Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label vyangya. Show all posts
Showing posts with label vyangya. Show all posts

8.4.14

गन्दी बात ……

गन्दी बात  …… 

भारत की गरीबी और भुखमरी भारत के लिए गन्दी बात है मगर उन वादा करने
वाले ढोंगियों पर अंधविश्वास करते रहना भी गन्दी बात होगी।

गरीब भारतीयों से छुपे हुए कर लगाकर लिए गए पैसे डकारना  गन्दी बात,मगर
देश की तिजोरी को खाली करने वालो को फिर से संसद में भेजना भी गन्दी बात
होगी।

गैस के सिलेण्डर बारह से नौ करना गन्दी बात थी क्योंकि सबसे ज्यादा सब्सिडी
तो पैसेवालों पर लूटा दी जाती है और नौ से बारह सिलेण्डर करना भी गन्दी चाल
थी। मुर्ख समझने वालों को सत्कार से संसद में बैठाना भी गन्दी बात होगी।

सीमा पर बहादुरों के शीश काट लिए जाए और हिन्दुस्तानी सल्तनत का खून नहीं
खोलना गन्दी बात थी ,हिन्दुस्थान में आतँक फैलाने वालो के लिए दुवा माँगना भी
गन्दी बात थी ,बहादुर शहीद शर्मा जी की शहादत बेकार चली गई तो गन्दी बात
होगी।

ईमानदार ऑफिसर का बार बार तबादला गन्दी बात है ,मगर ईमानदार ऑफिसर
के सवालों पर जनता  सही प्रतिसाद ना दे तो भी गन्दी बात होगी।

अल्पसंख्यको को विकास की ऊँचाई पर ना ले जाना भी गन्दी बात थी मगर उन्हें
तुष्टिकरण की अँधेरी खाई की ओर धकेलते जाना भी गन्दी बात है फिर भी अपनी
समझ को नहीं जगा पाना और वोट बैंक बने रहना भी गन्दी बात होगी।

गरीब भारतीय को 26 से 32 रूपये कमाने पर धनवान मान लेना गन्दी बात है
26 में गुजारा करने के लिए उन्हें अन्न दान माँगने के लिए मजबूर करना भी
गन्दी बात है। गरीब दान के सस्ते अन्न को खा कर अब भी सोता रहा तो भी
गन्दी बात होगी।

लुच्चे नेता को साहूकार बताने वाली खबरे बताते रहना गन्दी बात है मगर लुच्चो
को बचाने के लिए ईमानदारी का खौफनाक नाटक खेलना भी गन्दी बात है। इस
धूर्तता के नाटक को वास्तविकता समझना भी गन्दी बात है। राष्ट्रवादियों को
शासन चलाने से दूर रखने के लिए षड़यंत्र रचना भी गन्दी बात होगी।

चीन हमें आँख दिखाए ,पाकिस्तान साजिश रचे यह देश के लिए गन्दी बात है
मगर हम हुँकार भरने की जगह बिरयानी से उनका स्वागत करने वालो को
साँसद बना दे तो यह भी गन्दी बात होगी।

हमारा वोट ना करना भी गन्दी बात है मगर घुसपेठियों के मतदान के कारण कोई
राष्ट्रवादी हार जाए तो भी गन्दी बात होगी।    

5.2.14

चल,धरने पर बैठ जाते हैं

चल,धरने पर बैठ जाते हैं 

धरना बहुत सी बीमारियों का रामबाण ईलाज तो है ही ,साथ ही साथ अपनी असफलता
को भी छिपाने का सांगोपांग तरीका है।
धरने की खास बात यह है कि इससे लोगों से मेलजोल और पहचान का दायरा बढ़ता है
जिसे हम जानते भी नहीं वो भी एक नजर धरने पर बैठे लोगों पर मार ही लेता है।
धरने से हम अपनी नाजायज बात मनवाने की सफल कोशिश करते हैं क्योंकि जायज
बात तो कानून यूँ ही मनवा देता है या कुछ समय लेकर मनवा देता है।
धरने पर बैठने से हम अपनी मनमानी कर सकते हैं क्योंकि दूसरे मंच बात की तह तक
जाते हैं और बात उपयोगी होने पर ही मानी जाती है।
धरने का एक रूप का वर्णन रामायण काल में भी है इसलिए हम इसे प्राचीन विद्या भी
कह सकते हैं।
धरने के डर से सरकारें सीधे-सीधे चलती है, मालिक व्यवहारिक बने रहते हैं और पति
आज्ञाकारी शिष्य जैसा व्यवहार करते हैं।
धरना किसी भी मौसम में करो अनुकूल ही रहता है। धरने के लिए धुँआ उठना ही काफी
है आग तो बाद में खु ब खुद लग ही जाती है।
धरना यदि दिल को छूने वाली समस्याओं पर हो तो राजा बना सकता है,धरना यदि
आडम्बर फैलाने का हो तो प्रसिद्धि दिला सकता है,धरना यदि नाकामयाबी ढ़कने का हो
तो कामयाबी दिला सकता है।
जब भी काम करने का जी नहीं करें तो धरने पर बैठ जाना उत्तम आसन है ,विरोधी
टाँग खींचे और माकुल जबाब ना हो तो धरना टाँग छुड़ाने का उत्तम उपाय होता है,जब
भी विरोधी गलती करे तब धरने पर बैठना उसको नानी याद करवाने का उत्तम पेच
होता है।
धरना निराशा में आशा की लकीर खींचता है,धरना जबाबदेही से मुक्ति दिलाता है,धरना
अयोग्यता को छिपाता है,धरना मन के द्वेष को अभिव्यक्ति की आजादी में बदल देता
है,धरना हारने के बाद खेला जाने वाला गुरिल्ला दाँव है।
धरना देने के लिए अक्सर खाली रहने वाले स्थान उपयुक्त रहते हैं मगर वह शहर के बीच
में हो ताकि समय व्यतीत करने वालो कि सैरगाह बने रह सकें।
धरना दूसरों पर वजह या बेवजह देख कर नहीं दिया जाता है जब जी करे बैठ जाया करें।
धरना तर्क से नहीं दिया जाता है केवल स्वार्थ साधने के लिए दिया जाता है।
धरने को सफल बनाने के लिए शामयाने,प्रकाश ,पानी ,माईक,दरी,कम्बल,पत्रकार ,पुलिस
चाय,और मुफ्त खाना होना आवश्यक है ताकि जन साधारण कुछ दिन रुक सके।
धरने से हम अपनी जबान को तौल सकते हैं -जैसे चीख कितनी दूर जाती है,चीख मिठ्ठी
है या तेजाबी ,चीखने के बाद दांत सलामत रहते हैं या नहीं।
धरने से अपनी गलती को दूसरे पर थोपना आसान रहता है,धरने से एक साथ लाखों लोगों
को मुर्ख बनाया जा सकता है।
धरना कोई नेता ही दे यह जरुरी नहीं,धरना आम आदमी का शस्त्र है यदि धरने से खास
आदमी बन गये तो क्या कहने और अगर नहीं बन पाए तो आम आदमी पक्का बने
रहोगे उससे नीचे की पायदान पर नहीं गिरोगे।
यह सब पढ़ कर क्या नहीं लगता -चल यार ,धरने पर बैठ जाते हैं                    

21.11.13

नारे ले लो ,आरोप खरीद लो

नारे ले लो ,आरोप खरीद लो 

भर दोपहर में एक आवाज ने नींद ख़राब कर दी। बाहर  कोई फेरिया चिल्ला रहा था -
"नारे ले लो ,नारे नए पुराने ,आरोप एकदम ताजे ,चमत्कारी भाषण ले लो। "

मेने बाहर ताकझाँक की ,देखा एक युवा फेरिया गली में घूम रहा है। घर से बाहर
निकल कर मैं उसके पास गया और बोला -क्या क्या माल है तेरे पास ?

वो बोला -आप किस पार्टी से हैं ?चाबुक चलाने वाली पार्टी से हो या चलाने कि मंशा
रखने वाली पार्टी से ,इन दोनों में नहीं हो तो मौका देख रँग बदलने वाले हो ?

मेने कहा -मैं तो चाबुक खाने वाले में से हूँ ,सोचता हूँ कुछ सस्ता तुझ से मिल जाए
तो नयी पैकिंग में आगे सरका दूँ।

फेरिया को लगा मैं उसके काम का हथियार हूँ इसलिए उसने जाजम बिछा कर
अपनी दुकान दिखानी शुरू कर दी - देखिये जनाब ,ये कुछ नारे हैं ,पानी पर ,बिजली
पर ,सड़क पर ,रोजगार पर ,महँगाई पर.............इस तरफ जो मसाला है उसमे
आरोप हैं ,कुछ सच्चे ,कुछ बिलकुल झूठे ,कुछ अधूरे ,आपको भ्रष्टाचार पर ,चरित्र
हनन पर,साहेबगिरी पर ,रंग रास पर ,विकास पर ,सीनाजोरी पर  जिस पर भी
चाहो नए नवेले करारे ताजा आरोप मिल जायेंगे  ……… इस कोने में जो पड़े हैं
वो सब भाषण हैं जिन्हे सुनकर लोग हँसते हैं ,तालियां पीटते हैं ,चिल्लाते हैं
गुस्सा करते हैं और बफारा निकालने इ वी एम पर बटन दबाने पहुँच जाते हैं।

मैं बोला -कुछ सदाबहार कुछ नए नारे बता  …

फेरिया बोला -सदाबहार नारो में गरीबी हटाओ ,मीठा पानी ,खेतों में चौबीस घंटे
बिजली ,पक्की सड़क वाले नारे ही चल रहे हैं और रेट भी सबसे कम हैं  …

मेने पूछा -इनके रेट कम क्यों हैं ?

फेरिया बोला -जनता जानती है इनका कोई मूल्य नहीं है ,इन बातों पर विश्वास
नहीं करना है!

मैं बोला -अभी आरोप का बाजार कैसा है ?

फेरिया बोला -सा'ब , यह हाथो हाथ बिकने वाला माल है और दाम भी नेता के ग्रेड
पर निर्भर है। बड़े नेता पर आरोप लगाना है तो रेट ज्यादा और छोटे पर कम।
अभी चरित्र हनन के आरोपो का दौर है ,जनता भी मजे से सुनती है और तालियां
भी बजती है  … !!!

मेने पूछा -खरीदने वाले को वोट भी मिल जाते हैं या नहीं  …!

फेरिया बोला - वोट तो देना ही है ,वोट मुद्दे से नहीं पर्ची के अंकों से पड़ते हैं !!!

मेने कहा -भैया ,मेरे को तो भाषण बता दे दे !

फेरिया बोला -भाषण कौनसे वाले चाहिए -चटाकेदार ,चुट्कुलेवाले ,आरोपवाले
तथ्यहीन ,मिया मिठ्ठू वाले  …… !

मेने कहा -जो मुनाफे से बिक जाए !!

वो बोला - चटाकेदार ,सफेद झूठ वाले,रंगीन आरोप वाले अभी सुपर डुपर है,तथ्यहीन
का बाजार भी गर्म है !

मैं बोला -देश को इनसे कुछ मिलेगा ?

फेरिया बोला -मुझे लगता है आपको खरीदना नहीं है ,अपना रास्ता नापो और
मुझे जाने दो।

 फेरिया दूकान समेत कर आगे बढ़ा और टेर लगायी -चकाचक नारे ले लो ,रंगीन
आरोप ले लो ,तथ्यहीन भाषण ले लो  ………………………। 
  

15.9.13

हें -हें …हिंदी बोलता तू !!

हें -हें  …हिंदी बोलता तू !!

हिंदी दिवस है और हिंदी बोलना है ,यह देश चलाने वाले कर्णधारों को एक मिठ्ठी सजा
है वरना धकाधक इंग्लिश झाड़ना इनकी आदत है।

हिंदी अभी राष्ट्र भाषा की गरिमा और ताज से दूर है क्योंकि हमारे संविधान ने यह
ताज हिन्दी को नहीं बख्शा है।

हम अंग्रेजी के दीवाने हैं ,जो व्यक्ति फिरंगी भाषा में ऊल जलुल कुछ भी बक देता है
तो हम उसको ऊँचे दर्जे का साहब समझने लग जाते हैं। हम अपनी रगो में हिंदी को
बहने ही नहीं देना चाहते हैं क्योंकि हमें घर का जोगी जोगना और बाहर गाँव का
सिद्ध लगता है।

हिंदी बोलने वाले को आज अच्छी नौकरी और छोकरी नसीब नहीं होती है और ये
दोनों जीवन जीने के लिए जरुरी है। जब भी कोई पढ़ा -लिखा नौजवान किसी
महत्वपूर्ण सभा में राज भाषा में बोलने लग जाए तो कोई ना कोई फुलझड़ी बोल
पड़ती है - हें -हें  …हिंदी बोलता तू !!

हमारा भविष्य जब अंग्रेजी में बोलता है तो हम गर्व महसूस करते हैं और सोचते
हैं कि हमारे बुढ़ापे में सुखद समय आने वाला है ,इस मृग तृष्णा से हम बच नहीं
पाते हैं और खुद अपनी खुशियाँ कम करके देश के भविष्य को फिरंगी भाषा के
हवाले कर प्रगती के शिखर को तय करना चाहते हैं। हम बैसाखियों के सहारे चोटी
पर पहुंचना चाहते हैं इसलिए हम अढाई दिन में एक कोस चलते हैं।

हमारे नेता ,वाह! क्या कहना -जब देश का बजट भाषण संसद में पढ़ते हैं तो बड़े
गर्व से इंग्लिश जबान में बोलते हैं ,बेचारा देश उनके चेहरे को देख अपने भाग्य
को फोड़ता है ,हमारे प्रधान संसद में बड़ी सहजता से हिंदी को दरकिनार कर देते
हैं और फिरंगी भाषा में भारत निर्माण की बातें करते हैं। लोकसभा और राज्यसभा
में हिन्दी अपनी माथे की बिन्दी भी सुहागिन आधुनिका के ललाट की बिंदी की तरह
खोती जा रही है।

मुन्शी प्रेमचंद को कौन भारत रत्न देगा और क्यों देगा ? उन्होंने जो कुछ किया देशी
भाषा में किया और देशी का मोल गुलाम आत्माएँ कैसे समझे ?

हम विकास की बातें इंग्लिश में करते हैं और तुर्रा यह ठोकते हैं कि हिंदी अंतर्राष्ट्रीय
भाषा नहीं है इसलिए मज़बूरी में बोलना पड़ता है  … वाह रे कपूत !किसे उल्लू बना
रहा है ,इस देश के अगले कदम पर चीन है और वह अपनी भाषा के साथ विकास का
पर्याय बन रहा है,क्या चीन की भाषा विश्व के पल्ले पड़ती भी है ?

फिरंगी भाषा का बेजा फायदा नेता लोग उठा लेते हैं। वो जिनके सामने भाषण करते
हैं ,उनकी बर्बादी पर अंग्रेजी में बोलते हैं और उनसे तालियाँ भी बटोर लेते हैं!

बड़ी मुश्किल से बड़े लोग हिंदी दिवस पर इस तरह बोलते हैं -

"आज हिंदी दीन है,हमे एक भी वर्ड आज अंग्रेजी में नहीं बोलना है ,आज मेरा लेक्चर
हिन्दी के वास्ते हैं ,मैं इस टाइम आपसे वादा करता हूँ कि इण्डिया में हिंदी को डवलप
करने का हार्टली प्रयास करूंगा। बाई  ……  

7.8.13

अयोग्य राजा राष्ट्र के लिए अकल्याणकारी

अयोग्य राजा राष्ट्र के लिए अकल्याणकारी 

आचार्य चाणक्य की नीति में लिखा है -अयोग्य को राजा बनाने के स्थान पर किसी
को राजा न बनाने में राष्ट्र का कल्याण है,लेकिन हम भारतीय गलती करते ही
नहीं दोहराते भी हैं.

        नन्द वंश  केवल चाणक्य के समय में ही नहीं था हर काल में रहता है और
उसका हर काल में विनाश हुआ है. देश पूछता है -क्या चन्द्रगुप्त बनोगे ?

     केवल बातें, लच्छेदार बातें,खुद की गलतियों को ढकने की बातें,खुद की अक्षमता
को छिपाने की बातें,प्रजा को भ्रमित करने की बातें ……क्या इसे ही अतुल्य
भारत कहा जाएगा ?

    बातों से देश का शासन चलाओ,संसद में लच्छेदार शब्दों का भाषण पिलाओ,
दुश्मन राष्ट्र पर बातों से वार करो,बातों से वतन की रक्षा का दिखावा  …… क्या
इसी लिए चुनाव होता है    …?

   कड़े शब्दों में निंदा करके हम देश के बहादुर सैनिकों का अग्नि संस्कार करते
रहेंगे  …क्या इसी को प्रजातंत्र कहते है ?

   मौत दुश्मन की घात से हुई या दुश्मन के लुख्खो से  ……. मगर मरे तो इस देश
के जवान हैं  …जवानो की मौत का बदला दुश्मन से लेने की जगह खबर का
विश्लेषण करने वाले मंत्री को पद पर बने रहने का हक़ होना चाहिए ?

  जवान मर गये  …….  तुरंत अभिनय शुरू  …. संवेदना के स्वर ,चेहरे पर उदासी
की लकीरे ,हाथ में दस लाख की सहायता राशी … और इतिश्री शहीद श्री  …की कथा.
…क्या ऐसे कर्तव्यों के निर्वाह को स्वतंत्रता कहते हैं ?

 अरे दुश्मन की जाती पूछ कर बताओ  …फिर फैसला करेंगे कि उससे मार खाना है
या जबाब देना है. अगर वोट बैंक का दुश्मन है जुते  खा कर उसे बिरयानी खिलाओ,
उसकी सूजे गालों से आवभगत करो  …. क्या महान देश की यही कूटनीति है ?

   जवान शहीद हो गया  … अमर जवान ज्योति पर माथा टेक लो और दुश्मन या
उसके गुर्गे मर गए तो सब मिल कर मातम मनाओ ,  इस दुर्नीति से देश की दुर्दशा
को क्या यह नाम दें कि हो रहा भारत निर्माण  …. !!

  कल्पना करो की एक नेता का बेटा लुख्खो के हाथों मारा गया है  …. नेता और उसका
परिवार दहाड़े मार रहा है और हर देश प्रेमी भारतीय संवेदना और शोक दिखाने के
लिए कतार में उस लाश पर नोटों से श्रद्धांजली दे रहा है   …नोटों का ढेर देख कर भी
नेता रोता जा रहा है ,प्रजा को कुछ समझ नहीं आ रहा है  …अब भी नेता क्यों रोये जा
रहा है   …।
              

4.7.13

वाह !अब खाद्य सुरक्षा

वाह !अब खाद्य सुरक्षा 

पहले गरीबी हटाओ ,खूब फेशन चली थी उस जमाने में ,जबरदस्त हथकंडा था कुर्सी पर
विराजने का ,काम भी आया ,क्योंकि खुबसूरत सपना था मगर हश्र यह हुआ कि काठ की
हांडी बन गया।

फिर लाये आर्थिक उदारीकरण ,खूब चला ,पढ़े लिखे भी मुर्ख बन गए हश्र यह हुआ कि बाप
की सम्पति को बेच बेच कर बेटा धनवान दिखने का अभिनय करने लगा और नतीजा यह
कि सब कुछ ठप्प .....

चासनी पीने की आदत वाली जनता को बाद में इन्वेस्टमेंट के नाम पर शेयर का धंधा
बताया ,रातों रात करोडपति बनिए और काम भी मत कीजिये ,वाह! क्या खुबसुरत झूठ
था और खूब चला ,चाय की केंटिन वाला भी शेयर की बात करता था सा'ब और जब फुग्गा
फुटा तो दिन में तारे दिख गए जनाब को ...

मुर्ख बनाने के हजार तरीके होते हैं सा 'ब ,अब नया तुक्का ले आये -रोजगार गारंटी,भाई
को करना कुछ नहीं गड्ढे खोदो और आराम से रूपये ले जाओ ,मरे हुए ,पैदा भी नहीं हुए
और जिन्दे सबने मजा लिया नतीजा जो रोटी रूपये में मिल जाती थी वह पाँच की हो गई
और अरबों रूपये गड्ढों में गिर गए .......

इस बार धार पर थी नारी ...बेचारी भावुक ,बोले कि आप बराबरी करे ,आधी दुनियाँ आपकी
मुठ्ठी में ,शासन में आधा भाग आपका ,बस बात इस तरह उड़ी कि कुर्सी चल कर पास आ गई
और साहब विराजमान हो गए और परिणाम यह की शासन तो दूर की बात ,घर से निकलते
ही डरने लगी .........

फिर मथने लगे तस्वीर बनाने ,सब के सब लग पड़े और ऐसी तस्वीर बनाने लगे कि बेचारा
किशोर समय से पहले जवाँ दिखने लगा ,अब क्या था सब उसके कंधे पर ,माथे पर जहाँ
जगह मिली उस पर सवार होने लगे ,बेचारा किशोर ...बेहाल हो गया और समय से पहले
बोझ से दब गया ........

जो वोट बैंक थी उसे गुमराह करने लगे ,मगर वह भी अब शिक्षित हो गयी ,भला बुरा विचार
सकने की समझ पैदा कर ली और नतीजा यह कि साहब की कुर्सी के पाए चरमरा गए और
कुर्सी लुढकने लगी ............

अब आई नयी नवेली खाद्य सुरक्षा ,बत्तीस और छब्बीस की गणित का सवाल हल करने की
बारी ,छब्बीस और बत्तीस को असल में धनवान बनाने का वादा ,क्या हश्र होगा ,भविष्य के
हाथों तय होगा मगर इस खाद्य सुरक्षा ने एक सच्चाई देश के सामने उगल दी कि इस देश के
67% लोग अजीबोगरीब धनवान हैं जो बाजार भाव से अन्न खरीद सकने की स्थिति में नहीं
है .......
 और अंतिम बात समर्थन मुल्य पर ख़रीदे गए अन्न को पानी में भिगोने की ,साहब के पास
उस अन्न को बचाने की काबिलियत भी नहीं ,बड़े बुजुर्ग ने कहा -67% तथाकथित धनवानों
में बाँट दो,मगर कौन सुने ,क्यों सुने ,आखिर सवाल कुर्सी की बनावट का है ........     

12.6.13

रूठना और मनाना या खुद ब खुद मन जाना

रूठना और मनाना या खुद ब खुद मन जाना 

एक बच्चा गुब्बारे वाले को देखकर माँ से बोला -माँ मुझे गुब्बारा चाहिए।

माँ ने कहा - तूने इस सप्ताह खूब गुब्बारे फोड़ लिये ,आज गुब्बारा नहीं मिलेगा।

    बच्चे ने मन ही मन सोचा कि गुब्बारा तो आज ले कर ही रहना है ,बच्चे ने जिद की मगर माँ
ने एक भी नहीं सुनी।बच्चा बात बनती नहीं देख कर रूठता हुआ बोला -माँ ,आपने गुब्बारा नहीं
दिलाया तो मैं शाम का दुध भी नहीं पीऊँगा।

माँ बोली- जीद मत कर ,ज्यादा जिद करेगा तो शाम को पापा से पीटेगा।

बच्चा अपनी बाजी पलटते देख रोने लग गया।उसको रोते देख माँ ने एक बार समझाया।बच्चे
को लगा शायद यह हथियार कारगर रहेगा ,यह सोच वह जोर-जोर से रोने लगा।बच्चे को बेबात
पर गल्ला फाड़ते देख माँ ने गुस्से में बच्चे का कान मरोड़ दिया।अब तो बच्चा जोर -जोर से
रोने लगा।

बच्चे का बड़ा भाई उसे रोते देख बोला -चुप हो जा ,आज माँ तेरी सुनने वाली नहीं है।

यह सुनकर बच्चा और जोर से रोने लगा।थोड़ी देर में बच्चे की बहन भी आ गयी।बहन को
देख बच्चा और जोर से रोने लगा।बहन ने रोने का कारण पूछा और समझाते हुए बोली -भैया,
तुम गुब्बारे के लिए मत रोओ ,गुब्बारे तो जल्दी फूट जाते हैं।

बच्चा जिद पूरी ना होते देख रोता रहा।थोड़ी देर बाद बच्चे के पापा भी घर आ गये।बच्चे को रोते
देख रोने का कारण पूछा।बच्चे ने गुब्बारा ना दिलाने की बात बतायी।

बच्चे के पापा ने कहा -तेरी माँ ने जो किया वह ठीक ही किया।हर दिन जिद करना और जिद
से बात मनवाना ठीक बात नहीं है।यह कह कर उसके पापा भी अपने काम में लग गए।बच्चे
ने सोचा -गुब्बारा तो मिलने वाला नहीं है ,और रोते-रोते गला भी दर्द करने लगा है ,भलाई
इसी में है कि चुप हो जाऊं मगर चुप होने के लिए भी कोई वाजिब बहाना चाहिए।बच्चा सोचता
रहा और रोता रहा।थोड़ी देर में बच्चे ने देखा कि दादा आ रहे हैं।दादा को देख कर बच्चा फिर
से रोने लगा।बच्चे को रोते देख दादा ने रोने का कारण पूछा-

बच्चा बोला-दादा,मम्मी ने गुब्बारा नहीं दिलाया।

दादा ने कहा-कोई बात नहीं ,मैं तेरे को जब मेला लगेगा तब दिला दूंगा।

बच्चे ने सोचा -यह आखिरी मौका है कि मुझे रोना छोड़ देना चाहिए।बच्चे ने दादा से पूछा -
दादा ,मेला लगेगा तो आप गुब्बारा दिला देंगे।

दादा के हाँ भरते ही बच्चा रोना छोड़ नाचने लगा।

सवाल यही है कि बड़े -बड़े मँच पर यह खेल होता रहता है और सयाने लोग भी रोना छोड़
कर नाचने लग जाते हैं।बेचारे ..................... 


10.6.13

फाइल ........!!

मीलों चले ........!!

नेताजी बोले - हम मीलों चले और चलेंगे ........!!
जनता -मगर हम पहुंचे कहाँ ?
नेताजी - रुको ,मैं सामने घाणी चला रहे तेली से पता करके आता हूँ ...
जनता -तेली को कैसे पता ...?
नेताजी -वो दिन भर बैल चलाता है ना भाई  ....हमारा भी बता देगा ...!!
--------------------------------------------------------------------
नेता का नजरिया  ................!!

नेताजी - आप लोग दिल और विचार उच्च रखें .....
जनता -मगर महंगाई ...?
नेताजी-अरे,सबको चीज के दाम ज्यादा चाहिए और कुछ नहीं ...
जनता -घोटाले ....?
नेताजी -किसी न किसी का भला करने को घोटाला मत कहो ..
जनता-बेरोजगारी .......?
नेताजी -कोई घर आराम कर रहा है तो दुखी क्यों हो भाई ...!!
------------------------------------------------------------------------

विकास ......!!

नेताजी -मुझे ही वोट करें ,क्योंकि असल में विकास हम ही करते हैं
जनता - वो तो सही है मगर हमारा कब होगा?
नेताजी -छोटे विचार मत रखो,मेरा विकास देश का विकास और देश
              का विकास ही तेरा विकास ....
----------------------------------------------------------------------------

फाइल ........!!

नेताजी -देश विकास कर रहा है ,सड़के बनी .....
जनता -कहाँ .....?
नेताजी - फाइल में दिखा देंगे !...और कुए भी खुदवाये .....
जनता -....पर कहाँ ...
नेताजी-फाइल में देखना ...और गारंटी से मजदूरी भी दी ...
जनता -किसे ....
नेताजी -फाइल में ...और रेल भी चली ...
जनता - ....कहाँ से कहाँ को ....
नेताजी - तेरे गाँव से शहर तक ...
जनता -मगर गाँव में तो पटरी ही कहाँ है ?
नेताजी- पटरी है,सबुत चाहिए तो देख लेना फाइल में ..!!
---------------------------------------------------------------------

6.4.13

नेता उपदेश .............


 नेता उपदेश   .............

"मैं जानता हूँ कि समस्या क्या है क्योंकि मैं यह भी जानता हूँ कि समस्या किसकी
वजह से पैदा हुई ....
मैं समस्या को अच्छी तरह से रख सकता हूँ ताकि मेरे ज्ञानी होने का ढ़कोसला
पैदा हो सके .....
मैं समस्या के हल नहीं जानता हूँ और परीक्षा में हल नहीं जानने वाला असफल
होता है मगर मैं इसे अपनी सफलता मानता हूँ  ......
उत्तर पुस्तिका में प्रश्न लिखकर मैं पूछता हूँ -अब तो पप्पू पास है ना,क्योंकि मेने
कुछ लिखा तो है।
अब इतना कहकर मैं अपना भाषण समाप्त करता हूँ"

भाषण समाप्त होते ही कबीले वाले खुश हो गये और कहा -वाह ! राजा बेटा होशियार
हो गया अगर समस्या का कारण और उपाय बता देता तो अपनी सैंकड़ो साल पुरानी
कब्र खुद जाती।

कुछ घाघ लोग ताली बजाने लगे,उनसे पूछा -यह हरकत क्यों ?वो बोले -ताली बजाने
की कीमत मिलती है कोई फोकट में नहीं बजा रहे हैं।

29.11.12

नस पकडिये और दबाइये!!


नस पकडिये और दबाइये!!

नस पकड़ना भी एक विद्या है ,यह कला स्कुल या कॉलेज में नहीं पढाई जाती है।इसको सिखने
के लिए कई शातिर या घाघ लोगों के चरित्र पर PHD करनी पडती है।नस दबाने से जीवन
में सफलता बिना कुछ करे कराये मिल जाती है।जो लोग कहते हैं कि सफलता का बाई पास
नहीं होता उसे नस पकड़ने और उचित समय पर दबाना सीखना चाहिए।

                  हमारे पहचान वाले एक दुस्साहसी ने एक आम आदमी की नस पकड़ी।बेचारा आम
आदमी उसके चरण पखारने लगा और उसकी चरण रज को माथे चढाने लगा।दुस्साहसी को
आम आदमी धीरे-धीरे भेंट चढाने लगा अब तो द्स्साह्सी के मजे हो गए।उसके मजे एक कोतवाल
की आँखों की किरकिरी बन गये और कोतवाल ने उस दुस्साह्सी की नस पकड ली और दबाई।
नस दबाते ही दुस्साहसी घबराया और टें -टें  करने लगा।अब कोतवाल के भी मजे हो गए।जब
मन करा नस दबा दी और सेवा पूजा कराने लगता।

                   कोतवाल की नस विद्या अफसर को समझ पड़ी तो अफसर ने भी विद्या सिख ली और
कोतवाल की नस दबा दी।कोतवाल इशारे पर नाचने लगा और अफसर के मजे हो गये।अफसर की
राजाशाही से उपरी अफसर जल उठा ,मैं बडासाहेब होकर भी मजे नहीं और ये अफसर मजे लूट
रहा है ,बड़े अफसर ने खोज की , नस विद्या की जानकारी हासिल की तो उसका प्रयोग भी कर
दिया छोटे अफसर पर।विद्या ने असर दिखाया और बड़े साहेब के भी ऐश हो गयी।

                 बड़े साहेब की ऐश नेताजी को मालुम पड़ी तो नेताजी ने जांच बैठा दी।जांच से जो रिपोर्ट
आई उसे पढ़कर नेताजी भोंच्चके रह गए।उन्होंने भी जन सेवा का काम दूर करके नस पकड़ने की
विद्या सिख ली,अब तो सब कुछ व्यवस्थित हो गया,सब एक दूजे की नस पकडे थे।सबके मौज थी.
सबको मजे में देख पराये पक्ष के नेता का पेट दर्द करने लगा उन्होंने सबको मस्त देखा तो गहन
छानबीन में लग गए और नस विद्या के कोर्स को सिख गए।अब तो वो भी नस पकड के दबाते रहते
हैं और सुख भोग रहे हैं।

                   नोट:- इस विद्या में सज्जन कहलाने वाले सरल लोग नापास होते रहे हैं और होते रहेंगे।              

24.11.12

हो-हा मन्त्र !


हो-हा मन्त्र !

हो-हा करना सिर्फ मूर्खो की ठेकेदारी नहीं है इसके बेहतरीन फायदे देख अच्छे  भले लोग भी
हो-हा करते नजर आ रहे हैं।इस देश में हो-हा मन्त्र से गरीब को नुकसान होता है क्योंकि
यह मन्त्र सिर्फ इस बेचारे की कुंडली में ही नीच घर में बैठा होता है।हो-हा करने से कई बड़ी
गलतियों के कुफल से मुक्ति मिल जाती है।यह मन्त्र अकेले में कम प्रभावशाली मगर
सामूहिक रूप से जपने पर तुरन्त मोटा प्रभाव छोड़ता है। इस मन्त्र का प्रथम अक्षर दम
लगाकर लम्बे श्वास से बोला जाता है।सामूहिक जाप में इसे एक लय में नहीं गाया जाता
है। समूह के लोग जो इसका तुरंत प्रभाव चाहते हैं इसे एक के बाद एक क्षण दौ क्षण के बाद
जोर से चिल्ला कर बोले। 

     हो-हा करने के कई फायदे हैं-

     1.अगर आवश्यक या प्राथमिक काम पूरा नहीं हुआ है या शुरू ही नहीं किया है और उस की
        जाँच होनी हो तो हो-हा करके बचा जा सकता है।

     2.अगर  कोई जबाबदारी थी और उसे निभाया नहीं गया हो तो हो-हा करके बचा जा सकता
        है।

     3. ऐसा  काम जिसके करने से लुच्चई को फंदा लगता हो और बिना लुच्चई के काम नहीं
         चल सकता हो तो हो-हा करना एक वैकल्पिक जरुरत बन जाता है।

      4. अगर झूठ की पोल खुलती हो और उससे झूठ के साबित हो जाने की प्रबल सम्भावना
          हो तो हो-हा का प्रयोग किया जा सकता है।

      5.तेजाबी सत्य जो व्यक्तित्व को नंगा करने पर तुला हो और तथाकथित आबरू नीलाम
          होने की कगार पर हो तो हो-हा करना ही अंतिम ब्रह्मास्त्र होता है।

      6. पुराने इल्जाम और पाप का घड़ा फूटने ही वाला हो तो हो-हा सिरप की तरह काम करता
          है।हो-हा के बीच पाप का घड़ा फूट भी जाए तो आवाज ही नहीं आती है।

      7. हो-हा आसुरी मन्त्र है जिसे असुर और नकली सभ्य समान रूप से जप सकते हैं।यह मन्त्र
          कारगर यानि अनुभूत सिद्ध है जिसका प्रयोग आये दिन (अ)पथ-प्रदर्शक करते रहते हैं।

      8. स्कुल,कॉलेज,सभा,खेल,राजनीती सब जगह, हो-हा प्रभावी उपाय के रूप में काम करता
           है।यदि पढ़ना नहीं है तो हो-हा मचाये , मूल मुद्दे से सभा को भटकाना हो तो हो-हा कीजिये
           कोई बढ़िया या घटिया काम जिसे नहीं होने देना या होने देना है तो हो-हा कीजिये।

      9. हो-हा मन्त्र का उपयोग बच्चे,किशोर,युवा,अधेड़,बुजुर्ग,स्त्री,पुरुष,नपुंसक सभी समान रूप
          से कर सकते हैं।

    10. हो-हा मन्त्र से अखाद्य वस्तुएँ आसानी से व्यावहारिक तरीके से हजम हो जाती है।तेज
          चीख-पुकार में देशी- डालडा सब स्वाहा हो जाता है।

   11. धोखा,विश्वासघात,धूर्तता,छल,ठगी आदि कार्य में इस महामंत्र का सामूहिक जाप कुछ
         मिनिट तक किया जाए तो तुरंत सफलता मिलती है।

   12. चोर,मक्कार,लुटेरे,कर्तव्य विमूढ़,ढ़ोंगी,द्रोही हो-हा मन्त्र का खूब इस्तेमाल करते हैं और
        यह प्रभावी मन्त्र मन चाहा फल भी तुरन्त दे देता है।          

4.11.12

तेरी भी वाह -मेरी भी वाह!


तेरी भी वाह -मेरी भी वाह!

एक चोर ने दुसरे चोर पर आरोप लगाते हुये कहा -तूने जमीन लुटी!
दुसरे ने कहा -तुमने खजाना लुटा !!
पहले ने कहा -तूने दोनों लुटे !
दुसरे ने कहा -तूने भी दोनों लुटे और साथ में दलाली भी !
पहले ने कहा -ये सब तो तूने भी किया और साथ में फर्जीवाड़ा भी !
दुसरे ने कहा -तेरे को मौका मिले तो तू क्या पीछे रहेगा ?
पहले ने कहा -मौका मिलने पर करूंगा ,अभी तो तू जेब भर रहा है।
दुसरे ने कहा -छुटपुट चिल्लर तो तुझे भी लुटने दे रहा हूँ।
पहले ने कहा - तू मुझे बदनाम करता है
दुसरे ने कहा -तू भी तो मुझ पर कालिख पोतता है।
पहले ने कहा- तू मुझ पर आरोप लगाता है।
दुसरे ने कहा -तू कौनसा मुझे बख्शता है।
पहले ने कहा -मुझे अपनी दूकान चलानी है!
दुसरे ने कहा- मुझे कौनसा धंधा बंद करना है !
 
 इतने में किसी  को आता देख दोनों एक साथ चिल्लाये -

चुप कर बे,लगता है मालिक आ रहा है ,तू मेरी वाह कर और मैं तेरी .

2.11.12

भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता !


भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता  !

कोई कुर्सी दे दे बाबा ! भ्रष्टाचार के नाम पर कोई  पद दे दे बाबा !!कोई छोटा मोटा पद ही दे दे
बाबा! बाहर से किसी की पुकार सुनकर मैं हतप्रभ रह गया।मन में उत्सुकता जगी और घर
के दरवाजे को खोल कर बाहर की  ओर झाँका, एक खुबसुरत जवान खड़ा था चोखट पर !

  मेने उससे पूछा -अरे! नौजवान ,किस तरह से माँगता है, टेर लगानी भी नहीं आती तुझे?

वह बोला -आपको गलतफहमी हो रही है श्रीमान ,मैं सही टेर लगा रहा हूँ।इस देश में भगवान्
के नाम पर न्याय नहीं मिलता है।मैं जब तक भगवान् के नाम पर माँगता था तब तक फटे-
हाल था मेरे पर मौन अटेक की  नीति कथा सुना दी जाती थी।मेने  ऊपर नजर दौड़ाई,मगर
वह भी मेरा मन मौह न सका ,पेट को राहू ल गा। आँधी छा गयी सपनों पर।

अब क्या चाहते हो ?

कुर्सी! कैसी भी हो, चलेगी।तुम बेवकूफ बन कर झूठे,मक्कार,फरेबी या धूर्त को भी दरवाजे पर
आने पर अपना भाग्य तक दे देते हो।मैं तुम्हें सच कह कर माँग रहा हूँ ,मुझे भी एक बार दे दो।

टूटी हुई  कुर्सी से क्या हासिल हो जाएगा जवान! मेने पूछा।

वो बोला- टूटी हुयी कुर्सी भी भ्रष्टाचार की संगत से चेहरा बदल लेगी।या तो दाता उसे दुरुस्त
कर देगा या नई दे देगा।

ऐसा कैसे हो सकता है प्यारे?

कुर्सी के खेल में ऐसा ही होता आया है सा,ब।जिसकी  जैसी बाजीगिरी वैसी ही ऊँची कुर्सी। मैं
भी अव्वल बाजीगर बनूँगा ,बस एक बार मदद कर दीजिये बाबू।एक बार आप देकर देखिये,
इतना बड़ा अहसान फरामोस बनूंगा की तू पुकारेगा तब भी याद नहीं करूंगा।गन्दी नाली का
कीड़ा समझूंगा ....सच कहता हूँ बाप ,बस कुर्सी दिला दो सा,ब।

मेरे को गाली देकर मुझसे ही कुछ उम्मीद लगा बैठे हो ?

तुम तो बरसों से मूढ़ थे बाप, कोई तेरे कंधे पर हाथ रख कर ले गया और गाल पर मार कर
छोड़ दिया मगर मैं ऐसा नहीं हूँ अन्नदाता।मैं कोई उम्मीद दिखा कर डकेती नहीं कर रहा
हूँ ,मैं सच कह कर मांग रहा हूँ।भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे बाबा।

मैं देने को मना कर दूँ तो ?

वह बोला-तो तेरा ही नुकसान होगा दाता।मुझे नहीं देगा तो किसी बेवफा के जाल में फंसेगा।
माथा धुन धुन कर रोयेगा और कहेगा उस मनहूस घड़ी में किस पर मुहर छाप दी ......

वह अगले घर की तरफ बढ़ गया था और जोर से टेर लगाई-कोई टूटी फूटी कुर्सी दे दे बाबा,
भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता !!            
         

24.10.12

आम आदमी


आम आदमी 

 क्या रावन लँका में पैदा होते हैं ?

पता नहीं ,मगर यहाँ स्वदेशी का खूब चलन है !!
-----------------------------------------------------------------

विजया दशमी की शुभ कामनाएँ ,आम जनता को छोड़कर ... ?

क्योंकि आम जनता के पटाखे फूटते हैं!!

--------------------------------------------------------------- 

एक ही थेली के चट्टे-बट्टे , सिद्ध कीजिये ?

पक्ष और विपक्ष को गले मिलते देखिये !!

---------------------------------------------------------------

एक वचन या  बहु वचन - सदाचार और भ्रष्टाचार ?

सदाचार तो एक जैसा ही होता है पर भ्रष्टाचार तो बहुआयामी  रंगीला ..!!

---------------------------------------------------------------

भक्त - गुरूजी,सुख और दुःख कैसे जाने ?

गुरु-  जिसको सबने मिल कर चुना वह दुःख और जो चुना गया
         वह सुख।

-------------------------------------------------------------
गाँव-गाँव में फर्जीवाड़ा पहुंचाईये ?

सरल ,बस बाप ... आप मनरेगा को खूब  दूध पिलाईये !!

-----------------------------------------------------------------

"कोयला के सानिध्य" की करामात बतलाईये  ?

कोयला अन्दर से भी काला और बाहर से भी, मगर सानिध्य पाने
वाला अन्दर से काला और बाहर से धोल्ला !!

--------------------------------------------------------------

कानून अपना काम करेगा ?

.................आम आदमी पर !!

न्यायालय में देख लेंगे ?

...................आम आदमी को !!

कानून के हाथ लम्बे होते हैं ?

.................आम आदमी तक !!
------------------------------------------------------------

16.10.12

जादूगर


जादूगर 

जादूगर अपना तामझाम समेट रहा था।
मेने  पूछा- कहाँ चल दिये सम्राट ?
वो बोले -आज से ये धंधा बंद!
मेने पूछा-   क्या हुआ ?
जादूगर बोला - जब से इस देश में बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं तब से लोगो को
मेरी हाथ की सफाई में मजा भी नहीं आता।सब बोलते हैं असली में गायब
करने वाले तुर्मखां बैठे हैं तो नकली को क्यों देखे।

-----------------------------------------------------------------

जादूगर अपने बरसों पुराने जादू दिखा रहा था तभी दर्शक में से आवाज
आयी ....कुछ नया दिखाओ।
जादूगर बोला - सरकार,मैं सरदार नहीं हूँ,मामूली आदमी हूँ।नया देखना
है तो अखबार में  पढो, समाचार में सुनो। मैं तो पुराना ही दिखाऊंगा।   


-----------------------------------------------------------------

मेने जादूगर से पूछा - आपकी कला में और भ्रष्ट नेता की कला में अंतर
क्या है ?
जादूगर बोला -मेरी कला में जो नही दीखता उसका भी अस्तित्व बना
रहता है और भ्रष्ट नेता की कला में जो बचा है वह भी गायब हो जाता है।

------------------------------------------------------------------

14.10.12

चोर बाजार


चोर बाजार 

शहर की गलियों में चोर बाजार का नजारा साप्ताहिक देखा जा सकता है।चोर बाजार में
चोरों की काफी जातियां देखने को मिल जाती है।कुछ कच्चे चोर,कुछ पक्के चोर,कुछ
लुख्खे चोर,कुछ अनुभवी चोर ,कुछ उठाईगीरे तो कुछ सफेद कॉलर .....!!

   चोर बाजार की खासियत यह होती है कि वहाँ जो माल होता है वह आम जनता का होता
है, चोरों को उस सामान की कीमत नहीं देनी पडती है! माल जनता का बिना कीमत के
हासिल करते हैं और उसी जनता को कीमत लेकर बेच देते हैं!!

  कच्चे चोरों की ढेरियों में पुराना माल होता है मगर सफेदपोश की ढेरियों में यकीनन
बढिया माल होता है।

मेने एक सफेदपोश चोर से पूछा -चोर जी, (आजकल चोरों को भी अदब से बोलना पड़ता है
वरना अपने लम्बे हाथों से मुसीबत खड़ी कर देते हैं) आप बढिया माल सस्ते में क्यों बेच
देते हैं ?

  सफेदपोश चोर बोला- हमारा मकसद चोरी करके पूरा का पूरा ह्ड्फ करना नहीं रहता है
हम चोरी करते हैं वो भी आँखों में धुल झोन्क  कर ..हमे लोग चोर मानने भी संदेह करते हैं
लोग हमारी इज्जत करते हैं .जब हम उन्हें उनका माल सस्ते में लुटाते हैं तो वो हमारा
आभार मानते हैं।समाज में मान सम्मान भी मिलता है तथा लोग और-और की रट  लगाये
हमारे इर्दगीर्द घूमते रहते हैं।

हमने पूछा- चोर जी , आप इन कच्चे चोरों के बारे में  भी कुछ सोचते होंगे?

वो बोले - ये कच्चे चोर ही हमारी बदनामी का कारण बनते हैं।पूरी योजना से काम नहीं करते
और उजुल -फिजूल चोरियां करते रहते हैं। कच्चे चोरों की वजह से आम जनता हमे भी शक
से देखने लग जाती है।हम चाहते हैं कि ये कच्चे चोर शातिर चोरों से शिक्षण ले ताकि इज्जत
पर आँच ना आये।

हमने पूछा- क्या आपको भी इज्जत की परवाह  होती है ?

वो बोले- हम क्या झुग्गी बस्तियों वाले नजर आते हैं,अरे!हम भी अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग
हैं ,बड़े घरों से ताल्लुक रखते हैं .....ये तो धंधा ही ऐसा है ,इस वास्ते करते हैं।

हमने पूछा- आदरणीय (आधुनिक समय में सम्मान देने का चलन है), पक्के चोर भी कभी
पकड़े जाते हैं  ?

    वो बोले - वैसे तो शातिर चोर घाघ होते हैं,आगे-पीछे की सोच कर काम करते हैं।ये तो
अहंकारवश या फिर स्टिंग ओपरेशन से फँस जाते हैं मगर चलते पुर्जे होने के कारण कभी
इन पर अपराध साबित नहीं होता है।ये हमारे प्रियपात्र होते हैं।

हमने पूछा- आप श्री श्रीमंत , पक्के और अनुभवी चोर में कोई बुनियादी फर्क बतायेंगे ?

वो बोले- क्यों नहीं, अनुभवी चोर खुद अपने हाथों से चोरी नहीं करता है सिर्फ चोरी की योजना
समझाता है और हिस्सा बटोर लेता  है।पक्का चोर उस योजना पर सतर्कता से काम करता है।

 हमने पूछा - श्रीमान (ये अपने को आदर्श घरानों के बताते हैं इसलिए ये इसके हकदार माने
जाते हैं), उठाईगीरे की आपकी नजर में क्या परिभाषा है?

  वो बोले- ये हमारी बिरादरी के नहीं हैं , ये तो वे लोग हैं जो बिना काम के हैं,ना तो इनके घर में
कुछ माल मिलता है ना ही ये हमारी सहायता करते हैं।ये लोग तो पाँच -दस की चोरी करते भी
नहीं हिचकाते।हम जल्दी ही इनको जनता के हाथों पिटवायेंगे।

हमने पूछा- आप अपने धंधे के भविष्य को कैसा देखते हैं ?

वो बोले-  इस देश में यह धंधा कभी फेल नहीं होगा क्योंकि यहाँ की जनता लापरवाह,भोली,
भुल्लकड़ है।यहाँ के लोग सज्जन हैं ,डरपोक हैं ,असंगठित हैं।इन्हें अपने झगड़ो से भी कभी
फुरसत नहीं मिलती है क्योंकि ये अलग-अलग  जातियों में बँटे हैं।ये लोग जब पड़ोसी के घर
चोरी होती है तो खुश हो जाते हैं .......... हा हा हा !!

चोर महाशय को हँसता देख हम अपनी कमजोरी को भांप कर वहां से खिसक लेते हैं .........।                

13.10.12

लूट सके तो लूट .......


लूट सके तो लूट .......

ये तुलसी के राम नाम की लूट तो नही है मगर इसके काफी करीब जरुर है।राम के नाम
की लूट में इस लूट में कुछ फर्क है,राम नाम की लूट पर सबका समान अधिकार है और
इस लूट में जिसके हाथ में लाठी है उसके हाथ ही भेंस है।तुलसी के राम नाम को नही लूटने
पर पछताना पड़ता है और इस लूट में भी पछताना पड़ता है सिर्फ समय का फेर है तुलसी
अन्तकाल में पछताने की बात करते हैं तो इसमें पाँच साल की ही मर्यादा है उसके बाद
जनता चाहे तो एक्सपायरी डेट डाल सकती है।

      लूट डाकू भी करते थे सा'ब, मगर अक्ल से नही करते थे सिर्फ दुसाहस के बल पर करते
थे  मगर यह लूट दुसाहस के बल पर नही अधिकार पा कर और पाने के पश्चात दुरूपयोग
करके की जाती है। डाकूजी की लूट में बेचारे को काफी तकलीफ थी क्योंकि सिस्टम का
सहयोग नही था  मगर इसमें वो तकलीफ नही है सिस्टम के टूटे भागे अस्थि पंजर पूरा
सहयोग करते हैं। डाकू को लूट के पश्चात बीहड़ों का रुख करना पड़ता था मगर इसमें यह
परेशानी नहीं है,लूट के पश्चात आराम से कुर्सी पर चिपक सकते हैं।लूट के पैसे को भी डाकू
देश की गुफाओं और  घने बीहड़ों  में छिपाते  थे  मगर इस लूट में  बेखटके लूट का पैसा
सात समुंदर पार भेज सकते हैं।

   तुलसी की लूट में समय की मर्यादा बीच में आ जाती है क्योंकि रात-दिन तो लूट नहीं सकते
राम का नाम,आवश्यक काम में तुलसी की लूट में व्यवधान आ जाता है  मगर इस लूट में
व्यवधान नहीं है जब आपका जी जाता ,लूट मचा लो,इस लूट को अंजाम देने के लिए पहले
दिमाग की जरूरत भी नहीं थी  मगर कुछ समय से विद्रोही चिंचडे इस कदर चिपकने लग
गये हैं कि सावधानी आवश्यक है।

     तुलसी के राम नाम की लूट में और इस लूट में एक बुनियादी फर्क भी है।राम नाम की
लूट जो लुटेरा बनता है उसके खाते में ही जमा होती है ,लूट के धन का हस्तांतरण नहीं है,
मगर इस लूट में हस्तांतरण आराम से किये जा सकता है।इस लूट को  बेटे,दामाद किसी
के नाम पर भी हस्तांतरण कर सकते हैं या किसी के नाम पर भी ऋण दिखा कर भी जमा
कर सकते हैं।

    तुलसी के राम नाम की लूट में परलोक सुधरता है ,वर्तमान लोक में सुधार हर किसी को
नजर नहीं आता क्योंकि तुलसी की लूट में दिखावा नहीं होता ,जगत पर कम और आत्मा
को लाभ ज्यादा होता है मगर इस लूट में लोक सुधरता है और परलोक होता भी है इस पर
सोचने की जरूरत नहीं है।यह लूट जगत को दिखाई देती है और उड़ते पंखिड़े चाटुकारिता के
गीत भी गाते हैं।

  तुलसी के राम के नाम को लुटने के लिए ध्यान ,सुचिता,शुद्धता और एकाग्रता की जरूरत
पडती है मगर  इस  लूट  में  इसमें में से एक भी गुण की जरूरत नहीं पडती है। इस लूट में
ईमानदारी का नकाब पहन कर भी लाभ पाया और दिलाया जा सकता है।इसमें समान विचार
वाले लुटेरे जनता की सेवा,पूजा,अर्चना के नाम पर मिलझुल कर लूट सकते हैं।

   तुलसी के राम नाम की लूट में पापी और परोपकारी का भेद नहीं है जैसे ही राम नाम का
रंग लगता है पाप भी तिरोहित होने लग जाता है मगर अफसोस ...इस लूट में यह सुविधा
नहीं है। इस लूट में आम जनता को अलग रखा जाता है क्योंकि वही तो बकरा है ......!!       

18.9.12

तालाब में मगरमच्छ छोड़ने के फायदे


तालाब में मगरमच्छ छोड़ने के फायदे 

इस देश के तालाब में विदेशी मगरमच्छ बसाने बहुत जरूरी हो गया है। विदेश  का मगरमच्छ
आपके तालाब में लाना इसलिए जरूरी है ताकि  तालाब  में सालो से  जन्मी  मछलियों  का
सफाया हो सके।

   तालाब में बहुत सी मछलियों के कारण पानी शुद्ध भी रह सकता है और छिछला भी हो जाता
है। अर्थशास्त्र  के नजरिये से तालाब का पानी छिछला हो रहा है इसलिए पानी का शुद्ध होना जरूरी
है और पानी की शुद्धता में मछलियाँ एक बड़ी बाधा है इसलिए हर बड़े  तालाब  में  कुछेक  मगर-
मच्छ का होना भी जरूरी है।

     मगरमच्छ के आने से मछलियों के जीवन पर अचानक संकट आ जाएगा ऐसा कुछ नही होगा।
कारण  कि जो भी मगरमच्छ आपके तालाबों में छोड़े जाने वाले हैं वे बहुत ही अनुभवी हैं।शिकार
कैसे करना है, वे उत्तम तरीके से जानते हैं। विदेश  के  मगरमच्छ  गणितज्ञ हैं   और  तालाब  की
मछलियों की गिनती करके उचित मात्रा में खायेंगे।ऐसा नहीं है कि ये  सारी  मछलियों  को डकार
जायेंगे।जो मछलियाँ इनके इशारे पर थिरकेंगी उन्हें दास बना लिया जाएगा और जीवन दान बख्श
 दिया जाएगा।जो उधम मचाने वाली और डटकर स्वाभिमान की रक्षा के लिए आक्रमण करेंगी ये
मगर सिर्फ उनका भोजन ही आरोगेंगे।

  नेताओं का तर्क है कि तालाब में मगर आने से तालाब की शोभा बढ़ जायेगी।ये मगर इतने विशाल-
काय होंगे कि जैसे ही नगर के तालाब में कूदेंगे वैसे ही देशी मछलियाँ पानी के बाहर गिरकर तड़फेंगी।
तड़फती मछलियों का नजारा आपके जीवन में 1947 के बाद पहली बार देखने को मिलेगा।

      विदेशी मगरमच्छो के कारण मगरमच्छो के आका जो देश के बाहर बैठे हैं वे सब बहुत खुश होंगे
और देश के सांडो की प्रसंशा करेंगे। विदेशी गीद्ध हमारी प्रसंशा करे ,यह हमारा सौभाग्य होगा।जब
हमारे सांड बाहर जायेंगे तब इनको चारा डाला जाएगा जो अक्षय होगा,इन सांडो की 14 पुश्ते पेट
भरकर खाने पर भी चारा खत्म नही होगा।

    मगरमच्छ तालाब में होंगे और वे देशी मछलियों का शिकार करेंगे और उससे जो लोमहर्षक दृश्य
उत्पन्न होगा उसे हमारे देशी मगरमच्छ लुफ्त उठाकर देखेंगे। विदेशी  मगरमच्छ  का  जो  भोजन
बचेगा उसका जायका देशी मगरमच्छ लेंगे। इस  तरह  से  देशी  मगरमच्छो  के  लिए  नया पर्यटन
स्थल का भी निर्माण होगा।

      मछलियों का जीवन भी कोई जीवन है ?हजारो नगरो में अरबो मछलियाँ जीवन भुगत रही है।
उनकी नियति में तो मरना ही लिखा है।देशी मछलियाँ देशी मगरमच्छो का निवाला बने या बगुलों
या गिद्धों का,इससे देशी मछली पर क्या फर्क पड़ता है।मछली का तो शिकार होना ही है,उसे बगुला
खाए,गिद्ध खाए या विदेशी मगरमच्छ ,क्या फर्क पड़ेगा देशी मछली को जो इतनी चिल्ला रही है।

     मगरमच्छो के आने से हमारी ताकत बढ़ेंगी।ये मगर जब मछलियों को डकारेंगे जो उनके पेट
से जो अवशिष्ट बाहर निकलेगा उसको हम देश के लोगो को बेचेंगे,यह आय हमे मुफ्त में मिलेगी।
मगर का अवशिष्ट खेतों में जाएगा उससे पैदावार बढ़ेंगी,उससे जो दाना पैदा होगा उसे तालाबो में
डालेंगे उससे छोटी मछलियाँ खुराक बनाएंगी।जब वो बड़ी हो जायेगी तो फिर से मगर का शिकार
बनेगी ,फिर लोमहर्षक दृश्य होगा फिर से देशी गिद्ध और देशी मगर की दावत होगी।      

                       

15.9.12

जाना होगा ।


जाना होगा । 

नेताजी बोले -
क्या हमें 
जाना होगा,,,,,,,
जनता चुप थी।
वो फिर बोले - 
जाना होगा ;;;;;
जनता घुर रही थी।
वो फिर बोले -  
जाना होगा .........
जनता तिलमिला रही थी।
वो फिर बोले -
जाना होगा !!!!
जनता बोली -
हाँ, अब जाना होगा।।। 

11.9.12

देश लुटते है ...!

देश लुटते है ...! 

फिरंगी की भाषा,
सफेद जक्क कपड़े,
चापलूसी बोली,
नफ्फट ,
बेशर्म ,
वादा और भरोसा
सरेआम तोड़ते हैं!
मकसद है इनका
चल देश लुटते हैं .........!!

---------------------------------

कोयला 

कोयला-
बुरी चीज है।
जब जले,
तो हाथ जला दे ;
जब बुझे,
तो कालिख लगा दे।
हम शराफत के बंदे,
इस को मिटाने पर तुले हैं,
मगर-हाय ! रे,निर्दयी केग!
इस पर भी बवंडर फैला रहे हैं .........!!
========================

ख़ामोशी 

मेरी ख़ामोशी,
तेरी बक-बक से लाख अच्छी है।
क्या पाया बक-बक करने से ?
जाँच, जुल्म,और जख्मों के सिवा, 
काश-
सच को जानकर खामोश रहता,
तो,
जो ताज मेरे सिर पर है,
वह ताज कल तेरे सिर होता !

===========================

चापलूसी

कौन कहता है, 
चापलूसी को अवगुण,
है यह हुनर से कम नहीं,
सच बोलने से कुछ उखड़ता नहीं,
मगर-
चापलूस को कोई उखाड़ सकता नहीं !

=================================

 उसको क्या कहते हैं ?

एक मंदिर में !
खुलकर होती-
गुथमगुत्थी ... !
हाथापाई ....!
झगडे-लड़ाई ...!
गाली-गलोच .....!
मारा - मारी ...!
धक्का-मुक्की ...!
फेंका-फेंकी ...!
चोर .. ! चोरी ...!
सीना जोरी ...!
छिना झपटी ...!
शोर-शराबा ...!
देश -खराबा ...!
मिले जहाँ ये दर्शन, 
बोलो,उसको क्या कहते हैं ?