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11.4.13

युवा, तरक्की और शिवराज, राहुल, मोदी





                        देश में विकास उस ढलते सूरज की तरह है...जो कुछ ही देर में ढल जाता है, लेकिन एज़ वी लव सनसेट....तो हम उसकी तारीफें ज़रूर करते रहते हैं....मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के विकास की तारीफें मीडिया में बहुत सुनी हैं...ढेरों बिखरी पढ़ी हैं यहाँ, वहां...लेकिन ज़मीनी हकीक़त पे शायद किसी ने ध्यान नहीं दिया. अगर सच में मध्यप्रदेश में विकास हुआ है तो विकास का पर्याय 'मिथ्या' ही कहा जा सकता है. इस विकास की हकीक़त गाँव में रहने वाली वो जनता बता सकती है जिसके घर ४ घंटे बिजली पहुचती है या वो मजदूर जिन्हें नरेगा में काम करने का पैसा नसीब नहीं हुआ....या शायद IPS सिंह की पत्नी जिन्हें कुछ खनन माफिययों ने (बीजेपी के एक राष्ट्रीय महामंत्री की शह पर) मार दिया. विकास की तस्वीर हमेशा दो अच्छे रंगों से खींची जाती है, पहला- वादे, और दूसरा- प्रभाव.... शिवराज सिंह ने जितनी घोषणाएं की हैं अगर हिसाब रखा जाये तो उनके मुख्यमंत्री पद पर बिताये दिनों से ज्यादा ही होंगी....और वो प्रभावशाली हैं ही. विकास की हकीक़त मूलभूत समस्याएं झेलने बाले बता सकते हैं....और सुशासन की हकीक़त राजनीति की चक्की में पिसने बाले लोग....चाहे वो मार खाते डॉक्टर्स हों या क़त्ल होने बाले आईपीएस या फिर पिस्ता हुआ मिडिल क्लास.

                     श्रीमान राहुल गाँधी के भाषणों से मैं उक्ता गया हूँ.....साफ़ साफ़ शब्दों में ये कहा जाते हैं की देश को लीडर नहीं विज़न चाहिए.....जैसे बिना लीडर के विज़न अचार डालेगा. या तो उनके पास लीडर नहीं है या फिर वो खुद ही लीडर नहीं है..या फिर उनकी माँ और पार्टी की दस साल की लीडरशिप में सिर्फ देश की जनता का अचार डाला गया है.....कोलिशन गवर्मेंट कि मजबूरियाँ बता बता कर. कर (जो कि हकीक़त है).
                     ये देश युवाओं का देश है....आधी आबादी युवा है. इनके सपने हैं, और कुछ करने की हिम्मत भी....लेकिन डर लगता है मुझे कि इनका सही दोहन करने कि  बजाये देश का राजनैतिक तंत्र इन्हें फ्रस्ट्रेशन में न डाल दे. बेरोजगारी और भ्रष्ट तंत्र से जूझते इस देश के युवा उस और जा रहे हैं जहां से बेचारगी के अलावा कुछ और उन्हें नज़र नहीं आता और इस तरह का समाज पतन कि और जाता है तरक्की कि और नहीं!
                         सुयोजित और बराबर अवसर सिर्फ एक अच्छी लीडरशिप और डिसिशन टेकिंग प्रधानमंत्री से ही आ सकते हैं.....कोलिशन गवर्मेंट  का रोना रोते बुत से नहीं!

        विकास कि हकीक़त जो मध्यप्रदेश कि है मुझे नहीं लगता उससे ज्यादा कुछ अच्छी गुजरात की होगी.....वैसे NDTV पर 'रवीश कुमार' जी के प्रोग्राम में हमने देखा ही है......लेकिन जिस तरीके से देश कि सरकार से त्रस्त देश के युवायों को सपने मोदी जी द्वारा पहनाये जा रहे हैं वो काबिले- तारीफ है. उन्हें पता है कि देश बदलाव चाहता है, उन्हें पता है कि आधी आबादी युवा है और उन्हें ये भी पता है कि सपने बिकते हैं....और शायद ये भी कि चारों तरफ से पिसता मध्यम वर्ग सुशासन के सपने देख रहा है, भले उसके कुछ लोकतान्त्रिक अधिकार छीन जाएँ! (वैसे भी कितने मिले हुए हैं!).
                      हकीक़त विकास नहीं है, हकीक़त बस अपने सपने बेचना है क्यूंकि सच तो बहुत कड़वा है.... 'अजित पवार' जैसे लोग यहाँ उप-मुख्यमंत्री कि कुर्सी से मूत्र-विसर्जन करते हैं और मोंटेक अह्लुबलिया जैसे लोग गरीब हटाने के लिए गरीबी कि डेफिनिशन बदल डालते हैं. तो मोदी साहिब का सपने बेचना काबिले-तारीफ है.....भले ही वो जीते या हारे या पी एम् बने या न बने या बनने के बाद कितनी दशा बदलेंगे ये बाद कि बात होगी लेकिन आज के उनके भाषण गौर करने लायक ज़रूर हैं. खास तौर से हम जैसे युवा तो ध्यान से सुन ही रहे हैं!

23.9.11

भेड़िये का उपवास !

आममुग्धता के गानों से
भाट-चारणों की तानो से
अंधेर नगरी की सूरत नहीं बदलती।


चढ़ा
लो अहं की इमारतें
बिछा दो नफरत की सड़कें
और लगा लो मेले
मासूमो की कब्रों पर
फिर दे दो 'बेशर्म विनाश' को
'विकास' का नाम
पर इतना लो जान

'वाईब्रेंट' का बोर्ड लगाने भर से
मरघट की हकीकत नहीं बदलती।

भेड़िया चंद रोज़ कर सकता है
शिकार से नागा, पर उसकी
कभी खूँरेजी फितरत नहीं बदलती।

22.1.11

मोदी के मंच से सम्मानित होंगे दारुल उलूम के कुलपति


अगर सब कुछ ठीक ठीक रहा तो गणतंत्र दिवस के मौके पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम (कुलपति) मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को सम्मानित करेंगे। मोदी ने यह घोषणा उस वक़्त की है जब दारुल उलूम के कुलपति के पद पर वस्तानवी की नियुक्ति हुए चंद दिन ही हुए हैं। वहीं मौलाना वस्तानवी ने दो दिन पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की दिल खोल कर तारीफ़ की थी।

विश्व की नंबर दो इस्लामिक संस्था के नव नियुक्त कुलपति मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी लगातार सुर्खियों में हैं। इन दिनों मुस्लिम जगत मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को लेकर दो खेमों में बंट गया है। एक उनके समर्थन में है और दूसरा विरोध में। इसी कड़ी में उनकी मुश्किलें अब और बढने वाली हैं। दरअसल गुजरात में मुसलमानों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही मोदी सरकार ने मौलाना वस्तानवी को गणतंत्र दिवस के मौके पर सम्मानित करने का फैसला किया है। बीजेपी के मुस्लिम नेताओं द्वारा वस्तानवी को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों सम्मानित किए जाने की योजना को अमली जामा पहनाने की कोशिश की जा रही है।

वुस्तानवी, हाल ही में अपने एक बयान के बाद आलोचकों के निशाने पर आ चुके हैं। और कई उलेमा द्वारा मौलाना वुस्तानवी को दारूल उलूम, देवबंद के कुलपति के पद से हटाए जाने की मांग की जा रही है। मौलाना ने अपने बयान में मुस्लिमों में कट्टरपंथी माने जाने वाले नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की तारीफ़ की थी जो मुस्लिम जगत को बेहद नागवार गुज़री थी।

ग़ौरतलब है कि मौलाना अपने इस बयान के बाद विवादों में घिर गये थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार में राज्य के अल्पसंख्यकों ने भी तरक्की की है और उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा रहा है। गुजरात में मुसलमानों की स्थिति पर खास कर गुजरात दंगों के बाद से हमेशा ही नरेंद्र मोदी पर उंगलियां उठती रही हैं, और ये पहला मौक़ा है जब किसी मुस्लिम धर्मगुरु ने मोदी सरकार की तारीफ की। हालांकि, वुस्तानवी के इस बयान की कई मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कडी आलोचना भी की थी।

वहीं उलेमा के एक बड़े संगठन ’जमीयत उलेमा-ए-हिंद’ ने चेतावनी दी है कि यदि मौलाना वुस्तानवी को कुलपति के पद से नहीं हटाया
गया तो जमीयत इसके ख़िलाफ़ एक तहरीक़ चलाएगी।

सूरत जिले के मंगरोल तहसील के वुस्तन गांव के रहने वाले वुस्तानवी आज ही देवबंद लौटे हैं। खबरों के मुताबिक वुस्तानवी के नजदीकी माने जाने वाले बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चे के कुछ नेताओं द्वारा वुस्तानवी को बीजेपी के मंच पर लाने की हर मुमकिन कोशिशें की जा रही हैं। पार्टी गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों उन्हें सम्मानित करने का मन बना चुकी है।