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3.9.10

भ्रष्टाचार को मिलती मान्यता

लोकाचार में भ्रष्टाचार की प्रतिष्ठा के कारणों की पड़ताल कर रहे हैं जगमोहन सिंह राजपूत

राष्ट्रमंडल खेल तो होंगे ही, सफल भी घोषित होंगे और निश्चित रूप से इनके समाप्त होने पर आयोजन के जिम्मेदार कुछ लोगों को पुरस्कृत भी किया जाएगा। खेलों में भ्रष्टाचार की जांच के लिए कुछ जांच समितियां बना दी जाएंगी तथा उनका लिब्रहानीकरण कर दिया जाएगा। यानी जांच 16-17 वर्ष तक चल सकती है। इस देश में भ्रष्टाचार, घोटालों को उजागर करने वालों को हंसी का पात्र माना जाने लगा है। सूचना के अधिकार का प्रयोग कर तथ्य उजागर करने वालों की दिनदहाड़े हत्या कर दी जाती है। कहीं हत्या का अपराधी 66 बार जेल के बाहर जाता है, कोई दो-तीन महीने के पेरोल पर घर जाकर दादी की सेवा करता है। इस सबमें समानता का तत्व क्या है? धनबल से सत्ताबल, न्यायबल सब ढक जाता है। धनबल से सत्ता प्राप्त की जाती है। आने वाले वषरें में यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि धनबल सत्ता पर पूर्ण, स्वच्छंद अधिकार कर लेगा। स्वतंत्रता के चार दशकों बाद पंचायत राज अधिनियम बना। तब तक जनतंत्र की विकृति के आधार गांवों में पहुंच चुके थे। जाति आधारित राजनीतिक दल अपना स्थान बना चुके थे, ग्राम समाज बंट चुका था। बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के बीच की दीवार पक्की कर दी गई थी। 1993 में पीवी नरसिंहा राव की सरकार धन के लेन-देन से बची और केंद्र व राज्य सरकारों के लिए नजीर बन गई। गोवा, पूर्वोत्तर राज्य, झारखंड इसका भरपूर उपयोग करते रहे हैं। झारखंड के मधु कोड़ा कुछ अधिक ही साहसी निकले। उन्होंने व्यक्तिगत इच्छाओं तथा सरकारी खजाने में कोई भेदभाव नहीं रखा। खुले दिल से स्वहित साधन का खुला उदाहरण रख दिया। वैसे अब चारा घोटाले की चर्चा कौन करता है? किसे याद है झारखंड की जनता के हजारों करोड़ों की? क्या उसमें से एक पैसा भी वापस आया या आएगा? आज सारा देश हतप्रभ होकर देख रहा है? कुछ सौ करोड़ का अनुमान लगाकर खेलों के आयोजन की स्वीकृति पाने वाले आज कितने हजार करोड़ों का खेल प्रस्तावित आयोजन के पहले ही खेल चुके हैं, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। कहने को तो हर कोई पारदर्शिता की दुहाई देता है परंतु जो जानकारियां बाहर आई हैं वे भ्रष्टाचार तथा कदाचार के नए मानक स्थापित करती हैं। आजादी के बाद उम्मीद की जा रही थी कि अब शोषण, भ्रष्टाचार, सामाजिक अपमान धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे। प्रत्येक व्यक्ति को सत्ता में भागीदारी का न केवल अधिकार मिलेगा, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति का ख्याल किए बिना ही उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का बराबरी का अवसर भी हासिल होगा। वहां से चलते हुए केडी मालवीय, टीटी कृष्णामाचारी जैसे प्रकरण सामने आए। लोगों का विश्वास बढ़ा। इन पर व्यक्तिगत आरोप लगभग नगण्य थे। फिर लोगों के सामने रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा आया जो आंध्र में रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने दिया था। आज केंद्रीय मंत्रिमंडल में एक मंत्री ए राजा हैं। उन पर एक लाख करोड़ से ऊपर के भ्रष्टाचार के आरोप हैं। कहा तो यही जाता है कि प्रधानमंत्री उन्हें नई सरकार में नहीं लेना चाहते थे मगर सत्ता के समीकरणों ने उन्हें मजबूर कर दिया। ए राजा न कवेल मंत्री बने हैं बल्कि उनका विभाग भी आज तक नहीं बदला जा सका है। संविधान द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकारों का उपयोग यदि प्रधानमंत्री नहीं कर पाते हैं तो देश की जनता तथा युवा वर्ग को जो संदेश जाता है उसका असर लंबे समय तक रहेगा। उसी युवा वर्ग के प्रोत्साहन तथा मनोबल को बढ़ाने के लिए राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हो रहा है। आज दिन-रात स्कूल-कॉलेजों तथा घरों में हर कोई इन खेलों की नहीं, इनके आयोजन में भ्रष्टाचार के नए तरीकों की बात कर रहा है। चर्चा इस पर हो रही है कि भ्रष्टाचार तो सदा रहा है, लेकिन आज भ्रष्टाचार करने वाले के चेहरे पर शिकन नहीं आती है। वे जानते हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। यदि वे सत्ता में हैं तब तो मंत्री, मुख्यमंत्री या सरकार को सहारा देने वाले बन सकते हैं और आरोप ठंडे बस्ते में चले जाएंगे। सामाजिक मूल्यों पर जनतांत्रिक मूल्यों के Oास का जबरदस्त प्रभाव पड़ा है। चुने हुए प्रतिनिधियों की संपत्ति का ब्यौरा पांच साल में कई गुना बढ़ जाता है। सत्ता के ऊंचे पायदानों ने धनबल बढ़ाने के लिए जो कुछ किया है उसका खुला प्रदर्शन कॉमनवेल्थ खेलों में हुआ है। कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को राष्ट्रहित में खेलों के सफल आयोजन तक चुप रहना चाहिए। भ्रष्टाचार के, धन बटोरने में बेशर्मी के आरोप तो ऐसे हैं कि आयोजन से जुड़े अनेक लोगों को जेल में होना चाहिए। इस आयोजन ने सारे देश में आक्रोश की स्थिति पैदा कर दी है। युवा पीढ़ी विशेष रूप से आहत है। सब कुछ युवाओं को प्रोत्साहित करने के नाम पर हो रहा है। नैतिक पतन का ठोस उदाहरण उनके सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। युवा पीढ़ी ही इस स्थिति से देश को बाहर निकालने का रास्ता ढूंढ सकती है। आज नहीं तो कल ऐसा होगा ही। एक तरफ महंगाई करोड़ों को भूखा सुला रही है, तो दूसरी तरफ पैसे बटोरने की होड़ लगी है। महात्मा गांधी आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति को याद करते थे। आज के नेता चाहते हैं कि लोग राष्ट्रमंडल खेलों में देश की प्रतिष्ठा पर बट्टा लगाने वाले गुनहगारों के कारनामे भुला दें। ऐसा अधिक दिन नहीं होता है। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)
साभार:- दैनिक जागरण

2.9.10

तुम ही कहो ?

Independence या In Dependence...?? क्या कहूँ तुम ही कहो....??

आज आमजन के लिए हर मुकाम पे गुलामी है
कब तक ये सब अत्याचार सहूँ तुम ही कहो?

सब को यहाँ बस अपनी ही फ़िक्र है आजकल
देश अपना चला है किस चहूँ तुम ही कहो?

आमजन के करूण क्रंदन, नेताओं का फिर भी वंदन,
स्वतंत्र हूँ या हूँ अब भी बंदित, क्या कहूँ तुम ही कहो...

क्रांति के स्वर विकल हैं स्वार्थ के बियाबान में
धारा के विपरीत एक दुर्बल कैसे बहूँ तुम ही कहो?

वैचारिक मुफ़लिसी में है आज मंदिर भी मस्जिद भी
गदर के लिए किस धर्म की शरण गहूँ तुम ही कहो?

मन में उथल पुथल मचती हो जब नग्न व्यभिचार पर
व्यक्त करूँ दिल की व्यथा या चुपचाप रहूँ तुम ही कहो?

डायन डायबिटीज का विकराल रूप

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नक्सलियों ने फिर दिखाया सरकार का असली चेहरा

 नक्सलियों ने फिर दिखाया सरकार का असली चेहरा 

नक्सली एक बार फिर मार गए बाज़ी. जी हाँ आज ऐसा ही हुआ है. बिहार के लाखिसराए में कुछ दिन पहले हुए मुठभेड़ के बाद नक्सलियों ने ४ पोलिसे कर्मियों को अगवा कर लिया था, और उनकी जान के बदले नक्सलियों ने बिहार सरकार से अपने ४ साथियों को रिहा करने की मांग की थी, मियाद ख़त्म हो चुकी थी, पर केंद्र और बिहार सरकार की और से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, पर हर  वारदात के बाद अपना पलड़ा झड़ने वाले गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने इस बार भी  पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार पर डाल दी. कल से हर न्यूज़ चैनल में दिखाया जा रहा है की अगवा जवानों के परिजनों का रोरोकर बुरा हाल है, पर आज सुबह जब एस.आई.अभय यादव की पत्नी अपने बच्चों के साथ नितीश कुमार के निवास गयी तो उसे बाहर ही खड़े रहना पड़ा, मतलब सी.एम. साहब  के पास  एक जवान की पत्नी को ढाढस बंधाने का भी समय नहीं मिला. अगर नक्सलियों ने नितीश कुमार के किसी परिवार के सदस्य को अगवा किया होता तो?......, शाम को खबर आई की एक अगवा पुलिस एस.आई.अभय यादव की हत्या कर दी गयी है, पर शायद इससे भी किसी नेता को फर्क नहीं पड़ता, यह नक्सलियों और हमारे जवानों की बीच की जंग नहीं बल्कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच की जंग है , जिसमे शुरू से एस.पी.    वी.के.चौबे और अब अभय यादव जैसे जवान शहीद होते आ रहे हैं. 

भड़ास blog

"http://apnajahan.blogspot.com/2010/09/blog-post.html"

मैं लिखने की अक्सर कोशिश करता हूं.... आज भी अपनी तरफ से इमानदार कोशिश किया

हूं..... अगर आप पढ़े तो जरूर बतायें कि क्या त्रुटियां हैं, क्या कमियां हैं। साथ

हीं मेरे ब्लॉग में कौन सा आलेख कैसा है..... ताकि मैं अपने लेखनी को और दुरूस्त कर

सकूं....

आपके कमेंट की बाट जोहता मेरी ये रचना और मेरा ब्लॉग...
 
http://apnajahan.blogspot.com/2010/09/blog-post.html

कछुआ फिर जीत गया?

कलयुग में कछुए ने खरगोश को फिर से रेस करने की चुनौती दी और...... कछुआ फिर जीत गया ?
 
मैच फिक्सिंग विवाद से प्रेरित एक छोटी व्यंग्य रचना....

इंटरनेट पर हिन्दी वालों में भाषायी विभ्रम

      समझ में नहीं आता कहां से बात शुरू करूँ,शर्म भी आती है और गुस्सा भी आ रहा है। वे चाहते हैं संवाद करना लेकिन जानते ही नहीं हैं कि क्या कर रहे हैं,वे मेरे दोस्त हैं। बुद्धिमान और विद्वान दोस्त हैं। वे तकनीक सक्षम हैं । किसी न किसी हुनर में विशेषज्ञ हैं। उनके पास अभिव्यक्ति के लिए अनगिनत विषय हैं।

    वे हिन्दी जानते हैं । हिन्दी अधिकांश की आजीविका है। वे कम्प्यूटर भी जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि गूगल में अनुवाद की व्यवस्था है। इसके बाबजूद वे इंटरनेट पर हिन्दी फॉण्ट में नहीं लिखते अपनी अभिव्यक्ति को अंग्रेजी में हिन्दी के जरिए व्यक्त करते हैं। मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं ? लेकिन मैं विनम्रता के साथ हिन्दी भाषी इंटरनेट यूजरों से अपील करना चाहता हूँ कि वे नेट पर हिन्दी में लिखें। इससे नेट पर हिन्दी समृद्ध होगी।
    नेट पर हिन्दीभाषी जितनी बड़ी मात्रा में रमण कर रहे हैं और वर्चुअल घुमक्कड़ी करते हुए फेसबुक और अन्य रूपों में अपने को अभिव्यक्त कर रहे हैं यह आनंद की चीज है। मैं साफतौर पर कहना चाहता हूँ कि हिन्दी का अंग्रेजी के जरिए उपयोग उनके लिए तो शोभा देता है जो हिन्दी लिखने में असमर्थ हैं। लेकिन जो हिन्दी लिखने में समर्थ हैं उन्हें हिन्दी फॉण्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए।
     यूनीकोड फॉण्ट की खूबी है वह यूजर को अंधभाषाभाषी नहीं बनाता। आप ज्योंही यूनीकोड में गए आपको भाषायी फंडामेंटलिज्म से मुक्ति मिल जाती है। हिन्दी के बुद्धिजीवी, फिल्म अभिनेता-अभिनेत्री,साहित्यकार और पत्रकार नेट पर हिन्दी में ही लिखें तो इससे हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय ताकत बढ़ेगी।
    अंग्रेजी में हिन्दी लिखने वाले नेट यूजर यह क्यों सोचते कि उन्हें जो हिन्दी में नहीं पढ़ सकता वह गूगल से अनुवाद कर लेगा। आप ईमेल हिन्दी में लिखें,फेसबुक पर हिन्दी में लिखें,ब्लॉग पर हिन्दी में लिखें।
    यूनीकोड फॉण्ट लोकतांत्रिक है। यह सहिष्णु बनाता है। मित्र बनाता है। दूरियां कम करता है। संपर्क-संबंध को सहज बनाता है। इस फॉण्ट के इस्तेमाल का अर्थ है कि आप अपनी अभिव्यक्ति को विश्व भाषा संसार के हवाले कर रहे हैं। यूनीकोड फॉण्ट मित्र फॉण्ट है आप कृपया इसका इस्तेमाल करके तो देखें आपकी अभिव्यक्ति की दुनिया बदल जाएगी।
     दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषा को तकनीक के सहारे नहीं बचा सकते। कुछ लोग सोचते हैं कि भाषा को गूगल के अनुवाद के सहारे हम बचा लेंगे तो वे गलत सोचते हैं। भाषा को सीखकर और लिखकर ही बचा सकते हैं। भाषा अनुवाद की चीज नहीं है। अनुवाद से भाषा नहीं बचती।
    मुझे यह खतरा महसूस हो रहा है कि हिन्दी का नेट यूजर यदि हिन्दी में लिखना नहीं सीखता या उसका व्यवहार नहीं करता तो एक समय के बाद हिन्दी को पढ़ाने वाले भी नहीं मिलेंगे। हिन्दी हमारी भाषा है और यह गर्व की बात है कि हम हिन्दी में लिखते हैं। हमारी अंग्रेजियत हिन्दी के प्रयोग से कम नहीं हो जाती। अंग्रेजियत में जीने वाले लोग अंग्रेजी में लिखें लेकिन कृपा करके हिन्दी को अंग्रेजी में न लिखें। यह भाषा का अपमान है। उसकी अक्षमता की तरफ इशारा है। नेट पर हिन्दी तब तक अक्षम थी जब तक हिन्दी का यूनीकोड फॉण्ट नहीं था लेकिन आज ऐसा नहीं है। यूजर जब अपनी स्वाभाविक भाषा,परिवेश की भाषा का प्रयोग भ्रष्ट ढ़ंग से करता है तो अपने भाषायी विभ्रम को प्रस्तुत करता है। अंग्रेजी में हिन्दी लिखना भाषायी विभ्रम है। भाषायी विभ्रम निजी अस्मिता की मौत है। हम गंभीरता से सोचें कि हम भाषायी विभ्रम के सहारे क्यों मरना चाहते हैं ?      










1.9.10

कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्

-राजेश त्रिपाठी
पुण्य धरा भारत भूमि में भगवान ने समय-समय पर विविध अवतार ग्रहण कर सज्जनों के कष्टों का निवारण और दुर्जनों का संहार किया है। इन अवतारों में कृष्णावतार की महत्ता कहीं अधिक है क्योंकि इसमें प्रभु श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म युद्ध के लिए प्रवृत्त करने हेतु जिस गीता का गान किया, उसका दर्शन विश्व के लिए एक पाथेय बन गया। उसके आलोक में विश्व को इस बात का ज्ञान हुआ कि जीवन-धर्म क्या है, सत्य क्या है, जीवन क्या है, मृत्यु क्या है। स्वजन क्या हैं और मानव का कर्तव्य क्या है। एक प्रकार से कहें तो जीवन-दर्शन है प्रभु की वाणी से निस्सृत अमृतमयी गीता। इसका मनन-चिंतन और सम्यक अध्ययन मानव को मोह से निवृत्त और सत्कर्म पर प्रवृत्त करता है। कृष्ण कई अर्थों में विश्व को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, अपने कर्तव्य के प्रति सचेत होने और धर्माचरण में प्रवृत्त करने हेतु धरा पर आये थे।

कृष्ण का जन्म कारा में हुआ, शैशव और किशोरावस्था तक वे बाधाएं झेलते रहे। कंस ने उन्हें समाप्त करने के कितने प्रयत्न किये पर विजय अंततः श्रीकृष्ण की हुई। उनका संघर्षपूर्ण जीवन इस बात की प्रेरणा देता है कि अगर व्यक्ति निश्चय कर लें, दृढ़ प्रतिज्ञ हो तो सफलता अधिक दिनों तक उससे दूर नहीं भाग सकती। महाभारत युद्ध में कृष्ण को अपने ही परिजनों पर वार करने को प्रेरित करने वाले कृष्ण का उद्देश्य मात्र यही था कि जो अन्यायी है, उसे दंड मिलना ही चाहिए चाहे वह स्वजन ही क्यों न हो। ऐसा कर के वे यह स्पष्ट कर देना चाह रहे थे कि धर्मयुद्ध में सब कुछ उचित है। समय साक्षी है धर्मयुद्ध महाभारत में विजय पांडवों की ही हुई। यह और बात है कि युद्ध में जिसके सारथी स्वयं श्रीकृष्ण हो विजय हो उसकी होगी ही।

कृष्ण के अनेक रूप और अनेक अर्थ हैं उनकी लीलाओं को समझने के लिए गहरे चिंतन-मनन की जरूरत है। कुछ संसारी प्राणी उनकी लीलाओं को साधारण ज्ञान से सोचते हैं और अपने ढंग से अर्थ लगा लेते हैं। लेकिन सत्य तो यह है कि इन्हें जानने के लिए अंतर की अनुभूति और तर्क व मन की आंखों की आवश्यकता है। वायवीय रूप से उनकी लीलाएं सांसारिक लगेंगी लेकिन अगर इन्हें आध्यात्मिक ढंग से सोचा जाये तो कृष्ण के विराट रूप और उनके महिमामय व्यक्तित्व और कृतित्व के न जाने कितने आयाम खुलते चले जायेंगे और आप उन दैवीय स्वरूपों और उनकी लीलाओं से परिचित होकर उनमें इस तरह रम जायेंगे कि भक्त और भगवान की दूरी मिटती नजर आयेगी।

प्रारंभ प्रभु की बाललीला से करते हैं। जितनी बाल लीलाएं और उनमें भी सरस और सुंदर लीलाएं प्रभु ने कृष्णावतार में की हैं उतनी संभवतः किसी और अवतार में नहीं कर पाये। किन-किन प्रसंगों को याद करें। प्रभु की माखनचोरी की लीला, कंदुक क्रीड़ा, प्रुभ का मां का मन रखने के लिए ओखल में बंध जाना। जो संसार के प्रत्येक बंधन से लोगों को मुक्त करने की शक्ति रखता है उसका इस तरह मां के हाथों बंध जाना मां की महत्ता और उनकी सत्ता को गरिमा प्रदान करने की एक लीला ही तो थी अन्यथा बड़े-बड़े दैत्यों का संहार करने वाले कृषण के लिए सामान्य ऊखल से मुक्त होना कौन सी बड़ी बात थी। कालिया नाग का मानमर्दन, बकासुर वध, पूतना वध, गोपियों के वस्त्रहरण की लीला और न जाने कितने प्रसंग। सबमें प्रभु की सरसता, चपलता और कहीं उनका नटखटपन दिखता है। आपने अगर कभी कृष्णलीला देखी या सुनी है तो आपने पाया होगा कि माखन चोरी या दही की मटकी फोड़ने की शिकायत करने आयी गोपिकाएं कृष्ण को मां के हाथों दंड़ देना भी सह नहीं पातीं। यहां उनका वात्सल्य और कृष्ण के प्रति अनन्य अनुराग झलकता है। वे नहीं चाहतीं कि उनके प्रिय कृष्ण के कोमल गात पर कोई भी प्रहार करे, उनका मक्खन, दही चोरी होता है हो जाये। प्रभु का सलोना बाल स्वरूप सबको लुभाता और उनके जीवन को सार्थकता करता है। जैसे कि उन्हें अपने बीच पा कर गोपिकाएं और गोप हो धन्य हो गये।

कृष्ण की लीलाओं में कुछ लोग अपने संकुचित और सांसारिक सोच के चलते कलुष और मलिनता देखते हैं जो उनके सोच और उस स्वभाव का दोष है जो एक निश्चित सीमा से परे कुछ देखना ही नहीं चाहता। मेरा आशय कृष्ण की चीरहरण की लीला और गोपियों के संग उनकी रासलीला से है। कुछ लोग चीरहरण को सांसारिक दृष्टिकोण से देखते हैं और वही सोचते हैं जो उनका मन उन्हें सोचने के लिए प्रेरित करता है। वस्तुतः चीरहरण के प्रसंग को कुछ विद्वान इस बात से जोड़ते हैं कि उन दिन उत्पातियों और गलत प्रवृत्ति के लोगों का वहां बड़ा आतंक था, उनके प्रति गोपियों को सचेत करने और इस तरह स्नान न करने के लिए कृष्ण ने यह लीला की थी। ऐसे ही कुछ लोग रास में भी वासना के तत्व को जोड़ते हैं जो नितांत अनुचित और निरर्थक है। इसे इस दृष्टि से भी देखा जा सकता है कि प्रभु और भक्त में न दुराव होता है और न ही कोई सांसारिक आवरण। भक्त और भगवान का तो अनन्य प्रेम और अगाढ़ संबंध होता है। कृष्ण और गोपियों का जो अनुराग था वह सांसारिक भोग-लिप्सा से परे परम तत्व के साक्षात्कार और उससे तादाम्य का भाव था। वह परमात्मा से मिलन का वह अनुपम और अनन्य क्षण का प्रतिरूप था जहां देह की कोई भूमिका नहीं थी। जब प्रेम पराकाष्ठा को प्राप्त होता है, तो वहां देह भाव गौण और निरर्थक हो जाता है। इस स्थिति के परमानंद में देह की न कोई भूमिका है और न ही वासना का कोई अंश। प्रभु की इन लीलाओं का वर्णन कई विद्वानों ने अपनी-अपनी तरह से किया है। उसमें अधिकांश का मत है कि रासलीला में न वासना का पुट था और न ही भोग लिप्सा की झलक। कृष्ण ने ये लीलाएं यह दर्शाने के लिए कीं कि एकमात्र प्रेम ही जगत का सार तत्व है। प्रेम से किसी पर भी विजय पायी जा सकती है। यहां तक कि चंचल मन पर भी। गोपियों ने यही किया वे कृष्ण के सात्विक प्रेम में इस तरह डूब गयीं कि खुद कृष्णमय हो गयीं। न उनके मन में विकार रहा और न विचारों में। रास में एक प्रसंग आता है कि हर गोपी की यह इच्छा थी कि प्रभु उनके साथ अलग से नृत्य करें। कृष्ण को जब इसका भान हुआ तो उन्होंने ऐसी लीला की कि हर गोपी को यह लगने लगा कि कृष्ण तो उनके साथ हैं। यह प्रभु से तादात्म्य और उनके समीपत्व का भाव है। भक्त जब भक्ति की चरम सीमा में पहुंच जाता है तो वह हर जागतिक वस्तु में प्रभु के दर्शन प्राप्त करने लगता है। उसके लिए जगत की सारी वस्तुएं निस्सार और प्रभु का प्रेम ही सारतत्व हो जाता है। गोपियों की यही स्थिति हो गयी थी। वे प्रभु की अनन्य भक्त और अनुगामी थीं। उनके अलग जीवन की वे कल्पना भी नहीं कर सकती थीं। इसमें विकार या वासना देखना अनुचित है। भले ही इन प्रसंगों का वर्णन ललित और मोहनीय ढंग से काव्यों या ग्रंथों में हुआ हो लेकिन इन्हें इस रूप में देखना ही उचित है कि यह प्रेम की सतही नहीं सात्विक और स्वच्छ धारा थी जो गोपियों के हृदय में बह रही थी। यही वजह है कि गोपियों को जब समझाने उद्धव आते हैं तो वे उन्हें ही प्रश्नों से घेर देती हैं। वे साफ कहती हैं-‘ऊधो मन नाहीं दस बीस, एक हतो सो गयो श्याम संग केहिं आराधें ईश।’ यह अकाट्य सत्य है कि जो प्रभु में रम गया, वह अहर्निश उनकी ही स्मृति में खोया रहता है। फिर उसे सांसारिक बंधन बांध नहीं पाते और भोग-लिप्सा प्रभु के प्रति उनके प्यार से उनको डिगा नहीं पाती।

आज के भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार के घटाटोप अंधेरे में कृष्ण की वाणी और भी सार्थक और सटीक लगने लगी है। कृष्णावतार की सबसे बड़ी भूमिका तो अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार से लड़ने और उसे समाप्त करने के लिए ही थी। दुष्ट दुर्योधन के इशारे पर जब दुस्शासन अपने ही कुल की कुलीन स्त्री को भरी सभा में नग्न करने का प्रयत्न करता है और कृष्ण आकर उनकी मान रक्षा करते हैं। ऐसा कर प्रभु ने अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होने की प्रेरणा दी। इसका आशय यह है कि आप ऐसा कुछ भी अपने समक्ष होते देखते हैं तो आप अपने सामर्थ्य भर उसका प्रतिरोध करें। इसके आगे झुके नहीं। कहना नहीं होगा नारी का यही अपमान विश्व के सबसे बड़े धर्मयुद्ध महाभारत का कारण बना जहां अंततः विजय धर्म की ही हुई।

कृष्ण ने यह प्रतिपादित किया कि जहां-जहां धर्म पर प्रहार हुआ, खल प्रवृत्ति के लोगों ने सज्जनों का जीना दूभर कर दिया वहां से उनकी भूमिका प्रारंभ होती है। दुष्ट दलन कर धर्म को प्रतिष्ठित करने, शाश्वत, स्वच्छ मानव मूल्यों के पुनर्स्थापन की भूमिका, जग को धर्म पथ दिखाने की भूमिका। युद्धस्थल में स्वजनों को गांडीव के लक्ष्य के सामने देख मतिभ्रम और मोहग्रस्त हुए अर्जुन का मोहभंग करने और उसे धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित करते समय कृष्ण अपने धराधाम पर आने की प्रासंगिकता बताते हुए कहते हैं-‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यहम्। परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्. धर्म संस्थापनार्थाय संभावामि युगे-युगे।’ अर्थात हे अर्जुन! जब-ब भारत भूमि में धर्म का पराभव होगा तब-तब अधर्म के नाश के लिए मैं अवतार लूंगा। साधुओं की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होऊंगा।’ अपनी इस वाणी से प्रभु श्रीकृष्म जगद्उद्धार की अपनी प प्रतिबद्धता, संकल्प के प्रति अर्जुन को बताते हैं। अर्जुन का व्यामोह तोड़ने के लिए प्रभु बताते हैं कि जिन स्वजनों, परिजनों को तुम अपने समक्ष देख रहे हो इन्हें न तो तुमने पैदा किया है और न ही तुम इनकी मृत्यु का कारण ही बनोगे। जन्म लेना और पुनः मृत्यु को प्राप्त करना तो इनकी नियति है इसमें तुम्हारी कोई भूमिका नहीं है फिर ग्लानि कैसी, मोह कैसा। स्पष्ट है कि अगर अर्जुन मोहग्रस्त होकर युद्ध से विमुख हो जाता तो न जाने कितने अनर्थों और अनाचारों को बल मिल जाता। द्रौपदी को निर्वस्त्र करने की कुचेष्टा करने वाला दुस्शासन ऐसा करने का साहस पा जाता। दुर्योधन का मन और बढ़ जाता। समाज में व्याप्त अनाचार, अत्याचार और अन्याय समाप्त होने के बजाय बढ़ता जाता। महाभारत के कोई चाहे कितने अर्थ लगाये लेकिन मेरे विचार से इसका सबसे सटीक और अकाट्य अर्थ यही है कि बुरे काम का बुरा नतीजा। कौरवों ने अपने भाइयों के साथ बुरा किया जिसका फल उन्हें भोगना पड़ा।

कृष्ण के अर्जुन का सारथी बनने के प्रसंग की कथा भी एक शिक्षा ही देती है। कृष्ण ने अपनी तरफ से कौरव-पांडव युद्ध टालने का पूरा प्रयत्न किया लेकिन जब कौरव युद्ध के बिना पांडवों को सुई की नोंक के बराबर भी भूमि देने को तैयार नहीं हुए तो फिर कृष्ण को भी लगा कि अब युद्ध ही एक रास्ता बना है। कृष्ण का संबंध कौरवों और पांडवों दोनों से था। ऐसे में दोनों चाहते थे कि वे युद्ध में उनकी मदद करें। कृष्ण ने कहा कि एक तरफ मेरी सेना है, और एक तरफ अकेला मैं। कौरव-पांडव तय कर लें कि किसे किसका साथ चाहिए। कहते हैं कि इस बारे में बात करने के लिए जब दुर्योधन पहुंचा तो कृष्ण लेटे हुए थे। वह उनके सिरहान खड़ा हो गया और अर्जुन उनके पैरों की ओर बैठ गया। कृष्ण जब उठे तो उनकी दृष्टि सर्वप्रथम अर्जुन पर पड़ी। अर्जुन ने कहा प्रभु मुझे आपका साथ चाहिए। कृष्ण ने कहा कि ठीक है वे सारथी के रूप में उनके साथ रहेंगे लेकिन युद्ध में कभी अस्त्र ग्रहण नहीं करेंगे। अब कृष्ण मुड़े तो उन्होंने दुर्योधन को खड़ा पाया उससे वे बोले कि भाई मैं तो अर्जुन का हो गया, बाकी बची सेना वह तुम ले लो। दुर्योधन बहुत खुश हुआ कि चलो कृष्ण को अस्त्र तो उठाना नहीं है, ये हमारा क्या बिगाड़ लेंगे इनकी सेना पाकर हमारी ताकत बढ़ जायेगी। यहां यह शिक्षा देने का प्रयत्न किया गया है कि किसी के पास सहायता के लिए जाओ तो अपना अहंकार अपना दंभ भूल कर विनयी भाव से जाओ क्योंकि प्रयोजन तुम्हारा है। विनयी होना सर्वदा लाभदायी होता है और दंभी, अहंकारी होना कष्टप्रद। अर्जुन विनयी भाव से गया तो उसे साक्षात प्रभु का साथ मिला और विजयश्री उसे ही प्राप्त हुई।

प्रभु कृष्ण की लीलाएं अनंत हैं। कोई कितना गान करे। प्रभु को कौन किस दृष्टि से देखता है यह उसके अपने मनोभावों पर निर्भर है। कहा भी है कि- जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। जब जिनके विचार ही कलुषित हों, जो विचार की संकुचित सीमाओं से ऊपर न उठ सके हों उनके किसी भी सोच से प्रभु की महत्ता तो कम नहीं होगी। कभी हमारे संस्कृत के आचार्य मान्यवर विदयाभूषण द्विवेदी जी ने संस्कृत का कोई पाठ पढ़ाते समय पूछा था कि हम कृष्ण को किस रूप में याद करना चाहेंगे, माखनचोर, रास रचैया या धर्म का साथ देने अधर्म का नाश करने वाले कृष्ण के रूप में। स्पष्ट है कि हम सबने ने यही कहा कि धर्म की रक्षा करने वाले कृष्ण ही हमारे आदर्श हैं। हमारे आदर्श वे द्वारकाधीश कृष्ण हैं जो गरीब सुदामा से मिलने सिंहासन छोड़ दौड़े आते हैं और उन्हें अपने सिंहासन पर बैठा उनका आदर सम्मान करते हैं। (आज के शासकों की तरह नहीं जिनके पास उस जनता के लिए ही समय नहीं होता जिसकी वजह से वे सत्ता सुख भोग रहे होते हैं। ठंड़े घरों में बैठ ये उस भोली जनता को सुनहरे सपने दिखाते और फिर निर्ममता से उन्हें तोड़ते रहते हैं। जनता का दुख सुनने के लिए जो जनता दरबार लगाने का नाटक करते हैं लेकिन उनके दुख दूर करने के लिए रंचमात्र भी प्रयास नहीं करने। हम लानत भेजते हैं ऐसे शासकों पर जो जनसेवा के अपने कर्तव्य को भूल बैठे हैं।)
कृष्ण के जगकल्याणकारी रूप को हम नमन करते हैं। हम योगेश्वर, कर्मयोगी, धर्मरक्षक कृष्ण का वंदन करते हैं। प्रभु से प्रार्थना है कि वे स्वार्थ, भोग लिप्सा, कदाचार, व्याभिचार में डूबी भारत भूमि की रक्षा करें। यहां की जनता की करुण पुकार करें और कुछ ऐसा चमत्कार करें कि भारतवर्ष के जनता के प्रति उदासीन शासक नींद से जागें और अपने कर्तव्य को निभायें ताकि इस पावन भूमि के प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित स्थान, सम्मान मिले। दीनता मिट जाये, सर्वत्र सुख का साम्राज्य हो। भागवत् का प्रारंभ भी कृष्ण वंदना से ही हुआ है-सच्चिदानंद रूपाय, विश्व उत्पत्ति हेतवे, तापत्रय विनाशाय श्रीकृष्ण वयं नुमः।
कृष्ण को नमन-वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

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मधुमेह और उच्च-रक्तचाप- दोहरी मुसीबत

मधुमेह और उच्च-रक्तचाप- दोहरी मुसीबत 

उच्च-रक्तचाप की परिभाषा



उच्च-रक्तचाप वह रोग है जिसमें हृदय के संकुचन की अवस्था में रक्त वाहिकाओं में रक्त का दबाव पारे के 140 mm से ज्यादा या हृदय के विस्तारण की अवस्था में 90 mm से ज्यादा रहता है या दोनों अवस्थाओं में ज्यादा रहता है। यह दो प्रकार का होता है। पहला प्रमुख ( Essential) उच्च-रक्तचाप जिसमें हम रक्तचाप बढ़ने का कोई कारण नहीं ढूंढ़ पाते हैं, रक्तचाप के 85% से 90% रोगी इसी क्षेणी में आते हैं। अगला है द्वितीयक (Secondary) उच्च-रक्तचाप जिसमें रक्तचाप का उपचार योग्य कोई कारण विद्यमान रहता है। चूंकि आरंभिक अवस्था में रोगी में कोई लक्षण नहीं होते हैं, इसलिए इसे “मूक कातिल” भी कहते हैं।



मधुमेह और उच्च-रक्तचाप दोनों ही रोगों में हृदय रोग, वृक्क रोग तथा अन्य घातक जटिलताओं का जोखिम रहता है। यदि रोगी में दोनों एक साथ डेरा डाल लें तो उपरोक्त जटिलताओं का जोखिम दुगुना नहीं बल्कि एक और एक ग्यारह की तर्ज पर बढ़ेगा। दुर्भाग्य वश उच्च रक्तचाप रोग की संभावना सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा डायबिटीज के रोगी में कहीं ज्यादा रहती है। मधुमेह और उच्च रक्तचाप के साथ यदि रोगी में रक्त-वसा की विकृतियां (Dyslipidemia), केन्द्रीय स्थूलता (Central Obesity) और एथेरोस्क्लिरोसिस भी विद्यमान हो तो इस अवस्था को सिन्ड्रोम-एक्स (Syndrome-X) कहते हैं।



यदि डायबिटीज के रोगी को उक्त रक्तचाप भी है तो कोरोनरी धमनी रोग, हार्ट फेल्यर या हृदयवात, पेरीफ्रल वेस्कूलर रोग, क्षणिक अरक्तता दौरा (Transient Ischemic Attack) और स्ट्रोक का जोखिम अपेक्षाकृत काफी ज्यादा रहता है। डायबिटीज के रोगी में उच्च रक्तचाप रोग की उपस्थिति नेफ्रोपैथी, रेटीनोपैथी आदि जटिलताओं की संभावना को और प्रबल बनाती है। यदि डायबिटीज के रोगी को उच्च रक्तचाप रोग भी है तो रेटीनोपैथी के लक्षण जल्दी दिखाई देते हैं। यदि रक्तचाप पर कड़ा नियंत्रण रखा जाये तो रेटीनोपैथी की प्रगति धीरे होगी। डायबिटीज के रोगी को यदि उच्च रक्तचाप भी हो तो नेफ्रोपैथी तेजी से प्रगति करेगी। नेफ्रोपैथी का आरंभिक लक्षण सूक्ष्मश्वेतकमेह या माइक्रोएल्ब्युमिनुरिया है। ऐसा देखा गया है कि यदि रक्तचाप ज्यादा है तो मूत्र में एल्ब्युमिन का स्राव भी ज्यादा होगा। यदि रक्तचाप और रक्त शर्करा का नियंत्रण प्रभावशाली है तो मूत्र में एल्ब्युमिन का स्राव रूक जायेगा या न्यूनतम हो जायेगा। यदि डायबिटीज के उन रोगियों, जिनमें पहले से ही वृक्क रोग प्रगतिशील है, और उन्हें उच्च रक्तचाप रोग भी हो जाता है और अनियंत्रित छोड़ दिया जाता है तो उसमें वृक्क रोग अन्तिम अवस्था की ओर काफी शीघ्रता से प्रगति करेगा।


कारण


कारण जिन्हें हम बदल नहीं सकते हैं।


1- उम्र 2- प्रजाति 3- जीवन शैली 4- आनुवंशिक 5- लिंग।


कारण जिन्हें हम बदल सकते हैं।


1- स्थूलता 2- सोडियम संवेदनशीलता 3- मदिरापान 4- गर्भ निरोधक गोलियां 5- शारीरिक


निष्क्रियता (Sedantary Life) 6- दवाइयां।

आरंभिक लक्षण

आरंभिक अवस्था में सामान्यतः कोई लक्षण नहीं होते हैं। कुछ रोगी शुरू में चक्कर, चेहरा तमतमाना, सरदर्द, थकावट, मिचली, वमन, नकसीर और बैचेनी जैसे लक्षण बताते हैं। चौथी हृदय ध्वनि भी आरंभिक संकेत हैं। बाद में दृष्टि में धुंधलापन, श्वासकष्ट (Dysnoea), हृदयाघात (Heart Attack), हृदपात (Heart Failure), क्षणिक अरक्तता दौरा (Transient Ischemic Attack), वृक्कपात (Kidney Failure), दृष्टि हीनता, परिसरीय वाहिकीय रोग (Peripheral Vascular Disease) के कारण चलते समय पैरों में दर्द आदि।


उच्च-रक्तचाप के लगभग 1% रोगी तभी चिकित्सक से संपर्क करते हैं जब रक्तचाप बहुत बढ़ जाता है जिसे दुर्दम उच्च-रक्तचाप (Malignant Hypertension) कहते हैं। दुर्दम उच्च-रक्तचाप में विस्तारण रक्तचाप 140 mm से ऊपर रहता है और स्ट्रोक या रक्तस्राव का बहुत जोखिम रहता है । इस अवस्था का तुरंत सघन उपचार आवश्यक है।


याद रहे रक्तचाप वर्षों तक चुपचाप लक्षण रहित बना रह सकता है और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों जैसे हृदय, आँखें, वृक्क, मस्तिष्क आदि को चुपचाप क्षतिग्रस्त करता रहता है। कई बार हमें रक्तचाप होने की जानकारी तभी निलती है जब हमें हार्ट अटेक या स्ट्रोक होता है या इंश्योरेंस हेतु रक्तचाप नपवाते हैं।


निदान


भूतकाल, पारिवारिक, व्यक्तिगत और चिकित्सा इतिहास बारीकी से पूछिये।

भौतिक निरीक्षण- रक्तचाप नापें, कलाई, टखना और पैर की नब्ज़, हृदय, फेफड़े, उदर, रेटीनोपैथी आदि।

मूत्र परीक्षण- विशिष्ट घनत्व (Specific Gravity), सूक्ष्म श्वेतकमेह (Microalbuminuria), शर्करा, कास्ट आदि।

रक्त परीक्षण- संपूर्ण रक्त गणना (CBC), विद्युत अपघट्य (Eletrolytes), यूरिया, क्रियेटिनीन, जी.एफ.आर. (Glomerular Filtration Rate), लिपिड प्रोफाइल, थायराइड के T3 T4 TSH टेस्ट आदि।

छाती का एक्सरे, अल्ट्रासाउन्ड, CT स्केन, ECG, 2-डी इको, कलर डोपलर आदि।


डायबिटीज के रोगी में उच्च रक्तचाप के कुप्रभाव


सूक्ष्म वाहिका कुप्रभाव या Microvascular complications

• वृक्क रोग
• स्वायत्त नाड़ी-दोष (Autonomic Neuropathy) सेक्स संबंधी दोष और ऑर्थ्रोस्टेटिक हाइपरटेंशन।
• नैत्र रोग ग्लूकोमा, डायबीटिक रेटीनोपैथी और इसके फलस्वरूप दृष्टिहीनता।


दीर्घ वाहिका कुप्रभाव या Macrovascular complications

• हृदय रोग कोरोनरी धमनी रोग, रक्ताधिक्य हृदयवात या कंजेस्टिव हार्ट फेल्यर और कार्डियोमायोपैथी।
• मस्तिष्क रोग स्ट्रोक।
• परिसरीय वाहिकीय रोग (Peripheral Vascular Disease). पैरों में फोड़े, पैर विच्छेदन (Foot Amputation) आदि।


कुछ विशेष पहलू



डायबिटीज के रोगी में उच्च रक्तचाप रोग का उपचार आरंभ करने के पहले मैं आपको बतलाना चाहता हूं कि यह उच्च रक्तचाप का कारण कहीं अल्प रक्त-शर्करा (Hypoglycemia) तो नहीं हैं। कभी-कभी डायबिटीज के रोगी की रात्री में शर्करा कम हो जाती है जिसके फलस्वरूप सुबह रक्तचाप बढ़ जाता है और नींद से जागते ही सरदर्द हो सकता है। इसका कारण अल्प रक्त-शर्करा की वजह से एड्रीनेलिन, कोर्टिजोल, ग्रोथ हार्मोंन, ग्लुकागोन आदि हार्मोंन्स के स्राव का बढ़ना है। अतः दवाईयां या इन्सुलिन लेने वाले डायबिटीज के रोगी में रक्तचाप का उपचार शुरू करने के पहले यह सुनिश्चित कर लें कि उच्च रक्तचाप का कारण कहीं हाइपोग्लाइसीमिया तो नहीं है।


डायबिटीज के कुछ रोगियों में ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी के कारण पोस्चुरल हाइपोटेंशन होता है। यदि ऐसी संभावना का आभास हो तो चिकित्सक को चाहिये कि वह रक्तचाप का माप दोनों बाहों में रोगी को लेटाकर बैठा कर और खड़ा करके तीनों अवस्थाओं में ले।


डायबिटीज में रोगी के रक्तचाप का कड़ा नियंत्रण रखना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिये। चिकित्सक को हर बार डायबिटीज के रोगी का रक्तचाप नापना चाहिए। रोगी को स्पष्ट हिदायत दे देनी चाहिए कि उसे अपनी शर्करा और रक्तचाप आजीवन नियंत्रण में रखने है। जहां तक संभव हो रक्तचाप 120/80 के आस-पास रखना चाहिए। दुर्भाग्यवश कई रोगी ऐसा सोचते हैं कि यदि उन्हें रक्तचाप के सामान्य लक्षण जैसे सर दर्द आदि नहीं है तो रक्तचाप सामान्य ही होगा और वे दवा लेना बन्द कर देते हैं। लेकिन यह गलत है उच्च रक्तचाप शांत रहकर वार करने वाला शत्रु है। कई बार रक्तचाप बहुत ज्यादा होते हुये भी रोगी में कोई लक्षण नहीं होते। यदि हम यह सोचे कि रक्तचाप के लक्षण दिखाई देने पर उपचार शुरू करेंगे तो यह बड़ा त्रुटि पूर्ण निर्णय होगा क्योंकि तब तक वह शरीर को काफी क्षति पहुंचा चुका होता है।


रक्तचाप नापने के संबंध में सावधानियाः-
• रक्तचाप नापने के पहले यह सुनिश्चित कर ले कि रोगी ने पिछले 30 मिनट में केफीन, गुटखा, बीड़ी या सिगरेट का सेवन न किया हो।
• रक्तचाप मापने के पहले रोगी को शांत वातावरण में 5-10 मिनट विश्राम करने को कहें।
• यह सुनिश्चित कर लें कि रक्तचाप मापक यंत्र ठीक से काम कर रहा हो। इसका नियमित रखरखाव आवश्यक है।
• रक्तचाप को दो से अधिक बार नापें।
• दोनों बाहों का रक्त चाप नापें।
• हमेशा ध्यान रखे की यंत्र का कफ रोगी के बांह के नाप का हो।


अपने रोगियो को यह अच्छी तरह समझा दे की वे अपना रक्त चाप नियमित नपवाते रहें यदि रक्तचाप ज्यादा या कम हो तो चिकित्सक से सम्पर्क करें। रक्तचाप मापने के लिये पारे वाला या डायल वाला यंत्र ही सबसे अच्छा माना गया है। इलेक्ट्रानिक रक्तचाप यंत्र पर भरोसा न करें, यह कई बार गलत निर्णय देता है।


नोन-सलेक्टिव बीटा ब्लॉकर जैसे प्रोप्रेनालोल और सलेक्टिव बीटा ब्लॉकर जैसे ऐटीनोलोल और मेटोप्रोलोल दोनों ही ट्राइग्लीसराइड्स की मात्रा 30-40 % और HDL कॉलेस्ट्रोल की मात्रा 10-15 % बढ़ाते हैं। सिम्पेथेटिक प्रभाव वाले बीटा-ब्लॉकर जैसे प्रेक्टोलोल और पिंडोलोल वसा की मात्रा को प्रभावित नहीं करते है। वेरापेमिल और नीफेडिपिन कालेस्ट्रॉल को कम करती हैं। ACE इनहीबिटर्स और ARB लिपिड प्रोफाइल को प्रभावित नहीं करते हैं।


एक पहलू जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं, वह है पुरुषों में स्तंभन दोष। यह डायबिटीज के पुरूष रोगियों की महत्वपूर्ण समस्या है। ऐसा देखा गया है कि डायबिटीय होने के कुछ वर्षों बाद लगभग 50-60 % पुरूष रोगियों को स्थम्भन दोष की शिकायत हो जाती है। इसके कारण इससे रोगियों को काफी मानसिक आघात पहुँचता है। इसके बारे में वह अपने चिकित्सक से भी नहीं कह पाता है। ऐसे कितने चिकित्सक है जो अपने रोगियों से इस विषय के बारे में भी खुलकर प्रश्न करते हैं। जबकि आज हमारे पिटारे में नपुंसकता के लिये ढ़ेर सारे उपचार हैं। दुर्भाग्यवश ज्यादातर रक्तचाप की दवाईयों का दुष्प्रभाव नपुंसकता है। हमें चाहिये कि ऐसी दवाईयों का उपयोग बन्द करें। और किन्हीं विषम परिस्थितियों में उन्हें देना भी पड़े तो रोगी को उनके दुष्प्रभाव पहले से बताये जायें।

आज जब हमारे पास बेहतर दवाईयां उपलब्ध है जो रक्तचाप का स्निग्ध नियंत्रण करने के साथ-साथ रोगी में कोई सेक्स विकार भी नहीं करती हैं। तो हम क्यों अज्ञानवश पुरानी दवाईयां ही रोगियों को खिलाये जा रहे हैं। डाययुरेटिक्स, बीटा ब्लॉकर्स और हाईड्रेलेजील भी स्थम्भन दोष के लिये जिम्मेदार है। ACEi’s और ARB’s पूर्णतः सुरक्षित है।



हमने उपर देखा था कि ओटोनोमिक न्युरोपैथी के कारण कई रोगियों में पोस्चुरल हाइपोटेंशन की शिकायत होती है। ऐसे रोगियों को वे दवाईयां नहीं देनी चाहिये जिनका पार्श्व प्रभाव पोस्चुरल हाइपोटेंशन है जैसे- प्रेजोनिन, हाइड्रेनेजिन, मिनोक्सीडिल और कुछ डाइयुरेटिक्स बीटा ब्लॉकर्स में पिन्डोलोल काफी सुरक्षित मानी गयी है। CCB’s, ACEi’s और ARB’s भी इस मामले में अपेक्षाकृत सुरक्षित है।


रक्तचाप की देखभाल


सेकन्ड्री हाइपरटेंशन


हमारा अगला कदम उच्च रक्तचाप के उन कारणों का पता लगाना है, जिनका संपूर्ण उपचार शल्य क्रिया या अन्य तरीकों द्वारा संभव है, जैसे गर्भ निरोधक गोलियां, स्टिरोयड्स, एक्रोमेगाली, कशिंग्स सिंड्रोम, थायरोटोक्सिकोसिस, कोन्स सिंड्रोम, फियोक्रोमोसाइटोमा और रिनो-वेस्कुलर हाइपरटोंशन। हालांकि सामान्यतः विषमताओं के निदान हेतु विशेष जांचे नहीं करवाई जाती हैं, लेकिन एक अनुभवी चिकित्सक उपरोक्त कारणों को आरंभिक अवस्था में भी ताड़ ही लेता है।


नियंत्रण

रक्तचाप नियंत्रण की कई दवाइयों को हम विषम पार्श्व प्रभावों के कारण डायबिटीज में प्रयोग नहीं कर पाते हैं। हमें औषधियों के साथ साथ रक्तचाप के अन्य प्राकृतिक उपचार भी अपनाने चाहिये जैसे योग, ध्यान, प्राणायाम या जड़ी बूटियां । स्थूलता से रक्तचाप बढ़ता है और वजन कम करने से रक्तचाप कम होता है। इसलिए मोटे डायबीटिक को हमेशा वजन कम करने की सलाह दी जाती है।


नमक (सोडियम क्लोराइड) का सेवन कम करने से रक्तचाप पर बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ता है। जब रक्तचाप बढ़ता है तो आरंभिक अवस्था में रक्त का आयतन भी बढ़ता है, जिसका कारण बढ़ी हुई ग्लुकोज का रसाकर्षण (Osmosis) प्रभाव है। इसमें सोडियम की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। ऐसा देखा गया है कि यदि डायबिटीज के रोगी को ब्लड प्रेशर भी है तो उसका सोडियम अपेक्षाकृत 10% ज्यादा होता है।


रक्तचाप बढ़ने में सोडियम की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और सोडियम की मात्रा कम करना रक्तचाप के उपचार का कैंद्र बिंदु है। सोडियम की मात्रा कम करने के दो उपाय हैं, सोडियम का सेवन कम करना या डाइयुरेटिक्स लेना। डाइयुरेटिक्स के कई विषम पार्श्व प्रभाव हैं अतः डायबिटीज के रोगी को सोडियम (नमक) का सेवन कम से कम करना ही श्रेष्टतम होगा।


उच्च रक्तचाप में दी जाने वाली मुख्य दवाइयां


एंजियोटेंसिन कनवर्टिंग एंजाइम इन्हिबिटर्स (ACEi’s)

सन् 1981 से प्रचलित ACEi’s विषेशतौर पर डायबिटीज के रोगियों में उच्च रक्तचाप के उपचार की लोकप्रिय दवा है। डायबिटीज के रोगी में नेफ्रोपैथी की आरंभिक अवस्था (माइक्रोएल्ब्युमिनुरिया) से ही इसे शुरू कर देना चाहिये चाहे रक्तचाप सामान्य रहता हो। ऐसे पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं कि यह ग्लोमेर्युलस की केशिकाओं में रक्त का दबाव कम करती हैं जिसके फलस्वरूप नेफ्रोपैथी के कारण हुई आरंभिक क्षति को या तो उलट कर सही कर देती है या कम से कम क्षति की प्रगति को अवरुद्ध तो करती ही है। यह डायबिटीज में उच्च रक्तचाप की पसंदीदा औषधि है। यह उन रोगियों के लिए भी हितकारी है जिन्हें हृदयाघात, कंजेस्टिव हार्ट फेल्यर या डायबीटिक किडनी रोग हो चुका हो। हाल ही हुए परीक्षणों से यह निश्कर्ष निकला है कि यह स्ट्रोक, कोरोनरी धमनी रोग और अन्य हृदय रोगों के जोखिम को 20% से 30% कम करते हैं। ये इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाते हैं। इनका लिपिड प्रोफाइल पर कोई कुप्रभाव नहीं है। ये रेटीनोपैथी की प्रगति में अवरोध पैदा करते हैं।

कार्य प्रणाली

एंजियोटेंसिन कनवर्टिंग एंजाइम (ACE) एक प्रोटीन है जो निष्किय तत्व एंजियोटेंसिन-I को एंजियोटेंसिन-II में बदल देता है। एंजियोटेंसिन-II एक प्रबल तत्व है जो रक्त वाहिकाओं का संकुचन करता है। एंजियोटेंसिन कनवर्टिंग एंजाइम इन्हिबिटर्स (ACEi’s) इस एंजाइम को निष्क्रिय कर रक्त में एंजियोटेंसिन-II का मात्रा को कम करते हैं। एंजियोटेंसिन-II प्रबल रक्त वाहिका संकुचक है और एल्डोस्टेरोन का स्राव बढ़ाता है। एल्डोस्टेरोन सोडियम और जल को रोकता है। इस तरह ACEi’s एंजियोटेंसिन-II के स्राव को कम कर रक्त वाहिकाओं का विस्तारण करते हैं और एल्डोस्टेरोन के प्रभाव को निष्क्रिय करते हैं, फलस्वरूप रक्तचाप कम होता है।

वर्जना

अतिसंवेदनशीलता, गर्भावस्था, सोडियम ज्यादा होना, दोनों रीनल धमनियों का संकुचन। यदि यह दवा शुरू करते ही क्रियेटिनीन बढ़ने लगे तो मान कर चलें कि हो न हो यह दोनों रीनल धमनी के संकुचन के कारण ही बढ़ा हो। पहले इस संभावना का निदान कीजिये।

पार्श्व प्रभाव

ब्रेडीकाइनिन जमा होने के कारण बिना बलगम वाली सूखी खांसी, एंजियोऐडीमा, हाइपोग्लाइसीमिया, रक्तचाप कम हो जाना, एंजाइना (छाती में दर्द), , चक्कर आना, सर दर्द, कमजोरी, थकावट, मिचली, वमन, दस्त, कब्जी, श्वेत रक्त कण कम हो जाना, त्वचा में चकत्ते, चेहरा तमतमाना, सोडियम ज्यादा होना और मूत्र में प्रोटीन का स्राव।


एंजियोटेंसिन रिसेप्टर ब्लॉकर (ARBs)

एंजियोटेंसिन रिसेप्टर ब्लोकर उच्च रक्तचाप की दवाइयों की सबसे नई क्षेणी है जो ACEi’s के समान प्रभावशाली है। नये परीक्षणों से सिद्ध हुआ है कि अन्य दवाइयों की अपेक्षा ARBs वृक्कों की सुरक्षा बहतर ढंग से करती हैं। उच्च रक्तचाप की अनुपस्थिति में भी ये मूत्र में एल्ब्युमिन के स्राव (माइक्रोएल्ब्युमिनुरिया) कम करते हैं।

कार्य प्रणाली

ये एंजियोटेंसिन-II की उसके अभिग्राहक (रिसेप्टर) से समन्वय को बाधित करते हैं और इस तरह एंजियोटेंसिन-II का रक्त वाहिका संकुचन नहीं कर पाता है तथा एल्डोस्टेरोन का स्राव भी कम होता है। एल्डोस्टेरोन सोडियम और जल को रोकता है और रक्त का आयतन बढ़ाता है। ARBs इस तरह एल्डोस्टेरोन के प्रभाव को निष्क्रिय करते हैं, और रक्तचाप कम होता है।

वर्जना

अतिसंवेदनशीलता, गर्भावस्था, सोडियम ज्यादा होना, दोनों रीनल धमनियों का संकुचन। यदि यह दवा शुरू करते ही क्रियेटिनीन बढ़ने लगे तो सबसे पहले रीनल धमनियों के संकुचन की संभावना पर गौर कीजिये।

पार्श्व प्रभाव

ऑर्थोस्टेटिक हाइपरटेंशन, एंजियोऐडीमा, चक्कर आना, सर दर्द, थकावट, अपच, दस्त, मांस पेशियों में एंठन, त्वचा में चकत्ते, चेहरा लाल होना, सोडियम ज्यादा होना और मूत्र में प्रोटीन का स्राव।

केल्शियम चेनल ब्लॉकर (CCBs)

केल्शियम चेनल ब्लॉकर (CCBs) को उच्च रक्तचाप और एंजाइना के उपचार में व्यापक रूप से प्रयोग में लिया जाता है। कुछ वर्षों पहले ऐसी जानकारियां मिली थी कि इसके सेवन करने वाले रोगियों को हार्ट अटेक हो रहे हैं। यह बड़ी अचरज भरी घटना थी। हालांकि ये हार्ट अटेक निफेडिपिन के कारण हो रहे थे, जो वास्तव में उच्च रक्तचाप के उपचार हेतु कभी भी स्वीकृत नहीं की गई थी। सामान्यतः दीर्घ प्रभावी CCBs को काफी सुरक्षित माना जाता है क्योंकि ये धीरे धीरे और सहजता से रक्तचाप कम करते हैं। ये आजकल पुनः लोकप्रिय हो रही हैं।


CCBs दो तरह के होते हैं। डाइहाइड्रोपाइरिडीन्स CCBs (जैसे एम्लोडिपिन, डिलटायजेम) और नोनडाइहाइड्रोपाइरिडीन्स CCBs (जैसे वेरापेमिल)।


CCBs और ACEi’s को साथ दिया जाय तो मूत्र में एल्ब्युमिन का स्राव कम होता है।


कार्य प्रणाली
रक्त वाहिका की पैशी कोशिका (Muscle Cell) की झिल्लियों में केल्शियम के प्रवेश हेतु विशेष मार्ग होते हैं जिन्हें केल्शियम चेनल्स कहते हैं। केल्शियम इन चेनल्स से गुजरती हुई कोशिका में प्रवेश करती हैं और पैशी कोशिका का संकुचित करती हैं। जैसा कि नाम से स्पष्ट है केल्शियम चेनल ब्लॉकर (CCBs) झिल्लियों की केल्शियम चेनल्स को बंद कर देती हैं और पैशी कोशिका के संकुचन को कमजोर करती हैं। इससे रक्त वाहिकाओं का विस्तारण (Dilatation) होता है और रक्तचाप कम होता है। हृदय की पैशियां भी केल्शियम पर निर्भर हैं लेकिन इनका विन्यास कुछ अलग तरह का होता है, जिसके फलस्वरूप कुछ CCBs सिर्फ हृदय की पैशियों पर ही काम करती हैं और अन्यत्र नहीं। CCBs का कोरोनरी धमनियों को विस्तारित करना एंजाइना और उच्त रक्तचाप के लिए हितकारी है।

वर्जना

अतिसंवेदनशीलता, दूसरे या तीसरे दर्जे का हार्ट ब्लॉक, सिक साइनस सिन्ड्रोम, सिंपेथेटिक हाइपोटेंशन, कंजेस्टिव कार्डियक फैल्यर, कोरोनरी धमनी रोग।

पार्श्व प्रभाव

एवी हार्ट ब्लॉक, परिधीय एडीमा, सर दर्द, चक्कर, मसूढ़े बढ़ जाना, कब्जी आदि।

बीटा ब्लॉकर्स

हृदय की विषमताओं पर अनुकूल प्रभाव के कारण पहले बीटा ब्लॉकर्स डायबिटीज में उच्च रक्तचाप के उपचार में खूब लिखे जाते थे। लेकिन हाल ही हुई शोध से कुछ प्रतिकूल बातें सामने आई हैं जैसे हाइपोग्लाइसीमिया के लक्षणों का महसूस न होने के कारण रोगी का बेफिक्र बने रहना, पेरीफ्रल वेस्कुलर रोग में वृद्धि, रक्त-शर्करा और LDL-कॉलेस्ट्रोल का बढ़ना, जिससे कारण इनका प्रयोग काफी कम हुआ है।


नोन सेलेक्टिव बीटा ब्लॉकर्स जैसे प्रोप्रेनोलोल उपवास और आहार दोनों समय इंसुलिन का स्राव कम करते हैं और रक्त-शर्करा को 25%-30% बढ़ाते हैं। हालांकि सेलेक्टिव बीटा ब्लॉकर्स जैसे मेटोप्रोलोल, एटीनोलोल आदि सामान्यतः इंसुलिन के स्राव को प्रभावित नहीं करते हैं।


यह सत्य है कि रक्त-शर्करा की 30% बढ़त कोई विशेष नहीं है और इसे दवाइयों की मात्रा बढ़ा कर कम किया जा सकता है।


ग्लुकागोन का स्राव भी बीटा एड्रिनर्जिक के नियंत्रण में रहता है। प्रोप्रेनोलोल का सेवन ग्लुकागोन का स्राव कम करता है। ग्लुकागोन हाइपोग्लाइसीमिया से सुरक्षा कि मुख्य कड़ी है। बीटा ब्लोकर्स आवश्यकता पड़ने पर यकृत में गिलाइकोजन से ग्लुकोज के निर्माण को भी बाधित करते हैं। बीटा ब्लोकर्स कोशिकाओं में ग्लुकोज को ऊर्जा के निर्माण हेतु भेजते हैं। हालांकि ये सभी क्रियाएं डायबिटीज के रोगी के लिए हितकारी हैं। लेकिन बीटा ब्लोकर्स लेने वाले रोगी में हाइपोग्लाइसीमिया होने की संभावना ज्यादा रहती है, खास तौर पर इन्सुलिन लेने वाले रोगियो में। बीटा ब्लोकर्स लेने वाले रोगी को हाइपोग्लाइसीमिया की स्थिति से बाहर निकलने में भी समय लगता है। बीटा ब्लोकर्स नोरएपिनेफ्रीन का स्राव भी बाधित करते हैं, जो हाइपोग्लाइसीमिया से बाहर निकलने में मदद करता है।


नोनसेलेक्टिव और सलेक्टिव बीटा ब्लोकर्स ट्राइग्लिसराइड्स को 30% से 40% बढ़ाते है और HDL कॉलेस्ट्रोल को 10% से 15% कम करते है। सिम्पेथेटिक प्रभाव वाले बीटा ब्लोकर्स जैसे प्रेक्टोलोल और पिन्डोलोल लिपिड प्रोफाइल को नहीं छेड़ते है।


हालांकि बीटा ब्लोकर्स रक्त-शर्करा भी थोड़ी बढ़ाते हैं, कॉलेस्ट्रोल को भी बढ़ाते है और हाइपोग्लाइसीमिया का जोखिम भी ज्यादा रहता है, लेकिन ये हृदय रोगों की जोखिम को काफी कम करते हैं। इसलिए बीटा ब्लोकर्स को मधुमेह में उच्च रक्तचाप के उपचार हेतु दूसरे या तीसरे विकल्प के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।


कार्य प्रणाली

जैसा कि नाम से स्पष्ट बीटा ब्लॉकर्स बीटा रिसेप्टर्स को अवरुद्ध करते हैं। स्वायतः नाड़ी तंत्र या सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम हृदय और रक्त वाहिकाओं की विभिन्न क्रियाओं का नियंत्रण करता है। यह नर्व एडिंग्स से नोरएपिनेफ्रीन नामक रसायन का स्राव करता है जो हृदय और रक्त वाहिकाओं की कोशिका की सतह पर स्थित रिसेप्टर्स से क्रिया कर उनका संकुचन और विस्तारण करता है। बीटा ब्लॉकर्स इन रिसेप्टर्स पर चिपक जाते हैं और नोरएपिनेफ्रीन रिसेप्टर्स से क्रिया नहीं कर पाते हैं।


हृदय की पैशियों पर स्थित बीटा-1 रिसेप्टर्स के अवरोध के कारण हृदय गति कम होती है, पैशियों का संकुचन और एवी-कंडक्शन धीमा पड़ जाता है।


वर्जना

अतिसंवेदनशीलता, कार्डियोजनिक शोक या कार्डयक फैल्यर, तीव्र साइनस ब्रेडीकार्डिया, दूसरे या तीसरे दर्जे का हार्ट ब्लॉक, ब्रोंकियल अस्थमा या COPD सीओपीडी।

पार्श्व प्रभाव

रक्तचाप कम होना, हृदय गति कम होना, अवसाद, सर दर्द, चक्कर, अनिद्रा, ट्राइग्लिसराइड्स तथा LDL कॉलेस्ट्रोल का बढ़ना और HDL कॉलेस्ट्रोल का कम होना, ब्रोंकोस्पाज्म, कामेच्छा कम होना और पुषहीनता। एवी हार्ट ब्लॉक, परिधीय एडीमा, सर दर्द, चक्करआना, मसूढ़े बढ़ जाना, कब्ज़ी आदि। सुस्ती आना भी बड़ा कष्टदायक कुप्रभाव है।


अल्फा ब्लॉकर्स

अल्फा ब्लॉकर्स को डायबिटीज में उच्च रक्तचाप के उपचार हेतु पहले विकल्प के रुप में प्रयोग नहीं किया जाता है। इसका प्रयोग अन्य दवाईयों के साथ दूसरे या तीसरे विकल्प के रूप में तभी किया जाता है जब रक्तचाप को नियंत्रित करना काफी मुश्किल हो रहा हो।



कार्य प्रणाली

अल्फा ब्लॉकर्स सिम्पेथेटिक नाड़ी तंत्र के प्रभाव से होने वाले रक्त वाहिकाओं के संकुचन को बाधित करते हैं। ये रक्त वाहिकाओं की पेशी कोशिकाओं पर स्थित अल्फा रिसेप्टर्स को निष्क्रिय करते हैं और नोरएपिनेफ्रीन नामक रसायन को कोशिका की पेशियों का संकुचन करने से रोकते है। फलस्वरूप वाहिका तंत्र का परिधीय प्रतिशोध कम होता है और रक्तचाप स्वतः कम हो जाता है।

वर्जना

अतिसंवेदनशीलता, कार्डियोजनिक शोक या कार्डियक फैल्यर, तीव्र साइनस ब्रेडीकार्डिया, दूसरे या तीसरे दर्जे का हार्ट ब्लॉक, ब्रोंकियल अस्थमा या COPD सीओपीडी।

पार्श्व प्रभाव

आम तौर पर इनकी पहली खुराक से रक्तचाप एक दम गिरता है हालांकि बाद की खुराकों से रक्तचाप में ऐसी नाटकीय गिरावट नहीं होती है। रक्तचाप में इस गिरावट के कारण खड़े होने पर रोगी चक्कर खाकर गिर सकता है। इसलिए आरम्भ में अल्फा ब्लॉकर्स को कम मात्रा से शुरू किया जाता है और खुराक रात में दी जाती है। अल्फा ब्लॉकर्स के अन्य कुप्रभाव हैं - दिल की धड़कन बढ़ना, ब्रेडीकार्डिया, एडीमा, सर दर्द, चक्कर आना, थकावट, मिचली, वमन, दस्त, कब्ज़ी, ट्राइग्लिसराइड्स तथा LDL कॉलेस्ट्रोल का कम होना और HDL कॉलेस्ट्रोल का बढ़ना, मूत्र बार-बार आना, पुरूष हीनता, अविरत शिश्नोत्थान (Priapism) ।


डाइयुरेटिक्स

थायजाइड

ग्लुकोज और लिपिड प्रोफाइल पर प्रतिकूल प्रभावों और हृदय रोगों के जोखिम के कारण कुछ वर्षों पहले तक डायबिटीज के रोगियों में रक्तचाप के हेतु डाइयुरेटिक्स को ज्यादा पसंद नहीं किया जाता था। लेकिन इन दिनों डाइयुरेटिक्स पुनः चर्चा में हैं और ACEi’s तथा ARB’s के बाद पसंदीदा विकल्प मानी जाती हैं।


इसके कई कारण हैं। भोजन में नमक की मात्रा सिमित करने और डाइयुरेटिक्स लेने से डायबिटीज के रोगी में रक्तचाप कम होता है। नमक कम लेने से रक्त का बढ़ा हुआ आयतन कम हो जाता है। आयतन कम होने से रेनिन और एंजियोटेंसिन-II का स्राव बढ़ता है जो मूत्र विसर्जन कम करता है और ACEi’s के कार्य को गति देता है। जिस तरह डाइयुरेटिक्स ACEi’s और ARB’s की मदद करते हैं उसी तरह ACEi’s और ARB’s डाइयुरेटिक्स के चयापचय जनित कुप्रभावों जैसे सोडियम कम होना (एंजियोटेंसिन-II के प्रभाव से स्रावित एल्डोस्टेरोन को कम करके), यूरिक एसिड का बढ़ना और रक्त-वसा की विकृतियों को रोक देते हैं या कम करते हैं। इस तरह रक्तचाप की दवाइयों की दो श्रेणियां आपस में एक दूसरे को सहयोग करती हैं। वैसे डाइयूरेटिक्स के कुप्रभाव तभी होते हैं जब इन्हें ज्यादा मात्रा में दिया जाता है।


कार्य प्रणाली

ये वृक्क की डिस्टल ट्युब्यूल में सोडियम और क्लोराइड का अवशोषण बाधित कर सोडियम और जल का विसर्जन बढ़ाते हैं। रक्त वाहिकाओं का सीधा विस्तारण कर रक्तचाप कम करते हैं।

वर्जना


अतिसंवेदनशीलता और मूत्र का स्राव बंद होना।


पार्श्व प्रभाव


रक्त में सोडियम, मेग्नीशियम, केल्शियम तथा पोटेशियम कम होना, रक्त-शर्करा बढ़ना, यूरिक एसिड बढ़ना, एरिद्मिया, रक्त-वसा विकृतियां, प्रकाश संवेदनशीलता आदि।


पोटेशियम स्पेरिंग डाइयूरेटिक


कार्य प्रणाली

एमिलोराइड और ट्रायमटेरीन डिस्टल ट्युब्यूल में सोडियम और क्लोराइड के आदान-प्रदान को प्रभावित करते हैं। स्पाइरोनोलेक्टोन एल्डोस्टिरोन विरोधी है। चूंकि एल्डोस्टिरोन सोडियम और जल को रक्त में रोक कर रखता है। स्पाइरोनोलेक्टोन एल्डोस्टिरोन के कार्य को बाधित करता है और रक्त का आयतन कम करता है अतः रक्तचाप कम होता है।


वर्जना


अतिसंवेदनशीलता, वृक्कवात या किडनी फैल्यर, मूत्र का स्राव बंद होना, यूरिया, क्रियेटिनीन व पोटेशियम का बढ़ना।

पार्श्व प्रभाव

रक्त में पोटेशियम बढ़ना, जी घबराना, उलटी, दस्त, भूख न लगना, नपुंसकता, पुरुषों में स्तन बड़ा हो जाना।







काश! सभी मैनेजमेंट ऐसे हो जाएँ.

महानगर की मीडिया की गलियों मैं इन दिनों एक खबर चर्चा का विषय बनी हुई है। खबर कुछ इस तरह से प्रकाश मैं आये है। बताया जाता है। की विगत दिनों महानगर के दैनिक समाचार पत्र परिवार टुडे के २ वर्कर की एक्सीडेंट मैं मोत हो गई थी। बताया जाता है की दुर्घटना के बाद दोनों लोगों को अस्पताल ले जाया गया। जब परिवार टुडे के मैनेजमेंट को इसका पता चला तो एजीअम अब्बास और संपादक इन्दोरिया तुरंत अस्पताल पहुँच गए और घायलों की जान बचाने के प्रयास मैं लग गए। वही परिवार टुडे के प्रधान संपादक जो की उस दिन चेन्नई मैं थे वो भी थोड़ी थोड़ी देर बाद घायलों का हल पूँछ रहे थे और दोनों को बचाने की हर संभव कोशिश करने के निर्देश देते रहे । चिलचिलाती धुप और उमस की गर्मी मैं हरसंभव कोशिश इन लोगों ने की। लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था और दोनों कुछ देर बाद मृत हो गए। जिस समय घायलों का इलाज चल रहा था उस समय परिवार टुडे पेपर के सम्पादकीय मार्केटिंग डीटीपी प्रसार विभाग के २ सेकड़ा लोग वहा उपस्थित थे।
खबर तो यह भी है की एजीअम अब्बास के तो रोजे भी चल रहे थे। लेकिन उन्होंने जिस तरह से काम किया वो काबिले तारीफ़ है। बताया जाता है की मृतकों के इलाज से लेके पीऐम और फिर उनके शवों को उनके घर पहुँचाने से लेकर दह संस्कार करने तक की वयस्था इस अखबार के मैनेजमेंट ने की वह अखबारी दुनिया के उन कथित धन्ना सेठ ठेकेदार अखबार मालिकों के लिए एक नजीर है की वो भी इस नवोदित अखबार के मैनेजमेंट से अपने वर्कर से किस तरह बर्ताब किया जाता है यह सीखे।
चूंकि खबर तो खबर होती है। लेकिन अगर ये खबर सच है तो मुझे यह कहने मैं जरा भी संकोच नहीं की काश अखबारों के सभी मैनेजमेंट ऐसे ही हो जाएँ।
इस मैनेजमेंट को मेरा सलाम.

क्या बाघों के राबिनहुड बने जयराम रमेश मानवमात्र के हितो की ओर भी देखेंगें?: रामगोपाल

वर्तमान में भारत में वन और वन्य प्राणियों की रक्षा में सामने आये एक आधुनिक राविनहुड याने जय राम रमेश पूरे देश में उस पुराने राविनहुड की तरह ही हर कहीं से प्रशंसा पाते हुये दिखाई पड़ रहे है । पर सच सिर्फ इतना ही नहीं है इसके विपरीत भी एक और पहलु है जहां झांकने की कोशिश या यो कहें हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा है पर इसे सामने लाने का प्रयास हमें तो करना ही होगा क्यों र्षोर्षो क्योंकि हम इस तथाकथित राविनहुड़ से पोषित नही वल्कि शोषित जनसमुदाय में से हैं ।

यहां विषय है उत्तर दक्षिण कारीडोर मे एन.एच. 7 का वह विवादित हिस्सा जिसे लेकर भारत के सभी एन.जी.ओ. के साथ साथ वन और पर्यावरण मन्त्रालय भी पर्यावरण और बाघों को बचाने का मुद्दा बना जिले मेंं जी रही बारह लाख जनसंख्या और उस रोड़ के किनारे पड़ने वाले 20 हजार लोगों की पहचान और उनके जिन्दा रहने के मनसूबों को अपने अधिकारों के पेरौेंं तले रोन्दने पर अमादा नज़र आ रहें हैं ।

दुख का विषय है कि बचे कुचे बाघों को तो अपना राविनहुड़ मिल गया पर जिले में जीने वाले करीव बारह लाख लोग अपने लिये आदमियों को बचाने वाला राविनहुड़ कहां से लायें र्षोर्षो

इसका सिलसिला तब शुरू हुआ जब इस हिस्से का निर्माण कार्य आधे से उपर पूरा हो जाने के बाद एक तथा कथित एन.जी.ओ. जो अपने आप को वन एवं वन्य प्राणियों का हितेषी बताता है,ने सुप्रीम कोर्ट में बाघोेंं को इस निर्माण से होने जा रहें नुकसान की रूपरेखा बना निर्माण को रूकवाने की अनुमति पा ली । सवा साल पहले रूका निर्माण कार्य सुप्रीम कोर्ट में आज तक अनििर्णत पड़ा हुआ है ।

इस बीच महाअदालत द्वारा इस मसले को समझने हेतु एक समिती बनाई गई आश्चर्य यह है कि उसमेंं सिर्फ बाघोेंं की व्यथा समझने वालों को शामिल किया पर इस पूरे प्रकरण में उपजने वाली मानव समस्याओं का क्या र्षोर्षो इस पर विचार करना या विचारक को शामिल करना किसी ने जरूरी नही समझा। तो क्या इसके लिये हमें किसी मानवाधिकार संगठन की शरण में जाना पड़ेगा र्षोर्षो बाघोेंं को बचाने की कवायत में ये विशेषज्ञ मानव हितों को इस कदर किनारे कर देंगे यह किसी ने नही सोचा था ! विकास और बचाव का यह नज़रिया किसी भी रूप में एक सन्तुलित नज़रिया तो नहीं कहा जा सकता हैं। यह सत्य है कि डब्लू.डब्लू. ओ का एक बहुत बड़ा फण्ड इन्हें वालििन्टयर बनने के लिये अपनी ओर खीचता है पर उसकी आंच में ये यथार्थता को इतना नज़र अन्दाज कर जाते है कि इन पर हावी स्वार्थपरिता भी शर्मिन्दा नज़र आती है।

यथार्थ का धरातल मनुष्य ने अपने को आधार मान कर कर बुना है उससे जुडे़ सर्वाइवरों को बह कितना हिस्सा दे सकता है इसे बहां की भौगोलिक उपलब्धता, भौतिक परिस्थितयो, सामाजिक ढ़ाचे और आर्थिक समर्थतां के आकड़ों के अनुपात से सन्तुलित किया जाकर निर्धारित किया जाना चाहिये इसे डब्लू.डब्लू. ओ. के बने एक प्रारूपिक नक्शे पर बैठा एक अनुशासित वालिन्टयर बनकर उनकी वाहवाही तो पाई जा सकती है पर मुख्य उद्धेश्य की सार्थकता इससे मीलों दूर हो जाती है ।

भारत भूमि का क्षेत्रफल यहां रह रही आबादी को कितना पूरा पड़ता हैै यह ये मुफतखोरों जो मेट्रों के अपने ए.सी. आफिस में ऐश करने ,सड़क की जगह हवा में सफर करने तथा गांव शब्द का Þगाß भी न जानने वाले शायद कभी न जान पायेंगे। इसीलिये ये वहां बैठे बैठे इन कस्वाई हिस्सों की जरूरतों उनकी मुसीबतों और बामुश्किल जी जा रही जिन्दगी को नज़र अन्दाज कर अपनी कलमों से उनकी मौत का फरमान लिख देते हैं। सड़क पर भुट्टे बेचने वाले उस गरीब देहाती की, वहां बैठी ककड़ी बेचने वाली उस विधवा की और ऐसे ही कई हजार जरूरतमन्दो से जुड़ा जीवन और उनकी जीवनी का सम्बंध शायद ये उस सड़क से कभी न जोड़ पायें जिसे बन्द करने की वकालत ये लोग कर रहे है।बाघों को आवाद करने के लिये इतनी जिन्दगियां बरबाद की जाना क्या उचित हैर्षोर्षो यह एक यक्ष प्रश्न है ।

आिªफ्रका के मसाईमारा रिजर्व की उस परिस्थती से इन एन.जी.ओस को प्रेरणा लेनी चाहिये जब वहां अपने पालतू मवेशियों को शेरों द्वारा लगातार मारे जाने से शेर तथा मसाई एक दूसरे के आमने सामने आ खड़े हुयेे थे कई शेर मार भी दिये गये मामला हद से बाहर जाने पर सरकार तथा नियन्त्रकों ने हल के रूप में मसाईयों को निर्वासित नहीं किया था बल्कि शेरों और मसाई कबीलों के बीच बिल्लयों की मीलों लंबी दीवार खीच दी थी। मसाईयों के संसाधनों पर कोई आंच नहीं आने दी गई आज वहां स्थिती सामान्य चल रही है ।पिश्चिम में जब किसी कालोनी के पिछवाड़े पोखर में मगरमच्छ आ जाता है तो उसके संरक्षण में कालोनी को विचलित नहीं किया जाता वल्कि उस मगरमच्छ को वहां से सुरक्षित स्थान पर निर्वासित कर दिया जाता है।

अमरीका में पार्क क्षेत्र से लगे कस्बाई इलाकों में जब पार्क के भालू घुसपैठ करते हैं तो उन्हें बुरी तरह से रबर की गोलियों से मारा जाता है उनके पीछे कुत्ते छोड़े जाते हैं उन्हें इस हद तक डराया जाता है कि वो दोवारा उस जगह घुसपैठ न करें । स्थानीय प्रशासन एवं डब्लू.डब्लू. ओ. द्वारा स्थानीय वाशिन्दों के हित को नहीं छेड़ा जाता और न ही वन्य प्राणी संरक्षण की आड़ तले वन्य प्राणियों के क्षेत्र विस्तारण की प्रस्तावना दी जाती है ।उनकी नीतियां जो उन्होनें स्वविवेक से तय की हैं इतनी सटीक हैं कि कही से भी यह परिलक्षित नहीं होने देती की वन्य प्राणी संरक्षण की वजह से मानव या मानवहितों को कही से भी सुपरसीट नहीं कर रहीं हैं। और यही वन और वन्य संरक्षण का मूल मत्र है ।

पर यहां इसका उल्टा हो रहा है। बाघों के संरक्षण हेतु मनुष्यों के संसाधन छीने जा रहे है उन्हें निर्वासित और साधन विहीन किया जा रहा है ऐसे में तो मनुष्य इसके लिये बाघोेंं को ही दोषी मानेेगा तब क्या बाघोेंेंं और मनुष्यों के बीच सौहार्द रह पायेगा, क्या इसी सृजन की आपेक्षा डब्लू.डब्लू. ओ. तथा सरकार इतना पैसा खर्च कर करती है । इन परिस्थितियों को तो बाघ तथा वन वचाव के नाम पर ये एन.जी.ओ. और जिम्मेदार सरकारी मोहकमे ही अंजाम देते नज़र आ रहे हैं । हमने वन एवं पर्यावरण मन्त्री महोदय का फूला हुआ सीना तो देखा पर वो वह नही देख पा रहे हैं जो समय उन्हें समय आने पर दिखायेगा । उनकी ये हठधर्मिता वन्य प्राणी और पर्यावरण संरक्षण को विकास के बजाय कहीं विनाश के मुकाम पर तो ना ले जायगीर्षोर्षोे इसका उत्तर तो अभी धुन्ध में छिपा है ।

समस्या का हल वन वाघ और मानवों के बीच एक युक्तियुक्त सामन्जस्य बनाने का हा,े ऐसे में सरकार की ओर से विकल्प स्वरूप ऐसी योजनाओं को लाना होगा जिससे मनुष्य अपने संसाधन छिनने सेे शंकित न होकर सशक्त हो अपने अन्र्तमन से इन वनों तथा वन्य प्राणियों के संरक्षण में सरकार तथा इन संगठनों का कंधे से कंधा मिलाकर चलने का विचार बना सके ।



रामगोपाल Þबब्बाÞ सोनी

सुनारी मोहल्ला

सिवनी

मो. 09329020262









क्या बाघों के राबिनहुड बने जयराम रमेश मानवमात्र के हितो की ओर भी देखेंगेंर्षोर्षो: रामगोपाल






वर्तमान में भारत में वन और वन्य प्राणियों की रक्षा में सामने आये एक आधुनिक राविनहुड याने जय राम रमेश पूरे देश में उस पुराने राविनहुड की तरह ही हर कहीं से प्रशंसा पाते हुये दिखाई पड़ रहे है । पर सच सिर्फ इतना ही नहीं है इसके विपरीत भी एक और पहलु है जहां झांकने की कोशिश या यो कहें हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा है पर इसे सामने लाने का प्रयास हमें तो करना ही होगा क्यों र्षोर्षो क्योंकि हम इस तथाकथित राविनहुड़ से पोषित नही वल्कि शोषित जनसमुदाय में से हैं ।

यहां विषय है उत्तर दक्षिण कारीडोर मे एन.एच. 7 का वह विवादित हिस्सा जिसे लेकर भारत के सभी एन.जी.ओ. के साथ साथ वन और पर्यावरण मन्त्रालय भी पर्यावरण और बाघों को बचाने का मुद्दा बना जिले मेंं जी रही बारह लाख जनसंख्या और उस रोड़ के किनारे पड़ने वाले 20 हजार लोगों की पहचान और उनके जिन्दा रहने के मनसूबों को अपने अधिकारों के पेरौेंं तले रोन्दने पर अमादा नज़र आ रहें हैं ।

दुख का विषय है कि बचे कुचे बाघों को तो अपना राविनहुड़ मिल गया पर जिले में जीने वाले करीव बारह लाख लोग अपने लिये आदमियों को बचाने वाला राविनहुड़ कहां से लायें र्षोर्षो

इसका सिलसिला तब शुरू हुआ जब इस हिस्से का निर्माण कार्य आधे से उपर पूरा हो जाने के बाद एक तथा कथित एन.जी.ओ. जो अपने आप को वन एवं वन्य प्राणियों का हितेषी बताता है,ने सुप्रीम कोर्ट में बाघोेंं को इस निर्माण से होने जा रहें नुकसान की रूपरेखा बना निर्माण को रूकवाने की अनुमति पा ली । सवा साल पहले रूका निर्माण कार्य सुप्रीम कोर्ट में आज तक अनििर्णत पड़ा हुआ है ।

इस बीच महाअदालत द्वारा इस मसले को समझने हेतु एक समिती बनाई गई आश्चर्य यह है कि उसमेंं सिर्फ बाघोेंं की व्यथा समझने वालों को शामिल किया पर इस पूरे प्रकरण में उपजने वाली मानव समस्याओं का क्या र्षोर्षो इस पर विचार करना या विचारक को शामिल करना किसी ने जरूरी नही समझा। तो क्या इसके लिये हमें किसी मानवाधिकार संगठन की शरण में जाना पड़ेगा र्षोर्षो बाघोेंं को बचाने की कवायत में ये विशेषज्ञ मानव हितों को इस कदर किनारे कर देंगे यह किसी ने नही सोचा था ! विकास और बचाव का यह नज़रिया किसी भी रूप में एक सन्तुलित नज़रिया तो नहीं कहा जा सकता हैं। यह सत्य है कि डब्लू.डब्लू. ओ का एक बहुत बड़ा फण्ड इन्हें वालििन्टयर बनने के लिये अपनी ओर खीचता है पर उसकी आंच में ये यथार्थता को इतना नज़र अन्दाज कर जाते है कि इन पर हावी स्वार्थपरिता भी शर्मिन्दा नज़र आती है।

यथार्थ का धरातल मनुष्य ने अपने को आधार मान कर कर बुना है उससे जुडे़ सर्वाइवरों को बह कितना हिस्सा दे सकता है इसे बहां की भौगोलिक उपलब्धता, भौतिक परिस्थितयो, सामाजिक ढ़ाचे और आर्थिक समर्थतां के आकड़ों के अनुपात से सन्तुलित किया जाकर निर्धारित किया जाना चाहिये इसे डब्लू.डब्लू. ओ. के बने एक प्रारूपिक नक्शे पर बैठा एक अनुशासित वालिन्टयर बनकर उनकी वाहवाही तो पाई जा सकती है पर मुख्य उद्धेश्य की सार्थकता इससे मीलों दूर हो जाती है ।

भारत भूमि का क्षेत्रफल यहां रह रही आबादी को कितना पूरा पड़ता हैै यह ये मुफतखोरों जो मेट्रों के अपने ए.सी. आफिस में ऐश करने ,सड़क की जगह हवा में सफर करने तथा गांव शब्द का Þगाß भी न जानने वाले शायद कभी न जान पायेंगे। इसीलिये ये वहां बैठे बैठे इन कस्वाई हिस्सों की जरूरतों उनकी मुसीबतों और बामुश्किल जी जा रही जिन्दगी को नज़र अन्दाज कर अपनी कलमों से उनकी मौत का फरमान लिख देते हैं। सड़क पर भुट्टे बेचने वाले उस गरीब देहाती की, वहां बैठी ककड़ी बेचने वाली उस विधवा की और ऐसे ही कई हजार जरूरतमन्दो से जुड़ा जीवन और उनकी जीवनी का सम्बंध शायद ये उस सड़क से कभी न जोड़ पायें जिसे बन्द करने की वकालत ये लोग कर रहे है।बाघों को आवाद करने के लिये इतनी जिन्दगियां बरबाद की जाना क्या उचित हैर्षोर्षो यह एक यक्ष प्रश्न है ।

आिªफ्रका के मसाईमारा रिजर्व की उस परिस्थती से इन एन.जी.ओस को प्रेरणा लेनी चाहिये जब वहां अपने पालतू मवेशियों को शेरों द्वारा लगातार मारे जाने से शेर तथा मसाई एक दूसरे के आमने सामने आ खड़े हुयेे थे कई शेर मार भी दिये गये मामला हद से बाहर जाने पर सरकार तथा नियन्त्रकों ने हल के रूप में मसाईयों को निर्वासित नहीं किया था बल्कि शेरों और मसाई कबीलों के बीच बिल्लयों की मीलों लंबी दीवार खीच दी थी। मसाईयों के संसाधनों पर कोई आंच नहीं आने दी गई आज वहां स्थिती सामान्य चल रही है ।पिश्चिम में जब किसी कालोनी के पिछवाड़े पोखर में मगरमच्छ आ जाता है तो उसके संरक्षण में कालोनी को विचलित नहीं किया जाता वल्कि उस मगरमच्छ को वहां से सुरक्षित स्थान पर निर्वासित कर दिया जाता है।

अमरीका में पार्क क्षेत्र से लगे कस्बाई इलाकों में जब पार्क के भालू घुसपैठ करते हैं तो उन्हें बुरी तरह से रबर की गोलियों से मारा जाता है उनके पीछे कुत्ते छोड़े जाते हैं उन्हें इस हद तक डराया जाता है कि वो दोवारा उस जगह घुसपैठ न करें । स्थानीय प्रशासन एवं डब्लू.डब्लू. ओ. द्वारा स्थानीय वाशिन्दों के हित को नहीं छेड़ा जाता और न ही वन्य प्राणी संरक्षण की आड़ तले वन्य प्राणियों के क्षेत्र विस्तारण की प्रस्तावना दी जाती है ।उनकी नीतियां जो उन्होनें स्वविवेक से तय की हैं इतनी सटीक हैं कि कही से भी यह परिलक्षित नहीं होने देती की वन्य प्राणी संरक्षण की वजह से मानव या मानवहितों को कही से भी सुपरसीट नहीं कर रहीं हैं। और यही वन और वन्य संरक्षण का मूल मत्र है ।

पर यहां इसका उल्टा हो रहा है। बाघों के संरक्षण हेतु मनुष्यों के संसाधन छीने जा रहे है उन्हें निर्वासित और साधन विहीन किया जा रहा है ऐसे में तो मनुष्य इसके लिये बाघोेंं को ही दोषी मानेेगा तब क्या बाघोेंेंं और मनुष्यों के बीच सौहार्द रह पायेगा, क्या इसी सृजन की आपेक्षा डब्लू.डब्लू. ओ. तथा सरकार इतना पैसा खर्च कर करती है । इन परिस्थितियों को तो बाघ तथा वन वचाव के नाम पर ये एन.जी.ओ. और जिम्मेदार सरकारी मोहकमे ही अंजाम देते नज़र आ रहे हैं । हमने वन एवं पर्यावरण मन्त्री महोदय का फूला हुआ सीना तो देखा पर वो वह नही देख पा रहे हैं जो समय उन्हें समय आने पर दिखायेगा । उनकी ये हठधर्मिता वन्य प्राणी और पर्यावरण संरक्षण को विकास के बजाय कहीं विनाश के मुकाम पर तो ना ले जायगीर्षोर्षोे इसका उत्तर तो अभी धुन्ध में छिपा है ।

समस्या का हल वन वाघ और मानवों के बीच एक युक्तियुक्त सामन्जस्य बनाने का हा,े ऐसे में सरकार की ओर से विकल्प स्वरूप ऐसी योजनाओं को लाना होगा जिससे मनुष्य अपने संसाधन छिनने सेे शंकित न होकर सशक्त हो अपने अन्र्तमन से इन वनों तथा वन्य प्राणियों के संरक्षण में सरकार तथा इन संगठनों का कंधे से कंधा मिलाकर चलने का विचार बना सके ।



रामगोपाल Þबब्बाÞ सोनी

सुनारी मोहल्ला

सिवनी

मो. 09329020262





क्या बाघों के राबिनहुड बने जयराम रमेश मानवमात्र के हितो की ओर भी देखेंगेंर्षोर्षो: रामगोपाल






वर्तमान में भारत में वन और वन्य प्राणियों की रक्षा में सामने आये एक आधुनिक राविनहुड याने जय राम रमेश पूरे देश में उस पुराने राविनहुड की तरह ही हर कहीं से प्रशंसा पाते हुये दिखाई पड़ रहे है । पर सच सिर्फ इतना ही नहीं है इसके विपरीत भी एक और पहलु है जहां झांकने की कोशिश या यो कहें हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा है पर इसे सामने लाने का प्रयास हमें तो करना ही होगा क्यों र्षोर्षो क्योंकि हम इस तथाकथित राविनहुड़ से पोषित नही वल्कि शोषित जनसमुदाय में से हैं ।

यहां विषय है उत्तर दक्षिण कारीडोर मे एन.एच. 7 का वह विवादित हिस्सा जिसे लेकर भारत के सभी एन.जी.ओ. के साथ साथ वन और पर्यावरण मन्त्रालय भी पर्यावरण और बाघों को बचाने का मुद्दा बना जिले मेंं जी रही बारह लाख जनसंख्या और उस रोड़ के किनारे पड़ने वाले 20 हजार लोगों की पहचान और उनके जिन्दा रहने के मनसूबों को अपने अधिकारों के पेरौेंं तले रोन्दने पर अमादा नज़र आ रहें हैं ।

दुख का विषय है कि बचे कुचे बाघों को तो अपना राविनहुड़ मिल गया पर जिले में जीने वाले करीव बारह लाख लोग अपने लिये आदमियों को बचाने वाला राविनहुड़ कहां से लायें र्षोर्षो

इसका सिलसिला तब शुरू हुआ जब इस हिस्से का निर्माण कार्य आधे से उपर पूरा हो जाने के बाद एक तथा कथित एन.जी.ओ. जो अपने आप को वन एवं वन्य प्राणियों का हितेषी बताता है,ने सुप्रीम कोर्ट में बाघोेंं को इस निर्माण से होने जा रहें नुकसान की रूपरेखा बना निर्माण को रूकवाने की अनुमति पा ली । सवा साल पहले रूका निर्माण कार्य सुप्रीम कोर्ट में आज तक अनििर्णत पड़ा हुआ है ।

इस बीच महाअदालत द्वारा इस मसले को समझने हेतु एक समिती बनाई गई आश्चर्य यह है कि उसमेंं सिर्फ बाघोेंं की व्यथा समझने वालों को शामिल किया पर इस पूरे प्रकरण में उपजने वाली मानव समस्याओं का क्या र्षोर्षो इस पर विचार करना या विचारक को शामिल करना किसी ने जरूरी नही समझा। तो क्या इसके लिये हमें किसी मानवाधिकार संगठन की शरण में जाना पड़ेगा र्षोर्षो बाघोेंं को बचाने की कवायत में ये विशेषज्ञ मानव हितों को इस कदर किनारे कर देंगे यह किसी ने नही सोचा था ! विकास और बचाव का यह नज़रिया किसी भी रूप में एक सन्तुलित नज़रिया तो नहीं कहा जा सकता हैं। यह सत्य है कि डब्लू.डब्लू. ओ का एक बहुत बड़ा फण्ड इन्हें वालििन्टयर बनने के लिये अपनी ओर खीचता है पर उसकी आंच में ये यथार्थता को इतना नज़र अन्दाज कर जाते है कि इन पर हावी स्वार्थपरिता भी शर्मिन्दा नज़र आती है।

यथार्थ का धरातल मनुष्य ने अपने को आधार मान कर कर बुना है उससे जुडे़ सर्वाइवरों को बह कितना हिस्सा दे सकता है इसे बहां की भौगोलिक उपलब्धता, भौतिक परिस्थितयो, सामाजिक ढ़ाचे और आर्थिक समर्थतां के आकड़ों के अनुपात से सन्तुलित किया जाकर निर्धारित किया जाना चाहिये इसे डब्लू.डब्लू. ओ. के बने एक प्रारूपिक नक्शे पर बैठा एक अनुशासित वालिन्टयर बनकर उनकी वाहवाही तो पाई जा सकती है पर मुख्य उद्धेश्य की सार्थकता इससे मीलों दूर हो जाती है ।

भारत भूमि का क्षेत्रफल यहां रह रही आबादी को कितना पूरा पड़ता हैै यह ये मुफतखोरों जो मेट्रों के अपने ए.सी. आफिस में ऐश करने ,सड़क की जगह हवा में सफर करने तथा गांव शब्द का Þगाß भी न जानने वाले शायद कभी न जान पायेंगे। इसीलिये ये वहां बैठे बैठे इन कस्वाई हिस्सों की जरूरतों उनकी मुसीबतों और बामुश्किल जी जा रही जिन्दगी को नज़र अन्दाज कर अपनी कलमों से उनकी मौत का फरमान लिख देते हैं। सड़क पर भुट्टे बेचने वाले उस गरीब देहाती की, वहां बैठी ककड़ी बेचने वाली उस विधवा की और ऐसे ही कई हजार जरूरतमन्दो से जुड़ा जीवन और उनकी जीवनी का सम्बंध शायद ये उस सड़क से कभी न जोड़ पायें जिसे बन्द करने की वकालत ये लोग कर रहे है।बाघों को आवाद करने के लिये इतनी जिन्दगियां बरबाद की जाना क्या उचित हैर्षोर्षो यह एक यक्ष प्रश्न है ।

आिªफ्रका के मसाईमारा रिजर्व की उस परिस्थती से इन एन.जी.ओस को प्रेरणा लेनी चाहिये जब वहां अपने पालतू मवेशियों को शेरों द्वारा लगातार मारे जाने से शेर तथा मसाई एक दूसरे के आमने सामने आ खड़े हुयेे थे कई शेर मार भी दिये गये मामला हद से बाहर जाने पर सरकार तथा नियन्त्रकों ने हल के रूप में मसाईयों को निर्वासित नहीं किया था बल्कि शेरों और मसाई कबीलों के बीच बिल्लयों की मीलों लंबी दीवार खीच दी थी। मसाईयों के संसाधनों पर कोई आंच नहीं आने दी गई आज वहां स्थिती सामान्य चल रही है ।पिश्चिम में जब किसी कालोनी के पिछवाड़े पोखर में मगरमच्छ आ जाता है तो उसके संरक्षण में कालोनी को विचलित नहीं किया जाता वल्कि उस मगरमच्छ को वहां से सुरक्षित स्थान पर निर्वासित कर दिया जाता है।

अमरीका में पार्क क्षेत्र से लगे कस्बाई इलाकों में जब पार्क के भालू घुसपैठ करते हैं तो उन्हें बुरी तरह से रबर की गोलियों से मारा जाता है उनके पीछे कुत्ते छोड़े जाते हैं उन्हें इस हद तक डराया जाता है कि वो दोवारा उस जगह घुसपैठ न करें । स्थानीय प्रशासन एवं डब्लू.डब्लू. ओ. द्वारा स्थानीय वाशिन्दों के हित को नहीं छेड़ा जाता और न ही वन्य प्राणी संरक्षण की आड़ तले वन्य प्राणियों के क्षेत्र विस्तारण की प्रस्तावना दी जाती है ।उनकी नीतियां जो उन्होनें स्वविवेक से तय की हैं इतनी सटीक हैं कि कही से भी यह परिलक्षित नहीं होने देती की वन्य प्राणी संरक्षण की वजह से मानव या मानवहितों को कही से भी सुपरसीट नहीं कर रहीं हैं। और यही वन और वन्य संरक्षण का मूल मत्र है ।

पर यहां इसका उल्टा हो रहा है। बाघों के संरक्षण हेतु मनुष्यों के संसाधन छीने जा रहे है उन्हें निर्वासित और साधन विहीन किया जा रहा है ऐसे में तो मनुष्य इसके लिये बाघोेंं को ही दोषी मानेेगा तब क्या बाघोेंेंं और मनुष्यों के बीच सौहार्द रह पायेगा, क्या इसी सृजन की आपेक्षा डब्लू.डब्लू. ओ. तथा सरकार इतना पैसा खर्च कर करती है । इन परिस्थितियों को तो बाघ तथा वन वचाव के नाम पर ये एन.जी.ओ. और जिम्मेदार सरकारी मोहकमे ही अंजाम देते नज़र आ रहे हैं । हमने वन एवं पर्यावरण मन्त्री महोदय का फूला हुआ सीना तो देखा पर वो वह नही देख पा रहे हैं जो समय उन्हें समय आने पर दिखायेगा । उनकी ये हठधर्मिता वन्य प्राणी और पर्यावरण संरक्षण को विकास के बजाय कहीं विनाश के मुकाम पर तो ना ले जायगीर्षोर्षोे इसका उत्तर तो अभी धुन्ध में छिपा है ।

समस्या का हल वन वाघ और मानवों के बीच एक युक्तियुक्त सामन्जस्य बनाने का हा,े ऐसे में सरकार की ओर से विकल्प स्वरूप ऐसी योजनाओं को लाना होगा जिससे मनुष्य अपने संसाधन छिनने सेे शंकित न होकर सशक्त हो अपने अन्र्तमन से इन वनों तथा वन्य प्राणियों के संरक्षण में सरकार तथा इन संगठनों का कंधे से कंधा मिलाकर चलने का विचार बना सके ।



रामगोपाल Þबब्बाÞ सोनी

सुनारी मोहल्ला

सिवनी

मो. 09329020262

सरकार देश एवं प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैनिशंक

देहरादून 31 अगस्त, 2010 मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक से एनेक्सी स्थित मुख्यमंत्री आवास पर मंगलवार को विख्यात लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड लोक भाषा साहित्य समिति के प्रतिनिधिमण्डल ने भेंट की।
श्री नेगी ने मुख्यमंत्री से उत्तराखण्ड की लोक भाषाओं के समग्र विकास एवं संरक्षण के लिए लोक भाषा अकादमी का गठन करने की मांग की। श्री नेगी ने कहा कि जहां एक ओर भारतीय भाषाओं की मानक शोध संस्था साहित्य अकादमी द्वारा गढ़वाली-कुमाऊंनी को अपनी सूची में 16वें एवं 17वें स्थान पर रखा गया है, वहीं दूसरी ओर ये भाषाएं संविधान की 8वीं सूची में अपना स्थान नहीं बना पायी है। उन्होंने मुख्यमंत्री से गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषाओं को प्राथमिक स्तर पर शैक्षणिक पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की मांग की।
मुख्यमंत्री डॉ. निशंक ने प्रतिनिधिमण्डल को यथोचित कार्यवाही का आश्वासन देते हुए सचिव भाषा और निदेशक भाषा शोध संस्थान को उपरोक्त मांगो पर विस्तृत रिपोर्ट देने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री डॉ. निशंक ने कहा कि प्रदेश में हाल ही में गठित किये गये भाषा शोध संस्थान के ऊपर क्षेत्रीय भाषाओं के संवर्द्धन एवं संरक्षण की जिम्मेदारी भी है। आवश्यकता पड़ने पर लोक भाषाओं के लिए अलग से भी संस्थान पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि गढ़वाल-कुमाऊंनी सहित उत्तराखण्ड की अन्य लोक भाषाएं अत्यन्त समृद्ध हैं, और इनके संरक्षण संवर्द्धन के लिए सभी आवश्यक कदम उठाये जायेंगे। उन्होंने कहा कि इन भाषाओं को पाठ्यक्रमों में सम्मिलित करने के लिए सरकार सभी कर्णधारों के साथ विचार विमर्श कर आवश्यक कदम उठायेगी। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं की मजबूती हिन्दी की संमृद्धता के लिए भी आवश्यक है। उत्तराखण्ड सरकार देश एवं प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है, और इसी दिशा में ठोस कदम बढ़ाते हुए संस्कृत को द्वितीय राज भाषा का दर्जा दिया गया है।
प्रतिनिधिमण्डल में समिति के कार्यकारी अध्यक्ष त्रिभुवन उनियाल, वरिष्ठ उपाध्यक्ष अनिल बिष्ट, उपाध्यक्ष नरेन्द्र कठैत, प्रमोद नौटियाल, बी. मोहन नेगी, गणेश खुगशाल, विमल नेगी, ऊषा नेगी आदि सम्मिलित थे। 09837261570

कामन वेल्थ झेल का थीम गीत…

कृपया धुन के लिये प्रदीप जी का लिखा प्रसिद्ध गीत

“आओ बच्चो तुम्हे दिखाये, झांकी हिन्दुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो ,
ये धरती है बलिदान की”
पर निम्न पन्क्तियों को समायोजित करने का प्रयास करें…

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आओ तुमको कथा सुनाये, नेता जी के चमत्कार की.
खेल खेल में पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
टैक्स भी ले लिया…. काम भी नही किया.
टैक्स भी ले लिया…. काम भी नही किया.

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ये देखो इस सडक का गड्ढा, पहले थोडा हल्का था.
पानी तो भर जाता था, पर फिर भी ट्रैफिक चलता था.
साईड का खंबा टेढा था, पर बल्ब भी थोडा जलता था.
सडक खोद दी, बल्ब फोड दिया, चलने वाला डरता था.
सारे गड्ढे सडक हो गये, माया है झोलम झाल की.
खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
बल्ब भी खा गया, खंबा भी खा गया.
बल्ब भी खा गया, खंबा भी खा गया.

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ये देखो इस पुल पर पहले, गाडी ठीक से जाती थी.
हिचकोले से खाती थी, और गिरते पडते जाती थी.
कलेजा मुह को आता था, और जान पर बन आती थी.
ना जाने क्यों अक्सर फिर, जुर्माना पर्ची कट जाती थी.
अब तो पैदल जाता हूं मै, जय हो जाम महान की.
खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
पुल भी बंद हुआ, और रोड भी बंद हुआ.
पुल भी बंद हुआ, और रोड भी बंद हुआ.

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ये देखो एक ट्रैक बडा सा, साइकल के लिये बनाया था.
एड्वैंचर सा लगे इसलिये, थोडा कम घिसवाया था.
साइकल बढिया चले इसलिये, ट्रैफिक को रुकवाया था.
पहले दिन जब चली साइकले, लोगो को बुलवाया था.
एक अस्पताल, दो गड्ढे मे, जय हो ट्रैक की शान की.
.खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
लोगो का क्या करना, मेरा ट्रैक तो टैस्ट हुआ.
लोगो का क्या करना, मेरा ट्रैक तो टैस्ट हुआ.

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ये देखो एक मशीन प्यारी, खेलो के लिये लगाई है.
केवल बालिग खेले इसको, गजब खेल खिलाई है.
अतिथियो के लिये एस्कार्ट्, बाहर से मंगवाई है.
“यूज” करें प्लीज आप इसको, बातें भी सिखाई हैं.
इन खेलो का नाम ना लेना, बातें हैं ये ज्ञान की.
खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
मूसली पावर दम.. पहलवान हैं हम.
मूसली पावर दम.. पहलवान हैं हम.

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चोट लगे जो खेलो मे तो, हम सिकाई करवायेंगे.
ढाई हजार की मशीन को हम, चार लाख मे लायेंगे.
इस्तेमाल वो हो ना हो हम, लाभ तो बतलायेंगे.
कुछ तो हमको खाने दो, हम कामन वेल्थ करायेंगे.
बाकि सब पर ध्यान न दो, लाज रखो देश सम्मान की.
खेल खेल मे पैसा झपटा, लोगो ने हाहाकार की.
खा गये देश का धन… खा गये देश का धन.
खा गये देश का धन… खा गये देश का धन.