3.3.12
मुसलमानों को 18 फीसद आरक्षण : क्या बाकी के धर्म धोका हैं ! नकली हैं !
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कृष्ण कुमार यादव बने इलाहाबाद रीजन के नए निदेशक डाक सेवाएं

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित नाम श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढ़ा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य-संग्रह-2005), 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह-2006 व 2007), India Post : 150 Glorious Years (2006) एवं 'क्रांति -यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' (2007) प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा. राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ (सं. डा. दुर्गाचरण मिश्र, 2009) भी प्रकाशित हो चुकी है। पचास से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/संकलनों में विभिन्न विधाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं व ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन भी आपने किया है। आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर और दूरदर्शन से आपकी कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार इत्यादि का प्रसारण हो चुका हैं।
श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और व्यक्तिगत रूप से शब्द सृजन की ओर (www.kkyadav.blogspot.com) व डाकिया डाक लाया (www.dakbabu.blogspot.com) और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ ,‘सप्तरंगी प्रेम’ व ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉगों के माध्यम से सक्रिय हैं। विभिन्न वेब पत्रिकाओं, ई पत्रिकाओं, और ब्लॉग पर प्रकाशित होने वाले श्री यादव की इंटरनेट पर ’कविता कोश’ में भी काव्य-रचनाएँ संकलित हैं।
विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त श्री यादव की इलाहाबाद में नियुक्ति से इलाहाबाद से जुड़े साहित्यकारों और ब्लागरों में भी काफी हर्ष है !!
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अफीम है इनकी जिंदगी
शंकर जालान
कहने को तो आजादी के बाद से ही देश में अफीम का उत्पादन व कारोबार प्रतिबंधित है, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी उत्तर दिनाजपुर जिले के १२ लाइसेंसशुदा नशेड़ियों को सरकार अफीम की आपूर्ति करती है। यह नियम अंग्रेजों के जमाने से ही चला आ रहा है। इन सबों को चिकित्सकों के परामर्श से शारीरिक बाध्यता के चलते अफीम दी जाती है। पहले अफीम की बिक्री के लिए लाइसेंस दिए जाते थे, लेकिन वह नियम अब बंद है। इसीलिए सरकार सीधे ट्रेजरी के जरिए अफीम की आपूर्ति नशेड़ियों को करती है। मालूम हो कि कानूनन अफीम का सेवन, संग्रह या इसकी खेती करना दंडनीय अपराध है। आरोप साबित होने पर दस साल की जेल के अलावा कई लाख रुपए का जुर्माना लग सकता है। हालांकि इन १२ लाइसेंसी अफीमचियों पर यह कानून लागू नहीं होता। अफीम की खेती को हतोत्साहित करने के लिए ही यह कानून बनाया गया है। अंग्रेजों के जमाने में अफीम के कारोबार से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रचुर लाभ अर्जित किया था। उस समय अफीम सेवन के लिए सरकारी लाइसेंस दिए जाते थे। उनमें से ही अब केवल एक दर्जन अफीमची रह गए हैं। इनमें एक महिला भी हैं। नए सिरे से किसी को लाइसेंस नहीं दिए जाते। इन लोगों के पास अफीम हासिल करने के लिए सरकारी राशन कार्ड है। उल्लेखनीय है कि पूरे देश में अफीम या पोस्तो की खेती पर प्रतिबंध है। कानूनी तौर पर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के एक सरकारी फार्म में अफीम की खेती होती है, जिसका वैज्ञानिक उपयोग भी है। वहीं से इन अफीमचियों के लिए अफीम मंगाई जाती है। इसके अलावा अफगानिस्तान से भी अफीम मंगाई जाती है। अफीम की खेती नहीं की जा सके, इसके लिए इसे पानी में उबाल कर उसे बाजार में पोस्तो के नाम से बिक्री की जाती है। पोस्तो का उपयोग मसाले के बतौर किया जाता है। चूंकि अफीम का सेवन करने वाले इसे छोड़ नहीं सकते इसलिए अंग्रेज सरकार ने यह नियम बनाया था जिसका आज भी अनुपालन करना पड़ रहा है। अफीम मंगाकर सरकारी कार्यालय से इसे कड़ी सुरक्षा के बीच ट्रेजरी भेजा जाता है। वहां से इसे डीलरों के जरिए अफीमचियों तक पहुंचाया जाता है। इन अफीमचियों को प्रत्येक सप्ताह १२ ग्राम अफीम सेवन के लिए दी जाती है। रायगंज के एक अफीमची ने बताया कि अफीम नहीं मिलने पर मृत्यु जैसी यंत्रणा भोग करनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि बचपन में इसकी आदत लग गई। अब तो यह इनके लिए जिंदगी बन गई है। सरकार यह अफीम इन्हें मात्र ६० रुपए में उपलब्ध कराती है।
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anjuman
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कलर कोड कोलकाता
शंकर जालान
पढ़ा है कि रंगों का जीवन में बड़ा महत्व होता है, लेकिन किसी शहर के लिए सत्ताधारी राजनीति दल की ओर से कलर कोड का फरमान जारी करने की घटना देश की पहली घटना है, जिसे पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस शासित सरकार ने जारी किया है। पश्चिम बंगाल की नई सरकार के नए फरमान में कोलकाता शहर को नीला शहर (ब्लू सिटी) बनाने की बात कही गई है।
जानकारों का कहना है कि माक्र्सवादियों की पिछली सरकार को जहां लाल रंग पसंद था। अब वहीं पश्चिमी बंगाल की नई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गुलाबी नगरी (पिंक सिटी) जयपुर की तर्ज पर कोलकाता को नीले रूप में देखना चाहती हैं। इसके लिए ममता बनर्जी सभी सरकारी भवनों, फ्लाईओवर्स, सड़क किनारों की रेलिंग तथा टैक्सियों को हल्के नीले रंग में रंगा हुआ देखना चाहती हैं।
राज्य के शहरी विकास मंत्री फरिहाद हाकिम ने शुक्रवार को बताया कि उनकी नेता ममता बनर्जी ने निश्चय किया है कि रंगों के विषय-वस्तु के रूप में कोलकाता शहर का रंग नीला होना चाहिए क्योंकि नई सरकार की थीम ‘आकाश की सीमा’ है। उन्होंने कहा कि वह निजी भवन मालिकों से भी अनुरोध करेंगे कि वे भी नीले कलर के ‘पैटर्न’ का पालन करें। उन्होंने कहा कि इस संबंधी जरूरी सरकारी आदेश जल्द जारी किए जाएंगे।
कोलकाता के मेयर और ममता बनर्जी के करीबी शोभन चटर्जी ने शुक्रवार से बातचीत में कहा कि अब शहर के फुटपाथ से लेकर फ्लाईओवर, जीर्ण-क्षीर्ण पार्क और पटरियां को सफेद और नीले रंग के नपे तुले इस्तेमाल से शहर को नया रूप दिया जाएगा।
चटर्जी ने बताया कि राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी अपनी राजधानी के लिए एकसमान रंग संयोजन को आवश्यक समझती है। उनके मुताबिक सफेद और नीले का चयन ध्यानपूर्वक उनकी गैर-विवादास्पद विशेषताओं को देखते हुए किया गया है।
उनका दावा हैं कि इस कदम का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य सरकार के फैसले पर कदाचित क्षेत्रीय राजनीति का प्रभाव है।
लाल रंग का से कोलकाता के बीते वक्त से संबद्ध रहा है। जिसका सटीक उदाहरण वाममोर्चा का ३४ सालों का राज है। जिसने राज्य पर लगातार तीन दशकों से ज्यादा लंबे समय तक शासन किया। जानकार मानते हैं कि ममता बनर्जी का यह कदम बंगाल को उसकी लाल विरासत से छुटकारा दिलाने का प्रयास है।
जानकारों की माने तो तृणमूल कांग्रेस का चिन्ह तिरंगा है। सफेद के अलावा इन दोनों रंगों (भगवा और हरा) के अपने-अपने राजनीतिक नुकसान हैं। भगवा को भाजपा से जोड़कर देखा जाता है और हरे को इस्लाम के साथ। इसी लिए ममता ने चतुराई के साथ कोलकाता को नीला शहर बनाने का एलान किया है।
राज्य सरकार ने शहर में रंग-संयोजन के लिए आठ सौ मिलियन डालर आवंटित किए हैं। तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अनुमानित लागत पर टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया।
पश्चिम बंगाल का पर्यटन मंत्रालय बेशक सरकार के इस कदम से प्रसन्न हो, लेकिन हर कोई नीले और सफेद के रूपांतरण को खुले दिल से नहीं ले रहा। शहर को नीले रंग में रंगने की मुहिम में सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर शहर की पीली टैक्सियों को सफेद और नीले रंग में बदलने का फरमान सुना दिया है।
यह हमारी पहचान को बदल देगा- यह कहना है टैक्सी चालक करतार सिंह का। उन्होंने कहा कि पीली टैक्सियां पिछले पांच दशकों से ज्यादा लंबे समय से शहर में दौड़ रही हैं। पेंट के लिए पैसा आवंटन करने की बजाय, सरकार राज्य परिवहन में पैसा खर्च कर सकती थी।
विपक्ष ने सरकार की इस सौंद्रीयकरण योजना की खंचाई करते हुए इसे धन की बर्बादी करार दिया है। राज्य के परिवहन मंत्री मदन मित्र की दलील है कि टैक्सियों और बसों को एक ही रंग में रंगने पर कलर थीम में समानता आएगी और महानगर का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाएगा. लेकिन बंगाल टैक्सी एसोसिएशन ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है. एसोसिएशन के सचिव विमल गुहा कहते हैं- टैक्सी का रंग बदलने में लगभग सात हजार रुपए खर्च होंगे. टैक्सी मालिक यह खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं।
जहां तक आम लोगों का सवाल है, उनकी प्रतिक्रिया मिलीजुली है. एक निजी दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी का कहना है कि नया रंग अच्छा ही लग रहा है. इससे शहर की सुंदरता निखर गई है। वहीं एक बुजुर्ग हैं कि सरकार यह रकम सड़कों और बसों की दशा सुधारने पर खर्च करती तो बेहतर होता। आम लोग या विरोधी चाहे कुछ भी कहें, सरकार महानगर को ब्लू सिटी में बदलने की अपनी योजना पर दिल खोल कर खर्च कर रही है।
दिलचस्प बात यह है कि कोलकाता नगर निगम ने ममता के इस पसंदीदा रंग यानी सफेद और नीले रंग से अपना मकान रंगवाने वाले तमाम मकान मालिकों को संपत्ति कर में भी छूट देने का फैसला किया है।
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anjuman
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भ्रष्टाचार भगाएं
है निरुक्त में उक्त
जगत में चलने वाले जो हैं ;
धरा और सूरज भी समझो
एक रूप में गो हैं ।
इस गो का पयपान
सुधी सब कवि किया करते हैं ;
वे भी जो कर्तव्यनिष्ठ
धर्मार्थ जिया करते हैं ।
कपटी कोई किन्तु मनुज
बन जोंक जिया करता है
लोलुप वह वसुधा का
लोहू चूस लिया करता है ।
उसको क्या जो यह वसुंधरा जीवे
या मर जावे ;
आत्महीन वह दुष्ट किन्तु
बेशक दैहिक सुख पावे॥
दैहिक सुख के लिए दे रहा
इस गो को पीड़ा है;
भ्रष्टाचारी इसके व्रण का
एक गंदा कीड़ा है ।
रे कीड़े , कितने दिन तक
तू दैहिक सुख पायेगा ?
भू की गंदी धूल ,
धरा में मिट कर मिल जाएगा ।
किन्तु याद तेरी जब -जब
मानवता को आएगी ;
तू भी था एक मनुज
सोच यह कितना शरमायेगी !
संभल , वक्त अब भी है पापी ,
तू रोले , पछता ले ;
हरण किया जो स्वत्व उगल कर
कीड़ा जन्म छुडा ले ॥
रे कपटी , छल -छिद्र छोड़कर
भी कुछ दिन तो जीले ।
धर्म और ईमान भरा
जीवन का जल कुछ पीले ॥
स्वाद और इसकी सुगंध
जब एक बार पायेगा ;
फिर छल का गंदा नाला
शायद न तुम्हें भाएगा ॥
अगर सुधर तुम गए
भले मैंने लेखनी उठायी ;
कटुता जाओ भूल
सोच मानव हैं भाई -भाई ॥
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Dr Om Prakash Pandey
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भिंड रेत खदानों में करोड़ों का घपला !
भोपाल/ ग्वालियर (पोलखोल डॉट कॉम टीम ) : ग्वालियर-चम्बल संभाग कभी पीले सोने के लिए विख्यात हुआ करता था, किन्तु अब यह अवैध रेत के उत्खनन के लिए कुख्यात हो गया है. यहाँ प्रतिदिन लाखों घन मीटर रेत का अवैध उत्खनन कर उन्हें बगैर किसी रॉयल्टी के बेचा जा रहा है. यही नहीं भिंड जिले के भारोली गांव स्थित सिंध नदी पर रेत खदान माफियायों ने रॉयल्टी से तीन चार गुना अधिक पैसा वसूल कर रेत को सप्लाई किया जा रहा है. अगर सूत्रों पर भरोसा करें तो यहाँ प्रतिदिन करीब 24 लाख रूपए का घोटाला किया जा रहा है.
पोलखोल डॉट कॉम ने खदान पर कार्य कर रहें कर्मचारियों के माध्यम से भिंड जिले के भारोली गांव स्थित सिंध नदी रेत खदान पर चल रहें अवैध रेत उत्खनन की पड़ताल की तो पाया कि वहाँ पर प्रशासन की आँखों में धूल झोंक कर बहुत बड़े पैमाने पर अवैध रेत उत्खनन का कार्य किया जा रहा है. खदान पर काम कर रहें कर्मचारियों ने नाम का खुलासा न करने की शर्त पर बताया कि यहाँ प्रतिदिन करीब 200 ट्रक और 400 ट्रेक्टर-ट्रॉलियों से रेत को लोड कर मध्य प्रदेश, उत्तरप्रदेश सहित राजस्थान के कुछ इलाकों में सप्लाई किया जा रहा है. पोलखोल डॉटकॉम को उपलब्ध कराये सबूतों में खुलासा हुआ है कि एक ट्रक पर 2250 रूपए रॉयल्टी के साथ 1950 रूपए खदान ड्वलप्मेंट के नाम से राशि वसूली जा रही है. यानी एक ट्रक पर नियमानुसार 4200 रूपए चार्ज बनता है जबकि ट्रक मालिक और ठेकेदारों से 4200 रूपए की जगह 16000 हजार से 18000 रूपए तक वसूल किये जा रहें हैं. यानी एक ट्रक पर 11 हजार 800 रूपए और उससे भी अधिक की वसूली अवैध तरीके से की जा रही है. अगर खदान पर कार्य कर रहे कर्मचारियों और ट्रक ड्राइवरों की माने तो प्रतिदिन 200 ट्रक और 400 ट्रेक्टर-ट्रॉली इस खदान से लोड की जा रही हैं. इस हिसाब से प्रतिदिन 23 लाख 60 हजार (सिर्फ ट्रक से) अवैध तरीके से खदान माफिया राशि वसूल रहे हैं. अगर एक माह का आंकड़ा (संभावित) निकालें तो यह राशि 7 करोड़ से ऊपर जा पहुँचती है. और पिछले दो साल का आंकड़ा मापे तो यह राशि 169.92 करोड़ से ऊपर जा पहुंचेगी.इसी तरह ट्रेक्टर-ट्रॉली पर 750 रु रोयल्टी के नाम पर रशीद दी जा रही है, जबकि ट्रेक्टर-ट्रॉली मालिकों से 2000 रु अवैध तरीके से वसूले जा रहे हैं. और यहाँ से प्रतिदिन 400 ट्रॉली रेत लोड किया जा रहा है. यानि एक ट्रॉली से 1250 रु अधिक वसूले जा रहें हैं. इस तरह प्रतिदिन 5 लाख रु अवैध तरीके से वसूले जा रहे हैं और पिछले दो सालों में 36 करोड़ रु अवैध तरीके से वसूले गए हैं. यहाँ यह बताना जरूरी है कि जबरिया अधिक राशि वसूलने के नाम पर ट्रक व ट्रेक्टर ट्रॉली मालिकों व ठेकेदारों को कुछ घन मीटर रेत ज्यादा दे दिया जाता है. यह घोटाल भिंड जिले की एक रेत खदान का है. जबकि इस जिले में इस तरह की करीब 10 अन्य खदाने संचालित की जा रही हैं. कुल मिलकर भिंड में रेत खदान माफियाओं द्वारा पिछले दो वर्षों में 205 करोड़ रूपए का घोटाला किया गया है. अगर प्रदेश सरकार इस खदानों की गहराई से जांच पड़ताल करें तो कर्नाटक खदानों से बड़ा घोटाला म.प्र के भिंड रेत खदानों से उजागर हो सकता है. इस बारे में मध्यप्रदेश की विधानसभा के उपनेता प्रतिपक्ष व भिंड विधायक चौधरी राकेश सिंह ने कहा है कि यह पूरा कार्य प्रदेश सरकार के संरक्षण में किया जा रहा है. दूसरी तरफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डाक्टर गोविन्द सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा कि मुख्यमंती के नेतृत्व में पूरे प्रदेश में खदान माफिया पनप चुके हैं और इस अवैध उत्खनन को पूरी तरह शासकीय संरक्षण प्राप्त है यही वजह है कि कोई भी अधिकारी इस अवैध उत्खनन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है. दूसरी तरफ ग्वालियर से कांग्रेस विधायक प्रद्दुम्न सिंह तोमर भिंड की रेत खदानों से किये जा रहें अवैध वसूली और उत्खनन को कर्नाटक के बेल्लारी से बड़ा घोटाला मंत्रे हैं. उनका आरोप है कि भाजपा सरकार प्रदेश में खदान माफियाओं को खुला संरक्षण प्राप्त है. जब भारौली रेत खदान के पार्टनर के.पी सिंह से इस पूरे मामले से सम्बंधित बात की तो उन्होंने किसी भी प्रकार की अवैध वसूली नहीं की जाने की बात कही और आरोपों का खंडन किया.
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RAVI SHEKHAR
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पटरियां

हम पटरियां हैं शायद
दो अंजान मुसाफिरों की तरह
लाख कोशिशों के बाद भी नहीं मिलती
एक ही मंजिल है एक ही सपना
पर हैं अलग सूरज और चांद की तरह
क्योंकि हम पटरियां है शायद
हमारा पटरियां होना भी सही है
पटरियों का अलग-अलग होना भी सही है
क्योंकि पटरियों को डर है कहीं
एक होते ही उनका आस्तिव न समाप्त हो जाए
हम पटरियां न जानें कितनों का
सफर तैय करती हैं
न जाने कितनों को अपनों से मिलातीं हैं
पर खुद को हमेशा जुदा ही पातीं हैं
कभी भी नहीं मिल पातीं हैं पटरियां
क्योंकि हम पटरियां है शायद..........
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SHASHIKALA
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2.3.12
चरवाहे !
चरवाहे!
जिन कुत्तों को पाले थे
करने भेड़ों की रखवाली ;
भक्षण करते भेड़ों का
चल रहे चाल वे मतवाली ।
जन-गन-मन अधिनायक हे ,
चरवाहे!
जहाँ कहीं भी हो
अब आगे आओ ;
उजड़ रहा यह चारागाह
बचाओ
आज बचाने
अगर नहीं आओगे ,
कहीं जंग होगी
मुंह की खाओगे ।
इसी लिए कहता हूँ
हे ! हा ! हा! हे! आ हे!
चरवाहे !
आकर अपना चारागाह बचा हे !
भ्रष्टाचार भगा हे ,
बूढ़े चरवाहे !
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Dr Om Prakash Pandey
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गहलोत समझें तो यह तमाचे से कम नहीं है
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तेजवानी गिरधर
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...यानि अब ट्रेफिक पुलिस की जेब ज्यादा गरम होगी
तकरीबन बाईस पुराने सेंट्रल मोटर वीइकल एक्ट में संशोधन के प्रस्तावित बिल को केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद एक ओर जहां यह उम्मीद की जा रही है कि इससे भारी अर्थ दंड से डर कर चालक ट्रेफिक नियमों की पालना के प्रति सजग होंगे, वहीं इस बात की भी आशंका है कि इससे ट्रेफिक पुलिस में पहले से व्याप्त भ्रष्टाचार और बढ़ जाएगा। दरअसल सरकार का सोच यह है कि जुर्माना कम होने के कारण चालक सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे। वे ले दे कर छूटने कोशिश में रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब दो करोड़ लोगों ने पिछले साल ट्रैफिक नियमों को तोड़ा और जुर्माना भी चुकाया। अफसरों का कहना है कि जुर्माना राशि कम है। लोग नियम तोडऩे से नहीं डरते। ऐसे में सवाल यह है कि क्या वाकई में जुर्माना बढऩे के बाद लोग सुधर जाएंगे या हालात जस के तस बने रहेंगे। अक्सर यह देखने में आता है कि जिन नियमों के उल्लंघन में जुर्माने की राशि 100, 200 या 500 रुपये से ज्यादा है, उनमें जुर्माना भरने के बजाय मामला मौके पर ही निपटा लेने की कोशिशें की जाती हैं। यद्यपि आमतौर पर ये कोशिशें उल्लंघन करने वालों की तरफ से ही ज्यादा होती हैं, लेकिन कई ट्रैफिक पुलिसकर्मी भी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकते। ऐसे में जब जुर्माना बढ़ जाएगा, तो मामला मौके पर ही निपटा लेने की कोशिशें भी बढ़ जाएंगी। यह सही है कि ट्रेफिक पुलिस को यातायात सप्ताह के दौरान अपेक्षित लक्ष्य हासिल करने होते हैं, मगर लक्ष्य की पूर्ति के अतिरिक्त आम तौर पर घूसखोरी ही चलन में है। इसकी वजह ये है कि जहां नियम का उल्लंघन करने वाला नियमानुसार चुकाए जाने वाली राशि से कम दे कर छूट जाता है, इस कारण वह संतुष्ट रहता है, वहीं ट्रेफिक कर्मचारी को जेब गरम होने के कारण संतुष्ट होना ही है। यानि मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी? चूना तो सरकार को ही लगता है। जब जुर्माना राशि बढ़ जाएगी तो स्वाभाविक रूप से घूसखोरी बढ़ जाएगी। यद्यपि इस आशंका भरी सोच को नकारात्मक माना जा सकता है, मगर जब तक घूसखोरी पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया जाएगा, जुर्माना बढ़ाए जाने मात्र से हालत सुधरने वाले नहीं हैं। सौ बात की एक बात। जुर्माना बढ़ाने का सीधा सा मतलब है कि चालक सुधर नहीं रहा है। सुधर नहीं रहा है, इसका मतलब ये नहीं कि वह गंवार है, अपितु वह अधिक चतुर है। चालक इसके प्रति इतने जागरूक नहीं है कि सारे नियम उनके हित की खातिर ही बने हैं, बल्कि वह इसके प्रति अधिक जागरूक है कि ट्रेफिक पुलिस से कैसे बचा जाए। चालक जानता है कि अमुक-अमुक जगह पर ट्रेफिक पुलिस वाला नहीं होगा, उन-उन जगहों पर वह हेलमेट उतार देता है, सीट बैल्ट खोल देता है। एक महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि केवल नियम कड़े करने और दंड बढ़ाने से तब तक सकारत्मक परिणाम नहीं आएंगे, जब तक कि ट्रेफिक पुलिस के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे। हकीकत यही है कि संसाधनों की कमी के कारण ही नियमों का उल्लंघन होता है और दुर्घटनाएं होती हैं। रहा सवाल दुर्घटना में किसी की मृत्यु होने पर मुआवजा राशि चार गुना बढ़ाकर एक लाख रुपए करने की तो इसकी वजह से चालक दुर्घटना कारित कर किसी को मारेगा नहीं, ऐसा नहीं है, बल्कि महंगाई बढ़ जाने के कारण मौजूदा मुआवजा राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, इस कारण उसमें वृद्धि की गई है। लब्बोलुआब, दंड बढ़ाए जाने से कुछ तो फर्क की उम्मीद की जा सकती है, मगर इससे चालक जागरूक हो जाएगा, इसकी संभावना कुछ कम ही है। उलटे भ्रष्टाचार बढ़ जाएगा। इस सिलसिले में ओशो रजनीश की ओर से दिए गए उदाहरण को लीजिए- हमारे देश के एक मंत्री इंग्लैंड के दौरे पर गए। कड़ाके की ठंड थी। वे रात को करीब एक बजे किसी कार्यक्रम से होटल को लौट रहे थे। अचानक ड्राइवर ने कार रोक दी। मंत्री जी ने देखा कि चौराहे पर लाल बत्ती हो जाने के कारण कार रुकी है। उन्होंने जब यह देखा कि चौराहा पूरी तरह से सुनसान है तो ड्राइवर से बोले कि जब कोई वाहन व राहगीर नहीं है और उससे भी बढ़ कर ट्रेफिक पुलिस भी नहीं है तो कार रोकने का क्या मतलब है? इस पर ड्राइवर ने चौराहे पर एक ओर खड़ी ठंड में ठिठुर रही एक बुढिय़ा की ओर इशारा किया कि जो हरी लाइट होने का इंतजार कर रही थी तो मंत्री जी को समझ में आ गया कि हम भारतीय भले ही देशभक्ति की ऊंची ऊंची ढीगें हाकें, मगर राष्ट्रीयता और नियमों का पालन करने के मामले में अंग्रेज हमसे कई गुना बेहतर हैं। अफसोस कि अंग्रेज हमें अंग्रेजी तो सिखा गए, मगर एटीकेट्स और मैनर्स अपने साथ ले गए।
-tejwanig@gmail.com
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तेजवानी गिरधर
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क्या सुन्दरता का अर्थ सेक्सी है?
स्त्री को भोग वस्तु मानने वालों को, स्त्री को वासना की दृष्टि से देखने वालों को और उससे अशोभनीय भाषा में बात करने वालों को भारतीय समाज लंपट कहता है। भारत में स्त्री के लिए सेक्सी शब्द सुन्दरता का पर्याय नहीं। लेकिन, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने लड़कियों को सलाह दी है कि वे लड़कों के द्वारा बोले जाने वाले सेक्सी शब्द को नकारात्मक ढंग से न लें और बुरा न मानें। इतका मतलब सुन्दरता होता है। मोहतरमा ने यह बात महिला सशक्तिकरण और महिलाओं के सुनहरे भविष्य को लेकर आयोजित सेमिनार में कही। सुन्दरता की इस परिभाषा पर बिना देर किए हंगामा बरपा। पुरुषवादी और महिलावादी संगठनों ने महिला आयोग की अध्यक्ष के बयान का तीव्र विरोध जताया। बौंहे तानी। तमाम स्वतंत्र विचारकों, समाजसेवियों और संगठनों ने महिला आयोग की अध्यक्ष के इस बयान को 'स्त्रियों से छेड़छाड़' को बढ़ावा देने वाला माना। आंशिकतौर पर यह सच भी है। मनचले, सड़कछाप मजनू और आवारगी करते लड़के 'हे, सेक्सी' कहकर लड़कियों को सरेराह छेड़ेंगे। लड़की आंख तरेरेगी तो कह भी सकेंगे- तुम्हारे अधिकारों के संरक्षण के लिए बैठी महिला ने कहा है कि सेक्सी का मतलब सुन्दरता है। तुम कोई और अर्थ न लगाओ।
और अधिक पढने के लिए अपनापंचू पर आपका स्वागत है... अपनापंचू पर आप एक सार्थक बहस में भी शामिल हो सकते हैं....
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लोकेन्द्र सिंह
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Sanjay Kumar Tripathi
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1.3.12
राहुल ने वरुण को शालीनता के साथ दिया जवाब
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Shikha Kaushik
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एक बार फिर दहाड़ीं वसुंधरा, किरण ने भी मिलाया सुर
राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे ने एक बार फिर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को ललकारते हुए दहाड़ लगाई। इस बार तो राजसमंद विधायक व भाजपा राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमती किरण माहेश्वरी ने भी उनके सुर में सुर मिलाया। विधानसभा की कार्यवाही को बाधित करने में मुद्दे पर दोनों ने आरोप लगाया है कि जब भी मौजूदा सरकार में हो रहे भ्रष्टाचार की बात उठाई जाती है तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उसका कोई जवाब देने की बजाय उलटे पलट कर पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप का रिकार्डर चला देते हैं। उन्होंने इसके साथ यह भी जोड़ा कि वे दरअसल ऐसा इस कारण करते हैं ताकि उनके भ्रष्टाचार पर पर्दा पड़ जाए और जनता का ध्यान हट जाए। विधानसभा सत्र के पिछले कड़वे अनुभव को ख्याल में रखते हुए अपनी सदाशयता का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा सदन को ठीक से चलने देने की इच्छुक है। यदि ऐसा मानस न होता काहे को विधायक भवानी सिंह राजावत के निलंबन को समाप्त करने का आग्रह करने स्वयं मुख्यमंत्री गहलोत के घर जाती। मगर ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार सदाशयता चाहती ही नहीं। वसुंधरा का तर्क है कि नरेगा में हो रहे भ्रष्टाचार की जानकारी सरकार को भी है, कार्यवाही भी चल रही है, ऐसे में मुख्यमंत्री को भाजपा के वरिष्ठ नेता गुलाब चंद कटारिया के उन सच्चे आरोपों पर उबलने की जरूरत क्या थी? वसुंधरा ने ठोक कर कहा कि गहलोत पिछले तीन साल में उन पर एक भी आरोप साबित नहीं पाए हैं, फिर भी एक ही रट लगाए हुए हैं। एक ही तरह के आरोप सुन कर लगभग उकता चुकीं वसुंधरा ने चिढ़ते हुए तल्ख स्वर में चेताया कि या तो आरोप साबित करो और जो जी में आए सजा दो, वरना जनता से माफी मांगो। इस सिलसिले में उन्होंने माथुर आयोग का भी जिक्र किया, जिसे हाईकोर्ट व फिर सुप्रीम कोर्ट ने नकार दिया। इतना ही नहीं उन्होंने चाहे जितने आयोग बनाने तक की चुनौती भी दे दी।
वसुंधरा ने एक बार फिर गहलोत को घेरते हुए कहा कि खुद उन पर ही जल महल प्रकरण, कल्पतरू कंपनी को फायदा देना, वेयर हाउस कॉर्पोरेशन को शुभम कंपनी को सौंपने और होटल मेरेडीयन को फायदा पहुंचाने संबंधी कई आरोप लगे हुए हैं, जो कि खुद उनकी ही पार्टी के नेताओं ने लगाए हैं और मीडिया ने भी उजागर किए हैं। वसुंधरा के इन तीखे तेवरों से उत्तेजित हुईं किरण माहेश्वरी ने भी मुख्यमंत्री गहलोत की हरकत पर ऐतराज किया। वसुंधरा की पैरवी करते हुए उन्होंने कहा कि गहलोत एक भी आरोप साबित नहीं कर पाए हैं, बावजूद इसके उन्हीं आरोपों को लगा कर जानबूझ कर सदन से पलायन करने की नीति पर चल रहे हैं।
बहरहाल, भाजपा की इन दो नेत्रियों के तेवरों से साफ है कि भाजपा इस बार पूरे फॉर्म में है। उनके साफ-साफ आरोप सौ टंच सही प्रतीत होते हैं, ऐसे में जनता में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसी क्या वजह है कि गांधीवादी गहलोत आखिर किन मजबूरियों के चलते वसुंधरा की थप्पड़ के बाद फिर दूसरा थप्पड़ खाने को गाल आगे कर देते हैं। सीधी सीधी बात है वे किन कारणों से वसुंधरा पर लगाए गए आरोपों को साबित नहीं कर पा रहे हैं। चलो माथुर आयोग तो कानूनी पेचों में उलझ गया, मगर यदि भाजपा के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को साबित करने के और रास्ते भी निकाले जा सकते थे। यहां उल्लेखनीय है कि वसुंधरा के तेवरों के आगे गहलोत की ढ़ीले-ढ़ाले व्यक्तित्व को लेकर कांग्रेसियों को भी बड़ी भारी तकलीफ है। पिछले दिनों पूर्व उप प्रधानमंत्री व वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा के राजस्थान दौरे के दौरान वसुंधरा को घेरने के लिए गहलोत के इशारे पर कांग्रेस ने भ्रष्टाचार से जुड़े दस सवाल दागे थे, जो पूर्व में भी कई बार दागे जा चुके हैं। अर्थात कांग्रेस ने वे ही बम फिर छोडऩे की कोशिश की, जो कि पहले ही फुस्स साबित हो चुके हैं। वे सवाल खुद ही ये सवाल पैदा कर रहे थे कि उनमें से एक में भी कार्यवाही क्यों नहीं हो पाई है, जबकि अब तो सरकार कांग्रेस की है। प्रतिक्रिया में न केवल भाजपा ने पलटवार किया और मौजूदा कांग्रेस सरकार के तीन साल के कामकाज पर सवाल उठा दिए, अपितु पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी दहाड़ीं थीं।
सरकार की यह हालत देख कर खुद कांग्रेसी नेताओं को बड़ा अफसोस है कि गहलोत इस मोर्चे पर पूरी तरह से नकारा साबित हो गए हैं। उन्हें बड़ी पीड़ा है कि वे वसुंधरा को घेरने की बजाय खुद ही घिरते जा रहे हैं। हालांकि यह भी सही है कि वसुंधरा जिस तरह से अपने आप को निर्दोष बताते हुए दहाड़ रही हैं, जनता उन्हें उतना पाक साफ नहीं मानती। भाजपा राज में हुए भ्रष्टाचार को लेकर आम जनता में चर्चा तो खूब है, भले ही गहलोत उसे साबित करने में असफल रहे हों। साथ ही यह भर कड़वा सच है कि जनता की नजर में भले ही वसुंधरा की छवि बहुत साफ-सुथरी नहीं हो, मगर कम से कम गहलोत तो उनके दामन पर दाग नहीं लगा पाए हैं। देखते हैं इस बार वसुंधरा की थप्पड़ खा कर गहलोत का खून खौलता है या नहीं। या फिर नींद में से उठ कर पानी पी के सो जाएंगे।
-tejwanig@gmail.com
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तेजवानी गिरधर
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जिसके सर पर ब्रम्ह हत्या,गौ हत्या का दोष...!
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todaychhattisgarh
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सेक्सी,सेक्सी,सेक्सी तुझे लोग बोलें-ब्रज की दुनिया
मित्रों,किसी शब्द का अर्थ काल और देश के अनुसार कैसे एकदम-से बदल जाता है मैं इसे एक बेहद दिलचस्प उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना चाहूँगा.उस समय यानि वर्ष २००८ में दैनिक हिंदुस्तान,पटना में जेनरल डेस्क में कार्यरत था.एक दिन यूं ही उत्सुकतावश प्रिंट आउट वाली मशीन पर पड़ी सम्पादकीय पृष्ठ का प्रिंट आउट उठा लिया और पढ़ने लगा.मुख्य सम्पादकीय चन्द्रमा पर पानी के मिलने के सन्दर्भ में लिखा गया था जिसका समापन चंदामामा दूर के,पुए पके बूर के गीत से किया गया था.पंक्ति बिल्कुल सही थी और मुंगेर और खगड़िया के लिए अख़बार भेजा भी जा चुका था लेकिन बिहार में तो बूर का अर्थ योनि होता है भले ही गीतकार प्रेम धवन के पंजाब में इसका कोई और अर्थ होता हो.मैंने उस समय के समाचार संपादक कमल किशोर सक्सेना जी को इस तथ्य से अवगत कराया.फिर क्या था मशीन पर चल रही छपाई रोक दी गयी और आगे के संस्करणों में बूर को गुड़ कर दिया गया.ठीक इसी तरह हो सकता है कि सेक्सी शब्द का पश्चिमी देशों के सेक्स फ्री समाज में ज्यादा प्रयोग सुन्दर के अर्थ में होता हो लेकिन भारत में तो इसका सीधा मतलब होता है कामुक या सेक्स करने लायक.दोनों अर्थ सही हैं परन्तु जिस तरह बिहार में बूर शब्द का प्रयोग आपत्तिजनक की श्रेणी में आता है उसी तरह भारत में सेक्सी शब्द का प्रयोग मानसिक प्रताड़ना या छेड़खानी के लिए किया जाता है.ऐसे में ममता जी की सलाह को मानकर लड़कियां कैसे उस स्थिति में अपने को खुशनसीब मान सकती हैं जब कोई चौक-चौराहे पर खुलेआम उससे कहे कि तुम तो आज बड़ी सेक्सी लग रही हो?साथ ही छेड़खानी के वक़्त ऐसा करनेवाले के हाव-भाव पर गौर करना होता है और तब न तो शब्दों के अर्थ को लेकर ही कोई संशय शेष रह जाता है और न ही प्रयोगकर्ता के उद्देश्य को लेकर ही.
मित्रों,मुझे लगता है कि चूंकि ममता जी का लालन-पालन अंग्रेजी वातावरण में हुआ होगा इसलिए उन्हें शायद चौक-चौराहे पर रोजाना होनेवाली छेडखानियों से रूबरू होने का सुअवसर मिला ही नहीं है अन्यथा उन्हें पता होता कि जब कोई कामांध किसी अबला नारी के लिए सेक्सी शब्द का प्रयोग करता है तो उसका मतलब सिर्फ और सिर्फ कामुक होता है और उद्देश्य भी केवल और केवल एक होता है उस स्त्री का शीलहरण.उसका उद्देश्य अपने शिकार की सुन्दरता की प्रशंसा करना तो कदापि नहीं होता.इस तरह अगर ममता जी को प्रत्येक लम्पट में एक प्रशंसक भी नजर आने लगा तब तो हो चुका उनके सेक्सी हाथों से भारतीय महिलाओं का भला.हो सकता है कि वो कल किसी बलात्कार की दिल दहला देने वाली घटना के बाद यह भी कह डालें कि बलात्कारी निरपराध है क्योंकि वह तो पीडिता की सुन्दरता का अनन्य प्रशंसक है.
मित्रों,आपको भी आश्चर्य हो रहा होगा कि सुपर प्रधानमंत्री सोनिया गाँधी ने कैसे-कैसे लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठा रखा है.इटली से आयातित नेता से हम और उम्मीद भी क्या रख सकते हैं?एक बात तो निश्चित है कि सोनिया जी किसी भी तरह भारतीय संस्कृति का भला नहीं चाहती हैं तभी तो लगातार इसकी जड़ों पर केंद्र सरकार द्वारा सायास प्रहार किया जा रहा है.कभी राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा ममता शर्मा छेड़खानी और यौनापराध-उत्प्रेरक बयान दे डालती हैं तो कभी सरकार सुप्रीम कोर्ट में भारतीय संस्कृति में अतिवार्जित समलैंगिकता का समर्थन करने लगती है.जो कुछ भी इन दिनों देश में संस्कृति के मंच पर हो रहा है मुझे तो लगता है कि ऐसा सरकार द्वारा साजिशन किया या करवाया जा रहा है.चाहे वह सन्नी लियोन का भारत आगमन ही क्यों न हो.स्थिति बड़ी गंभीर है और निकट-भविष्य में और भी ज्यादा गंभीर हो जानेवाली है.अगर हम भारतीय अब भी नहीं संभले तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमारी लचीली संस्कृति में इतनी तब्दीली आ जाएगी कि सत्य सनातन भारतीय संस्कृति में कुछ भी भारतीय नहीं रह जाएगा.
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ब्रजकिशोर सिंह
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