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3.3.12

मुसलमानों को 18 फीसद आरक्षण : क्या बाकी के धर्म धोका हैं ! नकली हैं !


मुसलमानों को 18 फीसद आरक्षण ! बाकी अल्पसंख्यक कहाँ जायेंगे ? कौन बताएगा ?

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मुसलमानों को 18 फीसद आरक्षण 


मायावती ने भी की मुसलमानों के आरक्षण की वकालत!


मुसलमानों को आरक्षण देंगे?


क्या बुराई है , जब वो अल्प संख्या में हैं तो जरुर दें . पर ये बाकी के अल्पसंख्यक क्या किसी और देश के हैं !

HINDUISM - about 82%
ISLAM - about 12%
CHRISTIANITY - about 2.5%
SIKHISM - about 2%
BUDDHISM - about 0.7%
JAINISM - about 0.5%
ZOROASTRIANISM - about 0.01%
JUDAISM - about 0.0005%

क्या बाकी के  धर्म धोका हैं ! नकली हैं ! 

आखिर क्या कारण हैं कि ये १२% , बाकि के ८८% पर भारी हैं ! ज़रा अपने गिरेबान में झांकिये . 

कुछ तो होगा उनमें कमाल , कुछ तो अल्लाह मियां  में खासियात हैं कि कब्रों के ऊपर चादरें चढाने,  केवल हिंदू ही जाते हैं , क्योंकि इस्लाम के अनुसार तो अल्लाह के सिवा ,  कब्रों की  पूजा करना , कुफ्र है . 

जब देवताओं , भगवानों कि ताकत खतम हो गयी तभी तो उन्हें कब्रों कि शरण में जाना पड़ता है . 

काश हमारे देवता भी कुछ भला कर पाते !

चुनावों में बड़ा मुद्दा है मुस्लिम आरक्षण। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अपने अपने तरीके से इसे लागू करने की बात कह रही हैं। बीजेपी और बीएसपी अपने अपने तरीके से इससे बच रही हैं। ठीक है कि सब पार्टियां वोट के चक्कर में हैं, लेकिन मुद्दा तो है। देश का बड़ा मुसलमान तबका पिछड़ा हैं। उसे आगे लाना है। 

आखिर ये तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश कब मुसलामानों कि सुनेगा !

कृष्ण कुमार यादव बने इलाहाबाद रीजन के नए निदेशक डाक सेवाएं

भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने इलाहाबाद रीजन के नए निदेशक डाक सेवाएँ के रूप में कार्यभार ग्रहण कर लिया है. साहित्य, लेखन और ब्लागिंग में अभिरुचि रखने वाले श्री यादव इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में परास्नातक हैं. मूलत: तहबरपुर, आजमगढ़ के निवासी श्री यादव वर्ष 2001 बैच के अधिकारी हैं. इससे पूर्व आप सूरत, लखनऊ, कानपुर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हैं. इलाहाबाद में नियुक्ति से पूर्व कृष्ण कुमार यादव अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ थे. गौरतलब है कि इलाहाबाद रीजन, उत्तर प्रदेश परिमंडल का सबसे बड़ा डाक-रीजन है, जिसके अंतर्गत इलाहाबाद, कौशाम्बी, जौनपुर, प्रतापगढ़, वाराणसी, चंदौली, भदोही, गाजीपुर, मिर्जापुर और सोनभद्र जनपद आते हैं. इलाहाबाद में निदेशक डाक सेवाएँ का पद कई महीनों से खाली चलने के चलते आम जनता के साथ विभागीय गतिविधियाँ भी काफी प्रभावित हो रही थीं. यही नहीं पिछले माह यहाँ के पोस्टमास्टर जनरल की पदोन्नति पश्चात् इलाहाबाद रीजन मुख्यालय में शून्य की स्थिति पैदा हो गई थी. ऐसे में तेज-तर्रार और ईमानदार छवि के लिए मशहूर कृष्ण कुमार यादव की नियुक्ति इलाहाबाद रीजन में डाक सम्बंधित गतिविधियों को नए आयाम देगी. श्री यादव के पास गोरखपुर रीजन के निदेशक का भी अतिरिक्त प्रभार है, ऐसे में उनसे लोगों की आशाएं भी काफी बढ़ गई हैं.


सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित नाम श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढ़ा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य-संग्रह-2005), 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह-2006 व 2007), India Post : 150 Glorious Years (2006) एवं 'क्रांति -यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' (2007) प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा. राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ (सं. डा. दुर्गाचरण मिश्र, 2009) भी प्रकाशित हो चुकी है। पचास से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/संकलनों में विभिन्न विधाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं व ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन भी आपने किया है। आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर और दूरदर्शन से आपकी कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार इत्यादि का प्रसारण हो चुका हैं।



श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और व्यक्तिगत रूप से शब्द सृजन की ओर (www.kkyadav.blogspot.com) व डाकिया डाक लाया (www.dakbabu.blogspot.com) और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ ,‘सप्तरंगी प्रेम’ व ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉगों के माध्यम से सक्रिय हैं। विभिन्न वेब पत्रिकाओं, ई पत्रिकाओं, और ब्लॉग पर प्रकाशित होने वाले श्री यादव की इंटरनेट पर ’कविता कोश’ में भी काव्य-रचनाएँ संकलित हैं।



विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त श्री यादव की इलाहाबाद में नियुक्ति से इलाहाबाद से जुड़े साहित्यकारों और ब्लागरों में भी काफी हर्ष है !!

अफीम है इनकी जिंदगी

शंकर जालान



कहने को तो आजादी के बाद से ही देश में अफीम का उत्पादन व कारोबार प्रतिबंधित है, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी उत्तर दिनाजपुर जिले के १२ लाइसेंसशुदा नशेड़ियों को सरकार अफीम की आपूर्ति करती है। यह नियम अंग्रेजों के जमाने से ही चला आ रहा है। इन सबों को चिकित्सकों के परामर्श से शारीरिक बाध्यता के चलते अफीम दी जाती है। पहले अफीम की बिक्री के लिए लाइसेंस दिए जाते थे, लेकिन वह नियम अब बंद है। इसीलिए सरकार सीधे ट्रेजरी के जरिए अफीम की आपूर्ति नशेड़ियों को करती है। मालूम हो कि कानूनन अफीम का सेवन, संग्रह या इसकी खेती करना दंडनीय अपराध है। आरोप साबित होने पर दस साल की जेल के अलावा कई लाख रुपए का जुर्माना लग सकता है। हालांकि इन १२ लाइसेंसी अफीमचियों पर यह कानून लागू नहीं होता। अफीम की खेती को हतोत्साहित करने के लिए ही यह कानून बनाया गया है। अंग्रेजों के जमाने में अफीम के कारोबार से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रचुर लाभ अर्जित किया था। उस समय अफीम सेवन के लिए सरकारी लाइसेंस दिए जाते थे। उनमें से ही अब केवल एक दर्जन अफीमची रह गए हैं। इनमें एक महिला भी हैं। नए सिरे से किसी को लाइसेंस नहीं दिए जाते। इन लोगों के पास अफीम हासिल करने के लिए सरकारी राशन कार्ड है। उल्लेखनीय है कि पूरे देश में अफीम या पोस्तो की खेती पर प्रतिबंध है। कानूनी तौर पर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के एक सरकारी फार्म में अफीम की खेती होती है, जिसका वैज्ञानिक उपयोग भी है। वहीं से इन अफीमचियों के लिए अफीम मंगाई जाती है। इसके अलावा अफगानिस्तान से भी अफीम मंगाई जाती है। अफीम की खेती नहीं की जा सके, इसके लिए इसे पानी में उबाल कर उसे बाजार में पोस्तो के नाम से बिक्री की जाती है। पोस्तो का उपयोग मसाले के बतौर किया जाता है। चूंकि अफीम का सेवन करने वाले इसे छोड़ नहीं सकते इसलिए अंग्रेज सरकार ने यह नियम बनाया था जिसका आज भी अनुपालन करना पड़ रहा है। अफीम मंगाकर सरकारी कार्यालय से इसे कड़ी सुरक्षा के बीच ट्रेजरी भेजा जाता है। वहां से इसे डीलरों के जरिए अफीमचियों तक पहुंचाया जाता है। इन अफीमचियों को प्रत्येक सप्ताह १२ ग्राम अफीम सेवन के लिए दी जाती है। रायगंज के एक अफीमची ने बताया कि अफीम नहीं मिलने पर मृत्यु जैसी यंत्रणा भोग करनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि बचपन में इसकी आदत लग गई। अब तो यह इनके लिए जिंदगी बन गई है। सरकार यह अफीम इन्हें मात्र ६० रुपए में उपलब्ध कराती है।

कलर कोड कोलकाता

शंकर जालान



पढ़ा है कि रंगों का जीवन में बड़ा महत्व होता है, लेकिन किसी शहर के लिए सत्ताधारी राजनीति दल की ओर से कलर कोड का फरमान जारी करने की घटना देश की पहली घटना है, जिसे पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस शासित सरकार ने जारी किया है। पश्चिम बंगाल की नई सरकार के नए फरमान में कोलकाता शहर को नीला शहर (ब्लू सिटी) बनाने की बात कही गई है।
जानकारों का कहना है कि माक्र्सवादियों की पिछली सरकार को जहां लाल रंग पसंद था। अब वहीं पश्चिमी बंगाल की नई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गुलाबी नगरी (पिंक सिटी) जयपुर की तर्ज पर कोलकाता को नीले रूप में देखना चाहती हैं। इसके लिए ममता बनर्जी सभी सरकारी भवनों, फ्लाईओवर्स, सड़क किनारों की रेलिंग तथा टैक्सियों को हल्के नीले रंग में रंगा हुआ देखना चाहती हैं।
राज्य के शहरी विकास मंत्री फरिहाद हाकिम ने शुक्रवार को बताया कि उनकी नेता ममता बनर्जी ने निश्चय किया है कि रंगों के विषय-वस्तु के रूप में कोलकाता शहर का रंग नीला होना चाहिए क्योंकि नई सरकार की थीम ‘आकाश की सीमा’ है। उन्होंने कहा कि वह निजी भवन मालिकों से भी अनुरोध करेंगे कि वे भी नीले कलर के ‘पैटर्न’ का पालन करें। उन्होंने कहा कि इस संबंधी जरूरी सरकारी आदेश जल्द जारी किए जाएंगे।
कोलकाता के मेयर और ममता बनर्जी के करीबी शोभन चटर्जी ने शुक्रवार से बातचीत में कहा कि अब शहर के फुटपाथ से लेकर फ्लाईओवर, जीर्ण-क्षीर्ण पार्क और पटरियां को सफेद और नीले रंग के नपे तुले इस्तेमाल से शहर को नया रूप दिया जाएगा।
चटर्जी ने बताया कि राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी अपनी राजधानी के लिए एकसमान रंग संयोजन को आवश्यक समझती है। उनके मुताबिक सफेद और नीले का चयन ध्यानपूर्वक उनकी गैर-विवादास्पद विशेषताओं को देखते हुए किया गया है।
उनका दावा हैं कि इस कदम का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य सरकार के फैसले पर कदाचित क्षेत्रीय राजनीति का प्रभाव है।
लाल रंग का से कोलकाता के बीते वक्त से संबद्ध रहा है। जिसका सटीक उदाहरण वाममोर्चा का ३४ सालों का राज है। जिसने राज्य पर लगातार तीन दशकों से ज्यादा लंबे समय तक शासन किया। जानकार मानते हैं कि ममता बनर्जी का यह कदम बंगाल को उसकी लाल विरासत से छुटकारा दिलाने का प्रयास है।
जानकारों की माने तो तृणमूल कांग्रेस का चिन्ह तिरंगा है। सफेद के अलावा इन दोनों रंगों (भगवा और हरा) के अपने-अपने राजनीतिक नुकसान हैं। भगवा को भाजपा से जोड़कर देखा जाता है और हरे को इस्लाम के साथ। इसी लिए ममता ने चतुराई के साथ कोलकाता को नीला शहर बनाने का एलान किया है।
राज्य सरकार ने शहर में रंग-संयोजन के लिए आठ सौ मिलियन डालर आवंटित किए हैं। तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अनुमानित लागत पर टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया।
पश्चिम बंगाल का पर्यटन मंत्रालय बेशक सरकार के इस कदम से प्रसन्न हो, लेकिन हर कोई नीले और सफेद के रूपांतरण को खुले दिल से नहीं ले रहा। शहर को नीले रंग में रंगने की मुहिम में सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर शहर की पीली टैक्सियों को सफेद और नीले रंग में बदलने का फरमान सुना दिया है।
यह हमारी पहचान को बदल देगा- यह कहना है टैक्सी चालक करतार सिंह का। उन्होंने कहा कि पीली टैक्सियां पिछले पांच दशकों से ज्यादा लंबे समय से शहर में दौड़ रही हैं। पेंट के लिए पैसा आवंटन करने की बजाय, सरकार राज्य परिवहन में पैसा खर्च कर सकती थी।
विपक्ष ने सरकार की इस सौंद्रीयकरण योजना की खंचाई करते हुए इसे धन की बर्बादी करार दिया है। राज्य के परिवहन मंत्री मदन मित्र की दलील है कि टैक्सियों और बसों को एक ही रंग में रंगने पर कलर थीम में समानता आएगी और महानगर का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाएगा. लेकिन बंगाल टैक्सी एसोसिएशन ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है. एसोसिएशन के सचिव विमल गुहा कहते हैं- टैक्सी का रंग बदलने में लगभग सात हजार रुपए खर्च होंगे. टैक्सी मालिक यह खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं।
जहां तक आम लोगों का सवाल है, उनकी प्रतिक्रिया मिलीजुली है. एक निजी दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी का कहना है कि नया रंग अच्छा ही लग रहा है. इससे शहर की सुंदरता निखर गई है। वहीं एक बुजुर्ग हैं कि सरकार यह रकम सड़कों और बसों की दशा सुधारने पर खर्च करती तो बेहतर होता। आम लोग या विरोधी चाहे कुछ भी कहें, सरकार महानगर को ब्लू सिटी में बदलने की अपनी योजना पर दिल खोल कर खर्च कर रही है।
दिलचस्प बात यह है कि कोलकाता नगर निगम ने ममता के इस पसंदीदा रंग यानी सफेद और नीले रंग से अपना मकान रंगवाने वाले तमाम मकान मालिकों को संपत्ति कर में भी छूट देने का फैसला किया है।

भ्रष्टाचार भगाएं

है निरुक्त में उक्त
जगत में चलने वाले जो हैं ;
धरा और सूरज भी समझो
एक रूप में गो हैं ।
इस गो का पयपान
सुधी सब कवि किया करते हैं ;
वे भी जो कर्तव्यनिष्ठ
धर्मार्थ जिया करते हैं ।
कपटी कोई किन्तु मनुज
बन जोंक जिया करता है
लोलुप वह वसुधा का
लोहू चूस लिया करता है ।
उसको क्या जो यह वसुंधरा जीवे
या मर जावे ;
आत्महीन वह दुष्ट किन्तु
बेशक दैहिक सुख पावे॥
दैहिक सुख के लिए दे रहा
इस गो को पीड़ा है;
भ्रष्टाचारी इसके व्रण का
एक गंदा कीड़ा है ।

रे कीड़े , कितने दिन तक
तू दैहिक सुख पायेगा ?
भू की गंदी धूल ,
धरा में मिट कर मिल जाएगा ।

किन्तु याद तेरी जब -जब
मानवता को आएगी ;
तू भी था एक मनुज
सोच यह कितना शरमायेगी !

संभल , वक्त अब भी है पापी ,
तू रोले , पछता ले ;
हरण किया जो स्वत्व उगल कर
कीड़ा जन्म छुडा ले ॥

रे कपटी , छल -छिद्र छोड़कर
भी कुछ दिन तो जीले ।
धर्म और ईमान भरा
जीवन का जल कुछ पीले ॥

स्वाद और इसकी सुगंध
जब एक बार पायेगा ;
फिर छल का गंदा नाला
शायद न तुम्हें भाएगा ॥

अगर सुधर तुम गए
भले मैंने लेखनी उठायी ;
कटुता जाओ भूल
सोच मानव हैं भाई -भाई ॥

भिंड रेत खदानों में करोड़ों का घपला !




भोपाल/ ग्वालियर (पोलखोल डॉट कॉम टीम ) : ग्वालियर-चम्बल संभाग कभी पीले सोने के लिए विख्यात हुआ करता था, किन्तु अब यह अवैध रेत के उत्खनन के लिए कुख्यात हो गया है. यहाँ प्रतिदिन लाखों घन मीटर रेत का अवैध उत्खनन कर उन्हें बगैर किसी रॉयल्टी के बेचा जा रहा है. यही नहीं भिंड जिले के भारोली गांव स्थित सिंध नदी पर रेत खदान माफियायों ने रॉयल्टी से तीन चार गुना अधिक पैसा वसूल कर रेत को सप्लाई किया जा रहा है. अगर सूत्रों पर भरोसा करें तो यहाँ प्रतिदिन करीब 24 लाख रूपए का घोटाला किया जा रहा है.

पोलखोल डॉट कॉम ने खदान पर कार्य कर रहें कर्मचारियों के माध्यम से भिंड जिले के भारोली गांव स्थित सिंध नदी रेत खदान पर चल रहें अवैध रेत उत्खनन की पड़ताल की तो पाया कि वहाँ पर प्रशासन की आँखों में धूल झोंक कर बहुत बड़े पैमाने पर अवैध रेत उत्खनन का कार्य किया जा रहा है. खदान पर काम कर रहें कर्मचारियों ने नाम का खुलासा न करने की शर्त पर बताया कि यहाँ प्रतिदिन करीब 200 ट्रक और 400 ट्रेक्टर-ट्रॉलियों से रेत को लोड कर मध्य प्रदेश, उत्तरप्रदेश सहित राजस्थान के कुछ इलाकों में सप्लाई किया जा रहा है. पोलखोल डॉटकॉम को उपलब्ध कराये सबूतों में खुलासा हुआ है कि एक ट्रक पर 2250 रूपए रॉयल्टी के साथ 1950 रूपए खदान ड्वलप्मेंट के नाम से राशि वसूली जा रही है. यानी एक ट्रक पर नियमानुसार 4200 रूपए चार्ज बनता है जबकि ट्रक मालिक और ठेकेदारों से 4200 रूपए की जगह 16000 हजार से 18000 रूपए तक वसूल किये जा रहें हैं. यानी एक ट्रक पर 11 हजार 800 रूपए और उससे भी अधिक की वसूली अवैध तरीके से की जा रही है. अगर खदान पर कार्य कर रहे कर्मचारियों और ट्रक ड्राइवरों की माने तो प्रतिदिन 200 ट्रक और 400 ट्रेक्टर-ट्रॉली इस खदान से लोड की जा रही हैं. इस हिसाब से प्रतिदिन 23 लाख 60 हजार (सिर्फ ट्रक से) अवैध तरीके से खदान माफिया राशि वसूल रहे हैं. अगर एक माह का आंकड़ा (संभावित) निकालें तो यह राशि 7 करोड़ से ऊपर जा पहुँचती है. और पिछले दो साल का आंकड़ा मापे तो यह राशि 169.92 करोड़ से ऊपर जा पहुंचेगी.इसी तरह ट्रेक्टर-ट्रॉली पर 750 रु रोयल्टी के नाम पर रशीद दी जा रही है, जबकि ट्रेक्टर-ट्रॉली मालिकों से 2000 रु अवैध तरीके से वसूले जा रहे हैं. और यहाँ से प्रतिदिन 400 ट्रॉली रेत लोड किया जा रहा है. यानि एक ट्रॉली से 1250 रु अधिक वसूले जा रहें हैं. इस तरह प्रतिदिन 5 लाख रु अवैध तरीके से वसूले जा रहे हैं और पिछले दो सालों में 36 करोड़ रु अवैध तरीके से वसूले गए हैं. यहाँ यह बताना जरूरी है कि जबरिया अधिक राशि वसूलने के नाम पर ट्रक व ट्रेक्टर ट्रॉली मालिकों व ठेकेदारों को कुछ घन मीटर रेत ज्यादा दे दिया जाता है. यह घोटाल भिंड जिले की एक रेत खदान का है. जबकि इस जिले में इस तरह की करीब 10 अन्य खदाने संचालित की जा रही हैं. कुल मिलकर भिंड में रेत खदान माफियाओं द्वारा पिछले दो वर्षों में 205 करोड़ रूपए का घोटाला किया गया है. अगर प्रदेश सरकार इस खदानों की गहराई से जांच पड़ताल करें तो कर्नाटक खदानों से बड़ा घोटाला म.प्र के भिंड रेत खदानों से उजागर हो सकता है. इस बारे में मध्यप्रदेश की विधानसभा के उपनेता प्रतिपक्ष व भिंड विधायक चौधरी राकेश सिंह ने कहा है कि यह पूरा कार्य प्रदेश सरकार के संरक्षण में किया जा रहा है. दूसरी तरफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डाक्टर गोविन्द सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा कि मुख्यमंती के नेतृत्व में पूरे प्रदेश में खदान माफिया पनप चुके हैं और इस अवैध उत्खनन को पूरी तरह शासकीय संरक्षण प्राप्त है यही वजह है कि कोई भी अधिकारी इस अवैध उत्खनन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है. दूसरी तरफ ग्वालियर से कांग्रेस विधायक प्रद्दुम्न सिंह तोमर भिंड की रेत खदानों से किये जा रहें अवैध वसूली और उत्खनन को कर्नाटक के बेल्लारी से बड़ा घोटाला मंत्रे हैं. उनका आरोप है कि भाजपा सरकार प्रदेश में खदान माफियाओं को खुला संरक्षण प्राप्त है. जब भारौली रेत खदान के पार्टनर के.पी सिंह से इस पूरे मामले से सम्बंधित बात की तो उन्होंने किसी भी प्रकार की अवैध वसूली नहीं की जाने की बात कही और आरोपों का खंडन किया.

पटरियां


हम पटरियां हैं शायद
दो अंजान मुसाफिरों की तरह
लाख कोशिशों के बाद भी नहीं मिलती
एक ही मंजिल है एक ही सपना
पर हैं अलग सूरज और चांद की तरह
क्योंकि हम पटरियां है शायद
हमारा पटरियां होना भी सही है
पटरियों का अलग-अलग होना भी सही है
क्योंकि पटरियों को डर है कहीं
एक होते ही उनका आस्तिव न समाप्त हो जाए
हम पटरियां न जानें कितनों का
सफर तैय करती हैं
न जाने कितनों को अपनों से मिलातीं हैं
पर खुद को हमेशा जुदा ही पातीं हैं
कभी भी नहीं मिल पातीं हैं पटरियां
क्योंकि हम पटरियां है शायद..........

2.3.12

चरवाहे !

चरवाहे!


जिन कुत्तों को पाले थे


करने भेड़ों की रखवाली ;


भक्षण करते भेड़ों का


चल रहे चाल वे मतवाली ।


जन-गन-मन अधिनायक हे ,


चरवाहे!


जहाँ कहीं भी हो


अब आगे आओ ;


उजड़ रहा यह चारागाह


बचाओ


आज बचाने


अगर नहीं आओगे ,


कहीं जंग होगी


मुंह की खाओगे ।


इसी लिए कहता हूँ


हे ! हा ! हा! हे! आ हे!


चरवाहे !


आकर अपना चारागाह बचा हे !


भ्रष्टाचार भगा हे ,


बूढ़े चरवाहे !

गहलोत समझें तो यह तमाचे से कम नहीं है


राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व राज्य सरकार के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जो कि अगर गहलोत समझें तो किसी तमाचे से कम नहीं है।
उल्लेखनीय है कि विधानसभा में नरेगा में भ्रष्टाचार को लेकर हो रही बहस के दौरान जब मुख्यमंत्री गहलोत ने वसुंधरा पर भी भ्रष्टाचार के आरोप होने की बात कह कर मामले को दबाना चाहा तो वसुंधरा ने बाहर आ कर एक संवाददाता सम्मेलन बुलाया और लिखित बयान बांट कर उसमें ठोक कर कहा कि गहलोत पिछले तीन साल में उन पर एक भी आरोप साबित नहीं पाए हैं, फिर भी एक ही रट लगाए हुए हैं। वसुंधरा ने चुनौती दी कि या तो आरोप साबित करो और जो जी में आए सजा दो, वरना जनता से माफी मांगो। उन्होंने चाहे जितने आयोग बनाने तक की चुनौती भी दे दी।
सरकार ने भले ही उनकी बात को एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दिया हो, मगर आरोप-प्रत्यारोप जब मुख्यमंत्री स्तर के दो दिग्गजों पर हो, तो यह एक गंभीर प्रश्न है। इसका सीधा सीधा संबंध भाजपा के सत्ता च्युत होने से है। कांग्रेस ने ऐसे ही आरोपों की दुहाई दे कर पिछला चुनाव जीता था। हालांकि ऐसा कहना ठीक नहीं होगा कि इन्हीं आरोपों के चलते ही वसुंधरा सत्ता से बाहर हुईं, क्योंकि सच्चाई ये है कि वे तो कुछ राजनीतिक समीकरणों के बिगडऩे की वजह से हाशिये पर आई थीं, वरना कांग्रेस सत्ता में आने का सपना ही देखती रहती।
खैर, कांग्रेस ने जब वसुंधरा पर आरोप लगाने के बाद सत्ता हासिल की तो यह उसकी जिम्मेदारी थी कि वह आरोपों को साबित करती। ऐसा करने के लिए उसने जो माथुर आयोग गठित किया, वह कानूनी पेचीदगियों के कारण हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट की ओर से नकार दिया गया। उसके बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हाथ पर हाथ रख कर बैठ गए। इस पर वसुंधरा ने कई बार उन्हें चुनौती दी कि आरोप साबित करके दिखाओ। यहां तक कि कांग्रेसियों ने भी गहलोत से अपेक्षा की कि वे कुछ करें, वसुंधरा की बोलती बंद करें, वरना वे दुबारा सत्ता में आने की स्थिति में आ जाएंगी, मगर गहलोत कुछ भी नहीं कर पाए।
अब जब कि भाजपा सत्ता में लौटने को आतुर है, वसुंधरा का यह वार बहुत भारी है। असल में यह तमाचा ही है, अगर गहलोत इसे समझें तो, क्योंकि वसुंधरा न केवल आरोप साबित करने की चुनौती दे रही हैं, अपितु गहलोत पर जल महल प्रकरण, कल्पतरू कंपनी को फायदा देना, वेयर हाउस कॉर्पोरेशन को शुभम कंपनी को सौंपने और होटल मेरेडीयन को फायदा पहुंचाने संबंधी कई आरोप भी दोहरा रही हैं। यानि कि एक ओर तो गहलोत पर आरोप साबित करने की चुनौती है तो दूसरी ओर खुद को पाक साफ साबित करने की।
वसुंधरा के तेवरों से तो यही लगता है कि उनके हाथ गहलोत की कोई कमजोर नस लग गई है, इसी कारण इस प्रकार दहाड़ रही हैं। आम जनता में भी यही संदेश जा रहा है कि दाल में जरूर काला है, वरना वसुंधरा से कहीं अधिक साफ-सुथरी छवि के गहलोत चुप क्यों हैं? गहलोत को यह ख्याल में होगा कि केन्द्र में कांग्रेस के वापस सत्ता में आने की एक बड़ी वजह ये रही है कि जिस बोफोर्स सौदे में दलाली के आरोप लगने की वजह से कांग्रेस सत्ता च्युत हुई, उसकी प्याज के छिलकों की तरह जांच करने के बाद भी उसे साबित नहीं किया जा सका था। कहीं ऐसा न हो कि वसुंधरा केवल इसी कारण सत्ता के करीब न पहुंच जाएं, क्योंकि उन पर लगाए गए आरोप कांग्रेस सरकार साबित नहीं कर पाई।

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...यानि अब ट्रेफिक पुलिस की जेब ज्यादा गरम होगी


तकरीबन बाईस पुराने सेंट्रल मोटर वीइकल एक्ट में संशोधन के प्रस्तावित बिल को केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद एक ओर जहां यह उम्मीद की जा रही है कि इससे भारी अर्थ दंड से डर कर चालक ट्रेफिक नियमों की पालना के प्रति सजग होंगे, वहीं इस बात की भी आशंका है कि इससे ट्रेफिक पुलिस में पहले से व्याप्त भ्रष्टाचार और बढ़ जाएगा। दरअसल सरकार का सोच यह है कि जुर्माना कम होने के कारण चालक सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे। वे ले दे कर छूटने कोशिश में रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब दो करोड़ लोगों ने पिछले साल ट्रैफिक नियमों को तोड़ा और जुर्माना भी चुकाया। अफसरों का कहना है कि जुर्माना राशि कम है। लोग नियम तोडऩे से नहीं डरते। ऐसे में सवाल यह है कि क्या वाकई में जुर्माना बढऩे के बाद लोग सुधर जाएंगे या हालात जस के तस बने रहेंगे। अक्सर यह देखने में आता है कि जिन नियमों के उल्लंघन में जुर्माने की राशि 100, 200 या 500 रुपये से ज्यादा है, उनमें जुर्माना भरने के बजाय मामला मौके पर ही निपटा लेने की कोशिशें की जाती हैं। यद्यपि आमतौर पर ये कोशिशें उल्लंघन करने वालों की तरफ से ही ज्यादा होती हैं, लेकिन कई ट्रैफिक पुलिसकर्मी भी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकते। ऐसे में जब जुर्माना बढ़ जाएगा, तो मामला मौके पर ही निपटा लेने की कोशिशें भी बढ़ जाएंगी। यह सही है कि ट्रेफिक पुलिस को यातायात सप्ताह के दौरान अपेक्षित लक्ष्य हासिल करने होते हैं, मगर लक्ष्य की पूर्ति के अतिरिक्त आम तौर पर घूसखोरी ही चलन में है। इसकी वजह ये है कि जहां नियम का उल्लंघन करने वाला नियमानुसार चुकाए जाने वाली राशि से कम दे कर छूट जाता है, इस कारण वह संतुष्ट रहता है, वहीं ट्रेफिक कर्मचारी को जेब गरम होने के कारण संतुष्ट होना ही है। यानि मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी? चूना तो सरकार को ही लगता है। जब जुर्माना राशि बढ़ जाएगी तो स्वाभाविक रूप से घूसखोरी बढ़ जाएगी। यद्यपि इस आशंका भरी सोच को नकारात्मक माना जा सकता है, मगर जब तक घूसखोरी पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया जाएगा, जुर्माना बढ़ाए जाने मात्र से हालत सुधरने वाले नहीं हैं। सौ बात की एक बात। जुर्माना बढ़ाने का सीधा सा मतलब है कि चालक सुधर नहीं रहा है। सुधर नहीं रहा है, इसका मतलब ये नहीं कि वह गंवार है, अपितु वह अधिक चतुर है। चालक इसके प्रति इतने जागरूक नहीं है कि सारे नियम उनके हित की खातिर ही बने हैं, बल्कि वह इसके प्रति अधिक जागरूक है कि ट्रेफिक पुलिस से कैसे बचा जाए। चालक जानता है कि अमुक-अमुक जगह पर ट्रेफिक पुलिस वाला नहीं होगा, उन-उन जगहों पर वह हेलमेट उतार देता है, सीट बैल्ट खोल देता है। एक महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि केवल नियम कड़े करने और दंड बढ़ाने से तब तक सकारत्मक परिणाम नहीं आएंगे, जब तक कि ट्रेफिक पुलिस के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे। हकीकत यही है कि संसाधनों की कमी के कारण ही नियमों का उल्लंघन होता है और दुर्घटनाएं होती हैं। रहा सवाल दुर्घटना में किसी की मृत्यु होने पर मुआवजा राशि चार गुना बढ़ाकर एक लाख रुपए करने की तो इसकी वजह से चालक दुर्घटना कारित कर किसी को मारेगा नहीं, ऐसा नहीं है, बल्कि महंगाई बढ़ जाने के कारण मौजूदा मुआवजा राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, इस कारण उसमें वृद्धि की गई है। लब्बोलुआब, दंड बढ़ाए जाने से कुछ तो फर्क की उम्मीद की जा सकती है, मगर इससे चालक जागरूक हो जाएगा, इसकी संभावना कुछ कम ही है। उलटे भ्रष्टाचार बढ़ जाएगा। इस सिलसिले में ओशो रजनीश की ओर से दिए गए उदाहरण को लीजिए- हमारे देश के एक मंत्री इंग्लैंड के दौरे पर गए। कड़ाके की ठंड थी। वे रात को करीब एक बजे किसी कार्यक्रम से होटल को लौट रहे थे। अचानक ड्राइवर ने कार रोक दी। मंत्री जी ने देखा कि चौराहे पर लाल बत्ती हो जाने के कारण कार रुकी है। उन्होंने जब यह देखा कि चौराहा पूरी तरह से सुनसान है तो ड्राइवर से बोले कि जब कोई वाहन व राहगीर नहीं है और उससे भी बढ़ कर ट्रेफिक पुलिस भी नहीं है तो कार रोकने का क्या मतलब है? इस पर ड्राइवर ने चौराहे पर एक ओर खड़ी ठंड में ठिठुर रही एक बुढिय़ा की ओर इशारा किया कि जो हरी लाइट होने का इंतजार कर रही थी तो मंत्री जी को समझ में आ गया कि हम भारतीय भले ही देशभक्ति की ऊंची ऊंची ढीगें हाकें, मगर राष्ट्रीयता और नियमों का पालन करने के मामले में अंग्रेज हमसे कई गुना बेहतर हैं। अफसोस कि अंग्रेज हमें अंग्रेजी तो सिखा गए, मगर एटीकेट्स और मैनर्स अपने साथ ले गए।
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क्या सुन्दरता का अर्थ सेक्सी है?

स्त्री सृष्टि की अद्वितीय कृति है। वह सौंदर्य का पर्याय है। मेरा सदैव मत रहता है- दुनिया में कोई भी स्त्री असुंदर नहीं। अंतर मात्र इतना है कि कोई कम सुंदर है और कोई अधिक सुंदर। भारतीय संस्कृति में स्त्री के चित्र सदैव सुरूप दिखाए गए। उसे नग्न करने की जब-जब कोशिश हुई, समाज ने तीव्र विरोध जताया। तथाकथित महान चित्रकार एमएफ हुसैन 'स्त्री को नग्न' दिखाने की विकृत मानसिकता के चलते ही देश छोडऩे पर मजबूर हुए। वे अपनी गलती स्वीकार कर बदलने को तैयार नहीं थे और देश उन्हें झेलने को तैयार नहीं था। भारत में स्त्री को सौंदर्य की प्रतिमा माना गया। उसे 'देवी'  कहकर संबोधित किया गया। सुंदरी पुकारा गया। रूपमति कहा गया। हिरण जैसी खूबसूरत आंखों वाली स्त्री को कवि ने मृगनयनी कहा। उसकी दैहिक नाजुकता और कोमलता का निरुपण फूलों से तुलना कर किया गया। पद्मिनी कहा गया। मनीषियों ने उसे दिव्य प्रकाश के समकक्ष रखकर उज्ज्वला कहा। अच्छी देह की स्वामिनी स्त्री का सुघड़ा कहा। सब उत्तम कोटि के शब्द हैं। कोई शब्द ओछा नहीं, जो स्त्री के सम्मान में गुस्ताखी की जुर्रत कर सके। कोई भी शब्द उसके शरीर को नहीं उघाड़ता। एक भी शब्द स्त्री को यौन प्रतीक नहीं बनाता। भारत में सुन्दरता के संदर्भ में कभी भी स्त्री को 'सेक्सी' कहकर संबोधित नहीं किया गया। 'सेक्सी' शब्द का यौनिक अभिव्यक्ति के लिए जरूर उपयोग किया जाता रहा है। अंग्रेजी शब्दकोश में भी 'सेक्सी' का अर्थ काम भावना से संबंधित लिखा है। वहीं सुन्दरता के लिए तमाम शब्द है- लवली, ब्यूटीफुल, प्रिटी, स्वीट, डिवाइन, फेयरी, ग्रेसफुल, फाइन इत्यादि। सुन्दर का पर्याय सेक्सी नहीं है। वहीं हिन्दी के शब्दकोश में भी सुन्दर के लिए कई मनोहारी शब्द हैं - शोभन, अच्छा, भला, खूबसूरत, प्यारा, दिव्य, उत्कृष्ट, मधुर इत्यादि। सुन्दर का मतलब सेक्सी कहीं नहीं मिला।
        स्त्री को भोग वस्तु मानने वालों को, स्त्री को वासना की दृष्टि से देखने वालों को और उससे अशोभनीय भाषा में बात करने वालों को भारतीय समाज लंपट कहता है। भारत में स्त्री के लिए सेक्सी शब्द सुन्दरता का पर्याय नहीं। लेकिन, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने लड़कियों को सलाह दी है कि वे लड़कों के द्वारा बोले जाने वाले सेक्सी शब्द को नकारात्मक ढंग से न लें और बुरा न मानें। इतका मतलब सुन्दरता होता है। मोहतरमा ने यह बात महिला सशक्तिकरण और महिलाओं के सुनहरे भविष्य को लेकर आयोजित सेमिनार में कही। सुन्दरता की इस परिभाषा पर बिना देर किए हंगामा बरपा। पुरुषवादी और महिलावादी संगठनों ने महिला आयोग की अध्यक्ष के बयान का तीव्र विरोध जताया। बौंहे तानी। तमाम स्वतंत्र विचारकों, समाजसेवियों और संगठनों ने महिला आयोग की अध्यक्ष के इस बयान को 'स्त्रियों से छेड़छाड़'  को बढ़ावा देने वाला माना। आंशिकतौर पर यह सच भी है। मनचले, सड़कछाप मजनू और आवारगी करते लड़के 'हे, सेक्सी' कहकर लड़कियों को सरेराह छेड़ेंगे। लड़की आंख तरेरेगी तो कह भी सकेंगे- तुम्हारे अधिकारों के संरक्षण के लिए बैठी महिला ने कहा है कि सेक्सी का मतलब सुन्दरता है। तुम कोई और अर्थ न लगाओ।
और अधिक पढने के लिए अपनापंचू पर आपका स्वागत है... अपनापंचू पर आप एक सार्थक बहस में भी शामिल हो सकते हैं.... 


                  
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1.3.12

राहुल ने वरुण को शालीनता के साथ दिया जवाब



''राष्ट्रीय सहारा''के पेज-३ पर आज १-३-२०१२ पर  छपे  इस फोटो को जरा ध्यान से देखिये .

क्या आपको कोई खास बात नज़र आई .नहीं ?....अरे ऐसे कैसे .चलिए मैं ही बता देती हूँ .आज कांग्रेस के इस विज्ञापन को देखकर मुझे तो कम से कम ऐसा ही लगा जैसे राहुल गाँधी जी ने अपने चचेरे भाई वरुण गाँधी को ईट का जवाब पत्थर से दिया हो .कल  ''अमर उजाला ''दैनिक के मेरठ  संस्करण [पेज-१५] में एक खबर छपी थी जिसमे वरुण गाँधी जी का यह बयान था कि-''कांग्रेस में एक भी ऐसा चेहरा नहीं है जिसे पूरे प्रदेश में पहचाना जाता हो ,जबकि भाजपा में ऐसे ५५ चेहरे हैं जो पूरे प्रदेश में पहचाने जाते हैं और वे मुख्यमंत्री बन सकते हैं ''.ये पढ़कर मुझे वरुण गाँधी की बुद्धि पर बहुत तरस आया था  .सहानूभूति तो उनसे बहुत रही है पर उनके बयानों पर गुस्सा ही आता है .आज भी कांग्रेस में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जिन्हें पूरा देश पहचानता है .उत्तर प्रदेश ने ही ऐसे योग्य नेता देश को दिए हैं फिर वरुण गाँधी जी ऐसा बयां किस आधार पर देते हैं यह तो वे ही बता सकते हैं पर आज ऊपर दिए विज्ञापन में कांग्रेस ने देश व् प्रदेश में पहचाने जाने वाले नेताओं का सामूहिक  चित्र  देकर वरुण गाँधी जी को बहुत शालीनता के साथ जवाब दिया है .वरुण गाँधी जी कांग्रेस के इस मन्त्र को ही अपना लीजिये-उठो....जागो....बदलो .....!
शिखा  कौशिक 

एक बार फिर दहाड़ीं वसुंधरा, किरण ने भी मिलाया सुर


राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे ने एक बार फिर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को ललकारते हुए दहाड़ लगाई। इस बार तो राजसमंद विधायक व भाजपा राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमती किरण माहेश्वरी ने भी उनके सुर में सुर मिलाया। विधानसभा की कार्यवाही को बाधित करने में मुद्दे पर दोनों ने आरोप लगाया है कि जब भी मौजूदा सरकार में हो रहे भ्रष्टाचार की बात उठाई जाती है तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उसका कोई जवाब देने की बजाय उलटे पलट कर पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप का रिकार्डर चला देते हैं। उन्होंने इसके साथ यह भी जोड़ा कि वे दरअसल ऐसा इस कारण करते हैं ताकि उनके भ्रष्टाचार पर पर्दा पड़ जाए और जनता का ध्यान हट जाए। विधानसभा सत्र के पिछले कड़वे अनुभव को ख्याल में रखते हुए अपनी सदाशयता का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा सदन को ठीक से चलने देने की इच्छुक है। यदि ऐसा मानस न होता काहे को विधायक भवानी सिंह राजावत के निलंबन को समाप्त करने का आग्रह करने स्वयं मुख्यमंत्री गहलोत के घर जाती। मगर ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार सदाशयता चाहती ही नहीं। वसुंधरा का तर्क है कि नरेगा में हो रहे भ्रष्टाचार की जानकारी सरकार को भी है, कार्यवाही भी चल रही है, ऐसे में मुख्यमंत्री को भाजपा के वरिष्ठ नेता गुलाब चंद कटारिया के उन सच्चे आरोपों पर उबलने की जरूरत क्या थी? वसुंधरा ने ठोक कर कहा कि गहलोत पिछले तीन साल में उन पर एक भी आरोप साबित नहीं पाए हैं, फिर भी एक ही रट लगाए हुए हैं। एक ही तरह के आरोप सुन कर लगभग उकता चुकीं वसुंधरा ने चिढ़ते हुए तल्ख स्वर में चेताया कि या तो आरोप साबित करो और जो जी में आए सजा दो, वरना जनता से माफी मांगो। इस सिलसिले में उन्होंने माथुर आयोग का भी जिक्र किया, जिसे हाईकोर्ट व फिर सुप्रीम कोर्ट ने नकार दिया। इतना ही नहीं उन्होंने चाहे जितने आयोग बनाने तक की चुनौती भी दे दी।
वसुंधरा ने एक बार फिर गहलोत को घेरते हुए कहा कि खुद उन पर ही जल महल प्रकरण, कल्पतरू कंपनी को फायदा देना, वेयर हाउस कॉर्पोरेशन को शुभम कंपनी को सौंपने और होटल मेरेडीयन को फायदा पहुंचाने संबंधी कई आरोप लगे हुए हैं, जो कि खुद उनकी ही पार्टी के नेताओं ने लगाए हैं और मीडिया ने भी उजागर किए हैं। वसुंधरा के इन तीखे तेवरों से उत्तेजित हुईं किरण माहेश्वरी ने भी मुख्यमंत्री गहलोत की हरकत पर ऐतराज किया। वसुंधरा की पैरवी करते हुए उन्होंने कहा कि गहलोत एक भी आरोप साबित नहीं कर पाए हैं, बावजूद इसके उन्हीं आरोपों को लगा कर जानबूझ कर सदन से पलायन करने की नीति पर चल रहे हैं।
बहरहाल, भाजपा की इन दो नेत्रियों के तेवरों से साफ है कि भाजपा इस बार पूरे फॉर्म में है। उनके साफ-साफ आरोप सौ टंच सही प्रतीत होते हैं, ऐसे में जनता में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसी क्या वजह है कि गांधीवादी गहलोत आखिर किन मजबूरियों के चलते वसुंधरा की थप्पड़ के बाद फिर दूसरा थप्पड़ खाने को गाल आगे कर देते हैं। सीधी सीधी बात है वे किन कारणों से वसुंधरा पर लगाए गए आरोपों को साबित नहीं कर पा रहे हैं। चलो माथुर आयोग तो कानूनी पेचों में उलझ गया, मगर यदि भाजपा के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को साबित करने के और रास्ते भी निकाले जा सकते थे। यहां उल्लेखनीय है कि वसुंधरा के तेवरों के आगे गहलोत की ढ़ीले-ढ़ाले व्यक्तित्व को लेकर कांग्रेसियों को भी बड़ी भारी तकलीफ है। पिछले दिनों पूर्व उप प्रधानमंत्री व वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा के राजस्थान दौरे के दौरान वसुंधरा को घेरने के लिए गहलोत के इशारे पर कांग्रेस ने भ्रष्टाचार से जुड़े दस सवाल दागे थे, जो पूर्व में भी कई बार दागे जा चुके हैं। अर्थात कांग्रेस ने वे ही बम फिर छोडऩे की कोशिश की, जो कि पहले ही फुस्स साबित हो चुके हैं। वे सवाल खुद ही ये सवाल पैदा कर रहे थे कि उनमें से एक में भी कार्यवाही क्यों नहीं हो पाई है, जबकि अब तो सरकार कांग्रेस की है। प्रतिक्रिया में न केवल भाजपा ने पलटवार किया और मौजूदा कांग्रेस सरकार के तीन साल के कामकाज पर सवाल उठा दिए, अपितु पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी दहाड़ीं थीं।
सरकार की यह हालत देख कर खुद कांग्रेसी नेताओं को बड़ा अफसोस है कि गहलोत इस मोर्चे पर पूरी तरह से नकारा साबित हो गए हैं। उन्हें बड़ी पीड़ा है कि वे वसुंधरा को घेरने की बजाय खुद ही घिरते जा रहे हैं। हालांकि यह भी सही है कि वसुंधरा जिस तरह से अपने आप को निर्दोष बताते हुए दहाड़ रही हैं, जनता उन्हें उतना पाक साफ नहीं मानती। भाजपा राज में हुए भ्रष्टाचार को लेकर आम जनता में चर्चा तो खूब है, भले ही गहलोत उसे साबित करने में असफल रहे हों। साथ ही यह भर कड़वा सच है कि जनता की नजर में भले ही वसुंधरा की छवि बहुत साफ-सुथरी नहीं हो, मगर कम से कम गहलोत तो उनके दामन पर दाग नहीं लगा पाए हैं। देखते हैं इस बार वसुंधरा की थप्पड़ खा कर गहलोत का खून खौलता है या नहीं। या फिर नींद में से उठ कर पानी पी के सो जाएंगे।
-tejwanig@gmail.com

जिसके सर पर ब्रम्ह हत्या,गौ हत्या का दोष...!


सच है आदमी मुसाफिर ही तो है....,सैकड़ो साल पहले जिन मुसाफिरों ने अपनी यादों को हमारे लिए छोड़ दिया वो अब इतिहास बन चूका है ! कहते है ये दुनिया एक मेला है,इस मेले में जो बिछड़ गया वो एकदम अकेला है !.......एक पुरानी फिल्म के इसी गाने पर गुनगुनाते मै अपनी टीम के साथ यात्रा की नई मंजिल की ओर निकल पड़ा हूँ...! दुर्गम रास्ते पर छोटी  सी कार,तकलीफ तो दे रही थी मगर प्रकृति की खूबसूरती के आगे रफ़्तार और वक्त दोनों का पता नही चला ! आज हम यात्रा पर देवपहरी के लिए निकले है ! कोरबा से बालको होते हुए चुइया,गढ़ उपरोड़ा,देव कटरा,अजगरबहार, होते हुए हम ५२ किलोमीटर दूर देवपहरी करीब ढाई घंटे में पहुंचे ! रास्ते में ना ख़त्म होने वाली पहाड़ियों की ऊंचाई आकाश से आलिंगन करती नजर आती है,हर थोड़ी दूर पर धरती आकाश के मिलन में सेतु बने ये परबत आज खामोश है....! इनकी ख़ामोशी की वजह भी हम इंसान ही तो है,कभी इन पहाड़ियों का दायरा मिलो दूर तक ना ख़तम होने वाला था मगर आज इनके दायरे हम इंसानों ने महज कुछ जगहों के बीच समेट कर रख दिए है ! ये जंगल कई साल पहले तक इतने घने थे की एक पेड़ की आड़ में खड़े पेड़ को बिना करीब गए देखा पाना असंभव था...! आज जंगल के सिमटे दायरे को इस पार से उस पार तक देखने में दिक्कत नही होती ! ये सब सोचते हम देवपहरी के करीब पहुंचते जा रहे थे,जहां मुझे उस धाम के दर्शन होने थे जो देश में केवल तीन ही जगह है ! मेरी सहयोगी राजश्री ने मुझे बताया इन पांच पहाड़ो को पार करने के बाद ही यात्रा की मंजिल मिलेगी....!
                       वक्त अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रहा था और हम मशीनी युग की उस बोट में सवार थे जिसे कार कहते है....! रास्ते में कई बाते,कई नजारे हमेशा के लिए ना भूल पाने वाला पल बनकर रह गए...! पूरा एक पहर ख़तम होने के बाद हम देव पहरी पहुँचने ही वाले थे की जंगल के बीच से निकलती इन मासूमो पर नजरे जाकर ठहर सी गई ! बदन पर सरकारी स्कूल का यूनिफार्म और सर पर जरुरत का सामान...! नगे पाँव जरुरत के बोझ को लिए आगे बढती बच्चियों ने जैसे ही हमें सड़क के किनारे खड़े देखा सर का बोझ फेंककर आगे बढ़ गई...! उम्र कम है मगर समझ के आगे मै उन समझदारो की समझ पर शक करने को मजबूर हो गया जो खुद को काबिल होने का जगह जगह सबूत देते है...! मेरे सहयोगियों ने बताया पास के स्कूल में पढने वाली ये बच्चियां पंडो जाति की है जिनके विकास पर देश की सरकारे हर साल करोडो रूपये फुक देती है...! मैंने तत्काल सोच लिया उस पवित्र जगह को देखकर,माता का आशीर्वाद लेकर मै पंडो की बस्ती में जरुर जाऊँगा.....
                          पवित्र गौ मुख धाम से करीब आधा किलोमीटर पहले ही हमको अपनी गाड़ी छोड़कर पैदल आगे बढ़ना पड़ा,पथरीले रास्ते पर किनारे से बहती जल की धार शांति का एहसास करा रही थी ! कुछ दूर पहले से ही ऊंचाई से गिरते झरने का शोर कानो में मिठास घोल रहा था ! माँ दुर्गा से शक्ति का वरदान मांगने वाली पंडो जाति को यक़ीनन उसी माँ का सहारा है,क्यूंकि इस धाम को कुछ लोगो ने कब्जा करने की कई बार कोशिशे की,मगर माता की शक्ति और इस सिद्ध जगह पर पापियों के मनसूबे टूटकर चकना-चूर हो गए ! इस जगह की अपनी मान्यताये है,कई ऍसी बाते है जिनकी सचाई का सबूत पंडो आदिवासियों के पास है ! हमने यहीं पर नजर आई एक महिला से बात की,इसने बताया वो पुजारी की पत्नी है ! हमने पूछा आखिर क्या मान्यता है इस गौ धाम की.....? इसने कहा ये वो शक्ति स्थल है जहां  इंसान की मनोकामनाए तो पुरी होती ही है साथ ही ब्रम्ह हत्या का पाप धुल जाता है... जी हाँ ....यहाँ गौ हत्या करके पहुँचने  वाले इंसान के कपडे,गहने सब कुछ उतर जाते है ! इस पानी का रंग लाल हो जाता है,झरने का शोर उस उफान पर पहुँच जाता है जिससे इलाके में रहने वालो को इस बात का पता चल जाता है की कोई है ....!! कोई एसा इंसान गौ धाम की ओर बढ़ रहा है जिसके सर पर ब्रम्ह हत्या,गौ हत्या का दोष है ! तेज हवाए,झरने की बढ़ी आवाज पुजारी को आगाह कर देती है.....
कहते है पुजारी गौ हत्या के दोषी को पहले पांच लोटा पानी से स्नान करवाता है फिर नए वस्त्र पह्नावाकर इस पवित्र पानी में स्नान करवाता है.....इस झरने का पानी एक दम सफ़ेद और झाग की शक्ल ले लिया तो समझिये दोषी इंसान का पाप धुल गया,माता ने उसके सारे पापो पर रहम की नजर कर दी....! हमने भी इस पवित्र पानी को अपने माथे और ललाट पर लगाने के बाद उस शक्ति के दरबार में माथा टेका जहां हर गुनहगार को रहम की भीख मिलती है....पंडो आदिवासियों के इस शक्ति स्थल पर आकर लगा जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया हो...! पहाड़ पर देवी का मन्दिर,और उन जनजातियो का पीढ़ियों से बसेरा असल हिन्दुस्तान की कहानी दोहराता है ! शाम होने को है,पुजारी की पत्नी भी पहाड़ पर खो जाने के लिए चटानो के बीच से निकल पड़ी है...हमने सोचा यहाँ से निकलना ही बेहतर होगा क्यूंकि पन्डो की बस्ती इस शक्ति स्थल से काफी दूर ऊंचाई पर है.....मैंने  इस पवित्र पानी को एक बार फिर अपनी पेशानी से लगाया और उस बेर को खाने लगा जो पंडो आदिवासी महिला ने बड़े ही आदर से हमको दिये थे...! याद आ गई उस रामायण की जिसमे वनवास पर गए भगवान् राम को माता सबुरी ने जूठे बेर खिलाये थे....इस युग में मुझ जैसे मामूली इंसान के लिए वो पंडो जाति की महिला सबुरी माता से कम नही थी....!
                     वक्त की कमी और ज्यादा से ज्यादा जानने की ख्वाहिश मुझे उन पहाड़ी कोरवा,पंडो की बस्ती तक ले गई जहां की तस्वीर विकास पुरुषो के दोहरे चेहरे दिखा रही थी...! पहाड़ पर कार से पहुंचना हमारे लिए जितना रोमांचकारी था उससे कहीं ज्यादा आश्चर्य उन आदिवासियों के लिए जिन्होंने आज भी जंगल के अलावा कुछ नही देखा ! हम पहुंचे तो पहले बच्चे,बूढ़े झोपड़ियों की ओर भागे लेकिन कुछ देर उनको समझ आया हम उन इंसानों से अलग है ! फिर तो दर्द,जरुरत,एहसास सब कुछ मेरे करीब था ! इनकी सहमी नजरो और निश्छल चेहरों को देखकर लगा इनके हक़ और जरुरतो को वो लोग बिना डकार लिए पचा गए जिन्हें इन आदिवासियों ने अपना रहबर माना,रहनुमा समझा ! हमने इन आदिवासियों से भी उस गौ धाम की महत्ता को जाना,इन्होने कहा बेला गैया मारने वाले का पाप यहाँ धुल जाता है !
                                  दूर-दूर से आने वालों के पाप यहाँ कट रहे है,मगर उनका दुःख कम नही होता जिनकी कईयों पीढ़ियों ने विकास की मुख्यधारा से जुड़ने के इन्तेजार में दम तोड़ दिया ! वैसे भी आदिवासियों की इस बस्ती में कुछ भी छिपा नही है,जो है वो जंगल के वीरानेपन में खोकर रह गया है ! देखकर लगा विकास इनके लिए नही है,वैसे कहा तो ये भी जा सकता है की इन नंगे पाँव में दिखाई पड़ता एक मोजा विकास की इबारत ही तो है ! जानना तो बहुत कुछ चाहता हूँ, मगर क्या करूँ ..डूबता सुरज लौट जाने को कह रहा है......!!!! 
                     
   
                                      
                                

सेक्सी,सेक्सी,सेक्सी तुझे लोग बोलें-ब्रज की दुनिया

मित्रों,कभी प्रसिद्ध अमेरिकी उपन्यासकार पर्ल एस. बक ने उन महिलाओं को जिनका निकट-भविष्य में बलात्कार हो सकता है,को अमूल्य सलाह देते हुए कहा था कि यदि यह निश्चित हो कि आपका बलात्कार होकर रहेगा और विरोध करने का कोई फायदा नहीं रह जाए तो बेहतर यही है कि उक्त महिला इसका आनंद उठाए.मैं नहीं जानता कि श्रीमती बक को कितनी बार इस तरह का परमानन्द प्राप्त करने का पुण्य अवसर मिला.यहाँ आलेख के आरम्भ में उन स्वर्गीया का उल्लेख मैंने यह बताने के लिए किया है कि कई बार बड़ी शक्सियतें भी किस तरह अपनी मर्यादाओं की सीमाओं को लाँघ जाया करते हैं और उन्हें इसके असर का पता तक नहीं होता.जिस तरह बक महोदय को बलात्कार का दर्द क्या होता है;कदाचित पता नहीं था;शायद ममता शर्मा जो दुर्भाग्यवश या सौभाग्यवश पता नहीं इसमें से क्या हम भारतीय के लिए सही है;इस समय राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष के पद पर हैं;को भी यह मालूम नहीं है कि जब किसी गरीब-लाचार महिला के साथ छेड़खानी की घटना होती है तब उसके मन-मस्तिष्क पर क्या गुजरती है और वो उस एक क्षण में कितनी बार कितनी मौतें मरती है.उनकी पीड़ा की अगर स्वानुभूति करनी है तो ममता जी को किसी लम्पट साईनी आहूजा के घर घरेलू नौकरानी के तौर पर कार्य करना चाहिए या फिर किसी बेहया सुपरवाईजर के मातहत किसी फैक्टरी में साधारण मजदूर की नौकरी करनी चाहिए और अगर ईट-भट्ठे पर काम मिल गया तो क्या कहना.तब उन्हें पता चलेगा कि सेक्सी शब्द का वास्तविक अर्थ क्या होता है अथवा क्या कभी-कभी शब्दों का वह मतलब होता भी है जिसका जिक्र शब्दकोशकार शब्दकोशों में करते हैं क्योंकि हमेशा छेडनेवाले की निगाहें कहीं और होती हैं और निशाना कहीं और.
                  मित्रों,किसी शब्द का अर्थ काल और देश के अनुसार कैसे एकदम-से बदल जाता है मैं इसे एक बेहद दिलचस्प उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना चाहूँगा.उस समय यानि वर्ष २००८ में दैनिक हिंदुस्तान,पटना में जेनरल डेस्क में कार्यरत था.एक दिन यूं ही उत्सुकतावश प्रिंट आउट वाली मशीन पर पड़ी सम्पादकीय पृष्ठ का प्रिंट आउट उठा लिया और पढ़ने लगा.मुख्य सम्पादकीय चन्द्रमा पर पानी के मिलने के सन्दर्भ में लिखा गया था जिसका समापन चंदामामा दूर के,पुए पके बूर के गीत से किया गया था.पंक्ति बिल्कुल सही थी और मुंगेर और खगड़िया के लिए अख़बार भेजा भी जा चुका था लेकिन बिहार में तो बूर का अर्थ योनि होता है भले ही गीतकार प्रेम धवन के पंजाब में इसका कोई और अर्थ होता हो.मैंने उस समय के समाचार संपादक कमल किशोर सक्सेना जी को इस तथ्य से अवगत कराया.फिर क्या था मशीन पर चल रही छपाई रोक दी गयी और आगे के संस्करणों में बूर को गुड़ कर दिया गया.ठीक इसी तरह हो सकता है कि सेक्सी शब्द का पश्चिमी देशों के सेक्स फ्री समाज में ज्यादा प्रयोग सुन्दर के अर्थ में होता हो लेकिन भारत में तो इसका सीधा मतलब होता है कामुक या सेक्स करने लायक.दोनों अर्थ सही हैं परन्तु जिस तरह बिहार में बूर शब्द का प्रयोग आपत्तिजनक की श्रेणी में आता है उसी तरह भारत में सेक्सी शब्द का प्रयोग मानसिक प्रताड़ना या छेड़खानी के लिए किया जाता है.ऐसे में ममता जी की सलाह को मानकर लड़कियां कैसे उस स्थिति में अपने को खुशनसीब मान सकती हैं जब कोई चौक-चौराहे पर खुलेआम उससे कहे कि तुम तो आज बड़ी सेक्सी लग रही हो?साथ ही छेड़खानी के वक़्त ऐसा करनेवाले के हाव-भाव पर गौर करना होता है और तब न तो शब्दों के अर्थ को लेकर ही कोई संशय शेष रह जाता है और न ही प्रयोगकर्ता के उद्देश्य को लेकर ही.
                     मित्रों,मुझे लगता है कि चूंकि ममता जी का लालन-पालन अंग्रेजी वातावरण में हुआ होगा इसलिए उन्हें शायद चौक-चौराहे पर रोजाना होनेवाली छेडखानियों से रूबरू होने का सुअवसर मिला ही नहीं है अन्यथा उन्हें पता होता कि जब कोई कामांध किसी अबला नारी के लिए सेक्सी शब्द का प्रयोग करता है तो उसका मतलब सिर्फ और सिर्फ कामुक होता है और उद्देश्य भी केवल और केवल एक होता है उस स्त्री का शीलहरण.उसका उद्देश्य अपने शिकार की सुन्दरता की प्रशंसा करना तो कदापि नहीं होता.इस तरह अगर ममता जी को प्रत्येक लम्पट में एक प्रशंसक भी नजर आने लगा तब तो हो चुका उनके सेक्सी हाथों से भारतीय महिलाओं का भला.हो सकता है कि वो कल किसी बलात्कार की दिल दहला देने वाली घटना के बाद यह भी कह डालें कि बलात्कारी निरपराध है क्योंकि वह तो पीडिता की सुन्दरता का अनन्य प्रशंसक है.
                    मित्रों,आपको भी आश्चर्य हो रहा होगा कि सुपर प्रधानमंत्री सोनिया गाँधी ने कैसे-कैसे लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठा रखा है.इटली से आयातित नेता से हम और उम्मीद भी क्या रख सकते हैं?एक बात तो निश्चित है कि सोनिया जी किसी भी तरह भारतीय संस्कृति का भला नहीं चाहती हैं तभी तो लगातार इसकी जड़ों पर केंद्र सरकार द्वारा सायास प्रहार किया जा रहा है.कभी राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा ममता शर्मा छेड़खानी और यौनापराध-उत्प्रेरक बयान दे डालती हैं तो कभी सरकार सुप्रीम कोर्ट में भारतीय संस्कृति में अतिवार्जित समलैंगिकता का समर्थन करने लगती है.जो कुछ भी इन दिनों देश में संस्कृति के मंच पर हो रहा है मुझे तो लगता है कि ऐसा सरकार द्वारा साजिशन किया या करवाया जा रहा है.चाहे वह सन्नी लियोन का भारत आगमन ही क्यों न हो.स्थिति बड़ी गंभीर है और निकट-भविष्य में और भी ज्यादा गंभीर हो जानेवाली है.अगर हम भारतीय अब भी नहीं संभले तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमारी लचीली संस्कृति में इतनी तब्दीली आ जाएगी कि सत्य सनातन भारतीय संस्कृति में कुछ भी भारतीय नहीं रह जाएगा.