बड़प्पन और महानता जैसे शब्द हमारी दीदी के व्यक्तित्व के सामने बौने से लगने लगते हैं। आज जब मनीषा दीदी घर पर आयीं तो मैंने उन्हें करुणाकर के बारे में बताया तो इतनी भावुक हैं कि शुरू हो गयी तेलुगू में पता नही कौन कौन सी दुआएं करना...। बड़ी-बड़ी सुन्दर बंद आंखों से आंसू गिर रहे थे और फिर मुझे रुपए देकर बोली कि कि किसी को मत बताना कि मैंने रुपए दिये हैं लेकिन दीदी माफ करें मैं आप से किया हुआ वायदा तोड़ रहा हूं। मुझसे बोलती हैं रोते हुए कि मेरे बच्चे को कुछ नहीं होगा भाई मैं उसे गोद ले लूंगी, भगवान इतना निर्दयी नहीं है कि मेरी गोद सूनी कर दे......। एक दीदी हैं और वहीं दूसरी तरफ तमाम बड़े(?) मुंबापुरी के ब्लागर जिनसे मैंने सुबह पोस्ट डाल कर अपील करी थी हो सकता है कि अब तक किसी की नजर ही भड़ास पर न पड़ी हो या फिर नजरें चुरा रहे हों। खैर किसी से जबरई तो है नहीं पर धन्य हैं भड़ासमाता मुनव्वर आपा और हमारी मनीषा दीदी जो मेरे हाथ पर आकर पैसे रख गयी और आपा तो मेरे साथ दवा में लगने वाला हीरा भस्म के लिये हीरा कनी और स्वर्ण भस्म के लिये शुद्ध सोना खरीदने के लिये अपना डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड लेकर सर्राफ़ा बाजार चल पड़ीं कि अगर जैसी जरूरत हो पेमेंट करते चलेंगे....... इसे कहते हैं किसी के दुःख को दिल से महसूस करना। इस पोस्ट के द्वारा मैं मुनव्वर आपा और मनीषा दीदी के बारे में क्या कह सकूंगा क्योंकि ये काले अक्षर बड़े जड़ प्रतीत हो रहे हैं उनके प्रेम और करुणा को बता पाने के लिये........।
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1.7.08
भगवान इतना निर्दयी नहीं है कि मेरी गोद सूनी कर दे : मनीषा दीदी
Posted by
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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Labels: करुणा, करुणाकर, प्रेम, मनीषा दीदी, मुनव्वर आपा, सहायता
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