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6.1.13

हिन्दू सामग्री देवल देवी


Sudheer Maurya 'Sudheer'
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सल्तनत काल के भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जिनमे मुस्लिम शासकों के दरबारी, चाटुकार एवं कट्टरपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने अपने शासकों के क्रूर कारनामों तथा पराजित हुए युद्धों को छिपाने के लिए उन्हें इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया। ऐसा ही एक शौर्यपूर्ण प्रसंग है गुजरात की राजकुमारी देवल देवी तथा धर्म परवर्तित  होकर मुस्लिम बने खुशरो शाह का।
13वीं शताब्दी के अंतिम दशक से पहले दक्षिण भारत मुसलमानों के क्रूर तथा वीभत्स अत्याचारों तथा सामूहिक इस्लामीकरण से अनजान था। अलाउद्दीन खिलजी पहला मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण भारत में हमला करके भीषण नरसंहार किया और अपार धनराशि लूटी। उसने देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरै से अपार धनराशि ही नहीं लूटी बल्कि भारतीय धर्म, संस्कृति, कला को भी नष्ट किया। उसने गुजरात को भी दो बार लूटा। इतना ही नहीं तो गुजरात के शासक बघेल नरेश कर्णदेव की पत्नी कमला देवी को अपनी पत्नी तथा अत्यंत रूपवती राजकुमारी देवल देवी को जबरदस्ती अपने बड़े बेटे खिज्र खां की पत्नी बना दिया। कई मुस्लिम लेखकों ने(खासकर अमीर खुसरो ) यह मनगढ़न्त कहानी रची कि खिज्र खां तथा देवल देवी में प्रेम संबंध था। सचाई यह है कि देवल देवी बरदस्ती विवाह तथा इस्लाम अपनाने पर अपमान का घूंट पीकर भी अपने धर्म, संस्कृति तथा देश की स्वतंत्रता को न भूली तथा उचित मौके की तलाश में रहने लगी। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद उसके दूसरे पुत्र मुबारक शाह ने अपने बड़े भाई खिज्र खां की आंखें निकलवा कर मार डाला तथा देवल देवी से जबरदस्ती अपना निकाह कर लिया। देवल देवी को न पहले खिज्र खां से कोई लगाव था और न अब मुबारक शाह से।
इस अफरातफरी के माहौल  में दिल्ली सल्तनत में एक व्यक्ति- खुशरो शाह अत्यन्त प्रभावशाली बन गया था। सामान्यत: मुस्लिम इतिहासकारों ने या तो उसका वर्णन नहीं किया और यदि किया तो उसे ओछा, पापी, नरकगामी कहा। जबकि खुशरो शाह एक सुन्दर, दृढ़ निश्चयी और बलिष्ठ और वीर युवक था। वह मूलत: एक गुजराती हिन्दू था जिसे पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया था। उसका नाम "हसन" रख दिया गया था। हिन्दुत्व के दृढ़ भाव को मन में रखते हुए वह योजनापूर्वक मुबारक शाह का सबसे विश्वासपात्र तथा प्रभावशाली सेनापति बन गया। मुबारक शाह ने उसे "खुशरो शाह" की उपाधि दी तथा अपना मुख्या सेनापति नियुक्त किया। खुशरो शाह मन ही मन एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसने गुजरात के शासन पर अपने एक सगे भाई "हिमासुद्दीन" (जो पहले हिन्दू ही था) को मुख्य अधिकारी बनवाया। उसने दिल्ली में लगभग 20,000 ऐसे सैनिक भरती किये जो पहले हिन्दू थे पर जबरन धर्मपरिवर्तन के बाद अब मुसलमान बन गए थे। उसने विलासी मुबारक शाह का पूर्ण विश्वास प्राप्त किया। उसने एक बार मुबारक शाह को पुन: दक्षिण पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया तथा स्वयं भी उसके साथ गया। अगली बार वह मुबारक शाह की आज्ञा से स्वतंत्र रूप से गया। उसने दक्षिण भारत में मुसलमानों द्वारा भयंकर लूटमार तथा मारकाट से चारों ओर सामन्तों, राजाओं तथा प्रजा में बेचैनी का अनुभव किया। गुप्त मन्त्रणाओं में उसने इसको प्रोत्साहित किया। उनमें हिन्दुओं में राज परिवर्तन का भाव भी जगाया। साथ ही बाहरी रूप से उसने मुस्लिम विश्वास को भी बनाये रखा। यद्यपि दिल्ली दरबार में उसके क्रियाकलापों से बेचैनी होने लगी तथा उसकी शिकायतें मुबारक शाह से की जाने लगीं। परन्तु मुबारक शाह ने शिकायतों पर किचिंत भी विश्वास न किया। वस्तुत: खुशरो शाह तथा देवल देवी के संयुक्त प्रयास, तलवार की धार और जलती आग पर चलने जैसे थे। परन्तु दोनों ने बड़ी चतुराई, कूटनीति और समझदारी से काम लिया।
पूरी तरह अनुकूल परिस्थिति होने पर खुशरो शाह तथा देवल देवी - दोनों जन्मजात हिन्दुओं ने एक क्रांति को जन्म दिया जो राज्य क्रांति भी थी तथा धर्म क्रांति भी। 20 अप्रैल, 1320 ई. की रात्रि को लगभग 300 हिन्दुओं के साथ खुशरो शाह ने शाही हरम में यह कहकर प्रवेश किया कि इन्हें मुसलमान बनाना है तथा इसके लिए परम्परा के अनुसार सुल्तान के सम्मुख पेश किया जाना है। इस पेशी के समय खुशरो के मामा खडोल तथा भरिया नामक व्यक्ति ने इसका लाभ उठाकर मुबारक शाह की हत्या कर दी। फिर शाही परिवार के भी व्यक्तियों को मार दिया गया। खुशरो शाह ने अपने को सुल्तान घोषित कर दिया और जानबूझकर अपना नाम नहीं बदला। इसके साथ ही उसने देवल देवी से विवाह कर लिया। तत्कालीन मुस्लिम लेखक जियाउद्दीन बरनी ने लिखा कि इसके पांच-छह दिन बाद ही राजमहल में मूर्ति पूजा प्रारंभ हो गई। चारों ओर हिन्दुओं में उत्साह और उल्लास की लहर दौड़ गई।
स्वयं खुशरो शाह ने घोषणा की- "आज तक मुझे केवल बलात मुसलमानों का सा धर्म भ्रष्ट जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। फिर भी मूलत: मैं हिन्दू का पुत्र हूं, मेरा बीज हिन्दू बीज और मेरा रक्त हिन्दू रक्त है। चूंकि आज मुझे सुल्तान का समर्थन और स्वतंत्र जीवन प्राप्त है, इसलिए मैं अपने पैरों की धर्म भ्रष्टता की बेड़ी तोड़ता हुआ घोषित करता हूं कि मैं हिन्दू हूं। अब प्रकट में इस विशाल एवं अखण्ड भरत खण्ड में हिन्दू सम्राट के नाते इस सिंहासन पर आरूढ़ हुआ हूं। इसी तरह कल तक "सुल्ताना" कहलाने वाली देवल देवी जो मूलत: एक हिन्दू राज कन्या है... वह भी इस्लामियत को धिक्कारती है, अब से हिन्दू की तरह ही जीवन बितायेगी। हम दोनों की यह प्रतिज्ञा हमारे बलात्कार जनित अतीत धर्म विमुखता के पाप का परिमार्जन करे।"
यद्यपि यह हिन्दू साम्राज्य लगभग एक वर्ष ही रहा, क्योंकि ग्यासुद्दीन तुगलक तथा अन्य अमीरों के विद्रोह से खुशरो खान मारा गया, परन्तु इससे इसका महत्व कम नहीं हो जाता। वस्तुत: इस राज्य क्रांति का विचार भी दक्षिण भारत में हुआ था। इससे हिन्दुओं में, जो वर्षों से गुलामी के आदी हो गये थे, स्वतंत्रता की आशा तथा स्वाभिमान जागा, जो शीघ्र ही सोलह वर्ष पश्चात (1336 ई. में) विजय नगर साम्राज्य के निर्माण के रूप में हुआ। 

सुधीर मौर्य 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
+91 9619483963

सोच बदल लो वर्ना बन जाओगे इतिहास !


राजनीति जो न कराए वो कम है...अपनी राजनीति चमकाने के लिए वर्ग विशेष के वोटबैंक को साधने के लिए नेता किस हद तक जा सकते हैं ये मनसे प्रमुख राज ठाकरे के बयान से एक बार फिर से जाहिर हो गया। कहीं का तार कहीं जोड़कर कैसे वोटबैंक को साधा जाए ये कोई राज ठाकरे से सीखे। मराठियों का हिमायती होने का दावा करने वाले राज ठाकरे ने दिल्ली गैंगरेप जैसे मुद्दे पर भी अपना सियासी फायदा खोज ही लिया और एक बार फिर से निशाना लगाया बिहारियों पर। गैंगरेप की घटना दिल्ली में होती है...लेकिन राज ठाकरे मुंबई में बैठकर ये कहकर बवाल खड़ा कर देते हैं कि इस घटना को अंजाम देने वाले लोग बिहारी थे। बिहारियों पर राज ठाकरे पहले भी निशाना साधते रहे हैं...मुंबई में बिहार से आकर रहने वाले बिहारियों का मसला हो या फिर 13 जुलाई 2001 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार हमलों के सिलसिले में बिहार से कुछ संदिग्धों की गिरफ्तारी का मामला। राज ठाकरे ने हमेशा ही मराठियों के कंधों पर बंदूक रखकर बिहारियों पर निशाना साधने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली गैंगरेप के मुद्दे पर जहां सारा देश सड़कों पर उतर आरोपियों को फांसी की मांग कर रहा है तो राज ठाकरे यहां भी राजनीति की बिसात पर बिहारी राग अलाप पर अपनी घटिया मानसिकता दर्शाते हुए नजर आ रहे हैं। राज ठाकरे साहब दिल्ली की घटना को बिहार के आरोपियों को महाराष्ट्र में बैठकर जोड़ने से आप क्या हासिल करना चाहते हैं..? इस घटना के खिलाफ देश भर में गुस्सा दिखा...देशभर में लोग एकजुट होकर आरोपियों को फांसी की मांग के साथ ही महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं...लेकिन आपने यहां पर भी लोगों को बांटने का खेल शुरु कर दिया..! ये तो वक्त था राजनीति से ऊपर उठकर आम आदमी की आवाज को और बुलंद करने का ताकि न सिर्फ दिल्ली गैंगरेप को अंजाम देने वाले हैवानों को मौत की सजा मिले बल्कि समाज में महिलाएं सुरक्षित रह सकें और भविष्य में कोई शख्स किसी महिला के साथ बलात्कार करना तो दूर ऐसे सोचने से भी घबराए। लेकिन अफसोस आपको इस सब से कोई सरोकार नहीं है क्योंकि आपको तो यहां भी बिहारियों को गलिया के मराठियों को साधने का मौका दिखाई दे रहा है। आप एक देश में दो राज्यों के लोगों को अलग – अलग नजरों से देखकर क्या साबित करना चाहते हैं..? क्या महाराष्ट्र भारत का हिस्सा नहीं हैं या फिर बिहार भारत का हिस्सा नहीं है..? माना आप मुंबई में बैठकर क्षेत्रिय राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मराठियों के हितों के आगे आप दूसरे लोगों के हितों पर अतिक्रमण करें..! ठाकरे साहब आपको तो महाराष्ट्र में रहने वाले सभी लोगों को साथ लेकर चलना चाहिए क्योंकि महाराष्ट्र भी तो भारत का ही अभिन्न अंग है और उतना ही अभिन्न अंग बिहार भी भारत का है। दूसरे राज्यों के लोग महाराष्ट्र में रह रहे हैं तो क्या महाराष्ट्र के लोग दूसरे राज्यों में नहीं रह रहे हैं..? व्यक्ति किसी भी राज्य का हो लेकिन आखिर में वो है तो भारतीय ही...फिर चाहे वो मराठी हो या बिहारी हो या फिर किसी और राज्य से ताल्लुक रखता हो। आप दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों के बिहारी होने की बात कर क्या साबित करना चाहते हैं...? ठाकरे साहब अपराधी की कोई जाति नहीं होती और न ही वो किसी राज्य या देश का होता है। अपराधी सिर्फ अपराधी होता है क्योंकि वो अपराध करने से पहले ये नहीं देखता कि वो जिसके साथ अपराध कर रहा है वो कौन है..? जिस जगह अपराध कर रहा है वो जगह उसके गली मोहल्ले में है या देश के किसी दूसरे कोने में। ठाकरे साहब अपराधी अपने परिवार में भी अपराध करता है...अपने गली मोहल्ले में भी...अपने शहर और राज्य में भी और जहां वो उस वक्त मौजूद है वहां पर भी चाहे वह किसी भी देश में क्यों न हो। ऐसे में आप ये कैसे कह सकते हो कि दिल्ली गैंगरेप के आरोपी बिहार से हैं ये सबको जानना जरूरी है। क्या महाराष्ट्र के लोग अपराध नहीं करते या फिर महाराष्ट्र में अपराध नहीं होते..? ठाकरे साहब वोट बढ़ाने के लिए बांटों और राज करो की राजनीति का इतिहास भले ही सफल दिखाई देता हो लेकिन अब वक्त बदल चुका है और लोग राज ठाकरे टाइप लोगों की सोच को भी पहचान गए हैं इसलिए अभी भी वक्त है अपनी सोच बदल लो वरना कहीं ऐसा न हो कि वक्त के साथ जनता आपकी राजनीति का गणित - भूगोल सब बिगाड़ दे और आपको राजनीति में इतिहास का हिस्सा बनने पर मजबूर कर दे। ।।जय भारत।।

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तब नाबालिग दरिन्दे को सजा जनता देगी-ब्रज की दुनिया

मित्रों,दिल्ली पुलिस की ओर से बताया जा रहा है कि चूँकि 16 दिसंबर के सामूहिक दुष्कर्म का मुख्य अभियुक्त 18 साल का नहीं है इसलिए उसके खिलाफ पुलिस ने चार्ज-शीट दायर नहीं किया है और उस पर बाल-न्यायालय में अलग से मुकदमा चलाया जाएगा। इतना ही नहीं उस दरिन्दे को वर्तमान कानून के अनुसार मात्र 3 साल अधिकतम की सजा होगी और फिर उसके बाद वह आजाद होगा फिर से किसी दामिनी की अस्मत और जान के साथ खुलेआम खिलवाड़ करने के लिए। मैं आप सभी देशवासियों से पूछना चाहता हूँ कि उसने जो कुछ भी किया है वह क्या मासूमियत में किया गया नाबालिगोंवाला काम था? क्या जब कोई कथित नाबालिग बलात्कार करता है तो पीड़िता को कम दर्द होता है या कम मानसिक आघात का सामना करना पड़ता है? अगर नहीं तो फिर क्यों इस हवश के पुजारी को बाँकी नरपिचाशों से कम सजा दी जाए? बाँकी पाँचों को फाँसी और जो सबसे बड़ा अपराधी है उसको अधिकतम सजा मात्र 3 सालों की कैद? यह सजा तो सजा हुई ही नहीं यह तो ईनाम हो गया। प्रोत्साहन हो गया कि जाओ बेटे और लड़कियों की जिन्दगियों से खेलो,मर्द होने का पूरा लाभ उठाओ। अगर बाँकी 5 समाज के लिए खतरा हैं और इसलिए उनको जिंदा छोड़ना खतरनाक है तो फिर कैसे यह छठा समाज के लिए खतरा नहीं है क्योंकि वह अभी मात्र 17 साल 9 महीने का है? पहले सुनता था कि कानून अंधा होता है लेकिन अब तो साबित भी हो रहा है कि कानून वाकई अंधा होता है। क्या आवश्यकता है ऐसे अंधे कानून की? कानून ही जब अंधा होगा तो देश में क्यों नहीं अव्यवस्था और अराजकता रहेगी?
                   मित्रों,अगर कानून उस दरिन्दे को जिसने कथित रूप से दामिनी के साथ दो-दो बार सर्वाधिक बेरहमी से बलात्कार किया और भीषण शारीरिक-मानसिक क्षति पहुँचाई, सजा नहीं दे सकता क्योंकि उसके हाथ बंधे हैं तो देश की 125 करोड़ जनता खोलती है कानून के बंधे हाथों को और हुक्म देती है कि इसको भी फाँसी पर चढ़ाओ। अगर कानून फिर भी ऐसा नहीं कर सकता तो सौंप दे इसको जनता के हाथों में,इन्साफ जनता खुद करेगी। नाबालिग रेपिस्ट का इन्साफ हम करेंगे। तीन-तीन बेटियों का बाप होने की दुहाई देनेवाले मनमोहन सिंह और सुशील कुमार शिंदे से मैं पूछना चाहता हूँ कि अगर दामिनी उनकी बेटी होती (हालाँकि ऐसा होना नितान्त असंभव है क्योंकि इनकी बेटियाँ तो हमेशा जेड प्लस सुरक्षा में रहती हैं) तब भी क्या सरकार का रवैया इसी तरह उदासीन रहता? क्यों नहीं बुलाया जा रहा है संसद का विशेष सत्र? क्या जरूरत थी विधि आयोग के अस्तित्व में रहने पर भी एक और आयोग बनाने की? ऐसे कितने आयोगों या समितियों की सिफारिशों को सरकार ने लागू किया है? क्या सरकार ने सिर्फ टालने की सोंचकर ऐसा नहीं किया है? मैं पूछता हूँ कि कानून आयोग बनाएगा या संसद बनाएगी? फिर आयोग बनाने जैसे विलंबकारी कदम उठाकर क्यों जनता के धैर्य की सरकार परीक्षा ले रही है? पिछले कई सप्ताहों से अनशन पर बैठे जागरूक युवाओं में से कोई अगर मर जाता है तो उसकी मौत के लिए जिम्मेदार कौन होगा,सोनिया गांधी का चमचा मनमोहन सिंह या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या कई बेटियों का बाप मनमोहन सिंह? इसलिए वक्त की नजाकत को समझते हुए सरकार को तुरन्त संसद का विशेष सत्र बुलाना चाहिए और बलात्कारियों को फाँसी की सजा का प्रावधान करना चाहिए। इतना ही नहीं इस नाबालिग दरिंदे को भी फाँसी पर चढ़ाने का इन्तजाम करना चाहिए। संसद देश से है देश संसद से नहीं इसलिए भी सरकार और संसद को जनभावना का ख्याल रखना चाहिए। अगर संसद ऐसा नहीं कर सकती तो नहीं चाहिए हमको ऐसी संसद और ऐसी व्यवस्था जो निर्दोषों पर कहर ढाती हो और बलात्कारी-हत्यारे को इनाम देती हो। याद रखिए कि जब तक दामिनी के कातिल जिन्दा हैं दामिनी की आत्मा को तब तक शांति नहीं मिल सकती। फिर उसकी अंतिम इच्छा भी तो यही थी कि इन दरिन्दों को जिन्दा जलाकर मारा जाए। अंत में कवयित्री डॉ. संगीता अवस्थी द्वारा रचित कविता "माँ की व्यथा" के कुछ अंश प्रस्तुत करना चाहूंगा-
माफ करना हे प्रभु
जिस साँप को मैंने जन्मा
उसने तमाम बहन बेटियों को
डसने से नहीं बख्शा
वो दरिन्दा भूल गया कि वो भी
किसी औरत की कोख से ही जन्मा है
लानत है उस वहशी को जो अपनी दरिन्दगी से
न देख पाया अपनी माँ-बहन का रूप

चीत्कार करती माँ की ममता को
तभी मिलेगा त्राण
जब दरिन्दे का शरीर होगा छलनी और
तड़प-तड़प कर निकलेंगे उसके प्राण।

5.1.13

बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा..!


करूणानिधी के 18 सांसदों वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी (द्रमुक) भले ही केन्द्र की यूपीए सरकार की बैसाखी बनी हुई हो लेकिन द्रमुक के उत्तराधिकार को लेकर करूणानिधी के दो बेटों की लड़ाई से द्रमुक पर ही संकट खड़ा हो गया है। द्रमुक के सर्वेसर्वा करूणानिधि ने भले ही अपने छोटे बेटे स्टालिन को पार्टी की बागडोर देने के संकेत दिए हों लेकिन करूणानिधि के बड़े बेटे एम. के. आलागिरी को अपने पिता का ये फैसला रास नहीं आ रहा है और अलागिरी ने पिता के इस फैसले के खिलाफ ताल ठोक दी है। अलागिरी ने ये कह दिया है कि पार्टी कोई मठ नहीं है जो इसके उत्तराधिकारी की नियुक्ति की जाए।
वैसे देखा जाए तो राजनीति में परिवारवाद नई बात नहीं है और हिंदुस्तान में ऐसे बड़े - बड़े उदाहरण मौजूद हैं जो ये साबित करते हैं कि राजनीति में प्रवेश करने का सबसे आसान रास्ता विरासत की सियासत ही है। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है जहां पर परिवारवाद ही हावी है।
1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद लगा था कि अब ये परंपरा टूटेगी लेकिन सोनिया गांधी ने पार्टी को नेतृत्व प्रदान कर न सिर्फ कांग्रेस को उबारा बल्कि परिवारवाद की परंपरा को भी आगे बढ़ाया...इसे एक बार फिर से सोनिया गांधी के सुपुत्र राहुल गांधी आगे बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस के ही कई बड़े नेताओं के सुपुत्र जो कम समय में नाम कमा चुके हैं उनका पारिवारिक इतिहास पर नजर डालें तो ये तस्वीर और साफ हो जाती है। फिर चाहे माधव राव सिंधिया के सुपुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया हो या फिर राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट ये सब परिवारवाद की ही उपज हैं। करूणानिधि के बेटे भी इसी की उपज हैं लेकिन एक ही परिवार में पार्टी की सत्ता को लेकर आपस में तलवारें खिंच जाना रोचक हैं।
तमिलनाडु में द्रमुक की लोकप्रियता ही शायद करूणानिधि के दोनों बेटों के बीच पैदा हो रही दरार की मुख्य वजह ही है क्योंकि वर्तमान में केन्द्रीय मंत्री एम. के. आलागिरी तब तक ही मंत्री हैं जब तक केन्द्र में यूपीए की सरकार है, उसके बाद अलागिरी को पूछने वाला भी कोई नहीं होगा। अलागिरी को फिर से सत्ता का स्वाद भविष्य में तमिलनाडु में ही नसीब हो सकता है, वो भी तब जब द्रमुक तमिलनाडु में सत्ता पर काबिज हो और वो द्रमुक के सर्वमान्य नेता हो...लेकिन अलागिरी के पिता और फिलहाल द्रमुक के सर्वेसर्वा करूणानिधि का प्यार बड़े बेटे अलागिरी की बजाए छोटे बेटे स्टालिन पर ज्यादा छलक रहा है जो अलागिरी को रास नहीं आ रहा है।
जाहिर है अलागिरी की मंशा है कि करूणानिधि के बाद द्रमुक के सर्वेसर्वा वे खुद हों न कि स्टालिन। अलागिरी को द्रमुक के सर्वेसर्वा बनने के बाद भविष्य में कभी द्रमुक के सत्ता में आने के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी नजर आ रही होगी शायद इसलिए ही पिता के फैसले पर वे कहते हैं कि पार्टी कोई मठ नहीं है। खैर द्रमुक में पैदा हो रही दरार की असली वजह सब जानते ही हैं लेकिन बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या सिर्फ राजनीतिक दल के सर्वेसर्वा की कुर्सी पर बैठकर ही जनता की सेवा या गरीबों का उत्थान किया जा सकता है..? क्योंकि करूणानिधी कहते हैं कि उनके बाद उनका छोटा बेटा द्रमुक की कुर्सी संभालने के बाद इस काम को करेगा यानि कि बिना कुर्सी के करूणानिधि के मुताबिक जनता की सेवा नहीं होती..!
करूणानिधि की इसी सोच को ही अब उनके बेटे आगे बढ़ा रहे हैं और जनता की सेवा के लिए पार्टी का सर्वेसर्वा बनने के लिए दोनों के बीच उजागर हुए मतभेद पूरी कहानी बयां कर रहे हैं कि उनके दिल में जनता की सेवा करने का जज्बा कितना गहरा है और कुर्सी को पाने की लालसा कितनी जोर मार रही है। जब तमिलनाडु में सत्ता में न रहते हुए द्रमुक के सर्वेसर्वा करूणानिधि के बेटों में पार्टी के उत्तराधिकार को लेकर तलवारें खिंच गई हैं तो अगर कभी भविष्य में द्रमुक सत्ता में आ गई तो फिर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए दोनों भाइयों में कितनी जूतम पैजार होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

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तुम किस पंक्ति में हो ?


तुम किस पंक्ति में हो ?

एक आदमी नगर के विद्वान के पास बैठा युग के पतन पर गहरी चिंता कर रहा था।उसने
विद्वान् से कहा- देखो,हमारे परम्परागत मूल्यों का ह्रास हो रहा है।

विद्वान ने कहा- सही बात है।

उस आदमी ने कहा- ज्यादातर लोग उदात्त भावना खोते जा रहे हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-लोग भ्रष्ट और अनैतिक होते जा रहे हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-हमारा कानून गतिहीन या पंगु हो गया है।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-हमारे नेता भी आदर्शों का अनुकरण नहीं कर रहे हैं और सत्ता लोभी
                              हो गए हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा- गुरु और शिक्षक भी लोभी और असंस्कारी हो गए हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-नारी भी पाश्चात्य रंग में रंग के लज्जा के भूषण को छोड़ रही है।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-व्यापारी मुनाफाखोर और मिलावटी सामान बेच रहे हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-प्रशासनिक अधिकारी कामचोर और रिश्वत लेने वाले हो गए हैं।

उस आदमी ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-आप मान रहे हैं कि ये सब सही है परन्तु इन बुराइयों से समाज को
                             मुक्त कैसे करे ?क्या आपके पास कोई समाधान ने है।

विद्वान ने कहा- हाँ ,मेरे पास उपयुक्त समाधान है ।

वह व्यक्ति खुश होकर बोला -हमे वह उपाय शीघ्र बताएं ताकि हम समाज को बदल सके?

विद्वान बोला - उपाय बताने  से पहले मैं एक बात तुमसे जानना चाहता हूँ ?

वह व्यक्ति बोला -पूछिये ?

विद्वान बोला -इन सब में आप खुद को किस पंक्ति में पाते हैं?

वह व्यक्ति विद्वान के प्रश्न को सुनकर कुछ देर चुपचाप बैठा रहा और फिर सर झुका कर
चलता बना।    


Lkksprk gwa ] eSa D;ksa lq/k:- \ D;k ljdkj pkgrh gS fd eSa lq/k:a \ o”kksZa iwoZ baXyS.M esa ,d cykRdkj dk dsl gqvk vkSj cykRdkjh dsk tks ltk feyh og blfy, fd mlus csrgk’kk ‘kjkc ih j[kh FkhA fooknkLin gS A eq>s Hkh yxk A ml cykRdkjh dks csrgk’kk ‘kjkc ihus dh ltk feyh A dgk x;k fd ‘kjkc us mldh ekufld gkyr bruh [kjkc dj nh Fkh fd og fdlh dh gR;k Hkh dj ldrk Fkk A ysfdu esjs fglkc ls ml tt ds rdZ ls cykRdkfj;ksa dh fgEer c<+h gksxh A ,slk fofp= U;k; vlguh; gS ysfdu gqvk A fdUrq ;g rks r; gS fd ‘kjkc ‘kjhj esa vfrfjDr vuko’;d vklqjh mtkZ lapkj dj nsrh gS tks vDlj fod`fr;ksa dsk tUe nsrk gS vkSj vlhfer ‘kjkc lUrqyu [kjkc dj nsrh gS A eSa ;fn dgwaxk fd ‘kjkc u ihvks rks vki dgsaxs & eSa ikxy gwa A blfy, ugha dgwaxk A ,d fe= dgus Hkh yxs fd ‘kjkc ds cxSj dksbz ftUnxh gS \ eSus dgk gka gka A fQj cksys & ‘kjkc ihuk dksbZ cqjh ckr ugha gS A eSusa dgk & D;k vki tc dHkh dksbZ fyEdk ;k dskd vkfn dh cksry [kjhndj lM+d ij ihrs gSa rks cksry dks eqag ls yxkus ls igys b/kj m/kj ns[krs gSa D;k \ dksbZ ns[k rks ugha jgk A os cksys ugha ] D;ksa ns[ksa ] ;s dksbZ cqjh ckr gS D;k \ ljdkj ykbZlasl nsrh gS A eSaus dgk & fQj tc ‘kjkc [kjhnrs gSa vkSj ihrs gSa rks b/kj m/kj D;ksa ns[krs gSa \ ljdkj rks bldk Hkh ykblsaUl nsrh gS \ os cksys & ugha oks ] ,slk gS u oSlk gS u A [kSj ] ljdkj us gh lw[kk {ks= Hkh ?kksf”kr dj j[kk gS A tgka ckfj’k ugha gksrh ogak rks lw[kk {ks= gksrk gh gS ysfdu tgka rFkkdfFkr :Ik ls ljdkjh uhfr;ksa ds rgr ‘kjkc uhfrfo:) o fuf”k) gS ogka Hkh MªkbZ ,fj;k tSls inksa dk iz;ksx fd;k tkrk gS A tSls gfj}kj ] Hkys gh v[kckjksa dh lqf[kZ;ksa esa ;s [kcjsa gksa fd gfj}kj esa Hkh xSjdkuwuh rjhds ls yksx ‘kjkc csprs vkSj [kjhnrs idM+s tkrs gSa A vk/;kfRed ‘kgj gS A blfy, ‘kjkc ugha ihuh A ‘kjkc vkSj v/;kRe nksuks vyx vyx phtsa gSa A v/;kRe gh rks ;g fl[kkrk gS fd ijkbZ L=h dks ekrk cgu ekuks A vki dgsaxs ] ugha ;g rks uSfrdrk fl[kkrh gS A ,d gh ckr gS A vki dg dj rks nsf[k;s A vkidks lUr dk rexk feyrs nsj ugha yxsxh A dgk tk,xk vki v/;kReizo`fRr ds gSa A rks v/;kRe dk vFkZ gh gS vf/k vkRe ;kfu vkRek esa A vf/k milxZ esa vFkZ esa iz;ksx gksrk gS A euq”; 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loky vkSj Hkh gSa A brus tokc fey tk,a rks ckdh fQj dHkh --------------------

4.1.13

INSTRUMENTAL-Aansu Bhari Hain Ye Jivan Ki Rahen.flv




INSTRUMENTAL-Aansu Bhari Hain Yeh Jivan Ki Raahein.

DEAR FRIENDS,

I PLAYED INSTRUMENTAL "Aansu Bhari Hain Yeh Jivan Ki Raahein."  
ON 
MY  ELE. HAWAIIAN GUITAR .

DOWNLOAD FULL LENGTH-MP3 AUDIO. 


DOWNLOAD RINGTONE-MP3 AUDIO. 


FULL LENGTH VIDEO (YOU TUBE)


आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें
कोई उनसे कह दे, हमे भूल जाए

वादे भुला दे, कसम तोड़ दे वो
हालत पे अपनी, हमे छोड़ दे वो
ऐसे जहां से क्यों हम दिल लगाए

बरबादीयोंकी अजब दास्तां हूँ
शबनम भी रोये, वो मैं आसमा हूँ
तुम्हें घर मुबारक, हमे अपनी आहे

WITH GREAT HUMBLE, THIS IS MY ONE MAN SHOW. 
ENJOY & PUT YOUR PRECIOUS COMMENTS PLEASE.
MARKAND DAVE.
M.K.AUDIO-VIDEO RECORDING STUDIO.
AHMEDABAD-GUJARAT.INDIA.






अबे पुतला नहीं, कोच है हमारा, नाम है डंकन फ्लेचर!

Must Read::: Indian Dressing room
after 2nd ODI:
रोहित: मैच के साथ साथ सीरिज़ भी हार गए
आज!
धोनी: क्या बात है.. शाबाश लड़के..
बल्लेबाज़ी तेरी कितनी भी घटिया हो,
Observation power कमाल की है!
रोहित: यार आज तो मैं खेला ही नहीं, आज
तो मुझे मत बोल.इन सबने
घटिया बल्लेबाज़ी की, इनको बोल!
सहवाग: मुँह संभाल के बात कर रोहित,
मेरी पारी ठीक थी.
गंभीर: रहने दे वीरू, हम वहीं थे. आधे रन तो तेरे
Overthrow से बन रहे थे.
सहवाग: गौती, तेरी तरह बोल्ड तो नहीं हुआ,
विकेट तो बच गई!
धोनी: बस करो यार… तुम मियाँ-
बीवी दोनों को अगले मैच से निकाल देते हैं.
तसल्ली से बाहर बैठ कर लड़ना.
सहवाग: दिल्ली मे मैच है माही, दिल्ली के लड़के
तो खेलेंगे.
धोनी: हाँ, दिल्ली के लड़के तो खेलेंगे, विराट और
ईशांत.. दिल्ली के अंकल लोग बाहर बैठेंगे.
सहवाग: ये लड़के?? (कोहली की तरफ
इशारा करते हुए) चीकू ने क्या उखाड़
लिया था आज, वाइड बॉल पर आउट हुआ.
कोहली: क्या वीरू भाई, मेरी जगह परतो नज़र मत
डालो.. मेरी क्या ग़लती है,
पता ही नहीं था कि ये अकमल भी कैच वैच लेने
लग गया है.
जडेजा: किसी को कुछ पता नहीं था कैसे रन
बनाने हैं, मैने फालतू मे इतनी अच्छी गेंदबाज़ी की.
युवराज: साला यही दिन देखना बाकी रह
गया था कि जडेजा भी ताना मारे!
जडेजा: युवी भाई, आज मेरी तरफ से कोई
कमी नहीं थी. आज तो बनता है.
युवराज: चल भाई, तेरा दिन है आज.. जैसे
नासिर जमशेद का था.
रैना: यार ये नासिर का पता करवाओ,
इसका क्या बिगाड़ाहै हमने जो हर मैच मे लेने लग
जाता है.
धोनी: क्या पता करवाना है यार, ऐसेऐसे गेंदबाज़
होंतो कोई भी सर चढ़ कर ले सकता है.
रहाने: कोई नहीं सर, जो हुआ सो हुआ. अगले मैच
मे देख लेंगे उनको.
धोनी: तू तो 2 मैच से देख ही रहा है, और
कितना देखेगा. अब खेलने की तैयारी कर.
चलो अब सब अपना सामान संभालो और होटल
जा कर सो जाओ. अगलेमैच
की रणनीति दिल्ली जा कर बनायँगे. (भुवनेश्वर
कुमार का उठाहुआ हाथ देख कर) हाँ कुमार,
क्या हुआ?
भुवनेश्वर कुमार: सर जब से टीम मे आया हूँ, एक
बात पूछना चाहता था…
धोनी: हाँ हाँ, पूछ!
कुमार: ये पुतला किसका रखा रहता है हर ड्रेसिंग
रूम मे?
धोनी: अबे पुतला नहीं, कोच है हमारा.

नाम है डंकन फ्लेचर!


 कहीं से टीपा...! लेकिन पता नहीं कहां से.. एफबी पे मिला.. लेकिन पता नहीं किसकी वाल से.. अब कहाँ से और कैसे मिला छोड़कर पढो..और मजे लो.बढ़ चुके हो तो ढंग से दो चार कमेंट मार दो..! और निकलो..भड़ास निकालो और काम करो अपना..! जय हो 

निर्लज्जता पर चर्चा ना करे ................


निर्लज्जता पर चर्चा ना करे ................

एक व्यक्ति डॉक्टर के पास गया ,डॉक्टर ने उसकी शारीरिक तकलीफ के बारे में पूछा।
रोगी ने सब बात डॉक्टर को बतायी और शीघ्र निरोगी होने का उपाय जानना चाहा।

डॉक्टर ने कहा -आपको अमुक दवाइयाँ समय-समय पर लेनी होगी और खाने -पीने
में परहेज रखना होगा यदि तुम ऐसा करोगे तो शीघ्र ठीक हो जाओगे।

 रोगी बोला -डॉक्टर सा'ब, मैं आपके पास घर से चल कर आया,आपके साथ बैठकर
रोग की सांगोपांग चर्चा की ,हर तथ्य को समझा ,जाना, क्या इतने से बात नहीं बनेगी ?

डॉक्टर बोला - सिर्फ बिमारी को समझ लेने और जान लेने से स्वस्थ होना असंभव है,
स्वास्थ्य को दुरस्त करना है तो दवा भी लेनी होगी और परहेज भी करना होगा।

रोगी बोला -डॉक्टर सा'ब, आपका परामर्श मेरे गले नहीं उतर रहा है,ये तो हजारो सालो
पुरानी पद्धति है रोगों को शमन करने की ,आज हम  इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं।आज
हमने बहुत प्रगति कर ली है अब बिमारी को ठीक करने के जीर्ण-शीर्ण विचार नहीं चाहिए।
मुझे सिर्फ लच्छेदार बातों से ठीक कर दीजिये।

डॉक्टर बोला-मेरे पास अभी तक ऐसी तकनीक नहीं आई है इसलिए मैं आपकी कोई
सहायता नहीं कर सकता हूँ।आप सिर्फ यमराज से अरदास कीजिये ....!!

   आज यही हाल हमारा है।हम समस्याओं का सिर्फ बातों से समाधान चाहते हैं या फिर
हम परहेज को भूलकर सिर्फ दवा पर स्वस्थ होना चाहते हैं।हो सकता है दवा के बल पर
हम एक -दो बार ठीक हो जाए लेकिन परहेज से बचेंगे तो फिर रोगी हो ही जायेंगे इसमें
शंका की बात नहीं है।

हम समस्या के निवारण की प्रखर लालसा रखते हैं,उससे निजात पाने के लिए हम उस
व्यक्ति तक पहुँचने का प्रयास भी करते हैं और समस्या के निवारण के लिए दवा भी ले
लेते हैं मगर हम परहेज का प्रयास नहीं करते ,नतीजा यह होता है कि समस्या कम ज्यादा
बनी ही रहती है,उसका शमन नहीं होता।

  बियर बार डांसर के अश्लील डांस, डांस-क्लब में फूहड़ता का भोंडा प्रदर्शन,कला के नाम
 पर सिनेमा में परोसी जा रही कामुकता,गीत के नाम पर कामुक स्वर लहरियां,हास्य के
नाम पर द्वि अर्थी संवाद ,नारी देह का सार्वजनिक स्थलों पर फूहड़ प्रदर्शन,खेलो में चीयर
गर्ल, इन सबको छोड़े बिना हमे समस्यां से निजात चाहिए ,कैसे होगा ...?               

सिर्फ 20 रूपए में बेच दिया ईमान !


बात 29 दिसंबर 2011 की है...देहरादून से रात को काठगोदाम जाने वाली काठगोदाम-देहरादून एक्सप्रेस 12 घंटे लेट थी तो ट्रेन सुबह करीब साढ़े 11 बजे देहारादून से काठगोदाम के लिए चली। बाहर कोहरा था तो ट्रेन धीरे धीरे रूकते रुकाते अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। ट्रेन में पेंट्री नहीं थी ऐसे में जहां जहां ट्रेन रुकती वहां वहां यात्रियों को चाय-नाश्ता बेचने के लिए कुछ लोग ट्रेन में चढ़ जाते और ट्रेन चलते ही उतर रहे थे। मैं ट्रेन के बी-1 कोच में अपने भांजे के साथ यात्रा कर रहा था।
ट्रेन रामपुर स्टेशन से बस चली ही थी कि हाथ में गर्म चाय की केतली लिए एक युवक जिसकी उम्र करीब 30 वर्ष रही होगी हमारी बोगी से बड़ी तेजी से बाहर निकल रहा था उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था। युवक के पीछे एक पुलिसकर्मी जिसकी उम्र भी करीब 30 वर्ष के आस पास होगी भी तेजी से हमारी बोगी से बाहर निकला। चाय वाले को देखकर चाय लेने मैं भी बोगी से बाहर निकला था तो वहां का नजारा कुछ इस तरह था। ट्रेन के दरवाजे के पास पुलिसकर्मी चाय वाले युवक को ट्रेन में चढ़ने पर डपट रहा था और युवक से पूछताछ कर रहा था और उसने उसका परिचय पत्र मांगा। मैंने इसे नजरअंदाज करते हुए युवक से दो ग्लास चाय की मांगी तो वो युवक पुलिसकर्मी के सामने चाय देने से घबराने लगा। हालांकि उसने मुझे दो ग्लास चाय दे दी लेकिन इतने में वो पुलिसकर्मी उस युवक का परिचय पत्र लेकर युवक से ये कहते हुए आगे निकल गया कि तू मुझे आगे आकर मिल। कुल मिलाकर पुलिसकर्मी को चाय वाले युवक से पैसे ऐंठने का बहाना मिल गया था।
खैर मैं चाय लेकर अपनी सीट पर पहुंच गया। करीब 5 मिनट बाद वो चाय वाला युवक वापस हमारी बोगी में आया और चाय बेचने लगा इस बार उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था और वो बड़े इत्मीनान से यात्रियों को चाय देने लगा। इस 5 मिनट में चाय वाले युवक के साथ क्या हुआ होगा ये सारा माजरा मेरे समझ में आ गया था लेकिन फिर भी मैं युवक से पूछे बिना नहीं रह पाया। मैंने युवक को आवाज देकर बुलाया और उससे पूछा कि वह पुलिसकर्मी उससे क्या बोल रहा था तो वो पुलिसकर्मी को गाली देते हुए बोला कि साहब- ये तो हमारे साथ रोज ट्रेन में होता है हम दो पैसे कमाने के लिए ट्रेन में चाय बेचने के लिए आते हैं लेकिन मौका मिलते ही ये पुलिस वाले हमें परेशान करते हैं और पैसे वसूलते हैं। आज भी वही हुआ और वो हमसे पैसे मांगने लगा...हम भी क्या करते पैसे देने पड़े। वो बोला कि पुलिसकर्मी को पैसे दिए बगैर चाय बेचेंगे तो पुलिस वाला कहता है कि ये गलत है लेकिन उसको पैसे दे दिए तो सब सही हो जाता है। मैंने पूछा कि ये कितने पैसे मांगते हैं तो उसने जो बोला वो चौंकाने वाला था। वो बोला साहब- ये लोग तो पांच सौ रूपए तक मांगते हैं लेकिन 20-30 रूपए में भी मान जाते हैं। इतनी देर में किसी ने चाय के लिए आवाज दी तो वो चाय देने चला गया।
मैं काफी देर तक बैठकर इस बारे में सोचता रहा वाकई में पुलिस वालों के लिए जो कहा जाता है कि ये सिर्फ कमाई करना जानते हैं और कुछ नहीं(सभी पुलिसकर्मी नहीं)। ट्रेन में हैं तो ये यात्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात लेकिन इनकी नजर ऐसे ही चाय वालों पर या लोगों पर रहती है जिनसे मौका मिलते ही ये वसूली शुरु कर देते हैं। मैंने एक हिसाब लगाया कि देहरादून से काठगोदाम तक 336 किलोमीटर के सफर में ट्रेन करीब डेढ़ दर्जन स्टेशनों पर रूकती है। यानि की अगर इस दौरान एक पुलिसकर्मी के हाथ ऐसे 20 चाय वाले भी लग गए और हर चाय वाले से वो कम से कम 30 रूपए भी लेता है तो पुलिसकर्मी करीब 600 रूपए कमा लेता है यानि कि 18 हजार रूपए महीना। हर माह सरकार जो तन्खवाह देगी वो अलग। जब एक पुलिसकर्मी को सैलरी के अलावा करीब 15 से 20 हजार रूपए महीने इस तरह कमाई हो रही हो तो वो भला क्यों ये काम नहीं करेगा(सभी पुलिसकर्मी शामिल नहीं)। अब ट्रेन में यात्रियों का सामान चोरी हो रहा है तो हो जाए...लेकिन इन पुलिसकर्मियों को इससे कोई सरोकार नहीं। खैर ये तो एक छोटा सी घटना थी जो मेरे सामने घटी...इस तरह की हजारों वाक्ये रोज होते हैं जो शायद आपने भी अनुभव किए होंगे।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिसकर्मी कितनी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी को अंजाम देते हैं...माना कि चाय वाला भी गलत तरीके से चाय बेच रहा था लेकिन अगर पुलिसकर्मी उसके खिलाफ कार्रवाई करें तो मजाल है कि आगे से कोई चाय वाला इस चरह बगैर लायसेंस के ट्रेन में चाय बेचने के लिए घुसे लेकिन अगर चाय वाले कि हर बार इतनी हिम्मत होती है तो वो इन पुलिसकर्मियों की वजह से ही क्योंकि वे जानते हैं कि 20-30 रूपए में ये पुलिसवाले मान जाएंगे और वे आसानी से बिना रोकटोक ट्रेन में चाय बेच पाएंगे...लेकिन अफसोस हमारे देश में ऐसा होता नहीं है। यहां चोरी करने वाले को पकड़े जाने का डर नहीं क्योंकि उसे मालूम है कि पहले तो पकड़ने वाला ही उसे चंद पैसों पर उसे छोड़ देगा। ये पुलिसकर्मी अगर इमानदारी से अपनी ड्यूटी करें तो क्या नहीं कम होंगे हमारे देश में अपराध..?  जाहिर है पूरी तरह अपराधों पर अंकुश नहीं भी लग पाएगा तो कुछ हद तक अपराध और अपराधियों पर लगाम तो कसेगी लेकिन हमारे देश में जहां नीचे से ऊपर तक सब भ्रष्टाचार में लिप्त हैं वहां ये मुमकिन नहीं लगता।

deepaktiwari555@gmail.com

3.1.13

मिट्टी के शेर घर में भी ढेर-ब्रज की दुनिया

मित्रों,भारतीय क्रिकेट टीम के बारे में अक्सर यह कहा जाता रहा है कि वह विदेशों में भले ही अच्छा नहीं खेले मगर अपनी जमीन पर तो वह शेर ही होती है। मगर आज यह मिथक भी टूट गया है। भारतीय टीम के लिए इन दिनों अपने देश की पिच पर सीरिज जीतना तो दूर की बात रही एक मैच जीत पाना भी दूर की कौड़ी बन गया है। पहले हमारी टीम के शेरों ने इंग्लैंड को कई दशकों के बाद काफी आसानी से टेस्ट सीरिज जीत जाने दिया और आज पाकिस्तान के खिलाफ तीन एकदिवसीय मैचों की शृंखला में वह दो-शून्य से निर्णायक तरीके से पीछे हो गई है।
           मित्रों,इन दोनों देशों ने हमारे घरेलू मैदान के शेरों को माटी का शेर साबित कर दिया है। इन दिनों न तो हमारी गेंदबाजी ही चल पा रही है और न तो बल्लेबाजी ही,क्षेत्ररक्षण के क्षेत्र में भी हमारी स्थिति दयनीय होती जा रही है। समझ में नहीं आता कि करोड़ों का सालाना पैकेज पानेवाले हमारे खिलाड़ियों को हो क्या गया है?क्यों उनको मैदान में उतरते ही साँप सूंघ जाता है?हालाँकि कप्तान धोनी ने अपना कर्त्तव्य आज भी बखूबी निभाया है लेकिन सिर्फ कप्तान के ही अच्छा खेलने से कोई टीम क्या जीत सकती है?क्यों टीम के बाँकी बल्लेबाज लगातार फ्लॉप हो रहे हैं समझ में नहीं आता?क्या उनका मन अब खेलने में नहीं लग रहा और उनको सिर्फ विज्ञापनों में काम करना ही रास आ रहा है।
             मित्रों,अब टीम में प्रयोग करने का समय भी नहीं रह गया है। अब टीम के चयनकर्त्ताओं को टीम में आमूल-चूल परिवर्तन करने पड़ेंगे। खिलाड़ियों के साथ-साथ टीम के कोच को यथाशीघ्र बदलने की आवश्यकता है और टीम में अच्छे गेंदबाजी,बल्लेबाजी और क्षेत्ररक्षण प्रशिक्षकों को भी नियुक्त करने की जरुरत जान पड़ती है तभी टीम में फिर से जान आ सकेगी और भारतीय टीम की गाड़ी एक बार फिर से जीत की पटरी पर सरपट भाग सकेगी।

मानव इन्द्रियाँ : निग्रह या दमन


मानव इन्द्रियाँ : निग्रह या दमन

हमें ज्ञान कराने वाली पाँच इन्द्रियाँ है-चक्षु (देखना),श्रोत्र (सुनना),घ्राण (सूंघना),
रसन (स्वाद),स्पर्शन(स्पर्श का अनुभव करना)इन पाँचो शक्तियों के अलग-अलग
अधिष्ठान अंग होते हैं -आँख,कान,नाक,जीभ,त्वचा।ये ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्म होने से
दिखाई नहीं देती है हम इनके अंग को देख सकते हैं।इन इन्द्रियों का सम्बन्ध
पञ्च महाभूतों से होता है-आकाश,वायु,अग्नि,जल और पृथ्वी।
इसी तरह पाँच कर्मेन्द्रियाँ होती है -हाथ,पेर,वाणी,लिंग और गुदा।

 प्रश्न यह उठता है कि हमें इन इन्द्रियों के साथ कैसे जीना चाहिए क्योंकि इन
इन्द्रियों के कारण ही धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ बने हैं।इन चारों
पुरुषार्थों के बिना संसार का सृजन नही हो सकता है।

क्या हम इन्द्रियों का दमन करके व्यवस्थित रूप से जी पायेंगे? भारतीय दर्शन
ने इन्द्रियों का दमन करने का नहीं बल्कि इनका निग्रह (control)करने का
निर्देश दिया है।क्योंकि दमन करने से घुटन एवं कुण्ठा पैदा होती है और जिस
कामना का दमन किया जाता है वह हमसे ही शक्ति प्राप्त करके और बलवती
होती जाती है।हम उससे मुक्त नहीं हो पाते बल्कि उसमें और उलझ जाते हैं
और अपनी उर्जा ख़त्म करते रहते हैं।

धृति: क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह: के अनुसार इन्द्रियों का निग्रह
करना चाहिए ,दमन नहीं।न करने योग्य कर्म को करने से रोक कर ,करने
योग्य कर्म में ही इन्द्रियों को लगाना और कार्यरत रखना 'निग्रह' है।इसी
को आत्म नियन्त्रण या निज अनुशासन का पालन करना कहते हैं।इन्द्रियों
का निग्रह करने में विवेक और धैर्य सर्वाधिक सहायक रहते हैं।मन को वश
में रखना ही इन्द्रिय निग्रह करना है।

यहाँ यह शंका प्रस्तुत की जा सकती है की मन को वश में रखना बहुत कठिन
होता है।किसी सुंदर वस्तु को देखकर आकर्षित हो जाना स्वाभाविक है।किसी
सुंदर स्त्री को देखने या उसके सम्पर्क में रहने और घनिष्ठता होने की स्थिति में
काम वासना सम्बन्धी विचार मन में आ ही जाते हैं।अब इस कामना का दमन
कैसे करे ?

इसका समाधान यह है कि दमन करने की जरूरत नहीं सिर्फ विवेक से काम
लेकर निग्रह करने की जरूरत है जैसे अपनी सुंदर युवा बहन और बेटी को
देखने और सम्पर्क में रहने पर भी मन में कामुक विचार नहीं आता क्योंकि
विवेक ऐसा विचार नहीं करने देता।मन तभी वश में रहकर उचित विचार
करता है जब विवेक से काम लिया जाए क्योंकि विवेक ही मन को सही विचार
करने की प्रेरणा देने और सही आचरण करने के लिए विवश करने की क्षमता
रखता है।विवेक के साथ धैर्य का होना भी जरूरी होता है क्योंकि धैर्य विवेक
का बल होता है।

हमारा मन हमारे अवचेतन मन में दबे संस्कारों और अतृप्त इच्छाओं से
प्रभावित और संचालित रहता है अत:जो अच्छे संस्कार वाले होते हैं उन्हें
इन्द्रिय निग्रह करने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता बल्कि ऐसा स्वभावत:
स्वयमेव होता रहता है ब्रह्मचार्य इसी स्वभाव और आचार विचार को कहते हैं।

महाराज शिवाजी मुगलों से युद्ध कर रहे थे उस युद्ध में मुगल राजा हार गये
थे।शिवाजी की सेना ने मुगल राजा के महल से युवा सुन्दरी को बंधी बना
लिया और उसे शिवाजी को भेंट देने के लिए अपने साथ ले आये।शिवाजी ने
उस सुन्दरी को देख सैनिको से पूछा -ये कौन हैं ?
सैनिको ने जबाब दिया- मुग़ल राजा युद्ध में हार गया और जान बचा कर
भाग गया हम उसके महल से इसे आपके लिए बंदी बना लाये हैं।

शिवाजी ने कहा -आप लोगों ने यह गलत किया है।यह नारी तो मेरे लिए
माँ के समान है ,आप इसे आदर सहित वापिस पहुँचा देवे।

यह एक अनुपम उदाहरण है इन्द्रिय निग्रह का। हमे समाज को और
नारी को देखने का नजरिया भी बदलना होगा।केवल दण्ड व्यवस्था से पूरा
काम बनने वाला नहीं है। 

इस लेख में कुछ अंश निरोगधाम "स्वास्थ्य रक्षक "अंक से लिए हैं।            

2.1.13

जनसंदेश टाइम्‍स में सैलरी को लेकर पेजीनेटरों का हंगामा

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में फिर एक बार सैलरी को लेकर बवाल देखने को मिला. प्रबंधन ने अपने उन कर्मचारियों की सैलरी तो दे दी, जिनकी सैलरी खाते में जाती है, परन्‍तु नगद पैसा पाने वालों को सैलरी नहीं मिल पाई. बताया जा रहा है कि यहां पर दो तरह की व्‍यवस्‍था लागू है. कुछ कर्मचारियों की सैलरी सीधे उनके खाते में जाती है, जबकि तमाम को नकद पैसा दिया जाता है. हालांकि इसके बारे में आरोप लगाया जाता है कि यह ब्‍लैकमनी को सफेद करने की कोशिश में होता है. खैर.

अभी मामला ये है कि सोमवार को नगद सैलरी पाने वाले पेजीनेटर अमन कुमार कुमार को नवम्‍बर की सैलरी नहीं मिली. नाराज अमन ने सोमवार को कार्यालय में सैलरी के लिए हंगामा कर दिया, जिससे काम प्रभावित होने लगा. जिसके बाद अखबार की ऐसी-तैसी कर देने वाले विजय विनीत ने अपने पास से अमन को पैसा देकर मामले को बिगड़ने से बचाया. और अन्‍य लोगों को आश्‍वासन की घुट्टी पिलाकर मामले को सलटाया, जिसके बाद किसी तरह अखबार का काम पूरा हुआ.

मंगलवार की रात फिर बवाल हो गया. सात पेजीनेटरों ने सैलरी को लेकर हड़ताल कर दिया. उन लोगों ने काम करने से इनकार कर दिया. प्रबंधन के हाथ-पांव फूल गए. सातों पेजीनेटर किसी भी तरीके से बिना सैलरी के मानने को तैयार नहीं थे. वे आश्‍वासन देने वाले विजय विनीत की भी बात मानने को तैयार नहीं थे. सूत्रों का कहना है कि बाद में संपादक एवं सीजीएम के हस्‍तक्षेप के बाद किसी तरह मामला सलटा. इन लोगों ने किसी तरह पैसे का जुगाड़ कर सभी सातों पेजीनेटरों को उपलब्‍ध करवाया, जिसके बाद अखबार का फिर से काम शुरू हो सका.

वैसे भी सूत्रों का कहना है कि जिस तरह से अखबार की आंतरिक स्थिति है तथा अखबार में जूनियर लेबल के लोगों का हस्‍तक्षेप बढ़ा है, उससे अखबार को चला पाना बहुत ही मुश्किल है. पेज के  लेआउट का एबीसी नहीं जानने वाले लोग इसमें हस्‍तक्षेप करने लगे हैं तभी से इस तरह की स्थिति पैदा हुई है. सूत्र यह भी बताते हैं कि प्रबंधन ने अब इस अखबार को घाटे की स्थिति में चलाने के मामले में हाथ खड़ा कर लिया है. कहा जा रहा है कि मार्च तक इस अखबार को ''पैसे लाओ और अखबार चलाओ'' की स्थिति में लाए जाने का निर्देश दे दिया गया है. अगर मार्च तक स्थिति नहीं सुधरी तो संभव प्रबंधन अपने इस सफेद हाथी पर ताला जड़ देगा.

INSTRUMENTAL YE NAYAN DARE DARE



INSTRUMENTAL-YE NAYAN DARE DARE.

DEAR FRIENDS,

I PLAYED INSTRUMENTAL "INSTRUMENTAL-YE NAYAN DARE DARE."  
ON 
MY  ELE. HAWAIIAN GUITAR .


DOWNLOAD FULL LENGTH-MP3 AUDIO. 


DOWNLOAD RINGTONE-MP3 AUDIO. 


FULL LENGTH VIDEO (YOU TUBE)


WITH GREAT HUMBLE, THIS IS MY ONE MAN SHOW. ENJOY & PUT YOUR PRECIOUS COMMENTS PLEASE.

MARKAND DAVE.
M.K.AUDIO-VIDEO RECORDING STUDIO.
AHMEDABAD-GUJARAT.INDIA.






बुद्धिमान कौन ? क्या कहते हैं शास्त्र ...........


बुद्धिमान कौन ? क्या कहते हैं शास्त्र ...........

जिसे विद्याध्ययन,साहित्य,संगीत,कला,सांसारिक वैभव,सुखों के भोग,धन-संपदा,
सुन्दर वस्तुएं,सुन्दर स्त्री,और सुख-दु:ख का अनुभव -इन सब में रूचि न हो वह या
तो सिद्ध महापुरुष है या फिर मानव रूप में मूढ़ पशु है।सामान्य पुरुष इनसे अवश्य
आकर्षित होता है पर जो सामान्य रूचि लेता है वह बुद्धिमान है।

जो प्राप्त वस्तु से संतुष्ट रहता है और अप्राप्त के लिए दुखी नहीं रहता ,जिस हाल में हो
उसी में प्रसन्न रहता है और सब कुछ ईश्वर की इच्छा मान कर राजी रहता है वह
व्यक्ति दुख से बचा रहता है और जो व्यक्ति दुख से बचना जानता है वह बुद्धिमान है।

जो बात के मर्म को तुरन्त समझ लेता है,सुनने योग्य बातों को एकाग्रचित हो सुनता
हैऔर व्यर्थ की बातों में रूचि नहीं रखता,खूब सोच-विचार करके ही कोई काम शुरू
करता है और हाथ में लिए काम को अधूरा नहीं छोड़ता और बिना पूछे किसी को
सलाह नहीं देता,वही बुद्धिमान है।

जो नष्ट हुयी वस्तु के लिए शोक नहीं करता,जो विपत्ति पड़ने पर धैर्य और विवेक का
साथ नहीं छोड़ता,जो पराई वस्तु का लालच नहीं करता और सदा शुभ कर्म करके
अपने पुरुषार्थ से ही कोई वस्तु प्राप्त करता है और जो सफल होकर इतराता नहीं,वही
बुद्धिमान है।

जो यश और आदर सम्मान मिलने पर अभिमानी नहीं होता,आदर न मिलने पर
अप्रसन्न नहीं होता,जो अपनी विद्या का अहंकार नहीं करता और अपने धन का
दुरूपयोग नहीं करता,जो गहन गंभीर और उदार स्वभाव रखता है और किसी के प्रति
भी वैर भाव नहीं रखता ,वही  बुद्धिमान है।

जो अपने द्वारा किये गए उपकार और दूसरों के द्वारा अपने प्रति किये गए अपकार को
याद नहीं रखता , जो अपनी बुराईयों और दूसरों की भलाइयों को भूलता नहीं ,जिसके
साथ रहने से किसी का अहित नहीं होता बल्कि भला ही होता है और जो किसी भी
समस्या को ठीक ढंग से सुलझा लेता है,वही  बुद्धिमान है।      

1.1.13


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भूखे भजन जपो गोपाला, पीते रहो विष का प्याला !!

सरकारी सेवाओं में कार्यरत लोगों के लिये वेतन वृद्धि के सीमित अवसर होतें हैं । वर्ष में एक बार समयमान एवं वेतनमान के अनुसार निश्चित वेतन वृद्धि एवं प्रत्येक दस वर्षों में एक बार वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार तनख्वाह बढ़ने की उम्मीद । यह वेतन आयोग मूलत: केन्द्र सरकार द्वारा नियत किया जाता है । केन्द्र सरकार इसकी अधिकांशत: सिफारिशों को मान लिया करती है । इसकी सिफारिशों को राज्य सरकारें अपनी प्रशासनिक एवं वित्तीय सहूलियतों के अनुसार लागू करते हैं । यह सिफारिशें राज्यों पर बाध्यकारी नहीं होती परन्तु परम्परा रही है कि राज्य भी इन्ही सिफारिशों को आधार मान कर अपने वेतनभोगियों को भी लाभान्वित करती रही हैं । 
छ:ठे वेतन आयोग की सिफारिशें 01 जनवरी 2006 से लागू हुयी थी । यानि छ: वर्ष पहले । तकनीकी रूप से इसके मतलब है कि छ:ठे वेतन आयोग की सिफारिशों से लाभ मिलने का लगभग 60 प्रतिशत समय बीत चुका है । परन्तु उच्च शिक्षा में कार्यरत शिक्षकों को छ:ठे वेतन आयोग की सिफारिशों के लाभ देने के मामले में केन्द्र एवं अधिकांशत: प्रदेश सरकारों की नीति एवं नीयत शक के दायरे में है । पंजाब, हिमाचल एवं उड़ीशा जैसे अपवाद राज्यों को छोड़कर लगभग पूरे भारत में ही अभी तक शिक्षकों को छ:ठे वेतन अयोग की सिफारिशों के अनुसार उनका पूरा बकाया वेतन नहीं मिला है । कई राज्यों ने इस आयोग की सिफारिशों को उच्च शिक्षा के शिक्षकों के हक में लागू करने में काफी हीला-हवाली की । इन राज्यों में शिक्षकों को लम्बी कानूनी लड़ाईयाँ लड़नी पड़ी । उन्हे अपने मूलभूत अधिकार यानि वेतन प्राप्ति के लिये न्यायालयों की शरण में जाना पड़ा । 
शिक्षकों के इस संघर्ष में मध्य प्रदेश के शिक्षकों ने भोपाल उच्च न्यायालय के आदेशों एवं दस दिनों की हड़ताल के बाद इस दिशा में सफलता पाई तो महाराष्ट्र के शिक्षकों को इसे अपने हक में लागू कराने के लिये दबाव बनाने के लिये लगभग 40 दिन तक हड़ताल पर रहना पड़ा । लगभग पूरे भारत में ही शिक्षकों को अपने हक में इसे लागू कराने में तीन साल का समय लगा । अन्य राज्यों में स्थिति कमोवेश यही रही । जहाँ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) ने अपनी सिफारिशों में स्पष्ट कहा है कि उन्हे पूरी तौर पर लागू किया जाना आवश्यक है । वहीं राज्य सरकारें अपने हिसाब से इन सिफारिशों की व्याख्या करते हुये शिक्षकों को जो दे रहीं हैं वो इन सिफारिशों का अधा - अधूरा और टूटा - फूटा स्वरूप है । जिसे की राज्यों की सरकारें उससे भी ज्यादा नीरसता के साथ रो - रो कर लागू कर रहीं हैं । 
यू.जी.सी. के बताये पूरे लाभ शायद ही किसी राज्य ने अपने शिक्षकों को दिये हों तो उन्हे अत्यन्त खुशनसीब समझा जायेगा । किसी राज्य ने शिक्षकों की सेवा - निवृत्ति की आयु 65 वर्ष नहीं स्वीकार की तो किसी राज्य ने शिक्षकों के महंगाई भत्ते में अपने राज्य की माली हालत के मद्देनजर कटौती कर दी, किसी ने महिलाओं के लिये शिशु पालन अवकाश, पितृत्व अवकाश और मातृत्व अवकाश पर अपना रुख अभी तक स्पष्ट नहीं किया है । और शिक्षकों को शायद बीमार पड़ने का हक नहीं है इसलिये यू.जी.सी. की सिफारिशों के अनुसार उन्हे चिकित्सा लाभ भी नहीं मिल रहे हैं । मनोरंजन एवं परिवार के साथ वक्त बिताने के लिये मिलने वाली एल.टी.सी. से तो शिक्षकों को सभी ने महरूम ही रखा । 
उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा के अध्यापकों के लिये राज्य सरकार ने अनमने ढ़ंग से छ:ठा वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू किया । 01 जनवरी 2006 से लागू होने वाली इन सिफारिशों को कुत्सित एवं शिक्षक विरोधी मानसिकता के चलते इसे 01 दिसम्बर 2008 से लागू किया । और यह मान लिया कि 01 जनवरी 2006 से शिक्षकों से इसका सिर्फ "काल्पनिक" लाभ देकर उनके दायित्वों की इतिश्री हो गयी । बतातें चलें कि इस प्रकार के आदेशों को पास करने वालों में वे लोग प्रमुखता से शामिल थे जो स्वयं को जनता का भाग्य विधाता मानतें है । उन्हे अपने वेतन एवं सेवा सम्बन्धी लाभ केन्द्र सरकार के घोषणा मात्र के बाद ही स्वत: मिल जाया करतें हैं । या यूँ कहे कि वो अपने वेतन सम्बन्धी लाभ स्वयं ही झटक लिया करतें हैं । इनके संगठनों ने राज्यों के साथ स्वयमं के लिये सुविधावादी सामंजस्य बना रखा है कि इधर केन्द्र सरकार ने घोषणा करी उधर अखिल भारतीय सेवा का झण्डा उठाये इस वर्ग की झोली में सारे लाभ स्वत: आ गिरे । 
हमारी चुनी हुयी सरकारें भी उच्च शिक्षा के शिक्षकों के साथ होते ऐसे दमनकारी कृत्यों को रोकने में असक्षम नजर आती हैं । क्योकिं उनकी निगाहें वोट बैंक पर होती हैं । लोकतंत्र में वोटों के गुणा भाग में हमारी बिरादरी कमजोर बैठती है । जहाँ पूरे उत्तर प्रदेश में हमारी संख्या लगभग चौदर हजार के करीब है वही एक सभासद को चुनने में औसतन बीस से बाईस हजार मतदाता होते हैं । यह तथ्य लोकतांत्रिक वोट व्यवस्था में हमारी हैसियत बताने के लिये काफी है । उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा के शिक्षक लगभग तीन वर्षों के कठोर संघर्ष के बाद प्रदेश की सरकार को इस बात का एहसास करा पाने में सफल हुये कि उन्हे भी नियत तिथि यानि कि 01 जनवरी 2006 से ही छ:ठे वेतन आयोग की सिफारिशों का लाभ मिलना चाहिये । एक लम्बे संघर्ष के बाद प्रदेश की सरकार ने माना कि सिर्फ "काल्पनिक" लाभ देने से आम शिक्षक के घर का चुल्हा नहीं जलेगा । हमें भी आटे की वही रोटी खानी होती है जोकि मन्त्रियों और नौकरशाहों को खानी होती है । और बाजार अपने ग्राहकों के पद और वेतन के अनुसार वस्तुओं की दामों में फर्क नहीं करता । वर्ष 2010 के मई माह में जाकर उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बात को सिर्फ सिद्धांत: स्वीकार किया । शासनादेश जारी हो गये कि केन्द्र सरकार से धन मिलने पर शिक्षकों को 01 जनवरी 2006 से उनके बकाया वेतन का भुगतान कर दिया जायेगा । 
जमीनी स्तर पर एक शिक्षक के लिये आज भी हकीकत वित्तीय एवं अन्य लाभों की सिर्फ कल्पना से आगे नहीं बढ़ी है । शिक्षकों को सिर्फ आश्वावसनों का झुनझुना पकड़ा दिया कि केन्द्र सरकार (यू.जी.सी.) से धनराशि मिलने पर तुम लोगों का वेतन बकाया मिल जायेगा । मई 2010 से आज दो वर्षों से ऊपर का समय बीत चुका है पर हमारा पैसा कब मिलेगा, मिलेगा भी या नहीं ? किसी के पास कोई जवाब नहीं है । अन्दरखाने से मिलने वाली खबरें बताती हैं कि केन्द्र और राज्य की सरकार की इस मामले में रस्साकशी जारी है । दोनों अपनें दायित्वों को एक दूसरे पर ठेल कर अपना दामन साफ बता रहें हैं । कारण चाहे जो भी हो पर प्रदेश का शिक्षक अभी तक अपने 35 महीनों के बकाया वेतन के लिये सिर्फ बाट जोह रहा है । 
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि पूरे उत्तर प्रदेश में सिर्फ जौनपुर स्थित पूर्वांचल विश्वविद्यालय एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय था जिसके शिक्षकों के बकाया वेतन के लिये प्रदेश सरकार ने यू.जी.सी. से एक रुपया भी नहीं माँगा था । ऐसा इस विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों की हठधर्मिता और ऊल जलूल अड़ंगेबाजी के चलते हुया जिसे कि राज्य सरकार आखें मूंदे देखती रही । इस विश्वविद्यालय के शिक्षकों के सतत संघर्ष ने विश्वविद्यालय एवं राज्य सरकार को अंतत: जगाया । इस बाबत अपनी बात से सहमत कराने में विश्वविद्यालय के ’स्टील फ्रेम’ से काफी टकराहट भी हुयी । तब जाकर पूर्वांचल विश्वविद्यालय एवं प्रदेश सरकार विश्वविद्यालय अनुदान (यू.जी.सी.) आयोग से नियत तिथि से वेतनमान देने पर आने वाले वित्तीय बोझ का 80 प्रतिशत माँगने कि लिये तैयार हुयी । उच्च शिक्षा के इस पूरे परिदृष्य से जो तस्वीर सामने लाने का प्रयास किया गया है वह वास्तविकता में पूरी सच्चाई की एक बानगी मात्र है ।
 एक ओर तो यह यक्ष प्रश्न है कि जब पूरी नौकरशाही, जिसमें कि अखिल भारतीय सेवा, राज्य स्तरीय सेवा एवं अधीनस्त सेवाओं के अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल हैं, को अपना सारा बकाया वेतन मिल चुका है तो सिर्फ उच्च शिक्षा के शिक्षकों को ही उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित रखने का क्या उद्देश्य है ? यहाँ तक की राज्य के प्राथमिक शिक्षा एवं माध्यमिक शिक्षा के शिक्षकों भी उनके सारे लाभ मिल चुकें हैं तो हमारे साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों ? ऐसा क्यों मान लिया जाता है कि हमें आर्थिक संवर्धन की कोई जरूरत नहीं है । और जितने समय तक चाहे व्यवस्था बिना किसी जवाबदेही लिये हमें वंचित रख सकती है । जब मंच पर बैठकर आदर्श बघारनें की बात हो तो शिक्षकों को ऊँचे आदर्शों के साथ बाँध दिया जाता है । उन्हे समाज निर्माता एवं पथ प्रदर्शक जैसी अनेकों उपमाओं से नवाज़ा जाता है । पर यह विमर्श क्यों नहीं उठाया जाता कि एक वंचित शिक्षक कैसे समाज का निर्माण करेगा और समाज उससे यह अपेक्षा कर भी कैसे सकता है ? 
जिन अभिभावकों अपना पूरा बकाया वेतन मिल चुका हो उनके नौनिहालों को पढ़ाने की और उनके भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी वेतन-वंचित शिक्षकों पर डाली जा रही है । इस परिदृष्य में यह उच्च शिक्षा का हास्यास्पद चेहरा है कि इसके नीति - निर्माता इस क्षेत्र में योग्य अभ्यर्थियों के न आने से शिक्षा की घटती गुणवत्ता पर घड़ियाली आँसू बहाते रहते है । अपने जीवन को संघर्ष में रखकर दूसरों के चिरागों को रौशन करने का माद्दा सिर्फ शिक्षक में है । 
यानि, भूखे भजन जपो गोपाला, पीते रहो विष का प्याला !

मुसलमान की खामोशी

मित्रों कई बार बडे संकटों की आड लेकर स्वार्थी तत्व अपना ऐज़ेंडा लागू कर देते हैं।दिल्ली गैंग रेप कांड की आड लेकर भी कुछ लोगों ने अपनी रोटियां सेकना या यों कहें उनके अवचेतन में जो है उसे व्यक्त करना शुरू कर दिया।मैं जिस परिवेश में पला बढा उसमें कट्टरता की कोई गुंजायश कभी नही थी।छात्र जीवन में मेरे एक मित्र जो अलीगढ यूनीवर्सिटी में लेक्चरर थे ।कहने लगे अरविंद तुम्हे क्या लगता है पाकिस्तान का बनना गलती थी।मैने कहा-इसमें शक की गुंजायश कहा ये मिस्टेक नहीं ब्लंडर था।वे फिर बोले अगर फिर से भारत-बांग्ला-देश और पाक मिला दिया जाय तो क्या ये गलती सुधर जायेगी ?मैने कहा--बिल्कुल सुदर जायेगी जब हिंदू -मुसलमान दोनो को अहसास हो जायेगा कि साथ रहना उनकी नियति है तो ज़रूर कटुता भि एक दिन समाप्त हो जायेगी और वे सपनों नही हकीकत के देश में खुशी ढूढेंगे।तब वे बोले हां दूसरा तरीका ये हो सकता है कि अब फिर से मिलाकर आबादी के अनुपात में बांटा जाय तो कश्मीर जैसी समस्याओं का भी समाधान हो जायेगा।
मैने उन्हें एक क्षण तक घूर कर देखा फिर कहा --मियां दिक्कत यही है तुम तमाम बौद्धिकता के बाद बांटने पे आ जाते हो और हम हजार धोखे खाकर जोडने की बात करते हैं।२०-२१ साल पुरानी ये बात मुझे आज याद आने की खास वज़ह है।कुछ लोगों ने इस गैंग रेप कांड की आड में शरीयत और इस्लामी कानून की बात शुरू कर दी तो कुछ सेना और सरकार के बहाने भारत राज्य के विरूद्ध माहौल बनाने लगे।कुछ नामचीन शायर तो ये कह उठे -----"अभी और बेज़ार होने दो इस कौम को ,ये खुद कहेंगे हुसैन हमारे हैं।"कुछ दिन पहले अहमद बुखारी कह उठे कि भारत इसलिये धर्मनिरपेक्ष है क्योंकि हम अल्पसंख्यक हैं जिस दिन मुसलमान हिंदुओं के बराबर हो गये उस दिन यहां इस्लामिक क्रांति होगी और इस दारूहरब को इस्लाम कंट्री बना लेंगे।ताजा बयान अकबरुद्दीन ओवेसी का है और ये वीडियो सोशल साइट्स पर उपलब्ध है जिसमें कहा गया है कि १५ मिनट को पुलिस हटा ली जाये तो २५ करोड मुसलमान १०० करोड हिंदुओं को काट डालेंगे।
मित्रों चिंतनीय बात ये नहीं कि ओवेसी ने क्या कहा?चिंतनीय ये भी नहीं कि अहमद बुखारी ने क्या कहा ? इस बात से भि चिंतित -परेशाचिंतनीय बात है आम 
न होने की ज़रूरत नहीं कि ये शायर चंद तालियों और पैसों के लिये हमारी बेज़ारी और हुसैन की--स्वीकार्यत की बात कर रहेर।पर मुसलमान की खामोशी।मुख्यधारा मीडिया 
का दोगलापन जो इन बातों की चर्चा तक नहीं करता और राजनीतिक पार्टियों का तुष्टिकरण ।मुसलमानों को बहुत उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं --गोधरा अगर गुजरात बनसकता है तो असुरक्षा बोध से ग्रस्त हिंदू ---भी कत्ले आम कर सकता है।वक्त रहते ऐसे बयानों को रोकने और ऐसे चिंतन को नष्ट करने की ज़रूरत है-इस सुचिंतित चुप्पी से सबका अहित है।