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5.5.11

आधुनिक बोधकथा-५- `I` से बड़ा `WE?

`I` से बड़ा `WE?`
 (सौजन्य-गूगल)

मेरा ब्लॉग-
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/05/i-we.html

" हमको  सब  ढूंढेंगे,   हमारे   जाने के बाद,
  लफ़्ज़  कुछ कहेंगे, मौन  छा जाने के बाद..!!"



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प्यारे दोस्तों,
 
एक बार, एक शिक्षा-संस्थान के प्रांगण में,  I,  YOU, और  WE, आमने-सामने आकर ज़िद पर आ गए कि,"संस्था में किसका स्थान ज्यादा महत्वपूर्ण है और सफलता का मीठा-पक्का फल किसे मिलना चाहिए?"

बाद में,जो कुछ घटा,बस आप खुद अपनी आँखो से देख लीजिए..!! 

 
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"अबे, `हुंकार-I` ये तु क्या कर रहा है..रे ?"
 
"अरे..!! चुप करना `सर्वकार-We`, फ़ालतू, बीच में बोलता रहता है..!!  मैं ने तुझे बुलाया क्या?"
 
"नहीं..!!"
 
" तो फिर, क्यूँ अत्यधिक बुद्धिमानी दिखा रहा है? चल हट, हवा आने दे और काम कर अपना..!!" 
 
" पर यार, इस प्रकार? `तुंकार-You` के कंधे पर चढ़कर, खड़े रह कर? इतना ऊँचा? क्या,कर क्या रहे हो, तुम दोनों?"
 
" देख `तुंकार-You`, हम दोनों यहाँ क्या कर हैं, ये बात `सर्वकार-We` को मत बता देना..!!"
 
" हमें सब पता है,`हुंकार-I` और `तुंकार-You`,तुम दोनों क्या कर रहे हो..!!"

" देख `सर्वकार-We`, `ईनफ इज़ ईनफ`, अब ज्यादा  चातुरी दर्शाये बिना, फूट  ना यहाँ से? तुम्हें क्या पता है, तुम्हारे बाप..का..नगाड़ा..!!"

" तुंकार-You, रहने दे-रहने दे..!! हमें सब पता है, तुम लोग हैं ना? उस ऊँचाई पर दिख रहे,`Success`,नाम के फल को तोड़ने की कोशिश कर रहे हो..!!"

" फिर बीच में बोले? `सर्वकार-We`, तुम सब अनपढ़-गवाँरों को इसके बारे में क्या ज्ञान होगा..!! आप लोग तो बस, सिर्फ मज़दूरी करना जानते हो..!! पता है यह ,`Success`,नाम का फल पाने के लिए, हमने `EGO-अहंवाद` यूनिवर्सिटी से, PhD. की डिग्री हासिल की है? तुम सब अनपढ़-गवाँरों के पास इतना ज्ञान है क्या?"

( `तुंकार-You`,ईर्ष्या के कारण, `सर्वकार-We` के सामने आँख मारते हुए..!!)

 
" `सर्वकार-We`, प्लीज़, आप लोग थोड़ा दूर जाकर खड़े रहेंगे? अब और एक शब्द भी बोले तो,ठीक न होगा..!!" 
 
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" अरे..!! `तुंकार-You`, ये क्या कर रहा है? ज़रा भी हिला तो मैं तो गिर ही जाऊँगा ना? यहाँ ज़रा सा भी डिगना मत, वर्ना मैं `हुंकार-I`, गिर जाऊँगा..अरे..अरे..अरे..!!
 
(इतने में, `हुंकार-I`,के धड़ाम से गिरने की आवाज़..!!)
 
"अबे..या..आ..र, `तुंकार-You`, ये तुमने क्या किया, आखिर मुझे गिरा ही दिया ना? मैं ,`Success`, फल के कितना करीब पहुँच गया था..!! कर दिया ना बेड़ा गर्क?

" भाई `हुंकार-I`, मुझे ग़लत मत समझना, मेरे पाँव में `jealousy` की खुजली सताने लगी, मैं क्या करूँ ? बुरा मत मानना यार..!!"

"ऊई माँ, वो सब तो ठीक है, मेरे `तुंकार-You`भाई, पर मेरे तो हाथ-पैर टूट जाते ना? हा..य, हे..लॉ, अरे `सर्वकार-We`,तुम्हें कह रहा हूँ..!! वहाँ दूर खड़े-खड़े तमाशा क्या देख रहे हो? मुझे उठने में थोड़ा मदद करो ना मेरे भाई..!!"
 
( `हुंकार-I` के एक बार बुलाने भर  ही, `सर्वकार-We` उसकी मदद के लिए दौड़ते चले आयें और उसे ज़मीन पर से हाथ पकड़ कर `हुंकार-I` को खड़ा होने में, सहायता कि, इतना ही नहीं,  उसकी  `हुंकार -  I Am PhD.` , `EGO-अहंवाद` विषय के, यूनिवर्सिटी द्वारा पहनाये गये, युनिफ़ॉर्म पर लगी हुई मिट्टी को भी साफ करने लगे..!!)
 
" दोस्त,`हुंकार-I` तुमको  ज़मीन दोस्त हुआ देख, मेरी ` jealousy` की खुजली अपने आप मिट गई..!! ही..ही..ही..ही..!!"
 

" `सर्वकार-We`, मेरी सहायता के लिए-Thanks दोस्तों । चलो अब देखते क्या हो..!! `Success` के मीठे-पक्के फल, ना तो अकेले मैं `हुंकार-I`,ना तो अकेले `तुंकार-YOU`,पर  `हुंकार-I + तुंकार-YOU = सर्वकार-We` बनकर, एक होकर, एक दूसरे की सहायता से, एक साथ चखेंगे..!!
 
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आधुनिक बोध-
 
शरारती,इर्ष्यालु,`तुंकार-YOU` की सहायता से, अकेला `हुंकार-I` , अहंकार भाव धारण करके, जब-जब,`Success` नाम का मीठा-पक्का फल,  अकेले  ही, खाने का स्वार्थी प्रयत्न करता है, तब-तब उसे अनपढ़-गवाँर माने गए, `सर्वकार-We` नाम के मेहनतकश इन्सानों की हमेशा ज़रूरत महसूस होती ही है ।
 
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प्यारे दोस्तों, इस बोध को, आप कोई भी व्यक्ति,परिवार,कंपनी, संस्था या सत्ता मंडल पर लागू करके देख लें, सभी जगह ये सटीक लागू होता दिख रहा है क्या?
 
मार्कण्ड दवे । दिनांक- ०५-०५-२०११.

2.7.08

रंग लाया प्रयास, पिता ओंकार जेल से रिहा, करूणाकर का इलाज शुरू

कहते हैं इंसानी हौसलों की न कोई सीमा होती है और न कोई दायरा...बस इस बार जो हुआ उसमे नया कुछ नही था जीत थी, महक थी छोटे प्रयासों की बड़ी सफलता की, उम्मीद थी उजाले की...

कैंसर से जूझ रहे करुनाकर और जेल में बंद उनके पिता को न्याय दिलाने के यशवंत सिंह, डॉ रुपेश श्रीवास्तव, अमित द्विवेदी व अन्य ब्लागरों की मुहिम और भड़ास के प्रयासों से जेल में बंद करुनाकर के पिता ओंकार मिश्रा को जमानत मिल गई है...

अपने होनहार बेटे से मिलने के लिए लालायित पिता कल अपने बेटे के जन्मदिन पर उसकी खुशियों में भागीदार बन सकेगा, उसके दुख को साझा कर सकेगा..एक पिता के लिए इससे बड़े गौरव की दूसरी बात क्या हो सकती है...हर बार जब उम्मीदें ख़त्म होती लगती हैं तो लोग भड़ास की तरफ़ रुख करते हैं और हर बार भड़ास के गैर दुनियादार, असमाजिक, कुंठित, बेकार और दूसरे कई अलंकारों से नवाजे गए लोग करिश्मा कर डालते हैं...

''कई लोग जब करुनाकर के मामले में बहुत कुछ होने की उम्मीद खो बैठे थे तब भड़ास ने उम्मीद पालने की जिद पकड़ ली'' और हमारे प्रयासों का जब पहला ही परिणाम आसमान चूमने का हौसला पैदा करता हो तो असफलता की बात इस मंच से करना बेमानी है...

सारी दुश्वारियों को धता बताकर जब रुपेश जी मुंबई से दिल्ली पहुँच गए हैं और देखते ही देखते कई मदद करने वाले हाथ साथ जुड़ गए हैं तो करुनाकर के साथ कुछ ग़लत होगा, ऐसा कोई मूर्ख और अज्ञानी ही सोच सकता है...

कहते हैं दुआओं में असर होता है...और अब तो असर दिख भी रहा है....


करुनाकर के पिता जेल से छूट गए हैं, जमानत पर। करुनाकर का जीवन आयुर्वेद के पुरोधा के हाथ में है। जन्मदिन पर परिवार के सारे बुजुर्गों का आशीर्वाद है और दुआ के लिए भड़ास के ३६० हाथ हर वक्त तैयार हैं...

क्या अब भी किसी को भड़ास के इस अभियान की सफ़लता पर शक है...ये वक्त है जश्न मनाने का है...करुनाकर को बधाइयां देने का...साथ ही उन सबको विनम्र धन्यवाद देने का जो इस मुहिम में करुनाकर के साथ डटकर खड़े रहे...

''जन्मदिन की पूर्वसंध्या पर करुनाकर को ह्रदय की असीम गहराइयों से हार्दिक बधाइयां और बेहतर जीवन की शुभकामनाएं''...

''हृदयेंद्र''