29.6.13
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Suresh Trehan
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मोदी गुजरातियों को ले गए जिनके प्रति वे वहाँ के मुख्यमंत्री होने के नाते उत्तरदायी हैं तो राजनीति हो गयी । और आंध्र प्रदेश के नेता एयर पोर्ट पर आन्ध्र प्रदेश के आपदा पीड़ितों को लेने के लिए लड़ते नजर आये तो समाज सेवा हो गयी । उनसे किसी ने नहीं पूछा कि भाई बाकियों को क्यों नहीं ले जा रहे हो । सिर्फ आन्ध्र वासियों को ही क्यों ? मोदी आजकल ऐसे टारगेट हो गए हैं कि सब मिलकर मोदी से घबराए हैं और कोई मौका नहीं चूकते ।
मोदी को पैदल जाने की इजाजत नहीं , राहुल के लिए रास्ता साफ़ , क्यों ? यह राजनीति क्यों नहीं है ? अपने अमूल बॉय को आप जाने देते हैं ताकि चुनाव में फायदा उठाया जा सके । क्या जनता वास्तव में इतनी ही बेवकूफ होती है जितना नेता इन्हें समझते हैं ? हैरानी होती है । लेकिन एक बात तो तय हैकि राहुल को वहाँ लोगों ने जो खरी खोटी सुनाई है वह राहुल याद तो जरूर रखेंगे और अपने मातहत कांग्रेसियों को समझा कर रखेंगे कि आगे से ऐसा न हो ।
खैर , कुल मिलाकर कई बार राजनीति हमारी दृष्टि में होती है , वस्तु स्थिति में नहीं । अगर वास्तव में हमारा दृष्टिकोण बात बात में राजनीति न ढूँढता तो आज लोग वहाँ आपदा में भूखे प्यासे न मरते । क्योंकि यह राजनीति ही तो हमारी लाल फीताशाही को भी बर्बाद कर रही है ।
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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स्वार्थ बुद्धि -श्रीमद भगवत गीता
यह सँसार दौ मुख्य कारणों के इर्द गिर्द चल रहा है पहला मोह और दूसरा स्वार्थ।पशु में इन
दोनों चीजो का अभाव होता है मगर मनुष्य में ये होती ही हैं ,इनके अभाव हो जाने से शायद
सृष्टि का विकास भी खत्म हो सकता है।प्रश्न यह उठता है कि फिर श्री कृष्ण ने मोह और
स्वार्थ दोनों से दूर रहने को ही सही क्यों माना और अपने उपदेश में दूर रहने को ही सही
क्यों बताया ?
इस प्रश्न से पहले हमें इन दोनों शब्दों के अर्थ समझ लेने चाहिए ताकि हम इस प्रश्न के हल
की ओर बढ़ सके।
मोह -किसी वस्तु ,पदार्थ या जीव में आसक्ति और मेरापन
स्वार्थ -स्वयं की प्रसन्नता के लिए किये जाने वाले कामना युक्त कर्म ,ऐसे कर्मो के अन्दर
अन्य लोगों का अहित छुपा रहता है
इन दोनों से बिलकुल अलग है प्रेम और परमार्थ।प्रेम में मेरापन नहीं होता ह्मारापन होता
है और परमार्थ में शुभ कर्म ही निहित होते हैं।प्रेम में देने का भाव होता है प्रतिफल की इच्छा
नहीं होती।प्रेम में त्याग की भावना होती है प्रेमी से सुख पाने की लालसा नहीं होती।परमार्थ
में काम करने से पहले यह सोचना होता है की उस कर्म के करने से किसी का अहित तो नहीं
होगा।परमार्थ में कर्म के प्रभाव को पहले ध्यान में लिया जाता है और उसके बाद खुद के हित
को देखा जाता है।
अब हम मूल विषय पर आते हैं कि शुभ कर्म क्या है और स्वार्थ क्या है।शुभ कर्म
में अच्छे साहित्य का अध्ययन,शुभ कर्म से अर्जित सम्पति से दान,इंद्रियों में संयम यानि
तप,शरीर से लोकोपयोगी काम करना।स्वार्थ बुद्धि में भी कर्म करना पड़ता है परन्तु अन्य
के हित का ध्यान नहीं रखा जाता, शुभ -अशुभ सभी कर्मो से सम्पति का अर्जन करना और
स्वयं के सुख के लिए भी कंजूसी से खर्च करना दान तो बहुत दूर की बात है, इन्द्रियों का
दुरूपयोग करना हरेक इंद्री में असंयम,और शरीर से स्व हित के कर्म करना।
भगवान् गीता में मोह से परे हटकर विवेक का उपयोग करते हुए कर्म को पूरा
करने का उपदेश देते हैं।एक पिता को अपना पुत्र बहुत प्यार होता है,पुत्र पर स्नेह होने के
कारण पिता अपने पुत्र के ना करने योग्य काम पर टोकता नहीं है ,पुत्र को उचित दंड नहीं
देता है तो क्या वह अपने पुत्र का भला कर रहा होता है ?पुत्र चोरी करता है ,झूठ बोलता है
शराब पीता है ,जुआ खेलता है और पिता मोह के वशीभूत पुत्र के कुकर्मो पर आँख पर पट्टी
बाँध लेता है तो क्या वह अपने पुत्र का प्रेमी या हितेषी कहलाता है ?पैसे कमाने के लोभ में
संतान अपराध करता है,अराजकता के काम करता है,दुराचार करता है और माँ -बाप मोह
के कारण सब कुछ सह लेते हैं मगर क्या इसमें संतान का भला होता है ?अगर बाप जज हो
और बेटे ने किसी अबला के साथ दुराचार किया हो और उसका फैसला उसी बाप की कलम
से होना हो और वह बाप अपने अधिकारों का दुरूपयोग करके पुत्र के पक्ष में फैसला दे देता
है तो क्या वह पुत्र का भला कर रहा होता है।मोह से विवेक मंद पड़ जाता है विवेक के नष्ट
होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और कुबुद्धि से लिया गया निर्णय पतन का हेतु बन जाता है।
स्वार्थ का त्याग का मतलब यह नहीं कि हम जो भी अर्जित करे उसे दुसरो पर लुटा
दे या खुद कष्ट सह कर भी दूसरों का हित साधते रहे।श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध में खड़े हो
जाने की बात कही है यह नहीं कहा कि इस नर संहार से अच्छा है साधू बन जाना।हम जो
भी कर्म करे उनको करने से पहले इतना विचार जरुर कर लेना चाहिए कि मेरे द्वारा किये
जा रहे काम से किसी कमजोर का अहित तो नहीं होगा ना।मेरे काम से मुझे तो शुभ फल
प्राप्त हो मगर उसका प्रभाव दुसरो पर हितकारी रहे ,अन्यों को भी लाभ हो।भगवान् राम
यदि राज्य के लोभ में पड़कर पिता दशरथ को बंदी बना लेते और शासन खुद संभाल लेते
तो क्या वह आज हमारे पूजनीय होते ?जब भरत उनके पास जाकर राज्य संभालने की
जिद करते हैं और श्री राम उनकी बात को मानकर वनवास त्याग राज्य की धुरा खुद के
हाथ में ले लेते तो क्या आज हम उनको पूजते ?
जब भी हम कर्म करते हैं तब दुसरो के सुख को भी ध्यान में रख लेते है तो वह
काम लक्ष्य तक पहुँच जाता है और उस काम को पूरा करने में सहयोग भी सभी से स्वत:
ही मिल जाता है।जिस कर्म को करने में दुसरो के हित का ध्यान रखा गया तो निश्चित
जानिये उस काम के परिणाम में उस काम को करने वाले का भला होता ही है क्योंकि सूत्र
यह कहता है कि अच्छे काम का परिणाम कभी भी खुद के लिए बुरा हो नहीं सकता।कर
भला तो हो भला
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28.6.13
कर्तव्य का अभिमान -श्रीमद भगवत गीता
श्रीमद भगवत गीता में श्री कृष्ण कहते हैं की कर्म की आसक्ति से,सफलता या असफलता के
भाव से परे हटकर कार्य किया जाए तो समता भाव आता है।किसी कार्य को करने से पहले
यदि हम उसे कर्तव्य निर्वाह मान कर शुरू करे और जब तक वह कार्य सम्पूर्ण नहीं हो जाता
तब तक सफलता या असफलता के भाव से दूर रहकर करे तो उसे कार्य कुशलता कहा जाता
है ,क्योंकि हमारा मस्तिष्क इस तरीके से काम करने पर बंधन में नहीं रहता है ,कोई बोझ
यदि मन पर नहीं है तो वह कार्य पूर्ण होने पर यज्ञ बन जाता है।यदि किसी परिणाम से बंध
कर हम काम शुरू करते हैं तब हमारी कार्य क्षमता कम हो जाती है ,खुद पर श्रद्धा कम हो जाती
है।परिणाम से बंध कर कार्य करने पर हम शंका में फँस जाते हैं और नकारात्मक चिंतन करते
हैं,इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम लक्ष्य रहित या लापरवाही से काम को अंजाम दे।हमारे
कर्तव्य की योजना स्पष्ट,समयबद्ध और सुनियोजित होनी चाहिएलेकिन उसका परिणाम
उस योजना के पूरा हो जाने के बाद ही देखना चाहिए।
दौ अलग -अलग व्यक्ति एक ही प्रकार के काम को शुरू करते हैं उसमे एक
व्यक्ति सफल हो जाता है और दूसरा असफल,ऐसा क्यों होता है ? इसका कारण उस विषय के
प्रति पूर्ण जानकारी का भिन्न होना भी हो सकता है या उस काम को करने के ढंग में अंतर हो
सकता है।उस काम को करते समय एक व्यक्ति उसके परिणाम को अपनी इच्छा के अनुकूल
आने की चिंता के साथ करता है और दूसरा उस काम को कुशलता से पूरा करने के नजरिये से
करता है।काम को कुशलता पूर्वक करने के नजरिये से करने वाला सफल ही होता है और इसी
को भगवान् कर्म यज्ञ कहते हैं।
कर्म या तो शुभ होते हैं या अशुभ। शुभ कर्म ही कर्म यज्ञ कहलाते हैं।अब
प्रश्न यह उठता है कि शुभ कर्म से तात्पर्य क्या,किसे शुभ कर्म माने और किसे अशुभ।देश की
रक्षा के लिये किया गया शत्रु वध शुभ कर्म होता है जबकि स्वार्थ की पूर्ति के लिए किसी की
हत्या करना अशुभ कर्म हो जाता है।शुभ कर्म का आशय यह है कि ऐसे काम जिसके करने से
किसी निर्दोष का अहित नहीं हो और परिणाम भी सुन्दर हो।एक चोर ने एक महिला का हाथ
काट कर उसके हाथ में पहनी सोने की चूड़ी लूट ली और दुसरे दृश्य में एक सर्जन डॉक्टर ने
किसी मरीज की जान को बचाने के लिए उसकी दोनों टाँगे काट दी,अब हम किस कर्म को शुभ
और किसे अशुभ कहेंगे ?
सभी कर्म यदि शुभ भाव से ,सच्ची निष्ठां से किये जाते हैं तो वह यज्ञ है और
यज्ञ ही पूजा है।श्री कृष्ण कहते हैं-फल की इच्छा,आसक्ति,कामनाऔर कर्तव्य के अभिमान से
रहित होकर कर्म करने के लिए कर्म करे।प्राय: मनुष्य कर्म करने से पहले यह सोचता है कि
मेरा भला हो या मेरा भला हो चाहे दुसरे का अहित हो जाए या मेरा भला ना हो तो दुसरे का भी
भला ना हो या मेरा भला हो तथा दुसरे का भी हित हो या चाहे मेरा अहित हो जाए मगर दुसरे
का भला हो।सबसे अंतिम सोच लोक कल्याण की भावना है जिसके उदाहरण बहुत कम वर्तमान
में मिलते हैं क्योंकि ये लोक शिक्षा के कर्म है मगर भगवान् कहते हैं की तुम इस भाव से कर्म
नहीं करोगे तो भी मैं तुम्हारे कर्म को यज्ञ मान लूँगा यदि तुम निर्लिप्त भाव से उन्हें करो।
वर्तमान समय हो या गुजरा हुआ समय हो एक सूत्र श्री कृष्ण ने सफल व्यक्ति
बनने के लिए प्राणी मात्र को दिया है वह यह है कि कर्तव्याभिमान से सदैव बचे।यह एक सूत्र
है ,सूत्र सार्वभोमिक सत्य होते हैं हर काल में लागू होते हैं और उनका प्रभाव पड़ता है।
व्यक्ति छोटा सा भी शुभ काम करता है तो उसके मन में खुद पर अभिमान
आता हैऔर वह हर किसी के सामने उस शुभ कर्म को रखना चाहता है।व्यक्ति जिसके
सामने अपने शुभ कर्म को रखता है तो उसके मन में इच्छा जाग्रत होती है कि सामने वाला
उसकी प्रशंसा कर दे।इसी इच्छा से अभिमान की उत्पत्ति होती है और अभिमान ही पतन
का कारण बनता है।व्यक्ति शुभ आचरण करके प्रशंसा की इच्छा करे इसे कुछ समय के
लिए ठीक मान ले मगर उस व्यक्ति का क्या होगा जिसने खुद ने शुभ काम किया ही नहीं
था लेकिन वह यह चाहे कि लोक में उसकी प्रशंसा हो जाए भले ही वह काम किसी और ने
किया हो।प्राकृतिक आपदाओं के समय राजनेता जनता के द्वारा प्राप्त कर की राशि में
से आपदाग्रस्त को देने का दिखावा इस तरह से करते हैं कि जैसे उन्होंने खुद ने अपनी
कमाई से दी हो।
उच्च पदों पर आसीन नेता जब भी जनता के कर से प्राप्त राशि को लोक
हित में खर्च करने की योजना बनाते है तब सबसे पहले खुद की फोटो अखबार में विज्ञापन
के साथ जरुर देते हैं जैसे वो जनता का धन जरूरतमंद को देकर कोई उपकार कर रहे हों।
कर्तव्य के अभिमान का रोग उस भारत में बुरी तरह से फैल गया है जिससे
बचने के लिए ही श्री कृष्ण ने उपदेश किया था।आज अधिकाँश लोग यह चाहते हैं की उसकी
जगत में प्रशंसा हो चाहे उसने कर्म कैसा भी क्यों ना किया हो।आम व्यक्ति भी भगवान् के
मन्दिर पर जाता है और खुद के कल्याण की प्रार्थना करता है फिर खुद की संतुष्टि के लिए
कुछ चढ़ावा भेंट करता है और उसके बदले में बड़ी साड़ी लिस्ट भगवान को सौंप देता है तथा
मंदिर से बाहर आकर जगत में ढिंढोरा पीटता है कि उसने आज शुभ काम किया है ,दान दिया
है।
कर्तव्य अभिमान और अधिकारों का दुरूपयोग यह बहुत बड़ी बिमारी है जिससे
भारत ही नहीं पूरा विश्व ग्रसित है।इस खोटी प्रशंसा से उबरने की जरूरत है और उबरने
का उपाय भी गीता में निहित है कि कर्म के फल में आसक्ति ना हो ,कर्म में कामना ना
हो ,कर्म कर्तव्य बुद्धि से पूर्ण हो उसमे अभिमान की लालसा ना हो
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27.6.13
उत्तराखंड में संकट में लोक तंत्र लापता-ब्रज की दुनिया
मित्रों,16 जून की शाम ढलने तक दुनियाभर के हिन्दुओं के लिए सदियों से
अतिपवित्र माना जानेवाला देवभूमि उत्तराखंड श्मशान में तब्दील हो चुका था।
हर जगह,हर तरफ लाशें थीं,चीखें थीं,चीत्कारें थीं,नहीं थी तो केवल सरकार और
सरकारी तंत्र। कहीं कोई राहत का इंतजाम नहीं,कहीं किसी तरह की कोई
व्यवस्था नहीं। एक घोर चापलूस,दरबारी और अयोग्य मुख्यमंत्री से हम उम्मीद
भी क्या करें और क्यों करें? अब तक केंद्र व राज्य की सरकारों ने हादसे के
बाद बस इतना ही काम किया है कि वे लाशों को गिन रहें हैं मगर काफी कम करके।
जहाँ मरनेवाले अभागे 20 हजार से कम नहीं हैं इन सरकारों की गिनती अभी हजार
तक भी नहीं पहुँची है।
मित्रों,हम सभी जानते हैं कि
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था सदियों से हिन्दू तीर्थयात्रियों के आगमन पर
आधारित है और 16 जून को आए जल प्रलय में मरनेवाले और प्रभावित होनेवाले
लगभग सारे लोग हिन्दू तीर्थयात्री ही हैं। कहाँ तो वे आए थे चारों धाम की
यात्रा कर पुण्य कमाने और कहाँ तो वे या तो सुरधाम पहुँच गए या फिर उनको
मरणांतक पीड़ा का सामना करना पड़ा और करना पड़ रहा है। सोलह जून की शाम को
उन्होंने खुद को 15-20 फीट ऊँची वो भी कंकड़-पत्थरयुक्त अतिशीतल पानी की
तेज धारा के मध्य में पाया। उनमें से कुछ अभागे तो तत्काल मर गए और जो बच
गए उनकी हालत तो और भी बुरी थी। उनको सरकारी अव्यवस्था और अराजकता के चलते न
तो कुछ खाने को ही कुछ मिल रहा था और न तो पीने को ही। न तो दवा ही मिल
रही थी डॉक्टर भला कहाँ से मिलते? नौ-दस दिनों तक वे लोग लगातार पानी
उड़ेलते खुले आकाश के नीचे भींगते-सूखते भूखे-प्यासे पड़े रहे और पड़े हैं।
न कहीं शासन का पता और न कहीं प्रशासन का ही,पूरा-का-पूरा तंत्र लापता। न
जाने क्यों और किसलिए राज्य सरकार ने इतने भारी-भरकम तंत्र को पाल-पोस रखा
है? क्या अब भी किसी को संदेह रह गया है कि भारतीय लोकतंत्र में खासकर
कांग्रेसी लोकतंत्र में तंत्र की नजर में लोक का कोई स्थान रह भी गया है?
यह सर्वविदित है कि इस प्राकृतिक त्रासदी में मरनेवाले लगभग सारे लोग
हिन्दू हैं और कोई हिन्दू वोट बैंक तो होता है नहीं कि उनकी चिंता की जाए।
हिन्दू अगर अब भी नहीं जागे तो परंपरागत,सदियों पुरानी चार धाम यात्रा तो
भविष्य में थम ही जाएगी उनके जीने के भी लाले पड़ जाएंगे जैसे कि इस समय
देवभूमि उत्तराखंड में पड़े हुए हैं।
मित्रों,यह सब तब हुआ है जबकि सीएजी ने दो महीने पहले ही अपनी रिपोर्ट में
उत्तराखंड में आपदा-प्रबंधन के शून्य होने की चेतावनी दे दी थी। फिर
किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की ऐसी स्थिति क्यों आई? क्यों राज्य और केन्द्र की
सरकारों को कल-परसों यह कहना पड़ा था कि जिनको पीड़ितों तक राहत पहुँचानी
है वे आप खुद जाकर पहुँचाएँ? आप ही बताईए कि ऐसा भी कहीं हुआ है कि सड़क
मार्ग से कटे,अतिदुर्गम क्षेत्रों में जाकर देशभर के सहृदय और देशभक्त लोग
खुद राहत पहुँचाएँ? फिर जब लोग आगे आने लगे तो अब वही केंद्र व राज्य
सरकारें ऐसा क्यों कह रही हैं कि राहत-कार्य सिर्फ हमारे द्वारा ही चलाए
जाएंगे?
मित्रों,क्या सीएजी की चेतावनी के बाद
भी केंद्र और उत्तराखंड की सरकारों का कान में तेल डालकर सोए रहना आपराधिक
कृत्य नहीं है? क्या केंद्र और उत्तराखंड की सरकारों पर हजारों निरपराधों
की हत्या का मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? हमारे प्रधानमंत्री रोजाना
सर्वोच्च न्यायालय को अपनी सीमा में रहने की चेतावनी देते रहते हैं फिर
क्यों बिना सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के उत्तराखंड में राहत और बचाव
का काम शुरू नहीं किया गया? देश में क्या आवश्यकता है ऐसे लोकतंत्र की
जिसमें जब लोक की जान पर बन आए तो तंत्र लापता हो जाए? क्या जरुरत है ऐसी
सरकारों की जो गाढ़ी जरुरत के समय जनता की किसी भी तरह से मदद न कर पाए और
जनता को पूरी तरह से रामभरोसे तिल-तिल कर मरने के लिए छोड़ दे?
मित्रों,पूरा देश आभारी है भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के उन
जवानों का जिन्होंने रात-दिन एक करके और अपनी जान की बिल्कुल भी परवाह न
करते हुए हजारों लाचारों की जान बचाई। कल की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में
वायुसेना और अर्द्धसैनिक बलों के 19 जवानों को जान भी गवानी पड़ी है। हम
उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं और महापापी सरकार
से अनुरोध करते हैं कि इन वास्तविक नायकों के परिजनों को पर्याप्त मुआवजा
दे,कम-से-कम राशि धौनी ब्रिगेड को कप जीतने पर मिलने वाली राशि से तो
ज्यादा जरूर होनी चाहिए,प्रति जवान कम-से-कम एक करोड़ रूपया। दोस्तों,यह
घोर दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी भी कम-से-कम पाँच हजार लोग लगातार 11 दिनों
से बरसात,मच्छर,कीड़े-मकोड़े और भूख-प्यास से लड़ते हुए अभी भी मदद का
इंतजार कर रहे हैं। देश में किसी भी तरह की आपदा-योजना या आपदा-तंत्र का
नहीं होना क्या यह नहीं दर्शाता है कि वर्तमान केंद्र-सरकार और उत्तराखंड
की सरकार दोनों ही नाकारा हैं और किसी भी तरह की बाहरी और भीतरी चुनौती से
निबटने में पूरी तरह से अक्षम हैं? क्या ऐसी सरकारें खुद अपने-आपमें ही
आपदा नहीं होती हैं?
मित्रों,मुझे आपको
यह सूचित करते हुए अपार क्रोध हो रहा है कि भारत को श्री सुशील कुमार शिंदे
के बाद कई और नीरो के बाप मिल गए हैं। जिस प्रदेश में 10-11 दिनों से
साक्षात महाकाल का तांडव चल रहा हो,लाशों को जलाने के लिए लकड़ियों के लाले
पड़े हों उस राज्य का मुख्यमंत्री न जाने क्यों इसी सप्ताह स्विट्जरलैंड
की यात्रा पर जा रहा है। उनको स्विस बैंक से कोई जमा-निकासी करनी है या कोई
अन्य अपरिहार्य काम आ पड़ा है पता नहीं लेकिन वे जिस विषम परिस्थिति में
विदेश जाने पर अड़े हुए हैं उसे देखकर तो कदाचित् किसी जल्लाद को भी शर्म आ
जाए। जब उनका प्रेरणा-पुरूष युवराज ही दो-दो गृह राज्य मंत्रियों को साथ
में लेकर ऐन घटना के दिन से एक सप्ताह तक पेरिस में रंगरलियाँ मना रहा हो
तो बहुत सारे अज्ञात गुणों से युक्त बहुगुणा क्यों नहीं मनाएंगे? मरनेवाले
या नरक की पीड़ा भोग रहे लोग कोई उनके सगे-संबंधी तो हैं नहीं। इसी बीच
कृपालु युवराज 24 जून को देश में वापस आ गए हैं और लगातार बाढ़-पीड़ितों से
मिल रहे हैं जबकि इससे पहले भारत-सरकार के गृह-मंत्री श्री शिंदे ने
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहकर ऐसा करने से रोक दिया था कि
इससे राहत-कार्य में बाधा आएगी। देश की कुंडली में राहु की महादशा ला सकने
की अपार क्षमता रखनेवाले राहुल गांधी किसी नियम के अंतर्गत तो आते हैं
नहीं सो वे क्यों मंत्री की सलाह पर अमल करने जाएँ? कुछ अन्य केंद्रीय
मंत्री तो ऐसे भी हैं जिन्होंने तो राहत में लगे हेलिकॉप्टरों को जबरन खाली
करवा दिया और तब आपदा-प्रभावित क्षेत्रों का क्रूरतापूर्वक हवाई और जमीनी
सर्वेक्षण किया। क्या पता फिर कब ऐसा सुनहरा मौका हाथ लगता?
मित्रों,इस बीच उत्तराखंड के प्रलय-क्षेत्र से कुछ इस तरह की सूचनाएँ या
खबरें भी आ रही हैं जो उसके एक और नाम देवभूमि से बिल्कुल भी मेल नहीं
खातीं। कई जगहों पर स्थानीय निवासी फँसे हुए तीर्थयात्रियों से
खाद्य-सामग्री और पानी के मनमाने दाम वसूल रहे हैं। देवताओं यह
देव-संस्कृतिवाली बात तो हुई नहीं। भारतीय वांङ्मय में अतिथियों को देवता
का दर्जा दिया गया है फिर उनकी मजबूरियों से अनुचित लाभ उठाना तो
दानवोंवाला कृत्य ही कहा जाएगा न? इतना ही नहीं कई जीवित-मृत महिलाओं के
हाथ तक भी स्वर्णाभूषणों के लालच में काट लिए गए हैं,कई तीर्थयात्रियों को
पहाड़ से नीचे फेंकने की धमकी देकर लूटा गया है और कई तीर्थयात्री महिलाओं
के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया गया है। कुछ जगहों से जैसे गौरीकुंड से इस
तरह की खबरें भी आ रही हैं कि वहाँ के ग्रामीणों ने अपना सारा राशन-पानी
पीड़ित आगन्तुकों को खिला-पिला दिया है और खुद उपवास कर रहे हैं। ऐसे लोग
निश्चित रूप से श्रद्धा और स्तुति के पात्र हैं।
मित्रों,कहते हैं कि आपदायें मानवता का लिटमस टेस्ट होती हैं। इसी दौरान
पता चलता है कि कौन मानव है और कौन दानव,कौन हितैषी है और कौन शत्रु। तभी
तो रहीम कवि ने कहा था कि-रहिमन विपदा हूँ भलि जो थोड़े दिन होय।हित-अनहित
या जगत में जानि पड़े सब कोय।। जल-प्रलय ने हिन्दुओं के समक्ष कांग्रेस के
खौफनाक हिन्दू-विरोधी,मानवता-विरोधी और देश-विरोधी चेहरे को तो पूरी तरह से
अनावृत कर ही दिया है वहाँ की स्थानीय जनता के देव-संस्कृति का हिस्सा
होने के दावे को भी कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। मैं हमेशा से
तीर्थयात्रा को मूर्खता मानता रहा हूँ। भक्तराज रामकृष्ण परमहंस भी कहा
करते थे कि जहाँ सज्जन लोग निवास करते हों वहीं तीर्थ है अन्यत्र नहीं।
हिन्दुओं को अपना कर्म सुधारना चाहिए परलोक बिना तीर्थयात्रा किए ही सुधर
जाएगा।
मित्रों,उत्तराखंड में न तो पहली बार बादल
फटे हैं और न ही पहली बार भूस्खलन ही हुआ है। हाँ,इस बार जान-माल का नुकसान
जरूर बहुत ज्यादा हुआ है। हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया और प्रकृति ने
हमें बिना देरी किए उसका दंड भी दे दिया। हिमालय के साथ सबसे पहला खिलवाड़
तो अंग्रेजों ने पूरे क्षेत्र में अखरोट के बदले चीड़ का जंगल लगाकर किया
था जिसकी जड़ों में मिट्टी को जकड़कर रखने की क्षमता कम होती है। फिर हमने
औद्योगिकीकरण,सड़क-निर्माण और जल-विद्युत उत्पादन के नाम पर पूरे उत्तराखंड
के पहाड़ों को वेध कर रख दिया,छलनी कर दिया। अभी-अभी 4-5 जून को मूर्खता
के प्रकाश-स्तंभ,चापलूस-शिरोमणि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार
के पर्यावरण मंत्रालय पर राज्य में नई जल-विद्युत परियोजनाओं और नई सड़कों
के निर्माण को बाधित करने का आरोप लगाते हुए देखा। सूत्र बताते हैं कि नई
जल-विद्युत परियोजनाओं के लिए प्रति मेगावाट 1 करोड़ रूपया माननीय
मुख्यमंत्री सुविधा-शुल्क के रूप में लेते हैं।
मित्रों,सारे पर्यावरणविद् हिमालय-क्षेत्र में नए बाँधों और सड़कों के
निर्माण के विरूद्ध लगातार चेतावनी देते रहे हैं। हमने अपनी आँखों से देखा
है कि मंसूरी में लोगों ने पहाड़ की ढाल पर पीलर दे-देकर घर बना लिए हैं।
नवीन वलित पर्वतीय व भूकंप की दृष्टि से अतिसंवेदनशील क्षेत्र में इस
प्रकार से घर बनाना और उसमें रहना निश्चित रूप से मृत्यु को आमंत्रण देना
है इसलिए प्रदेश में अंधाधुंध कंक्रीटों के जंगल लगाने पर भी रोक लगाई जानी
चाहिए। गिनाने को तो मैंने गिना दिया कि उत्तराखंड में क्या-क्या किया
जाना चाहिए परन्तु यह सब करेगा कौन? कांग्रेस पार्टी के नेताओं से तो कुछ
होनेवाला है नहीं सिवाय धर्मनिरपेक्षता के फूटे ढोल को पीटते रहने के और
धर्मनिरपेक्षता की छतरी के नीचे बैठकर देश-प्रदेश को लूट लेने के,बेच देने
के और फिर अमेरिका व स्विट्जरलैंड जाकर लूट और विक्रय के माल को ठिकाने
लगाने के या फिर पेरिस जाकर रंगरलियाँ मनाने के। तो आईये मित्रों,अंत में
हम भी भारतेन्दु हरिश्चंद्र की तरह वर्तमान भारत की महादुर्दशा (अंग्रेजों
ने तो भारत की सिर्फ दुर्दशा ही की थी) पर सामूहिक विलाप करें-रोवहु सब
मिलि के आवहु भारत भाई। हा! हा! भारत महादुर्दशा देखी न जाई।।
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ब्रजकिशोर सिंह
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Labels: उत्तराखंड में संकट में लोक तंत्र लापता-ब्रज की दुनिया
सफलता के सूत्र -श्रीमद भगवत गीता से
कर्म का आशय वह कार्य जिसके करने के निमित में प्रतिफल की लालसा हो और कर्मयोग
का मतलब समतापूर्वक समभाव रखते हुए कर्म का निर्वाह करना,यहाँ फल की लालसा नहीं
है जो भी परिणाम मिलेगा उसे स्वीकार कर लेना है।समता पूर्वक कर्तव्य का आचरण करना
ही कर्मयोग है
समतापूर्वक कर्म कैसे किया जाये ? यह प्रश्न स्वाभाविक है क्योंकि हर परिस्थिति में सम
रहना बहुत मुश्किल लगता है।हम जो भी कर्म करते हैं तब दौ चीजों से जुड़ कर करते हैं
राग और द्वेष,लाभ या हानि ,हार या जीत ,सफलता या असफलता।जब इन भावनाओं के
वशीभूत होकर हम काम करते हैं तो हम अपने अनुकूल या प्रतिकूल किसी एक बंधन में
बंध जाते हैं जो हमे सुख या दू:ख का अनुभव करवाता है।भगवान श्री कृष्ण कहते हैं -
श्रेयान स्वधर्मो विगुण: परधर्मात स्वनुष्ठितात
स्वधर्म क्या है -अपना कर्तव्य खुद तय करके उस पर आचरण करना।कर्तव्य हर परिस्थिति,
समय,स्थान,व्यक्ति के अनुसार अलग -अलग होता है। किसी व्यक्ति के लिए कोई कर्म
आवश्यक होता है तो दुसरे के लिये वही काम अनावश्यक भी हो सकता है।एक डॉक्टर के
पास दौ रोगी एक साथ पहुंचे।डॉक्टर ने एक से कहा -तू दही का सेवन छोड़ दे और दुसरे से
कहा-तुझे दिन में दही जरुर सेवन करना है।दही एक ही है मगर एक को नुकसान कर सकता
है और एक को फायदा।अर्जुन जब कर्तव्य को समझने में भ्रमित हो जाता है तो श्री कृष्ण
कहते हैं कि तेरे लिए युद्ध करना ही कर्तव्य है।युद्ध जैसा कर्म जिसमे नर संहार होना निश्चित
है जिसमे गुण नहीं है फिर भी वह समय ,परिस्थिति स्थान और व्यक्ति के कारण कर्तव्य
बन जाता है जबकि किसी वीतरागी व्यक्ति ने श्री कृष्ण से पूछा होता तो उत्तर यह हो सकता
था -अहिंसा परम धर्म है।
स्वकर्म क्या हो?कैसा हो ?किस रीति से तय किया जाये?- स्वकर्म आत्मवलोकन
है खुद का मूल्यांकन करना।हम किसी पर कोई कार्य थोप दे उसे पूरा करने को स्वमूल्यांकन
नहीं कह सकते।हम किस विषय में निपुण हैं और किस में कमजोर यह सबसे अच्छे तरीके से
खुद ही जानते हैं इसलिए खुद के प्रति तठस्थ रहकर अपने गुण और विगुण को परखे ,अपनी
कमजोरियों को सही रूप से पहचाने और अपने गुणों को भी यथारूप में पहचाने।यदि यह काम
हम सफलता से कर सकते हैं तो हम आसानी से लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
कोई छात्र गणित में निपुण हो और उसके अभिभावक कहे कि वह इतिहास के विषय
का चयन करके उसे ही पढ़े तो क्या वह छात्र अपनी सम्पूर्ण योग्यता का प्रदर्शन कर पायेगा ?
किसी व्यक्ति की रूचि कार बनाने में हो और उसे कहा जाये कि आपको खेती करनी है तो
क्या परिणाम आयेगा ?किसी पडोसी के जेवरात की दूकान अच्छी चलती हो और खुद के धंधे
में मंदी चल रही हो तो क्या तुरंत अपने धंधे का त्याग कर जेवर बेचने की दूकान शुरू कर देना
बुद्धिमत्ता है ?
श्री कृष्ण कहते हैं कि दुसरे का कर्म कितना ही लुभाने वाला क्यों ना हो पर अपनी समझ से
परे हो तो तुच्छ है ना करने के योग्य है क्योंकि उस कर्म को हम लोभ के वशीभूत होकर कर
रहे हैं ,हम जिस विषय में पारंगत ना हो तो सिर्फ देखादेखी करने से फायदे की जगह नुकसान
ही करेंगे।हम क्या कर सकते है और कितना कर सकते हैं हमारे लिये इसी बात का महत्व है।
लोग क्या कर रहे हैं इस बात का महत्व अपने खुद के लिए नहीं होता है।जैसे पतिव्रता के लिये
उसका पति ही सेव्य है चाहे वह अवगुण भी रखता हो ,यदि दुसरे का पति गुणवान हो तो क्या
वह सेवनीय है? पर पति पतिव्रता के लिए कदापि सेवनीय नहीं होता है।
श्री कृष्ण कहते हैं कि स्वकर्म का आचरण करो चाहे उसमे कितनी ही बाधाएं क्यों ना हो।जो
कार्य खुद को रुचिकर लगे जिस काम को करने की हम योग्यता रखते हैं उस काम को ही
करने की योजना बनाओ और उस पर अमल करो।हर काम में विघ्न बाधाएँ होती ही है।वास्तव
में बाधाएं तो यह परीक्षा करने के लिए आती है कि हमने जो संकल्प किया है उसके प्रति कितने
निष्ठावान हैं।काम को करने पर हमारे आत्म विशवास की परीक्षा करने के लिए विधि बाधाओं
को भेजती है यदि हम उस काम को समस्याओं के कारण बीच में ही अधूरा छोड़ देंगे तो हारेंगे
भी और लोक में हँसी भी होगी।बाधों के आने पर भी यदि हम लक्ष्य की ओर बढ़ते रहेंगे तो
बाधाएँ स्वत ही दूर हो जायेगी यदि किसी कारण से दूर ना भी हुयी और हम लक्ष्य से दूर रह भी गए
तो भी मन में पछतावा नहीं होगा,कष्ट नहीं होगा।क्योंकि हमने जो काम किया उसको जी जान
से पूरा किया ,पुरे मन से किया।
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26.6.13
वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय नवानि संयाति नवानि देही ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
अर्थात जिस प्रकार से मनुष्य पुराने वस्त्र को त्यागकर नए वस्त्र को धारण करता है उसी प्रकार से आत्मा भी पुराने या कटे फटे मृत शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करता है ॥
न जायते म्रियते व कदाचित
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोयं पुरानो,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।
यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता और कभी मरता भी नहीं,
यह होकर फिर कभी नहीं होता ।
पुराणों में कथित यह आत्मा अज है अर्थात कभी उत्पन्न नहीं होने वाला है , नित्य है शाश्वत है अर्थात अनादि काल से अनंत काल तक है ।
यह मारे जाने वाले शरीर में कभी मारा भी नहीं जाता ॥
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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25.6.13
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ASHUTOSH VERMA
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ASHUTOSH VERMA
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पहले नेचुरल एक्टर मोतीलाल
मोती लाल के गाये गीत
‘मुझसे सुन्दर कोई नहीं – ‘शहर का जादू’ /1938
‘रूठी लड़की कौन मनाए’ – ‘आपकी मरजी’ /1939
‘माशूक हर जगह है, आशिक कहीं-कहीं’ – ‘शादी’ /1941
‘प्यारा-प्यारा है समां’ – ‘कमल’ /1949
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Shri Sitaram Rasoi
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24.6.13
उत्तराखंड में आई आपदा की भयानक तस्वीर सामने आने के बाद अब सभी तरफ से सरकार के इस ऑपरेशन के चीरफाड़ की बारी आ गयी है । इससे पूर्व ही उत्तराखंड के आपदा मंत्री ने खुद कह दिया है कि हम नाकाम रहे । राज्य सरकार ने भी पचास सवालों के बाद यह मान ही लिया है कि सरकार इस दिशा में नाकाम रही है । इस सबके बीच बहुगुणा विरोधी लाबी खुश हो रही होगी कि चलो , बहुगुणा फेल हुए और अब इस लाबी को यह मौका मिल गया है कि यह अपने आलाकमान के कान भर सके कि बहुगुणा के कमजोर प्रशासन ने देश में कांग्रेस की भद पिटवा दी है और अब मुख्यमंत्री बदला जाना चाहिये और हो सकता है कि कुछ दिन में यह आवाज उठे ।
इस आपदा का सार यही कहा जा सकता है कि सरकार बादल को नहीं रोक सकती थी लेकिन जो लोग भूख से मर गए , दम घुटने , ठण्ड लगने , कुचलने से मर गए या रास्ता भटक कर इधर उधर मर गए या नेपाली युवकों द्वारा लूट लिए गए और मार भी दिए गए , यह सब सरकार की जिम्मेदारी थी और सरकार इस मामले में पूरी तरह से फेल हो गयी है ।
यही नहीं , जब रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हुआ तब शुरुआत में सिर्फ २ २ हेलीकाप्टर लगाए गए , जैसे जैसे देखा गया देर हो रही है तो हेलीकाप्टर की संख्या बधाई गयी । और सात दिन बाद टी वी पर देखा गया कि ८३ हेलीकाप्टर हैं । लेकिन तब तक दोबारा बारिश शुरू हो गयी । क्या अब जो लोग फंस गए हैं और रास्ते फिर टूटने शुरू हो गए हैं तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है । यदि पहले ही यह काम तेजी से कर लिया जाता तो वे लोग भी अब तक सुरक्षित बचाए जा सकते थे । लेकिन ऐसा हो नहीं सका और यह स्थिति तब है जब दो दिन बाद ही मनमोहन और सोनिया गाँधी का दौर हो चुका था । लेकिन जब केंद्र सरकार ही ७ दिन बाद तक इस इन्तजार में बैठी रही कि उसके युवराज स्पेन से लौटेंगे तब उनके हाथों से ही राहत सामग्री बंटवाई जायेगी तब इस बेचारी सरकार का क्या कहें ।
आपदा प्रबंधन कुशल होता तो जिस दिन केदारनाथ में यह घटना घटी उस दिन वहाँ पर यह टीम यदि पहले से सक्रिय होती तो वहाँ पर सैकड़ों लोगों को बचा लिया जाता । कुछ लोग ठण्ड से मर रहे थे , कुछ दम घुटने से तो कुछ भूख से , कुछ लोग उन बंद मकानों में भी फंसे थे जिन में मलबा भर गया था । लेकिन सरकार के पास सोचने का कोई तंत्र नहीं था इसलिए पिता की गोद में उसका बच्चा भूख और पानी की प्यास से अपने पिता से पानी पानी मांगता हुआ दम तोड़ गया । जो स्थानीय पुलिस सात दिन बाद दिखाई दी वह अगर सक्रिय होती तो उन महिलाओं के पतियों को बचाया जा सकता था जिन्हें कुछ नेपाली गुंडों ने लूटने के बाद खाई में फेंक दिया । लेकिन बेचारी सरकार का क्या कहें । जो २ ० ० कमांडो छठवे दिन उतारे गए वे पहले भी उतारे जा सकते थे । जो मानव रहित विमान लोगों को खोजने के लिए सातवें दिन लगाने की बात सामने आई वह पहले भी लगाए जा सकते थे । लोगों तक कम से कम रोटी और पानी तो पहुंचाई जा सकती थी । सेना जो कर रही है वह भगवान् का रूप निभा रही है । लेकिन सरकार कहाँ है । क्या सरकार के पास कोई सोच भी नहीं है जो किसी का भला कर सके ।
राष्ट्रीय आपदा घोषित करने से कतरा रहे गृह मंत्री नहीं समझ सकते कि जब किसी आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाता है तब समस्त राज्यों की सरकारें उस आपदा से निपटने में तत्परता दिखाती हैं । गृहमंत्री इसे राष्ट्रीय संकट मानने को तो तैयार थे लेकिन राष्ट्रीय आपदा नहीं । क्या वे बता पायेंगे कि आखिर राष्ट्रीय आपदा और संकट में क्या फर्क है । क्या वे नहीं जानते कि संकट और आपदा एक ही बात है । ये दोनों पर्याय वाची शब्द हैं । लेकिन यह मांग चूंकि विपक्ष की तरफ से थी इसलिए राष्ट्रिय आपदा और संकट में फर्क दिखने की कोशिश की गयी है । इसे कहते हैं विरोध के लिए विरोध अंततः राज्य सरकार को मानना पड़ा कि वह नाकाम रही , और आपदा मंत्री भी कह चुके हैं कि हम नाकाम रहे । क्या यदि एक माह बाद इश्वर न करे कोई बादल फिर फट जाए तो सरकार के पास तैयारी है । नहीं , बिलकुल नहीं ।
खैर , राहुल देहरादून पहुंचे , कल तक जो सरकार यह कह रही थी कि कोई भी हवाई सर्वे तो कर सकता है लेकिन जमीन पर नहीं उतार जाएगा क्योंकि इससे सिस्टम पर असर पड़ता है उसे अब क्या हो गया है । राहुल ऐसा क्या करने स्पेन से सीधे जमीन पर आ गए हैं जिससे विकास कार्य को गति मिल जायेगी । लेकिन राजनीति है यह भी । खैर राजनेता राजनीती नहीं करेंगे तो उनकी दूकान कैसे चलेगी ?
कुल मिलाकर इस देश के सबसे बड़े खेल संगठन बी सी सी आई ने उत्तराखंड के लिए कुछ भी देने से मना कर दिया है । इस देश का वह करिश्माई कप्तान भी इसी राज्य का ही है । वाह , इसे कहते हैं देश भक्ति । जिन्हें जरूरत है उन्हें कुछ नहीं लेकिन जो पहले से मालामाल हैं उन्हें एक एक करोड़ ।
खैर , यह इस देश की नियति है कि यहाँ समय पर कुछ नहीं होता और जब होता है तो पानी सर पर से गुजर चुका होता है ।
इस घटना से कुल मिलाकर राज्य सरकार के पर्यटन उद्योग को अच्छा ख़ासा घाटा होने वाला है । जो लोग भी बचकर आये हैं कसम खाए हुए हैं कि दुबारा इस यात्रा पर नहीं आयेंगे और दूसरों को भी सलाह देंगे कि यहाँ न आयें क्योंकि यहाँ का प्रशासन पंगु है ।
सभी लोग आर्मी का धन्यवाद दे रहे हैं । मेरी भी तरफ से आर्मी को हज़ार सलाम । कोई तो है जो हमको बचा लेगा ।
जो चले गए हैं , उनकी आत्मा को ईश्वर शांति दे ।
न जायते म्रियते व कदाचित
नायं भूत्वा भविता व न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणों ,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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राहुल जी आ गए हैं । मम्मी का फ़ोन गया था । बेटा ! यहाँ उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा आ पड़ी हैं । ये विपक्ष वाले हल्ला मचा रहे हैं कि तुम कहाँ हो । ऐसा है , अगले साल चुनाव हैं । इनके नेता तो वहाँ पहुँच गए हैं । एक जहाज ले के अपने यात्रियों को अपने स्टेट पहुंचा भी दिया है लेकिन सब कह रहे हैं कि तुम कहाँ हो । इनको पता नहीं किसने बता दिया है कि तुम स्पेन में हो । तुम काहे सबको बता कर जाते हो कि कहाँ जा रहे हो ? अब नुकसान करवा दिया न । अब ऐसा है कि फ़टाफ़ट कोई सी ट्रेन , या अगर ट्रेन न मिले तो जहाज पकड़ कर आ जाओ । यहाँ मैंने पच्चीस ट्रक रसद संभाल कर रखी है ताकि तुम आओ तो पहुँचाओ । सात दिन तो हो गए हैं । उधर जो भी जिन्दा बचकर आ रहा है वो आर्मी का तो धन्यवाद कर रहा है लेकिन हमारी सरकार को गाली दे रहा है । अब ऐसे में तुम और गायब हो । जानते नहीं कि इनका नेता कितना चालाक है । वो वहाँ पहुँच कर कह रहा है कि उसने वहाँ बहुत लोगों की मदद की । और केदारनाथ को ठीक करने का ठेका मांग रहा था । वो तो हमारे दिग्गी ने कह दिया कि तुमसे पहले तो हमारे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने दस करोड़ रुपये देकर केदार नाथ के उद्धार के लिए कह दिया था । और अब हम उस चालाक विपक्षी नेता के द्वारा दिए गए २ करोड़ रूपये पर उसकी टाँग खींच रहे हैं । बड़ा कहता था - गुजरात विकास कर रहा है । अब जब देने की बात आई तो २ करोड़ दिए । गरीब प्रदेश का मालिक । क्या ख़ाक विकास किया है ? खैर , उसको छोडो , रात दिन उसके बारे में ही तो सोचते रहते हैं । नींद हराम कर रखी है उसने । तुम आ जाओ । नहीं तो लोग तुम्हें भूल जायेंगे । ये राशन वितरित हो जाए तो कुछ सांस में सांस आये । इधर , हमारा खाद्यान्न सुरक्षा बिल ये विपक्ष वाले पास नहीं होने दे रहे हैं और उधर हमारी सरकार के इस प्रदेश में लोग इस तबाही में भूखे मर रहे हैं । कोई पत्ती चबा रहा है , कोई लकड़ी चूस रहा है , कोई कच्ची मैगी खा रहा है , दो रुपये की चीज पचास में बिक रही है । आठ माह बाद चुनाव हैं , क्या होगा कैसे होगा बताओ । अब तुम आ जाओ । नहीं तो सब गड़बडा जाएगा । वहाँ हमारी किरकिरी हो रही है । जल्दी आओगे तो कुछ जवाब भी तुम्हें रटने हैं । हर बार तुम्हें मेहनत करानी पड़ती है और तब जाकर तुम कुछ करते हो । जब निर्भया काण्ड था तब भी तुम उत्तराखंड के प्रशासन की तरह एन मौके पर गायब हो गए थे । जब अन्ना आये थे तब तुम ग्यारह दिन बाद निकले थे बाहर । तुम्हें सजाने संवारने में हमें कितनी मेहनत करनी पड़ती है तुम क्या जानो । उनका नेता देखो कैसे फ़टाफ़ट बोल लेता है । अब कुर्ती की बांह तो तुम चढ़ा लेते हो बखूबी , लेकिन यूपी में यह सब काम नहीं आया । अब उत्तराखंड में लोग कुर्ती की बांह चढ़ाए पीड़ित हैं , उनकी कुर्ती की बांह नीचे करो . यहाँ जल्दी आ जाओ । इधर ये मीडिया वाले केदार घाटी तक पहुँच कर बार बार कह रहे हैं कि मैं पहले पहुंचा हमारा चैनल पहले पहुंचा , और चैनल पर लाइन चला रखी है कि राहुल गाँधी कहाँ हैं ? वहाँ चैनल्स में जल्दी पहुँचने की होड़ लगी हैं और इस मौके पर तुम गायब हो । जल्दी नहीं तो कम से कम उत्तराखंड की स्थानीय पुलिस की तरह सातवें दिन तो बाहर निकल आओ बेटा । जल्दी आ जाओ । बड़ी फजीहत हो रही है । और हाँ लोगों से ये कह देना कि मैं स्पेन गया था घूमने । ठीक है । आ जाओ अब ।
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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सलाम है सेना को यारा .........
एक ओर नेताओं की टोली, एक ओर सैनिक है यारा
किसको करना है सेल्यूट ,मन को कौन लगे प्यारा
एक ओर झंडे सब दल के, एक ओर तिरंगा न्यारा
किसको करना है प्रणाम, मन को कौन लगे प्यारा
इधर नेता का जयघोष,उधर सेना का जय हिन्द
किस पर रखना है विश्वास, कौन है जनता को प्यारा
इधर नेता की आँख में आँसू, उधर शहीद दारा की धारा
किसे देख छलकेगी आँखें ,तू ही तुझको तोल ले प्यारा
एक ओर हवाई दौरे हैं,एक ओर डटा है सैनिक यारा
किसे कहें पुरुषार्थ? बता दे कौन तेरी आँखों का तारा
इधर जहर उगलती बातें,उधर जान बचाने की जहमत
किस ओर चले दुआ मन की,तू ही तो बतला दे यारा
इधर बेजानो पर रण नीति,उधर जान बचाना ही नारा
महाकाल खड़ा उस ओर,जहाँ सेना ने है काल को मारा
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23.6.13
शिवपुर वाराणसी की की पुलिस द्वारा मुक़दमा अपराध संख्या 86/2013 धारा 419/420/467/468/471 IPC में दर्ज ऍफ़ आई आर पर कोई कार्यवाही न करने और दोषी को गिरफ्तार न किये जाने के सम्बन्ध में
लगभग दो माह बीतने के बाद भी शिवपुर वाराणसी की की पुलिस द्वारा मुक़दमा अपराध संख्या 86/2013 धारा 419/420/467/468/471 IPC में दर्ज ऍफ़ आई आर पर कोई कार्यवाही न करने और दोषी को गिरफ्तार न किये जाने के सम्बन्ध में
Advocate
Dr. Rajendra Prasad Adhivakta Bhawan
Collectrate Court ,Varanasi -221002 India
Cell. 9450960851;
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VYOMESH CHITRAVANSH advocate 9450960851
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तालाब, पार्क नहीं यहां तो नदी पर हो गया है अतिक्रमण
तालाब, पार्क नहीं यहां तो नदी पर हो गया है अतिक्रमण
- मोरवा नदी के करीब 300 मीटर क्षेत्र पर कर लिया गया है कब्जा,
- जिलाधिकारी आवास के बाउंड्री से होकर गुजरी है मोरवा नदी,
- करीब एक दशक पूर्व हुआ था डीएम आवास का निर्माण,
- कार्यदायी संस्था व इंजीनियरों के कार्य पर सवाल
तालाबो पर कब्जे की बात तो आपको अखबारों में पढ़ने को मिल जाती हो लेकिन किसी नदी पर कब्जे की बात शायद किसी ने सुनी हो ,लेकिन उत्तर प्रदेश के भदोही में कुछ ऐसा ही वाकया सामना आया है। देश में अपने तरह का पहला मामला है जब नदी को ही अपनी चहारदीवारी के अन्दर कर लिया गया है, 1994 में भदोही को जिला बनने के बाद जनपद में जिलाधिकारी के लिए एक बड़े आवास की जरूरत पड़ी मुख्यालय के बगल में ही इसका निर्माण कराया गया, उसी के पास से प्रवाहित हो रही मोरवा नदी को जिला अधिकारी के अवास के अन्दर ले लिया गया हालांकि यह कार्यदायी संस्थायो ने लगभग 10 वर्ष पूर्व किया होगा तबसे से लेकर अब तक 15 से अधिक जिला अधिकारी उस आवास में रह चुके हैं लेकिन किसी का ध्यान भी इस ओर नहीं गया मोरवा नदी सरपतहां आदि गांव से होते हुए आगे जाकर वरूणा नदी में मिल गई है। सरपतहां तक तो मोरवा नदी स्वच्छंद रूप में गुजरी है। लेकिन आगे जाकर जिलाधिकारी आवास के चहारदीवारी में कैद कर ली गई है। करीब 300 मीटर से अधिक लंबा नदी का क्षेत्र डीएम आवास की चहारदीवारी में कैद है। चहारदीवारी से होते हुए हुए नदी बाहर निकलती है।
भारतीय संविधान और केन्द्रीय रिवर बोर्ड अधिनियम कहता है कि किसी भी प्राकृतिक संपदा नदी, तालाब आदि पर कब्जा नहीं किया जा सकता है। बावजूद जबकि कानून किसी भी नदी के क्षेत्र को किसी आवास के चहारदीवारी के अंदर नहीं मिलाया जा सकता है। जिस कार्य संस्था और इंजीनियरों की टीम ने आवास का निर्माण कराया, उन्होनें आखिरकार कानून का ख्याल क्यों नहीं रखा। यही नहीं अब तक कई जिलाधिकारी जिले में आए और गए। उनकी भी नजर आवासीय परिसर में कैद नदी पर नहीं पड़ी।
इसी जनपद के उगापुर गांव के वाद पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय से पुरे देश में तालाबो ,पोखरांे आदि के संरक्षण में तेजी आई इस निर्णय ने देश के तालाबो पोखरों को जल संरक्षण का आधार माना उसे संरक्षित करने उसे बचाने का आदेश सरकार को दिया ,इस निर्णय ने तालाब पोखरों पार्कों पर अवैध कब्जा हटाने का अधिकार भी दे दिया ,लेकिन इसी से लगभग आठ किलोमीटर दूर जनपद की प्रमुख नदी मोरवा पर ही कब्जा कर लिया गया , कब्जा भी जिसने किया उसी को सरकार ने इसके संरक्षण की करने की जिम्मेदारी भी सौंप रखी थी
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पिचले 10 वर्षों से ज्यादा समय से यही स्थिति बनी रही किसी सरकारी संस्थान की नजर इस ओर नहीं गया न ही पर्यावरणविद को नदी जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनो पर नजर रखने के लिए अनेक सरकारी संस्थाए काम करती हैं, लेकिन किसी ने इस पर आपत्ति नहीं जताई ये सरकारी कार्यप्रणाली का इससे अच्छा सबुत नहीं हो सकता है हालांकि कुछ लोग मानते है की मामला जिलाधिकारी आवास से जुड़ा हुआ है इसलिए किसी संगठन खबरनवीस , सरकारी अधिकारी की हिम्मत नहीं पड़ी हो , उप जिलाधिकारी ज्ञानपुर रत्नाकर मिश्रा का
यहाँ बयांन भी आपने आप पुष्टि करता है जब उनसे नदी कब्जे की बात पर वह इसे गलत बताते है लेकीन जब जिलाधिकारी आवास की बात बताई गयी तो उनके बयान किस तरह से बदला गए
जिलाधिकारी के रूप में तैनात हुए चंद्रकांत पाण्डेय से
अभी हाल में ही जनपद में जिलाधिकारी के रूप में तैनात हुए चंद्रकांत पाण्डेय से जब इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया और कहा उन्हें आये एक-दो दिन ही हुए और इस मामले को देखंेगे नवागत जिलाधिकारी ने नदी अतिक्रमण को लेकर कार्रवाई के प्रति अपनाने की बात दिखाई पड़ती है।
वरुण बचाओ अभियान के संयोजक व्योमेश इस-
पर अपनी टिप्पणी दी की नदी, तालाब आदि के संरक्षण के लिए सरकारें व न्यायालय विशेष सख्ती बरत रही है। बावजूद इसके अतिक्रमण जारी है। तालाब व पार्कों पर तो अतिक्रमण व अवैध कब्जा की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। लेकिन किसी नदी पर कब्जा कर लिया गया हो, ऐसा मामला अभी तक सामने नहीं आया था।
जनपद के ओमप्रकाश पाल का कहना है
कि इस आवास और इसकी जमीन अधिगृहित कर पूरे निर्माण के दौरान स्वीकृति के लिए तमाम रास्ते तय किए होंगे। तमाम वरिष्ठ अधिकारी और शासन के स्तर से आवास के लिए नक्शा आदि की भी स्वीकृति ली गई होगी ऐसे में इस प्रकार नदी को कब्जे में लिया गया वो लचर सरकारी कार्य प्रणाली का सबसे बड़ा सबूत
सामाजिक सरोकारों से रूचि रखने वाले पर्यावरण मामलों के जानकर और अधिवक्ता संतोष गुप्ता-
का का कहना है नदी, तालाब सार्वजनिक संपत्ति है। इस पर किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा कब्जा नहीं किया जा सकता है। इस पर कब्जा करने या इसे बाउंड्री में मिलाने का अधिकार किसी को नहीं है। भारतीय संविधान में इस बात का उल्लेख है कि किसी भी प्राकृतिक संपत्ति पर कोई भी व्यक्ति या संस्था कब्जा नहीं कर सकता है। राज्य सरकार को संपत्तियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। 133 सीपीआरसी में उल्लेख है कि जिलाधिकारी व मजिस्ट्रेट प्राकृतिक संपत्ति की सुरक्षा करें। अगर कब्जा व अतिक्रमण की जानकारी मिले तो कार्रवाई करें।
क्या कहते हैं एसडीएम
इस संबंध में उपजिलाधिकारी ज्ञानपुर रत्नाकर मिश्र से पूछा गया तो उन्होनें ने कहा किसी नदी, तालाब या जलाशय पर कब्जा नहीं किया जा सकता है। उसे अपने बाउंड्री के अंदर नहीं मिलाया जा सकता है। लेकिन जिलाधिकारी आवास के बाउंड्री से होकर बुजरी मोरवा नदी के बारे में पूछने पर गोलमोल जवाब दिया। कहा कि बाउंड्री के अंदर नदी भले है, लेकिन उसके स्वरूप वही है। स्वरूप् से छेड़छाड़ नहीं हुआ है। इसलिए बाउंड्री के अंदर मिलाया जा सकता है।
वरुणा नदी
वरुणा नदी भदोही जनपद की ३२ किलोमीटर लम्बाई तय करती वाराणसी के छोर से इलाहबाद के सीमा तक सफर तय करती है जनपद के 155 वर्ग किमी परिक्षेत्र में फैली है यह नदी वरुण और गंगा की सहायक नदी है मोरवा नदी कारी गांव से निकली है जो कसिदहां, नथईपुर,मूसी, जोगीपुर, सरपतहां आदि गांव से होते हुए आगे जाकर वरूणा नदी में मिल गई है।
क्या कहता है कानून
1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के तहत प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक संपदा नदी ,तालाब आदि का संरक्षण करे।
2. अनुच्छेद 48क के तहत राज्य का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक संपदा की रक्षा करे।
3. 133 सीआरपीसी के तहत जिलाधिकारी व मजिस्ट्रेट को यह शक्ति प्रदान की गई है कि उन्हें सूचना मिले या वे निरीक्षण के दौरान किसी नदी, तालाब पर कब्जा है तो उसे तत्काल हटवाएं। डीएम व मजिस्ट्रेट को अतिक्रमण हटवाने का पूरा अधिकार है।
4. नदी के धारा या भूमि पर कोई ऐसा अवरोध नहीं लगाया जा सकता जिससे उसका उपयोग करने में जन सामान्य को परेशानी हो।
5. चहारदीवारी बनाकर किसी नदी के जल को अवरूद्ध नहीं किया जा सकता है।
6. नदी या तालाब का निजी तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
फोटो गूगल मैप कर रहा है पुष्टि
ग्ूगल मैप में देखने में साफ-साफ पता चल रहा कि मोरवा नदी को लिाधिकारी आवास परिसर में कैद किया गया है। नदी आवास के बाउंड्री के अंदर से गुजरी है। स्थिति स्पष्ट हो सके, इसके लिए तस्वीर को ग्राफिक्स के जरिए स्पष्ट किया गया है। लाल रंग की दिख रही लाइन मोरवा नदी है। वहीं नीले रंग की लाइन जिलाधिकारी आवास की बाउंड्री है। ग्राफिक्स देखने के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि मोरवा नदी का कितना लंबा क्षेत्र जिलाधिकारी आवास के परिसर से गुजरा है।
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VYOMESH CHITRAVANSH advocate 9450960851
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12:21 PM
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