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5.2.13


कांग्रेसियों द्वारा कांग्रेसियों को हरा कर कांग्रेस को ही निपटा देने संबंधी हरवंश सिंह के बयान की जिले के राजनैतिक हल्कों में चर्चा
साल का वह एक दिन 30 जनवरी का होता था जब समूचा शहर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपने श्रृद्धांजली अर्पित कर उन्हें नमन करता था। लेकिन अब 30 जनवरी को ना तो डिस्लरी का भैंपू सुनायी देता है और ना ही डालडा फेक्टरी का सायरन क्योंकि ये दोनों ही फेक्टरियां अब बंद हो चुकीं हैं। यह सच्चायी हमें यह सोचने को मजबूर कर देंती हैं कि हम अपने जिले के विकास के लिये कुछ नया लाना तो दूर पुराना भी सहेज कर नहीं रख पायें हैं। हम मतदाताओं का काम तो जनप्रतिनिधियों को चुनने का रहता हैं। हमारी समस्याओं को प्रदेश और केन्द्र सरकार तक पहुंचाना और उनका निराकरण कराना हमारे जनप्रतिनिधियों का काम होता हैं। जिले में कांग्रेस और भाजपा में कोई और समानता हो या ना हो लेकिन एक समानता जरूर दिखायी दे रही हैं कि दोनों ही पार्टियों में जब भी कोई समिति गठित होती है तो वह जम्बो जेट ही होती हैं। अब देखना यह है कि कांग्रेस और भाजपा में किसकी जम्बो जेट फौज चुनाव की जंग जीतती हैं। हरवंश सिंह ने कहा है कि कांग्रेसियों द्वारा कांग्रेसियों को निपटाने के कारण आज कांग्रेस ही निपट गयी है। कहा जा रहा है कि उनके इस बयान की पुष्टि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने भी यह कह कर दी हैं कि हरवंश सिंह ने क्या गलत कहा है। 
नया लाना तो दूर पुराना भी सहेजकर नहीं रख पाये हम-आज से कई बरस पहले साल में एक दिन सुबह 11 बजने के एक मिनिट पहले,11बजे और 11 बजकर दो मिनिट पर शहर की डिस्लरी का भौंपू सुनायी देता था। फिर इसमें डालडा फेक्टरी का सायरन भी शामिल हो गया था। साल का वह एक दिन 30 जनवरी का होता था जब समूचा शहर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपने श्रृद्धांजली अर्पित कर उन्हें नमन करता था। लेकिन अब 30 जनवरी को ना तो डिस्लरी का भौंपू सुनायी देता है और ना ही डालडा फेक्टरी का सायरन क्योंकि ये दोनों ही फेक्टरियां अब बंद हो चुकीं हैं। यह सच्चायी हमें यह सोचने को मजबूर कर देंती हैं कि हम अपने जिले के विकास के लिये कुछ नया लाना तो दूर पुराना भी सहेज कर नहीं रख पायें हैं। जिले के औद्योगिक विकास के इस पिछड़ेपन के लिये कौन दोषी है? इस पर जरूर विवाद हो सकता हैं। इसका दोष कांग्रेस भाजपा पर और भाजपा कांग्रेस पर मढ़ सकती हैं लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिये इसके ना सिर्फ कांग्रेस और भाजपा वरन हम सभी दोषी हैं। जिले के जनप्रतिनिधि यदि दोषी हैं तो हम सभी मतदाता भी इस बात के लिये बराबरी के दोषी हैं कि हम ऐसे नाकारा जनप्रतिनिधियों को बार बार चुनकर भेज देते हैं। जब बिना कुछ ही चुनाव जीते जा सकते हैं तो भला नेताओं को कुछ करने की जरूरत ही क्यों महसूस होगी? विकास के लिये आवश्यक बड़ी रेल लाइन आज भी विज्ञप्तियों और छोटे मोटे आंदोलनों तक ही सीमित रह गयी हैं तो उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत बन रही फोर लेन का विवाद भी अभी तक सुलझा नहीं हैं। मामले चाहे प्रदेश सरकार के कारण लंबित हों या केन्द्र सरकार के इसके लिये क्या जिले के हमारे जनप्रतिनिधि दोषी नहीं हैं? हम मतदाताओं का काम तो जनप्रतिनिधियों को चुनने का रहता हैं। हमारी समस्याओं को प्रदेश और केन्द्र सरकार तक पहुंचाना और उनका निराकरण कराना हमारे जनप्रतिनिधियों का काम होता हैं। जबकि आज हमारे जिले का प्रतिनिधित्व तीन सांसद और चार विधायक कर रहें हैं। सन 2013 और 14 चुनावी साल हैं इसमें हमें हमारे जनप्रतिनिधियों से हिसाब लेना चाहिये नहीं तो चुनाव के समय फिर से एक बार गल्ती दोहरा कर हमें आने वाले पांच सालों तक एक बार फिर पछताने के अलावा कुछ हाथ नहीं आने वाला हैं। 
इंका और भाजपा में से किसकी जम्बो जेट फौज जीतेगी चुनावी जंग?-जिले में कांग्रेस और भाजपा में कोई और समानता हो या ना हो लेकिन एक समानता जरूर दिखायी दे रही हैं कि दोनों ही पार्टियों में जब भी कोई समिति गठित होती है तो वह जम्बो जेट ही होती हैं। इन दिनों जिले में भाजपा की मंड़ल समितियों की घोषणायें हो रही हैं। सभी समितियों में भारी भरकम मात्रा में कार्यकर्त्ताओं को पद देकर संतुष्ट किया जा रहा हैं। इसी तरह कांग्रेस में भी संगठन की मोर्चा समितियों सहित सभी में ढ़ेरों पदाधिकारी बना दिये गये थे। दोनों ही पार्टियों की यह कार्यवाही आने वाले विस और लोस चुनावों को ध्यान में रख कर की जा रही हैं। भाजपा में मंड़ल समितियों में अध्यक्ष के अलावा 6 उपाध्यक्ष,2 महामंत्री,6 मंत्री,1 कोषाध्यक्ष सहित 60 सदस्यों की समिति बन रहीं तो वहीं जिले में अध्यक्ष सहित 91 सदस्यीय कार्यकारिणी समिति बनना है जिसमें 8 उपाध्यक्ष, 3 महामंत्री,8 मंत्री एवं 1 कोषाध्यक्ष की नियुक्ति होगी। जिले में भाजपा के 24 मंड़ल हैं। इनमें  1 हजार 4 सौ 40 कार्यकर्त्ताओं को पदों से नवाजा गया हैं। जिले में 91 इस तरह कुल 1 हजार 5 सौ 31 नेताओं को पदों पर बिठाया जा रहा हैं। इसी तरह कांग्रेस में भी जिले एवं ब्लाक की भारी भरकम समितियों के अलावा सेवादल,महिला कांग्रेस,युवक कांग्रेस एवं एन.एस.यू.आई में नेताओं को पदों पर बिठाया गया हैं। समितियों में संतुलन के नाम पर अभी भी नियुक्तियों का दौर चालू ही हैं। एक बात यह भी है कि इन दिनों कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही पार्टियों को प्रदेश और केन्द्र सरकार के खिलाफ जिले में आंदोलन करना पड़ता हैं। दोनों ही पार्टियों में आलम एक सा ही हैं। हजारों पदधिकारियों वाली भाजपा और कांग्रेस के आंदोलन के सैकड़ों लोग भी शिरकत नहीं करते हैं। और तो और अपनी अपनी पार्टी के महापुरुषों की जयंती और पुण्य तिथि के अवसर पर पार्टी कार्यालयों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में तो संख्या अगुलियों पर गिनने लायक ही रहती हैं। इस पर अंकुश ना तो जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर लगा पा रहें हैं और ना ही इंकाध्यक्ष हीरा आसवानी। इससे क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता हैं कि पदाधिकारियों की लंबी फौज को अपने महापुरुषों और नेताओं के प्रति कोई श्रृद्धा नहीं हैं क्योंकि पार्टियों में उन्हें पद उनके आकाओं के रहमोकरम पर मिले हैं और उनकी इस लापरवाही से उनके आका जब नाराज नहीं होते हैं तो भला उनकी राजनैतिक सेहत पर क्या असर पड़ेगा? अब देखना यह है कि कांग्रेस और भाजपा में किसकी जम्बो जेट फौज चुनाव की जंग जीतती हैं।
कांग्रेसी ही कांग्रेस की हार का कारण सबंधी हरवंश का बयान चर्चित-प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं विस उपाध्यक्ष ठा. हरवंश सिंह का पिपरिया में दिया गया एक बयान इन दिनों अखबारों की सुर्खियों में है। अपने बयान में हरवंश सिंह ने यह कहा था कि कांग्रेसियों द्वारा कांग्रेसियों को निपटाने के कारण आज कांग्रेस ही निपट गयी है। कहा जा रहा है कि उनके इस बयान की पुष्टि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने भी यह कह कर दी हैं कि हरवंश सिंह ने क्या गलत कहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछले दस सालों हरवंश सिंह जिले के इकलौते कांग्रेसी विधायक हैं। जिले से कांग्रेस की टिकिट पर चुनाव लड़कर लोकसभा,विधानसभा और नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव हारने वाले नेता भी उनके इस बयान को सही मानते है। फर्क सिर्फ इतना है कि हारने वाले नेताओं की अगुंलिया किसी और कांग्रेसी के बजाय उनकी ओर ही सालों से उठती रहीं हैं। इस जिले में एक विशेष बात यह और रही हैं कि बागी होकर या भीतरघात करके कांग्रेस को हराने वाले नेताओं को पुरुस्कृत भी किया जाता हैं। इस कारण अब जिले में कांग्रेस के यह हाल हो गये हैं कि स्थानीय निकायों में कांग्रेस का बहुमत होने के बाद भी अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बनने के लिये पार्टी के लोगों को ही पैसा देना पड़ता है जब उसे वोट मिलते हैं। इसीलिये जिले में कांग्रेस तो नेस्त नाबूत हो गयी है लेकिन धनबल और बाहुबल पर राजनीति करने वाले नेता ही सिरमौर हो गये हैं। “मुसाफिर“
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले
05 फरवरी 2013 से साभार

4.2.13

यकीन नहीं होता- इस्लाम ऐसी शिक्षा देता है !


आज समाचार चैनलों में एक खबर को देखने से पहले मैं तो कम से कम यही सोचता था कि हिंदुस्तान को आजाद हुए 66 साल हो गए हैं...लेकिन इस खबर को देखने के बाद लगा कि कहीं मैं गलत तो नहीं हूं..! क्या वाकई में हमें आजादी मिले 66 साल हो गए हैं..? अगर इसका जवाब हां है तो फिर जरूर ये खबर झूठी होगी..! लेकिन अफसोस न तो ये खबर गलत थी और न ही ये झूठ है कि हिंदुस्तान को आजाद हुए 66 साल हो गए हैं।
कश्मीर में लड़कियों के एकमात्र बैंड प्रगाश के बंद होने की खबर थी। इसके पीछे जो वजह बताई जा रही थी वो और भी हैरान करने वाली थी। खबर के मुताबिक सर्वोच्च मुफ्ती बशीरूद्दीन अहमद ने लड़िकयों के गाने को गैर इस्लामिक करार देते हुए इनके खिलाफ फतवा जारी किया है। ये भी कहा जा रहा है कि एक कट्टरपंथी उग्रवादी महिला संगठन दुश्तकान ए मिल्लत ने बैंड में शामिल लड़कियों के परिवार के सामाजिक बहिष्कार तक की धमकी दी है। जिसके बाद बेहद डरी हुई इन लड़कियों ने अपने बैंड को बंद करने के साथ ही संगीत को छोड़ने का फैसला लिया है।
गलत व अनैतिक कार्य न करने की शिक्षा तो सभी धर्म देते हैं लेकिन संगीत से दूर रहने की शिक्षा भी कोई धर्म देता है ये आज ही पता चला। यहां पर अपने मुस्लिम मित्रों का मार्गदर्शन चाहूंगा क्योंकि मेरा सामान्य ज्ञान तो यही कहता है कि संगीत तो कम से कम गैर इस्लामिक नहीं हो सकता और मेरे हिसाब से तो ये बिल्कुल गलत है कि गायकी इस्लामिक शिक्षा के अनुरूप नहीं है।
संगीत पर तो गुलाम भारत में भी अंग्रेजों ने शायद ही रोक लगाई होगी लेकिन आज हमें आजाद हुए 66 साल हो गए हैं...हम चांद के बाद मंगल ग्रह तक पहुंच गए हैं लेकिन अभी भी हमारे समाज में ऐसे लोग मौजूद हैं जिन्हें लड़कियों की गायकी पर आपत्ति है।
बसीरूद्दीन साहब कल्पना चावला तो याद ही होगी आपको...आज से 10 साल पहले 1 फरवरी 2003 को दुखद हादसे में हमें छोड़ कर चली गयी। अंतरिक्ष के रहस्यों को सुलझा रही थी कल्पना लेकिन आप क्या समझोगे आपकी सोच तो घर की चारदीवारियों से बाहर ही नहीं निकल पाती है।
अच्छा लगा की जम्मू- कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला ने लड़कियों का समर्थन किया है लेकिन और अच्छा लगता अगर मुख्यमंत्री उमर साहब फतवा जारी करने वालों के खिलाफ कानूनी फतवा जारी करवाते और चार दीवारी के अंदर की सोच रखने वाले ऐसे लोगों को ही जेल की चार दीवारी में कैद करने की पहल कर ऐसी सोच वाले लोगों को ये संदेश देने की कोशिश करते कि हिंदुस्तान को आजाद हुए 66 साल हो गए हैं।
बहरहाल ये वक्त है कि मुस्लिम समुदाय खुद आगे आए और रॉक बैंड में अपने भविष्य के सुनहरे सपने देख रही इन लड़कियों का उत्साह बढ़ाएं और ऐसे फतवे जारी करने वालों को खुद सबक सिखाए।

deepaktiwari555@gmail.com

कौन अन्ना..कैसा आंदोलन ?


2014 के आम चुनाव में अभी करीब 15 महीने का वक्त है लेकिन देश की दोनों बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा को उम्मीद ही नहीं पूरा भरोसा है कि सरकार उनकी ही बनेगी। यहां तक तो ठीक था लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी को लेकर भी जोर आजमाईश चरम पर है। कांग्रेस नीत यूपीए में तो अघोषित तौर पर राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार हैं तो भाजपा नीत राजग में प्रधानमंत्री की उम्मीदार को लेकर घमासान मचा है। सब कुछ यूपीए और एनडीए के आसपास ही घूमता दिखाई दे रहा है।
ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर दो साल पहले शुरु हुई बदलाव और भ्रष्टाचार मुक्त शासन की बयार आखिर क्यों मंद पड़ गई..?
वो नजारा मेरी तरह आपके जेहन में भी शायद ताजा होगा जब आज से करीब दो साल पहले समाजसेवी अन्ना हजारे ने अपने सहयोगियों संग दिल्ली के जंतर मंतर से लोकपाल के समर्थन में भ्रष्टचार के खिलाफ हुंकार भरी थी तो अन्ना के समर्थन में देशभर में सड़कों पर उतरा जनसैलाब एक नयी क्रांति के उदघोष का आभास करा रहा था..!
लगने लगा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु हुई ये लड़ाई अपने अंजाम तक पहुंचेगी और 2014 का आम चुनाव निर्णायक सिद्ध होगा। लेकिन टीम अन्ना में विघटन के रूप में अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक विकल्प चुनकर आम आदमी पार्टी का गठन करना शायद आम आदमी का भरोसा ले डूबा क्योंकि बड़ी संख्या में लोग राजनीति विकल्प के इस फैसले के समर्थन में नहीं थे..!    
टीम अन्ना का विघटन सरकार के साथ ही दूसरे राजनीतिक दलों के लिए संजीवनी की काम कर गया और उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई पर सवाल उठाने के मौके मिल गए।
हालांकि अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल अलग अलग रास्तों से अपनी लड़ाई को आम आदमी के सहारे अंजाम तक पहुंचाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं लेकिन ये बात अन्ना, केजरीवाल और उनके सहयोगी और समर्थक भी अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी राह आसान नहीं है..!
इसके पीछे की बड़ी वजह ये भी है कि जिस आम आदमी के साथ की उम्मीद में ये लड़ाई लड़ी जा रही है वही आम आदमी कहीं न कहीं अभी भी देश के दो प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाया है..!
भ्रष्टाचार, घोटाले, महंगाई, बेरोजगारी से त्रस्त आम आदमी राजनीति में किसी तीसरे विकल्प पर मुहर लगाने की सोचता तो है लेकिन जब ऐसा करने की बारी आती है तो उसका ऊंगलियां कमल या हाथ की तरफ ही या फिर लोकप्रिय क्षेत्रीय दलों के चुनाव चिन्ह के आस पास ही घूमती नजर आती हैं..!
भारतीय राजनीति का इतिहास उठा कर अगर देख लें तो इक्का दुक्का मौके को छोड़कर ये बात साबित भी हो जाती है कि आम आदमी का मानस परिवर्तन कर सत्ता परिवर्तन इतना आसान तो कभी नहीं रहा।
ऐसे में सवाल ये उठता है कि जनता को भ्रष्टाचार, घोटाले, महंगाई, बेरोजगारी जैसी सौगातें देने वाले ऐसे राजनीतिक दलों को ढोना ही क्या अब इस देश की नियती बन गई है..?
सवाल ये उठता है कि क्या हम इन सब चीजों के आदि हो गए हैं और हमें इस सब से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता..?
इसका जवाब शायद यूएनडीपी की ह्यूमन डेवलेपमेंट रिपोर्ट में मिल जाए जिसके अनुसार भारत में गरीबों की संख्या 42 करोड से ज्यादा है। यूएनडीपी की नजर में गरीब का मतलब वह परिवार है जिसे हर रोज एक डॉलर से भी कम आमदनी में गुजारा करना पड़ता है जो आज के हिसाब से तकरीबन 50 रूपए के आस पास है।
121 करोड़ की आबादी वाले देश में ये वो संख्या है जिनकी ये हालत भ्रष्टाचार, घोटाले, महंगाई, बेरोजगारी की वजह से ही है और इस सब से सबसे ज्यादा यही लोग प्रभावित भी हैं और दूसरे लोगों के साथ ही इनका वोट बदलाव की ताकत रखता है।  
लेकिन विडंबना देखिए यही लोग भ्रष्टाचार, घोटाले, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं कर पाते क्योंकि इनको इस सब की जानकारी ही नहीं होती है और ये लोग चाहकर भी अपनी आवाज नहीं उठा पाते क्योंकि सुबह होते ही ये लोग दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में जुट जाते हैं।
इनके पास तो वक्त ही नहीं है अपनी आवाज उठाने का..वैसे भी जब पेट ही नहीं भरेगा तो आवाज कोई कैसे उठाएगा..?
कहते भी हैं - भूखे पेट तो भजन भी नहीं होते हैं..! सत्ता परिवर्तन, व्यवस्था परिवर्तन के खिलाफ आंदोलन कैसे होगा..?

deepaktiwari555@gmail.com

क्यों फ्लॉप हुई टीम अन्ना की पटना रैली?-ब्रज की दुनिया

मित्रों,टीम अन्ना की पटना रैली ऐतिहासिक गांधी मैदान में 30 जनवरी को सम्पन्न हो चुकी है हालाँकि उसकी सफलता और विफलता को लेकर अभी भी बहस जारी है और जारी रहेगी। यह तथ्य है कि इस रैली में उतनी भीड़ जमा नहीं हो पाई जितनी की उम्मीद की जा रही थी। परन्तु मेरी समझ से परम आदरणीय अन्ना हजारे जी की मूल समस्या अपेक्षित भीड़ का जमा नहीं पाना नहीं है बल्कि यह है कि अन्ना की टीम एक बार टूट चुकने के बावजूद एकजुट नहीं दिख पा रही है। अन्ना हजारे की अहम सहयोगी और पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने आश्चर्यजनक तरीके से रद्दी की टोकरी में फेंकने के लायक संशोधित लोकपाल विधेयक के मसौदे का समर्थन कर दिया है। हालाँकि अन्ना हजारे इस विधेयक को पूरी तरह से ख़ारिज कर चुके हैं। ट्विटर पर किरण बेदी ने लिखा है, “यदि हम प्रस्तावित लोकपाल के मसौदे पर आगे बढ़ते हैं तो कोई नुकसान नहीं होगा और आगे चलकर जरूरत पड़ने पर हम इसे और बेहतर बना सकते हैं।” इससे पहले, भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल गठन के मुद्दे पर सरकार को मजबूर करने वाले अन्ना हज़ारे ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की ओर से मंज़ूर किए गए लोकपाल विधेयक के नए मसौदे को सिरे से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने इस मसौदे को 'झूठा' बताते हुए कहा कि सरकार एक 'कमज़ोर' क़ानून पारित करवाना चाहती है। अन्ना ने कहा, "भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए सख्त लोकपाल लाने के मसले पर अब प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी पर और भरोसा नहीं किया जा सकता है। अगर इस मुद्दे पर वे ईमानदार होते तो इस सिलसिले में ठोस फैसला लेने में सरकार को दो साल नहीं लगते"। जाहिर है कि टीम अन्ना में एक बार फिर से मतभेद तो उत्पन्न हो ही गया है समन्वय की भी भारी कमी है। इसके साथ ही टीम अन्ना के बाँकी सदस्यों की अन्ना और उनके भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन के प्रति निष्ठा भी संदेह के घेरे में आ गई है।
               मित्रों, प्रश्न उठता है कि जब अपनी टीम में ही अन्ना हजारे अपने उद्देश्यों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध कुछ दर्जन लोगों को शामिल नहीं कर पा रहे हैं तो फिर इस बात की क्या गारंटी है कि उनकी रैली या आन्दोलन में जमा होनेवाले लोग उनके पवित्र उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध ही होंगे? मैं पहले भी अपने पूर्व के आलेखों में निवेदन कर चुका हूँ कि अन्ना को अपनी टीम के लिए कुछ दर्जन पूर्ण प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं का नहीं मिल पाना अन्ना की समस्या नहीं है बल्कि वर्तमान युग की समस्या है। कदाचित् आज के भारत में अगर गांधी खुद फिर से आ जाएँ तो उनको भी इस तरह की समस्याओं से जूझना ही पड़ेगा। देश का पढ़ा-लिखा तबका विभिन्न मुद्दों पर इस कदर मतभिन्नता और स्वार्थपरकता का शिकार है कि उनको एक मंच पर लाना मेंढ़क को तराजू पर तौलने की तरह मुश्किल है और रहेगा। साथ ही जिस तरह अरविन्द केजरीवाल आदि ने अन्ना के साथ धोखा किया उससे जनता इस बात को लेकर आश्वस्त भी नहीं हो पा रही है कि टीम अन्ना में आगे टूट नहीं होगी या उनके आंदोलन को वैसी सफलता फिर से मिल सकेगी जैसी कि पिछले दो सालों में मिलती रही है। इन परिस्थितियों में अन्ना को अगर फिर से जनता का विश्वास जीतना है तो पहले तो उनको अपनी टीम में ऐसे लोगों को ही शामिल करना होगा जो उनके परम-पावन उद्देश्यों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध हों,अटूट निष्ठा रखते हों। यह कतई आवश्यक नहीं कि टीम में कोई प्रसिद्ध व्यक्तित्व उपस्थित रहे ही। बल्कि सेलिब्रिटी को टीम में शामिल करने के अपने खतरे हैं जैसा कि पहले अरविन्द केजरीवाल के मामले में देखा गया और अब किरण बेदी के समझौतावादी बयान के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। बल्कि टीम अन्ना में आने पर कोई भी अनजाना व्यक्ति भी जल्दी ही प्रसिद्ध हो जाएगा इसमें संदेह नहीं। मैं एक और उस गलती की ओर अन्ना जी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जो उन्होंने पटना में की और वह गलती यह थी कि उन्होंने वर्तमान बिहार में व्याप्त भ्रष्टाचार को पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया। मैं नहीं समझता कि नीतीश राज में लालू-राबड़ी के समय से भ्रष्टाचार में किसी तरह की कमी आई है बल्कि इसमें मात्रात्मक और गुणात्मक वृद्धि ही हुई है। इतना जरूर हुआ है कि इसका विकेंद्रीकरण हो गया है। अन्ना को अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की भावना देश में उत्पन्न करनी है तो उनको भविष्य में भ्रष्टाचार को खाँचे में बाँटने की गलती नहीं करनी होगी। मैं नहीं मानता और देश की जनता भी नहीं मानती है कि भ्रष्टाचार की कोई पार्टी होती है,कोई जाति होती है या कोई धर्म होता है। अन्ना जी भ्रष्टाचार सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार होता है चाहे उसको करनेवाला कलमाडी हो,पवार हो,लालू हो,मुलायम हो,राजा हो,माया हो,मोदी हो या नीतीश हो। माना कि नीतीश जी पर व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार के आरोप आजतक नहीं लगे हैं लेकिन उनके शासन-तंत्र में व्याप्त अराजकतापूर्ण भ्रष्टाचार अगर दिन-प्रतिदिन सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता जा रहा है तो इसके लिए वही जिम्मेदार हैं और होंगे। माना कि रैली के सफल और सरल आयोजन के लिए नीतीश का समर्थन प्राप्त करना जरूरी था लेकिन रैली तो बिना सरकारी अनुमति के भी उसी तरह आयोजित हो सकती थी जिस तरह अन्ना जी पूर्व में दिल्ली में आयोजित कर चुके हैं। मैं समझता हूँ तब रैली में ज्यादा लोग जमा होते और तब रैली निश्चित रूप से संख्यात्मक दृष्टि से भी सफल होती।

धर्म विहीन होने से

धर्म विहीन होने से , चलिए मान लेते हैं , हम अनैतिक हो जायेंगे | लेकिन यह भी तो देखें कि आज ही नैतिकता कितने पानी में है ? फिर इतने सारे भगवानों और धर्मो का अतिरिक्त बोझ क्यों  ढोयें ? सीधे सीधे नैतिक या अनैतिक ही न हो लें ?

 विकास की आरियाँ


तुम अब नहीं हो।  कटे पड़े हो । विकास की आरियाँ चली हैं तुम पर । जब भी विकास की आरियाँ चलती हैं तो पहला प्रहार तुम्हीं पर होता है । समझ नहीं आता कि  तुम बीच में आते ही क्यों हो ? तुम्हें विकास की रथ यात्रा में आड़े नहीं आना चाहिए । क्या तुम नहीं जानते ? देश में विकास की बहार है । विकासवाद अब हमारी सरकारों का प्रथम मापदंड हो गया है और तुम हो कि  राह में बाधा बन खड़े हुए हो । वर्षों से । जब मैं छोटा था । पांच सात साल का । तब तुम भी इतने बड़े नहीं थे । तुम पर इमलियाँ लटकी रहती थी । मैं और मेरे साथ के बच्चे बार बार पत्थर मारकर तुमसे इमलियाँ तोड़ने की कोशिश करते और इमलियाँ थीं कि  टूटने को नहीं आतीं । हमें तब लगता , तुम इतने बड़े क्यों हो । थोडा छोटे होते तो हम इमली तोड़ लेते । कभी किसी कौवे ने घड़े में कंकन डालकर पानी पीया था लेकिनहमें तो पत्थर चाहिए होते थे तुम्हें मारने के लिए । तुमसे इमलियाँ तोड़ने में पत्थरों ने हमारी बहुत मदद की है । देखा ? हमारी ताकत । अब तुम कटे पड़े हो । मूक । बोल भी नहीं सकते । शास्त्र कहते हैं । तुम बोल सकते हो । बोलो । बोल भी रहे होगे तो मैं कोई पेड़ थोड़े ही हूँ जो तुम्हारी बात सुन लूँगा । तुम्हारी जगह अब पत्थर बिछा दिए जायेंगे । वही  पत्थर जिन्होंने तुमसे इमलियाँ तोड़ने में हमारी बहुत मदद की थी । संवेदना होने और न होने में यही फर्क है । तुममे संवेदना थी इसलिए तुम काट दिए गए । पत्थर असंवेदनशील है इसलिए चोट भी करते हैं और आसानी से कटते भी नहीं । वे बिछे रहेंगे । सड़कों के नीचे । उन पर दौड़ेगी सरपट से गाड़ियाँ । सोचो । क्या तुम्हारे रास्ते में होते गाड़ियां दौड़ पाती । नहीं न । तुम तो राह में बाधा बन खड़े थे । अब गलती मत करना । आदमी के रास्ते में मत आना । तुम देते भी क्या थे । ओक्सिजन । अरे , उसके तो अब सिलेंडर हैं हमारे पास ।अब तुम्हारे उस हिस्से पर सरपट दौड़ती गाड़ियां धुंआ छोड़ेंगी ।
क्या तुम खुश हो ? कटकर  भी ? कि  तुम्हे वह धुआँ अब नहीं सहन करना पड़ेगा । उस धुएं के खिलाफ अब तुम्हारी जंग शायद अब समाप्त हो चुकी है ? शायद , लेकिन तुम अमर हो गए हो । हाँ , तुम मेरी स्मृतियों में तो अमर हो ही गए हो । यदि मैं मर गया तो मैं अपने मरने से पहले तुम्हें इन्टरनेट पर टांग दूंगा । गूगल पर टांग दूंगा । कोई तुम्हे गूगल से हटाएगा भी तो internate पर तुम हमेशा के लिए अमर अमिट  हो जाओगे । पेड़ हुए होना क्या कुछ होना नहीं होता । क्या मरा हाथी सवा लाख का नहीं होता ? क्या अब तुम्हारा बाज़ार भाव नहीं है । है । अब तुम कितने ही घरों में पहुँच जाओगे । दुखी मत होना ।
एक बात कहूं । तुम बहुत लम्बे हो गए थे । क्या तुम्हे अहंकार हो गया था । शायद । तुम्हारी इमलियाँ कब लगती और ख़त्म हो जाती यह पता ही नहीं चल पाता  था । या पता नहीं लगती भी थी या नहीं , क्या तुम नहीं जानते कि  जिनसे मनुष्य का स्वार्थ नहीं साधता वे  सब मनुष्य के लिए महत्व हीन हो जाती हैं ? क्या तुमने बूढ़े माँ बाप की हालत नहीं देखी   है ? तो फिर , तुम तो संवेदन शील हो , तुम्हे समझना चाहिए । जब कभी जाम लगता तो तुम्हारी वजह से सड़कें चौड़ी नहीं हो पाती थी । तुम्हारे नीचे वह छोले कुलचे वाला अब नहीं दिखेगा जिसके पास आकर लोग तुम्हारी छाँव में अपने भूख मिटाते थे । वह चला गया है । एक और वहां अब भी खड़ा  है । दाल चावल लिए । वह भी चला जाएगा । विकास की इस यात्रा में जब भी तुम कटते हो तो कितनों को अपने रोजगार की तलाश में  नयी  छतें तलाशनी पड़ती हैं । विकास की यह यात्रा वैसे भी उन अमीरों के लिए है जिनकी सरपट दौड़ती गाड़ियों से अक्सर जाम लगते हैं और फिर सड़के चौड़ी होती हैं । तुम कटते हो उनके लिए जिनके रईसजादे  अक्सर कभी तुम पर अपनी गाड़ियां थोक देते थे पर वे तुम्हें नहीं गिरा पाए । लेकिन देखो , पैसा ही खर्च हो रहा है और उस पैसे की ही बदौलत तुम गिरा दिए गए हो ।
तुम्हे पता भी है । एक दधीची हुए हैं जिन्होंने देवताओं के लिए उनकी विजय के लिए अपनी हड्डियां तक दान कर दी थी । तुमने भी सर्वस्व दान कर दिया है । या , सॉरी , तुमसे छीन  लिया गया है तुमारा सर्वस्व । लेकिन रोना नहीं । संवेदनाओं को नियंत्रण में रखना । तुम ही तो हो जिसकी संवेदनाएं अब भी नियंत्रित हैं । अपना अर्थ नहीं खोती  । तुम स्थितप्रज्ञ हो । सुख दुःख में एक । मुझे तो ऐसा ही लगता है । जबरन ही सही । क्या मैं गलत हूँ ? इंसान अपनी संवेदनाओं से ऊपर उठ खडा हुआ है । या संवेदनाओं को मारकर उठ खडा हुआ है । विकास की इस यात्रा पर । तुम चिंता मत करो । तुम मेरे घर में होगे । सोफे आलमारी दरवाजे आदि के रूप में । मेरी यादों में । तुम अकेले ही नहीं कटे हो । तुम्हारे अपने बहुत से कटे हैं और बहुत सारे नए भी ईजाद कर लिए जायेंगे । तुम यादों में रहोगे । हमारे हृदय की गहराइयों में , अपनी इमलियों के साथ , जिन्हें याद करके अब भी मेरे दांत विकास की इस यात्रा में भी खट्टे हुए जा रहे हैं ।

 विकास की आरियाँ


तुम अब नहीं हो।  कटे पड़े हो । विकास की आरियाँ चली हैं तुम पर । जब भी विकास की आरियाँ चलती हैं तो पहला प्रहार तुम्हीं पर होता है । समझ नहीं आता कि  तुम बीच में आते ही क्यों हो ? तुम्हें विकास की रथ यात्रा में आड़े नहीं आना चाहिए । क्या तुम नहीं जानते ? देश में विकास की बहार है । विकासवाद अब हमारी सरकारों का प्रथम मापदंड हो गया है और तुम हो कि  राह में बाधा बन खड़े हुए हो । वर्षों से । जब मैं छोटा था । पांच सात साल का । तब तुम भी इतने बड़े नहीं थे । तुम पर इमलियाँ लटकी रहती थी । मैं और मेरे साथ के बच्चे बार बार पत्थर मारकर तुमसे इमलियाँ तोड़ने की कोशिश करते और इमलियाँ थीं कि  टूटने को नहीं आतीं । हमें तब लगता , तुम इतने बड़े क्यों हो । थोडा छोटे होते तो हम इमली तोड़ लेते । कभी किसी कौवे ने घड़े में कंकन डालकर पानी पीया था लेकिनहमें तो पत्थर चाहिए होते थे तुम्हें मारने के लिए । तुमसे इमलियाँ तोड़ने में पत्थरों ने हमारी बहुत मदद की है । देखा ? हमारी ताकत । अब तुम कटे पड़े हो । मूक । बोल भी नहीं सकते । शास्त्र कहते हैं । तुम बोल सकते हो । बोलो । बोल भी रहे होगे तो मैं कोई पेड़ थोड़े ही हूँ जो तुम्हारी बात सुन लूँगा । तुम्हारी जगह अब पत्थर बिछा दिए जायेंगे । वही  पत्थर जिन्होंने तुमसे इमलियाँ तोड़ने में हमारी बहुत मदद की थी । संवेदना होने और न होने में यही फर्क है । तुममे संवेदना थी इसलिए तुम काट दिए गए । पत्थर असंवेदनशील है इसलिए चोट भी करते हैं और आसानी से कटते भी नहीं । वे बिछे रहेंगे । सड़कों के नीचे । उन पर दौड़ेगी सरपट से गाड़ियाँ । सोचो । क्या तुम्हारे रास्ते में होते गाड़ियां दौड़ पाती । नहीं न । तुम तो राह में बाधा बन खड़े थे । अब गलती मत करना । आदमी के रास्ते में मत आना । तुम देते भी क्या थे । ओक्सिजन । अरे , उसके तो अब सिलेंडर हैं हमारे पास ।अब तुम्हारे उस हिस्से पर सरपट दौड़ती गाड़ियां धुंआ छोड़ेंगी ।
क्या तुम खुश हो ? कटकर  भी ? कि  तुम्हे वह धुआँ अब नहीं सहन करना पड़ेगा । उस धुएं के खिलाफ अब तुम्हारी जंग शायद अब समाप्त हो चुकी है ? शायद , लेकिन तुम अमर हो गए हो । हाँ , तुम मेरी स्मृतियों में तो अमर हो ही गए हो । यदि मैं मर गया तो मैं अपने मरने से पहले तुम्हें इन्टरनेट पर टांग दूंगा । गूगल पर टांग दूंगा । कोई तुम्हे गूगल से हटाएगा भी तो internate पर तुम हमेशा के लिए अमर अमिट  हो जाओगे । पेड़ हुए होना क्या कुछ होना नहीं होता । क्या मरा हाथी सवा लाख का नहीं होता ? क्या अब तुम्हारा बाज़ार भाव नहीं है । है । अब तुम कितने ही घरों में पहुँच जाओगे । दुखी मत होना ।
एक बात कहूं । तुम बहुत लम्बे हो गए थे । क्या तुम्हे अहंकार हो गया था । शायद । तुम्हारी इमलियाँ कब लगती और ख़त्म हो जाती यह पता ही नहीं चल पाता  था । या पता नहीं लगती भी थी या नहीं , क्या तुम नहीं जानते कि  महत्वहीन चीजें मनुष्य के लिए महत्व हीन हो जाती हैं ? क्या तुमने बूढ़े माँ बाप की हालत नहीं देखी   है ? तो फिर , तुम तो संवेदन शील हो , तुम्हे समझना चाहिए । जब कभी जाम लगता तो तुम्हारी वजह से सड़कें चौड़ी नहीं हो पाती थी । तुम्हारे नीचे वह छोले कुलचे वाला अब नहीं दिखेगा जिसके पास आकर लोग तुम्हारी छाँव में अपने भूख मिटाते थे । वह चला गया है । और और वहां अब भी कडा है । दाल चावल लिए । वह भी चला जाएगा । विकास की इस यात्रा में जब भी तुम कटते हो तो कितनों को अपने रोजगार की तलाश में  बाई छतें तलाशनी पड़ती हैं । विकास की यह यात्रा वैसे भी उन अमीरों के लिए है जिनकी सरपट दौड़ती गाड़ियों से अक्सर जाम लगते हैं और फिर सड़के चौड़ी होती हैं । तुम कटते हो उनके लिए जिनके रईसजादे  अक्सर कभी तुम पर अपनी गाड़ियां थोक देते थे पर वे तुम्हें नहीं गिरा पाए । लेकिन देखो , पैसा ही खर्च हो रहा है और उस पैसे की ही बदौलत तुम गिरा दिए गए हो ।
तुम्हे पता भी है । एक दधीची हुए हैं जिन्होंने देवताओं के लिए उनकी विजय के लिए अपनी हड्डियां तक दान कर दी थी । तुमने भी सर्वस्व दान कर दिया है । या , सॉरी , तुमसे छीन  लिया गया है तुमारा सर्वस्व । लेकिन रोना नहीं । संवेदनाओं को नियंत्रण में रखना । तुम ही तो हो जिसकी संवेदनाएं अब भी नियंत्रित हैं । अपना अर्थ नहीं खोती  । तुम स्थितप्रज्ञ हो । सुख दुःख में एक । मुझे तो ऐसा ही लगता है । जबरन ही सही । क्या मैं गलत हूँ ? इंसान अपनी संवेदनाओं से ऊपर उठ खडा हुआ है । या संवेदनाओं को मारकर उठ खडा हुआ है । विकास की इस यात्रा पर । तुम चिंता मत करो । तुम मेरे घर में होगे । सोफे आलमारी दरवाजे आदि के रूप में । मेरी यादों में । तुम अकेले ही नहीं कटे हो । तुम्हारे अपने बहुत से कटे हैं और बहुत सारे नए भी ईजाद कर लिए जायेंगे । तुम यादों में रहोगे । हमारे हृदय की गहराइयों में , अपनी इमलियों के साथ , जिन्हें याद करके अब भी मेरे दांत विकास की इस यात्रा में भी खट्टे हुए जा रहे हैं ।
विदा !

3.2.13

बदलती संस्कृति


बदलती संस्कृति 

मेरे देश का परिवेश बदल रहा है ,भाषा बदल रही है ,संस्कृति बदल रही है ,आधुनिकता के
तूफान में जो अच्छा था वह भी ढह ढहा कर गिर रहा है -कुछ पंक्तियों का आनन्द लीजिये,
व्यंग प्रस्तुत है -

एक ससुर ने
पढ़ी लिखी बहु से कहा-
बहु ,
मेरा पोते को कुछ संस्कार सीखा।
उसके बाल मन को,
कुछ प्रभु की ओर झुका,
उसे कुछ श्लोक,प्रार्थना सीखा।
बहु बोली -
आपकी आज्ञा का होगा पालन,
बताईये कौनसे श्लोक का है चलन।
ससुर बोला -
मेरे पोते को सबसे पहले
"त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव "सीखा
कुछ दिन बाद पोते ने
यह प्रार्थना अपने दादा को
कुछ  इस तरह सुनायी-
यू आर माई मॉम
यू आर माई डेड
यू आर माई ब्रो
यू आर माई फ्रेंड
यू आर माई टीचर
यू आर माई मेम
यू आर माई ऑल
यू आर माई ऑल  

राहुल गांधी पीएम बनने लायक नहीं !


 2014 के आम चुनाव से ऐन पहले राहुल गांधी ने आखिरकार हिम्मत दिखाई और कांग्रेस के उपाध्यक्ष की कुर्सी संभाल कर बड़ी जिम्मेदारी निभाने की तरफ कदम बढ़ाया। राहुल से कांग्रेसियों को उम्मीदें भी हैं और राहुल ने भी बड़ी जिम्मेदारी संभालने के बाद युवाओं के सहारे 2014 में यूपीए की हैट्रिक कराने का दम भी भरा। हालांकि कांग्रेस की तरफ से पीएम पद के लिए प्रोजेक्ट न होते हुए भी राहुल गांधी ही सरकार बनने की स्थिति में कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
कांग्रेसी तो काफी पहले ही चाहते थे कि राहुल पीएम बनें या सरकार में अहम जिम्मेदारी संभालें लेकिन राहुल हर बार कदम पीछे खींचते रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद कई बार राहुल से सरकार में शामिल होने का आग्रह करते रहे हैं लेकिन राहुल ने कभी हामी ही नहीं भरी या कहें कि हिम्मत नहीं दिखाई।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अन्य राजनीतिज्ञों की अपेक्षा युवा और चर्चित चेहरा हैं।
निश्चित ही कांग्रेसियों के साथ ही देश के युवाओं को राहुल गांधी से बड़ी उम्मीदें भी होंगी लेकिन सवाल ये उठता है कि विपक्ष के राहुल को अपरिपक्व कहने पर उन्हें जवाब देते हुए खुद को परिपक्व कहने वाले राहुल गांधी आखिर क्यों हर बार सरकार में शामिल होने से बचते रहे..?
क्या राहुल गांधी को खुद पर भरोसा नहीं था..? या फिर राहुल एक ऐसी सरकार में शामिल नहीं होना चाहते थे जो पहले से ही भ्रष्टाचार, घोटालों और आर्थिक मोर्चे पर अपने फैसलों को लेकर सवालों के घेरे में है..?
जाहिर है राहुल एक ऐसी सरकार का हिस्सा रहकर 2014 में आम जनता के बीच नहीं जाना चाहते थे जिसका जवाब उन्हें जनता को देना भारी पड़ जाता..! ऐसे में राहुल ने जानबूझकर कांग्रेस में बड़ी जिम्मेदारी संभालने के लिए 2014 के आम चुनाव से पहले का वक्त चुना और ये संकेत भी दिया कि वे युवाओं के सहारे युवा भारत की तकदीर लिखेंगे। लेकिन यहां पर ये सवाल जेहन में आता है कि जब राहुल के पास संगठन के अलावा कोई दूसरा अनुभव नहीं है तो 2014 में यूपीए की सरकार बनने की स्थिति आने पर वे कैसे देश को चला पाएंगे..?
राहुल के चाहने वाले शायद यहां पर शायद ये तर्क देंगे कि कोई भी व्यक्ति पेट से कुछ सीखकर नहीं आता और कहीं न कहीं से शुरुआत जरूर करता है और राहुल बहुत ही काबिल राजनेता हैं लेकिन इसका जवाब मैं ये देना चाहूंगा कि- देश को चलाना न तो एनएसयूआई के चुनाव कराने जैसा काम है और न ही खाली वक्त में किसी राज्य के किसी अति पिछड़े गांव में दलित के घर जाकर भोजन करने का काम..! या प्लास्टिक के तसले(बर्तन) में मिट्टी ढ़ो कर जमीन से जुड़े होने का एहसास कराने का काम..!
यहां सवाल राहुल की काबलियत का नहीं है बल्कि सवाल ये है कि 34 साल की उम्र में राजनीति में प्रवेश करने वाले राहुल गांधी 8 साल के अपने राजनीति जीवन में (जिसमें भी वे कभी सरकार का हिस्सा नहीं रहे) क्या इतने परिपक्व हो गए हैं कि सरकार बनने की स्थिति में वे 2014 में देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाल सकें..?
हां राहुल के पास एकमात्र और अनोखी काबलियत ये जरूर है कि उनका जन्म गांधी परिवार में हुआ और राजनीति उन्हें विरासत में मिली और गांधी परिवार के दम पर ही उनका राजनीति अस्तित्व कायम भी है।
क्या सिर्फ उनकी इस एकमात्र काबिलियत को ये पैमाना बनाया जा सकता है कि सिर्फ 8 साल के राजनीतिक अनुभव वाले राहुल पीएम की कुर्सी के लिए योग्य हैं..?
हालांकि 8 साल के राजनीतिक जीवन का अनुभव राहुल के हिस्से में सिर्फ एक ये उपलब्धि दर्शाता है कि 2009 के आम चुनाव में राहुल ने 2004 की अपेक्षा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति को सुधारा और कांग्रेस की सीटों की संख्या 9 से बढ़ाकर 21 करने में सफलता हासिल की जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी का जादू नहीं चला और तीनों ही राज्यों में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी।   
बहरहाल राहुल गांधी बड़ी जिम्मेदारी संभलकर कांग्रेस उपाध्यक्ष के साथ ही कांग्रेस में नंबर दो हो गए हैं और अघोषित रूप से 2014 में कांग्रेस के घोषित पीएम उम्मीदवार हैं लेकिन देखने वाली बात ये होगी कि फैसला करने वाली देश की जनता क्या राहुल गांधी पर भरोसा करेगी..?

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2.2.13

वसुंधरा राजे का कोई विकल्प था भी नहीं


अपने आपको सर्वाधिक अनुशासित बता कर पार्टी विद द डिफ्रेंस का नारा बुलंद करने और व्यक्ति से बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के आगे नतमस्तक हो गया। उन्हें न केवल राजस्थान में पार्टी की कमान सौंपी गई है, अपितु आगामी विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। आगामी विधानसभा चुनाव में जीतने के लिए पार्टी के पास इसके अलावा कोई विकल्प था भी नहीं। भले ही समझौते तहत संघ लॉबी के गुलाब चंद कटारिया को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है, मगर जीतने के लिए पार्टी को वसुंधरा के चेहरे का ही इस्तेमाल करना पड़ रहा है। उनकी नियुक्ति के साथ पिछले कई दिन से उहापोह में जी रहे पार्टी कार्यकर्ता, नेता व विधानसभा चुनाव में टिकट के दावेदारों ने राहत की सांस ली है और उनके चेहरे पर खुशी छलक आई है। पार्टी की अंदरूनी कलह की वजह से मायूस हो चुके कार्यकर्ता में उत्साह का संचार हुआ है। समझा जाता है कि अब पार्टी पूरी ताकत से चुनाव मैदान में ताल ठोकेगी और उसका प्रदर्शन बेहतर होगा।
ज्ञातव्य है कि राजस्थान में पार्टी दो धड़ों में बंटी हुई है। एक बड़ा धड़ा वसुंधरा के साथ है, जिनमें कि अधिसंख्य विधायक हैं तो दूसरा धड़ा संघ पृष्ठभूमि का है, जिसमें प्रमुख रूप से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी, पूर्व मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी, गुलाब चंद कटारिया आदि शामिल हैं। आपको याद होगा कि जब पूर्व प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने घोषणा की कि राजस्थान में अगला चुनाव वसुंधरा के नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो ललित किशोर चतुर्वेदी व गुलाब चंद कटारिया ने उसे सिरे से नकार दिया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी भी इस बात से नाइत्तफाकी जाहिर करते रहे। इसके बाद जब कटारिया ने मेवाड़ में रथ यात्रा निकालने ऐलान किया तो वसुंधरा ने इसे चुनौती समझते हुए विधायक किरण माहेश्वरी के जरिए रोड़ा अटकाया। नतीजे में विवाद इतना बढ़ा कि वसुंधरा ने विधायकों के इस्तीफे एकत्रित कर हाईकमान पर भारी दबाव बनाया। हालांकि नई घोषणा से पहले तक संघ लॉबी ने पूरा दबाव बना रखा था, मगर आखिरकार कटारिया को नेता प्रतिपक्ष बनाने की एवज में वसुंधरा का नेतृत्व स्वीकार करना ही पड़ा। हालांकि यह तय है कि टिकट वितरण में वसुंधरा को पूरा फ्रीहैंड तो नहीं मिलेगा और संघ लॉबी तय समझौते के तहत अपने कोटे के टिकट हासिल कर लेगी, मगर पार्टी के जीतने पर मुख्यमंत्री तो वसुंधरा ही बनेंगी।
असल में नितिन गडकरी के अध्यक्षीय काल में ही तय था कि राजस्थान में वसुंधरा के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा, मगर राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से समीकरणों में कुछ बदलाव आया। बदलाव सिर्फ इतना कि संघ लॉबी कुछ हावी हो गई। और यही वजह रही कि आखिरी वक्त तक खींचतान मची रही। संघ लॉबी अपने गुट के कटारिया को नेता प्रतिपक्ष  बनाने पर ही राजी हुई। वजह ये कि राजनाथ सिंह व वसुंधरा राजे के संबंध कुछ खास अच्छे नहीं रहे। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय होने की जिम्मेदारी लेते हुए तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर ने तो इस्तीफा दे दिया, लेकिन नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफे की बात आई तो वसुंधरा ने इससे इंकार कर दिया था। तब राजनाथ सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और उन्होंने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया था। आखिरकार वसुंधरा को पद छोडऩा पड़ा था। यह बात दीगर है कि उसके बाद तकरीबन एक साल तक यह पद खाली पड़ा रहा और उसे फिर से वसुंधरा को ही सौंपना पड़ा। आखिर तक भी वसुंधरा का अपर हैंड ही रहा और जीतने के लिए सिंह के लिए यह मजबूरी हो गई कि उन्हें वसुंधरा को ही कमान सौंपनी पड़ी।
राजस्थान में वसुंधरा राजे पार्टी से कितनी बड़ी हैं और उनका कोई विकल्प ही नहीं है, इसका अंदाजा इसी बात से हो जाता है कि हाईकमान को पूर्व में भी उन्हें विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से हटाने में एडी चोटी का जोर लगाना पड़ गया था। सच तो ये है कि उन्होंने पद छोडऩे से यह कह कर साफ इंकार कर था दिया कि जब सारे विधायक उनके साथ हैं तो उन्हें कैसे हटाया जा सकता है। हालात यहां तक आ गए थे कि उनके नई पार्टी का गठन तक की चर्चाएं होने लगीं थीं। बाद में बमुश्किल पद छोड़ा भी तो ऐसा कि उस पर करीब साल भर तक किसी को नहीं बैठाने दिया। आखिर पार्टी को मजबूर हो कर दुबारा उन्हें पद संभालने को कहना पड़ा, पर वे साफ मुकर गईं। हालांकि बाद में वे मान गईं, मगर आखिर तक यही कहती रहीं कि यदि विपक्ष का नेता बनाना ही था तो फिर हटाया क्यों? असल में उन्हें फिर बनाने की नौबत इसलिए आई कि अंकुश लगाने के जिन अरुण चतुर्वेदी को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाया गया, वे ही फिसड्डी साबित हो गए। पार्टी का एक बड़ा धड़ा अनुशासन की परवाह किए बिना वसुंधरा खेमे में ही बना रहा। वस्तुत: राजस्थान में वसु मैडम की पार्टी विधायकों पर इतनी गहरी पकड़ है कि वे न केवल संगठन के समानांतर खड़ी हैं, अपितु संगठन पर पूरी तरह से हावी हो गई हैं। उसी के दम पर राज्यसभा चुनाव में दौरान वे पार्टी की राह से अलग चलने वाले राम जेठमलानी को न केवल पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी बनवा लाईं, अपितु अपनी कूटनीतिक चालों से उन्हें जितवा भी दिया। जेठमलानी को जितवा कर लाने से ही साफ हो गया था कि प्रदेश में दिखाने भर को अरुण चतुर्वेदी के पास पार्टी की फं्रैचाइजी है, मगर असली मालिक श्रीमती वसुंधरा ही हैं। कुल मिला कर ताजा घटनाक्रम से तो यह पूरी तरह से स्थापित हो गया है के वे प्रदेश भाजपा में ऐसी क्षत्रप बन कर स्थापित हो चुकी हैं, जिसका पार्टी हाईकमान के पास कोई तोड़ नहीं है। उनकी टक्कर का एक भी ग्लेमरस नेता पार्टी में नहीं है, जो जननेता कहलाने योग्य हो। अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि आगामी विधानसभा चुनाव में केवल वे ही पार्टी की नैया पार कर सकती हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

एक प्याज की ताकत


प्याज बड़ी महत्वपूर्ण चीज है। कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्याज के बिना खाना भले ही बन जाए लेकिन प्याज के बिना सरकार नहीं बनती। प्याज सिर्फ सरकार बनाता ही नहीं है बल्कि सरकार गिराने का भी दम रखता है। प्याज के दाम जब जमीन पर होते हैं तब तो सब ठीक रहता है लेकिन अगर प्याज के दामों में ईजाफा होना शुरु हो गया तो फिर ये सबको रूलाता है।
चुनाव के आस पास अगर प्याज के दाम चढ़ने लगे फिर तो ये सबसे ज्यादा सरकार को रूलाता है क्योंकि प्याज का इतिहास सत्तारूढ़ दलों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा है।
दिल्ली में विधानसभा चुनाव की तारीख करीब है ऐसे में प्याज की बढ़ती कीमतें शीला सरकार को क्यों न नजर आती..? सो शीला दीक्षित ने केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को चिट्ठी लिखकर प्याज का निर्यात कम करने की अपील कर दी ताकि प्याज के बढ़ते दामों में लगाम कस सके। क्योंकि शीला जानती हैं कि प्याज के दाम इसी तरह चढ़ते रहे तो प्याज के बढ़ते शीला सरकार को दिल्ली की सत्ता से बेदखल करने की वजह बन सकते हैं।
प्याज से ठीक पहले रसोई गैस और डीजल के दाम बढ़े लेकिन शीला दीक्षित ने कभी न तो प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी और न ही पेट्रोलियम मंत्री को लेकिन प्याज के बढ़ते दामों ने शीला की नींद हराम कर दी..!
ऐसा नहीं है कि खाद्य पदार्थों में सिर्फ प्याज के दाम ही बढ़े हो...तमाम चीजों पर महंगाई असर डाल रही है और दूसरी सब्जियों के साथ ही राशन सामग्री भी महंगी हुई है लेकिन इस पर शीला ने कभी किसी को चिट्ठी नहीं लिखी...लेकिन प्याज के बढ़ते दामों ने शीला को डरा दिया..! क्योंकि शीला जानती हैं प्याज की ताकत..!
साल 1998 तो याद ही होगा आपको...ये प्याज ही था जिसने एनडीए सरकार की नींद हराम कर दी थी और इसी प्याज के सहारे कांग्रेस ने सत्ता की चाबी हासिल की थी। पाकिस्तान को सब्जियां निर्यात करने वाले कारोबारियों ने प्याज का आयात भी शुरु कर दिया था लेकिन प्याज एनडीए को रुलाकर ही माना।
2010 में भी प्याज की बढ़ती कीमतों की वजह से ही 12 साल बाद फिर से पाकिस्तान से प्याज का आयात शुरु किया गया ताकि प्याज की कीमतों पर लगाम कसी जा सके।
एक बार फिर से प्याज नए कीर्तीमान स्थापित करने की ओर बढ़ रहा है और आम आदमी के साथ ही सरकार को भी रुला रहा है।
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की बेचैनी तो शरद पवार को लिखे उनके खत से ही जाहिर हो गई है लेकिन शरद पवार के जवाब- प्याज के दाम स्थानीय कारणों से बढ़ रहे हैं ने शीला की उलझन को कम करने की बजाए बढ़ा ही दिया है।
कुल मिलाकर प्याज के आंसू आसानी से थमने के फिलहाल कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं...आम आदमी तो एक बार को बिना प्याज के गुजारा कर भी ले लेकिन प्याज खरीदने की हैसियत रखने वाले सत्तारूढ़ दल के नेताओं को जनता का ये दुख देखा नहीं जा रहा है क्योंकि उन्हें डर है कि प्याज के आसूं रो रही जनता कहीं चुनाव में इनको न रुला दे..!

deepaktiwari555@gmial.com

हिंदुत्व कभी क्रूर नहीं रहा

हिंदुत्व कभी कट्टरपंथी और क्रूर नहीं रहा है और इसका साक्षी हजारों साल पुराना इतिहास
है और वर्तमान समय भी।

यदि हिंदुत्व क्रूर या कट्टर होता तो विभिन्नं संस्कृतियाँ यहाँ ना तो पनप सकती थी और
ना पोषित हो सकती थी।हमारे वेद, जो प्राचीन ग्रन्थ हैं उनसे विश्व बंधुत्व का सन्देश निकला।
यह वेदों की सोच है जो यह मानती है कि सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो।

        हिंदुत्व ने आज तक किसी देश को क्षति नहीं पहुंचाई ,विश्व के किसी भी देश को ना लूटा
और ना ही आक्रमण किया।रामायण काल में श्री राम ने लोक व्यवस्था को मजबूती दी,
आततायी चाहे भारत का रहा हो या भारत के बाहर का उसे खत्म किया।श्री राम ने बाली के
अधार्मिक शासन को खत्म किया और सुशासन की स्थापना के लिए उन्ही लोगो को शासन
की बागडोर सौंप दी जो उसके उत्तराधिकारी थे,उन्होंने उस शासन को अपने अधीन नहीं किया।
रावण के आतंक को खत्म किया ,वहां सुशासन की स्थापना की मगर उस देश को स्वतंत्र
रखा। क्या श्री राम जीते हुए देश पर अपना शासन नहीं रख सकते थे ? हिंदुत्व की सोच क्रूरता
की नहीं थी ,राम ने उस समय ना तो लंका को लूटा ना ही अपना प्रभुत्व जमाया।क्या इसे
इतिहास विश्व बंधुत्व के सन्देश से परे देखता है ?

     स्वामी विवेकानंद ने कहा था -"गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" क्यों कहा होगा उस वेद वेदान्त के
मर्मज्ञ ने ऐसा ?क्यों शिकागो सम्मलेन में हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ आँका गया ?क्या कट्टरवाद के
कारण ?  नहीं ,हिंदुत्व के मानव धर्म के कारण ऐसा संभव हुआ था।

  महात्मा गांधी ने कहा -मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है। क्या गांधी को फासिस्ट मान लिया
जाए ,शायद नहीं ,क्योंकि गांधी के हिंदुत्व में भाईचारा झलकता था।

  आरएसएस या विहिप जब यह उदघोष करती है कि हमें हिन्दुत्व पर गर्व है तो आज उन्हें
तथाकथित सभ्य लोग कट्टरपंथी कह देते हैं,क्यों ?क्या अपने धर्म पर गर्व करना कट्टरपंथ
या अन्य धर्मों पर क्रूरता करना है ?यह हिंदुत्व ही है जो इतना विशाल ह्रदय लेकर चलता है,
जिस तरह विभिन्न दिशाओं से बहने वाली नदियाँ समुद्र में आकर समा जाती है और एक रस
हो जाती है उसी तरह हिंदुत्व के कारण भारत में सभी धर्म पोषित हो रहे हैं।

  हिंदुत्व को देश की स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा कट्टरपंथी मान्यता वाला शब्द माना गया
तो उसके पीछे दुसरे धर्मों के लोगों से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं,क्योंकि हमारे में निम्न कोटि
की सोच के लोग पनप गए हैं जो अपना घर जला कर खुद तमाशा दिखा रहे हैं।सत्ता का नशा
भी निम्न कोटि की सोच के लोगों को लग गया है ,दूसरों के सामने खुद को गाली और खुद को
तमाचा मार के भी लोग सत्ता पाना चाहते हैं ,और इसी दिवालियापन के कारण विश्व भ्रम में
पड़ गया है। आज एक हिन्दू दुसरे हिन्दू को सार्वजनिक रूप से साम्प्रदायिक कह देता है और
उसका समर्थन भी सत्ता लोभी दूसरा हिन्दू कर देता है।आज सत्ता को टिकाये रखने के लिए या
फिर से सत्ता पाने के लिए एक हिन्दू  दुसरे हिन्दू को ही आतंकी बता देता है,तथाकथित सभ्य
हिन्दू भगवा में आतंक देखने की बात फैलाते हैं जब की वो जानते हैं कि वो सच नहीं झूठ कह
रहे हैं,फिर भी इसलिए कह रहे हैं ताकि सत्ता का सुख भोग सकें।सिर्फ सत्ता पाने के लिए हिंदुत्व
को संकीर्ण बताने वाले लोग ना तो खुद का भला कर पायेंगे और ना ही सभी धर्मों का।

      एक हिन्दू खुद को सभी धर्मों को समान भाव से देखने वाला मानता है और दुसरे हिन्दू
को देख कर यह कहता है कि यह फासिस्ट है तो दुनियाँ किसे सही और किसे गलत मानेगी ?
क्या दुसरे मजहब के लोग फिर ये धारणा नहीं बना लेंगे कि हिंदुत्व कट्टरवाद का पोषक है।

     राजनीती के कुछ सिद्धांत होते हैं मगर  मजहबों में वैमनस्य फैलाना और सत्ता की
रोटी सेकना अधम नीति है।सभी धर्मों के लोगों को अपने धर्म पर गर्व होना चाहिए।किसी
धर्मावलम्बी को अपने धर्म पर गर्व तभी होता है जब उस धर्म में गर्व करने योग्य महान गुण
हो।

   हमें अपने "हिंदुत्व पर गर्व है क्योंकि हमारा हिंदुत्व विश्व बंधुत्व की प्रेरणा देता है।"      

1.2.13

गणतंत्र के लड्डू से गण - गण को लड्डूओं की ओर !


गणतंत्र के  लड्डू से गण - गण को लड्डूओं की ओर !
जौनपुर, 26 जनवरी 2013

विगत 65 वर्षों की तरह ही आज सुबह सवेरे भी " ए मेरे वतन के लोगों .. याद करो कुर्बानी " मार्का गीतों के स्वर कान में पड़े । पर आज के परिवेश में यह एक रस्म अदायगी मात्र ही लगती है ।

महारानी का राज्य समाप्त होने के बाद एवं आजा़द भारत के अपने सविंधान लागू होने के 65 वर्षों बाद भी हम आजादी और उसके मायनो का वही रिकार्ड बजा रहे हैं जो शायद 1950 या 1960 के दशक में बज रहा था । राष्ट्रीय ध्वज को सलामी के समय मेरे मन में जो विचार आये वो काफी अलग थे । यहां आप से साझा कर रहा हूँ ।  जन - गण के लिये आजादी और स्वराज की जो परिभाषा 1947 में गढ़ी गयी थी वो उसे आज भी रटाई जा रही है । देश की बहुधा आबादी के लिये आजादी की सीमा आज भी, देश की राजनैतिक आजादी पर आकर रुक जाती है । परन्तु, देश पर न्योछावर होने की शिक्षा देते समय यह कभी भी नहीं सोचा जाता कि जब तक प्रत्येक व्यक्ति  के स्तर पर आजादी नहीं पहुँचती, तब तक देश की आजादी का जश्न केवल केवल रस्मी तौर पर ही मनाया जाता रहेगा ।

सही मायनों में प्रत्येक व्यक्ति की आर्थिक अजादी  के बिना राजनैतिक आजादी का जश्न बेमानी होगा । आजाद भारत को विरासत में मिली सोंच के अनुसार आर्थिक आजादी के लिये आय के परम्परागत साधन के रूप में,  सेवा (नौकरी) का बड़ा योगदान रहा है । सेवा  अगर सरकारी हो तो उसे सोने पर सुहागा माना जाता रहा है ।
1990 के दशक में शुरू हुये आर्थिक सुधारों से इस ट्रेंड में कुछ बदलाव आया । परन्तु सरकारी मशीनरी की सोंच और गुलाम मानसिकता के चलते व्यक्तिगत सम्पदा अभी भी सरकारों और इनके खेवनहारों की वक्रदृष्टि के निशाने पर हैं ।

इस मानसिकता के कुछ ताजा उदाहरण देखिये ।

पूर्व वित्त मन्त्री एवं मौजूदा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने वोडाफोन पर उसके अधिग्रहण सौदे हुये पूंजीगत लाभ पर पिछली तारीखों से कर लगाने कि जिद पकड़ी तो देश के कारोबारी घरानों का भारत में नियमन के स्थायित्व पर शक का माहौल बना । साथ ही अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की कारोबारी मंशा पर सवालिया निशान लगे । पूरे प्रकरण से भारत की सरकारों की व्यवसाय के प्रति नजरिये पर जो माहौल बना उसे, विदेश में रहने वाले एक रिश्तेदार ने इन शब्दों में बयान किया । Indians don't have respect for contractual obligations. यानि भारतियों में अनुबन्धात्मक दायित्वों के प्रति सम्मान नहीं है ।

अब मौजूदा वित्त मंत्री पी. चिदाम्बरम अमीरों पर अधिक कर लगाने की वकालत कर रहे हैं  । देश में अजादी के बाद से ही समाजवाद  की घुट्टी पिलायी जाती रही । स्वतंत्रता प्राप्ति काल के नीति नियन्ताओं की उस समय के महाशक्ति रूस से निकटता के कारण हमारी आर्थिक नीतियों में साम्यवाद की झलक भी देखी जा सकती है । साम्यवाद, राज्य को सर्व-शक्तिमान मान कर उसके सभी क्रिया कलापों को सर आखों बिठाने की अवधारण भी है । इस अवधारणा के चलते उद्योगों एवं व्यापार को हमेशा से कड़े सरकारी निगरानी में रखा गया ।  सरकारी मशीनरी और नियामक प्राधिकारियों पर यह विचार आज भी हावी रहता है कि वह जो करेंगे, सब सही होगा और उद्योगों को छूट देने से देश का अहित ही होगा ।

उदारीकरण की बयार ने थोड़ा सा, परन्तु नकाफी स बदलाव लाया है ।

देश की आज की आवश्यकता में सबसे ऊपर अद्यमिता का स्थान है । इसे आजादी और गणतंत्र की नई परिभाषा में शामिल कर बड़े दायरे में समझने की जरूरत है । मौजूदा दौर में जब सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार घटती जा रही है और निजी क्षेत्र में नौकरी प्राप्त करने के लिये आवश्यक क्षमता एवं शैक्षणिक दक्षता देश की बहुधा आबादी के पास अभी भी नहीं है । तो उद्यमिता एक सशक्त माध्यम हो सकता है ।

परन्तु सरकारी महकमों के कार्य करने के तरीके और उसके पीछे की मानसिकता से उद्यमिता पनपने की उम्मीद तक दम तोड़ती नजर आ रही है ।

जितना खतरा देश को एफ.डी.आई. (FDI)  से नहीं है उससे ज्यादा नुकसान व्यवसाय से जुड़े सरकारी प्रवर्तन महकमों के DDI (Domestic Direct Invasion) है । जिसके चलते इन महकमों को व्यापार के कामों में अनावश्यक दखलंदाजी करने का मौका मिलता है । यह दखलन्दाजी व्यवसाय की जमीनी और वास्तविक सच्चाईयों को बिल्कुल नजरंदाज़ करती है ।

छोटे से लेकर मंझोले और बड़े व्यवसाय तक - सभी इससे पीड़ित हैं । रतन टाटा सरीखे नामचीन व्यवसायियों ने मंच से कई बार इस बात को उद्धवरित किया कि व्यवसायिक कार्यों के चलते उनसे कई बार रिश्वत की मांग की गयी है । युवा को अगर उद्यमिता की ओर अग्रसर करना हो तो सरकारी व्यवस्था को व्यवसाय एवं व्यवसायी के प्रति अपना नजरिया बदलने की जरूरत है ।

वित्त मंत्री के साथ - साथ देश को भी यह समझना होगा कि कोई भी व्यक्ति, व्यक्तिगत लाभ के लिये अधिक प्रयास करता है । इस पर अमीरों पर उनके अधिक टैक्स लगाने के प्रस्ताव से कारोबारी माहौल कमजोर होगा । इन्ही सब खबरों के बीच अर्थव्यवस्था में काले धन को बाहर लाने के लिये सरकार के द्वारा पुन: कोई योजना लाने की तैयारी बजट 2013 में की जा रही है । काले धन को देश की मुख्य धारा में लानें की यह पहली कोशिश नहीं है । अन्तिम बार ऐसी योजना Voluntary Disclosure of Income Scheme, 1997 में आयी थी । इस योजना में जिन लोगों ने काले धन का स्वत: प्रकटीकरण किया उन्हे बाद में आयकर विभाग द्वारा नोटिस एवं स्पष्टीकरण आदि से परेशान किया गया । ऐसी किसी भी योजना पर समय से अपना कर आदि अदा करने वाले करदाता सवाल उठाते हुये आलोचना करते हैं कि ऐसी योजना से कर अपवंचन करने वालों को शय मिलती है और यह कर कानूनों का पालन न करने वलों के लिये एक प्रोत्साहन योजना की तरह काम करती है ।                                            आवश्यकता है कि टैक्स अदा करने वाले लोगों की संख्या में इजाफा हो, न की मौजूदा समय में टैक्स अदा करने वालों पर जबरिया अधिक टैक्स लादा जाये ।  ज्यादा टैक्स से छुपाने के लिये किये गये लेन-देनों से ही काले धन का निर्माण होता है । आवश्यकता है एक ऐसे माहौल की जिसमें जनता को किसी प्रकार के व्यक्तिगत और कारोबारी सौदों को छिपाने की जरूरत न पड़े ।

तभी लड्डू सिर्फ गण-दिवस पर नहीं पर वर्ष के हर दिन और गण-गण को मिल सकेंगे । मेरे विचार में यह आज के भारत के जन-गण के मन की आवाज है । शायद आज से पचास साल बाद गाने के बोल कुछ इस प्रकार से हों :

ऐ मेरे वतन के लोगों
जरा आंख में भर लो पानी
जो आर्थिक आजादी के लिये शहीद हुये हैं
उनकी याद करो कुर्बानी !!

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गुस्ताखी माफ़ !
(मौजूदा दौर में एक हास्यास्पद बात यह दिखती है की कई बार जो लोग इस प्रकार के गीतों के रिकार्ड बजाने में बहुत आगे रहते हैं उनकीअपनी जिंदगी इस गीत से दूर - दूर तक कहीं भी सुर  - ताल मिलाती नहीं दिखती । और इसे कोई व्यक्तिगत टिप्पणी न माना जाये ।)

‘विश्‍वरूप’ रिलीज हुई, लोगों ने सराहा


नई दिल्ली (श्रवण शुक्ल): अभिनेता कमल हासन की फिल्‍म `विश्‍वरुपम` का हिंदी संस्करण ‘विश्वरूप’ आज दिल्‍ली, लखनऊ, नॉएडा समेत उत्‍तर भारत के सभी शहरों में रिलीज हो गई। फिल्म देखने के बाद सभी लोगों ने कलम हासन के साहस की तारीफ़ की है।

आज थोड़े अफरा तफरी के माहौल के बाद यूपी में भी फिल्म रिलीज हो गई। हालांकि सिनेमाघरों तक प्रिंट के समय पर न पहुंचने की वजह से लखनऊ में सुबह के शो कैंसिल कर दिए गए, लेकिन इसमें प्रतिबन्ध जैसी कोई बात नहीं थी। उधर नॉएडा के सिनेमाघरों में आज सुबह से ही काफी चहल पहल दर्ज की गई।

‘फिल्म अलकायदा और तालिबान की
पृष्ठिभूमि में बनी है, इस फिल्म को
लेकर भारतीय मुस्लिमों का
हाय-तौबा मचाना समझ से
परे है’: राहुल पल्हानिया
लोगों ने फिल्म की तारीफ करते हुए बताया कि फिल्म से आपको तालिबानी और अलकायदा आतंकियों की वास्तविकता को जानने का मौका मिलता है। ऐसी फिल्म बनाने के लिए कमल हासन के साहस को मानना पड़ेगा कि उन्होंने इस फिल्म के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया।

नॉएडा के एक सिनेमाघर में फिल्म देखने पहुंचे एक युवा ने बातचीत में कहा कि हमने सुबह का शो देखने का फैसला किया, क्योंकि हम उत्तर-प्रदेश सरकार के बयान के बाद से असमंजस में थे कि कहीं फिल्म को प्रतिबंधित न कर दिया जाए।

फिल्म देखने के बाद बाहर निकले राहुल पल्हानिया नाम के युवक ने कहा, ‘फिल्म बहुत साफ़ सुथरी है, इसमें ऐसा कुछ भी नहीं, जिसमें किसी को भी आपत्ति हो’। युवक ने आगे जोड़ा, ‘फिल्म अलकायदा और तालिबान की पृष्ठिभूमि में बनी है, इस फिल्म को लेकर भारतीय मुस्लिमों का हाय-तौबा मचाना समझ से परे है’। ऐसे ही कुछ विचार फिल्म देखकर निकले मुस्लिम युवक उस्मान ने व्यक्त किए।

उस्मान ने कहा, ‘फिल्म वास्तविकता को दर्शाती है, मुझे जहां तक लगता है कि अबतक मेरे द्वारा देखी गई आतंक पर आधारिक बेहतरीन फिल्म है। इस फिल्म को देखने के बाद मुझे उन लोगों पर दया आ रही है जो बिना फिल्म देखे ही विरोध कर रहे हैं। ऐसी फ़िल्में बननी चाहिए’। फिल्म देखकर निकले उस्मान के चेहरे पर काफी सुकून नजर आया, क्योंकि फिल्म देखने पहले उन्हें काफी निगेटिव रिव्यूज मिले थे।

वहीं फिल्म देखकर निकलती ज्योति नाम की युवती ने फिल्म के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि फिल्म में तालिबानी और अलकायदा सदस्यों द्वारा महिलाओं पर अत्याचार को भी अहम् जगह दी गई है। यह फिल्म न सिर्फ आतंक पर आधारित है बल्कि इस फिल्म में तालिबानी शासन के दौरान महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर भी रोशनी डाली गई है।

आज फिल्म के रिलीज होने के बाद लगभग सभी सिनेमाघरों के बाहर और अन्दर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। इस बीच, कहीं से भी किसी भी प्रकार की कोई अप्रिय घटना की जानकारी नहीं है।

भ्रष्टाचार जिंदाबाद !


केन्द्रीय कैबिनेट ने संशोधित लोकपाल पर मुहर क्या लगाई...एक बार फिर से लोकपाल पर तकरार शुरु हो गई है। सरकार कह रही है कि ये एक सशक्त लोकपाल है और इससे भ्रष्टाचार पर लगाम कसेगी लेकिन लोकपाल को लेकर सरकार की नाक में दम करने वाले समाजसेवी अन्ना हजारे कहते हैं कि ये लोकपाल प्रभावी नहीं है।
अन्ना ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर वादे से मुकरने का आरोप लगाते हुए कहा कि पीएम ने उन्हें चिट्ठी लिखकर सीबीआई को लोकपाल के दायरे में रखने के साथ ही मजबूत लोकपाल लाने का वादा किया था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सीबीआई को लोकपाल के दायरे में न रखने पर अन्ना कहते हैं कि सीबीआई को लोकपाल के दायरे में होना बहुत जरूरी है...इसके बिना लोकपाल का कोई मतलब नहीं है।
यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी भ्रष्टाचार को कैंसर तो बताती हैं...प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार पर चिंता तो जताते हैं लेकिन भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए प्रभावी लोकपाल लाने की जब बारी आती है तो ये लोग कदम पीछे खींच लेते हैं।
जाहिर है इनकी कथनी और करनी में बड़ा फर्क है...शायद इसलिए ही सरकार सीबीआई और सीवीसी को लोकपाल के दायरे में नहीं लाना चाहती है..!
माना सिर्फ लोकपाल से भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म नहीं होगा लेकिन भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए लोकपाल एक शुरुआत तो हो सकता है लेकिन अफसोस सरकार ये शुरुआत करना ही नहीं चाहती..!
शुरुआत हो भी कैसे जब सरकार में शामिल एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप हों तो क्यों कोई सरकार ऐसा कानून लाना चाहेगी जो भविष्य में उसके मंत्रियों के गले की ही फांस बन सकता है..!
सरकार की मंशा अगर सशक्त लोकपाल लाने की होती जैसा अन्ना हजारे मांग कर रहे हैं तो क्या लोकपाल पर इतनी तकरार होती..?
क्या अब तक लोकपाल बिल पास नहीं हो गया होता..?
जाहिर है लोकपाल की राह में सबसे बड़ा रोड़ा सरकार ही है..! सरकार नहीं चाहती कि एक सशक्त लोकपाल आए..!
हो सकता है कि बजट सत्र में संशोधित लोकपाल बिल पास भी हो जाए क्योंकि संसद में सशक्त लोकपाल के समर्थन में आवाज उठाने वाला कोई नहीं है क्योंकि विपक्ष में बैठे लोग ये जानते हैं कि कभी न कभी वे भी सत्ता में आएंगे ऐसे में सशक्त लोकपाल एक दिन उनके गले की फांस भी बन सकता है..! तो क्यों वो इसके पक्ष में आवाज बुलंद करेंगे..?
बहरहाल लोकपाल को लेकर तकरार शुरु हो गई है...सरकार बजट सत्र में राज्यसभा में लोकपाल लाने की तैयारी कर रही है तो अन्ना हजारे ने मजबूत लोकपाल के लिए देशभर में घूम घूमकर एक बार फिर से बड़ा जनांदोलन करने की बात कही है...जो साफ ईशारा कर रहा है कि लोकपाल पर छाया कुहासा फिलहाल तो जल्द छंटने के कोई आसार नहीं हैयानि कि भ्रष्टाचार जिंदाबाद!!

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ये है विश्वरूपम पर बैन की असली वजह !


विश्वरूपम के रिलीज पर बैन से दुखी कमल हासन ने जब राजनीति का शिकार होने की बात कहते हुए देश छोड़ने की धमकी दी थी तो दुख हुआ लेकिन एक सवाल जेहन में कौंधा कि आखिर एक अभिनेता राजनीति मे कैसे फंस सकता है..? क्या वाकई में इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक खेल हो जो कुछ मुस्लिम संगठनों का आगे कर खेला जा रहा है..?
बीबीसी के मुताबिक कमल हासन की इस फिल्म के सैटेलाइट राइट्स का समझौता जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके से ताल्लुक रहने वाले जया टीवी से हो चुका था लेकिन जैसे ही कमल हासन ने इस फिल्म को डीटीएच पर रिलीज करने का ऐलान किया जया टीवी ने सैटेलाइट टीवी के अधिकार खरीदने से इंकार कर दिया। जया टीवी के इंकार के बाद कमल हासन ने फिल्म के सारे अधिकार स्टार विजय को बेच दिए। ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि कहीं कमल हासन जया टीवी से बगावत की सजा तो नहीं झेल रहे हैं..?
इसके साथ ही डीटीएच पर फिल्म को रिलीज करने के कमल हासन के ऐलान ने थिएटर मालिकों के कान भी खड़े कर दिए। उन्हें आशंका होने लगी कि कमल हासन की शुरु की जा रही ये परंपरा कहीं उनके धंधे को चौपट न कर दे ऐसे में थिएटर मालिक भी कमल हासन के खिलाफ हो गए। यहां ये सवाल उठता है कि कहीं थिएटर मालिकों की राजनीतिक पहुंच भी तो कहीं विश्वरुपम की राह का रोड़ा तो नहीं बनी..?
कमल हासन ने एक कार्यक्रम में न सिर्फ करूणानिधि की तारीफ की बल्कि विदेश मंत्री पी चिदंबरम की तरफ ईशारा करते हुए वे किसी धोती वाले को देश का प्रधानमंत्री देखने की बात कह बैठे। करूणानिधि और चिदंबरम से जयललिता के रिश्ते जगजाहिर है ऐसे में जाहिर है करूणानिधि और जयललिता की तारीफ करना जयललिता को नागवार तो गुजरा ही होगा। ऐसे में एक सवाल यहां भी उठता है कि क्या कमल हासन की फिल्म को बैन कर जयललिता ने कमल हासन को सबक सिखाया है..?
धुंआ उठा है तो जाहिर है कि आग कहीं न कहीं जरूर लगी होगी फिर चाहे ये कमल हासन की जया टीवी से बगावत की आग का बदला हो..! जयललिता के धुर विरोधी करूणानिधि और चिदंबरम की तारीफ करने पर लगी आग हो या फिर थिएटर मालिकों के संभावित नुकसान की आग हो..!
अगर धुंआ इन तीनों में से किसी आग का है तो आग ने बकौल फिल्म निर्माता कमल हासन रिलीज न होने से उन्हें करीब 40 से 50 करोड़ का फटका लगाकर बुरी तरह झुलसा तो दिया ही है..!
राजनीति में कुछ भी संभव है बस आपको सही समय पर अचूक चाल चलनी आनी चाहिए। अगर वाकई में कमल हासन और जयललिता के बीच अनबन की खबरें सही हैं तो फिर इसमें कोई शक नहीं कि आतंकवाद जैसे मसले पर आधारित फिल्म पर जयललिता ने मुस्लिम संगठनों को आगे कर अपनी चाल चल दी और कमल हासन को चारों खाने चित कर दिया..!
इस मसले पर एक हफ्ते बाद मीडिया के सामने आई जयललिता ने भले ही कमल हासन से कोई दुश्मनी होने या किसी कारोबारी वजह से फिल्म रिलीज पर बैन लगाने की बात से इंकार करते हुए 24 मुस्लिम संगठनों की आपत्ति और कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए अपनी सफाई पेश की हो। साथ ही फिल्म में कांट छांट के बाद फिल्म रिलीज में कोई आपत्ति न होने की बात कही हो। लेकिन एक हफ्ते तक फिल्म को रिलीज न होने देकर जयललिता ने इस फिल्म में अपना सब कुछ दांव पर लगा कर बैठे कमल हासन की न सिर्फ नींद हराम कर दी बल्कि 40-50 करोड़ का फटका भी लगा दिया और इसके बाद कमल हासन को फिल्म में कांट छांट की सलाह देकर समझौते का रास्ता भी दिखा दिया..!
ये आशंकाए इसलिए भी बलवती होती हैं क्योंकि फिल्म रिलीज के एक दिन पहले रिलीज पर 15 दिन का बैन राज्य सरकार ने लगाया जबकि सेंसर बोर्ड फिल्म को पास कर चुका था..!
बैन के खिलाफ कमल हासन जब हाईकोर्ट पहुंचे तो कोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले को गलत ठहराते हुए कमल हासन को राहत देते हुए फिल्म पर लगा बैन हटा लिया। लेकिन सरकार तो मानो फिल्म की रिलीज रुकवाने में तुली थी..! सरकार ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट की डबल बैंच में अपील कर दी...जिसने सिंगल बैंच के फैसले को पलटते हुए फिल्म की रिलीज पर फिर से बैन लगा दिया।
बहरहाल सच्चाई भले जो भी हो देर सबेर सामने आ ही जाएगी फिलहाल तो आज विश्वरूप नाम से हिंदी में रिलीज होने जा रही कमाल हासन की विश्वरूपम के लिए हम कमल हासन को शुभकामनाएं ही दे सकते हैं कि देश के बाकी हिस्सों में विश्वरूपविवादरूप न बने और ये फिल्म सुपर हिट हो।

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