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14.8.12

जो टिकट खरीदता है...लाटरी भी उसी की खुलती है।


जो टिकट खरीदता है...लाटरी भी उसी की खुलती है।

शीर्षक थोड़ा अजीब है...जो लाटरी खरीदता है...लाटरी भी उसी की खुलती है...लेकिन मसला ही कुछ ऐसा है कि शायद लाटरी के माध्यम से ये बात आसानी से समझ में आ जाए। दरअसल मुद्दा है आंदोलन का...बात 1974 में सत्ता पलट देने वाले भ्रष्टाचार, बदहाल शिक्षा, बेरजगारी और महंगाई के खिलाफ जेपी के आंदोलन की नहीं...लोकपाल को लेकर अन्ना हजारे के आंदोलन की भी नहीं...और न ही विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वापस लाने को लेकर बाबा रामदेव के आंदोलन की है...लेकिन हम जब आगे बढ़ेंगे तो निश्चित ही 74 के जेपी के आंदोलन और हाल ही में जंतर मंतर पर हुए टीम अन्ना के आंदोलन के साथ ही बाबा रामदेव के आंदोलन का जिक्र इसमें जरूर आएगा। दरअसल बात है कि क्या जब किसी चीज की अति हो जाए तो उसके लिए आंदोलन की जरूरत है...और आंदोलन का कितना असर होता है...क्या वाकई में आंदोलन अपने मुकाम पर आसानी से पहुंचता है। हिंदुस्तान के परिपेक्ष्य में अगर बात करें तो भ्रष्टाचार अपने चरम पर है...ऐसा कोई दिन नहीं बीतता...जिस दिन टीवी चैनल पर या अख़बार में किसी न किसी घोटाले की खबर न आती होया छपती हो...गाहे – बगाहे इनमें लिप्त लोगों को सालों के बाद सजा भी होने की खबरें आती हैं...लेकिन इसके बाद भी ये सिलसिला रूकने की बजाए बढ़ता जा रहा है। शोषण जनता का होता है...और जनता के पैसे से भ्रष्ट कर्मचारी, अफसर और राजनेता ऐश करते हैं...इसके बाद भी जनता चुप रहती है...चुपचाप सब कुछ सहती है...या यूं कहें कि ये उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है कि उन्हें सरकारी दफ्तर में अपने छोटे से लेकर बड़े काम तक के लिए रिश्वत देनी पड़ती है...ऐसा भी कह सकते हैं कि लोगों ने इसे अपने दिलो दिमाग में बैठा लिया है...और उन्हें भी ये आसान तरीका लगता है कि ऐसे ही सही उनका काम हो गया...और लोग बजाए भ्रष्टाचार के इस बात की चर्चा करते दिखाई दे जाते हैं कि मैंने तो फलां काम सिर्फ 500 या 1000 रूपए की रिश्वत देकर करा लिया...जबकि सामने वाले उस काम के लिए 3000 से 4000 रूपए मांग रहा था...यहां ये स्थिति होता है कि लोग सोचते हैं कि उन्होंने अपने 2500 से 3000 रूपए बचा लिया। इसमें इनका भी कोई दोष नहीं है, दरअसल स्थिति है ही ऐसी की अगर बिना रिश्वत दिए वे अपना काम करवाना चाहें तो उसमें तमाम तरह की आपत्तियां लगा दी जाती हैं...और उस काम को होने में महीनों और कई बार सालों लग जाते हैं...ऐसे में लोगों को लगता है कि कुछ पैसे देकर अपना काम करवा लेना एक आसान विकल्प है। लेकिन उनका ये आसान विकल्प भ्रष्ट कर्मचारियों, अफसरों और नेताओँ के लिए हथियार बन जाता है और वे इसे अपनी ताकत समझने लगे हैं। और जब ये ताकत उनकी आदत में शुमार हो जाती है तो अति होना लाजिमी है। बात ऐसी ही किसी अति के खिलाफ आंदोलन की जरूरत पर हो रही थी...लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आंदोलन की शुरूआत कौन करे...कौन भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के लिए आंदोलन की बिगुल बजाए। असल जिंदगी में लोग अपनी दो वक्त की रोटी जुगाड़ने में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि अगर किसी दिन काम पर न जाएं तो शायद उस दिन घर में चूल्हा न जले...ये हकीकत है उन करोड़ों परिवारों की जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं...और जिनके लिए रोज कुंआ खोद कर पानी पीना उनकी मजबूरी है। लेकिन सवाल ये भी है कि अगर आंदोलन की बिगुल नहीं बजेगा तो कैसे कुंभकर्णी सरकार की नींद टूटेगी। आंदोलन की जरूरत भी है...और इसका बिगुल बजाने की भी...क्योंकि जैसा कि शीर्षक है कि अगर आपको लाटरी जीतनी है तो लाटरी का टिकट तो खरीदना ही पड़ेगा...यानि बदलाव लाना है...भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को जगाना है तो आंदोलन तो करना ही होगा...जब आंदोलन होगा तो निश्चित ही भ्रष्टाचार से त्रस्त लोग आंदोलन से जुड़ेंगे...भले ही वो समय न दे पाएं...इतिहास गवाह है ऐसे आंदोलन को भारी जनसमर्थन मिलता आया है...1974 में भ्रष्टाचार, बदहाल शिक्षा, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ जय प्रकाश नारायण ने आंदोलन का बिगुल बजाया था तो आंदोलन के समर्थन में सड़कों पर हुजूम उमड़ पड़ता था...गली नुक्कड़ों में पटना के प्रसिद्ध कवि सत्यनारायण अपनी कविताओँ से शब्द गर्जना करते थे तो लोगों को जोश ए जुनून आसामन को छूने लगता था...सत्यनारायण कहते थे...
जुल्म का चक्कर और तबाही कितने दिन...हम पर तुम और सर्द स्याही कितने दिन...ये गोली, बंदूक, सिपाही कितने दिन...सच कहने की मनाही कहो कितने दिन, कितने दिन
जेपी के उस आंदोलन ने सत्ता पलट दी थी...जेपी ने उस आंदोलन की नींव रखी थी...या यूं कहें कि लाटरी का टिकट खरीदा था...अगर जेपी आंदोलन रूपी लाटरी का टिकट नहीं खरीदते तो शायद आज इस लेख में 1974 के जेपी आंदोलन का जिक्र मैं नहीं कर रहा होता...ये अलग बात है कि जेपी के सफल आंदोलन के नतीजे जरूर विफल रहे...लेकिन जेपी ने इसकी शुरूआत तो की ही। ठीक इसी तरह अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए लोकपाल की वकालत करते हुए आंदोलन किया...और बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वापस लाने के लिए आंदोलन का शंखनाद किया...यहां भी हमें देखने को मिला कि इन दोनों आंदोलनों को भारी जनसमर्थन मिला...यानि लोग भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं...इसलिए लोगों ने बढ़चढ़कर आंदोलनों में भाग लिया...परिणाम भले ही कुछ भी हों...इसके पीछे की उनकी मंशा कुछ भी रही हो...लेकिन अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने लाटरी का टिकट खरीदने की हिम्मत तो जुटायी...अब लाटरी खुले या न खुले ये अलग बात है...लेकिन आप इस बात को नहीं झुठला सकते कि जो लाटरी का टिकट खरीदता है...लाटरी उसी की निकलती है। इसलिए कुछ करने की ईच्छा है...कुछ करने का मन है तो परिणाम की मत सोचिए...लाटरी का टिकट जरूर खरीदें...वरना आपकी स्थिति भी वैसी ही हो जाएगी जैसी कि जो किस्सा मैं नीचे सुनाने जा रहा हूं...उसमे मंदिर के पुजारी की हुई थी।
एक मंदिर का पुजारी जिसने अपना पूरा जीवन प्रभु की भक्ति में गुजार दिया...एक दिन भगवान की मूर्ति के सामने खड़ा होकर बोला...हे प्रभु – मैंने जीवन में आज तक आपसे कुछ नहीं मांगा...सदा आपकी तन मन से सेवा की...बस मुझ पर एक कृपा कीजिए और मेरी एक दस लाख की लाटरी खुलवा दीजिए...ये कहकर पुजारी घर चले गए...पुजारी रोज आते...रोज प्रभु से प्रार्थना करते लेकिन पुजारी की लाटरी नहीं खुली...इस तरह जब 2 माह बीत गए...तो एक दिन पुजारी ने गुस्से में प्रभु से कहा – प्रभु मैंने आपकी भक्ति में कोई कमी नहीं छोड़ी...दिन रात आपकी भक्ति की...फिर भी आपने मेरी विनती नहीं सुनी और मेरी लाटरी नहीं खुली। पुजारी के सामने अचानक भगवान प्रकट होते हैं...और पुजारी से कहते हैं...वत्स पहले जाकर लाटरी का टिकट तो खरीद लो

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

जो टिकट खरीदता है...लाटरी भी उसी की खुलती है।


जो टिकट खरीदता है...लाटरी भी उसी की खुलती है।

शीर्षक थोड़ा अजीब है...जो लाटरी खरीदता है...लाटरी भी उसी की खुलती है...लेकिन मसला ही कुछ ऐसा है कि शायद लाटरी के माध्यम से ये बात आसानी से समझ में आ जाए। दरअसल मुद्दा है आंदोलन का...बात 1974 में सत्ता पलट देने वाले भ्रष्टाचार, बदहाल शिक्षा, बेरजगारी और महंगाई के खिलाफ जेपी के आंदोलन की नहीं...लोकपाल को लेकर अन्ना हजारे के आंदोलन की भी नहीं...और न ही विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वापस लाने को लेकर बाबा रामदेव के आंदोलन की है...लेकिन हम जब आगे बढ़ेंगे तो निश्चित ही 74 के जेपी के आंदोलन और हाल ही में जंतर मंतर पर हुए टीम अन्ना के आंदोलन के साथ ही बाबा रामदेव के आंदोलन का जिक्र इसमें जरूर आएगा। दरअसल बात है कि क्या जब किसी चीज की अति हो जाए तो उसके लिए आंदोलन की जरूरत है...और आंदोलन का कितना असर होता है...क्या वाकई में आंदोलन अपने मुकाम पर आसानी से पहुंचता है। हिंदुस्तान के परिपेक्ष्य में अगर बात करें तो भ्रष्टाचार अपने चरम पर है...ऐसा कोई दिन नहीं बीतता...जिस दिन टीवी चैनल पर या अख़बार में किसी न किसी घोटाले की खबर न आती होया छपती हो...गाहे – बगाहे इनमें लिप्त लोगों को सालों के बाद सजा भी होने की खबरें आती हैं...लेकिन इसके बाद भी ये सिलसिला रूकने की बजाए बढ़ता जा रहा है। शोषण जनता का होता है...और जनता के पैसे से भ्रष्ट कर्मचारी, अफसर और राजनेता ऐश करते हैं...इसके बाद भी जनता चुप रहती है...चुपचाप सब कुछ सहती है...या यूं कहें कि ये उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है कि उन्हें सरकारी दफ्तर में अपने छोटे से लेकर बड़े काम तक के लिए रिश्वत देनी पड़ती है...ऐसा भी कह सकते हैं कि लोगों ने इसे अपने दिलो दिमाग में बैठा लिया है...और उन्हें भी ये आसान तरीका लगता है कि ऐसे ही सही उनका काम हो गया...और लोग बजाए भ्रष्टाचार के इस बात की चर्चा करते दिखाई दे जाते हैं कि मैंने तो फलां काम सिर्फ 500 या 1000 रूपए की रिश्वत देकर करा लिया...जबकि सामने वाले उस काम के लिए 3000 से 4000 रूपए मांग रहा था...यहां ये स्थिति होता है कि लोग सोचते हैं कि उन्होंने अपने 2500 से 3000 रूपए बचा लिया। इसमें इनका भी कोई दोष नहीं है, दरअसल स्थिति है ही ऐसी की अगर बिना रिश्वत दिए वे अपना काम करवाना चाहें तो उसमें तमाम तरह की आपत्तियां लगा दी जाती हैं...और उस काम को होने में महीनों और कई बार सालों लग जाते हैं...ऐसे में लोगों को लगता है कि कुछ पैसे देकर अपना काम करवा लेना एक आसान विकल्प है। लेकिन उनका ये आसान विकल्प भ्रष्ट कर्मचारियों, अफसरों और नेताओँ के लिए हथियार बन जाता है और वे इसे अपनी ताकत समझने लगे हैं। और जब ये ताकत उनकी आदत में शुमार हो जाती है तो अति होना लाजिमी है। बात ऐसी ही किसी अति के खिलाफ आंदोलन की जरूरत पर हो रही थी...लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आंदोलन की शुरूआत कौन करे...कौन भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के लिए आंदोलन की बिगुल बजाए। असल जिंदगी में लोग अपनी दो वक्त की रोटी जुगाड़ने में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि अगर किसी दिन काम पर न जाएं तो शायद उस दिन घर में चूल्हा न जले...ये हकीकत है उन करोड़ों परिवारों की जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं...और जिनके लिए रोज कुंआ खोद कर पानी पीना उनकी मजबूरी है। लेकिन सवाल ये भी है कि अगर आंदोलन की बिगुल नहीं बजेगा तो कैसे कुंभकर्णी सरकार की नींद टूटेगी। आंदोलन की जरूरत भी है...और इसका बिगुल बजाने की भी...क्योंकि जैसा कि शीर्षक है कि अगर आपको लाटरी जीतनी है तो लाटरी का टिकट तो खरीदना ही पड़ेगा...यानि बदलाव लाना है...भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को जगाना है तो आंदोलन तो करना ही होगा...जब आंदोलन होगा तो निश्चित ही भ्रष्टाचार से त्रस्त लोग आंदोलन से जुड़ेंगे...भले ही वो समय न दे पाएं...इतिहास गवाह है ऐसे आंदोलन को भारी जनसमर्थन मिलता आया है...1974 में भ्रष्टाचार, बदहाल शिक्षा, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ जय प्रकाश नारायण ने आंदोलन का बिगुल बजाया था तो आंदोलन के समर्थन में सड़कों पर हुजूम उमड़ पड़ता था...गली नुक्कड़ों में पटना के प्रसिद्ध कवि सत्यनारायण अपनी कविताओँ से शब्द गर्जना करते थे तो लोगों को जोश ए जुनून आसामन को छूने लगता था...सत्यनारायण कहते थे...
जुल्म का चक्कर और तबाही कितने दिन...हम पर तुम और सर्द स्याही कितने दिन...ये गोली, बंदूक, सिपाही कितने दिन...सच कहने की मनाही कहो कितने दिन, कितने दिन
जेपी के उस आंदोलन ने सत्ता पलट दी थी...जेपी ने उस आंदोलन की नींव रखी थी...या यूं कहें कि लाटरी का टिकट खरीदा था...अगर जेपी आंदोलन रूपी लाटरी का टिकट नहीं खरीदते तो शायद आज इस लेख में 1974 के जेपी आंदोलन का जिक्र मैं नहीं कर रहा होता...ये अलग बात है कि जेपी के सफल आंदोलन के नतीजे जरूर विफल रहे...लेकिन जेपी ने इसकी शुरूआत तो की ही। ठीक इसी तरह अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए लोकपाल की वकालत करते हुए आंदोलन किया...और बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वापस लाने के लिए आंदोलन का शंखनाद किया...यहां भी हमें देखने को मिला कि इन दोनों आंदोलनों को भारी जनसमर्थन मिला...यानि लोग भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं...इसलिए लोगों ने बढ़चढ़कर आंदोलनों में भाग लिया...परिणाम भले ही कुछ भी हों...इसके पीछे की उनकी मंशा कुछ भी रही हो...लेकिन अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने लाटरी का टिकट खरीदने की हिम्मत तो जुटायी...अब लाटरी खुले या न खुले ये अलग बात है...लेकिन आप इस बात को नहीं झुठला सकते कि जो लाटरी का टिकट खरीदता है...लाटरी उसी की निकलती है। इसलिए कुछ करने की ईच्छा है...कुछ करने का मन है तो परिणाम की मत सोचिए...लाटरी का टिकट जरूर खरीदें...वरना आपकी स्थिति भी वैसी ही हो जाएगी जैसी कि जो किस्सा मैं नीचे सुनाने जा रहा हूं...उसमे मंदिर के पुजारी की हुई थी।
एक मंदिर का पुजारी जिसने अपना पूरा जीवन प्रभु की भक्ति में गुजार दिया...एक दिन भगवान की मूर्ति के सामने खड़ा होकर बोला...हे प्रभु – मैंने जीवन में आज तक आपसे कुछ नहीं मांगा...सदा आपकी तन मन से सेवा की...बस मुझ पर एक कृपा कीजिए और मेरी एक दस लाख की लाटरी खुलवा दीजिए...ये कहकर पुजारी घर चले गए...पुजारी रोज आते...रोज प्रभु से प्रार्थना करते लेकिन पुजारी की लाटरी नहीं खुली...इस तरह जब 2 माह बीत गए...तो एक दिन पुजारी ने गुस्से में प्रभु से कहा – प्रभु मैंने आपकी भक्ति में कोई कमी नहीं छोड़ी...दिन रात आपकी भक्ति की...फिर भी आपने मेरी विनती नहीं सुनी और मेरी लाटरी नहीं खुली। पुजारी के सामने अचानक भगवान प्रकट होते हैं...और पुजारी से कहते हैं...वत्स पहले जाकर लाटरी का टिकट तो खरीद लो

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

13.8.12

तुम याद आ गए । (गीत)


(Google Images)


तुम  याद  आ  गए । (गीत)


किसीने     छेड़ा    यूँ     ही    ज़िक्र    तेरा,    तुम  याद  आ  गए 


कुछ  महक  रहा  है  दिल  में  फिर  से, बस   तुम  याद  आ  गए ।


अंतरा-१.


दो  सांसो  का  घुलमिल  जाना, वो  अधर  मघुरस  झरना । 


मधुरस ने  घूँघट फिर  उकसाया, बस  तुम  याद  आ  गए ।


किसी ने   छेड़ा   यूँ   ही   ज़िक्र   तेरा, तुम  याद  आ  गए ।


(उकसाना = उठाना)


अंतरा-२.


खिला-खिला  सा  चेहरा और  वो  तिरछी  नज़र  का  पहरा ।


कनखियोँ से फिर किसी ने देखा, बस तुम  याद  आ  गये ।  


किसी ने   छेड़ा    यूँ   ही   ज़िक्र   तेरा, तुम  याद  आ  गए ।


(कनखियोँ से देखना=निगाहेँ बचा कर देखना)


अंतरा-३.


इस   जहाँ   की  तुम  नहीं  थीं, शायद आसमाँ  की  परी  थी..!


उगते  चाँद ने  फिर  दिल को  छूआ,बस  तुम  याद  आ  गये ।


किसी   ने    छेड़ा   यूँ     ही   ज़िक्र   तेरा,  तुम  याद  आ  गए ।


अंतरा-४.


बात   नहीं   जज़बातों   में, औकात   नहीं    इन  सांसो  में ।


रूठ  चाँद से अभी-अभी खग टूटा, बस  तुम  याद  आ  गए । 


किसी ने   छेड़ा    यूँ   ही   ज़िक्र   तेरा, तुम  याद  आ  गए ।


(जज़बात=मनोभाव; औक़ात=सामर्थ्य शक्ति;  खग=तारा)


मार्कण्ड दवे । दिनांकः १३-०८-२०१२.

आत्मदर्शन Visualization


आत्मदर्शन Visualization
आत्मदर्शन शायद सबसे मुख्य विधा है जिसकी मदद से आप अपने जीवन को अभीष्ट दिशा में ले जा सकते हो। जो कुछ आप चारों तरफ देख रहे हैं, वह प्रारंभ में एक सिर्फ विचार ही होता है। जैसे यह कप जिसमें आप चाय ही रहे हैं या यह घर जिसमें आज आप रहते हैं, बनने से पहले वह कभी आपके मन में एक विचार के रूप में ही था कि आप ऐसा घर बनाना चाहते हैं। फिर आपने उसकी योजना बनाना शुरू किया, उसका नक्शा बनवाया और इसके बाद उसका निर्माण करवाया। तब जाकर उसका भौतिक अस्तित्व सामने आया जिसमें आज आप रहते हैं। इस तरह मनुष्य का जीवन हमेशा समय की पटरी पर निरंतर आगे ही चलता जाता है और कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखता है।
               भूतकाल                                                                                                 भविष्य
               ---------------------------------------------------------------------------------------------->            
आप इस बात को समझ लीजिये कि हमारे चारों तरफ जो कुछ भी है, वह शुरू में मात्र एक विचार, एक ऊर्जा, एक तरंग होती है। यह समझना बहुत आवश्यक है, यही एक तरीका है जिससे आप समझ सकते हैं कि ऊर्जा ही पदार्थ में परिवर्तित होती है। जरा सोचिये कि एक हिप्नोटिस्ट आपको यह मानने के लिए बाध्य कर देता है कि आपकी हथेली में जो सिक्का है वह बहुत गर्म है, उसकी गर्मी से आपकी हथेली लाल हो जाती है, यहाँ तक कि आपके हाथ में फफोले भी पड़ सकते हैं। यहाँ सिक्का सिर्फ विचार के द्वारा ही आपको गर्म लगने लगा था। यदि आपने यह सोचा होता कि आपकी हथेली पर रखा सिक्का ठंडा है तो क्या आपकी त्वचा लाल हुई होती?
यदि आप यह विश्वास कर चुके हैं (लेकिन मेरे खयाल से आप अभी करेंगे नहीं) कि एक अमुक विचार से कुछ ही सैकंड में पदार्थ अपनी अवस्था बदल सकता है। तो एक उपयुक्त विचार ट्यूमर (कैंसर) की अवस्था में बदलाव क्यों नहीं कर सकता है। कई वर्षों से आत्मदर्शन के प्रशिक्षक श्री कार्ल सिमोन्टन यही बात साबित करने की कौशिश तो कर रहे हैं। लोथर हरनाइसे (कुछ बिंदुओं को छोड़ कर) उनकी शोध का बहुत सम्मान करते हैं। अपने कई प्रयोगों से कार्ल ने यह सिद्ध किया है कि कैंसर के वे रोगी अधिक समय तक जीवित रहे जिन्होंने आत्मदर्शन विधा को सही ढंग से अपनाया था। सिमोन्टन अपने कैंसर के रोगियों को  सिखाते हैं कि वे यह कल्पना करें कि उनकी श्वेत-कोशिकाएं कैंसर कोशिकाओं पर आक्रमण कर रही हैं, उन्हें नेस्तनाबूत कर रही हैं। लेकिन लोथर इस तरह के विचार से सहमत नहीं है। क्योंकि पहले तो इस विचार में रोगी अपने ट्यूमर पर ध्यान कैंद्रित करता है जबकि वे यह मानते हैं कि मुख्य समस्या कुछ और है ट्यूमर का महत्व द्वितीयक है। दूसरा रोगी अपने शरीर में एक युद्ध का विचार मन में लाता है, जब कि वे शत प्रतिशत यह मानते हैं कि कैंसर के रोगी को संतुलन और तारतम्य (Harmony) की आवश्यकता होती है, न कि युद्ध की कल्पना करने की।
श्री लोथर ने कैंसर के सैंकड़ों विजेताओं से साक्षात्कार किया है और वे इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि कैंसर का रोगी अपने ट्यूमर से सीधा सामना करने से बचता है, लेकिन अपने स्वस्थ भविष्य की सुखद कल्पनाओं में डूबे रहना पसन्द करता है। हालांकि हर रोगी की अपनी अलग तकनीक होती है, लेकिन सबका अंत समान ही होता है, अपने सुखद भविष्य का सृजन करना। लोथर यह मानते हैं कि उनके 3E कार्यक्रम में सबसे अहम कोई बिंदु है तो वह आत्मदर्शन ही है। क्योंकि यदि अपना भविष्य हम सृजन नहीं करेंगें तो और कौन करेगा? कृपया अपनी समय रेखा का पुनः अवलोकन कीजिये और विचार- वस्तु रेखा से इसकी तुलना कीजिये।
               विचार                                                                                                वस्तु
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              भूतकाल                                                                                              भविष्य
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दोनों रेखाएं एक ही दिशा में चल रही हैं और दोनों पीछे नहीं मुड़ती हैं। आप इनमें से किसी भी रेखा को पीछे नहीं मोड़ सकते हैं। इसलिए आज से ही प्रारंभ करें, खुद अपने भविष्य का सृजन करना शुरू करें।
नीचे मैं आपको श्री लोथर की तकनीक को विस्तार से समझाने की कौशिश करूँगा, जो उन्होंने अपने मित्रों और यूरोप के प्रसिद्ध आत्मदर्शन के प्रशिक्षक जेक ब्लैक और क्लॉस पर्टल से सीखी है। पिछले कुछ वर्षों में ग्लॉसगो के जेक ब्लैक  ने अपनी माइंड स्टोर सिस्टम 50,000 से ज्यादा लोगों को सिखाया है। वे कई विख्यात लोगों और कम्पनियों के कंसल्टेंट है। लोथर कहते हैं कि कैंसर के हर रोगी को जेक ब्लैक (अंग्रेजी) या क्लॉस पर्टल (जर्मन) के सेमीनार में जाकर आत्मदर्शन की तकनीक सीखना ही चाहिये।
आमतौर पर कैंसर का रोगी यह सोचता है कि उसके लिए सबसे मुख्य काम ट्यूमर को नष्ट करना है, जब ट्यूमर से मुक्ति मिल जायेगी तब वह कोई आध्यात्मिक उपचार को अपनायेगा। लेकिन यह बहुत जोखिम भरा निर्णय है। यह बहुत जरूरी है कि रोगी ट्यूमर को खत्म करने के उपचार के साथ ही आत्मदर्शन तकनीक से अपने सुखद भविष्य का सृजन भी करना शुरू करे। 
कैसे? यह शब्द भी बहुत महत्व रखता है क्योंकि यह कई अहम निर्णय लेने में व्यवधान पैदा करता है। प्रायः जिन लोगों ने कभी ध्यान (Meditation) नहीं किया है या जिनके विचार आध्यात्मिक नहीं हैं, आत्मदर्शन के महत्व को नहीं समझ पाते हैं।  इसलिए यह सोचने की गलती मत कीजिये कि यह आत्मदर्शन कैसे ट्यूमर को नष्ट करेगा, बल्कि मुझ पर और लोथर पर विश्वास कर लीजिये कि यह कार्य करता है।
वैसे आपको आत्मदर्शन सिखाने वाले कई प्रशिक्षक मिल जायेंगे। लेकिन अधिकांश प्रशिक्षकों को कैंसर के रोगियों को आत्मदर्शन सिखाने का अनुभव नहीं होता है। वे आठ दिन तक आपको अधूरा ज्ञान देते हैं, और कुछ ही दिनों में आप फिर सब कुछ भूल जाते हैं।  एक अच्छे प्रशिक्षक  की पहचान करना भी कठिन काम है।
संक्षेप में मैं यही कहूँगा कि आप अपने प्रशिक्षक से अपने भविष्य को सुखद बनाने की तकनीक सीखें। भूत या वर्तमान पर अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं है। लोथर कहते हैं कि यदि आप अपने भूतकाल के बारे में जानते हैं तो भविष्य को बदलना आसान रहता है। लोथर यह नहीं कहते हैं कि रोगी अपने भूतकाल के बारे में बिलकुल नहीं सोचे, आप उन्हें गलत मत समझिये। कैंसर के उपचार में भविष्य के सृजन पर पर्याप्त ध्यान देना आवश्यक होता है।
नदिया के दांये तट पर आपका ड्रीम हाउस

अपने शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालने के लिए बहुत जरूरी है कि आप बिलकुल शांत (Relaxed State) होकर विचार और सृजन करना शुरू करें। शान्त होना पहली प्रक्रिया है। इसके लिए आपको अल्फा स्थिति में आना जरूरी है। अल्फा शब्द का मतलब मस्तिष्क की शांत अवस्था है। जैसे ई.ई.जी. में मस्तिष्क की चेतना का चित्रण होता है। मस्तिष्क में शांत अवस्था (7-14 hertz))  में उत्पन्न तरंगों को अल्फा तरंग कहते हैं (बीटा, थीटा और डेल्टा अन्य तरंगें होती हैं)। मन को शांत करने के लिए कई तकनीकें या मेडीटेशन सिखाया जाता है। इसके लिए कुछ पुस्तकें और सी.डी. भी मिल जाती हैं। या आप शास्त्रीय संगीत भी सुन सकते हैं।  
जब आप शांति की गहन अवस्था को पूरी तरह प्राप्त करलें, तभी आप कल्पना करना शुरू करे। आप सोचिये कि आप एक शांत नदी के दाएं तट पर चलते जा रहे हैं। थोड़ा आगे चल कर आप दाई तरफ मुड़ते हैं। आपको नीला आकाश और हरियाली दिखाई देती है। हरे-भरे पेड़ों के बीच में एक सुन्दर सा घर दिखाई देता है, जिसकी छत लाल रंग की है (कृपया अपने ड्रीम हाउस की कल्पना कीजिये) । अब आप घर में प्रवेश करते हैं और एक सुन्दर से स्नान घर में जाते हैं, जहाँ एक शावर लगा है। शावर के नीचे खड़े होकर आप अपनी सारी नकारात्मकता को धो डालते हैं।  इसके बाद आप सूर्य की सुनहरी धूप में बैठते हैं, जहाँ कुछ ही पलों में तेज धूप आपके शरीर को सुखा देती है।
इसके बाद आप एक स्क्रीन रूम में जाते हैं। आपके सामने वाली दीवार पर तीन बड़े स्क्रीन लगे हैं। आप स्क्रीन के सामने एक सोफे पर आराम से बैठ जाते हैं। आपके हाथ में रिमोट कंट्रोल होता है। बांई तरफ का स्क्रीन  भविष्य के दृश्य बताता है, दाहिनी तरफ का स्क्रीन भूतकाल के दृश्य दिखाता है और बीच का स्क्रीन वर्तमान के दृश्य दिखाता है। आपको जो कुछ भी समस्या हो आप रिमोट से बीच का स्क्रीन चालू कीजिये। आप यह स्वीकार कीजिये कि आपके पहले भी कई लोगों को यह तकलीफ हो चुकी है। अब आप दाहिनें स्क्रीन को  चालू कीजिये। आप भूतकाल में यह देखिये कि क्या आपको पहले भी यह तकलीफ हुई थी? यदि हुई थी तो क्या आपने इसका समाधान ढूँढ़ लिया था? आमतौर पर वर्तमान की चुनौतियों का समाधान  भूतकान में नहीं मिलता है।  लेकिन यदि कोई तकलीफ जीवन में दो बार घटित हो जाये, तो भूतकाल में उसका समाधान ढूँढ़ना बहुत हितकर होता है।  अब आप रिमोट कंट्रोल की मदद से इस स्क्रीन  की तस्वीर को छोटा करके पॉज कर दें। इसके बाद आप रिमोट कंट्रोल की मदद से बीच वाले स्क्रीन की तस्वीर को भी छोटा कर दें और पॉज का बटन दबा दें।  
अब आप शांत होकर बाएं स्क्रीन को चालू करें और अपनी समस्या का समाधान खोजने की कौशिश करें। ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिये जहाँ आपकी समस्या पहले ही ठीक हो चुकी है। जैसे आपकी बाई जांघ में एक ट्यूमर है, जिसकी वजह से आप चल भी नहीं पाते हैं। अब आप कल्पना कीजिये कि पर आप दोस्तों के साथ स्कीइंग कर रहे हैं। आप बर्फ की चोटियों, सर्द हवाओं, दोस्तों के हंसने की आवाजें और आपकी तेज चलती सांसों को महसूस कीजिये। अब इन तस्वीरों को बड़ा करें, उनकी ब्राइटनेस बढ़ाएं और अपने शरीर पर इन तस्वीरों के प्रतिबिंब को अनुभव करें। जब भी वक्त मिले आप रोज स्क्रीन रूम में जाइये और स्वयं को स्कीइंग करते हुए निहारिये। अब आपको बीच या दाहिने स्क्रीन  पर देखने की जरूरत नहीं है। सीधे बांए स्क्रीन  पर देखिये।
आपका अगला कार्य अपने स्कीइंग के इस वीडियो को एक केसेट में रिकॉर्ड करना है। अब इस वीडियो टेप को अपने सामने एक टेबल पर रखे "यूनीवर्स वीडियो रिकॉर्डर" में डालिये और इस रिकॉर्डिंग को पूरे संसार में रिले कर दीजिये। यह बहुत जरूरी बात है। इससे आपके सभी लोग आपके भावी उद्देष्य के अवगत हो जायेंगे। इस तरह अचानक दूसरे लोग जो आपकी मदद करना चाहते हैं, आपके जीवन में आ जायेंगे। इसके बाद आप घर से बाहर निकलें और नदी के किनारे लौट आयें। सात तक गिनती करें और आत्मदर्शन के सत्र का समापन कर दें।
मैं जानता हूँ कि शुरू में आपको यह सब समझ के परे की बात लगेगी। लेकिन मुझ पर विश्वास कीजिये, जल्दी ही आपको इसके अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे। यदि आपको फिर भी विश्वास नहीं है तो आप यह छोटी सी तकनीक आजमा कर देखिये। मसलन एयरपोर्ट या रेल्वे स्टेशन पर पार्किंग प्लेस के बारे में विचार कीजिये या अपने बिजनेस पार्टनर्स के साथ मीटिंग के परिणाम के बारे में सोचिये। यदि यह छोटा सा टोटका काम करता है तो कोई बड़ी बात के बारे में कल्पना कीजिये। जब पूरा आत्मविश्वास हो जाये तब अपना भविष्य संवारना शुरू कीजिये।
एक बात का विशेष ध्यान रखिये कि अंत हमेशा सबके लिए सुखद होना चाहिये। अपने फायदे के लिए किसी का नुकसान नहीं होना चाहिये।
नदिया के दांये तट पर अपने मकान  में कुछ और कमरे बनवाइये
नदिया के किनारे स्थित आपके ड्रीम हाउस में कुछ और कमरे भी बनवा सकते हैं। जैसे आप एक कमरा अपने लिए विश्राम करने और रिलेक्सेशन के लिए बनवा सकते हैं, जहाँ आप दर्द होने पर रिलेक्स होने के लिए जा सकते हैं। आप एक गोष्ठी के लिए बैठक बनवा सकते हैं। इस बैठक में आप महत्वपूर्ण लोगों को बुला सकते हैं और उनकी अमूल्य राय ले सकते हैं। आप किसी भी हस्ती को जैसे महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, आइंस्टीन, लोथर हरनाइसे,  डॉ. बुडविग, प्रोफेसर अब्दुल कलाम और मदर टरेसा को बुलवा कर आमने-सामने बैठ कर अपनी समस्या के बारे में उनकी राय ले सकते हो।
आप अपने सारे रिश्तेदारों और करीबी दोस्तों को बुलवा कर एक समारोह का आयोजन कर सकते हैं। सब लोग आपके सामने कुर्सियों पर बैठे होगे और आप मंच पर खड़े होकर अपनी स्कीइंग या अमरनाथ की यात्रा के अनुभवों को रोचक ढंग से बता रहे हैं।  सारांश यह है कि कहानी कुछ भी हो आप स्वस्थ हैं और आपको स्वस्थ हालत में सब देख रहे हैं। इसलिए ये सब भी आपको अपना सुखद भविष्य बनाने में मदद करेंगे।  
एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि नदिया के दाहिने किनारे बने मकान में कितनी बार जाना चाहिये। वैसे तो कोई निश्चित नियम नहीं हैं। फिर भी इस बारे में लोथर यही कहते हैं कि जब भी वक्त मिले मकान में जरूर जाइये। यदि आपकी तकलीफ गंभीर है तो आपको दिन में कई बार जाना चाहिये।
आत्मदर्शन स्वास्थ्य में जबर्दस्त सकारात्मक परिवर्तन लाता है। इसमें कोई खर्चा नहीं होता है और यह तकनीक 100% काम करती है। इस तकनीक को आप गंभीर रोगों के उपचार, जीवन को खुशहाल बनाने या आर्थिक सफलता पाने के लिए प्रयोग कर सकते हैं। इस विधा से आप अपने भविष्य को जैसा चाहो वैसा बना सकते हो।  

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दिल की तबाही । (गीत)




दिल  की  तबाही । (गीत)

http://mktvfilms.blogspot.in/2012/08/blog-post_12.html

अब  मान  भी जाओ, इस  दिल  की  तबाही  कम   है   क्या..!

चले   भी  आओ   इन, टिसुओं  की  गवाही   कम   है   क्या..!

(तबाही=बरबादी; टिसुआ =आंसु; गवाही=साख )

अंतरा-१.

घातक    निगाहेँ    करती    मुश्किल,  प्यार   भरी   ये    राहें ।

मुर्दों   की   इस   बस्ती   में,   तुम्र   सिपाही   कम   है   क्या..!

अब  मान  भी  जाओ, इस  दिल  की  तबाही  कम  है  क्या..!

(घातक= क़ातिल;  तुम्र=ज़ालिम; सिपाही=पहरेदार )

अंतरा-२.

सुराख़दार   सुराही     सांसे,   फूटे     आस    के    जाम ।

उपर से  साक़ी  से   ऐसी, कम - निगाही  कम  है  क्या..!

अब मान भी जाओ, इस दिल की तबाही  कम  है  क्या..!

(सुराख़दार=छिद्रवाली; आस= उम्मीद; साक़ी=प्रियतमा; कम-निगाही=उपेक्षा)

अंतरा-३.

न  मिलन  के  आसार, न  ख़त - ख़बर, अब  ये  तो  बता..!

इन  आंखोँ   में  तेरी, काजल   की   सियाही  कम  है  क्या..!

अब  मान  भी  जाओ, इस  दिल की  तबाही  कम  है  क्या..!

(आसार=संकेत; सियाही= स्याही)

अंतरा-४.

 फिर  वही   आवाज़े   सुन   या, राग   भरे   ये  साग़र  चुन..!

कर     इबादत   उसकी, रहमत -ए-  इलाही कम  है  क्या..!

अब  मान  भी  जाओ, इस  दिल की तबाही  कम  है  क्या..!

चले  भी आओ  इन, टिसुओं  की  गवाही   कम   है   क्या..!

(आवाज़ा= आक्षेप; राग=प्यार; साग़र=पैमाना; रहमत-ए-इलाही = ईश्वरकृपा)

मार्कण्ड दवे । दिनांक-१२-०८-२०१२.

नीरो का रोम और सोनिया का भारत-ब्रज की दुनिया

मित्रों,बात बहुत पुरानी नहीं है इसलिए आपको भी याद होगी। वर्ष 2004 में घटी थी यह महान घटना। तब प्रधानमंत्री की कुर्सी को लात मारते हुए और कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं को दरकिनार कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने एक पूर्व नौकरशाह मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया था और अकस्मात् मीडिया ने उन्हें सिर-माथे पर बिठा लिया था। कोई उन्हें "त्याग की देवी" की उपाधि से विभूषित कर रहा था तो कोई अपनी पत्रिका के आमुख पर हंसती हुई सोनिया की तस्वीर के साथ बहुत-ही मोटे-मोटे अक्षरों में लिख रहा था "सोनिया ब्लौसौमिंग"। सबको न जाने क्यों लग रहा था कि अब भारत का वारा-न्यारा होकर रहेगा। देश के दरवाजे पर अब बदलाव दस्तक देने ही वाला है। खास आदमी की जगह आम आदमी की पार्टी जो सत्ता में आ गई थी।
             मित्रों,आज सोनिया के उस महान त्याग को 8 साल बीत चुके हैं। देश में खूब बदलाव हुआ है लेकिन धनात्मक की जगह ऋणात्मक। लगता है जैसे भारत के लिए समय की घड़ी उल्टी दिशा में चल पड़ी है। इन आठ सालों में देश की ऐसी की तैसी हो गई है। अर्थव्यवस्था पातालवासिनी होने को व्याकुल है तो कमजोर मानसून में भी घोटालों की बाढ़-सी आई हुई है। कांग्रेस अध्यक्षा और उनकी सरकार के मंत्रियों को देश की जनता के बैंक बैलेंस की चिंता होने के बदले (वोट) बैंक बैलेंस की चिंता है। अर्थव्यवस्था से लेकर आतंरिक सुरक्षा और बाह्य सुरक्षा प्रत्येक मोर्चे पर भारत और भारतीय संप्रभुता की हार हो रही है परन्तु सोनिया गाँधी एंड (फेमिली) कम्पनी उनके मूल देश के अब तक के महानतम शासक नीरो की तरह चैन (सत्ता) की बंशी बजाने में तल्लीन है। सत्ता लोलुपता की लाईलाज बीमारी से वे इस कदर ग्रसित हो गई हैं कि अपने कथित प्राणप्रिय पति द्वारा किए गए वादे और समझौते भी याद नहीं रहे। तभी तो उन्होंने (चाहे तो उनकी सरकार भी कह सकते हैं बात एक ही है) कल उच्चतम न्यायालय में यह झूठ बोला कि अब बांग्लादेशी घुसपैठियों को पहचानना संभव ही नहीं है। क्यों नहीं है और कैसे नहीं है? जो चीज म्यांमार के लिए संभव है वही सोनिया के लिए असंभव क्यों और कैसे है? मैं बताता हूँ रास्ता। मुझे पता है लेकिन आश्चर्य है कि सोनिया एंड कंपनी को पता नहीं है! सीधी बात है कि जिन बांग्लाभाषियों के पास 1971 के पूर्व के आवासीय प्रमाण हैं वे भारतीय बंगाली हैं (स्व. राजीव गाँधी द्वारा 1985 में किए गए समझौते के अनुसार भी) और जिनके पास नहीं हैं वे बांग्लादेशी घुसपैठी हैं। हो सकता है ऐसा करने से कुछ निर्दोष भी इसकी चपेट में आ जाएँ। लेकिन ऐसा करना ही पड़ेगा और कोई ऐसा विकल्प नहीं है जिससे भारत का भला होता हो। अगर आप ऐसा नहीं करती हैं तो 'कूदे बैल न कूदे तंगी' की तर्ज पर जो बांग्लादेशी परसों तक असम को जला रहे थे और जिन बांग्लादेशियों ने कल मुम्बई को जलाया है,आने कल में वही दिल्ली,कोलकाता और कटिहार को भी जला कर रख देंगे। फिर भी अगर आपको इस दिशा में कुछ भी करना नहीं है तो बना लीजिए चाहे जो भी बहाने बनाने हैं। आपकी आराम फरमाती सरकार फरमाती है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूचियों से हटाना असंवैधानिक होगा। तो क्या उनको विशेष अभियान चलाकर भारत का मतदाता बना देना संवैधानिक है और संविधानसम्मत है? असलियत तो यह है कि भारतीय संविधान के अनुसार 19 जुलाई,1948 के बाद पूर्वी पाकिस्तान या वर्तमान बांग्लादेश से भारत में प्रवर्जन करने वाला प्रत्येक अप्रवासी अवैध है अगर उसने बिना विहित प्रक्रिया के नागरिकता अर्जित कर ली है तब भी। दरअसल सोनिया जी को प्रत्येक उस कदम से सख्त नफरत है जिससे भारत का कुछ भी भला होता हो। वे और उनकी कंपनी ने अपने जहाज को डूबने से बचाने के लिए भारत के भविष्य की संभावनाओं को ही डूबाकर रख दिया है। सच्चाई यह भी है कि उनके जैसा शासक जब तक सत्ता में है कोई जरुरत नहीं है आई.एस.आई. या चीन को भारत को कमजोर या अस्थिर करने के किसी तरह के प्रयास करने की और तब तक वे भारत के एशिया में शक्तिशाली होकर उभरने की आशंका से बेफिक्र होकर कान में मोम डालकर सो सकते हैं।
                 मित्रों,चाहे कोई माने या न माने कड़वी सच्चाई तो यही है कि वर्ष 2009 में अपनी दूसरी पारी में सोनिया जी की सरकार ने अब तक जाति और धर्म का कार्ड खेलने के सिवाय ऐसा कुछ भी नहीं किया है,ऐसा कोई एक कदम भी नहीं उठाया है जिससे देश मजबूत होता हो। बल्कि उसने सिर्फ और सिर्फ वही किया है जिससे देश कमजोर होता हो और उनका खुद का बैंक बैलेंस और वोट बैंक बैलेंस मजबूत होता हो। जो सरकार यूपीए-1 में थोड़ा-बहुत अच्छा काम कर रही थी वही सरकार अब सिर्फ गूँ बनाने की फैक्टरी बनकर रह गई हैं। इस सरकार और इसके मंत्रियों के होने या न होने का कोई औचित्य हो नहीं बचा है। घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं और सोनिया जी इससे पूरी तरह अप्रभावित बनी हुई हैं। ऐसा लग रहा है जैसे वे भारत की हैं ही नहीं बल्कि किसी शत्रु देश द्वारा भेजी गई हैं और भारत से अपना पुराना हिसाब गिन-गिनकर चुकता कर रही हैं। 2004 की हमारी कुलगौरव 2012 में कुलबोरनी बन गई है। उनको एक सामान्य और स्वार्थी स्त्री की तरह सिर्फ और सिर्फ अपने घर-परिवार की चिंता है देश की नहीं। कुछ इसी तरह के हालात को बयां करता अमर फिल्म अमरप्रेम का एक अमर गीत इस समय मुझे याद आ रहा है-मँझधार में नैया डोले तो माँझी जान बचाए,माँझी जब नाव डूबोए तो उसे कौन बचाए?
                  मित्रों,आपके पास कोई उत्तर है क्या इस प्रश्न का?है यक़ीनन है लेकिन आपको याद नहीं आ रहा है। जैसे हनुमान को तब तक अपनी शक्तियाँ याद नहीं आती थीं जब तक कोई उनको याद नहीं दिलाता था उसी तरह आप भी भूल गए हैं कि देश की डूबती नैया को सिर्फ आप ही डूबने से बचा सकते हैं। बस आपको करना यही है कि अगले लोकसभा चुनाव में देश की पतवार को इस विश्वासभंजक सोनिया के हाथों से छीन लेना है। हाँ,लेकिन हमें यह भी ध्यान में रखना है कि कहीं गलती से भी पतवार फिर से किसी कुलघातक के हाथों में न चली जाए। 

11.8.12

Islam, che Kalmy

Islam, che Kalmy

‘रामदेव+विवाद’ बहुत गहरा याराना है


अति महत्वाकांक्षी और बड़बोलेपन का प्रमाण देने वाले योग गुरू रामदेव विवादित हो जाते हैं। उनको जन्म भी वह खुद ही देते हैं। रामलीला मैदान में चल रहे इस बार के आंदोलन में सरकार के प्रति उनका प्रेम भी दिख रहा है। यह वही बाबा हैं जो सरकार के विनाश का सपना देखते आये हैं और जी भरकर कोसते हैं। अब सोनिया गांधी को सोनिया माता कहकर कहते हैं कि बातचीत के लिये उनके दरवाजे खुले हैं। कोई इसे नमस्कार योग, तो कोई पलटयोग बता रहा है। मंच पर लगाये गए पोस्टर से भी वह विवादों में आ गए। मीडिया से तूल न देने का आग्रह किया। दरअसल पोस्टर में बालकृष्ण को महापुरूष बताते हुए पोस्टर के दोनों तरफ भगवान श्री कृष्ण के अलावा क्रमबद्व ढंग से राष्ट्रपिता, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल, चंद्रशेखर आजाद के बाद बालकृष्ण व उनके बाद शहीद भगत सिंह व वीर शिवाजी आदि के फोटों हैं। पोस्टर पर लिखा गया कि ’जेल आंदोलनकारियों का तीर्थ है। आचार्यजी महान हैं, रोगियों के भगवान हैं, भगवान के वरदान हैं, भ्रष्टाचारी परेशान हैं।’ बाबा ने महापुरूषों का अपमान करते हुए पता नहीं बालकृष्ण की ऐसी तुलना शायद इसलिए कर डाली क्योंकि बालकृष्ण उनकी अरबों का कारोबार करने वाली 34 कंपनियों के डायरेक्टर हैं। फर्जी पासपोर्ट मामले में जेल में बंद बालकृष्ण को जबरन महापुरूष बनाने पर बाबा तुले हैं। अपने कृत्यों से व्यक्ति स्वतः ही महान हो जाता है, लोगों के दिलों में जगह बना लेता है उसके लिये कोई प्रयास करने की जरूरत नहीं है। 
पिछली बार अफसोसजनक बात यह रही कि लाखों दिलों में आदर के साथ बसने वाले स्वामी रामदेव ने अपने अनशन की बुनियाद झूठ के मंच पर रखी और नाम दे दिया ‘सत्याग्रह’। शीर्षासन पर बैठे लोगों से यूं तो ऐसी आशा नहीं की जाती। जब बाबा अनसन से पहले ही सरकार से लिखित समझौता कर चुके थे, तो उन्हें अनशन की क्या जरूरत थी। लोगों को गुमराह करने के बजाये उन्हें बता देना चाहिए था। बाबा के निर्णय पर कोई असहमति प्रकट भी नहीं करता। चूंकि सभी तैयारियां हो चुकी थीं। बाबा एक तीर से दो निशाना साधना चाहते थे। एक तो वह भक्तों की नजर में साफ रहना चाहते थे दूसरे सरकार को जनसमर्थन की ताकत दिखाना चाहते थे।
जनता की भावनाओं को छले जाने का सिलसिला पुराना है। नेता यह काम अर्से से करते आ रहे हैं। बाबा ने कुछ नया भी नहीं किया। बेचारी जनता की नियति यही है। संभवतः बाबा खुद को भविष्य में प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे थे। उन्होंने मांग शुरू कर दी कि जनता को प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। सवाल यह कि इससे लाभ किसको? जाहिर है बाबा के भक्त उन्हें ही कहते और बाबा कहते कि अब जनता कह रही है, तो मैं क्या करूं। बाबा की महत्वाकांक्षाओं से संत समाज भी उनसे नाराज रहा है। ऐसे संकेत बाबा फिर दे रहे हैं। भ्रष्टाचार मिटाने का सपना भला किसना नहीं होता, लेकिन बाबा की बातें डंके की चोट पर साफ नहीं होती। अह्म सवालों पर चतुराई से कन्नी काट जाते हैं। या वक्त आने पर बतायेंगे कहकर टाल जाते हैं। आरोप यह कि वह देखते हैं कि बात बन गई, तो ठीक वरना बाद में साफ कर देंगे। बाबा हों या नेता जनता बहुत कुछ जानकार व समझदार हो गई है। जय हो बाबा!

जागते रहो । (गीत)




जागते  रहो । (गीत)


अपनी  ही   परछाई   से,  बस  भागते  रहो ।

कभी  न  करना    इश्क,  सब  जागते  रहो ।



अंतरा-१.


अब  आप  से  ज्यादा,  किसकी   उठायें  कसम !


नसीब   में   न  तो   बोसा  है,  ना  गाली  सनम ।


सी   कर   होठ, लफ़्ज़   को  बस   निगलते रहो ।


कभी    न      करना    इश्क,   सब  जागते  रहो ।


(बोसा=चुंबन; लफ़्ज़ =शब्द) 



अंतरा-२.


अहले   -  वफ़ा    की    जुर्रत,  न    हो   ना  सही ।


नाकाम  अश्क   की   क़िमत, न    हो   ना  सही ।


दिल - ए - नादाँ   को  बस, यही  समझाते  रहो ।


कभी   न     करना    इश्क,    सब  जागते  रहो ।

(अहले वफ़ा =अडिग वफ़ा; जुर्रत=हिम्मत)


अंतरा-३.


न   रांझा,  न   रोमियो,  ना  मजनू   हैं   हम ।


न  हिर, न जूलियट, ना कोई  लैला  शबनम ।


चाहत - ए - ज़बान  को, बस  दफनाते  रहो ।


कभी  न  करना    इश्क,  सब  जागते  रहो ।


(चाहत-ए-ज़बान=प्यार के बोल)



अंतरा-४.


आदत     पुरानी    है,  कभी   छूटे  ना   छूटे ।


कब   से    हैं   तैयार,  कोई   लूटे   ना   लूटे ।


लचर  है  दर-ओ-दिवार , बस  ताकते  रहो ।


कभी  न  करना    इश्क,  सब  जागते  रहो ।


(लचर=कमज़ोर;  दर-ओ-दिवार=दरवाजा,दिवार)


मार्कण्ड दवे । दिनांक-०७-०८-२०१२.

10.8.12

इंतज़ार । (गीत)





इंतज़ार । (गीत)


आँखो  में   हरपल,  किसी   का    इंतज़ार   रहता   है ।

शायद,  कोई       चूपके    से,    हमें  प्यार  करता  है ।


अंतरा-१.


दिये   की  लौ  भी  देखो,  झपका   रही   है  पलकें ! 

शायद,  उसे   भी   रोशनी  का,   ख़ुमार  लगता  है !

आँखो  में  हरपल, किसी  का  इंतज़ार   रहता   है ।


अंतरा-२.


है   आसमाँ   तंग   मगर , मंसूबा   तेज़   है   शायद  ।

तभी  तो, मन  परिंदा, उड़ने को  तक़रार  करता   है ?

आँखो  में   हरपल   किसी   का   इंतज़ार   रहता   है ।

( तंग=छोटा ; मंसूबा= विचार ; तेज़=तीव्र) 


अंतरा-३.


जाना-पहचाना  सा  है,  शरारत  का  ये  अफसाना ।

फिर भी, फरेब  खाने  को  दिल  इकतार  मरता   है ।

आँखो   में  हरपल,  किसी  का   इंतज़ार   रहता   है ।


(इकतार= लगातार)


अंतरा-४.


बेवजह    हम     जीते   थे,  तौबा    करके   पीते   थे ।

शायद, अमल  का  आलम,  अब  बेशुमार  रहता  है ।

आँखो   में   हरपल,  किसी   का   इंतज़ार  रहता  है ।

शायद,  कोई     चूपके    से,    हमें  प्यार  करता  है ।


(अमल= बुरी आदत; आलम=स्थिति ; बेशुमार=बेहद )

मार्कण्ड दवे । दिनांक-१०-०८-२०१२.

चाँद-ब्रज की दुनिया

पूर्णमासी की रात में,
दूधिया आकाश में;
चाँदी-सा चमकता हुआ,
निकलता है चाँद।

रोटी-सा गोल-गोल,
भात-सा धवल श्वेत;
वृहत गोला नवनीत का,
प्रतीक प्रकाश की जीत का;
रजत रश्मियाँ लुटाता पल-पल;
जेठ की रात में,
मित्रों के साथ में;
सोते हुए मैदान में,
कहीं खेत-मध्य मचान में;
जब रह-रह के फूटते हैं हँसी के फव्वारे;
हँसते हुए आता है देता है साथ चाँद;

पूर्णमासी की रात में,
दूधिया आकाश में;
चाँदी-सा चमकता हुआ,
निकलता है चाँद।

मिलता नहीं कोई जिन्हें बोलने-बतियाने को,
दौड़ती है सारी दुनिया मारने-लतियाने को;
शीतलता देने मन को,
चीरकर विस्तृत गगन को;
प्रकट होकर रात्रि में मुलाकात करने को,
मीठी बात करने को,
दुःख-ताप हरने को;
आता है तब अपने विश्राम को त्याग चाँद;

पूर्णमासी की रात में,
दूधिया आकाश में;
चाँदी-सा चमकता हुआ,
निकलता है चाँद।

9.8.12

रामलीला के बाद क्या ?



 भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के अधूरे आंदोलन और चुनावी विकल्प देने के टीम अन्ना के फैसले का जनता ने स्वागत भी किया तो इसका विरोध भी हुआ...ऐसे में लोगों की निगाहें रामदेव के आंदोलन की तरफ भी थी। 9 अगस्त की सुबह से ही रामलीला मैदान में समर्थकों का रैला लगा हुआ था...और हर कोई रामदेव के पहुंचने के इंतजार में था। सबको उममीद थी कि रामदेव आएंगे तो आंदोलन की दिशा और इस लड़ाई की रणनीति पर से पर्दा उठाएंगे...तय कार्यक्रम के तहत रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान से आंदोलन का शंखनाद भी किया...लेकिन सरकार के प्रति रामदेव के ढीले तेवर और तीन दिन के सांकेतिक अनशन के एलान ने रामदेव के उन दावों की हवा निकाल दी...जो वे आंदोलन से पहले तक या यूं कहे जून 2011 में रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस की रावणलीला के बाद से ही वे करते आए थे...कि अबकी लड़ाई आर पार की लड़ाई होगी। रामदेव का ईरादा आर पार की लड़ाई का रहा भी हो तो शायद अन्ना के आंदोलन के हश्र से रामदेव ने सबक जरूर लिया होगा। रामदेव को इस बात को अंदेशा हो गया होगा कि अन्ना के आंदोलन की तरह केन्द्र सरकार ने उनके आंदोलन को भी नजरअंदाज कर दिया तो आर पार की लड़ाई का ऐलान कहीं उनके ही गले की हड्डी न बन जाए...जो न तो उगलते बने और न ही निगलते। अब रामदेव तीन दिन के अनशन की बात कर रहे हैं...औऱ सरकार को भी उन्होंने अपनी मांगों पर विचार के लिए इतने ही दिन का समय दिया है...लेकिन जो सरकार जंतर मंतर पर टीम अन्ना के 10 दिन के आंदोलन से नहीं डिगी...उनके लिए रामलीला मैदान में तीन दिन का आंदोलन क्या चीज है...इसका अंदाजा आंदोलन की शुरूआत के साथ ही उस वक्त हो गया था...जब आंदोलन शुरू होने के कुछ ही देर बाद केन्द्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का बयान आता है कि रामलीला तो हर साल होती है...बस किरदार बदल जाते हैं...खुर्शीद का ये बयान तीखे कटाक्ष के साथ ही सीधा ईशारा था रामदेव के लिए कि आप कितना भी हो हल्ला मचा लो...सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हालांकि हरिद्वार से सांसद और केन्द्रीय संसदीय कार्य राज्यमंत्री हरीश रावत ने ये जरूर कहा कि बातचीत के रास्ते खुले हैं...लेकिन यहां रामदेव दो कदम आगे निकल गए और हरीश रावत से कह दिया कि सोनिया गांधी से कह दो कि बातचीत के द्वार तो हमारे भी खुले हैं...हम तो आए ही हरिद्वार से हैं। बातचीत के लिए रामदेव भी तैयार हैं और सरकार भी...लेकिन यहां पर बड़ा सवाल ये है कि आखिर पहल कौन करे...बहरहाल रामदेव ने तीन दिन का वक्त सरकार को देने के साथ ही अपने आंदोलन के लिए यह कहकर आगे का रास्ता खुला रखा कि आंदोलन की आगे की रणनीति का खुलासा वे 12 अगस्त को करेंगे...यानि की अगर सरकार इन तीन दिनों में उनकी मुख्य मांग...कालाधन वापस लाने, मजबूत लोकपाल लाने और सीबाआई की स्वायत्तता पर संजीदगी से विचार नहीं करती तो आंदोलन का बिगुल वे बजाते रहेंगे। हालात तो इसी ओऱ ईशारा कर रहे हैं कि रामदेव के आंदोलन में भले ही लोगों का भारी जनसमूह उमड़ रहा हो लेकिन सरकार किसी भी हालत में किसी भी तरह की बातचीत के मूड में नहीं दिख रही...ऐसे में रामलीला मैदान के बाद रामदेव के आंदोलन का अगला पड़ाव क्या होगा और किस रूप में होगा ये देखना रोचक होगा।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com


'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' हेतु कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव चयनित


ब्लागिंग के क्षेत्र को निरंतर समृद्ध करने के मद्देनजर चर्चित साहित्यकार और ब्लागर कृष्ण कुमार यादव एवं आकांक्षा यादव को 'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' का सम्मान प्रदान किए जाने हेतु चयनित किया गया है। परिकल्पना समूह की तरफ से अन्तराष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले इस सम्मान के तहत हिंदी ब्लोगिंग में दशक के सर्वाधिक चर्चित पाँच ब्लागर और पाँच ब्लॉग के साथ-साथ दशक के श्रेष्ठ चर्चित ब्लोगर दंपत्ति के रूप में कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव का चयन किया गया है. मूलत: आजमगढ़ जनपद निवासी श्री यादव वर्तमान में इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं. गौरतलब है कि परिकल्पना के माध्यम से चर्चित ब्लागर रवीन्द्र प्रभात जहाँ तमाम ब्लॉगों का सम्यक विश्लेषण कर रहे हैं,वही पिछले वर्ष से ही उन्होंने वर्ष के श्रेष्ट ब्लागरों को सम्मानित भी करना आरंभ किया है. इसी कड़ी में इस बार 'दशक' की उपलब्धियों वाले ब्लागर भी सम्मानित किये जा रहे हैं, जो कि ब्लागिंग के क्षेत्र में एक नायब और अनूठा प्रयोग होया.

'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' हेतु चयनित कृष्ण कुमार यादव जहाँ 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय हैं, वहीँ आकांक्षा यादव 'शब्द-शिखर' ब्लॉग के माध्यम से. इसके अलावा इस युगल-दंपत्ति द्वारा सप्तरंगी प्रेम, बाल-दुनिया और उत्सव के रंग ब्लॉगों का भी युगल सञ्चालन किया जाता है. उपरोक्त सम्मान की घोषणा करते हुए संयोजकों ने लिखा कि- ''कृष्ण कुमार यादव ने 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से डाक विभाग की सुखद अनुभूतियों से पाठकों को रूबरू कराने का बीड़ा उठाया तो आकांक्षा यादव ने 'शब्द-शिखर' के माध्यम से साहित्य के विभिन्न आयामों से रूबरू कराने का। एक स्वर है तो दूसरी साधना। हिन्दी ब्लोगजगत में जूनून की हद तक सक्रिय इस ब्लॉगर दंपति ने हिंदी ब्लागिंग को कई नए आयाम दिए हैं.''

गौरतलब है कि यादव दम्पति की सुपुत्री अक्षिता (पाखी) को पिछले साल हिंदी भवन, नई दिल्ली में 'श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर' सम्मान से सम्मानित किया गया था तो 14 नवम्बर, 2012 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में भारत सरकार द्वारा अक्षिता को आर्ट और ब्लागिंग के लिए 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' भी प्रदान किया गया. मात्र साढ़े चार साल की उम्र में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्राप्त कर अक्षिता ने जहाँ भारत की सबसे कम उम्र की बाल पुरस्कार विजेता होने का सौभाग्य प्राप्त किया, वहीँ पहली बार भारत सरकार द्वारा किसी ब्लागर को कोई राजकीय सम्मान दिया गया. फ़िलहाल अक्षिता गर्ल्स हाई स्कूल, इलाहाबाद में प्रेप में पढ़ती है. अक्षिता के ब्लॉग का नाम है- पाखी की दुनिया.


परिकल्पना दशक का ब्लॉगर सम्मान के तहत सम्मानित होने वाले ब्लागर हैं - पूर्णिमा वर्मन(शरजाह, यू ए ई), समीर लाल समीर(ओटरियों, कनाडा), रवि रतलामी (भोपाल, म.प्र.), रश्मि प्रभा (पुणे, महाराष्ट्र), एवं अविनाश वाचस्पति (नयी दिल्ली). इसके अलावा पञ्च चयनित श्रेष्ठ ब्लॉगों के संचालकों को भी सम्मानित किया जायेगा.(परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान-2012 की पूरी सूची हेतु क्लिक करें)


उपरोक्त सम्मान दिनांक 27 अगस्त 2012 को लखनऊ के क़ैसर बाग स्थित राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन मे प्रदान किया जायेगा. इस अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन तस्लीम व परिकल्पना समूह कर रहा है । इस समारोह में देश व विदेश के तमाम चर्चित ब्लॉगर जुटेंगे और नए मीडिया जैसे कि ब्लॉग, वेबसाईट, वेब पोर्टल,सोशल नेटवर्किंग साइट इत्यादि के सामाजिक सरोकार पर भी बात करेंगे ।
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(विभिन्न समाचार-पत्रों में कृष्ण कुमार यादव-आकांक्षा यादव को 'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' हेतु चयनित किये जाने पर प्रमुखता से समाचार प्रकाशित हुए हैं, उनकी एक झलक)










































.......इन्तजार !!

देखा था जिसे 
एक बार
यूं ही आँखे
बंद किए हुए
दिवास्वप्न में !

अब फिर वही,
अचानक उस दिन
बिना कुछ कहे
निकल गई
सामने से !!

उस दिवास्वप्न के बाद
हर रोज
कोशिश की थी
मैंने दिन में
फिर से सोने की !

मगर फिर कभी
आँखों में
नींद नहीं थी
था, तो, सिर्फ
उसी
दिवास्वप्न
के
दुहराए जाने
का इन्तजार!!