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29.5.09

कब्रों की ज़ियारत किस लिये?

मुझ से यह सवाल हमारे एक भाई मे ई-मेल से पूछा था तो मै उस्का जवाब यहा दे रहा हू ।

सवाल :- कब्रों की ज़ियारत मज़ारों से वसीला लेना और (चढावे के तौर पर) वहां माल और दुंबे आदि ले जाने का क्या हुक्म है? जैसा कि लोग सय्यद अल-बदवी (सुडान में), हज़रत हुसैन बिन अली रज़ि ॒ (इराक में), और हज़रत जैनब रज़ि ॒ (मिस्र) कि कब्रों पर करते हैं । आप जवाब दें, अल्लाह आप के इल्म में बरकत दे । आमीन

जवाब :- कब्रों के ज़ियारत की दो किस्में हैं । पहली किस्म वह है जो कब्र वालों पर रहम व मेह्र्बानी करने, उनके लिये दुआ करने, मौत को याद रखने और आखिरत कि तय्यारी के लिये कि जाये । यह ज़ियारत जाइज़ है और ऐसी ज़ियारत की आवश्यक्ता भी हैं । क्यौंकि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहिंं वसल्लम का फ़र्मान है । आगे पढ़े...

20.9.08

इन्होने तो मुसलमानों को आतंकवादी और देशद्रोही साबित कर दिया !!

"अमिताभ बुधौलिया 'फरोग' जी" ने "भड़ास" और अपने ब्लॉग "गिद्ध" पर एक पोस्ट लिखी थी उसमे उन्होंने जो लिखा मैं उनकी भावनाओ की इज्ज़त करता हूँ लेकिन उन्होंने ना - ना करते करते आपने मुसलमानों को आतंकवादी और देशद्रोही साबित कर दिया, और बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद् की पुरी तरह से वकालत की है,
सिमी पर तो प्रतिबन्ध लगा हुआ है और सिमी ने जितने भी हमले किए उसमे से कोई भी हमला किसी धर्म विशेष पर नही था लेकिन बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद् ने सिर्फ़ एक धर्म के लोगो और उनके धर्म स्थलों को निशाना बनाया है तो उन्हें कैसे धर्म निरपेक्ष कह सकते हो? आप लोग ही बताये उन पर प्रतिबन्ध क्योँ नही लगाया जाए?
इस्लाम क्या किसी धर्म में यह नही बताया गया है की दूसरे धर्म के लोगो को जीने ना दो, उन्हें और उन्हें धर्म स्थलों को तबाह कर दो.... इस्लाम तो अपने मानने वालो को कुरान में आदेश देता है की "दुसरो के माबुदो (उपास्यो) को बुरा ना कहो (सूरा-ए-अलंफाल : आयत-१०८) ' पाक कुरान में खुदा का हुक्म है, "जिसने एक बेकुसूर का कत्ल किया, गोया उसने सारी इंसानियत का कत्ल कर दिया सूरा-ए-अल्मायेदाह : आयत - 108) ' आख़िर यह कौन से जेहादी हैं और इनका कौन सा मज़हब है, जो बेगुनाह लोगो की जान लेने को इन्हे आतुर करता है दिल्ली बम काण्ड को ले, तो यह बात समझ नही आती की क्या कोई सच्चा मुस्लिम, और वे भी रमजान के पाक महीने में ऐसा जघन्य पाप करेगा साफ़ है, आतंक्वादियौं का कोई धर्म और ईमान नही होता
आज मुस्लिम समाज में कुछ लोग ऐसे हैं, जो इस्लाम की मानवतावादी शिक्षाओ से कोसो दूर हैं ऐसे लोगो की गैर इस्लामी हरकतों से इस्लाम का नाम बदनाम होता होता है इस्लाम का नाम बदनाम करने वाले आतंकवादी चाहे कश्मीर में हों, अफगानिस्तान में हों, पाकिस्तान में हों, अमेरिका में हों, या इंडोनेशिया में, ये सभी इंसानियत और मज़हब पर बदनुमा दाग हैं इस्लाम अपने मानने वालो को ये आदेश भी देता है की बुढो, बच्चो और औरतों पर हथियार न उठाओ, किसी भी धर्मस्थल में बैठे हुए राहिबो व सन्यासियों पर हमला न करो किसी ऐसे आदमी पर हमला न करो और ऐसे आदमी से न लड़ो, जो मुकाबला करने की हालत में न हो मगर आतंकियों ने कभी इन नसीहतो को नही पढ़ा सिर्फ़ नाम मुसलमान का और बाप - दादा के मुसलमान होने कोई मुसलमान नही हो जाता हैं,

5.4.08

मर कर अल्लाह से ही सीधे जानूंगी कि सच कौन बोल रहा है?

रक्षंदा आपा,जैसा आपने लिखा कि इस्लाम है ही ऐसा तो जरा गौर से देखिए आगे लिखी एक-दो नहीं बल्कि बहत्तर अलग-अलग मान्यताओं के द्वारा इस्लाम की व्याख्या करने वाले अंदाज़ और बताइये कि किसको मानूं मैं?शायद मैं भी अपने मजहब को सर्वश्रेष्ठ मानती हूं लेकिन किसके चश्मे से दुनिया और सत्य को देखूं आधी उम्र गुजर जाने पर भी समझ नहीं पाई हूं और लगता है कि शायद जब इतने विरोधाभास हैं तो समझ भी न पाऊंगी। कुछ साल पहले तक मैं अपने अब्बा हुजूर से सुनती आयी थी कि इस्लाम पुनर्जन्म की धारणा को नहीं मानता लेकिन हो सकता है कि आपको ये जान कर अजीब लगे कि इन बहत्तर अलग-अलग सोचों में से एक सोच,"तनसिख़िया" पुनर्जन्म की धारणा को मानती है लेकिन हममें साहस नहीं है कि हम कह सकें कि इन सब में आपस में इतना भेद क्यों है? सारे के सारे गला फाड़ कर खुद को सच और बाकी लोगों की सोच को गलत बताने में जुटे रहते हैं। आप तो पढ़ी-लिखी हैं फिर भी मजहबी बातों पर टिप्पणी करने से मैं बचती थी लेकिन आज आपने मज़बूर कर दिया कि मैं लिखूं भले ही मुझे मार डाला जाए परवाह नहीं है इन जाहिलों की। आज भी हम चौदह सौ साल पहले बोले और बताए गये नबी के सत्य को ठीक से न समझ पाए लेकिन उसी आदिम परिवेश के सोच की वकालत करते हैं,कितनी बातें ऐसी हैं जिनका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है कि क्या मानव धरती पर एलियन्स हैं या फिर मानव के क्रमिक विकास की लैमार्क और डार्विन जैसे साईंसदानों की बात सच है? क्यों हम आज भी जानवरों को मार काट कर उनका हड्डी मांस खा जाने को क़ुर्बानी देना कहते हैं? क्यों नहीं हम सब भी अगर उस पूरे प्रकरण को अगर याद करना चाहते हैं तो अपने-अपने बच्चों को ज़िबह करते अगर हमारा मन भी साफ होगा तो छुरी के नीचे दुम्बा आ जाएगा,लेकिन हम हैं बस गोश्तखोर तो हमें बस एक आधार मिल गया निरीह जानवरों को मार कर खा जाने का। मैंने एक कहानी पढी़ जिसका नाम था "मैमूद" और लेखिका का नाम था शायद मेहरुन्निसा परवेज़ जिसमें उन्होने लिखा था कि किस तरह परिवार के लोग एक बुढ़िया के द्वारा पाले गए मेमने को धर्म की दुहाई देकर मार कर खा जाते हैं लेकिन उस बुढि़या से न तो कीमा खाते बनता है न ही पाया। मैं भी जब उन मासूम जानवरों को देखती हूं तो लगता है कि वो मुझसे पूछ रहे हैं कि अगर कुर्बानी की कहानी में छुरी अगर कुत्ते या सुअर या गधे को लगी होती तो क्या तुम लोग उन्हें खा पाते?
जाने दीजिये आपा,मन में बहुत कुछ भरा है जिसमें से थोड़ा सा आज आपकी मेहरबानी से निकल गया और अगर आगे फिर कभी मजहबी जिक्र निकला तो बाकी भी निकल जाएगा। इन सारे लोगों के समर्थकों से बहुत सारे सवाल हैं लेकिन अब तो सोचती हूं कि मर कर अल्लाह से ही सीधे जानूंगी कि सच कौन बोल रहा है? इनके हिन्दी में नाम भी लिख पाना एक टेढ़ा काम है इसलिये अंग्रेजी में ही काम चला लिया है......
Jarudiyah,Sulaimaniah/Jaririyah,Butriyah/Hurariyah,Yaqubiyya,Hanafiyah,Karibiyah,Kamiliyah,Muhammadiyyah /Mughairiyah,Baqiriyah,Nadisiyah,Sha'iyah,Ammaliyah,Ismailiyah,Musawiyah/Mamturah,Mubarikiyah,Kathiyah/Ithn'Ashariyh(theTwelvers),Hashamiya/Taraqibiyah,Zarariyah,Younasiyah,Shaitaniyah / Shireekiyah,Azraqiah,Najadat,Sufriyah,Ajaridah,Khazimiyah,Shuaibiyah /Hujjatiyah,Khalafiyah,Ma'lumiyah / Majhuliyah,Saltiyah,Hamziyah,Tha'libiyah,Ma'badiyah,Akhnasiyah,Shaibaniyah/Mashbiyah,Rashidiyah,Mukarramiyah/Tehmiyah,Ibadiyah/Af'aliyah,Hafsiyah,Harithiya,Ashab Ta'ah,Shabibiyah / Salihiyah,Wasiliyah,'Amriyah,Hudhailiyah / Faniya,Nazzamiyah,Mu'ammariyah,Bashriyah,Hishamiyah,Murdariyah,Ja'friyah,Iskafiyah,Thamamiyah,Jahiziayh,Shahhamiyah/Sifatiyah,Khaiyatiyah/Makhluqiyah,Ka'biyah,Jubbaiyah,Bahshamiyah,Ibriyah,Muhkamiyah,Qabariyya,Hujjatiya,Fikriyya,'Aliviyah / Ajariyah,Tanasikhiya,Raji'yah,Ahadiyah,Radeediyah,Satbiriyah,Lafziyah,Ashariyah,Bada'iyah
इंसानी दुनिया में मजहब या धर्म सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही है इंसानियत और उस पर हमें अपने इस्लामिक,क्रिस्तान या हिंदू होने के नजरिये का चोला नहीं चढ़ाना चाहिये। मुझे पूरी उम्मीद है कि आपको यही बातें अगर किसी हिंदू या गैरमजहबी ने लिखीं होती तो शायद बुरा लग गया होता लेकिन मैं तो हममजहब हूं लेकिन अगर फिर भी बुरा लग रहा हो तो आइये भड़ास पर हम दोनो कुछ दिन तक सिर टकराते हैं।
भड़ास ज़िन्दाबाद

कहां लिखा है कि मुस्लिम हूं तो मांसाहार ही करूं?????....

पिछले कई दिनों से स्कूल में बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं तो उसमें व्यस्त रही क्योंकि प्रश्नपत्र बनाने से लेकर उत्तरपुस्तिकाएं जांचने तक बहुत जिम्मेदारी रहती है। भड़ास पर लिखने का समय नहीं मिलता है लेकिन दो-चार दिन में नजर मार लेती हूं। कल घर में जो हुआ उसने मजबूर कर दिया कि भड़ास पर जाकर उगल दूं वरना उस बात से तो दिल ही जला जा रहा है। कल हमारे घर डा.रूपेश आए और अब्बा हुज़ूर ने उन्हें भोजन का आग्रह करके मनुहार करके रोक लिया,वे अपनी व्यस्ततता के बावज़ूद प्रेमवश रुक गए। मैने जनाब डा.रूपेश के लिये शाकाहारी भोजन बनाया लेकिन मेरी बेटी ज़िद करके दस्तरख़्वान पर दोपहर का उसके द्वारा पकाया गोश्त लेकर बैठ गयी। मैंने उसे दबी जुबान से मना किया लेकिन वो मानी नहीं। इस बीच हमेशा की तरह हमारे अब्बा हुज़ूर और जनाब बातों में मशगूल थे और विदेशी गायक माइकल जैक्सन का जिक्र आया तो मेरी बेटी ने बीच में उछल कर कहा कि अभी हाल ही में उसने एक गाना गाया है जो समझ में तो कुछ ज्यादा नहीं आता पर उस गाने में अल्लाह शब्द कई बार आया है और ढेरों अरबी शब्द हैं और शायद हो सकता है कि वह कन्वर्ट होकर मुस्लिम बनने का इरादा रखता होगा जैसे कि विश्वप्रसिद्ध मुक्केबाज़ कैसियस क्ले कन्वर्ट हो कर मुहम्मद अली बन गये थे। दुनिया मुसलमान बनने की राह पर है लेकिन हमारे घर के लोग हैं कि डा.अंकल के कारण हिन्दू बने जा रहे हैं। उसका इशारा हमारे खाने-पीने में आये परिवर्तन की ओर था। बच्चे ते़ज़, चटपटा और मसालेदार मांसाहार के शौकीन हैं लेकिन मैंने जबसे डा.रूपेश के कहे अनुसार अपने भोजन में बदलाव लाया है मैं जोकि हाईब्लड प्रेशर की एक भयंकर मरीज़ा थी अब बिना दवाओं के स्वस्थ हूं बस ध्यान करती हूं और भड़ास से जुड़ी हूं यही मेरे स्वास्थ्य का राज़ है। क्या कारण है कि लोग अभी भी खान-पान को धर्म या मजहब से जोड़ कर देखते हैं जबकि डा.रूपेश कहते हैं कि खान-पान पेट का विषय है और धर्म आत्मा का विषय है,कुछ भी खाने पीने से आप अधार्मिक नहीं हो जाते; शाकाहार और मांसाहार का मुद्दा धर्म जैसी विराटता का करोड़वां हिस्सा भी नहीं हो सकता है। कहां लिखा है कि मुस्लिम हूं तो मांसाहार ही करूं? अगर ऐसा लिखा भी है तो मैं इसे मानने से आप सबके सामने इंकार कर रही हूं। जिसे मेरे बारे में जो सोचना है सोचे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। यशवंत भाईसाहब जानते हैं कि डा.रूपेश की भोजन संबंधी सोच कितनी शाइस्ता है।
भड़ास ज़िन्दाबाद