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3.3.12

भ्रष्टाचार भगाएं

है निरुक्त में उक्त
जगत में चलने वाले जो हैं ;
धरा और सूरज भी समझो
एक रूप में गो हैं ।
इस गो का पयपान
सुधी सब कवि किया करते हैं ;
वे भी जो कर्तव्यनिष्ठ
धर्मार्थ जिया करते हैं ।
कपटी कोई किन्तु मनुज
बन जोंक जिया करता है
लोलुप वह वसुधा का
लोहू चूस लिया करता है ।
उसको क्या जो यह वसुंधरा जीवे
या मर जावे ;
आत्महीन वह दुष्ट किन्तु
बेशक दैहिक सुख पावे॥
दैहिक सुख के लिए दे रहा
इस गो को पीड़ा है;
भ्रष्टाचारी इसके व्रण का
एक गंदा कीड़ा है ।

रे कीड़े , कितने दिन तक
तू दैहिक सुख पायेगा ?
भू की गंदी धूल ,
धरा में मिट कर मिल जाएगा ।

किन्तु याद तेरी जब -जब
मानवता को आएगी ;
तू भी था एक मनुज
सोच यह कितना शरमायेगी !

संभल , वक्त अब भी है पापी ,
तू रोले , पछता ले ;
हरण किया जो स्वत्व उगल कर
कीड़ा जन्म छुडा ले ॥

रे कपटी , छल -छिद्र छोड़कर
भी कुछ दिन तो जीले ।
धर्म और ईमान भरा
जीवन का जल कुछ पीले ॥

स्वाद और इसकी सुगंध
जब एक बार पायेगा ;
फिर छल का गंदा नाला
शायद न तुम्हें भाएगा ॥

अगर सुधर तुम गए
भले मैंने लेखनी उठायी ;
कटुता जाओ भूल
सोच मानव हैं भाई -भाई ॥

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