Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label outlook. Show all posts
Showing posts with label outlook. Show all posts

29.3.12

कम से कम बची तो है जान....

संसार के जंगल में रोज जाती है वो
गठरी मजबूरियों के भर-भर लाती है वो
चूल्हा धधकता तभी है पेट का
चुन-चुन बूंद जिंदगी को बुझाती हो वो
ओहदे, चेहरे, नाम, धर्म सबने कहा
चंद दिनों का और मुफलिसी का जीवन रहा
पर, मगर, सदियां बीत गईं सुनते-सुनते यही
अब तो बात बस उसके नहीं रही
बसें तो नहीं पर बस्तर पहुंचे लक्कड़. लोहा,
मिट्टी, गिट्टी, रेती, पानी, हवा,
पत्ते, पौधे, यहां तक कि जिंदगियों को चोर
मैना, कोयल, कूक, शाल, बीज
दशहरा, सल्फी, शहद, और मसूली भी
छोड़ हटरी उसकी बिक रही देश में चारो ओर
सियासत आती कहने मत रखो फूल पर
दुनियावी नाइंसाफियां भूलकर
रमन, रहनुमा है तुम्हारा
क्या नहीं जानते यह एहसान हमारा
छोड़ दो संस्कृति, संसार, मनाओ खैर कि
कम से कम बची तो है जान...
-सखाजी

22.2.12

Not news

संस्कृति विभाग के राहुल सिंह जी ने पिछले दिनों एक घटना पर ध्यानाकर्षित करवाया। एक कोई दबी कुचली सी लेखिका हैं लक्ष्मी शरथ। इन्होंने छत्तीसगढ़ की महिलाओं के छत्तीस पति होने जैसी टिप्पणी अपने एक लेख में की है। और इसे एक कहानी के रूप में चटखारे लेकर बतलाया है, जिसमें एक कोई टोप्पो और दूसरा कोई मुमताज आपस में चर्चा कर रहे थे। इसके बाद से जब मैंने इस लेखिका से बात की तो यह बड़ी बदमिजाज निकली। इतना ही नहीं डरी हुई भी निकली। अब यह कह रही है कि मुझे तो पर्यटन वालों ने बुलाया था। इस इश्यू को मैं मीडिया में नहीं लाना चाहता। चूंकि इससे होगा सो होगा किंतु इस दबी कुचली लेखिका को जरूर एकाध पहचान मिल जाएगी।
क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो बिना मीडिया में आए इसके खिलाफ केस दर्ज करवाए? और शेष मीडिया से भी मेरी अपील है कि वह इस घटना को छापे भी तो इसमें अपनी एक लाइन साफ करते हुए छापे कि हम लेखिका कौन है यह नहीं बताएंगे। इससे विवादों के सहारे संवाद करने वाले गैर जिम्मेदार लोगों की फेहरिश्त बढ़ेगी। अगर कोई ऐसा करना चाहता है तो वह शीघ्र करे।
- सखाजी

25.1.12

The Rushdi festival-12@Jaipur, UP and delhi.

The Rushdi festival-12@Jaipur, UP and delhi.
Literature festival dead on the cutter of Rushdi. No doubt Ruhdi is prominent writer and thinker. But while the festival media played only with Rushdi, like will Rushdi come?, will Rushdi chat, will Rushdi address through VC, will Rushdi’s stanzas allowed to recite? Etc.etc. But with this media coverage where was festival ? I think this was tough to know, what happened there, and how much people were presented. Through the festival we have some observations to review the whole phenomenon of the festival, why media played with only Rushdi’s concerns, why government both state and center did such?, why another writers are not been in discussion? Many f questions are arisen while the fest. Let we see now into the rehearsal of Media, Politics, Writer and the common man.
1. Media- It has no brain to cover fest, because they do not like to show only chidia, chunmun, patte, pattiyan, nadiyan, fool, prem, gulab, khushbu etc. very heavy words and no mass concerns are there. So media was very worry about the fest, while fest was an international prominent event, so naturally it has to be covered by media, but the problem is what viewers, listeners, reader, page viewers will get. Are they all be interested to know content of the fest. When it was negative that several people are not liking about fest’s content than media hyped the issue. It was the over all roll of media.
2. Party- To look ahead elections no party was ready to perches in cash animosity to the community Musilms. Congress played to come out from the crease and shot six out of boundary. SP, BSP and so on are not also interested to allow Rushdi to come India, BJP as all time confused, it repeats itself as confusion on the issue. Congress goaled really exactly into the net via Rushdi. Though it started controversy to get in the knowledge of all Muslims that everything can be in India if you will not be us, congress actualize this to the minority community that their real well wisher is congress. Congress gets its own object, BJP failed while it could not unveiled the real face of the government either state or center. Another parties do not know about the national concerns, they are larking only voter anyhow.
3. Writers- There were more than thousand prominent writers but only three person could be known among the public. Rushdi got great fame as more as he did not through ban book. But Ruchir also got something behind it, he gets fame as fearless writer who tried to recite satanic verses. And third is Sanjay Roy, who was key organizer. And no one is there who can be in the line of media. What concludes this actually. Writers are motivated to write something like disputing, controversial, objectionable, revolutionary etc. what with they all go back? All writers know very firmly that with out writing some sensational never become Rushdi. So consequence is fest promote writer to write something like it. Fest become totally diverted. I claim it is not good for any democracy where a person who written something against the community and will ban like Bangldesh. It is monarchy of congress and government like china who encroached Tibbat and exile the Dalai Lama, same as same did Bangladesh who exiled Taslima Nasreen. It is very embarrassing.
SAKHAJEE

22.12.11

पहिए सी चलती ये जिंदगी

तब धूप कंबल से भी रास्ता बनाकर आंखों के धो डालती, गाय रंभाकर बछड़े को पुकारने लगती, छाछ बनाती दादी दो रस्सियों को पकड़ नाचती सी। दातून के लिए बबूल की डालियों से झूलते ग्रामीण। सार (गौशाला) में घुसकर हरवाया जैसे गायों को गालियों से गुडमॉर्निंग कहता। सूं..सूं.. की आवाज और फिर ढिर..ढिर जैसे दूध लगना शुरू हुआ और जब पतीला पूरा भरने को है, तो आई आवाज। सुबह रामायण के पाठ की गूंज, दाज्जी (ताऊ) का जेहि सुमरत सिद्ध होई.. आगे कुछ न समझ आता। और फिर बारी होती स्कूल की तैयारी होती। मंजन, बस्ता, बस्ती, नहाना धोना, किताब कापी और स्लेट बत्ती रखने में हो जाता टाइम। जल्दी से खाना खाना रोज लेट होना दौडक़र घंटी बजने से पहले स्कूल में पहुंचना। टन-टन की आवाज और प्रार्थना वह शक्ति हमें दो दान कर्तव्य मार्ग पर डट जावें.. और फिर वही स्कूल, स्लेट, बत्ती, ब्लैक बोर्ड, मास्टर, कुंजी, कापी, फट्टी, किवाड़ और कुर्सी जैसे बार-बार आंखों को छूकर निकलते से हैं। रोटी खाने की छुट्टी (लंच) फिर मास्टसाब के लिए चाय। फिर दो अन्य विषयों भूगोल और सामाजिक अध्ययन की पढ़ाई और बस फिर छुट्टी। 4 बजे घर खेल, खलिहान, खेत और गलियारा। गुल्ली, गोली, गोवर और मिट्टी के खिलौने। बस यही जीवन। एक दम असली सा।



अब कोलगेट, वेस्टर्न टॉयलेट, यूरोपियन बाथरूम, म्यूजिक, गीजर, वाशिंग मशीन, बड़ा सा आइना और झम-झम करके बरसता शॉवर। कपड़े, टाई, बेल्ट, कोट, जूते न जाने कितने बंधन। नाश्ता, डायनिंग। न जाने क्या-क्या। अटैची, कागज, मोबाइल, आईपैड, लैपटॉप, चश्मा और फिर कार। सीट बेल्ट, लाइसेंस, कार के कागज और सरपट तारकोल को रौंदते टायर। ऑफिस, नमस्ते, सलाम साब, लेट, अरे इतने जल्दी, तुम्हारा कल का काम, आज यह नहीं वह, कल फिर से वही। साहिब चाय। फोन, ट्रिन. ट्रिन। मेल का क्या हुआ, जवाब दो। मुझे आज के आज सब कुछ चाहिए। जमीन। महत्वाकांक्षाएं, स्पर्धा, सर्वश्रेष्ठ, पिछड़ापन आदि। चंदना, वंदना, शीला, मुन्नी, मोहन, रोहन, सोहन न जाने कितने कौन, क्या उनका काम, कैसा अच्छा बुरा, खराब, नया पुराना और बस लैपटॉप बंद फिर वही शाम के 8 बजे। घर से फोन कब, कहां डिनर में क्या लोगे। घर, बेटा, बीवी, टीवी, ऑफिस की फाइलें, सुबह की प्लानिंग, एडमिशन, स्कूल, परेशान बेटा, चिंतित पत्नी। वीडियो गेम और न्यूज चैनल, सास बहु साजिश, दिल्ली में दो हत्या मुंबई में बलात्कार, विधायक एक करोड़ का, बाबू के पास 10 कारें, सोने के हार, अंधेरे को चीरती कुछ सनसनी सी, हीरा, हार, मोती, ज्योतिष मंगाए, खुश हो जाएं। मंगल को व्रत रखें, अंगूठी पहनें दांयी उंगली में ऑफर के साथ और न जाने कब आंख लग सी गई। बस यही जिंदगी। एक दम नकली सी।
- वरुण के सखाजी, चीफ रिपोर्टर, रायपुर दैनिक भास्कर

2.8.11

जूं भी नहीं रेंगता

मेरे अतिप्रिय मित्र प्रसून पुरोहित के पिता का एक दुर्घटना में देहांत हो गया। मैं स्व. जुगल किशोर पुरोहित अंकल समेत इस दुर्घटना के शिकार सभी लोगों की आत्मा की शांति के लिए कामना करता हूं। इस विषद दुर्घटना से आहत लोगों और रिश्तेदारों को ईश्वर साहस दे। यह दुर्घटना भोपाल से जबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-12 जयपुर-जबलपुर पर पडऩे वाले बारना नदी के पुल पर हुई। यह पुल 60 सालों से कई लोगों को निगलते आ रहा है। लेकिन रायसेन जिले के पैदाइशी तमाम नेताओं और प्रबुद्ध लोगों के सिर में जूं भी नहीं रेंगता। देखें इस जिले से किनका ताल्लुक कैसा रहा है:
- अटल बिहारी बाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री, 1989 में विदीशा से सांसद (पहले यह क्षेत्र विदीशा लोकसभा में आता था)
- स्व. डॉ. शंकर दयाल शर्मा, पूर्व राष्ट्रपति, इसी क्षेत्र की पैदाइश हैं, बाद में बेगम


बिया के कहने पर भोपाल शिफ्ट हो गए।
- रामपाल सिंह, पूर्व सांसद, विधायक, मंत्री भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष (शिवराज सिंह के दांए हाथ)
- शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री एवं पूर्व सांसद विदीशा
- जसवंत सिंह, पूर्व मंत्री, दिज्विजय सिंह के पहले कार्यकाल में मुख्यमंत्री के बेहद करीबी।
- डॉ. गौरीशंकर शेजवार, मंत्री, उमाभारती के बेहद करीबी, आडवाणी के नजदीकी।
- आशुतोष राणा, फिल्म कलाकार, (इसी जिले में इनकी पुस्तैनी जमीन है, हालांकि 7 साल की उम्र में गांव छोड़ा।
- आचार्य रजनीश, ओशो के नाम से मशहूर शख्शियत की जन्मस्थान इसी जिल में आता है।
- देश दुनिया में ऐसे कई और लोग हैं, जो यहां से ताल्लुक रखते हैं।
लेकिन मुझे अफसोस है, कि इस छोटी सी पुलिया को बनवाने की किसी में भी पुरुषता नहीं है। इन लोगों को लानत है।
-सखाजी

30.1.11

पहले तो हम अपनी पीठ थपथपाएं

यह बताने से पहले कि क्या कर रहे है, पहले तो हम अपनी पीठ थपथपालें। अब कुछ लिखता हूं।
प्रज्ञा दी, प्रखरता दी और दिया सम्मान, वाकई भैया रायपुर है महान। मैं इस शहर का आभारी हूं, जिसने मुझे वो सबकुछ दिया है, जो यह सबको देता है। मैं इसका और ज्यादा आभारी हो जाऊंगा अगर यह मुझे वो और दे देगा जो मुझे इससे अब चाहिए। जी हां अखबार की नौकरीनुमा रचनात्मकता में कहीं हम अपनी क्रियाशीलता तो बढ़ी पाते हैं, लेकिन रचनाशीलता को सिकुड़ा और पारंपरिक खांचों में फंसे जज्बात। इसी बात को ध्यान में रखकर हम कुछ लोगों ने गांधी पर एक अलग ढंग की फिल्म बनाने का फैसला किया है। यह काम कुछ-कुछ उसी तरह से है जैसे एक उद्योगपति के घर पर काम करने वाला माली उसकी हर अच्छी बुरी बात जानता है, लेकिन उस बात का इस्तेमाल नहीं। लेकिन अगर एकाध माली ऐसा कुछ जानने लग जाए तो उसे अतिरिक्त प्रज्ञा का धनी कहा जा सकता है। हम लोग भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। गांधी की प्रतिमा के नीचे खड़े होकर हम सबने इस फिल्म पर आज से औपचारिक रूप से काम करने का संकल्प लिया है। इसमें स्क्रिप्ट स्तर का काम रोहित और विनीत जी 5 फरवरी तक फाइनल कर देंगे। 15 फरवरी तक रोहित वरुण और नीरज कॉलेजों से इसके लिए पात्रों को खोजकर लाएंगे। 25 फरवरी तक वरुण इसकी पूरी शूटिंग रूप रेखा तैयार करके 26 फरवरी से शूटिंग स्टार्ट करेंगे। यह जिम्मा वरुण के पास ही रहेगा, कि कौन कैमरा चलाएगा, कौन एडिटिंग करेगा। साजसज्जा, फिल्म सेट्स, लोकेशन आदि की प्लानिंग। वहीं इस पुनीत और रचना के शुभ कार्य में हमारे सीनियर प्रसून जी का भी विशेष सहयोग मिल रहा है। विश्वविद्यालय में रावण के रूप में फैमस रहे हमारे साथी रंजीत की फिल्मी और नाटकीय प्रतिभा के इस्तेमाल की उनसे एसएमएस और मेल से बात हुई है। मित्रो यह कार्य ब्रम्हांड को अपने पैरों के नीचे रखने का बराबर है। यह फिल्म लोगों के बीच 1 अप्रैल तक होगी। इसकी संभावित रिलीज भी यही तारीख या रामनवमीं रहेगी। स्क्रिप्टिंग, शूटिंग, एक्टिंग, कोरियोग्राफी, फिल्मांकन, लोकेशन, इवेंट मैनेंिजग, एडिटिंग, पब्लिसिटी से लेकर सबकुछ काम हमारी यह टीम देखेगी। इस फिल्म के निर्माण से लेकर बहुत कुछ प्लानिंग है। दोस्तों संभव भी हो कि हम अपने मकसद में सफल न हो सकें। संभव भी है, कि हम इस प्रॉजेक्ट पर चंद कदमों पर ही ढेर हो जाएं। लेकिन आखिरी और आखिरी शब्द यही है, फिल्म तो बनकर रहेगी, और यह फिल्म जरूर बनेगी। गांधी जी से हमारा वायदा है दोस्त कि यह फिल्म जरूर बनेगी।
अंत में: फिल्म तो बनेगी भैया चाहे फिर कैसे भी बने। रचना यज्ञ में आहुति देने आप सभी पधारें। जय हे::::::::वरुण, ९००९९८६१७९
इनका आभार: श्री प्रसून जी, श्री विनीत जी, श्री रोहित जी, श्री नीरज जी, श्री श्याम जी, श्री भगत जी, श्री वो सब जो इस प्रॉजेक्ट से अबतक जुड़े हैं, और जो जुडऩे वाले हैं, या जो जुड़ेंगे ही जुड़ेंगे। और वो भी जो इसे हल्के से लेकर अंडर एस्टिमेट कर रहे हैं। इसके साथ ही वर्दी कमेंट्स भी हमें आपके चाहिए, जो आपको देने ही देने हैं।

22.1.11

जिंदगियां आपस में उलझ सी गई हैं


आदमी एक साथ न जाने कितनी जिंदगियां जी रहा होता है। पिछले दिनों मेरे साथ एक जिंदगी में कुछ ऐसा ही हुआ, जब दुनिया के तमाम संसाधनों को ही अपनी सफलता समझने वाली इस जिंदगी को एक छोटे से प्यादेनुमा व्यक्ति ने चुनौती दे डाली। दरअसल मामला है उस दौर का जब मैं बहुत संघर्ष के दौर से गुजर रहा था, वक्त ऐसा था कि करियर कुछ शेप लेता इससे पहले ही हादसे हो जाते। इससे निराश हो कर वह जिंदगी का इनचार्ज सीधा बड़ी जिंदगी के पास गया। बड़ी जिंदगी अक्सर यही कहती है बेटा कार्य पूरे मनोयोग से नहीं किया गया एक बार फिर कोशिश करो। छोटी जिंदगी के इनचार्ज महोदय वापस अपने काम में जुट जाते। उन्हें बड़ी जिंदगी की कही बात कुछ ऐसी लगती जैसे जो कुछ हो रहा है, वह परम सत्य और न्याय के तराजू और छन्नियों से होकर निकल रहा है। जिंदगी कुछ कह ही नहीं पाती। एक दिन उसे ऐहसास हुआ कि बेटा इस तरह से काम चलेगा नहीं, जरा सोचो तुम्हारो पास कुछ ऐसा तो है नहीं कि बड़ी जिंदगी हमेशा सही ही बोलेगी। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह झूठ बोल रही है। इस उहापोह में जिंदगियां कई बार आपस में ही उलझ जाती। लडक़र, घबराकर बड़ी ंिजदगी एक अपात बैठक इन जिंदगियों के साथ करती। लेकिन वह भी नाकामयाब।
आज कुछ मेरे साथ ऐसा ही हो रहा है, कि कई जिंदगियां आपस में उलझ सी गई हैं, और इतना लड़ रही हैं, न पूछो।।।।।।।।
क्या हुआ वो जो नहीं हुए हमारे इश्कपरस्त
मगर मियां मेहताब तो चार दिन ही चमकता है,
कह रहे हैं वो बार-बार इस कदर,
अगर जीना है तो जी इसी तरह,
सखाजी

21.9.10

Never shut your mouth

Do not keep peace around you because it makes a noise and noise creates irritation and should it be used the energy whichever emits while irritation than man can change the universe. kindly comment me to pace this discussion.
Barun K Sakhajee, +919009986179

14.9.10

Dabang ? What is there like Dabang.

There is a lot crowd, pushing each others, pulling shirts, abusing to be violating the queue, beating to the protester of uncontrolled queue men. I am talking about the ticket waiters of the Salman's film Dabang. This type of scenes can be seen at any cinema hall of the city, although multiplex maintains their expensiveness. I also visited to the multiplex to watch it after getting information about crowd gathering at single screens and house full at multiplex. Dabang is the film of violence, corruption supporting, with out any cause murdering, innocents killing, and very light acting of Dimpal, Vinod, Arwaz, simultaneously story, script, dialogs, scenes and sequences are weakening as film goes to climax. This film collects 48 crore with in four days, its marvelous. When i watched it, i could not understand what actually in the file, therefor i wrote it, if you having some words regarding it kindly comment and write for the people. What is in the film, that making it so much good responding film.