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25.10.14

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

पर उपदेश कुशल बहुतेरे 

एक बाबाजी जँगल में कुटिया बना के रहते थे। समीप के गाँवों से भिक्षा अर्जन
करके पेट भर लेते थे। बाबाजी समीप के गाँवों में प्रसिद्ध थे। गाँव वालो के दुःख
दर्द सुनते और उचित उपचार और सलाह देते। उनकी कुटिया पर दिन भर कोई
ना कोई भक्त अपना दुःख दर्द लेकर आता रहता। कोई बच्चे के निरोगी होने की
कामना से,कोई पालतू जानवर के बीमार हो जाने पर,कोई बिगड़े काम को
सँवारने की आशा से।

एक दिन सुबह सवेरे बाबाजी गाँव की ओर गये और गाँव वालो को खुद की बीमार
गाय का हाल बताया और ठीक होने का उपाय पूछा। गाँव वालो ने दूसरे गाँव के
जानकार के पास भेजा ,दूसरे ने तीसरे गाँव वाले जानकार के पास। एक गाँव से
दूसरे गाँव घूमते-घूमते बाबाजी थक गए इतने में एक किसान उधर से गुजरा।
बाबाजी को प्रणाम कर उसकी भैंस को भभूत से ठीक कर देने के लिए आभार
जताया और बाबाजी को वहाँ होने का कारण पूछा।

बाबाजी ने अपनी बीमार गाय के बारे में सुबह से गाँव-गाँव बिमारी के बारे में
जानकारी रखने वाले की खोज में घूमने की बात कही। उनकी बात सुन किसान
बोला -बाबाजी,आपकी भभूत से मेरी भैंस ठीक हो गयी तो क्या आपकी गाय
ठीक नहीं हो सकती ?

बाबाजी बोले -वो तेरी भैंस थी बेटे,मगर यह मेरी गाय है।

हम अपनी पीड़ा के बोझ तले दब जाते हैं। दूसरे का दुःख छोटा और खुद का बड़ा
समझने की फितरत है इंसान में। आप कहेंगे यह तो हर कोई जानता है,इसमें
नया क्या ?दूसरों को उपदेश देना सहज,सरल है क्योंकि उसमें "मेरा"या "मेरापन"
नहीं है। जहाँ मेरापन झुड़ा हो,वहां क्या करे,कैसे करें ?

जब दुःख स्वयं से जुड़ जाता है तो उसको दूर करने के लिए हम निष्णात व्यक्ति
से,अपने हितेषी के निर्णय से और परमात्मा की न्याय व्यवस्था से जुड़ जाये।
खुद की बुद्धि का संकटकाल में अधिक उपयोग ना करेंक्योंकि चिंतित मन कभी
भी सही निर्णय समय पर नहीं करता है।       

11.7.14

पंक्चर वाला और बजट

पंक्चर वाला और बजट 

बाईक चलते -चलते डगमगा गयी ,मेने टायर की ओर देखा जो पिचका जा रहा था।
बाईक को घसीटते हुए पंक्चर की दुकान तक लाया और पंक्चर वाले से पंक्चर
बनाने को कहकर वहाँ पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। ट्यूब में दौ -तीन पंक्चर पड़े देख
मेने पंक्चर वाले से कहा -भैया ,पंक्चर बनाना रहने दो तुम ऐसा करो कि जल्दी से
नया ट्यूब डाल दो ,थोड़ी देर में बजट आने वाला है उसे लाइव सुनना है।
       पंक्चर वाले ने नया ट्यूब निकाला और उसमें हवा भर के लीकेज चेक किया
ट्यूब सही था। मेने एक नजर से ट्यूब को देखा और बोला -भैया जल्दी करो ,मुझे
बजट सुनना है।
       पंक्चर वाले ने हाँ में सिर हिलाया और नए ट्यूब में भरी हवा को निकाल दिया
और टायर को चेक करने लगा। टायर चेक करता देख मेने पूछा -भैया ,नया ट्यूब
डलवा रहा हूँ फिर टायर को चेक करके टाइम क्यों बिगाड़ रहे हो ?
    पंक्चर वाला मुस्कराया और टायर चेक करता रहा -एकबार  … दो बार  … तीन
बार  … वह टायर के अंदर हाथ घुमाता जा रहा था। उसे टाइम पास करता देख मैं
अकला गया और बोला -भैया ,चेक हो गया ;अब फिटिंग कर दो ,मुझे बजट सुनना
है   .......
    मेरी बात काटते हुए वह बोला -क्या फर्क पड़ता है साब बजट सुनने या ना सुन
पाने में। हर साल बजट तो नया ही आता है ना फिर यह देश पंक्चर क्यों है ?
   मै उसकी बात का हल खोजने के लिए सोचने लगा ,इतने में वह उठा ,पास पड़ा
एक ड्राइव उठाया और टायर में घुसेड़ कर छोटी सी लौहे की कील को निकाल दिया।
अब उसके चेहरे पर संतुष्टि थी। टायर फीट करते हुए बोला -साब ,क्या सोच रहे हैं ?
इतने साल बजट आते गये और देश पंक्चर ही रहा इसका कारण टायर में दबी
कीले ही तो है। जब तक ये कीले खोज खोज कर नहीं निकाली जायेगी तब नए
ट्यूब से क्या फायदा !
     मुझे लगा यह पंक्चर वाला सही सोच रहा है। नीतियाँ बनती है पर उसका लाभ
व्यवस्था में आड़े आ रही असंख्य भ्रष्ट कीले चाट जाती है।    

22.5.14

ताकत

ताकत 

गाँव के पास तालाब के किनारे कुछ बच्चे खेल रहे थे तभी एक दौ मुँह वाला साँप
रेंगता हुआ आ गया। पहले तो बच्चे साँप -सांप चिल्ला कर भयभीत हुये फिर
कुछ दूर जाकर ध्यान से उसे देखा और उसके निकट आकर उसे मारने सताने
लगे। दौ मुँह वाले साँप को सताते बच्चों को देख पास की कुटिया से एक महात्मा
निकले और उन्होंने बच्चों से पूछा -क्या तुम लोगों को भय नहीं है इससे ?

बच्चों ने कहा -यह दौ मुँह वाला दोगला साँप है इसमें ताकत नहीं होती है इसलिए
इससे भय कैसा ?

कुछ दिन बाद बच्चे वहां खेल रहे थे तभी एक साँप का बच्चा वहां से रेंगता हुआ
जा रहा था ,बच्चे साँप -साँप चिल्लाकर भयभीत हुये ,सुरक्षित दुरी से उन्होंने
उस साँप के बच्चे को देखा और चिल्लाये -भागो ,कालिंदर नाग का बच्चा है।

बच्चों को भागते देख महात्मा ने उन्हें रोका और पूछा -क्यों भाग रहे हो ?

बच्चों ने समवेत स्वर से कहा -सांप का बच्चा है वहाँ।

महात्मा ने निकट जाकर साँप के बच्चे को देखा और बोले -कुछ दिनों पहले
बड़े साँप से नहीं डरने वाले बच्चे इस नन्हे सपोलिये से क्यों डर रहे है ?

बच्चो में से एक ने कहा -महात्माजी ,उस दिन वाला दोगला साँप था जिसमे
जहर की ताकत नहीं थी ,यह सपोलिया (बच्चा) जरूर है पर काले नाग की
प्रजाति वाला है इसमें जहर की ताकत है।

महात्मा ने कहा -बच्चो ,तुम भी जिंदगी में ऐसे ही बनो ,दुष्ट व्यक्ति यदि शान्त
हो तो उसे छेड़ो मत और दुष्ट यदि तुम्हे अकारण छेड़ रहा हो तो पूरी शक्ति से
आक्रमण कर दो मगर दोगली नीति कभी मत रखना।  

30.3.14

निरन्तरता

निरन्तरता 

हथोड़े की पहली चोट खाकर बड़ी चट्टान ने भयँकर अटटहास किया और नन्हे से 
हथोड़े से व्यंग से पूछा -तेरे नन्हे से शरीर पर चोट तो नहीं लगी ना ,मुझ पर प्रहार 
करके तेरा अस्तित्व ही मिट जायेगा। 

हथोड़े ने जबाब दिया -मुर्ख चट्टान ,मैं जानता हूँ कि तुम बहुत बड़ी हो और मैं 
बहुत छोटा सा हूँ मगर मेरी छोटी चोटे जब निरंतर तेरे पर पड़ेगी तब तुम 
चकनाचूर हो जाओगी। इतना कहकर हथोड़े ने सतत चोट करना चालु रखा.कुछ 
समय बाद चोट खा -खा कर चट्टान चटखने लग गयी और अपना अस्तित्व खो 
बैठी। 

हर समस्या और मुश्किल आरम्भ में हमें डराने की कोशिश करती है उसकी 
विकरालता को देख कर हम खुद पर संदेह करने लग जाते हैं हम में से ज्यादातर 
हार मान कर ध्येय बदलने की क्रिया अपना लेते हैं यानि मुश्किलों को खुद पर 
हावी होने देते हैं। बहुत कम लोग खुद पर विश्वास रखते हैं और समस्या पर निरन्तर 
चोट करते हैं मगर जो लोग आत्म विश्वास के साथ सतत प्रयास करते हैं उनको 
हम सफल व्यक्ति कहते हैं। सतत प्रयास करते रहने से मुश्किलें आसान बन जाती 
है और हमें आगे बढ़ने का रास्ता दे जाती है। 

चिंता नहीं ,लगातार प्रयास।       

21.3.14

तिजोरी की चाबी

तिजोरी की चाबी

शाम के समय बगीचे में घूमने आये दोस्त ने दूसरे दोस्त को उदास देख कर पूछा -
आज बहुत उदास और खिन्न से हो ,क्या कोई चिंता सता रही है क्या ?

दूसरे ने जबाब दिया -यार ,कमाते -कमाते बुढ़ापा आ गया ,जो कुछ बचाया उसे 
सँजोकर रखा है मगर बेटा बोलता है तिजोरी की चाबी सौंप दो। अब बता यह कैसे 
सम्भव है और इस तिजोरी की चाबी की वजह से हर दिन अशांति है। 

पहले ने पूछा -बच्चा क्या कमाता है ?

दूसरा बोला -अच्छा खासा व्यापार चल रहा है ,सब सुख सुविधा है घर में लेकिन 
ना जाने क्यों उसकी नजर मेरी तिजोरी पर गड़ी है। एक बात बता ,तूने अपनी 
बचत को कैसे सहेज कर रखा है। 

पहला बोला -मेने जो कुछ बचाया ,बच्चे को यह कर थमा दिया कि इस तिजोरी 
की पहरेदारी अब मैं नहीं करूँगा ,अब तुम जबाबदारी सम्भालो और मुझे बुढ़ापे 
को निश्चिंतता के साथ जीने दो बस बच्चे को जबाबदारी समझा मैं मस्ती से 
बुढ़ापा गुजार रहा हूँ। 

अपने मित्र का उत्तर सुन पहले ने तिजोरी की चाबी को कस के पकड़ लिया और 
चिंता में लीन हो गया।  

24.1.14

फूलों का गणतन्त्र

फूलों का गणतन्त्र 

एक विशाल बगीचे में विभिन्न तरह के फूलों के पौधे लगे थे ,सब में अलग-अलग
सौरभ और सब खिले-खिले से। एक दिन बगीचे में एक बड़े फूल ने सब पौधोँ से
कहा- हम अलग-अलग किस्म और जाति के फूल हैं और हमारी खुशबु भी भिन्न -
भिन्न है इस गुण के कारण हमारे में विभिन्नता में एकता के दर्शन नहीं होते हैं ,
क्यों नहीं हम सब सुगंध निरपेक्ष हो जाए ताकि हमारे में सभी को एकता नजर
आये। कुछ पौधों को समझा कर ,कुछ को धौंस दिखाकर ,कुछ को समाज द्रोह
का डर दिखा कर सुगंध निरपेक्ष बना दिया गया। अब उस बगीचे से मीठी सुगंध
गायब हो गयी। भँवरे ,मधुमक्खियाँ ,तितलियाँ ,पक्षी सब अगले दिन हतप्रभ
रह गये। उन सबने फूलों से पूछा -अरे!तुम लोग सुगंध विहीन क्यों हो गए हो ?

बड़े फूल ने कहा -इस बगीचे में हम विभिन्न प्रजाति के पुष्प साथ -साथ रहते हैं
हमारे रंग और सुगंध भी अलग-अलग है ,अलग-अलग सुगंध के कारण हम
एकता के सूत्र में नहीं बंध पा रहे थे इसलिए हमने सुगंध निरपेक्ष हो जाने का
निर्णय लिया है।

  उस बड़े फूल का निर्णय सुन तितलियों ने उस बगीचे में मंडराना छोड़ दिया ,
भँवरे बगीचे से दूर हो गए ,मधुमक्खियों ने दूसरी जगह छत्ता बनाना शुरू
कर दिया ,कुछ दिनों में बगीचा वीरान हो गया। यह सब बदलाव देख मोगरे
के छोटे फूल ने बड़े फूल से पूछा -ज्येष्ठ श्री ,क्या इसी का नाम निरपेक्षता है ?
क्या यह हमारी एकता की सही और सच्ची पहचान है ?इस निरपेक्षता से हमें
क्या मिला ?हमने अपना गुण खोया और साथी तितलियों ,भंवरों, मधुमक्खियों 
को खोया ?हम को देख कर प्रसन्न होने वाले मानव की प्रसन्नता को खोया ?

बड़े फूल ने कहा -एकता के दर्शन के लिए कुछ तो क़ीमत चुकानी होती है  …

मोगरे ने कहा -ज्येष्ठ ,मुझे आपकी निरपेक्षता जँच नहीं रही है ,मैं तो अपने
सुगन्धित स्वरुप से खुश हूँ और उस स्वरुप में जाना चाहता हूँ।

मोगरे की बात का बड़े फूल ने विरोध किया मगर मोगरा नहीं माना और पुरानी
तरह से फिर खुशबु बिखरने लग गया.मोगरे कि मिठ्ठी खुशबु देख भँवरे उस
के आस पास गीत गाने लगे,तितलियाँ फुदकने लगी ,मधुमक्खियाँ पराग
चूसने लगी। बाकी फूल एक दो दिन ये सब देखते रहे और फिर साथी भँवरों से
पूछने लगे -तुम सब मोगरे को गीत सुनाते हो ,हमारे पास क्यों नहीं फटकते ?

भँवरे ने उत्तर दिया -आप झूठी एकता का प्रदर्शन करने लगे हैं ,जब आप
साथ रहकर खुशबु बिखरते थे तब हम लोग आपसे प्रेरणा लेते थे कि आप
अलग-अलग किस्म के होते हुए भी सब मिलकर के वायु मंडल को सुगंधित
कर देते हैं ,आपके सामीप्य से निकल कर पवन देव भी अपनी निरपेक्षता
छोड़ देते हैं और आपके गुणों को दूर तक अपने साथ फैलाते रहते हैं।
महत्व निरपेक्षता का नहीं अपने गुणों की सुगंध को फैलाने का है।

उसकी बात सुन कर सभी पौधे पूर्ववत महकने लगे। 

7.1.14

धूर्त नीति

धूर्त नीति  

एक जँगल के धूर्त सियार सभा कर रहे थे। सबके मन में डर था और लालसा भी। डर
इस बात का था कि जंगल पर सिंह का राज हो गया तो बेघर होना पड़ जायेगा और
लालसा यह थी कि किस उपाय से सिंह को परास्त कर मौज का जीवन जीये।

 एक सियार बोला -काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती ,हमने अपनी धूर्तता के कौशल
से दो बार चढ़ा दी। पिछली बार छल कपट से दूर रहने वाली गाय को अपने पक्ष में
लिया और उसका राजतिलक कर सब जानवरों को समझाया कि गाय एक अहिंसक
जंतु है उसके नेतृत्व में जँगल में शान्ति रहेगी। सब जानवरों ने यह बात मान ली
और हम गाय के नेतृत्व में गुलछरे उडाते रहे।

तभी दूसरा सियार बोला -क्यों ना तीसरी बार ही गाय को आगे कर दिया जाए?

 इस बात का उत्तर देता हुआ पहला सियार बोला -जब हमने उस गाय को पहली
बार आगे किया था तब उसका रँग सफेद था मगर अब उसका रँग काला हो गया है
हमने जितनी कालिख पोतनी थी उस पर पोत दी अब तो वह इतनी डरावनी दिखती
है कि उसका नेतृत्व किसी को स्वीकार न होगा।

कुछ देर की  चुप्पी के बाद एक मोटा सियार बोला - गाय जैसा कोई दूसरे प्राणी को
खोज जाए ताकि सिंह को मांद में बंद रखा जा सके और हम निर्विघ्न ताजा गोस्त
उडाते रहे।

काफी सोच विचार करने के बाद एक बुड्ढा सियार बोला -जँगल के मुर्ख और लालची
बकरे का नेतृत्व स्वीकार कर लेना चाहिये। आज तक बकरे के ऊपर हिँसा फैलाने का
आरोप नहीं लगा है।

सब सियारों ने एकराय होकर बकरे के नाम पर मुहर लगा दी। जब बकरे को मालूम
हुआ की उसका नेतृत्व बहुमत से स्वीकृत हो गया है तो वह उछलने लगा। कुछ
सियारो को अपने साथ लेकर वह शेर की मांद की ओर बढ़ने लगा।

शेर ने अपने आसपास सियारों और बकरे की आवाज सुनी तो मांद से बाहर निकला।
शेर को देखते ही सियार तो भाग खड़े हुये और बकरा शेर के पंजे से मारा गया।  

बहुत ऊँची महत्वाकाँक्षा की लालसा और धूर्त की मित्रता संकट में डालती है     

29.12.13

भू-लोक तन्त्र !!

भू-लोक तन्त्र !! 

एक गाँव के प्रवेश द्वार के पास एक कँटीला पेड़ था और उस पेड़ से कुछ दुरी पर
एक साधु की कुटिया थी। पेड़ के बड़े-बड़े काँटों से आये दिन कोई न कोई आदमी
चुभन का शिकार होता रहता।

एक दिन किसी राहगीर को काँटा चुभ गया ,वह दर्द से बिलबिला उठा। उसे लगा
की कुछ ऐसा काम कर दूँ ताकि अन्य राहगीर को काँटे न चुभे। अगले दिन उसने
एक बड़ा बोर्ड बनाया और पेड़ से कुछ फलाँग पहले लगा दिया। उस बोर्ड पर लिखा
था -"सावधान ,आगे काँटे का पेड़ है "
साधू ने उस बोर्ड को देखा और मुस्करा कर कुटिया में चला गया।

कुछ दिन बाद दूसरे राहगीर को काँटा लग गया ,वह राहगीर भी दर्द से बिलबिला
उठा। कुछ समय बाद वह एक कुल्हाड़ी लेकर वापिस आया और पेड़ कि कुछ टहनियाँ
जो रास्ते पर आ रही थी उनको काट डाला।
साधु उस राहगीर के पास आया और मुस्करा के अपनी कुटिया में चला गया।

कुछ दिन बाद फिर तीसरे राहगीर को काँटा चुभ गया ,वह दर्द से चिल्ला उठा और
गुस्से से भरा दौड़ता हुआ घर पर गया और घर से आरा लाकर उस पेड़ के तने को
काट डाला। पेड़ को कटा देख सब गाँव वाले इकट्टे हुये और उसे कंधों पर बिठा कर
उत्साह से नाचने लगे।

साधु गाँव वालों के पास गया और सब तमाशा देख चुपचाप मुस्कराता हुआ कुटिया
में चला आया। गाँव वाले कुछ दिन सुकून से रहे। किसी ने उस बोर्ड को वहाँ से हटा
दिया मगर कुछ ही महिनों में वह पेड़ फिर से फलफूल गया और राहगीर फिर से
घायल होने लग गये।

आने जाने वालों ने फिर से बोर्ड लगा दिया ,किसी ने फिर से बड़ी टहनियों को काटा
तो कोई आरा लेकर फिर से तने को काट डालता। तने को काटने वाले को गाँव वाले
कंधों पर बैठाते और नाचते। साधु हर बार घटना क्रम को देखता और मुस्करा कर
कुटिया में चला जाता।

पेड़ का तना कटने के बाद कुछ दिन गाँव में शान्ति रहती और जैसे ही पेड़ वापिस
फलफूल जाता वापिस वही  चक्र शुरू हो जाता। बार-बार के इस चक्र से गाँव वाले
परेशान हो गये और इस समस्या का स्थायी हल ढूंढने के लिए साधु के पास उपाय
पूछने गये।

साधु ने कहा -"आप सब मिलकर इस पेड़ को जड़ सहित उखाड़ दो ,यह इस समस्या
का स्थायी हल है "

गाँव वालों में से एक बोला -हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि इस उपाय से हम नेता
विहीन हो जायेंगे ,हम में से जो बोर्ड लगाता है वह सेवा भावी कहलाता है जो कुछ
टहनियाँ काटता है वह समाज सुधारक कहलाता है और जो आरा लेकर तना काटता
है वह नेता कहलाता है.इस चक्र ने हमें सेवाभावी ,समाज सुधारक और नेता दिये हैं
इसके रुकने पर सब बराबर हो जायेंगे। यह उपाय नामंजूर है  …
गाँव के सेवा भावी ,समाज सुधारक और नेता इस उपाय से असहमत थे।

उन सबकी बात सुनकर साधू जोर-जोर से हँस पड़ा और बोला -हाय! भू-लोक तन्त्र !!       

15.12.13

व्यवहार

व्यवहार 

 एक बार किसी ने सूर्यदेव से पूछा -आप बहुत ही तेजस्वी हैं आपके तेज से समस्त लोक 
आलोकित होते हैं मगर जब भी आप चंद्रदेव से मिलते और बिछुड़ते हैं तब आप सोम्य 
और शीतल क्यों हो जाते हैं ?

सूर्यदेव ने कहा -यही तो जीने की सरल और सुंदर पद्धति है और यही नीति का सार है 
यदि सामने वाला सोम्य और शीतलता से मिलता है तब हमे भी सारा ऐश्वर्य ,तेज और 
बल भूल कर सोम्य और शीतल व्यवहार करना चाहिए।सज्जन को बल और तेज के 
घमंड से मित्र नहीं बनाया जा सकता उसे मित्र बनाना है तो हमे अपना खुद का व्यवहार 
सुधार लेना चाहिए और बिना कारण अनुचित समय में अपने बल को दिखाकर खुद को 
अहँकारी भी नहीं बनाना चाहिये।  

6.10.13

नजरिया

नजरिया 

पौधे पर लगा गुलाब  पास खड़ी कांटे की झाड़ी पर लगे कांटो को देख खुद पर गर्व
महसूस कर रहा था . गुलाब अपने सौन्दर्य ,कोमलता ,महक ,रंग ,रूप,कुशल माली
के हाथों लालन पालन देख अहंकार से भर गया . उसे दुनिया में खुद की सार्थकता
नजर आने लगी . गुलाब ने मन ही मन सोचा - मेरे कारण ही यह उपवन शोभित है ,
तितलियाँ और भवरे मेरे कारण ही उपवन की सुन्दरता बढाते और नाचते गाते हैं .
मेरे कारण ही देव प्रतिमा सुसज्जित लगती है .जब मैं सुन्दरी के बालो में होता हूँ
तो उसका रूप खिल उठता है .यह सब सोच वह प्रफुल्लित हो गया और कांटे की झाड़ी
का उपहास करते हुए बोला- अरे शूल !तुम कांटो का बोझ ढ़ो कर निरर्थक जिन्दगी 
क्यों जी रहे हो ?न तुम सुन्दर हो ,ना सौरभ है ,ना ही तुम कोमल हो ?

कंटीली झाड़ी ने कहा - गुलाब , तुम सिर्फ खुद को देख कर ही ऐसा कह रहे हो मगर
यह भूल रहे हो कि तुम और मैं इस एक ही प्रकृति कि संतान हैं ,तुम्हे यह लग रहा है
कि तेरे अलावा बाकी सब कि जिन्दगी निरर्थक है मगर मुझे लगता है कि हम सभी
सार्थक जिन्दगी जी रहे हैं .

गुलाब हंसा और बोला -बताओ तेरे में क्या सार्थकता है ?

कांटे कि झाड़ी बोली -मेरे कारण कई छोटे छोटे पौधों का जीवन पशुओं से बच जाता है
मुझे देख वे दूर चले जाते हैं ,मेरे कारण तेरी रक्षा भी होती हैं तुम्हे अवांछित हाथों में
जाने से बचाता हूँ ,मेरे से ही सभी किसानों के खेत सुरक्षित हैं और किसान चिंता
रहित हो रात को सुकून से घर लौटते हैं .मेरे सूख जाने पर मैं अपने इन्ही कांटो से
भयंकर सर्द रातों में हर पथिक को गर्मी देता हूँ .यह तो आदमी कि फितरत है कि वो 
खुद को महान और दूसरों को तुच्छ समझता है   

9.6.13

इंसानियत

इंसानियत 

एक व्यक्ति समाज में बढ़ रहे पाप और अनाचार से दुखी होकर भगवान् के मंदिर गया और
भगवान से प्रार्थना करके बोला -प्रभु ,इस धरती पर पाप और अनाचार बहुत बढ़ गये हैं कृपा
करके संसार से पाप और अनाचार को हटाने के लिए देवता भेज दो।

भगवान् ने कहा -पुत्र ,इस पृथ्वी पर मैं जन्म तो देवताओं को ही देता हूँ परन्तु स्वार्थ और
मोह के वशीभूत मानव के संग में आकर वो देवपन भूल जाते हैं और पाप और अनाचार में
लिप्त हो जाते हैं।

भगवान का उत्तर सुन वह व्यक्ति वहां से चला गया।रास्ते में थोडा ही चल पाया था कि उसे
एक दूसरा मंदिर दिखाई दिया।वह व्यक्ति उस मंदिर में गया वहां दुर्गा की मूर्ति थी।वह
व्यक्ति माँ दुर्गा से प्रार्थना करते हुए बोला -माँ ,इस पृथ्वी पर पाप और अनाचार बढ़ गए हैं
आप करुणा करके इस पृथ्वी पर शक्ति की स्थापना करो ताकि पाप का नाश किया जा सके।

दुर्गा बोली -वत्स, तुम ठीक कह रहे हो परन्तु जब -जब भी मेने शक्ति को भेजने की कोशिश
कि तब तुम मनुष्यों ने उसे या तो कोख में मार दिया या वासना की पुतली समझ कर कुचल
दिया।

दुर्गा का उत्तर सुन वह व्यक्ति पुन:रास्ते की ओर बढ़ गया।कुछ दूर जाकर उसने देखा कि
एक सन्यासी घायल सूअर के घावों पर मरहम लगा रहा है।कुछ देर तक वह संत के क्रिया-
कलाप को देखता रहा और फिर समीप जाकर बोला -पूज्यवर,आप यहाँ इस निकृष्ट प्राणी
के घाव पर मरहम कर रहे हैं जबकि आप जानते हैं कि पृथ्वी पर घोर अनाचार फैल रहा है
आपको गाँव -गाँव जाकर पाप और अनाचार के खिलाप जागरूकता फैलानी चाहिए।

सन्यासी ने सूअर के मरहम लगाते हुए पूछा -क्या तुम गधे हो?

वह व्यक्ति बोला -आप क्या कह रहे हैं ,क्या मैं आपको इंसान नहीं दिख रहा हूँ ?

सन्यासी बोला-......तो फिर इंसानियत सीख ,पाप और अनाचार खुद ब खुद ख़त्म हो जाएगा।           

23.4.13

बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है


बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है 

प्राथमिक शाला के बच्चों को नैतिक ज्ञान के पीरियड में अध्यापक सुलेख लिखा रहे थे।
अलग -अलग बच्चों को अलग-अलग पंक्ति लिख कर दी गयी थी और सभी बच्चे उसी
पंक्ति को बार-बार लिख रहे थे।कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थी
माता -पिता की आज्ञा का पालन करो
झूठ कभी मत बोलो
अपने देश पर गर्व करो
अनुशासन में रहना सीखो
समय को व्यर्थ मत गवाओं
वृद्धों की सेवा करो
नारी को सम्मान दो
माता के चरणों में स्वर्ग होता है
सभी बच्चे सुन्दर अक्षरों में सुलेख लिख रहे थे।जिस जिस बच्चे का सुलेख पूरा हो
जाता था वह बच्चा अपनी नोटबुक मास्टरजी को दिखाने उनके पास आ जाता था।
मास्टरजी बच्चो के अक्षर देख कर दस में से दस,नौ,आठ अंक देते जा रहे थे।मैं इस
प्रक्रिया को देख रहा था।एक बच्चे को छोड़कर सभी बच्चे अध्यापकजी को अपनी
अपनी कॉपी दिखा चुके थे।जो बच्चा नहीं आया था उसको मास्टरजी ने अपने पास
बुलाया और डाँटते हुए पूछा -सब बच्चो ने सुलेख लिख लिया तुमने अभी तक क्यों
नहीं लिखा? क्या तुझे लिखना नहीं आता है ?

बच्चा बोला -मुझे लिखना तो आता है ....

मास्टरजी बोले -फिर लिखा क्यों नहीं ?

वह बच्चा कुछ बोला नहीं।मास्टरजी ने कहा -नहीं लिखता है तो मुर्गा बन जा।

बच्चा मुर्गा बन गया।बच्चे को दंड पाते देख मेने मास्टरजी से कहा -मास्टरजी
यह बच्चा कहता है कि उसे लिखना आता है फिर भी उसने नहीं लिखा और आपने जो
दंड इसे दिया उसने स्वीकार कर लिया इसके पीछे बच्चे का कोई भाव रहा होगा लेकिन
आपने इसे कुछ नहीं पूछा और दंड दे दिया आखिर एक बार उससे पूछ लेते कि उसने
क्यों नहीं लिखा।

मास्टरजी ने उस बच्चे को खड़े होने का आदेश दिया और पूछा -तुम्हे लिखना आता था
फिर भी क्यों नहीं लिखा ?

बच्चा बोला -स्कुल आने से पहले मेरे दादा ने मुझे अपनी लकड़ी और चश्मा देने को
कहा था लेकिन मेने उन्हें नहीं दिया और वहां से भाग गया।अभी आपने मुझे जो लिखने
के लिए दिया वह यह था कि "वृद्धों की सेवा करो "जब मैं लिखने को बैठा तो मुझे अपनी
करनी याद आई।मुझे लगा जिस बात को आज सवेरे ही मैं नहीं कर पाया क्या केवल
लिखने मात्र से मेरा अवगुण दूर हो जाएगा ,इसलिए मेने कुछ भी नहीं लिखा।

बच्चे की बात सुनकर मास्टरजी सन्न रह गए।मैं भी सोचने पर मजबूर हो गया।मुझे
लगा बच्चे ने कडवा सत्य कह दिया है।

  मुझे लगा आज मेरा देश इसलिए रुग्ण हो गया है कि सभी तथाकथित बुद्धिजीवी सिर्फ
प्रवचन देते हैं ,देश प्रेम के भाषण करते हैं,अच्छी बातें कहते हैं ,सुभाषित लिखते हैं मगर
उसका पालन नहीं करते हैं।बिना शुभ आचरण को धारण किये धर्म व्यर्थ का ढकोसला ही
तो है।किताबों में बंद पड़ी नैतिकता से कब कल्याण हुआ है।            

21.4.13

स्थान परिवर्तन


स्थान  परिवर्तन 

कल शाम की बात है ,मैं अपने रिश्तेदार के ग्रह प्रवेश के अवसर पर उपस्थित था।गाँव से आये
भैया ने मुझसे कुशल क्षेम पूछी। मेने कहा -मैं यहाँ प्रसन्न हूँ।मेने उनके बारे में पूछा -

वो बोले - आप शहरी लोगों जैसी जिन्दगी हमारी नहीं है,बस ठीक ठाक चल रहा है।

मेने उनसे पूछा -आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ?

वो बोले -यह इसलिए कह रहा हूँ कि आप लोग गाँव छोड़ कर शहर मैं आ गए और हम वहीं
रह गये।आप ने तकलीफ झेलकर स्थान परिवर्तन कर लिया इसलिए उन्नति के अवसर भी
आप लोगों को हमारे बनस्पत ज्यादा मिले।

बात यहीं खत्म हो गयी और मैं भी स्व रूचि भोज लेकर घर आ गया।

सुबह जब मैं उठा तो घर की वाटिका में टहलने लगा।मेरा ध्यान अनायास एक गमले पर
चला गया जिस गमले में मेने 9 -10 महीने पहले कुछ बीज बिल्व के पेड़ के डाल दिए थे
उस समय गमले में पाँच पौधे लगे थे।उन पौधों में से मेने एक पौधा दुसरे गमले में लगा दिया
था और एक पौधा उस गमले में लगा दिया जिसमे पहले से गुलाब का पौधा लगा था। मेने
जिस गमले में अकेले बिल्व को लगाया था वह पौधा चार फुट लम्बा हो गया था और तना भी
काफी मोटा हो गया था।जिस गमले में गुलाब के साथ बिल्व के पौधे को लगाया था वह पौधा
ज्यादा नहीं पनप पाया केवल छह सात इंच का था और जिन पौधों का स्थान परिवर्तन नहीं
किया था उनमे से एक-एक करके दौ पौधे नष्ट हो गए और अंतिम पौधा नष्ट होने की कगार
पर था।

              मुझे यह देख कर अचानक रात का वाकया याद आ गया कि गाँव से आये भैया ने बहुत
सटीक बात कही थी कि आप लोगों ने स्थान परिवर्तन कर लिया और उन्नती के अवसर पकड़ते
रहे।
        मेने उस बिल्व को देखा जो चार फुट लंबा था शायद मेरे से यह कह रहा था कि खुद को
उन्नती के पायदान पर देखना हो तो अकेले ही चल पड़ो और संघर्ष करो ,डटे रहो।

       गुलाब के साथ वाला पौधा यह कह रहा था कि अपने से बड़े पेड़ की छाया में मत पलो ,एक
बड़े पेड़ की छाया तले दूसरा बड़ा पेड़ विकसित नहीं हो सकता अगर खुद को बड़ा बनाना है तो
बड़े पेड़ की छाया से दूर जाकर संघर्ष करो।

      जिस गमले के बिल्व का स्थान परिवर्तन नहीं किया था वह मुझसे यह कह रहा था कि
यदि एक ही स्थान पर पड़े रहोगे और मजे की जिन्दगी जीना चाहोगे तो कुछ समय बाद पतन
की ओर चले जाओगे। लक्ष्य को हासिल करने के लिए गतिशील रहना होगा,अवसर की प्रतीक्षा
में समय खोना मुर्खता है।                      

8.4.13

दुःख का कारण


दुःख का कारण 

एक वन में काकराज बहुत सारे कोओं के साथ रहा करते थे।सभी कोओं का बसेरा एक
विशाल बरगद का पेड़ था।काकराज वृद्ध और विद्धवान थे ,सार कुटुंब संतोष और चैन के
साथ जी रहा था।

एक बार काकराज को काफी लम्बे समय के लिये सुदूर जाना था।यात्रा के पहले वे सभी
कोओं से मिले और मुस्कराहट और संतोष के साथ रहने की सलाह देकर यात्रा को चले
गये।जब काकराज सुदूर यात्रा से वापिस लौटे तो देखा कि उनका कुटुम्ब गहरा दुःख झेल
रहा है।काकराज सबसे मिले उन सबके चेहरे पर तनाव देख वो समझ गए कि कुछ बात
जरुर है।

अगले दिन काकराज ने देखा कि उनके बरगद पर गोरैया रहने आई हुयी है।काकराज
गोरैया से मिले और उससे पूछा- गोरैया बहन,यहाँ तुझे कोई कष्ट तो नहीं हैं न ?

गोरैया ने कहा-काकराज ,मुझे यहाँ रहकर अच्छा लग रहा है,मेरे बच्चों को भी किसी ने
हानि नहीं पहुंचाई है।सभी कौए प्रेम से बोलते हैं ,मैं यहाँ आराम से हूँ।

काकराज ने गोरैया को अभयदान दिया और वापिस अपने कुटुम्बी जनों के पास आ गये।
अपने कुटुम्बियों और मित्रो के दुःख को भांप कर उन्होंने एकांत में एक-एक कौए को
बुलाया और दुःख का कारण पूछा।

एक कौआ बोला -काकराज ,यहाँ अन्न का अभाव नहीं है,किसी का भय भी नहीं है लेकिन
जब से यह गोरैया यहाँ आई है तब से इसके रंग को देख कर मेरे मन में पीड़ा है कि इसका
रँग सुनहरा क्यों है।

दूसरा कौआ बोला -काकराज,मैं यहाँ पर प्रसन्नता पूर्वक हूँ लेकिन कभी -कभी सोचता हूँ
कि काश !मैं भी गोरैया की तरह सुरीली तान में बोल पाता।

तीसरा कौआ बोला -काकराज,इस विशाल बरगद पर कोई अभाव नहीं है ,मेरे दुःख का
कारण इस गोरैया के द्वारा बनाए गये सुन्दर घोंसले के कारण है।इस गोरैया ने अपने
रहने के लिए कितना सुन्दर नीड़ बुना है।
 
चोथा कौआ बोला- काकराज ,मेरी पीड़ा का कारण सिर्फ इतना है कि मुझे पेट भरने के लिए
काफी मेहनत करनी पड़ती है जबकि इस गोरैया का शरीर छोटा होने के कारण इसे अपना
पेट भरने के लिए मेहनत बहुत कम करनी पडती है।

काकराज ने सबसे दुःख का कारण जाना तो उन्हें लगा सारे कौए किसी आपदा के कारण
दुखी नहीं है इनके दुःख का कारण सिर्फ दुसरे से ईर्ष्या करना है।हम दूसरो के सुख को बड़ा
मानकर खुद के सुख को दुःख में बदल लेते हैं और खिन्न होकर अपना जीवन जीते हैं।
शायद यह एक बड़ा कारण हमारे रोते पीटते जीने का।हम अपने पास जो है उसका आन्नद
लेने के बजाय इसलिए दुखी रहते हैं कि दूसरा सुखी क्यों है।   
 
                   

5.1.13

तुम किस पंक्ति में हो ?


तुम किस पंक्ति में हो ?

एक आदमी नगर के विद्वान के पास बैठा युग के पतन पर गहरी चिंता कर रहा था।उसने
विद्वान् से कहा- देखो,हमारे परम्परागत मूल्यों का ह्रास हो रहा है।

विद्वान ने कहा- सही बात है।

उस आदमी ने कहा- ज्यादातर लोग उदात्त भावना खोते जा रहे हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-लोग भ्रष्ट और अनैतिक होते जा रहे हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-हमारा कानून गतिहीन या पंगु हो गया है।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-हमारे नेता भी आदर्शों का अनुकरण नहीं कर रहे हैं और सत्ता लोभी
                              हो गए हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा- गुरु और शिक्षक भी लोभी और असंस्कारी हो गए हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-नारी भी पाश्चात्य रंग में रंग के लज्जा के भूषण को छोड़ रही है।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-व्यापारी मुनाफाखोर और मिलावटी सामान बेच रहे हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-प्रशासनिक अधिकारी कामचोर और रिश्वत लेने वाले हो गए हैं।

उस आदमी ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-आप मान रहे हैं कि ये सब सही है परन्तु इन बुराइयों से समाज को
                             मुक्त कैसे करे ?क्या आपके पास कोई समाधान ने है।

विद्वान ने कहा- हाँ ,मेरे पास उपयुक्त समाधान है ।

वह व्यक्ति खुश होकर बोला -हमे वह उपाय शीघ्र बताएं ताकि हम समाज को बदल सके?

विद्वान बोला - उपाय बताने  से पहले मैं एक बात तुमसे जानना चाहता हूँ ?

वह व्यक्ति बोला -पूछिये ?

विद्वान बोला -इन सब में आप खुद को किस पंक्ति में पाते हैं?

वह व्यक्ति विद्वान के प्रश्न को सुनकर कुछ देर चुपचाप बैठा रहा और फिर सर झुका कर
चलता बना।    

30.9.12

सफलता की राह

 सफलता की राह 

एक पतँगा (उड़ने वाला कीड़ा ) खुली हुयी खडकी से कमरे के अन्दर आ गया था।मेने खिड़की
के कांच को बंद कर दिया और उस कीट को कमरे से बाहर निकालने की कोशिश की मगर
पतँगा उड़ता हुआ काँच के पास आया और बंद कांच से बाहर निकलने का प्रयास करने लगा।
मैं इस घटना को देखने लग गया।वह पतँगा बार -बार उस कांच से टकरा रहा है और बाहर
निकलने की कोशिश कर रहा है। इस घटना को मैं लगातार 10-15 मिनिट तक देखता रहा।
वह कीट बार-बार पूरी शक्ति से उस कांच से टकराता है,मगर  कमरे  की दूसरी  खिड़की या
दरवाजे से बाहर निकलने का प्रयास नहीं कर रहा है।मेने सोचा थोड़ी देर इस कांच से टकरा कर
जब यह थक जाएगा तो दूसरी खडकी या दरवाजे से बाहर निकल जायेगा। उस पतंगे से ध्यान
हटा मैं कमरे से बाहर निकल गया और अपने काम में लग गया।
        
            रात को जब मैं अपने कमरे में सोने गया तो देखा वह पतँगा कांच से टकरा-टकरा कर
मर चुका है।

          आप सोचेंगे कि इस छोटी सी घटना का ब्लॉग पर लिखने का क्या आशय ?मेने इस
घटना पर विचार किया कि यह पतंगा आसानी से अपनी जान बचा कर दूसरी खिड़की से या
दरवाजे से स्वतंत्र हो सकता था मगर यह अपना नजरिया बदल नही सका तथा बाहर निकलने
के दुसरे विकल्पों पर ध्यान नही दे सका इसलिए स्वतंत्र होने के भरसक प्रयत्न करते हुए भी
मर गया। मरा हुआ पतंगा मेरे मन में बहुत  से विचार छोड़ गया -

         क्या इस पतंगे ने बाहर निकलने के लिए प्रयत्न नहीं किया ? ..तो फिर असफल क्यों हुआ ?

        क्या यह पतंगा स्वतंत्र होकर जीना नही चाहता था ?
    
        क्या इस पतंगे की मौत इसी तरीके से होनी निश्चित थी? या यह विधि का विधान था।

       क्या यह पतंगा बार-बार की असफलता से टूट कर मर गया? या सफल होना उसके
सामर्थ्य से बाहर था ?

         ......आखिर पतंगे की प्रयत्न करने पर भी असफल रहने का कारण क्या था?

      निश्चित रूप से पतंगे के असफल होने का कारण दुसरे विकल्पों पर ध्यान ना देना यानि
खुद के नजरिये में बदलाव नही  लाना था।

        क्या हम भी कभी-कभी पतंगे जैसी कोशिश तो नही कर लेते हैं ?

       हम लोग भी जब एक ही बिंदु पर बार-बार असफल होते हैं तो इसका मुख्य
कारण सभी विकल्पों पर ध्यान नही देना या नजरिये की दिशा को समग्र रूप से नही देखना है

सफल होने के लिए प्रयत्न जरूरी है लेकिन यदि असफल रहे तो दुसरे सम्भावित विकल्प
और उनकी दिशा का बदलाव भी सोच के रखे ताकि असफलता हमारी शक्ति बन जाये।       

23.9.12

अकर्मण्य और कर्मशील


अकर्मण्य और कर्मशील 

एक पत्थर नदी के बहाव में बहता हुआ समुद्र की चट्टान के पास रुक गया। चट्टान ने उसे
उपहास के भाव से देखा और कहा - मित्र , तू सैंकड़ों मील से पानी के बहाव  के साथ बहता
रहा,पानी में बहते-बहते तू  अपना  यथा रूप भी नही बचा पाया। तू घुड़ता -पड़ता बहता रहा
और लम्बा गोल पिंड जैसा बन गया।मुझे देख मैं बरसों से एक ही जगह ताकत के साथ खड़ी
हूँ और पानी की लहरों से मुकाबला करती हूँ। तू मिलो लम्बी यात्रा करके भी आज तक क्या
कुछ पा सका है?

       छोटे पिंड रूपी पत्थर ने जबाब दिया- यह सच है की मैं पानी के साथ सैंकड़ो मील की
यात्रा करता रहा और अपना मूल स्वरूप भी नही बचा सका लेकिन मुझे ख़ुशी है कि मैं
तेरी तरह एक जगह पड़ा नही रहा।तुम वर्षो से यही पड़ी-पड़ी पानी से टकरा रही हो और
व्यर्थ पानी से टकरा कर अकर्मण्य जीवन गुजार रही हो जबकि मैं पानी के बहाव  के साथ
सदा गतिशील रहा हूँ  तेरी तरह व्यर्थ पानी से टकराता नहीं रहा और अकर्मण्य नही रहा।

  चट्टान छोटे से पत्थर की बात पर उपहास से मुस्करा उठी तभी एक राहगीर उधर से
गुजरा उसने चट्टान के पास पड़े बेलनाकार पिंड रूपी पत्थर को उठाया और उसे चट्टान
पर रख दिया। उस राहगीर ने आस-पास से कुछ फूल इकट्टे किये और श्रद्धा के साथ
उस पिंडी रूपी पत्थर पर अर्पित कर दिए  और उस पिंडी को हाथ जोड़कर उसकी शिव रूप
से स्तुति की और माथे पर चढा कर उसे ले जाने लगा।

  छोटी पिंडी ने चट्टान से कहा -हे निरर्थक चट्टान ,तुझे अब तो समझ आ गया होगा कि
गतिशील रहना कितना आवश्यक है। मेरी पानी के साथ गतिशीलता ने मुझे पूज्य बना
दिया और तेरी अकर्मण्यता के कारण तू सदियों से पानी की थपेड़े खा रही है और खाती
रहेगी।

सार - अकर्मण्य जीवन जीने का कुछ भी महत्व नही है        

2.8.12

संगत का असर


संगत का असर 


एक वाटिका में कुछ गमलों में काफी पौधे लगे थे .एक श्रद्धालु महिला नियम पूर्वक उस
वाटिका में आती और तुलसी के गमले में लगी तुलसी की रोली  अक्षत से पूजा करती .
एक बच्चा नियमित रूप से उस महिला को पूजा करते देखता था .एक दिन उसने उस
महिला से पूछा -आंटी ,आप रोज किसकी पूजा करने आती है ?
महिला ने जबाब दिया-तुलसी की .
बच्चा बोला - आंटी, आप तुलसी की पूजा करती हैं या उसके बिलकुल पास में लगे ग्वार भाटे
के पौधे की ....
महिला ने देखा वह प्रतिदिन जिस गमले में लगी तुलसी की रोज पूजा करती है उस गमले के
पास में ग्वार भाटे का गमला रखा है ,जब वह तुलसी के रोली और अक्षत चढ़ाती है तब पास
के गमले में लगे ग्वार भाटे के पौधे पर भी रोली के छींटे लग जाते थे और अक्षत भी उस पर
गिर जाते थे .उस महिला ने बच्चे को अपने पास बुलाया और कहा -बेटा,मैं पूजा तो तुलसी की
ही प्रतिदिन करती हूँ परन्तु पास के गमले पर रोली और अक्षत अनजाने में ही लग जाते हैं ,
तुम इससे एक बात सीख सकते हो ?
बच्चा बोला- मैं क्या बात सीख सकता हूँ ?
महिला बोली- अच्छे लोगो की संगत करना .ये ग्वार भाटे का कंटीला पौधा तुलसी की संगती में
रहने के कारण अकारण ही पूजा जाने लगा ,यदि मनुष्य सिर्फ अपनी संगती सुधार ले और
सज्जन और विद्धवानो की संगती में रहने लग जाए तो संसार में पूजा जा सकता है .
 

7.5.12

तुलसी और मनीप्लांट

तुलसी और मनीप्लांट 



एक वाटिका में तुलसी और मनीप्लांट पास-पास
में लगे थे .तुलसी की झाडी  छोटी थी और 
मनीप्लांट से विविध शाखाएं निकलकर पास के पेड़
के सहारे काफी फैल चुकी थी .

एक दिन मनीप्लांट ने तुलसी से व्यंग्य से कहा "इस
वाटिका में हम दोनों का जन्म साथ-साथहुआ है 
लेकिन तुम अभी तक छोटी झाडी ही बने हो और मैं 
कितना विस्तार कर चुकी हूँ ".
तुलसी का पौधा मनीप्लांट की बात पर मुस्करा के रह गया .कुछ समय 
बीत गया .एक दिन वाटिका के माली ने मनीप्लांट की बहुत सी शाखाओं 
को काट  कर छोटी कर दी और मनीप्लांट को काफी छोटा कर दिया .

मनीप्लांट अपनी दशा पर फफक कर रो पड़ा और तुलसी के पेड़ से 
बोला -"इस माली ने जगह- जगह से मुझे काट दिया और मेरे विस्तृत 
रूप को छोटा कर दिया .मैं पहले मस्त हवा की बाँहों में पेड़ पर झूलती 
रहती थी मगर आज जमीन  पर बदहाल पड़ी हूँ जबकि उस माली ने 
तुझे किसी भी तरह की क्षति नहीं पहुंचाई और तेरी श्रधा के साथ परिक्रमा करके चला गया.मेरे 
साथ यह अन्याय क्यों हुआ?जबकि फल तुम भी नहीं देते हो और मैं भी नहीं देती" .

तुलसी की झाडी ने जबाब दिया-"यह सही है की मेरे पर फल  नहीं आते मगर मुझ में और तुममे 
स्वभाव का बड़ा फर्क है .तुम परजीवी हो और दुसरो के सहारे आगे बढती हो जबकि मैं छोटी झाडी 
जरुर हूँ मगर अपनी जड़ों की ताकत पर खड़ी रहती हूँ .जब मेरे को मालूम चला की मैं फल नहीं दे
सकती हूँ तब इस विषम परिस्थिति में मेने अपने में गुणों का विकास किया जबकि तुम सारहीन 
विभिन्न शाखाएं फैला कर बढती रही .तुम्हारी सारहीनता के कारण ही माली ने तुझे काट कर बौना
कर दिया और मेरी उपयोगिता और गुणों से प्रभावित होकर मुझे क्षति पहुंचाए बिना मेरी परिक्रमा 
कर के चला गया .  

(छवि -गूगल से साभार . )   

26.4.12

ठकुराई बचे या कबीला


ठकुराई बचे या कबीला 
एक पांच सात सौ घरो का कबीला था .बड़ी संख्या में कबीले वाले अनपढ़ या कम पढ़े लिखे थे.कबीले 
की व्यवस्था कैसे चलती है उससे उनको कोई सरोकार नहीं था .थोड़े बहुत लोग जानकार थे वे या तो 
चुप थे या फिर उस व्यवस्था का अंग थे .कबीले का सरदार रामूला था और उसकी पंचायत में कबीले 
के छंटे हुये शातिर भी रामनामी ओढ़कर अपनी बात पर रामूला से मुहर लगवा ही लेते थे . 

    कबीले के शातिर पंच रामूला को बेवकूफ बनाकर उससे कबीलेवालो के लिए अप्रिय निर्णय करवा
लेते जिससे कबीले को नुकसान और पंचो को फायदा होता रहता .लोगो का रोष रामूला के प्रति बढ़ता 
रहता था मगर शातिर पंचो की बदोलत हर होली पर होने वाले सरदार के चुनाव में चुनाव रामूला ही 
जीत जाता था .रामूला की जीत का कारण होली के त्यौहार पर कबीलेवालो को भरपेट स्वादिष्ट खाना 
और शराब देना था .कबीलेवाले उस दिन छक कर खाते और रामूला को नया सरदार चुन लेते .

   सरदार चुने जाने के बाद शातिर पंच कबीले वालो पर नये-नये कर लगा देते और कर की जबरन 
वसूली करते .कर अदा न कर पाने वाले कबीलेवालो को पंचो के खेतो पर बिना मजदूरी के काम 
करना पड़ता था .धीरे-धीरे कबीले वालो की सम्पति कर भार के कारण घटती गयी और पंचो की 
आमद बढती रही .पंच अपनी बढ़ी हुई आय को दुसरे आस पास के कबीले की जमीन मकान खरीदने 
में लगा देते .
        कबीले की बदहाली बढती रही .कर कम वसूल होने से कबीले की व्यवस्था चलाने में रामूला 
को तकलीफ होने लगी .वह जब भी पंचायत बुलाता तो पंच उसको कबीले की जमीन बेचने की सलाह
 दे देते .रामूला भी कर से घटती आय से परेशान हो कबीले की जमीन बेच देता जिसे रामूला के पंच 
ओने पोने दामो में खरीद लेते.

     कबीले वाले कष्ट भरा जीवन जी रहे थे ,उनको अपनी बदहाली का कारण समझ नहीं आ रहा था 
कर नहीं चुकाने के कारण उन्हें अपनी जमीन की जगह पंचो की जमीन की निराई गुड़ाई करनी 
पड़ती थी जिससे उनके खेतो की बुवाई नहीं हो पाती और समय पर बुवाई नहीं होने के कारण खेतो
 में फसल नहीं होती .यह दुष्चक्र काफी सालो तक चलता रहा .रामूला कर की आमद कम देख कर
 गाँव की जमीन बेच देता .धीरे-धीरे कबीले की जमीन बिकती गयी और रामूला की आय इतनी कम
हो गयी कि होली का त्यौहार मनाने के लिए पैसे भी दुसरे कबीले के सरदारों से उधार लेना पड़ता .
दुसरे कबीले वालो ने रामूला की हालत देख कर्ज पर सूद बढ़ा कर लेने लगे .रामूला पर सूद की मार 
इस तरह पड़ी की उससे सूद भी चुकाया नहीं जाता .आखिर तंग आकर रामूला ने पुरे कबीले की सभा
 बुलाई और कबीले की दशा सबके सामने रखी और सबके सामने एक सवाल रखा -क्या मुझे ठकुराई 
बचानी चाहिए या कबीला ?

पंचो ने कहा -बिना ठाकुर के कबीले का कोई धणी धोरी नहीं रहेगा इसलिए ठकुराई बचे.

कबीलेवालो ने कहा- जब कबीले में कोई रहनेवाला ही नहीं बचेगा तो ठकुराई किस पर चलेगी.
  इसलिए ठकुराई जाये और नये को मौका मिले . 

रामूला पंचो और कबीलेवालो का उत्तर सुन कर्तव्य विमूढ़ हो गया और इस फेसले पर पहुंचा कि जब
तक सही उपाय नहीं सूझ जाता तब तक कबीले कि व्यवस्था सूद चुकाने और कर्ज लेने पर चलती 
रहेगी.

वह कबीला इसी दुष्चक्र में फँसा है..........कर्ज, सूद, लुट, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई, आत्महत्या,
अनैतिकता का दुष्चक्र.