5.2.13
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ASHUTOSH VERMA
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4.2.13
यकीन नहीं होता- इस्लाम ऐसी शिक्षा देता है !
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कौन अन्ना..कैसा आंदोलन ?
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क्यों फ्लॉप हुई टीम अन्ना की पटना रैली?-ब्रज की दुनिया
मित्रों, प्रश्न उठता है कि जब अपनी टीम में ही अन्ना हजारे अपने उद्देश्यों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध कुछ दर्जन लोगों को शामिल नहीं कर पा रहे हैं तो फिर इस बात की क्या गारंटी है कि उनकी रैली या आन्दोलन में जमा होनेवाले लोग उनके पवित्र उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध ही होंगे? मैं पहले भी अपने पूर्व के आलेखों में निवेदन कर चुका हूँ कि अन्ना को अपनी टीम के लिए कुछ दर्जन पूर्ण प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं का नहीं मिल पाना अन्ना की समस्या नहीं है बल्कि वर्तमान युग की समस्या है। कदाचित् आज के भारत में अगर गांधी खुद फिर से आ जाएँ तो उनको भी इस तरह की समस्याओं से जूझना ही पड़ेगा। देश का पढ़ा-लिखा तबका विभिन्न मुद्दों पर इस कदर मतभिन्नता और स्वार्थपरकता का शिकार है कि उनको एक मंच पर लाना मेंढ़क को तराजू पर तौलने की तरह मुश्किल है और रहेगा। साथ ही जिस तरह अरविन्द केजरीवाल आदि ने अन्ना के साथ धोखा किया उससे जनता इस बात को लेकर आश्वस्त भी नहीं हो पा रही है कि टीम अन्ना में आगे टूट नहीं होगी या उनके आंदोलन को वैसी सफलता फिर से मिल सकेगी जैसी कि पिछले दो सालों में मिलती रही है। इन परिस्थितियों में अन्ना को अगर फिर से जनता का विश्वास जीतना है तो पहले तो उनको अपनी टीम में ऐसे लोगों को ही शामिल करना होगा जो उनके परम-पावन उद्देश्यों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध हों,अटूट निष्ठा रखते हों। यह कतई आवश्यक नहीं कि टीम में कोई प्रसिद्ध व्यक्तित्व उपस्थित रहे ही। बल्कि सेलिब्रिटी को टीम में शामिल करने के अपने खतरे हैं जैसा कि पहले अरविन्द केजरीवाल के मामले में देखा गया और अब किरण बेदी के समझौतावादी बयान के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। बल्कि टीम अन्ना में आने पर कोई भी अनजाना व्यक्ति भी जल्दी ही प्रसिद्ध हो जाएगा इसमें संदेह नहीं। मैं एक और उस गलती की ओर अन्ना जी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जो उन्होंने पटना में की और वह गलती यह थी कि उन्होंने वर्तमान बिहार में व्याप्त भ्रष्टाचार को पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया। मैं नहीं समझता कि नीतीश राज में लालू-राबड़ी के समय से भ्रष्टाचार में किसी तरह की कमी आई है बल्कि इसमें मात्रात्मक और गुणात्मक वृद्धि ही हुई है। इतना जरूर हुआ है कि इसका विकेंद्रीकरण हो गया है। अन्ना को अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की भावना देश में उत्पन्न करनी है तो उनको भविष्य में भ्रष्टाचार को खाँचे में बाँटने की गलती नहीं करनी होगी। मैं नहीं मानता और देश की जनता भी नहीं मानती है कि भ्रष्टाचार की कोई पार्टी होती है,कोई जाति होती है या कोई धर्म होता है। अन्ना जी भ्रष्टाचार सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार होता है चाहे उसको करनेवाला कलमाडी हो,पवार हो,लालू हो,मुलायम हो,राजा हो,माया हो,मोदी हो या नीतीश हो। माना कि नीतीश जी पर व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार के आरोप आजतक नहीं लगे हैं लेकिन उनके शासन-तंत्र में व्याप्त अराजकतापूर्ण भ्रष्टाचार अगर दिन-प्रतिदिन सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता जा रहा है तो इसके लिए वही जिम्मेदार हैं और होंगे। माना कि रैली के सफल और सरल आयोजन के लिए नीतीश का समर्थन प्राप्त करना जरूरी था लेकिन रैली तो बिना सरकारी अनुमति के भी उसी तरह आयोजित हो सकती थी जिस तरह अन्ना जी पूर्व में दिल्ली में आयोजित कर चुके हैं। मैं समझता हूँ तब रैली में ज्यादा लोग जमा होते और तब रैली निश्चित रूप से संख्यात्मक दृष्टि से भी सफल होती।
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ब्रजकिशोर सिंह
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धर्म विहीन होने से
धर्म विहीन होने से , चलिए मान लेते हैं , हम अनैतिक हो जायेंगे | लेकिन यह भी तो देखें कि आज ही नैतिकता कितने पानी में है ? फिर इतने सारे भगवानों और धर्मो का अतिरिक्त बोझ क्यों ढोयें ? सीधे सीधे नैतिक या अनैतिक ही न हो लें ?
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Ugra Nagrik
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तुम अब नहीं हो। कटे पड़े हो । विकास की आरियाँ चली हैं तुम पर । जब भी विकास की आरियाँ चलती हैं तो पहला प्रहार तुम्हीं पर होता है । समझ नहीं आता कि तुम बीच में आते ही क्यों हो ? तुम्हें विकास की रथ यात्रा में आड़े नहीं आना चाहिए । क्या तुम नहीं जानते ? देश में विकास की बहार है । विकासवाद अब हमारी सरकारों का प्रथम मापदंड हो गया है और तुम हो कि राह में बाधा बन खड़े हुए हो । वर्षों से । जब मैं छोटा था । पांच सात साल का । तब तुम भी इतने बड़े नहीं थे । तुम पर इमलियाँ लटकी रहती थी । मैं और मेरे साथ के बच्चे बार बार पत्थर मारकर तुमसे इमलियाँ तोड़ने की कोशिश करते और इमलियाँ थीं कि टूटने को नहीं आतीं । हमें तब लगता , तुम इतने बड़े क्यों हो । थोडा छोटे होते तो हम इमली तोड़ लेते । कभी किसी कौवे ने घड़े में कंकन डालकर पानी पीया था लेकिनहमें तो पत्थर चाहिए होते थे तुम्हें मारने के लिए । तुमसे इमलियाँ तोड़ने में पत्थरों ने हमारी बहुत मदद की है । देखा ? हमारी ताकत । अब तुम कटे पड़े हो । मूक । बोल भी नहीं सकते । शास्त्र कहते हैं । तुम बोल सकते हो । बोलो । बोल भी रहे होगे तो मैं कोई पेड़ थोड़े ही हूँ जो तुम्हारी बात सुन लूँगा । तुम्हारी जगह अब पत्थर बिछा दिए जायेंगे । वही पत्थर जिन्होंने तुमसे इमलियाँ तोड़ने में हमारी बहुत मदद की थी । संवेदना होने और न होने में यही फर्क है । तुममे संवेदना थी इसलिए तुम काट दिए गए । पत्थर असंवेदनशील है इसलिए चोट भी करते हैं और आसानी से कटते भी नहीं । वे बिछे रहेंगे । सड़कों के नीचे । उन पर दौड़ेगी सरपट से गाड़ियाँ । सोचो । क्या तुम्हारे रास्ते में होते गाड़ियां दौड़ पाती । नहीं न । तुम तो राह में बाधा बन खड़े थे । अब गलती मत करना । आदमी के रास्ते में मत आना । तुम देते भी क्या थे । ओक्सिजन । अरे , उसके तो अब सिलेंडर हैं हमारे पास ।अब तुम्हारे उस हिस्से पर सरपट दौड़ती गाड़ियां धुंआ छोड़ेंगी ।
क्या तुम खुश हो ? कटकर भी ? कि तुम्हे वह धुआँ अब नहीं सहन करना पड़ेगा । उस धुएं के खिलाफ अब तुम्हारी जंग शायद अब समाप्त हो चुकी है ? शायद , लेकिन तुम अमर हो गए हो । हाँ , तुम मेरी स्मृतियों में तो अमर हो ही गए हो । यदि मैं मर गया तो मैं अपने मरने से पहले तुम्हें इन्टरनेट पर टांग दूंगा । गूगल पर टांग दूंगा । कोई तुम्हे गूगल से हटाएगा भी तो internate पर तुम हमेशा के लिए अमर अमिट हो जाओगे । पेड़ हुए होना क्या कुछ होना नहीं होता । क्या मरा हाथी सवा लाख का नहीं होता ? क्या अब तुम्हारा बाज़ार भाव नहीं है । है । अब तुम कितने ही घरों में पहुँच जाओगे । दुखी मत होना ।
एक बात कहूं । तुम बहुत लम्बे हो गए थे । क्या तुम्हे अहंकार हो गया था । शायद । तुम्हारी इमलियाँ कब लगती और ख़त्म हो जाती यह पता ही नहीं चल पाता था । या पता नहीं लगती भी थी या नहीं , क्या तुम नहीं जानते कि जिनसे मनुष्य का स्वार्थ नहीं साधता वे सब मनुष्य के लिए महत्व हीन हो जाती हैं ? क्या तुमने बूढ़े माँ बाप की हालत नहीं देखी है ? तो फिर , तुम तो संवेदन शील हो , तुम्हे समझना चाहिए । जब कभी जाम लगता तो तुम्हारी वजह से सड़कें चौड़ी नहीं हो पाती थी । तुम्हारे नीचे वह छोले कुलचे वाला अब नहीं दिखेगा जिसके पास आकर लोग तुम्हारी छाँव में अपने भूख मिटाते थे । वह चला गया है । एक और वहां अब भी खड़ा है । दाल चावल लिए । वह भी चला जाएगा । विकास की इस यात्रा में जब भी तुम कटते हो तो कितनों को अपने रोजगार की तलाश में नयी छतें तलाशनी पड़ती हैं । विकास की यह यात्रा वैसे भी उन अमीरों के लिए है जिनकी सरपट दौड़ती गाड़ियों से अक्सर जाम लगते हैं और फिर सड़के चौड़ी होती हैं । तुम कटते हो उनके लिए जिनके रईसजादे अक्सर कभी तुम पर अपनी गाड़ियां थोक देते थे पर वे तुम्हें नहीं गिरा पाए । लेकिन देखो , पैसा ही खर्च हो रहा है और उस पैसे की ही बदौलत तुम गिरा दिए गए हो ।
तुम्हे पता भी है । एक दधीची हुए हैं जिन्होंने देवताओं के लिए उनकी विजय के लिए अपनी हड्डियां तक दान कर दी थी । तुमने भी सर्वस्व दान कर दिया है । या , सॉरी , तुमसे छीन लिया गया है तुमारा सर्वस्व । लेकिन रोना नहीं । संवेदनाओं को नियंत्रण में रखना । तुम ही तो हो जिसकी संवेदनाएं अब भी नियंत्रित हैं । अपना अर्थ नहीं खोती । तुम स्थितप्रज्ञ हो । सुख दुःख में एक । मुझे तो ऐसा ही लगता है । जबरन ही सही । क्या मैं गलत हूँ ? इंसान अपनी संवेदनाओं से ऊपर उठ खडा हुआ है । या संवेदनाओं को मारकर उठ खडा हुआ है । विकास की इस यात्रा पर । तुम चिंता मत करो । तुम मेरे घर में होगे । सोफे आलमारी दरवाजे आदि के रूप में । मेरी यादों में । तुम अकेले ही नहीं कटे हो । तुम्हारे अपने बहुत से कटे हैं और बहुत सारे नए भी ईजाद कर लिए जायेंगे । तुम यादों में रहोगे । हमारे हृदय की गहराइयों में , अपनी इमलियों के साथ , जिन्हें याद करके अब भी मेरे दांत विकास की इस यात्रा में भी खट्टे हुए जा रहे हैं ।
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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तुम अब नहीं हो। कटे पड़े हो । विकास की आरियाँ चली हैं तुम पर । जब भी विकास की आरियाँ चलती हैं तो पहला प्रहार तुम्हीं पर होता है । समझ नहीं आता कि तुम बीच में आते ही क्यों हो ? तुम्हें विकास की रथ यात्रा में आड़े नहीं आना चाहिए । क्या तुम नहीं जानते ? देश में विकास की बहार है । विकासवाद अब हमारी सरकारों का प्रथम मापदंड हो गया है और तुम हो कि राह में बाधा बन खड़े हुए हो । वर्षों से । जब मैं छोटा था । पांच सात साल का । तब तुम भी इतने बड़े नहीं थे । तुम पर इमलियाँ लटकी रहती थी । मैं और मेरे साथ के बच्चे बार बार पत्थर मारकर तुमसे इमलियाँ तोड़ने की कोशिश करते और इमलियाँ थीं कि टूटने को नहीं आतीं । हमें तब लगता , तुम इतने बड़े क्यों हो । थोडा छोटे होते तो हम इमली तोड़ लेते । कभी किसी कौवे ने घड़े में कंकन डालकर पानी पीया था लेकिनहमें तो पत्थर चाहिए होते थे तुम्हें मारने के लिए । तुमसे इमलियाँ तोड़ने में पत्थरों ने हमारी बहुत मदद की है । देखा ? हमारी ताकत । अब तुम कटे पड़े हो । मूक । बोल भी नहीं सकते । शास्त्र कहते हैं । तुम बोल सकते हो । बोलो । बोल भी रहे होगे तो मैं कोई पेड़ थोड़े ही हूँ जो तुम्हारी बात सुन लूँगा । तुम्हारी जगह अब पत्थर बिछा दिए जायेंगे । वही पत्थर जिन्होंने तुमसे इमलियाँ तोड़ने में हमारी बहुत मदद की थी । संवेदना होने और न होने में यही फर्क है । तुममे संवेदना थी इसलिए तुम काट दिए गए । पत्थर असंवेदनशील है इसलिए चोट भी करते हैं और आसानी से कटते भी नहीं । वे बिछे रहेंगे । सड़कों के नीचे । उन पर दौड़ेगी सरपट से गाड़ियाँ । सोचो । क्या तुम्हारे रास्ते में होते गाड़ियां दौड़ पाती । नहीं न । तुम तो राह में बाधा बन खड़े थे । अब गलती मत करना । आदमी के रास्ते में मत आना । तुम देते भी क्या थे । ओक्सिजन । अरे , उसके तो अब सिलेंडर हैं हमारे पास ।अब तुम्हारे उस हिस्से पर सरपट दौड़ती गाड़ियां धुंआ छोड़ेंगी ।
क्या तुम खुश हो ? कटकर भी ? कि तुम्हे वह धुआँ अब नहीं सहन करना पड़ेगा । उस धुएं के खिलाफ अब तुम्हारी जंग शायद अब समाप्त हो चुकी है ? शायद , लेकिन तुम अमर हो गए हो । हाँ , तुम मेरी स्मृतियों में तो अमर हो ही गए हो । यदि मैं मर गया तो मैं अपने मरने से पहले तुम्हें इन्टरनेट पर टांग दूंगा । गूगल पर टांग दूंगा । कोई तुम्हे गूगल से हटाएगा भी तो internate पर तुम हमेशा के लिए अमर अमिट हो जाओगे । पेड़ हुए होना क्या कुछ होना नहीं होता । क्या मरा हाथी सवा लाख का नहीं होता ? क्या अब तुम्हारा बाज़ार भाव नहीं है । है । अब तुम कितने ही घरों में पहुँच जाओगे । दुखी मत होना ।
एक बात कहूं । तुम बहुत लम्बे हो गए थे । क्या तुम्हे अहंकार हो गया था । शायद । तुम्हारी इमलियाँ कब लगती और ख़त्म हो जाती यह पता ही नहीं चल पाता था । या पता नहीं लगती भी थी या नहीं , क्या तुम नहीं जानते कि महत्वहीन चीजें मनुष्य के लिए महत्व हीन हो जाती हैं ? क्या तुमने बूढ़े माँ बाप की हालत नहीं देखी है ? तो फिर , तुम तो संवेदन शील हो , तुम्हे समझना चाहिए । जब कभी जाम लगता तो तुम्हारी वजह से सड़कें चौड़ी नहीं हो पाती थी । तुम्हारे नीचे वह छोले कुलचे वाला अब नहीं दिखेगा जिसके पास आकर लोग तुम्हारी छाँव में अपने भूख मिटाते थे । वह चला गया है । और और वहां अब भी कडा है । दाल चावल लिए । वह भी चला जाएगा । विकास की इस यात्रा में जब भी तुम कटते हो तो कितनों को अपने रोजगार की तलाश में बाई छतें तलाशनी पड़ती हैं । विकास की यह यात्रा वैसे भी उन अमीरों के लिए है जिनकी सरपट दौड़ती गाड़ियों से अक्सर जाम लगते हैं और फिर सड़के चौड़ी होती हैं । तुम कटते हो उनके लिए जिनके रईसजादे अक्सर कभी तुम पर अपनी गाड़ियां थोक देते थे पर वे तुम्हें नहीं गिरा पाए । लेकिन देखो , पैसा ही खर्च हो रहा है और उस पैसे की ही बदौलत तुम गिरा दिए गए हो ।
तुम्हे पता भी है । एक दधीची हुए हैं जिन्होंने देवताओं के लिए उनकी विजय के लिए अपनी हड्डियां तक दान कर दी थी । तुमने भी सर्वस्व दान कर दिया है । या , सॉरी , तुमसे छीन लिया गया है तुमारा सर्वस्व । लेकिन रोना नहीं । संवेदनाओं को नियंत्रण में रखना । तुम ही तो हो जिसकी संवेदनाएं अब भी नियंत्रित हैं । अपना अर्थ नहीं खोती । तुम स्थितप्रज्ञ हो । सुख दुःख में एक । मुझे तो ऐसा ही लगता है । जबरन ही सही । क्या मैं गलत हूँ ? इंसान अपनी संवेदनाओं से ऊपर उठ खडा हुआ है । या संवेदनाओं को मारकर उठ खडा हुआ है । विकास की इस यात्रा पर । तुम चिंता मत करो । तुम मेरे घर में होगे । सोफे आलमारी दरवाजे आदि के रूप में । मेरी यादों में । तुम अकेले ही नहीं कटे हो । तुम्हारे अपने बहुत से कटे हैं और बहुत सारे नए भी ईजाद कर लिए जायेंगे । तुम यादों में रहोगे । हमारे हृदय की गहराइयों में , अपनी इमलियों के साथ , जिन्हें याद करके अब भी मेरे दांत विकास की इस यात्रा में भी खट्टे हुए जा रहे हैं ।
विदा !
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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3.2.13
बदलती संस्कृति
बदलती संस्कृति
मेरे देश का परिवेश बदल रहा है ,भाषा बदल रही है ,संस्कृति बदल रही है ,आधुनिकता के
तूफान में जो अच्छा था वह भी ढह ढहा कर गिर रहा है -कुछ पंक्तियों का आनन्द लीजिये,
व्यंग प्रस्तुत है -
एक ससुर ने
पढ़ी लिखी बहु से कहा-
बहु ,
मेरा पोते को कुछ संस्कार सीखा।
उसके बाल मन को,
कुछ प्रभु की ओर झुका,
उसे कुछ श्लोक,प्रार्थना सीखा।
बहु बोली -
आपकी आज्ञा का होगा पालन,
बताईये कौनसे श्लोक का है चलन।
ससुर बोला -
मेरे पोते को सबसे पहले
"त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव "सीखा
कुछ दिन बाद पोते ने
यह प्रार्थना अपने दादा को
कुछ इस तरह सुनायी-
यू आर माई मॉम
यू आर माई डेड
यू आर माई ब्रो
यू आर माई फ्रेंड
यू आर माई टीचर
यू आर माई मेम
यू आर माई ऑल
यू आर माई ऑल
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राहुल गांधी पीएम बनने लायक नहीं !
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2.2.13
वसुंधरा राजे का कोई विकल्प था भी नहीं
अपने आपको सर्वाधिक अनुशासित बता कर पार्टी विद द डिफ्रेंस का नारा बुलंद करने और व्यक्ति से बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के आगे नतमस्तक हो गया। उन्हें न केवल राजस्थान में पार्टी की कमान सौंपी गई है, अपितु आगामी विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। आगामी विधानसभा चुनाव में जीतने के लिए पार्टी के पास इसके अलावा कोई विकल्प था भी नहीं। भले ही समझौते तहत संघ लॉबी के गुलाब चंद कटारिया को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है, मगर जीतने के लिए पार्टी को वसुंधरा के चेहरे का ही इस्तेमाल करना पड़ रहा है। उनकी नियुक्ति के साथ पिछले कई दिन से उहापोह में जी रहे पार्टी कार्यकर्ता, नेता व विधानसभा चुनाव में टिकट के दावेदारों ने राहत की सांस ली है और उनके चेहरे पर खुशी छलक आई है। पार्टी की अंदरूनी कलह की वजह से मायूस हो चुके कार्यकर्ता में उत्साह का संचार हुआ है। समझा जाता है कि अब पार्टी पूरी ताकत से चुनाव मैदान में ताल ठोकेगी और उसका प्रदर्शन बेहतर होगा।
ज्ञातव्य है कि राजस्थान में पार्टी दो धड़ों में बंटी हुई है। एक बड़ा धड़ा वसुंधरा के साथ है, जिनमें कि अधिसंख्य विधायक हैं तो दूसरा धड़ा संघ पृष्ठभूमि का है, जिसमें प्रमुख रूप से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी, पूर्व मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी, गुलाब चंद कटारिया आदि शामिल हैं। आपको याद होगा कि जब पूर्व प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने घोषणा की कि राजस्थान में अगला चुनाव वसुंधरा के नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो ललित किशोर चतुर्वेदी व गुलाब चंद कटारिया ने उसे सिरे से नकार दिया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी भी इस बात से नाइत्तफाकी जाहिर करते रहे। इसके बाद जब कटारिया ने मेवाड़ में रथ यात्रा निकालने ऐलान किया तो वसुंधरा ने इसे चुनौती समझते हुए विधायक किरण माहेश्वरी के जरिए रोड़ा अटकाया। नतीजे में विवाद इतना बढ़ा कि वसुंधरा ने विधायकों के इस्तीफे एकत्रित कर हाईकमान पर भारी दबाव बनाया। हालांकि नई घोषणा से पहले तक संघ लॉबी ने पूरा दबाव बना रखा था, मगर आखिरकार कटारिया को नेता प्रतिपक्ष बनाने की एवज में वसुंधरा का नेतृत्व स्वीकार करना ही पड़ा। हालांकि यह तय है कि टिकट वितरण में वसुंधरा को पूरा फ्रीहैंड तो नहीं मिलेगा और संघ लॉबी तय समझौते के तहत अपने कोटे के टिकट हासिल कर लेगी, मगर पार्टी के जीतने पर मुख्यमंत्री तो वसुंधरा ही बनेंगी।
असल में नितिन गडकरी के अध्यक्षीय काल में ही तय था कि राजस्थान में वसुंधरा के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा, मगर राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से समीकरणों में कुछ बदलाव आया। बदलाव सिर्फ इतना कि संघ लॉबी कुछ हावी हो गई। और यही वजह रही कि आखिरी वक्त तक खींचतान मची रही। संघ लॉबी अपने गुट के कटारिया को नेता प्रतिपक्ष बनाने पर ही राजी हुई। वजह ये कि राजनाथ सिंह व वसुंधरा राजे के संबंध कुछ खास अच्छे नहीं रहे। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय होने की जिम्मेदारी लेते हुए तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर ने तो इस्तीफा दे दिया, लेकिन नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफे की बात आई तो वसुंधरा ने इससे इंकार कर दिया था। तब राजनाथ सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और उन्होंने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया था। आखिरकार वसुंधरा को पद छोडऩा पड़ा था। यह बात दीगर है कि उसके बाद तकरीबन एक साल तक यह पद खाली पड़ा रहा और उसे फिर से वसुंधरा को ही सौंपना पड़ा। आखिर तक भी वसुंधरा का अपर हैंड ही रहा और जीतने के लिए सिंह के लिए यह मजबूरी हो गई कि उन्हें वसुंधरा को ही कमान सौंपनी पड़ी।
राजस्थान में वसुंधरा राजे पार्टी से कितनी बड़ी हैं और उनका कोई विकल्प ही नहीं है, इसका अंदाजा इसी बात से हो जाता है कि हाईकमान को पूर्व में भी उन्हें विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से हटाने में एडी चोटी का जोर लगाना पड़ गया था। सच तो ये है कि उन्होंने पद छोडऩे से यह कह कर साफ इंकार कर था दिया कि जब सारे विधायक उनके साथ हैं तो उन्हें कैसे हटाया जा सकता है। हालात यहां तक आ गए थे कि उनके नई पार्टी का गठन तक की चर्चाएं होने लगीं थीं। बाद में बमुश्किल पद छोड़ा भी तो ऐसा कि उस पर करीब साल भर तक किसी को नहीं बैठाने दिया। आखिर पार्टी को मजबूर हो कर दुबारा उन्हें पद संभालने को कहना पड़ा, पर वे साफ मुकर गईं। हालांकि बाद में वे मान गईं, मगर आखिर तक यही कहती रहीं कि यदि विपक्ष का नेता बनाना ही था तो फिर हटाया क्यों? असल में उन्हें फिर बनाने की नौबत इसलिए आई कि अंकुश लगाने के जिन अरुण चतुर्वेदी को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाया गया, वे ही फिसड्डी साबित हो गए। पार्टी का एक बड़ा धड़ा अनुशासन की परवाह किए बिना वसुंधरा खेमे में ही बना रहा। वस्तुत: राजस्थान में वसु मैडम की पार्टी विधायकों पर इतनी गहरी पकड़ है कि वे न केवल संगठन के समानांतर खड़ी हैं, अपितु संगठन पर पूरी तरह से हावी हो गई हैं। उसी के दम पर राज्यसभा चुनाव में दौरान वे पार्टी की राह से अलग चलने वाले राम जेठमलानी को न केवल पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी बनवा लाईं, अपितु अपनी कूटनीतिक चालों से उन्हें जितवा भी दिया। जेठमलानी को जितवा कर लाने से ही साफ हो गया था कि प्रदेश में दिखाने भर को अरुण चतुर्वेदी के पास पार्टी की फं्रैचाइजी है, मगर असली मालिक श्रीमती वसुंधरा ही हैं। कुल मिला कर ताजा घटनाक्रम से तो यह पूरी तरह से स्थापित हो गया है के वे प्रदेश भाजपा में ऐसी क्षत्रप बन कर स्थापित हो चुकी हैं, जिसका पार्टी हाईकमान के पास कोई तोड़ नहीं है। उनकी टक्कर का एक भी ग्लेमरस नेता पार्टी में नहीं है, जो जननेता कहलाने योग्य हो। अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि आगामी विधानसभा चुनाव में केवल वे ही पार्टी की नैया पार कर सकती हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com
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तेजवानी गिरधर
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एक प्याज की ताकत
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हिंदुत्व कभी क्रूर नहीं रहा
है और वर्तमान समय भी।
यदि हिंदुत्व क्रूर या कट्टर होता तो विभिन्नं संस्कृतियाँ यहाँ ना तो पनप सकती थी और
ना पोषित हो सकती थी।हमारे वेद, जो प्राचीन ग्रन्थ हैं उनसे विश्व बंधुत्व का सन्देश निकला।
यह वेदों की सोच है जो यह मानती है कि सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो।
हिंदुत्व ने आज तक किसी देश को क्षति नहीं पहुंचाई ,विश्व के किसी भी देश को ना लूटा
और ना ही आक्रमण किया।रामायण काल में श्री राम ने लोक व्यवस्था को मजबूती दी,
आततायी चाहे भारत का रहा हो या भारत के बाहर का उसे खत्म किया।श्री राम ने बाली के
अधार्मिक शासन को खत्म किया और सुशासन की स्थापना के लिए उन्ही लोगो को शासन
की बागडोर सौंप दी जो उसके उत्तराधिकारी थे,उन्होंने उस शासन को अपने अधीन नहीं किया।
रावण के आतंक को खत्म किया ,वहां सुशासन की स्थापना की मगर उस देश को स्वतंत्र
रखा। क्या श्री राम जीते हुए देश पर अपना शासन नहीं रख सकते थे ? हिंदुत्व की सोच क्रूरता
की नहीं थी ,राम ने उस समय ना तो लंका को लूटा ना ही अपना प्रभुत्व जमाया।क्या इसे
इतिहास विश्व बंधुत्व के सन्देश से परे देखता है ?
स्वामी विवेकानंद ने कहा था -"गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" क्यों कहा होगा उस वेद वेदान्त के
मर्मज्ञ ने ऐसा ?क्यों शिकागो सम्मलेन में हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ आँका गया ?क्या कट्टरवाद के
कारण ? नहीं ,हिंदुत्व के मानव धर्म के कारण ऐसा संभव हुआ था।
महात्मा गांधी ने कहा -मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है। क्या गांधी को फासिस्ट मान लिया
जाए ,शायद नहीं ,क्योंकि गांधी के हिंदुत्व में भाईचारा झलकता था।
आरएसएस या विहिप जब यह उदघोष करती है कि हमें हिन्दुत्व पर गर्व है तो आज उन्हें
तथाकथित सभ्य लोग कट्टरपंथी कह देते हैं,क्यों ?क्या अपने धर्म पर गर्व करना कट्टरपंथ
या अन्य धर्मों पर क्रूरता करना है ?यह हिंदुत्व ही है जो इतना विशाल ह्रदय लेकर चलता है,
जिस तरह विभिन्न दिशाओं से बहने वाली नदियाँ समुद्र में आकर समा जाती है और एक रस
हो जाती है उसी तरह हिंदुत्व के कारण भारत में सभी धर्म पोषित हो रहे हैं।
हिंदुत्व को देश की स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा कट्टरपंथी मान्यता वाला शब्द माना गया
तो उसके पीछे दुसरे धर्मों के लोगों से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं,क्योंकि हमारे में निम्न कोटि
की सोच के लोग पनप गए हैं जो अपना घर जला कर खुद तमाशा दिखा रहे हैं।सत्ता का नशा
भी निम्न कोटि की सोच के लोगों को लग गया है ,दूसरों के सामने खुद को गाली और खुद को
तमाचा मार के भी लोग सत्ता पाना चाहते हैं ,और इसी दिवालियापन के कारण विश्व भ्रम में
पड़ गया है। आज एक हिन्दू दुसरे हिन्दू को सार्वजनिक रूप से साम्प्रदायिक कह देता है और
उसका समर्थन भी सत्ता लोभी दूसरा हिन्दू कर देता है।आज सत्ता को टिकाये रखने के लिए या
फिर से सत्ता पाने के लिए एक हिन्दू दुसरे हिन्दू को ही आतंकी बता देता है,तथाकथित सभ्य
हिन्दू भगवा में आतंक देखने की बात फैलाते हैं जब की वो जानते हैं कि वो सच नहीं झूठ कह
रहे हैं,फिर भी इसलिए कह रहे हैं ताकि सत्ता का सुख भोग सकें।सिर्फ सत्ता पाने के लिए हिंदुत्व
को संकीर्ण बताने वाले लोग ना तो खुद का भला कर पायेंगे और ना ही सभी धर्मों का।
एक हिन्दू खुद को सभी धर्मों को समान भाव से देखने वाला मानता है और दुसरे हिन्दू
को देख कर यह कहता है कि यह फासिस्ट है तो दुनियाँ किसे सही और किसे गलत मानेगी ?
क्या दुसरे मजहब के लोग फिर ये धारणा नहीं बना लेंगे कि हिंदुत्व कट्टरवाद का पोषक है।
राजनीती के कुछ सिद्धांत होते हैं मगर मजहबों में वैमनस्य फैलाना और सत्ता की
रोटी सेकना अधम नीति है।सभी धर्मों के लोगों को अपने धर्म पर गर्व होना चाहिए।किसी
धर्मावलम्बी को अपने धर्म पर गर्व तभी होता है जब उस धर्म में गर्व करने योग्य महान गुण
हो।
हमें अपने "हिंदुत्व पर गर्व है क्योंकि हमारा हिंदुत्व विश्व बंधुत्व की प्रेरणा देता है।"
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Labels: chintan
1.2.13
गणतंत्र के लड्डू से गण - गण को लड्डूओं की ओर !
गणतंत्र के लड्डू से गण - गण को लड्डूओं की ओर !
जौनपुर, 26 जनवरी 2013
विगत 65 वर्षों की तरह ही आज सुबह सवेरे भी " ए मेरे वतन के लोगों .. याद करो कुर्बानी " मार्का गीतों के स्वर कान में पड़े । पर आज के परिवेश में यह एक रस्म अदायगी मात्र ही लगती है ।
महारानी का राज्य समाप्त होने के बाद एवं आजा़द भारत के अपने सविंधान लागू होने के 65 वर्षों बाद भी हम आजादी और उसके मायनो का वही रिकार्ड बजा रहे हैं जो शायद 1950 या 1960 के दशक में बज रहा था । राष्ट्रीय ध्वज को सलामी के समय मेरे मन में जो विचार आये वो काफी अलग थे । यहां आप से साझा कर रहा हूँ । जन - गण के लिये आजादी और स्वराज की जो परिभाषा 1947 में गढ़ी गयी थी वो उसे आज भी रटाई जा रही है । देश की बहुधा आबादी के लिये आजादी की सीमा आज भी, देश की राजनैतिक आजादी पर आकर रुक जाती है । परन्तु, देश पर न्योछावर होने की शिक्षा देते समय यह कभी भी नहीं सोचा जाता कि जब तक प्रत्येक व्यक्ति के स्तर पर आजादी नहीं पहुँचती, तब तक देश की आजादी का जश्न केवल केवल रस्मी तौर पर ही मनाया जाता रहेगा ।
सही मायनों में प्रत्येक व्यक्ति की आर्थिक अजादी के बिना राजनैतिक आजादी का जश्न बेमानी होगा । आजाद भारत को विरासत में मिली सोंच के अनुसार आर्थिक आजादी के लिये आय के परम्परागत साधन के रूप में, सेवा (नौकरी) का बड़ा योगदान रहा है । सेवा अगर सरकारी हो तो उसे सोने पर सुहागा माना जाता रहा है ।
1990 के दशक में शुरू हुये आर्थिक सुधारों से इस ट्रेंड में कुछ बदलाव आया । परन्तु सरकारी मशीनरी की सोंच और गुलाम मानसिकता के चलते व्यक्तिगत सम्पदा अभी भी सरकारों और इनके खेवनहारों की वक्रदृष्टि के निशाने पर हैं ।
इस मानसिकता के कुछ ताजा उदाहरण देखिये ।
पूर्व वित्त मन्त्री एवं मौजूदा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने वोडाफोन पर उसके अधिग्रहण सौदे हुये पूंजीगत लाभ पर पिछली तारीखों से कर लगाने कि जिद पकड़ी तो देश के कारोबारी घरानों का भारत में नियमन के स्थायित्व पर शक का माहौल बना । साथ ही अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की कारोबारी मंशा पर सवालिया निशान लगे । पूरे प्रकरण से भारत की सरकारों की व्यवसाय के प्रति नजरिये पर जो माहौल बना उसे, विदेश में रहने वाले एक रिश्तेदार ने इन शब्दों में बयान किया । Indians don't have respect for contractual obligations. यानि भारतियों में अनुबन्धात्मक दायित्वों के प्रति सम्मान नहीं है ।
अब मौजूदा वित्त मंत्री पी. चिदाम्बरम अमीरों पर अधिक कर लगाने की वकालत कर रहे हैं । देश में अजादी के बाद से ही समाजवाद की घुट्टी पिलायी जाती रही । स्वतंत्रता प्राप्ति काल के नीति नियन्ताओं की उस समय के महाशक्ति रूस से निकटता के कारण हमारी आर्थिक नीतियों में साम्यवाद की झलक भी देखी जा सकती है । साम्यवाद, राज्य को सर्व-शक्तिमान मान कर उसके सभी क्रिया कलापों को सर आखों बिठाने की अवधारण भी है । इस अवधारणा के चलते उद्योगों एवं व्यापार को हमेशा से कड़े सरकारी निगरानी में रखा गया । सरकारी मशीनरी और नियामक प्राधिकारियों पर यह विचार आज भी हावी रहता है कि वह जो करेंगे, सब सही होगा और उद्योगों को छूट देने से देश का अहित ही होगा ।
उदारीकरण की बयार ने थोड़ा सा, परन्तु नकाफी स बदलाव लाया है ।
देश की आज की आवश्यकता में सबसे ऊपर अद्यमिता का स्थान है । इसे आजादी और गणतंत्र की नई परिभाषा में शामिल कर बड़े दायरे में समझने की जरूरत है । मौजूदा दौर में जब सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार घटती जा रही है और निजी क्षेत्र में नौकरी प्राप्त करने के लिये आवश्यक क्षमता एवं शैक्षणिक दक्षता देश की बहुधा आबादी के पास अभी भी नहीं है । तो उद्यमिता एक सशक्त माध्यम हो सकता है ।
परन्तु सरकारी महकमों के कार्य करने के तरीके और उसके पीछे की मानसिकता से उद्यमिता पनपने की उम्मीद तक दम तोड़ती नजर आ रही है ।
जितना खतरा देश को एफ.डी.आई. (FDI) से नहीं है उससे ज्यादा नुकसान व्यवसाय से जुड़े सरकारी प्रवर्तन महकमों के DDI (Domestic Direct Invasion) है । जिसके चलते इन महकमों को व्यापार के कामों में अनावश्यक दखलंदाजी करने का मौका मिलता है । यह दखलन्दाजी व्यवसाय की जमीनी और वास्तविक सच्चाईयों को बिल्कुल नजरंदाज़ करती है ।
छोटे से लेकर मंझोले और बड़े व्यवसाय तक - सभी इससे पीड़ित हैं । रतन टाटा सरीखे नामचीन व्यवसायियों ने मंच से कई बार इस बात को उद्धवरित किया कि व्यवसायिक कार्यों के चलते उनसे कई बार रिश्वत की मांग की गयी है । युवा को अगर उद्यमिता की ओर अग्रसर करना हो तो सरकारी व्यवस्था को व्यवसाय एवं व्यवसायी के प्रति अपना नजरिया बदलने की जरूरत है ।
वित्त मंत्री के साथ - साथ देश को भी यह समझना होगा कि कोई भी व्यक्ति, व्यक्तिगत लाभ के लिये अधिक प्रयास करता है । इस पर अमीरों पर उनके अधिक टैक्स लगाने के प्रस्ताव से कारोबारी माहौल कमजोर होगा । इन्ही सब खबरों के बीच अर्थव्यवस्था में काले धन को बाहर लाने के लिये सरकार के द्वारा पुन: कोई योजना लाने की तैयारी बजट 2013 में की जा रही है । काले धन को देश की मुख्य धारा में लानें की यह पहली कोशिश नहीं है । अन्तिम बार ऐसी योजना Voluntary Disclosure of Income Scheme, 1997 में आयी थी । इस योजना में जिन लोगों ने काले धन का स्वत: प्रकटीकरण किया उन्हे बाद में आयकर विभाग द्वारा नोटिस एवं स्पष्टीकरण आदि से परेशान किया गया । ऐसी किसी भी योजना पर समय से अपना कर आदि अदा करने वाले करदाता सवाल उठाते हुये आलोचना करते हैं कि ऐसी योजना से कर अपवंचन करने वालों को शय मिलती है और यह कर कानूनों का पालन न करने वलों के लिये एक प्रोत्साहन योजना की तरह काम करती है । आवश्यकता है कि टैक्स अदा करने वाले लोगों की संख्या में इजाफा हो, न की मौजूदा समय में टैक्स अदा करने वालों पर जबरिया अधिक टैक्स लादा जाये । ज्यादा टैक्स से छुपाने के लिये किये गये लेन-देनों से ही काले धन का निर्माण होता है । आवश्यकता है एक ऐसे माहौल की जिसमें जनता को किसी प्रकार के व्यक्तिगत और कारोबारी सौदों को छिपाने की जरूरत न पड़े ।
तभी लड्डू सिर्फ गण-दिवस पर नहीं पर वर्ष के हर दिन और गण-गण को मिल सकेंगे । मेरे विचार में यह आज के भारत के जन-गण के मन की आवाज है । शायद आज से पचास साल बाद गाने के बोल कुछ इस प्रकार से हों :
ऐ मेरे वतन के लोगों
जरा आंख में भर लो पानी
जो आर्थिक आजादी के लिये शहीद हुये हैं
उनकी याद करो कुर्बानी !!
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गुस्ताखी माफ़ !
(मौजूदा दौर में एक हास्यास्पद बात यह दिखती है की कई बार जो लोग इस प्रकार के गीतों के रिकार्ड बजाने में बहुत आगे रहते हैं उनकीअपनी जिंदगी इस गीत से दूर - दूर तक कहीं भी सुर - ताल मिलाती नहीं दिखती । और इसे कोई व्यक्तिगत टिप्पणी न माना जाये ।)
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Sachin Agarwal
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‘विश्वरूप’ रिलीज हुई, लोगों ने सराहा
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| ‘फिल्म अलकायदा और तालिबान की पृष्ठिभूमि में बनी है, इस फिल्म को लेकर भारतीय मुस्लिमों का हाय-तौबा मचाना समझ से परे है’: राहुल पल्हानिया |
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भ्रष्टाचार जिंदाबाद !
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ये है विश्वरूपम पर बैन की असली वजह !
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