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27.2.12


एक थी कलावती



एक थी कलावती . थी इसलिए क्योंकि उसका वर्तमान में होना भी थी 


के ही बराबर है . नाम पर जाया जाय तो वह कलावती थी . कलाओं 


वाली थी . कला की धनी थी . लेकिन नाम से वो कलावती थी काम से 


किसान . यह कृषि प्रधान देश है इसलिए किसान होना सम्मान का 


प्रतीक हो सकता है . वह भी कृषक ही थी . लेकिन उसका अथक 


परिश्रम भी उसके नाम को सार्थक नहीं कर सका था . गरीबी उसके 


भाग्य की परछाही थी जो हमेशा उसे साथ ही रहा करती थी . सर पर 


बमुश्किल एक छत घासफूस की . तन पर कपडे के नाम पर कुछ 


चीथड़े और रसोई में खाने के नाम पर मोटा अनाज और बमुश्किल दो 


समय का खाना . रात को गुदड़ियों में सो जाती और सुबह गुदड़ियों से 


ही उठ जाती . वैसे तो हमारे देश में कई गुदड़ी के लाल हैं जिनका 


गुदड़ी से कोई सम्बन्ध नहीं है. वे दीखते गुदड़ी के लाल हैं लेकिन 


उनका जीवन गुदड़ी वाला  नहीं. वे जब किसी राज्यके मुखिया  रहे 


तब जरूर बाकी प्रदेशवासियों को उन्होंने गुदड़ी वाला बना दिया था 


लेकिन वे खुद गुदड़ी वाले नहीं हैं . बल्कि हर ऐशो आराम से ओत प्रोत 


हैं . वे कहने को गुदड़ी के लाल हैं और हकीक़त में मैनेजमेंट गुरु भी रह 


चुके हैं .


लेकिन हम बात कर रहे थे कलावती की . वह गुदड़ी पर आश्रित थी . 


उसने कोई सपना कदाचित ही कभी देखा हो . या देख भी होगा तो 


टूटते सपनों के बाद कदाचित ही कभी दोबारा सपने देखने की कोशिश 


की होगी. उसने कभी नहीं सोचा होगा की भी कोई राजा या युवराज 


उसके घर या जीवन में आएगा और उसके दिन बहुरने की उम्मीदों पर 


पानी डाले जाने की चर्चा होगी.




लेकिन एक दिन अचानक . एक युवराज . एक लम्बी गाडी में . अपनी 


गाडी से उतरा . वह युवराज था . उसे चेहरे पर युवराजों की मुस्कान 


थी . ऐसा उसके मातहत कहते थे या कह सकते हैं कि उसके आसपास 


घूमने वालों को उसमे उनका युवराज नज़र आता था . वह कलावती 


की झोपडी में आया . बैठा . उसके हालचाल पूछे उसके चूल्हे की बनी 


रोटी खाई  . उससे पूछा कि वह कैसे अपना जीवन यापन करती है ? 


युवराज को बड़ी चिंता हुई कि देश में ऐसे भी लोग हैं  जो दो  समय का 


भोजन भी नहीं पा पाते . लेकिन मुझे इस बात की ख़ुशी है कि उस 


युवराज ने फ्रांस की कभी उस एक राजकुमारी की तरह यह नहीं कहा 


कि यदि कलावती के पास रोटी नहीं है तो वह केक पिज्जा बर्गर आदि 


से काम क्यों नहीं चला लेती ? युवराज परेशान था कलावती की हालत 


पर और वह कलावती को उम्मीदों का पिटारा थमाकर चला गया.




कलावती हक्का बक्का थी . कोई आया था उसके दिन फेरने . उसके 


पीछे लाव लश्कर था . कैमरे थे . फ्लैश थी . वह घबरा गई थी . इतनी 


उम्मीद तो उसने कभी नहीं की थी . वह बेसुध सी थी . ऐसा भी होता 


है क्या ? ऐसा तो सपनों में हुआ करता है . वह भी उन तरुण युवतियों 


के सपनों में जो अपने अपने राजकुमारों की प्रतीक्षा में दिन काटती हैं 


कि कोई आएगा उनके दिन फेरने . यहाँ पर स्थिति थोड़ी भिन्न थी . 


युवराज आया था . एक पुत्र की तरह अपनी माँ के दिन फेरने . उसे तो 


ऐसा ही लगा होगा . उसे आँखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था . दिन 


फिरने की ऐसी उम्मीद तो उसने कभी नहीं लगाईं थी . वह थोडा सा 


होश में तब आई जब युवराज चला गया . कैमरे चले गए . लाव लश्कर 


चला गया . और रह गया वही टूटा फूटा सा झोपडी नुमा घर . झोपड़ 


पट्टी . शरीर पर कतरे . वही सूखी रोटी और पुनर्जीवित होने की 


उम्मीद में उम्मीदें जिनके पूरा होने की हैरत भरी उम्मीद अब 


कलावती को भी थी . 
अगले दिन अखबारों में खबर छपी . युवराज कलावती के घर गया था .
 उसके हाल चाल पूछे . कलावती को तो 


पढना भी नहीं आता था . कैसे जान पाती . कदाचित ही किसी ने  उसे 


बताया हो . लेकिन पृष्ठ में वह अब इतनी अभागी नहीं थी जितने देश 


के अन्य करोड़ों लोग जो सूरज की तपिश झेलते सूख सूखकर जल 


जाते हैं. युवराज देश की सर्वोच्च संस्था में गया था . वहां बोला वह - 


कलावती .....कलावती.........कलावती.................कलावती वहाँ 


रहती हैं . चीथड़ों में रहती है . ये खाती है . उसने भी वही खाया . 


उसकी हालत खराब है. उसके पास पैसे नहीं हैं. वह उसके बारे में 


चिंतित है. देश में ऐसी कितनी ही कलावतियाँ हैं. उनके लिए हमें 


कुछ करना है. .................




ख़बरों से पता चला , कलावती सबकी जुबान पर है. वह अब इतनी 


अभागी नहीं है.वह देश के सुप्रीमो की जुबान पर है. अब उसका कुछ 


होगा . उसका जीवन बदल जाएगा.


समय बीतता गया और सब कुछ चूकता गया. वर्षों बीतते  गए . कई 


बरसातें चली गयीं . ठण्ड , गर्मी , वर्षा . दिन माह वर्ष . शिशिर वसंत 


ग्रीष्म वर्षा शरद हेमंत सब ऋतुएं अपनें अपने कालचक्र के साथ 


पुनरावृत्त होती गयीं . अगर कुछ नहीं बदल रहा था तो वह था 


कलावती का अपना घर और हालात . नयी घटनाओं व घटनाक्रमों के 


झंझावातों के बीच कलावती नाम का पत्ता कहीं उड़ या खो सा गया था 


. फिर मैंने कभी सुना नहीं . 




अचानक एक दिन अखबार में पढ़ा -




कलावती के किसान दामाद ने कर्ज में दबे होने , कर्ज न चूका पाने 


के कारण भुखमरी से तंग आकर आत्महत्या कर ली है.


यह दूसरी बार था जब कलावती का नाम अखबार में आया था . मुझे 


हैरत नहीं हुई . हैरत मुझे तब भी नहीं हुई थी जब पहली बार कलावती 


का नाम सुर्ख़ियों में आया था . हैरत न होने की मुझे आदत पड़ चुकी है 


. जो होना है या जो कुछ हमारे नीति निर्धारकों ने तय कर रखा है उसे 


कोई टाल सकता है क्या ?




कुछ दिन और बीते और एक दिन अचानक फिर से कलावती का नाम 


अखबार के एक छोटे से कालम पर . नजर पड़ी . देखा . पढ़ा . 


उत्सुकता से . खबर थी -




कलावती की कुछ दिन पूर्व विधवा हो गयी बेटी ने कर्ज से तंग आकर 


आत्महत्या कर ली .




यह कलावती की वही बेटी थी जिसके पति ने कुछ दिन पूर्व ही इसी 


कर्ज की समस्या के चलते अपनी पत्नी को वैधव्य प्रदान कर दिया था . 




यह तीसरी बार था जब मैं कलावती का नाम अखबार में पढ़ रहा था . 


मुझे पता नहीं , कलावती का कोई बेटा था या नही , हाँ , उसका नाम 


जरूर इतिहास के पन्नों में कुछ दिनों के लिए और समाचार पत्र में 


हमेशा के लिए अंकित हो गया था.




अब , एक बार फिर , वही युवराज , निकल पड़ा है देश की 


कलावातियों की दुर्दशा पर रोने और उस दशा को सुधारने के लिए . 


वह अपने वातानुकूलित रथ पर अपने दल बल के साथ उत्तराखंड और 


पंजाब के बाद अब उत्तर प्रदेश की सड़कों पर चल पड़ा है कलावतियों के 


उद्धार के लिए और बाकि भिखारियों के दिन बहुराने को . हाँ , उसे 


लगता है कि इस उत्तर प्रदेश के बहुत से लोग भिखारियों की तरह दर 


दर ठोकर खाते और जगहों पर भूखे प्यासे पेट काम के मारे घुमते हैं 


और जगह जगह मार खाते हैं . वह भूल जाता है कि जहां इस प्रदेश के 


ये लोग मार खाते हैं वहाँ पर उसके भी लोग और सरकार है जो उनकी 


रक्षा भी नहीं कर पाती है. वो कहता है कि इनकी हालत सुधारनी है . 


वह कृषि प्रधान से कुर्षी प्रधान हो चुके इस देश के इस सबसे बड़े राज्य 


के गली मुहल्लों में सपने दिखाने के लिए अवतार की मानिंद चल पडा 


है की अगर उसके दल व मन पसंद को जनता ने स्वीकार कर लिया 


तो वह उन सबकी रातों को दिन में बदल देगा . वह बाहर घूमकर 


आया है . वह सेवाराम और बाबुरामों की तकदीर बदल देगा . बस कोई 


उसे लगाम थमा दे . देश की सबसे बड़ी कुर्सी तो उसके लिए आरक्षित 


है  लेकिन उसे सारी कुर्सियां चाहियें ताकि वह सबकी दशा सुधार सके 


. २२ सालों से इस प्रदेश को और लोग निगल गए हैं . वह सुधारेगा . 


वह भ्रष्टाचार   की शिकायत करता है पर वह टूजी पर मौन है . वह 


कहता है कि फलाना पैसा खाता है पर वह विदेशों में लाखों करोड़ 


डिपोजिट पर मौन है क्योंकि उसकी प्रिय आरक्षित कुर्सी पर बैठा 


उसकी प्रतीक्षा कर रहा उसका अपना भी मन से मौन है . वह अब 


कलावती पर भी मौन है क्योंकि अब उसके सामने एक नहीं लाखों 


कलावातियाँ हैं . उसे सबके दिन बहुराने हैं . मुझे पता नहीं 


कलावतियों के दिन बहुरेंगे या नहीं पर शायद उसके अपने दिन बहुर 


जाएँ .

सात वचनों का क्या आधार रहा ?

जबसे  तुमने  मुह  मोड़ा  है 
सूना  सा हर त्यौहार रहा
जब प्रेम की कसमे टूट गई तो
सात वचनों का क्या आधार रहा ?

तुम्हरे संग सावन सावन  था
तुम्हरे संग फागुन था फागुन
जब से विरहन का रंग चढ़ा
भाए न अब कोई मौसम
जब तेरे प्रेम का रंग नहीं तो 
सिन्दूर का रंग उजाड़ रहा

जब प्रेम की कसमे टूट गई तो
सात वचनों का क्या आधार रहा ?
पूरी कविता पढने के लिए क्लिक करें

मेरे गम को हरा कर दिया प्‍यारे मोहन ने। 'बडी नियुक्तियों में बडे बडे खेल

आपने कभी देखा है कि किसी आई,ए,एस या पी,सी,एस, का बेटा,बेटी कभी लोक सेवा आयोग की पी,सी,एस एलाइड की सेवा में चयनित होकर समाज सेवा कर रहा हो।अगर होगा भी तो एकाध प्रतिशत से भी कम।इतने दिनों तक मेरा भी ध्‍यान इस ओर नहीं गया,लेकिन अपने भाई'गेंगैस्‍टर माफिया' संजय मोहन ने इस बात के सूत्र दे दिये कि चाहे शिक्षण पात्रता परीक्षा 'टैट' हो या अन्‍य परीक्षा हरेक मैं अपनों को लाभ पहुंचाने का खेल चलता ही है।हॉं ये अलग है कि मेहनती ईमानदार अभ्‍यर्थी को उसका मेहनताना एलाइड सेवा में नियुक्‍त करके दे दिया जाता है।उँचे पदों पर बैठे सॉंवत अपनों के लिये नीली बत्‍ती के पदों को सुरक्षित कर ही लेते हैं,अपने कामगारों को अपने नीचे बिठालने का इससे नायाब व तार्किक तरीका और कोई नहीं हो सकता।ऐसे भी सूत्रों का पता चला है कि ऐसे बेरोजगारों को चयनित करने का प्‍लान तैया र किया जाता है,जिन्‍हें बडे लोग अप ना रिश्‍तेदार बनाना चाहते हैं। इसमें दलित कैडर पीछे है,इस भ्रम में मत रहिये।अपने पूर्ववर्ती लोगों की देख देखी दलित जातियॉं भी अपने ऐसे लाभ लेना एक जायज एवं सामाजिक न्‍याय पाने का एक अनौपचारिक तरीका समझने लगी हैं।

इस समय चुनाव का समय है,तथाकथित वैधानिकता के आगे मानवीय विसंगतियों को झेलने के सिवाय और कोई चारा नहीं है।सरकार आने पर घोटालों पर कुछ परदा डाला जायेगा तो वहीं पुरानी सरकारों के कारनामों की जॉंच के नाम पर ईमानदारी का गुबार पैदा किया जायेगा,और उसी गुबार के धुंधं में अपनों को चुपके से लाभ पहुंचाया जायेगा।यह सिलसिला अनवरत चलेगा।प्रशासन में दलित वर्ग'एलाइड संवर्ग' की बात तार्किकता के लबादे में शर्म से मुह झुकाये अपने पुनीत कार्य को अंजाम देती रहेगी।

केजरीवाल ने की बुझते शोलों को हवा देने की कोशिश


टीम अन्ना के बुझते आंदोलन को हवा देने की खातिर अन्ना हजारे के खासमखास सिपहसालार अथवा यूं कहें कि अन्ना को कथित रूप से चाबी भरने वाले अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर गरमागरम बयान दे दिया है। यूपी विधानसभा चुनावों में स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को चुनने के लिए चलाए जा रहे जन जागृति अभियान के सिलसिले में केजरीवाल ने कहा कि संसद में हत्यारे और बलात्कारी बैठे हैं। लालू, मुलायम और राजा जैसे लोग संसद में बैठ कर देश का कानून बना रहे हैं। धन इकठ्ठा कर रहे हैं। इन लोगों से संसद को निजात दिलाने की जरूरत है। उन्होंने यहां तक कहा कि लुटेरे और बलात्कारी सहित सभी प्रकार के बुरे तत्व संसद पर कब्जा जमाए हुए हैं। पहली बार क्रीज से बाहर आ कर उन्होंने कहा कि भाजपा भी भ्रष्टाचार करने वालों में शामिल है। उसने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए कुछ भी नहीं किया।
असल में केजरीवाल को लग रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश को खड़ा व एकजुट करने के तुरंत बाद भी यूपी विधानसभा चुनाव में उनकी टीम अप्रासंगिक सी हो गई है। वहां जातिवाद व संप्रदायवाद पूरी तरह से हावी हैं। हर पार्टी ने इसी आधार पर प्रत्याशियों का चयन किया है और जनता का रुख भी जातिवाद पर केन्द्रित हो गया है। ऐसे में चुनाव के बाद आंदोलन को फिर से जिंदा करने में काफी जोर आएगा। इसी कारण चुनावी सरगरमी के बीच आखिरी दौर में जानबूझ कर ऐसा बयान दिया है, ताकि राजनेताओं को मिर्ची लगे और वे प्रतिक्रिया में कुछ बोलें व फिर बहस की शुरुआत हो जाए। उनका पैंतरा काम भी आया। उनका गरमागरम बयान आते ही राजनीति भी गरम हुई। कांग्रेस ने केजरीवाल के इस बयान पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। कांग्रेस प्रवक्ता संजय निरूपम ने कहा कि हम मानते हैं कि संसद में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग हैं। इसका मतलब ये नहीं कि कोई भी संसद की गरिमा के खिलाफ जा कर बोले। यह संसद के विशेषाधिकार का हनन है। सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा है कि उनका यह बयान अमर्यादित है। टीम अन्ना लगातार संसद के मर्यादा को चोट पहुंचा रही है। मुलायम सिंह का नाम इस संदर्भ में घसीटना बेतुका है। पार्टी इस संदर्भ में चर्चा के बाद कार्रवाई तय की करेगी। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता ह्रदय नारायण दीक्षित ने कहा है कि केजरीवाल को इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए था। संसद एक गरिमामयी स्थान है। सांसदों को जनता चुनकर भेजती है। ऐसे में उनको इस तरह की बात कहने का कोई अधिकार नहीं है। संसद की विशेषाधिकार समिति इस बात का संज्ञान लेकर कार्रवाई करेगी।
निरूपम के इस बयान से जाहिर तौर पर एक बार फिर यह बहस शुरू होगी कि टीम अन्ना संसद की गरिमा पर हमला कर रही है या फिर सांसदों पर। देखना ये होगा कि केजरीवाल की ओर से शांत से हो गए आंदोलन में डाले गए कंकड़ से कितने दिन तक तरंगें उठती हैं।

ममता शर्मा के बयान पर इतना बवाल क्यों?


राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा के बयान पर बवाल हो गया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने थूक कर चाटना ही बेहतर समझा, लिहाजा तुरंत बयान वापस भी ले लिया। ज्ञातव्य है कि ममता ने यह कहा था कि युवतियां युवकों की टिप्पणियों से न डरें, बल्कि सकारात्मक रूप में लें। लड़कों द्वारा कहे जाने वाले सेक्सी शब्द को नकारात्मक सोच लेकर बुरा नहीं माने। इसका मतलब सुंदरता है, आकर्षण है और एक्साइटमेंट है।
भारतीय संस्कृति की दृष्टि से मोटे तौर पर निरपेक्ष रूप में उनका बयान निहायत ही आपत्तिजनक प्रतीत होता है और इस बयान की जरूरत भी नहीं थी दिखती, मगर सवाल ये उठता है आखिर उन्होंने गलत क्या कह दिया? सीधी सी बात है कि उन्होंने उन्हीं लड़कियों को यह सीख देने की कोशिश की होगी, जिन्हें सेक्सी शब्द बाण झेलना पड़ता है। वे वही लड़कियां हैं, जो कि जानते-बूझते हुए भी इस प्रकार के वस्त्र पहनती हैं, ताकि वे सुंदर व सेक्सी दिखाई दें। जो पारंपरिक परिधान पहनती हैं या जिनके सिर पर पल्लू ढ़का होता है, उन लड़कियों को वैसे भी कोई लड़का सेक्सी कहने की हिमाकत नहीं कर पाता। अमूमन उन्हीं लड़कियों को ऐसी टिप्पणी का सामना करना पड़ता है, जो कि शरीर के अंगों को उभारने वाले वस्त्र पहनती हैं। अव्वल तो उन लड़कियों को ऐसी टिप्पणी से ऐतराज होना ही नहीं चाहिए, क्योंकि वे जानबूझ कर ऐसे वस्त्र पहनती हैं। सच तो ये है कि लड़कों को ऐसी टिप्पणी के लिए प्रेरित करने के लिए वे ही जिम्मेदार हैं। गर संस्कारित लड़की अपनी सहेलियों की देखादेखी में ऐसे वस्त्र पहन लेती है तो उसे जरूर अटपटा लगता होगा। संभव है ऐसी लड़कियों को ही ममता ने सीख देने की कोशिश की होगी। यदि ममता के मुंह से निकले बयान को जुबान फिसलना मानें तो यह साफ दिखता है कि उन्होंने लड़कियों को बिंदास बनने की प्रेरणा देने की कोशिश की, जैसी कि वे खुद हैं। बस गलती ये हो गई कि उन्होंने बयान गलत तरीके से दे दिया।
रहा सवाल ममता के बयान का विरोध होने का तो वह स्वाभाविक ही है। जिस देश में नारी की पूजा की परंपरा हो, वहां ऐसे बयान से बवाल होना ही है। जैसे ही बवाल हुआ तो ममता को अपना बयान वापस भी लेना पड़ गया, क्योंकि वे एक ऐसे पद पर बैठी हैं, जिस पर रह कर ऐसा निम्नस्तरीय बयान कत्तई शोभाजनक नहीं माना जा सकता। वे इस पद पर नहीं होतीं तो कदाचित यह उनका निजी विचार मान लिया जाता।
खैर, इन सवालों के बीच एक सवाल ये भी उठता है कि जिन प्रबुद्ध महिलाओं, सामाजिक संगठनों व राजनीतिक संगठनों को ममता के बयान पर घोर आपत्ति है और उनका खून खौल उठा है, उन्हें सेक्सी कपड़े पहनने वाली लड़कियों को देख कर भी ऐतराज होता है या नहीं? जिन्हें ममता के इस बयान में लड़कियों को पाश्चात्य संस्कृति की ओर ले जाने का आभास होता है, उन्हें क्या सच में पाश्चात्य संस्कृति की ओर भाग रही लड़कियों पर भी तनिक अफसोस होता है। चारों ओर से शोर मचा कर उन्होंने भले ही ममता को बयान वापस लेने को मजबूर कर दिया हो, मगर क्या कभी अंगों को उभारने वाले वस्त्र पहनने वाली बहन-बेटियों को भी वे सादगी के वस्त्र पहनने को मजबूर कर पाएंगे। बयान तो बयान है, वापस हो गया, मगर क्या अंग प्रदर्शन करने वाले कपड़े पहनने वाली लड़कियों व पुरुषों के वस्त्र जींस व टी शर्ट पहनने वाली युवतियों को हम वापस भारतीय परिवेश में ला पाएंगे? अगर नहीं तो हम कोरी बयानबाजी ही करते रहेंगे, आरोप-प्रत्यारोप ही लगाते रहेंगे और हमारी लड़कियां पाश्चात्य संस्कृति की ओर सरपट दौड़ती चली जाएंगी।

चोर सांसद को चोर कहने से लोकतंत्र कमजोर होता है तो ऐसा कमजोर लोकतंत्र मंजूर है


टीम अन्ना के सदस्य अरविन्द केजरीवाल ने गाजियाबाद में शनिवार को जो बयान दिया था उसमें खरी
सच्चाई है .पूरा देश जानता है की वर्तमान में संसद के मंदिर में १६३ सांसदों के खिलाफ जघन्य अपराध
 के मामले चल रहे हैं.

       नेताजी को अपना गुनाह भी पुण्य लगता है !जो नेता खुद के गुनाह को गुनाह कबूल करते हैं वे तो
वास्तव में जनसेवक हैं क्योंकि उनमे छोटी सी उम्मीद की किरण दिखाई देती है की वे खुद को सुधारने
के लिए प्रयत्न करेंगे और उनको तो टीम अन्ना के सदस्य केजरीवाल या देशवासी गाली नहीं दे रहे हैं
मगर यदि स्वच्छ छवि के जनसेवक को गुनाहगार सांसदों को दी हुई कडवी सच्ची बात बुरी लगती है तो
फिर वो लोग भी स्वच्छ जनसेवक कैसे हुए ? हमारे लोकतंत्र की यह कमजोरी है की हमारा कानून  चुनाव
में उम्मीदवार के रूप में नामांकन पत्र भरने की अनुमति आपराधिक लोगों को  दे देता है.

     अपराधी लोग आज तो १६३ हैं यदि ये बहुमत में आ जाए तो संसद कैसी होगी ?कैसे कानून  बनेंगे?
क्या अपराधी लोग जनहित की बात सोचेंगे ?

     सवाल यह उठता है की ऐसे लोगों को चुनता कौन है और क्यों चुन कर भेजता है ?

हमारे देश में शिक्षा का अभाव ,जातिगत समीकरण,धन से वोटो की खरीद ,मतदान के प्रति अनुत्साह,
बाहुबल ,मतदान केन्द्रों पर कब्जा आदि कारण हैं जिनके कारण अपराधी तत्व सांसद और विधायक
बन जाते हैं .

किसी अपराधी के  सांसद या विधायक चुन लिए जाने मात्र से  क्या उसका अपराध ख़त्म हो जाता है ?
क्या कुकर्मी भगवा वस्त्र पहन लेने या हज कर आने से पवित्र हो जाता है ? क्या अपराधी सांसद
या विधायक संसद की गरिमा को बढाते हैं ? क्या किसी अपराधी ने साम ,दाम ,दंड या भेद किसी भी
कारण से चुनाव जीत लिया है तो जनता उसके दोषों को नजर अंदाज कर दे ?

केजरीवाल ने कोई गप्प नहीं लगाई है या किसी को भ्रमित नहीं किया है उन्होंने तो उस जनता को
जागरूक करने का प्रयास किया है कि यदि जनता सोच समझ कर फैसला नहीं करती है और मत
का सोच समझ कर उपयोग नहीं करती है तो लोकतंत्र के बुरे परिणाम भी भुगतने के लिए उसे तैयार
रहना पडेगा .

      करोडो -अरबों कि राशि का गबन करने वाले सांसदों कि जय जयकार या वाहवाही क्यों चाहते हैं
आज के जनसेवक ? क्यों बुरे सांसदों को बुरा कहने पर भड़कते हैं सफेद कॉलर नेता ? यदि वो लोग
देश और देश के संविधान के प्रति वफादार हैं तो बुरे को बुरा कहने मात्र से क्यों मिर्ची लग जाती है?
क्यों आपराधिक सांसदों के प्रति सहानुभूति रखते हैं स्वच्छ छवि रखने वाले सांसद?

   सभी दल के नेता क्यों टिकिट देते हैं आपराधिक छवि वाले लोगों को ? सभी दल बाहुबलियों को
टिकिट देते हैं ,सभी दलों के नेता उन अपराधियों को चुनने के लिए जनता के दरवाजे पर दस्तक देते
फिरते हैं और यही कारण है कि केजरीवाल जैसे देशवासीयों को गाली देने के लिए आज सभी दल
उतारू हैं.

   चोर सांसद को चोर कहने से ,हत्यारे सांसद को हत्यारा कहने से ,बलात्कारी सांसद को बलात्कारी
कहने से यदि लोकतंत्र कमजोर होता है तो ऐसा लोकतंत्र ही क्या काम का ? मीडिया को चाहिए कि
वो भी राष्ट्र धर्म का पालन करते हुए केजरीवाल जैसे लोगो के पक्ष में माहोल बनाए क्योंकि आज
मिडिया की ताकत से अनेको राज पर्दाफाश हुए हैं और अपराधी विधायक ,सांसद जेल कि हवा खा
रहे हैं .     

26.2.12

हो गया..............एग्जाम फोबिया !


google se sabhar




परीक्षाएं निकट आते ही विद्यार्थी वर्ग सदैव से तनाव में आ जाता है .थोडा तनाव जायज भी क्योंकि यह अध्ययन  के प्रति हमें गंभीर बनाता है .माता-पिता की अपेक्षाएं ;गुरुजन की अपेक्षाएं और सबसे बढ़कर हमारी स्वयं की स्वयं से अपेक्षाएं .ऐसे में यदि विद्यार्थी ने साल भर पढाई में लापरवाही बरती हो तो वह बहुत अधिक तनाव में आ जाता है .फेसबुक -ट्विटर जैसी सोशल वेबसाइट्स ने भी विद्यार्थी वर्ग की एकाग्रता को भंग किया है .कभी कभी बहुत पढाई में लगे रहने वाले भी परीक्षा आते ही भ्रमित  से हो जाते है .उस पर यदि माता-पिता भी विद्यार्थी के परीक्षा में मिलने वाले नंबरों से अपनी प्रतिष्ठा को जोड़ ले तो विद्यार्थी गहरे अवसाद का शिकार हो जाता है .आज के मनोचिकित्सक इसे  ''एग्जाम  फोबिया  '' का नाम देते हैं .इससे बचने का सर्वोतम उपाय है -


*परीक्षा की बेहतर तैयारी 
*टाइम मनेजमेंट का कड़ाई से पालन 
*माता-पिता का सहयोगी व्यवहार 
*रिलेक्स रहना 


                                 ये गीत इन्ही भावों को प्रकट करता है -


[स्व -रचित  गीत मेरी आवाज़ में ]


   परीक्षा के मौसम में ये क्या हो गया ?
भूख मर गयी ;चैन खो गया ;
हो गया..हो गया ...एग्जाम फोबिया !


मम्मी  -पापा भेजते स्कूल जबरदस्ती ;
खोलते किताब हमको आती थी सुस्ती ;
साल भर तो की बैंड-बाजा-मस्ती;
कहलाना चाहते नहीं पर फिसड्डी ;
अच्छे नंबर लाने का प्रेशर हो गया .
हो गया..............एग्जाम फोबिया !




मैडम के कहने से हम न पढ़े ;
सर ने जो डाटा  तो उनसे चिढ़े ;
घर वालों से करते थे चीटिंग ;
कैफे पर जाकर करते थे चैटिंग ;
सारा टाइम फेसबुक-ट्विटर  पी गया .
हो गया .........एग्जाम फोबिया !


भैया सुनों अब हमारी सलाह 
साल अपना करना न यूँ ही तबाह ;
परीक्षा की करना बेहतर तैयारी ;
टाइम मैनेजमेंट  सदा रखना जारी ;
रिलेक्स होकर जिसने ये सब किया ;
हो गया हवा उसका सारा फोबिया 
हो गया हवा उसका सारा फोबिया .


                                        शुभकामनाओं के साथ 
                                              शिखा  कौशिक 
                         [vicharon ka chabootra ]










बौखलाहट या दंभ?


उत्तरप्रदेश की जनता का अपमान राष्ट्रपति शासन की धमकी
 उ त्तरप्रदेश में पांच चरणों के मतदान के बाद आ रहे रुझान देखकर कांग्रेस की सिट्टी-पिट्टी गुम है। कांग्रेस की यथा स्थिति यानी चौथे पायदान पर बने रहने की प्रबल संभावनाएं जताई जाने लगी हैं। इससे कांग्रेस के तमाम नेतागण या तो बौखला गए हैं या फिर उनके बयानों में दंभ झलक रहा है। सबसे पहले कांग्रेस के विवादास्पद नेता दिग्विजय सिंह ने उत्तरप्रदेश में सत्ता में न आने पर राष्ट्रपति शासन की बात कही। बात क्या कही जनता को राष्ट्रपति शासन का डर दिखाया। दिग्विजय की बात का कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से विरोध नहीं जताया गया। अर्थात् ऐसी कांग्रेस पार्टी और आलाकमान सोनिया गांधी की मंशा है यह समझा जाना चाहिए। इसे और अधिक पुष्ट किया कांग्रेस सांसद और केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जायसवाल ने। बुंदेलखंड में मट्टी पलीद होते देख कांग्रेस की बौखलाहट या दंभ सामने आ गया। केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जायसवाल ने कहा था कि यदि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं बनी तो किसी और की सरकार नहीं बनेगी। ऐसे में राष्ट्रपति शासन के अलावा कोई विकल्प नहीं। इस पर तमाम विपक्षी पार्टियों ने इसे लोकतंत्र का उपहास, कांग्रेस का दिवालियापन, पागलपन, तानाशाही और हताशा की स्थिति में पहुंचना बताया। 
सबका अपना-अपना नजरिया है। लेकिन, मैं इसे सीधे तौर पर उत्तरप्रदेश की जनता का अपमान समझता हूं। यह साफ तौर पर वहां की जनता को धमकाने का मामला है।   और अधिक पढऩे के लिए अपनापंचू पर आएं...

SWEET SWEET GIRL .....YOU CAN DO SO !


Sweet Little Girl with Roses.
[from free photos.biz]






SWEET SWEET GIRL ..COME TO ME 
BEAUTIFUL ANGEL JUST TELL ME 
WHERE DO YOU WANT TO GO ?
AND WHY  DO WANT TO GO ?


SHE SAID...SHE SAID....SHE  SAID 
I WISH TO GO SCHOOL
LIKE MY BROTHER
I WANT TO LEARN SKILLS
BREAK CONSERVATIVE PILLAR 
ALL RIGHT....YOU CAN DO SO !
WHERE DO ........


SHE SAID....SHE SAID......SHE SAID
I WISH FREEDOM JUST LIKE A BOY
I WANT TO FLY IN OPEN SKY 
ALL RIGHT ...YOU CAN DO SO !
WHERE .......................


                                         SHIKHA KAUSHIK 

भड़ास blog: सवर्ण विरोधी संविधान ?

भड़ास blog: सवर्ण विरोधी संविधान ?

अंदाज ए मेरा: लाल क्रांति के लिए दो अपने लाल!

अंदाज ए मेरा: लाल क्रांति के लिए दो अपने लाल!: ‘’हर घर से एक युवक दो या फिर मौत के लिए तैयार हो जाओ......’’ ये फरमान जारी किया है नक्‍सलियों ने और इस फरमान का असर है कि लोग अपनी धर...

25.2.12

वसुंधरा जी, आप ही बता दीजिए वे दिग्गज कांग्रेसी कौन हैं?


प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती वसुन्धरा राजे ने बाड़मेर जिले के कोलू (बायतू) में जसनाथ महाराज के भव्य मन्दिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए फिर हुंकार भरी कि भंवरी मामले में सीबीआई छोटे नेताओं की तो जांच कर रही है, मगर कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गजों पर हाथ नहीं डाल रही। सीबीआई का इस्तेमाल कांग्रेस लोगों को डराने, धमकाने और परेशान करने में कर रही है, ताकि वे सहम कर कांग्रेस के नेताओं का आधिपत्य स्वीकार कर लें, लेकिन उनका ये सपना कभी साकार नहीं होगा। उन्होंने यहां तक पूछा कि भंवरी मामले में सीबीआई की जांच मारवाड़ के इर्द-गिर्द ही क्यों हो रही है, बाकी के कांग्रेसी दिग्गजों को क्यों जांच से बाहर रखा गया है, जबकि उनके नाम चर्चाओं में हैं। सवाल ये उठता है कि अगर सीबीआई को दिग्गजों के नाम पता नहीं हैं या फिर वह जानबूझ कर उन पर हाथ नहीं डाल रही तो खुद वसुंधरा दिग्गजों नाम क्यों नहीं उजागर कर देतीं। जब से यह मामला उजागर हुआ है, वे लगातार पिटा हुआ रिकार्ड प्लेयर चला रही हैं। बीच-बीच में गायब हो जाती हैं और जब भी आती हैं तो वही राग अलापने लगती हैं। यदि यह मान भी लिया जाए कि सीबीआई तो कांग्रेस सरकार के हाथों में खेल रही है, मगर वसुंधरा जी पर तो किसी का दबाव नहीं है। वे तो पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। माना कि सरकार चलाने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की है, मगर नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उनकी भी आखिरकार बड़ी जिम्मेदारी है। वह भी तब जब कि वे आगामी संभावित भाजपा सरकार की मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं। असल में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उनकी जिम्मेदारी ज्यादा की बनती है कि यदि सरकार किसी मामले को दबा रही है तो वे उसे उजागर करें। मात्र कुछ अज्ञात दिग्गजों का जिक्र कर सरकार पर हमला करने की बजाय उन्हें बाकायदा नाम लेकर बताना चाहिए कि भंवरी मामले में और कौन शामिल हैं। केवल शोशेबाजी करने से क्या लाभ? ऐसी शोशेबाजी कर जनता को उद्वेलित करना जन भावनाओं से खेलने की संज्ञा में आता है। यदि उन्हें पता है और उनके पास सबूत हैं तो एक अर्थ में जानकारी छिपाने का कानूनी अपराध वे भी कर रही हैं। इस मामले में एक दिलचस्प बात ये भी है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी कह चुके हैं कि वे तो नियमानुसार कार्यवाही कर रहे हैं, मगर वसुंधरा ज्यादा नहीं बोलें, उनकी पार्टी के लोगों पर भी आंच आ सकती है। इसका मतलब ये निकलता है कि उन्हें पता है कि कौन-कौन से भाजपा नेता इस मामले में लिप्त हैं। यह दीगर बात है कि पुख्ता सबूत के अभाव में सरकार उन पर हाथ नहीं डाल पा रही। वैसे बताते ये हैं कि सीबीआई को जो सीडियां मिली हैं, उनमें अनेक नेता व बड़े अधिकारी भी संदिग्ध अवस्था में दिखाई दे रहे हैं। इसके बावजूद आरोप कुछ ही नेताओं पर मढ़े गए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि मुख्यमंत्री गहलोत व वसुंधरा नूरा कुश्ती खेल रहे हैं। अपने गिरेबां में भी झांकें श्रीमती वसुंधरा ने मन्दिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में यह भी कहा कि सरकार 3 साल तो जनता के बीच से गायब रही, अब जब उसे पता चला कि चुनाव आने वाले हैं और हमारा लोगों के दु:ख-दर्द सुनने का सिलसिला जारी है तो सरकार की नींद खुल गई और उसने फरमान जारी कर दिया कि सभी मंत्री 3 दिन दौरा करें। तीनों दिन मुख्यमंत्री का विरोध हुआ। जनता ने पूछ लिया 3 साल गायब थे, अचानक जनता की कैसे याद आ गई। सवाल ये उठता है क्या वे खुद पूरे तीन साल जनता के बीच रहीं। पूरा प्रदेश जानता है कि वे यदा-कदा अचानक गायब हो जाती हैं। कई बार तो उनके निजी समर्थकों तक को पता नहीं लग पाता कि वे कहां हैं। राजनीति पर नजर रखने वाले दिग्गज पत्रकार तक ये कहते हैं कि पिछले तीन साल में राज्य की राजनीति में ज्यादा सक्रिय नहीं रही हैं। विधानसभा में भी वे सिर्फ उपस्थिति दर्ज करवाती हैं। ऐसे में उन्हें सरकार से तीन साल गायब रहने पर सवाल करने का अधिकार है या नहीं, यह जनता पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि वे अगली मुख्यमंत्री बनने की खुशफहमी में जी रही हैं। खुद उनके पार्टी संगठन व संघ से संबंध कुछ खास अच्छे नहीं हैं फिर भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चंद्रभान के हवाले से मान रही हैं कि कांग्रेस 50 सीटों पर ही सिमट जायेगी। यानि कि भाजपा अपने दम पर सरकार में नहीं आ रही, वे तो कांग्रेस का रायता ढुलने का इंतजार कर रही हैं। हो सकता है बिल्ली के भाग्य का छींका टूट ही जाए।

सवर्ण विरोधी संविधान ?

मैं एक लेखक हूँ और संवेदना मेरी प्रकृति है । मैं साहित्य का छात्र रहा हूँ और एक महान लेखक शिवपूजन सहाय के इस कथन (कहानी का प्लाट ) से सहमत हूँ कि अमीरी की कब्र पर पनपी हुयी गरीबी बड़ी जहरीली होती है । इस भयंकर भौतिकवादी युग में गरीब सवर्णों की व्यथा बड़ी भयावह है पर उन्हें कोई नहीं पूछता है । क्या ब्राह्मण , भूमिहार, राजपूत, कायस्थ, सैय्यद एवं पठान इत्यादि सब के सब अमीर ही हैं ? अगर नहीं तो फिर उनके अन्दर जो गरीब हैं उनकी सहायता के लिए कोई नीति या कानून क्यों नहीं बनता ? क्या इस देश का संविधान सवर्ण विरोधी है ?
क्या कोई नेता उनकी पीड़ा सामने रखता है ? अवसरवादी उन नेताओं को धिक्कार जो सवर्णों की पीड़ा से अवगत होते हुए भी उनकी तरफ से सिर्फ इस लिए नहीं बोलते कि सवर्णों की मतसंख्या कम है । यह प्रजातंत्र है या बहुमत की तानाशाही ? ऐसे प्रजातंत्र पर थू जो किसी गरीब सवर्ण के प्रति हृदयहीन व्यवहार करता है ।
लेखक के रूप में मैंने अपने उपन्यास 'दी रिबर्थ ऑफ़ महात्मा ' में बहुत कुछ लिखा था और उसकी एक प्रति वाजपेयीजी और एक सोनियाजी को भेजा भी था । आज इस ब्लॉग के माध्यम से यह जानना चाहता हूँ कि क्या आप लोगों में से किसी को उन सवर्ण गरीबों से कोई सहानुभूति है जो बिलकुल गरीब और उपेक्षित हैं ?

गाज़ियाबाद विधान सभा से भाजपा उम्मीदवार " अतुल गर्ग " को कमल पर बटन दबा कर .. विजयी बनाइये .

भ्रस्टाचार पर वार ,

२८ फ़रवरी -मंगलवार .


गाज़ियाबाद विधान सभा से 


भाजपा उम्मीदवार " अतुल गर्ग " 



को कमल पर बटन दबा कर .. 




विजयी बनाइये .

एक बार लगा दे फेरा... हे जगदम्बे ! महारानी !


एक बार लगा दे फेरा... हे जगदम्बे ! महारानी !

Maa DurgaMaa DurgaMaa Durga



ये सुन ले अर्ज़ हमारी 
हे जगदम्बे ! महारानी !
एक बार लगा दे फेरा 
हम सबके घर  कल्याणी !

Maa DurgaMaa DurgaMaa Durga

तेरे आने से माता 
घर आँगन सब महकेगा ;
तेरे दर्शन पाकर के 
मन का पाखी चहकेगा ;
फिर भक्ति रस में पगकर  
फैलेगी गंध सुहानी ;
एक बार लगा दे फेरा 
हम सबके घर कल्याणी !
[पूरा सुने ऊपर दिए गए वीडियों से ]
                                       शिखा कौशिक  
                       [shikhakaushik06 on you tube ]

पित्ताशय कैंसर

 पित्ताशय कैंसर

यह कैंसर पित्ताशय एक दुर्लभ प्रजाति का कपटी और कष्टप्रद कर्क रोग है जो इसकी श्लेष्मकला (Mucosal Layer) में होता है और बाहर की तरफ बढ़ता है। पित्ताशय एक नाशपाती के आकार की एक थैली है जिसमें यकृत से आकर पित्त इकट्ठा होता रहता है। यह रोग स्त्रियों को अधिक होता है।   इसकी भित्तियों में तीन निम्न परतें होती हैं।
1-   सबसे अन्दर की  श्लेष्मकला (Mucosal Layer), 
2-   बीच की स्निग्ध-पेशी परत और
3-   बाहर की सीरमीकला (Serosa) परत।
इन तीनों  परतों को संयोजी ऊतक (Connective Tissue) चिपका कर रखता है।
लक्षण
·        पीलिया,
·        ज्वर,
·        पेट में दर्द,
·        पेट में फुलाव,
·        मिचली और उलटी,
·        पेट में गांठ आदि।

निदान
प्रारंभिक अवस्था में बीमारी का पता नहीं चल पाता है, क्योंकि शुरू में इस रोग के लक्षण बड़े सामान्य होते हैं और फिर यह यकृत के पीछे भी छुपा रहता है। अक्सर जब पित्ताशय को पथरी रोग के कारण निकाला जाता है, तब बायोप्सी करने पर रोग का पता चलता है। इसके निदान के लिए निम्न परीक्षण किये जाते हैं।
·        भौतिक परीक्षण
·        सोनोग्राफी
·        यकृत कार्य परीक्षण
·        कारसिनोऐम्ब्रोयनिक एन्टीजन CEA
सामान्यतः 5 ng/ml या कम
·        CA 19-9 ट्यूमर मार्कर सामान्यतः 40 40 U/ml या कम
·        रक्त की रसायनिक जांच
·        CT स्केन
·        M R I
·        ERCP
·        बायोप्सी
·        लेपरोस्कोपी

चरण (Stages)

चरण 0  स्वस्थानी कैंसर  (Carcinoma in Situ) में सबसे अन्दर की की श्लेष्मकला (Mucosal Layer),  में असामान्य कोशिकाएं जो कैंसर कोशिकाओं में परिवर्तित और फैल सकती हैं।

चरण I       के दो उपचरण होते हैं।

चरण I A - में कैंसर संयोजी ऊतक या मांसल परत तक फैल चुका होता है।

चरण I B -  में कैंसर मांसल परत के बाहर की संयोजी ऊतक तक फैल चुका होता है।

चरण II      के दो उपचरण होते हैं।

चरण II A - में कैंसर  अंतरांगी उदरावरण (Visceral Peritoneum) को पार कर चुका या/और यकृत या/और पास के किसी अन्य अंग (आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत, अग्न्याशय या पित्त वाहिकाएं) तक फैल चुका होता है।

चरण II B -  कैंसर निम्न संरचनाओं तक फैल चुका होता है।

·        आंतरिक श्लेष्मकला (Mucosal Layer) से संयोजी ऊतक (Connective Tissue) और पास के लसिकापर्व (Lymph node) तक।

·        मांसल परत और पास के लसिकापर्व (Lymph node) तक।

·        मांसल परत से संयोजी ऊतक और पास के लसिकापर्व तक।

·        अंतरांगी उदरावरण को पार कर और/या यकृत और/या पास को कसी अंग (आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत, अग्न्याशय या पित्त वाहिकाएं) और लसिकापर्व तक।

चरण III  में कैंसर रक्त-वाहिकाओं द्वारा यकृत या पास के किसी अंग और लसिकापर्व तक फैल चुका होता है।

चरण IV में कैंसर के पास के लसिकापर्व और/या दूर के किसी अंग तक फैल चुका होता है।

 

उपचार की दृष्टि से इस कैंसर को निम्न चरणों में बांटा गया है।

स्थानीय (चरण I) कैंसर पित्ताशय से बाहर नहीं फैला है। इसे शल्य द्वारा निकाला जा सकता है।

अशल्य योग्य (चरण II, चरण III और चरण IV) आसपास की संरचनाओं, अंगों या पूरे पेट में फैल चुका हो। जो कैंसर सिर्फ लसिकापर्व तक फैला हो उसको छोड़ कर बाकी सभी  शल्य योग्य नहीं हैं अर्थात उन्हें शल्य द्वारा पूरी तरह निकालना संभव नहीं है। 

आवर्ती (Recurrent) पित्ताशय कैंसर   

उपचार

उपचार के पहले रोगी की स्वीकृति ली जाती है, इसका मतलब उपचार में खतरा है या प्रयोगात्मक उपचार दिया जा रहा है।

शल्य

पित्ताशय कैंसर में पित्ताशय-उच्छेदन उपचारात्मक शल्य-क्रिया है।

चरण 0  (Carcinoma in Situ), चरण I A और चरण I B में तो यह बहुत जरूरी उपचार है।
चरण II में पित्ताशय के साथ उसका बेड (3 से.मी. चौड़ी पट्टी), यकृत का कुछ हिस्सा (removal of segments IVb and V) और लसिकापर्व (Lymph node) निकाले जाते हैं। चरण III में  पित्ताशय के साथ पित्ताशय वाहिनी (Bile Duct) भी निकाली जाती है। बड़ी शल्य-क्रिया में ड्यूओडिनम और प्लीहा भी निकाल लिया जाते है, हालांकि इसके बाद जीवन कष्टमय हो जाता है।
अशल्ययोग्य कैंसर में निम्न उपशामक (palliative) उपचार दिये जाते हैं।
·        पित्त उपमार्ग शल्य -  यदि कैंसर आंत या पित्त-पथ पर दबाव डाल रहा हो तो शल्य द्वारा पित्ताशय या पित्त-वाहिका को काट कर आंत से जोड़ दिया जाता है।
·        दूरदर्शी द्वारा रुकावट की जगह कृत्रिम प्लास्टिक नलिका (Stent) डाल कर पित्त को शरीर से बाहर या आंत डाल कर वैकल्पिक पित्त-निकास व्यवस्था बना दी जाती है।
·        यदि दूरदर्शी द्वारा कृत्रिम प्लास्टिक नलिका डालना संभव नहीं हो तो त्वचा द्वारा नलिका डाल कर पित्त को शरीर से बाहर या आंत डाल कर  पित्त-निकास व्यवस्था बना दी जाती है। ऐसा सामान्यतः शल्य पूर्व किया जाता है।
रसायन उपचार (Chemotherapy)  
अभी तक कोई शोध यह साबित नहीं कर सकी कि इस कैंसर में कीमो से रोगी का कुछ भला हो सकता है। फिर भी यह उपचार दिया जा रहा है। आज यह साबित हो चुका है कि 5-FU और ल्यूकोवोरिन से रोगी की मृत्यु जल्दी होती है। दूसरा विकल्प स्थानीय कीमोथैरेपी है।  यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि निदान के समय अधिकतर कैंसर फैल कर पित्ताशय को पार कर चुके होते हैं। इस कैंसर में निम्न दवाएं दी जाती हैं।
·        जेम्सीटेबीन,
·        सिसप्लेटिन,
·        5-फ्लूरोयूरेसिल,
·        केपीलिटेबीन और
·        ऑग्जालिप्लेटिन।
पार्ष्व-प्रभाव - इनके पार्ष्व-प्रभाव निम्न हैं।
·        गंजापन
·        मुंह में छाले और फोड़े
·        भूख न लगना
·        मिचली और उलटी
·        दस्त
·        संक्रमण (श्वेत रक्तकण WBC कम हो जाने के कारण)
·        रक्त स्राव (बिंबाणु Platelets कम हो जाने के कारण)
·        रक्त-अल्पता और कमजोरी (लाल रक्तकण RBC कम हो जाने के कारण)
·        सिसप्लेटिन और ऑग्जालिप्लेटिन नाड़ियों को क्षतिग्रस्त करती हैं और हाथों और पैरों में कमजोरी, दर्द, स्पर्श या तापमान की अनुभूति न होना या अतिसंवेदनशीलता या सुन्न हो जाना आदि की शिकायत हो सकती है। 
रेडियोसेंसिटाइजर्स – रेडियोथैरेपी के साथ दिये जाते हैं, ये रेडियोथैरेपी के लिए कैंसर कोशिकाओं की संवेदनशीलता बढ़ाते हैं। और अभी प्रयोगात्मक दौर में ही हैं।  
रेडियोथैरेपी  
सामाय और स्थानीय रेडियो भी कीमोथैरेपी की तरह यह भी प्रभावशाली साबित नहीं हुई है और प्रयोगात्मक (Trials) तौर पर ही दी जाती है।