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27.9.14

पाकिस्तान का रोना

पाकिस्तान का रोना 

पाकिस्तान को रोने की आदत हो चुकी है क्योंकि नासमझ बच्चा जब भी रोता
है तो समझदार लोग उसके हाथ में लॉलीपॉप थमा देते हैं,तब बच्चा समझता
है रो कर के मेने कुछ पाया और समझदार जानते हैं कि उसका लॉलीपॉप चूसना
ही बेहतर है ताकि वे लोग महत्वपूर्ण काम कर सके।

जब समझदार लोग अपने महत्वपूर्ण काम पुरे कर लेते हैं और बच्चा फिर रोने
लगता है तब उसे चाँटा मारकर चुप करा दिया जाता है या फिर गला फाड़ कर
रोने दिया जाता है और बच्चा दोनों ही परिस्थिति में अपनी औकात समझ मुँह
बंद कर लेता है।

पाकिस्तान का सँयुक्त राष्ट में जाकर कश्मीर पर रोना !! कोई ज़माना था जब
इस मातम मनाने के तरीके पर उसे समझदार पुचकारा करते थे मगर अब
उसके रोने हश्र उस हठीले बच्चे जैसा होगा जो चाँटा खा कर चुप होता है या
गला फाड़ कर रोने से गला दर्द करने लगता है और वह मौका पाकर स्वत: ही
रोना बंद कर देता है।

पाकिस्तान का कश्मीर पर रोने का हश्र क्या होगा ?आज विश्व को ताकतवर
भारत के सहयोग की आवश्यकता है खण्डहर हो चुके पाकिस्तान का सहारा
लेकर कोई भी भारत से रिश्ता खट्टा नहीं करेगा।

विश्व जानता है कि भारत अपना मसला खुद सुलझाने का माद्दा रखता है और
इस मसले पर टाँग फँसा कर कौन आफत मोल लेगा,इसलिए अब वो होने वाला
है जो भारत चाहता है। यह है शक्तिशाली भारत की नयी पहचान।   
   

31.7.14

.... स्वार्थी मित्र है या हितेषी ?

.... स्वार्थी मित्र है या हितेषी ?

आप जब कमजोर होते हैं तब स्वार्थी मित्र आपसे दूरियाँ बढ़ा लेते हैं और आपको
भूलने का या फिर अनुचित दबाब बढ़ाने का प्रयास करते हैं। अपने को ताकतवर
समझने वाले लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए या आपको नीचा दिखाने के लिए
आपके दुश्मन तथा विरोधी का सहयोग करते रहते हैं लेकिन जब आप ताकतवर
बन उभरते हैं तो स्वार्थी मित्र आपकी वाहवाही में लग जाते हैं,आपके दिए स्लोगन
या आपके द्वारा कही गई सामान्य बात पर भी तालियाँ पीटने लगते हैं। अपनी सीमा
से स्वार्थी लोग आपको इसलिए दूर रखते हैं ताकि उनका स्वार्थ सिद्ध होता रहे।
क्या ऐसे लोग कभी मित्र भी हो सकते हैं ?

ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाये ? हमारे नीति शास्त्र कभी भी ऐसे
तुच्छ लोगों से मित्रता करने की सलाह नहीं देते हैं और ना ही उन पर विश्वास
जताने की सलाह देते हैं जिस तरह शठ के लिए शठ नीति है उसी तरह स्वार्थी लोगों
से खुद का स्वार्थ पूरा करके उन्हेँ बरगलाये रखना अच्छा है। स्वार्थी लोग खुद को
अच्छी तरह से पहचानते हैं वे स्वार्थ पूरा करने के लिए जो मिठ्ठी बात करते हैं
या सहयोग करने का वादा करते हैं वास्तव में उसका मूल्य कौड़ी का होता है। यदि
हम उन चिकनी बातों पर विश्वास करते हैं तो हम ही फिसलते हैं और चोट खाते हैं.

विश्व के डरावने स्वार्थी मित्र जब आपको निमंत्रण देते हैं और आपके पैरों तले लाल
कालीन बिछाते हैं इसका मतलब यह नहीं मानना चाहिए कि ये आपकी सफलता की
कद्र कर रहे हैं। ये लोग अपना स्वार्थ और आर्थिक हित देखने आते हैं और हमें भोन्दु
समझ अपना काम निकालने की फिराक में रहते हैं। जो लोग स्वार्थी मित्र से बढ़िया
सम्बन्ध बनाने में ऊर्जा नष्ट करते हैं वास्तव में अपने सच्चे मित्रों की उस समय
अवहेलना करते हैं क्योंकि हम तब उन्हें सम्मान देने में लगे रहते हैं जिसकी पात्रता
नहीं है और उत्साह अतिरेक में सच्चे मित्रों को खुद से दूर कर लेते हैं।

"सबका साथ और सबका विकास "तो भारतीय दर्शन का  मूलमंत्र रहा है हमारे ग्रन्थ
वसुधैव कुटुम्बकम का मन्त्र हजारों साल से दे रहे हैं मगर स्वार्थी लोग उसकी कद्र
आज तक नहीं कर पाये हैं परन्तु अपना हित साधने के लिए अभी वो इस मन्त्र की
प्रशंसा करते नहीं थक रहे हैं ?क्या हम वास्तविकता को समझ रहे हैं ? हमारे सच्चे
मित्र छोटे हैं तो भी हमारे लिए उत्तम है क्योंकि इतिहास और पुराण गवाह है श्री राम
की विजय में सहयोग करने वाले निषाद,भील,वानर ,काक जैसे सहयोगियों के समर्पित
भाव का।

कोयला जलता हुआ होता है तो भी उसका सम्पर्क हाथ जला सकता है और बुझा हुआ
है तो हाथ काले कर देता है ,स्वार्थी त्याज है। स्वार्थी मित्र को दूर करना है तो मनुष्य को
शांति पूर्वक अपना बहुत बड़ा स्वार्थ पूरा करने की बात रख देनी चाहिए वह उलटे पाँव
खिसक जाता है।    

25.6.14

महँगाई से लड़ने का तरीका क्या हो

महँगाई से लड़ने का तरीका क्या हो 

महँगाई नहीं रोक पाने में अभी तक सरकारें असफल क्यों रही है?

हमारा रुपया खर्च कहाँ होता है और उसे कहाँ खर्च करना होगा ,यह व्यवस्था
ही महँगाई को कम करेगी। भारत के लोग उधार के रूपये पर कितने दिन घी
पियेंगे।

हमारे पास पेट्रोल नहीं है और बाहर से खरीद करना पड़ता है फिर भी हम
पेट्रोल की खपत को कम करने के उपाय नहीं ढूंढते हैं.हम पब्लिक ट्रांसपोर्ट
की सेवा को दुरस्त नहीं कर पाते हैं,सड़कों को दुरस्त नहीं कर पाते हैं,यातायात
व्यवस्था को सहज नहीं बना पा रहे हैं, निजी कारों को सब्सिडी भाव से ही
पेट्रोल ,गैस  या डीजल की आपूर्ति कर रहे हैं। जब तक पेट्रोल की बचत के
तरीके नहीं खोजे जायेंगे तब तक हमारे धन का दुरूपयोग नहीं रुकेगा और
महँगाई भी नहीं रुकेगी। क्या पेट्रोल की राशनिंग का वक्त नहीं आ गया है ?
क्या 80 % भारतीयों के पास कार है ,नहीं हैं ना तो 20% रहीशो को सब्सिडी
वाला पेट्रोल,डीजल ,गैस उपलब्ध क्यों ?

आधुनिकीकरण,उदारीकरण ने हमें जेब खाली होने पर भी खर्च करने को
प्रोत्साहित किया। उधार लेकर जलसे करना सिखाया। गरीब के शौक को
बढ़ावा देना सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता है। हम ब्याज पर पैसा
लेकर शौक पुरे करते हैं और ब्याज को चुकाने के लिए कर्ज लेते हैं। हमारे
बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में चला जाता है और इस कारण से
रुपया मूल्य खोता जा रहा है।

बड़े उद्योगो को बढ़ावा दिया मगर पाया क्या ?सिवाय पूँजी के केन्द्रीयकरण के।
आज बहुत से बड़े उद्योगपति देश की बैंकों का ब्याज और मूल रकम कुछ भी नहीं
चूका रहे हैं तो बैंकों का घाटा पूरा कैसे होगा और उस बोझ को कौन ढोयेगा ?
80%गरीब भारतीय ही ना। बड़े उद्योगो को सब्सिडी क्यों ?उन्हें धंधा बढ़ाना है
तो सरकार सहायता दे और 80%वाले अपनी मेहनत से व्यापार करे!! क्या
किसानों,फुटकर व्यापारियों ,अति लघु ,कुटीर और लघु उद्योगो को बिना
ब्याज के कोई बैंक कर्ज देती है। 

हम अच्छी बन्दुक और तोप भी अपने यहाँ नहीं बना पा रहे हैं दूसरे स्वचालित
सामरिक उपकरणों की बात क्या करे। आज हमारा रुपया सामरिक उपकरण
पर खर्च हो रहा है। विकसित देश भारी मुनाफे पर सामरिक उपकरण हमें
बेचते हैं और हम उनकी पुरानी टेक्नोलॉजी को ऊँचे दाम देकर खुश होते हैं और
उनके कबाड़ को खरीद कर पैसा चुकाते हैं ?कब तक चलेगा ऐसा ??

महँगाई का भार गरीब जनता पर ना पड़े इसका ख्याल मोदी सरकार को करना
होगा ?कड़वी दवा उनके लिए जरुरी है जो तीन लाख सालाना से ज्यादा आय कमाते
हैं। 50-100 रुपया दिन के कमाने वाले पर कड़वी दवा इस्तेमाल करने की भूल
करने पर इस सरकार का ५साल बाद क्या हश्र होगा ?जिस तरह काँग्रेस गयी ,यह
भी चली जायेगी।

नेताओं और नौकरशाहों के काले धन पर हाथ डालो,राष्ट्रिय बैंकों का कर्ज ना चुकाने
वाले बड़े मगरमच्छों के जबड़े पकड़ो, कामचोर और रिश्वत खोर अफसरों को घर
बैठाओ ,जमाखोरी वाले से राजनैतिक साँठगाँठ ख़त्म करो। प्रशासनिक जबाबदेही
के मानक तय करो। गरीबी भगाने के लिए कागजी योजनायें आज तक असफल
हुयी है ,समय पुरुषार्थ को पुकार रहा है।    

      

16.2.14

चिड़ियाँ छोड़ मुर्गी को धाये !!

चिड़ियाँ छोड़ मुर्गी को धाये !!

कामना और लोभ की जब अति होती है तब दानव का जन्म होता है। शास्त्र ने कहा है
अति सर्वत्र वर्जयेत। आचार्य चाणक्य का मानना था कि मनुष्य ना तो ज्यादा सरल
बने और ना अतिशय ईमानदार क्योंकि अति दानी होने के कारण बली को पाताल
लोक में जाना पड़ा , अति ईमानदार होने के कारण राजा हरिशचन्द्र को चाण्डाल
बनना पड़ा और अतिशय रूपवती होने के कारण सीता का अपहरण हुआ।

         देश की सियासत में एक अति महत्वाकांक्षी पार्टी का उदय हुआ जो खुद को
और खुद की पार्टी में शामिल सभी लोगों को ईमानदारी का स्वयं निर्मित ताज पहना
कर उनके ऊपर ईमानदारी का चौबीस केरेट का सिक्का लगा महसूस करती है और बाकी 
सब को चोर समझती है ,इनके मुताबिक़ संविधान में प्रावधान नहीं है तो संविधान
को ठेंगा बताये और संविधान से इनके स्वार्थ की पूर्ति होती है तो उस बेकार संविधान
को पवित्र मान उसकी दुहाई दे दे। राह चलता उदंड किसी सज्जन को गाली बक कर
यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि इस महाशय ने जो भी समाजोपयोगी काम किये
हैं उसमें उनकी मेहनत के अलावा हराम के धन का उपयोग किया है तो हो सकता है लोग
उस सज्जन पर शंका करें मगर उस उदंड के पास पहले से भी खोने के लिए कुछ भी ना था
और अब भी कुछ नहीं है लेकिन समाज को उसकी उदंडता से एक नुकसान जरुर होता है
की सज्जन लोग समाजोपयोगी काम करने से विरक्त हो जाये।

         एक किसान ने खेत पर पाले हुए कुत्ते को एक दिन गाँव में लाने की सोची।किसान
ने सोचा कि गाँव की गलियों के कुत्ते उस पर हमला ना कर दे इसलिए उस कुत्ते के गले
में पट्टा बाँध बैलगाड़ी के निचे बाँध दिया और बैलगाड़ी को गाँव की ओर हाँक दिया। कुत्ता
बैलगाड़ी के निचे सुरक्षित चल रहा था। कुछ देर बाद जब गाँव में बैलगाड़ी ने प्रवेश किया
तो गलियों के कुत्तों ने खेत के कुत्ते से पूछा -भाई ,आप बैलगाड़ी के निचे हम लोगों से डर
कर क्यों चल रहे हो ?तुम और हम तो एक ही जाति से हैं। कुत्ते ने बहाना बनाते हुए कहा -
भाइयों,मैं आपसे डर नहीं रहा हूँ। कुछ देर रुक कर शेखी मारते हुए बोला -आप लोग तो
निकम्मे बन गए हो ,मुफ्त कि रोटियाँ तोड़ रहे हो और मेरे ऊपर अभी बेलों सहित मालिक
को सुरक्षित घर पहुँचाने कि जबाबदेही है ,इन सबका बोझ उठाते हुए मैं महत्वपूर्ण सेवा में
व्यस्त हूँ। सभी कुत्ते उसकी शेखी सुनकर उस पर भौंकने लगे। कहने का आशय यही है कि
मनुष्य कभी ये ना समझे कि उससे ज्यादा बुद्धिमान कोई भी नहीं है और ना भविष्य में
जरुरत पड़ने वाली है।

        आचार्य चाणक्य ने कहा है कि अनिश्चित और निश्चित में से निश्चित का ही महत्व
है चाहे उसका फल छोटा भी क्यों ना हो। कल मिलने वाले मुर्गे की आकांक्षा के चलते आज
जो हाथ में चिड़ियाँ है उसको छोड़ देने वाला मुर्ख होता है। व्यक्ति जब अति लोभी बनता है
तो उसके लोभ के कारण वह अपने कुनबे के सर्वनाश का कारण बनता है  उस कुनबे की
हालत उस मक्खी जैसी होती है जो मीठे के लोभ में शहद पर बैठ जाती है और अपने पँख
शहद से लिपटा कर अपनी मौत का कारण खुद बनती है।               

9.2.14

गरीब लोकतन्त्र से दान पाते हैं पूँजीपति

गरीब लोकतन्त्र से दान पाते हैं पूँजीपति 

शास्त्र और विद्धवानों के मत के अनुसार दान करना समाज के प्रति उत्तम कर्तव्य
को निभाना है इसलिए हर धर्म में दान का बहुत महत्व है। शास्त्रों ने दान देने और
लेने दोनों को योग्य पात्र होना जरुरी माना है। अगर दान देने वाला योग्य पात्र नहीं
है तो उसके द्वारा दिया हुआ दान तथा दान लेने वाला योग्य पात्र नहीं है तो भी उसे
दिया गया दान महत्वहीन काम है जिसे नहीं किया जाना चाहिए।

    हमारा देश आर्थिक रूप से गरीब लोकतंत्र है और इसका संचालन गरीब लोगों
पर अप्रत्यक्ष तथा प्रत्यक्ष कर लगाकर किया जा रहा है मगर जब यह गरीब
लोकतंत्र कर के पैसे का दान पूंजीपतियों को दोनों हाथों से करता है तब आम
भारतीयों पर क्या गुजरती होगी इसकी चिंता भी यह गरीब लोकतंत्र आज तक
नहीं कर पाया है।

   इस देश के पूंजीपति एक तरफ लोकतंत्र से दान पाने का खुद को उचित अधिकारी
ठहराते हैं और बड़ी राशि ,भूमि ,कर की छूट और अन्य तरीके से दान डकारते रहते
हैं और गरीब लोकतन्त्र भी इनको दान देकर प्रोत्साहित करता रहता है। तर्क यह
दिया जाता है की धनकुबेरों को दान लुटाने से देश का विकास होता है और फिर विकास
के नाम पर गरीबों पर कर का बोझ बढ़ा दिया जाता है और अमीरों को दान कर दिया
जाता है।

   वो भी एक समय था जब भामाशाह ने अपनी सम्पति राणा प्रताप के पास कुछ
भी धन नहीं बचा था तब राज्य की आन मान और शान बनी रहे इसके लिए दान
कर दी और आज का भामाशाह इस समय के धनहीन राणा से दान माँगता रहता
है और धनहीन आज का राणा उनको जनता के कर के पैसे लूटा कर खुद को
गौरवान्वित भी महसूस करता है। किसी को SEZ ,किसी को टैक्स में छूट,किसी को
उद्योग के नाम पर रोकड़  … सब कुछ बाँटा जा रहा है और ऊपर से ठप्पा विकास का।

    आम आदमी को गैस सिलेंडर के लिए पात्रता दिखानी है ,गरीब किसान के लिए धन
दान देने पर कम पड़ जाता है ,छोटे व्यापारी को हजार सवाल करके लौटा दिया जाता
है ,विधवा बहनों को टुच्ची रकम (चार -पाँच सौ रुपया महीना )दे दी जाती है ,बेरोजगार
युवाओं को,वंचित वर्ग को ,आदिवासी जनजातिओं को,निर्धन भारतीयों को जो वास्तव
में लोकतंत्र से कुछ सहायता पाने की पात्रता रखते हैं उसे आज तक क्या मिला ?एक
भारत में दौ भारत किसने विकसित होने दिए और क्यों ?क्या किसी लोकतंत्र के प्रहरी
के पास इन सवालों का जबाब है। लोकतंत्र का मतलब यह नहीं होता है कि वह मुठ्ठी
भर लोगों के हित की रक्षा करता रहे और बहुत बड़े वर्ग को आश्वासन की घुट्टी पिलाता
रहे। यदि आम आदमी सरकारी अनुदान के बिना अपने पुरुषार्थ के बल पर अपना जीवन
चला सकता है तो पूंजीपतियों को बेवजह गरीब जनता का धन मुफ्त में बाँटने का हक़
लोकतंत्र की सरकारों को क्यों है ?
       
    जनता के कर के पैसे से पूंजीपति अपना घर सब्सिडी के नाम पर भर कर कैसा आदर्श
दिखाना चाहते हैं ?दान वंचित ,निर्धन ,असहाय,पीड़ित और जरुरत मंद के लिए हो तभी
सार्थक है।    

29.1.14

आओ, कानून बना देते हैं !!!

आओ, कानून बना देते हैं !!!

देश अब कागज पर चलेगा क्या ? अगर नेताओं को यही रास्ता ठीक लगता है और इसी
रास्ते से सरकारें बनना सरल लगता है तो कुछ लाइनें और खिंच दीजिये ताकि देश वासी
यह मुगालते में रहे कि अब सब कुछ ठीक ठाक हो गया है -

1. रोजगार का अधिकार कानून
2. पानी आपूर्ति कानून
3. बिजली और सड़क का अधिकार
4. सड़क निर्माण कानून
5. दुर्घटना रोको कानून
6. महँगाई भगाओ कानून
7. बिना पढ़ें डिग्री का कानून
8. तुष्टिकरण और पक्षपात का कानून
9.अभिव्यक्ति पर लगाम का कानून
10. वादों और आश्वासन का कानून
11. झूठ बोलने की स्वतंत्रता का कानून
12. समाज सुधार का कानून
13. विकास का कानून

कागज पर लिखने से देश और नागरिकों का विकास सम्भव है तो फिर हर अव्यवस्था पर
प्रतिदिन कानून बनाते चलो। हर चौराहे पर निपटारा विभाग खोल दो। गाँव-गाँव में
कारावास बना दो। देश का विकास इसी रास्ते से होना सही लगता है तो कानून बनाते रहो।

देश के पास पर्याप्त कानून है। देश के पास अगर कमी है तो निष्ठा और कर्तव्य परायणता की,सेवा और समदृष्टि की।   

28.1.14

मेरा पाप जिंदाबाद ,उसका पाप मुर्दाबाद !!

मेरा पाप जिंदाबाद ,उसका पाप मुर्दाबाद !!

देश को बपौती समझने वाले लोग अपने पाप पर भी जिंदाबाद चाहे और किसी के काम
को सिर्फ मुर्दाबाद कहें तो किसे मुर्ख समझे ?उसको चुनने वाली जनता को या उसके 
दोहरे चरित्र को ,तय करें क्योंकि समय आप हिन्दुस्तानियों से जबाब माँग रहा है। 

कोई व्यक्ति खुद को स्वराज मानता है और अपने से बड़ों का अनादर भाषा से या हाव 
भाव से करता रहता है तो उसे देश स्वराज माने या अराजकता ,तय करे और पुनर्विचार 
करें क्योंकि यह देश कुछ लोगों कि जागीर नहीं है इसकी हर विचारधारा पर करोड़ों 
भारतीयों का भविष्य बंधा है। 

हजारों चूहे खाकर बिल्ली हज को चली ,क्या उसके बाद वह चूहे खाना बंद कर देती है ?

विधाता ने खून के रँग में फर्क नहीं किया मगर नेता अब सड़कों पर बह चुके खून को 
अलग-अलग भाव से देखता है ,उसको दर्द नहीं होता इस बात पर कि खून बहा है उसे 
दर्द है इस बात पर कि वह किसका बहा है !!  

14.1.14

विकसित होते गुजरात के पंख हैं "हम "

विकसित होते गुजरात के पंख हैं "हम "

भारत के टुच्चे राजनीतिज्ञ वर्तमान और भविष्य को नहीं देख पा रहे हैं उन्हें केवल
दिखाई देता है सालों पहले हुआ गुजरात का दँगा ,अतीत के उस पन्ने को बार -बार
खोल कर वो देश के सामने रखते रहते हैं जैसे वह दँगा अभी तक चल रहा हो!!

          क्या गुजरात झूठे मिडिया ,उल्लू  गुणों वाले राजनीतिज्ञों,स्वार्थी NGO से
निराश हुआ ?नहीं। गुजरात पर दैविक और लोक सृजित आपदायें आयी और
हर बार गुजरात स्वयं के बल से बाहर निकला ,कैसे ?सब लोग पूछते हैं यह हुआ
कैसे ?इसके पीछे परिपक्व नेतृत्व कि मेहनत है।

    गुजरात के टूटे हुये दिलों में एक नयी आशा का संचार हुआ जब यहाँ के नेतृत्व 
ने एक महत्वपूर्ण काम किया। उन्होंने बड़ी कुशलता से हिंदुओं से "ह "लिया और 
मुस्लिमों से "म "और फिर इन दोनों को नेक नियत से जोड़ कर "हम "बना दिया।

यह बात बहुत से बुद्धिजीवियों के गले नहीं उतरी होगी क्योंकि उन्होंने इस प्रयोग
को देखा नहीं था और आज तक समझा भी नहीं है। वो तो बस एक रट लगा के बैठे
हैं कि यहाँ का विकास बड़बोलापन है। वो लोग झूठ बोल कर खुद भी सच को समझ
नहीं पा रहे हैं और देश के अवाम को भी गुमराह कर रहे हैं। गुजरात में बारह साल
से कोई दँगा क्यों नही हुआ ,टुच्चे नेता गुजरात में आपाधापी देखना चाहते हैं पर
"हम "के कारण उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। गुजरात के नेतृत्व ने बड़े धीरज
से विकास के आकाश में "ह "और "म "के दोनों पंखों से मुक्त आकाश में उड़ान
भरी और देखते ही देखते गुजरात विकास की बुलंदियों को छूने लगा।

     आज जब देश के अधिकाँश नेता तुष्टिकरण की खोटी कुनीति से बाहर कुछ
नहीं देख पा रहे हैं वहीं गुजरात ने समता कि नीति में विश्वास कर सबको प्रगति
का समान अवसर प्रदान किया ,समता की नीति से दोनों समुदायों का द्वेष खत्म
हुआ और हर गुजराती पुरे दम ख़म के साथ विकास के पथ पर ,कुछ अच्छा कर
गुजरने के लिये दौड़ने लगा और परिणाम यह आया कि गुजरात विश्व के नक़्शे
पर छा गया।

एक के मुँह से छीनकर दूसरे के मुँह में ग्रास डालने कि कुनीति जैसे ही खत्म हुयी
वैसे ही अलग-अलग मजहब ,अलग-अलग प्रान्त के लोगों ने एक दूसरे के हाथ
मजबूती से थाम लिये और चल पड़े विकास की  राह पर।

    आज वोट बैंक की राजनीती के युग में , जातिवाद और धर्मवाद की राजनीति
के युग में, पक्षपात और तुष्टिकरण के युग में  "हम " की संस्कृति दुर्लभ है।

  आज "हम" ने गुजरात को स्थिर सरकार दी और बदले में नेतृत्व ने विकास के
नए रास्ते बनाएँ। आज हम गुजराती आगे बढ़ रहे हैं ,दंगे फसाद ,लड़ाई -झगड़े
सब भूल गए क्योंकि अब हमारे हाथों में काम है हम निकम्मे नहीं रहे। हमारा
काम "हम "अकेले अकेले पूरा नहीं कर सकते इसलिये पुरुषार्थ ने हमें मिलजुल
कर रहने को बाध्य कर दिया।
            

22.12.13

जनमत तो श्री राम के साथ भी था …।

जनमत तो श्री राम के साथ भी था  …। 

केजरीवाल के दाँत क्या खाने और दिखाने के अलग हैं ?यह प्रश्न सहज है ,क्योंकि वे युवा
भारत को नैतिकता और ईमानदारी का स्वराज्य देने का सपना दे रहे थे। जिस भ्रष्टाचार
से लड़ने की बात किया करते थे वो केजरीवाल अब कहाँ गायब हो गया ?क्या सत्ता की
भूख हर बार नैतिकता पर भरी पड़ जाती है ?

"आप" कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ वोट माँग रही थी और जब राजा बनने की
बारी आयी तो कांग्रेस से समर्थन पाकर राज जमाने की तैयारी में लग गयी है। क्या
यही नैतिकता है या यही स्वराज्य का स्वरुप था केजरीवाल का। क्या जनता ने इसलिए
केजरीवाल को वोट किया था। नहीं ,जब जनता ने वोट किया था तो उसकी सोच कांग्रेस
के शासन से मुक्ति की थी और "आप"के निर्दोष नए चेहरे थे। जनता ने इस विश्वास के
साथ "आप"को वोट दिया कि उसे नया स्वराज्य मिलेगा।

जब जनता ने केजरीवाल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया तो उसे भी भाजपा कि तरह सत्ता
को हाथ जोड़ देना चाहिए था ,लेकिन हाथीके दाँत खाने और दिखने के अलग होते हैं उसी
तरह "आप" ने सत्ता का सुख भोगने का शॉर्ट कट लिया उसका अर्थ यह था कि सत्ता मिल
गयी तो राज करते रहेंगे और काँग्रेस ने हाथ हटाया तो जनता को कह देंगे कि हमने तो
आपके कहने पर यह सब पाप किया।

  मुझे रामायण का वह खंड याद आता है जब राम के वनवास कि बात सुन अयोध्या की
प्रजा ने राजा दशरथ का साथ छोड़ श्री राम को राजा मान लेने का निर्णय कर लिया था।
खुद दशरथ भी राम से कह चुके थे कि -"बेटा ,मुझे कारावास में बंदी बनाकर तुम राज कर
लो "मगर श्री राम ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह जानते थे कि उनके इस आचरण का
दूरगामी प्रभाव प्रजा पर पडेगा और वह भी धीरे -धीरे अनैतिक हो जायेगी। राम ने वनवास
को सुराज्य कि स्थापना के लिए स्वीकार किया था। श्री राम ने उस समय जनमत के
विरुद्ध आचरण करके वन जाना स्वीकार क्यों किया ?उन्होंने जनमत का आदर क्यों नहीं
किया जो उन्हें उसी समय राजा के रूप में स्वीकार कर चूका था।

केजरीवाल जनता कि भावुकता और सरल ह्रदय का फायदा उठाने कि सोच चुके हैं ,अगर
जनता ने भावावेश में कोई निर्णय कर लिया तो इसका मतलब यह नहीं की केजरीवाल
सिंहासन पर बैठ जाये। केजरीवाल और उनकी टीम ने कभी भी जनता से यह प्रश्न नहीं
किया कि हमें वापिस जनता के पास जाना चाहिए ,क्यों ? आप जनता से हाँ या ना क्यों
पूछ रहे थे ?उनको यह क्यों नहीं समझा रहे थे कि काँग्रेस के सहयोग से सरकार बनाना
अनैतिक है ?

इसके जबाब में "आप"यह तर्क दे कि जनता इतना जल्दी चुनाव का खर्च नहीं बर्दास्त
कर पायेगी लेकिन इस बात में कोई दम नहीं है क्योंकि जनता जानती है की उसने सही
बहुमत नहीं दिया इसलिए वापिस चुनाव का खर्च उठाना पडेगा। देश की जनता मौका
परस्त नहीं है ,देश कि जनता नैतिकता के प्याले में अनैतिकता का घोल पसंद नहीं
करती है मगर उससे छद्म और छल से गलत फैसला करवा कर हम किस ढ़ंग की
नैतिकता की स्थापना करने जा रहे हैं यह शोचनीय है

   

4.7.13

वाह !अब खाद्य सुरक्षा

वाह !अब खाद्य सुरक्षा 

पहले गरीबी हटाओ ,खूब फेशन चली थी उस जमाने में ,जबरदस्त हथकंडा था कुर्सी पर
विराजने का ,काम भी आया ,क्योंकि खुबसूरत सपना था मगर हश्र यह हुआ कि काठ की
हांडी बन गया।

फिर लाये आर्थिक उदारीकरण ,खूब चला ,पढ़े लिखे भी मुर्ख बन गए हश्र यह हुआ कि बाप
की सम्पति को बेच बेच कर बेटा धनवान दिखने का अभिनय करने लगा और नतीजा यह
कि सब कुछ ठप्प .....

चासनी पीने की आदत वाली जनता को बाद में इन्वेस्टमेंट के नाम पर शेयर का धंधा
बताया ,रातों रात करोडपति बनिए और काम भी मत कीजिये ,वाह! क्या खुबसुरत झूठ
था और खूब चला ,चाय की केंटिन वाला भी शेयर की बात करता था सा'ब और जब फुग्गा
फुटा तो दिन में तारे दिख गए जनाब को ...

मुर्ख बनाने के हजार तरीके होते हैं सा 'ब ,अब नया तुक्का ले आये -रोजगार गारंटी,भाई
को करना कुछ नहीं गड्ढे खोदो और आराम से रूपये ले जाओ ,मरे हुए ,पैदा भी नहीं हुए
और जिन्दे सबने मजा लिया नतीजा जो रोटी रूपये में मिल जाती थी वह पाँच की हो गई
और अरबों रूपये गड्ढों में गिर गए .......

इस बार धार पर थी नारी ...बेचारी भावुक ,बोले कि आप बराबरी करे ,आधी दुनियाँ आपकी
मुठ्ठी में ,शासन में आधा भाग आपका ,बस बात इस तरह उड़ी कि कुर्सी चल कर पास आ गई
और साहब विराजमान हो गए और परिणाम यह की शासन तो दूर की बात ,घर से निकलते
ही डरने लगी .........

फिर मथने लगे तस्वीर बनाने ,सब के सब लग पड़े और ऐसी तस्वीर बनाने लगे कि बेचारा
किशोर समय से पहले जवाँ दिखने लगा ,अब क्या था सब उसके कंधे पर ,माथे पर जहाँ
जगह मिली उस पर सवार होने लगे ,बेचारा किशोर ...बेहाल हो गया और समय से पहले
बोझ से दब गया ........

जो वोट बैंक थी उसे गुमराह करने लगे ,मगर वह भी अब शिक्षित हो गयी ,भला बुरा विचार
सकने की समझ पैदा कर ली और नतीजा यह कि साहब की कुर्सी के पाए चरमरा गए और
कुर्सी लुढकने लगी ............

अब आई नयी नवेली खाद्य सुरक्षा ,बत्तीस और छब्बीस की गणित का सवाल हल करने की
बारी ,छब्बीस और बत्तीस को असल में धनवान बनाने का वादा ,क्या हश्र होगा ,भविष्य के
हाथों तय होगा मगर इस खाद्य सुरक्षा ने एक सच्चाई देश के सामने उगल दी कि इस देश के
67% लोग अजीबोगरीब धनवान हैं जो बाजार भाव से अन्न खरीद सकने की स्थिति में नहीं
है .......
 और अंतिम बात समर्थन मुल्य पर ख़रीदे गए अन्न को पानी में भिगोने की ,साहब के पास
उस अन्न को बचाने की काबिलियत भी नहीं ,बड़े बुजुर्ग ने कहा -67% तथाकथित धनवानों
में बाँट दो,मगर कौन सुने ,क्यों सुने ,आखिर सवाल कुर्सी की बनावट का है ........     

5.12.12

FDI ,नेता और आम भारतीय

FDI ,नेता और आम भारतीय 

रिटेल में FDI पर सरकार और नेता क्या कहते हैं इस बात को महात्मा गांधी की विकास
नीति से शुरू करेंगे। महात्मा गांधी वो  शख्सियत है जिसको नमन सब पार्टियां करती है
परन्तु उसकी विचारधारा से भी पर्याप्त  दुरी भी सब ने बना रखी है।गांधी को नमन भी
उनके नाम पर वोट मिल जाते हैं इसलिए ज्यादातर करते हैं।

              महात्मा गांधी के कहने भर से देशवासियों ने विदेशी कपड़ो की होली जला दी
और खादी  के वस्त्र धारण कर लिए ,क्यों हुआ होगा उस समय ऐसा ? क्योंकि उस नेता में
देश प्रेम छलकता था और देशवासी उसका अनुकरण करते थे। गांधी ने कुटीर और लघु
उद्योगों के द्वारा देश के विकास का खाका खींचा क्योंकि गांधी को मालुम था भारत के प्राण
गाँवों में बसते हैं मगर इस विचारधारा को तुरंत ही  हांसिये पर धकेल दिया गया।

              गांधी ने फिरंगियों को बाहर किया ताकि देशवासियों का शोषण भविष्य में ना हो।
क्या उस समय भारत की गरीबी को गांधी नहीं जानते थे?गांधी जानते थे की गरीबी और
गरीब की मज़बूरी क्या होती है इसीलिए तो वे अध नंगा फकीर बने रहे। जो व्यक्ति भारत
की गरीबी को जानता हो क्या उसके पास उसका समाधान नहीं था? समाधान था,इसीलिए
गांधी कुटीर और लघु उद्योग चाहते थे ,सबको स्वाभिमान से जीता देखना चाहते थे,मगर
उनकी नीति को नहीं अपनाया गया इसलिए आज गरीब मिटता जा रहा है।

             अब बात FDI की ,सरकार तर्क देती है कि FDI से बिचोलिये खत्म हो जायेंगे।
यह बात सच है कि करोड़ो बिचोलिये खत्म हो जायेंगे,आत्म हत्या कर लेंगे या भिखारी
बन जायेंगे;मगर ये बिचोलिये हैं कौन? क्या वे भारतीय लोग नहीं हैं या ये विदेशी लोग हैं।
करोड़ो भारतीयों को बिचोलिये  बना कर सरकार उनकी रोटी छिनना क्यों चाहती है?जो
लोग खुद की व्यवस्था बना कर ,खुद की अल्प पूंजी लगाकर,खुद पुरुषार्थ और मेहनत कर
सरकार पर बिना भार बने अपना परिवार पाल रहे हैं वो बिचोलिये कैसे हो सकते हैं वो
तो भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग हैं।उन करोड़ो भारतीयों को बेरोजगारी के खप्पर
में क्यों होमना चाहती है सरकार?

           सरकार का दूसरा तर्क है कि बिचोलिये जब हट जायेंगे तो भारतीयों को सस्ते दामों
पर वस्तुए उपलब्ध हो जायेंगी।किन भारतीयों के लिए चीजें सस्ती होगी? 90%गरीब लोगों
के लिए या 10%अमीर लोगों के लिए ?क्योंकि 90% भारतीय तो गरीब है।क्या भारत में जीने
का वास्तविक अधिकार 10% के लिए ही होना चाहिए ?क्या सिर्फ 10%लोगो के लिए FDI
को लाकर 90%लोगो का शोषण वाजिब होगा?

           सरकार कहती है कि किसान FDI को अपना माल ऊँचे मूल्य पर बेच कर शोषण
मुक्त हो जाएगा ,क्या FDI समर्थित मूल्य से ऊपर दाम किसानो को देगा ?भारत की खेती
छोटे-छोटे भूमि के टुकडो में बँटी हुई है।ज्यादातर किसानो के पास पाँच -सात एकड़ जमीन
भी नहीं है।यदि एक एकड़ में तीन से चार बोरी गेंहू का उत्पादन मान लिया जाए तो 20-25
बोरी गेंहू किसान की पैदावार हुयी ,उसमे से किसान अपने उपयोग के लिए 10-12 बोरी गेंहू
रख लेता है और बाकी बाजार में बेचता है तो क्या FDI गाँव-गाँव जाकर वह धान लेगी ?
हर खेत की उपज का दाना अलग-अलग होता है ,क्या FDI सबके अलग-अलग किस्म के
धान को ऊँचे भाव में खरीद पाएगी?अगर नहीं तो फिर उस धान को कौन खरीदेगा ?बिचोलिये
को तो आप खत्म कर देंगे!

            सरकार कहती है किसान की फसल का 30-35%भाग वर्तमान में नष्ट हो जाता है।
कैसे हो जाता है ?जो किसान दिन रात मेहनत करके सोना उपजाता है वह उसे नष्ट होने देगा ?
किसान  की फसल में प्रमुख रूप से चावल,गेंहूँ मक्का,बाजरा,जीरा,सरसों,चना,मुंग आदि दाले
आती है ,क्या ये फसलें सड़ के खराब हो जाती है?.....फिर क्यों अनर्गल बातें की जाती है।

किसान सब्जियों में आलू,प्याज,लहसुन बड़ी मात्रा में पैदा करता है उसको सहेजने के लिए
कोल्ड स्टोरेज गाँव-गाँव में चाहिए,क्या FDI गाँव-गाँव में कोल्ड स्टोरेज का निर्माण करेगी
और कहेगी -हे किसान!तुम कोल्ड स्टोरेज में अपनी फसल रख लो और जब सही भाव आये
तब बेच लेना!! जो काम सरकार को करना चाहिए वह तो हो नहीं रहा और हम दूसरों के भरोसे
देश को छोड़ देना चाहते हैं।

             सरकार कहती है कि कोई नुकसान देश को नहीं होगा,देश की तरक्की होगी FDI के
आने से ?क्या FDI कोई परोपकारी संस्था है जो अपने देश का धन भारत में लुटाने आयेगी ?
FDI भारत से कमा कर अपने देश में धन ले जाने के लिए आएगी। FDI की दुकाने हर गली
नुक्कड़ में नहीं लगने वाली है इसलिए सब खुदरा व्यापारियों को नुकसान नहीं होगा,यह
सरकार कहती है,मगर 100/-के पिज्जा बर्गर की होम डिलेवरी करने वाली FDI 1000/-के
सामान की होम डिलेवरी नही करेगी?कीमतों को डम्पिंग करके छोटे किराना को नहीं डकार
जायेगी?

       हमारा ही आलू ,हमारा ही प्याज,हमारा ही आटा , मैदा ,हमारे ही आदमी उनका सिर्फ
बनाने का तरीका और उसके बदले में ले लिया चोखा नफा ...यह है FDI .  
                 

9.2.12

सच को क्यों मारा जा रहा है


२७ फरवरी २००२ को गोधरा रेलवे स्टेशन पर अयोध्या से लौट रहे हिन्दू तीर्थयात्रियो से भरी
रेलगाड़ी के एक डिब्बे में आग लगाकर ५९ यात्रियों को मारने वाले किस धर्म के लोग थे और
उन्होंने बेकुसूर ५९ तीर्थयात्रियो को जिनमे २५ महिलाए और १५ बच्चे भी शामिल थे
उनको जिन्दा किस मजहब के लोगो ने और क्यों जलाया ?

इस बात पर न्याय अंधा हो जाता है ,क्यों ?

हिन्दू यात्रियों को जिन्दा जलाया गया इस बात पर  आततायियो को कोई दोषी क्यों नहीं मान
रहा है जिन्होंने यह अधम कृत्य किया था ,उनकी कहीं चर्चा नहीं होती ;

इस बात पर न्याय भी बहरा हो जाता है, क्यों ? 

क्या हिन्दू की जान गयी वह कीमती नहीं थी ,

इस बात पर न्याय पट्टी बाँध लेता है ,क्यों?

पूरा गुजरात इस सच को जानता है और बार बार मोदी को चुनकर भेजता आया है 
क्योंकि गुजरात छद्म धर्मनिरपेक्षता और धर्मनिरपेक्षता को अच्छी तरह समझता है  
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इन दंगों में कुल १०४४ लोग मारे गए, जिनमें ७९० मुस्लिम और २५४ हिन्दू थे.
२५४८ घायल, २२३ लापता, ९१९ महिलायें विधवा हुईं और ६०६ बच्चे अनाथ. 
सात साल बाद लापता लोगों को भी मृत मान लिया गया और मृतकों की संख्या 
१२६७ हो गयी.पुलिस ने दंगों को रोकने में लगभग १०००० राउण्ड गोलियां चलायीं,
जिनमें जिनमें ९३ मुसलमानों और ७७ हिन्दुओं की मौत हुई. दंगों के दौरान 

१७९४७ हिन्दुओं और ३६१६ मुस्लिमों को गिरफ्तार किया गया बाद में कुल

मिला कर २७९०१ हिन्दुओं को और ७६५१ मुस्लमों को गिरफ्तार किया गया.

ये आंकड़े http://en.wikipedia.org/wiki/2002_Gujarat_violence साईट से मिले हैं.

ये आंकड़े सरकारी हैं और गैरसरकारी आंकड़ों के हिसाब से २००० से ज्यादा लोग

इन दंगों में मारे गए, लेकिन हमेशा ही गैर सरकारी आकडे सरकारी आंकड़ों

से ज्यादा होते हैं……..पर महत्वपूर्ण विषय ये है यदि सरकार और पुलिस मूक 

दर्शक बनी थी या हिन्दुओं का साथ दे रही थी तो पुलिस की गोली से ७७ हिन्दुओं

की मौत कैसे हो गयी…….. पुलिस ने २७००० से अधिक हिन्दुओं को क्यों गिरफ्तार किया जबकि मुस्लिमों को कम ……?


1.2.12

क्या मुसलमानों के साथ नाइंसाफी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार है?


क्या मुसलमानों के साथ नाइंसाफी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार है?

क्या मुसलमानों के साथ नाइंसाफी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार है?

यह सवाल खड़ा किया है भविष्य में भारत का प्रधानमंत्री बनने का सपना (दिवास्वप्न ) देखने वाले 
युवा ने .जो लोग इस बयान की तरफदारी करते हैं वो तथाकथित धर्म निरपेक्ष हो सकते हैं.

क्या हिन्दू हित की बात करना मुस्लिम विरोध करना है ?इस देश का हिन्दू यदि अपने देश में अपने 
हित की बात नहीं सोचेगा तो क्या पाक में जाकर सोचेगा .

कश्मीरी हिन्दू शरणार्थियों की कोई बात नहीं करता है?क्यों? क्या कश्मीर में पैदा होना ही उनका 
गुनाह है .१९९० से आज तक उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी के रूप में दर-दर भटकना पड़ रहा है ?
क्या किया हमारी धर्म निरपेक्ष सरकार ने उनके लिए ?क्या मुस्लिम चाटुकारिता ही धर्म निरपेक्षता  
 है .ऐसी धर्मनिरपेक्षता से क्या भला होगा हमारे वतन का ?आज इस देश का नाम हिन्दुस्थान 
यदि सुनना है तो पाक चेनल या रेडियो सुनना पडेगा ,हमारे यहाँ तो "हिन्दुस्थान "नाम लेना  भी 
सांप्रदायिक हो सकता है .

करोडो हिन्दुओ पर शासन करने का सपना है उनका,किसकी बदोलत ?हिन्दुओ का जाती आधारित 
वर्गीकरण करके तथा अल्पसंख्यक वोट बैंक को मिला कर शासन करना क्या धर्म निरपेक्षता है?

इस देश में तथाकथित धर्म निरपेक्ष सरकारे रही है उन्होंने क्या किया अल्पसंख्यक समाज के लिए ?
सिर्फ सत्ता प्राप्ति के लिए किसी कौम को गुमराह करते रहना क्या धर्म निरपेक्षता है?क्या ऐसी धर्म 
निरपेक्षता स्वीकार की जानी चाहिये जो विभिन्न धर्मो में वैमनस्य फैलाये,किसी धर्म विशेष के लोगो 
में जातिगत भेदभाव फैलाये .

राष्ट्रिय स्वयसेवक संघ ने कब सत्ता के लिए चुनाव लड़ा ?संघ ने कब "फतवे" जारी किये ?संघ ने कब
मुस्लिम विरोध किया ?संघ ने राष्ट्र प्रेमी मुस्लिम  को स्वीकार किया है ,मानवता प्रेमी इसाई को
स्वीकारकिया है .इस देश की प्रगति के साथ जुड़े हुए हर कौम के लोगो के साथ संघ हर समय खड़ा
रहता है .

जो लोग इस देश में रहकर भी इस देश के होना नहीं चाहते ,जो लोग इस देश में रहकर भी हिन्दुओ 
का धर्म परिवर्तन करने की नापाक कोशिश करते हैं जो लोग धर्म और बहुसंख्यक समुदाय का खोटा
भय दिखाकर खुद का स्वार्थ साधना चाहते हैं वो लोग विकृत सोच के जीव हैं ऐसे लोग ना तो किसी 
कौम का भला करते हैं ना ही हिन्दुस्थान का भला करने वाले हैं .      

18.12.11

हिन्दुस्तान कब कहेगा ..............?

हिन्दुस्तान कब कहेगा ..............?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है कि ब्रिटेन एक ईसाई देश है और ''हमें ये बताने
 में डरना नही चाहिए''.


सवाल यही से उठता है हम विश्व को कब कहेंगे कि भारत भी हिन्दू राष्ट्र है.हमारे नेता अपने 
को सर्वधर्म का सिर्फ सन्देश सुनाते हैं मगर तुष्टिकरण कि राजनीति करते हैं.

जब ये लोग मंच से मुस्लिम तुष्टिकरण कि बात सार्वजनिक रूप से करते हैं तो कोई भी दल 
यह कहने का साहस नहीं करते हैं कि ये गलत है, यह अन्याय है, पक्षपात कि राजनीति है.


आज हिन्दू अपने ही देश में बेगाना हो गया है ,नेता लोग एक ही भाषा समझते हैं -वोट 
और वोट बैंक. हिन्दू भी यदि संगठित रूप से वोट बैंक बन जाए तो क्या मजाल हिन्दू हित 
कि अनदेखी हो, मगर हिन्दू कि आपस कि लड़ाई ही उसे डूबा रही है.


क्या दलित, अनुसूचित जनजाति,जनजाति ये सभी हिन्दू नहीं है ?मगर हिन्दुओ को आपस में 
लड़ाकर विभेद पैदा किया जा रहा है और राजनीति कि रोटियाँ सेकी जा रही है .


आरक्षण के नाम पर ,जाती के नाम पर ,धर्म के नाम पर हिन्दू हितों को ही कोसा जाता है ?
कोई दल यह नहीं कहता कि आरक्षण का आधार जाती नहीं आर्थिक स्थिति होनी चाहिए ?


जाती के नाम पर दलित,अगड़ा,पिछड़ा ,जनजाति ,अनुसूचित जाती ये सब हिन्दुओ को तोड़ने 
या कमजोर करने वाली बातें है.


जब कोई नेता ऐसी बातें मंच से करता है तो कोई भी आवाज नहीं होती है,ये कैसा सर्वधर्म 
समभाव है ?एक को सुविधा और एक कि अनसुनी .


दोष भी हिन्दुओ का है क्योंकि वे वोट बैंक नहीं हैं .    

24.11.11

भारत भाग्य विडम्बना


भारत भाग्य विडम्बना  

हमारे देश को अर्थहीन नीतियाँ डस रही है .मनमानी नीतियाँ और विधेयक  आम जनता पर थोप दिए जा
 रहे हैं ,उनके कुपरिणाम ५%जनता को छोड़कर आम नागरिकों को भुगतने पड़ रहे हैं .आम आदमी त्रस्त 
और बेहाल है .भारत के नीति नियंता अहंकार और परिवारवाद में रचे पचे हैं .

कुछ बानगियाँ   

१.करोडो फुटकर व्यापारी जो जैसे तैसे १-२लाख रूपये का जुगाड़ बैठाकर अपने परिवार को दौ समय की 
  रोटी मुहैया कराते हैं अब उस क्षेत्र को भी विदेशी हाथो में सुरक्षित किया जा सकता है ,अब हमारे देश के 
  उत्पाद विदेशी लोग पहले लागत मूल्य पर या मोटी संख्या में सस्ते में खरीद कर हमें ऊँचे दामों में बेचेंगे.
  नतीजा यह आयेगा की धीरे धीरे करोडो दुकाने बंद हो जायेगी और करोडो घर दौ समय की रोटी के लिए 
 मारे मारे फिरेंगे या अकुशल श्रमिक बनकर मनरेगा में काम करते हो जायेंगे .इसमें देश का क्या फायदा 
 होगा?शायद ५%जनता को सुविधा होगी .अगर ऐसे ही विधेयक बनते रहे तो आम आदमी का क्या होगा ?
 क्या भारत के विकास की गाथा हम नहीं लिख कर विदेशी लिखेंगे .एक इस्ट इंडिया को हटाने में 
लाखों लोगो ने जान की कुर्बानी दी थी तो अब तो लाखों विदेशी कम्पनियां हमारा क्या हाल करेगी ? क्या 
हम नादानी भरे कदम उठाकर कुर्बानियां ही देते रहेंगे? 


२. अर्थ शास्त्र का सामान्य नियम है कि बड़ी मछली छोटी मछलियों को निगल जाती है .हमारे देश के प्रधान 
  तो खुद अर्थशास्त्री हैं .कैसा विकसित भारत चाहते हैं ? आम आदमी के समझ से परे है.भारत के प्राण आज 
  भी गाँवों में ही बसते हैं यदि उन प्राणों पर ही संकट आ जाएगा तो भारत कि तगदिर क्या होगी ?आज हर 
 चीज का केन्द्रीयकरण होता जा रहा है .देश का पैसा अमीरों के हाथों में जा रहा है .गरीब को ३२/- वाला धनी
 बनाया जा रहा है ,बढ़ता आर्थिक असन्तुलन भयावह भविष्य कि और खिंच रहा है ,गाँवों में उद्योग पनप ही 
नहीं रहे हैं क्योंकि वंहा बुनियादी सुविधाओं का खाका ही तैयार नहीं किया जा रहा है .मज़बूरी में गाँवों कि दौड़ 
  शहरों कि तरफ है और हमारे नेता हैं कि एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर कर्तव्य कि इति श्री कर लेते 
हैं.जनता बेचारी हर एक को आजमाकर थक चुकी है ,कही क्षितिज नजर नहीं आ रहा है.


३.हमारे देश में अरबों रूपये सालाना कमाने वाली कम्पनियों पर भी ३०% टेक्स है और उच्च मध्यम वर्ग के 
   लोगो पर भी कुछ सीमा कि राहत के बाद ३०% टेक्स है .क्या उच्च में वर्ग और अरबों रूपये सालाना कमाने 
  वाली कम्नियों का एक ही स्तर है ? लेकिन वसूली के लिए यही वर्ग है .सौ बड़े घराने लाखों करोड़ रूपये बैंकों 
 से कर्ज लेकर वापस नहीं कर रहे हैं या उन पर कोई दबाब नहीं है परन्तु एक किस्त समय पर नहीं भरने वाले 
 को डी फोल्टर लिस्ट का भय सताता है .२-३ किस्तों का समय पर भुगतान नहीं कर पाने वाला तो बेहाल हो 
 जाता है 


४.दवा पर छपी MRP को ही ले लीजिये .सरकार कहती है जीवन रक्षक दवा को टेक्स मुक्त किया जाएगा .मेरे 
ख्याल से दवा होती ही जीवन रक्षक है.सरकार हर दवा को टेक्स मुक्त करे और MRP का नियम तय करे .
आज दवा पर ४०से ५०% तक ज्यादा रेट लिखी रहती है ,क्यों ? दवा जैसे क्षेत्र पर कोई पाबंदी नहीं ,मनमर्जी 
का रेट छाप दे और मजबूर भारतीय ठगाता रहे .


५.पीने का बोतल बंद पानी १२ से २० रूपये लीटर में रिटेल में बिकता है ,हमारा ही पानी जमीन से खिंच कर 
हमें वापिस इतने महंगे दाम पर खरीदना पड़ रहा है ,कारण सरकार पीने के पानी कि समुचित व्यवस्था करने 
 में विफल रही है ,बेचारा मजदुर जब रोजी रोटी के लिए बाहर यात्राएं करता है तो उसका धन पानी में खर्च हो 
जाता है ,लेकिन किसी को पड़ी नहीं है .


६.हमारे देश के पानी को ठंडा पेय वाली कम्पनियां बर्बाद कर रही है .जिस देश में सभी को पीने योग्य पानी 
नहीं मिल पा रहा है उस देश को ठंडा पेय बनाने वाली कम्पनियों कि कँहा आवश्यकता है ?मगर राजस्व के 
बहाने लाखों लीटर पानी हर दिन बर्बाद होने दिया जा रहा है और लोग पानी को तरसते हैं.


७.आज हर कौम जब शान्ति से जी रही है ,अपने अपने जीवन यापन में लगी है ऐसे में साम्प्रदायिकता का 
विधेयक लाने कि तैयारी क्यों हो रही है ?क्या हम भारतीय रोजी रोटी को छोड़ फिर जातीवाद पर खून 
खराबा करे ? अरे!जीने दो सबको ,अपनी दूकान चलाने के लिए बिना जरुरत के कानून ना लाओ .तू हिन्दू ,
तू मुस्लिम ,तू दलित ...............क्यों मानवता में विभेद पैदा कर रहे हो ?यदि कानून ही जातिवादी हो 
जाएगा तो मानवता कहाँ जायेगी  .


८.काम हो तो हंगामा और काम नहीं हो तो हंगामा .कैसी स्तरहीन राजनीति पनपती जा रही है .सिर्फ तू -तू 
मैं-मैं .जनता कि समस्याओं से किसी को लेना देना नहीं .देश के विकास कि कोई बात नहीं .हर सत्र में लोक 
-सभा हंगामे कि भेंट चढ़ जाती है .करोडो रूपये स्वाहा हो जाते हैं .चोरो के बचाव कि तोड्जोड़ में सत्र ख़त्म .
सब पार्टियों को मत कि बेजा फिकर मतदाता कि किसी को पड़ी नहीं .मतदाता फटेहाल है तो है मगर वह 
हमें वोट देकर निहाल कर दे ,बस यही चाहते हैं पक्ष -विपक्ष के लोग ......
                        

14.11.11

क्या अन्ना जनता में नैतिकता जगा पायेंगे ?

क्या अन्ना जनता में नैतिकता जगा पायेंगे ?


अन्ना टीम की आपसी खेंचतान से यह सवाल मुखुर हो उठता है की टीम अन्ना का ये हश्र क्यों हो रहा है?
क्या कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा सदस्यों में घुस आई है? क्या अन्ना की लोकप्रियता को लोग अपनी 
निजी लोकप्रियता में तब्दील करना चाहते हैं ?क्या अन्ना रूपी बरगद अपनी डालियों के भार से दबा जा 
रहा है?

आम भारतीय अन्ना के साथ क्यों जुड़े थे ?-- अन्ना के साथ निर्धन मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग दिल 
से जुड़ा था और इनके जुड़ने का कारण इनकी प्रमुख समस्याए थी जिनमे भ्रष्टाचार ,महंगाई और दिन -
प्रतिदिन सरकारी नीतियों से हो रही उसकी माली हालत मुख्य थी .आज जब देश में आर्थिक असमानता 
बढती जा रही है उच्च मध्यम वर्ग जैसे तैसे अपनी आबरू ढक रहा है मध्यम वर्ग तो नीचे के पायदान 
पर फिसल चुका है और गरीब मध्यम वर्ग तो बेहाल है .इस परिस्थिति में सभी दलों के राजनेता अपनी 
डफली अपना राग अलापने में व्यस्त हैं ,कुर्सी की खेचतान में डूबे हैं या फिर अपने काले कारनामो पर 
रेशमी परदे ढकने में लगे हैं तो इस पीड़ित विशाल वर्ग की कौन सुने और ऐसे समय में जब अन्ना ने 
हुंकार भरी तब ये सभी अन्ना के साथ सुर में सुर मिला कर मैदान में डट गए ,ये सब इतने बड़े पैमाने 
पर हो जाएगा ये ना तो अन्ना ने सोचा ना किसी राजनैतिक  पंडित ने .

मेरे ख्याल से आम भारतीयों को लगा अब उसके दिन फिरने वाले हैं ,आने वाले दिनों में व्यवस्था में बड़ा 
बदलाव आयेगा जिससे उसका काम आसान हो जाएगा ,उसे रिश्वत से निजात मिल जायेगी ,सरकारी 
दफ्तरों में काम तुरंत हो जाएगा और देश के भ्रष्ट नेताओं नेताओं का विदेशों में जमा काला धन पुन:देश 
की तिजौरी में जमा हो जाएगा इन सबके परिणाम स्वरूप उसकी दयनीय स्थिति में सुधार हो जाएगा 
मगर जब अन्ना ने आन्दोलन को स्थगित करने की घोषणा की उसके बाद उनके आन्दोलन पर प्रमुख 
राजनैतिक दल ने बेफाम हमले किये और अन्ना टीम को आपस में उलझा दिया .

अन्ना की  टीम के लोग अहंकार के मद में डूबकर मनमर्जी का विधान करने लगे जैसे वे ही भारत हैं.
उनके अटपटे विधानों ने इस मध्यम वर्ग को पुन: हताश किया है .जनलोकपाल के लिए जब अन्ना ने 
कांग्रेस के खिलाफ हुंकार भरी तो लोगों को लगा की "अन्ना यहाँ गलती कर रहे हैं "क्योंकि अन्ना यह 
तो कह सकते थे की कांग्रेस को वोट मत दो मगर यह नहीं कह पाए की अमुक चयनित उम्मीदवार को 
वोट दे क्योंकि यह खरा और सेवाभावी इंसान है .यदि अन्ना के पास "नैतिक या ईमानदार लोगो का 
टोटा है तो अन्ना को पहले अच्छे लोगों पर ध्यान केन्द्रित करना था जो देश की तस्वीर बदलने में 
सक्षम हो मगर अन्ना ने एलान कर दिया की हिसार के बाद आने वाले राज्यों में चुनाव से पहले यदि 
 जनलोकपाल नहीं लाया गया तो केंद्र सरकार का विरोध करेंगे .

अन्ना  के अधिकार में कांग्रेस का विरोध करना तो है मगर अन्ना का पवित्र कर्तव्य भी यह बनता है 
की वो आम भारतीयों को बताये की किस उम्मीदवार को वोट करे .अन्ना यह तो अच्छी तरह से जानते 
हैं की इस समय भारत के जितने भी राजनैतिक दल हैं उनमे से कोई भी दल दूध का धुला हुआ नहीं है 
फिर अन्ना किस दल को वोट देने की बात कहेंगे ?इस यक्ष प्रश्न का सही जबाब अन्ना टीम या आम 
भारतीय के पास भी नहीं है और यही कारण है की मतदाता एक बार फिर ज्यादा काला और कम काला 
के फेर  में पड़ जाएगा .

आदरणीय अन्ना ,प्रश्न जनलोकपाल कानून के बनने का तो है ही ,लेकिन गर्त में जा चुकी नैतिकता और 
हमारे जीवन से दफन हो रहे सदाचार का भी है क्योंकि इन दौ गुणों की पुष्टि के बिना हर कानून लंगडा 
हो जाता है .सदाचार और चरित्र का निर्माण किसी कानून के बन जाने से विकसित नहीं होते इसके लिए 
शिक्षा और मूल्यों में आमूल चुल परिवर्तन की आवश्यकता है .हमारे देश में मूल्य हीन विद्धवानो का 
टोटा नहीं है ,सिर्फ जीवन मूल्यों का टोटा है .क्या अन्ना पुरे भारत में यह अलख जगा सकेंगे ?कर सकेंगे 
इस संकल्प की पूर्ति का सफल प्रयास ?  

सिर्फ पत्तियों को पानी देने से क्या होगा ?सवाल जड़ को सींचने का है ? सवाल उच्च नैतिक मूल्यों और 
सदाचार की पुन: स्थापना का है ?बिना इनके कानून क्या कर सकेगा .