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29.7.11

घोटालों के निष्कि्रय संरक्षक

संवैधानिक दायित्व के पालन में लापरवाही को प्रधानमंत्री का मूल स्वभाव बता रहे हैं हृदयनारायण दीक्षित

संप्रग सरकार पर भ्रष्टाचार को संस्थागत बनाने के आरोप थे ही, रही-सही कसर पूर्व संचारमंत्री ए राजा ने पूरी कर दी। राजा ने शीर्ष न्यायपीठ के सामने संचार घोटाले के मामले में प्रधानमंत्री को भी शामिल बताया है। गृहमंत्री पी चिदंबरम भी लपेटे में हैं। कांग्रेस ने इसे एक अभियुक्त के बचाव की बयानबाजी बताकर पल्ला झाड़ लिया है। सर्वोच्च न्यायपीठ के सामने प्रधानमंत्री को सहअभियुक्त जैसा प्रस्तुत किया गया है, बावजूद इसके प्रधानमंत्री चुप हैं। आखिरकार राजा के आरोपों पर प्रधानमंत्री का स्पष्टीकरण क्यों नहीं आया? प्रधानमंत्री के मौन का अर्थ स्वीकृति लगाया जा रहा है। ए राजा ने प्रधानमंत्री को साजिश व कर्तव्यपालन में लापरवाही का दोषी ठहराया है। कर्तव्यपालन में लापरवाही मनमोहन सिंह का मूल स्वभाव है। लेकिन प्रधानमंत्री के विरुद्ध साजिश का आरोप संगीन मामला है। राजा के तर्क में दम है। स्पेक्ट्रम आवंटन के पूरे मामले का परीक्षण करने के लिए प्रधानमंत्री ने मंत्रिसमूह का गठन क्यों नहीं किया? राजा के अनुसार प्रधानमंत्री ने ही मंत्रिसमूह गठित न करने का निर्णय लिया। कायदे से प्रधानमंत्री को अपनी चुप्पी तोड़कर सत्य का पर्दाफाश करना चाहिए। उन्हें अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय में चल रही कानूनी कार्यवाही में सहयोग करना चाहिए। ए राजा साधारण अभियुक्त नहीं हैं। वह उनके विश्वासपात्र मंत्री रहे हैं। यह मुकदमा भी असाधारण प्रकृति का है। केंद्र सरकार सीधे भ्रष्टाचार के लपेटे में है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी इस कांड से बाहर नहीं दिखाई देते। राजा के वकील ने कोर्ट से गृहमंत्री को भी गवाह बनाने की मांग की है। पी चिदंबरम पहल करें, कोर्ट के सामने जाएं, न्यायिक कार्यवाहियों में उठे प्रश्नों का उत्तर दें। संविधान निर्माताओं ने ही सरकारी जवाबदेही को संसदीय जनतंत्र का मुख्य आदर्श बताया था। प्रधानमंत्री से कोई अपेक्षा करना बेकार है। वह प्रधानमंत्री पद के वास्तविक प्राधिकार से वंचित हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री की तरह कभी कोई काम नहीं किया। राष्ट्रमंडल घोटाले से देश की अंतरराष्ट्रीय बदनामी हुई। भ्रष्टाचार और लूट के महोत्सव उनकी जानकारी में थे, लेकिन वह लाचार होकर टुकुर-टुकुर ताकते रहे। दूरसंचार घोटाले से वह अवगत थे। ए राजा का वक्तव्य पर्याप्त साक्ष्य है। मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति धांधली में वह शामिल थे। उन्होंने गलत काम को रोकने में कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया। कर्तव्यपालन में ऐसी लापरवाही किसी भी जनतांत्रिक देश के प्रमुख ने नहीं की। उन्होंने अपनी तरफ से भी कभी कोई सही काम नहीं किया। वास्तविक सत्ता सोनिया गांधी ने चलाई, जिम्मेदार वह बने। अच्छाई का श्रेय सोनिया, राहुल ले गए और सारे गलत कामों के जिम्मेदार प्रधानमंत्री बने। उन्होंने सक्रिय, जिम्मेदार और जवाबदेह प्रधानमंत्री होने का कोई प्रयास नहीं किया। पूंजीवादी अर्थशास्त्र की विद्वता व्यावहारिक सत्ता संचालन में काम नहीं आती। वह हरेक मोर्चे पर विफल रहे और वीतरागी संन्यासी की तरह पद से हटने की प्रतीक्षा करते रहे। प्रधानमंत्री करें तो क्या करें? कांग्रेस 1947 से ही ऐसी है। पंडित नेहरू बेशक कामकाजी प्रधानमंत्री थे, लेकिन सत्ता में भ्रष्टाचार की शुरुआत उसी समय हुई। 1949 में नेहरू के खास मंत्री कृष्णमेनन पर 216 करोड़ रुपये के जीप घोटाले का आरोप लगा। लोक लेखा समिति ने दोषी पाया। कुछ दिन बाद वह फिर से मंत्री बने। 1957 में मूंदडा कांड हुआ। फिरोज गांधी ने सवाल उठाया। वित्तमंत्री टीसी कृष्णमाचारी का त्यागपत्र हुआ। बवाल रुका, वह भी फिर से मंत्री हो गए। कांग्रेस की यही परंपरा आगे चली। इंदिरा गांधी के विरुद्ध नागरवाला कांड राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना। इंदिरा गांधी के शासन में ही भ्रष्टाचार को सार्वजनिक स्वीकृति मिली। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बोफोर्स ने घेरा। उन्हीं के कृपापात्र क्वात्रोचि का साथ वर्तमान केंद्रीय सत्ता ने भी दिया। प्रधानमंत्री नरसिंहा राव भी पीछे नहीं रहे। रिश्वत देकर संसद में वोट, लक्खूभाई पाठक कांड और हर्षद मेहता कांड सहित तमाम घोटालों के जरिए उन्होंने कांग्रेस की परंपरा को बढ़ाया, बखूबी सरकार भी चलाई। कांग्रेसी परंपरा के सभी पूर्व प्रधानमंत्री घपलो-घोटालों के सक्रिय संरक्षक थे। लेकिन मनमोहन सिंह ऐसे सभी मामलों के निष्कि्रय संरक्षक हैं। दरअसल निष्कि्रयता ही उनकी पूंजी है। सोनिया गांधी ने उन्हें निष्कि्रय रहने का ही काम सौंपा है। राजनीतिक सक्रियता उनका काम नहीं। चुनाव उन्हें लड़ना नहीं। चुनाव अभियान में उनका उपयोग नहीं। उनका कहीं कोई जनाधार भी नहीं। कांग्रेसी जीत का श्रेय उन्हें मिलना नहीं। हार की जिम्मेदारी के लिए उनसे अच्छा कोई दूसरा बलि का बकरा नहीं। वह सोनिया, राहुल और उनके सहयोगियों की अच्छी बुरी सक्रियता को निर्बाध चलाते रहने की जिम्मेदारी ही निभाते हैं। बेशक भ्रष्टाचार रोकना प्रधानमंत्री की ही जिम्मेदारी है। आतंकवाद, आंतरिक सुरक्षा, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, किसान उत्पीड़न आदि समस्याओं से निपटना भी उनका ही प्राथमिक संवैधानिक कर्तव्य है। सारा देश उनसे सक्रियता की अपेक्षा करता है, उनकी ही ओर टकटकी लगाए रहता है, लेकिन वह सिर्फ एक ही परिवार के प्रति निष्ठावान हैं। वह खुश हैं कि वह परिवार उनसे खुश है। उनकी निष्कि्रयता ही उनकी विद्वता और विनम्रता है। संसदीय जनतंत्र का मुख्य गुण है-जवाबदेही। शीर्ष भ्रष्टाचार के लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं, लेकिन उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप में किसी मंत्री को नहीं हटाया। कोर्ट ने पहल की तभी कार्रवाई हुई। ए राजा ने सीधे उन पर, गृहमंत्री और सोलीसिटर जनरल पर उंगली उठाई है। बावजूद इसके वह चुप हैं। हाईकमान ने उन्हें चुप रहने को ही कहा है। जाहिर है, कांग्रेस और केंद्र सरकार जनता के प्रति जवाबदेही के संवैधानिक सिद्धांत को नहीं मानते। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)
साभार:-दैनिक जागरण
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/article/index.php?page=article&choice=print_article&location=8&category=&articleid=111717418674083552

बर्तनों पर लगी हिन्दू और मुसलमान की मोहर और बालिका अमृता ! भाग 1

''भारतीय नारी '' ब्लॉग पर आज  प्रस्तुत आलेख -अशोक कुमार शुक्ल जी द्वारा प्रस्तुत किया गया है -

अमृता  प्रीतम का जन्म 1919 में पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के लाहौर शहर में हुआ । इनके माता पिता पंचखंड भसोड़ के स्कूल में पढाते थे। इनका बचपन अपनी नानी के घर बीता जो रूढिवादी विचारधारा की महिला थी। अमृता बचपन से ही रूढियों के विरूद्व खडी होने वाली बालिका थीं ।
बचपन में अमृता ने देखा कि उनकी नानी की रसोई में कुछ बरतन और तीन गिलास अन्य बरतनों से अलग रखे रहते थे परिवार में सामान्यतः उन बर्तनों का उपयोग नहीं होता था । अमृता के पिता के मुसलमान दोस्तों के आने पर ही उन्हें उपयोग में लाया जाता था। बालिका अमृता ने अपनी नानी से जिद करते हुये उन गिलासों में ही पानी पीने की जिद की''

इस आलेख को पढने के लिए ''http://bhartiynari.blogspot.com/''पर आयें .

28.7.11

गंगानगर-- हम सब जानते हैं कि कुछ कोस पर भाषा,बोली बदल जाती है और अखबारों की खबरें भी । श्रीगंगानगर के अखबार में हम जो खबर पढ़ते हैं वह किसी कस्बे,शहर में रहने वाला नहीं पढ़ पाता। अखबार भले ही एक हो मगर खबर एक समान नहीं होती। ऐसे में श्रीगंगानगर से दूर रहने वाले ये नहीं जान पाते कि श्रीगंगानगर क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, शिक्षा, चिकित्सा, कला, साहित्य,…………. पटल पर क्या हो रहा है। अब सब वही पढ़ेंगे जो श्रीगंगानगर मे रहने वाले। इसके लिए हम शुरू कर रहें हैं ऑनलाइन गोविंद www।newsbox4u.com । आज जमाना इंटरनेट का है। धरती का कोई कोना ऐसा नहीं जहां इंटरनेट की पहुँच ना हो। जब इंटरनेट है तो www.newsbox4u.com भी होगा। हमारी योजना अगस्त के दूसरे सप्ताह में इसकी विधिवत आरंभ करने की है। यह क्षेत्र ऐसा है जिसमें हर पल सुधार,बदलाव,नयापन की आवश्यकता देखने को मिलती है। हमारा यह प्रयास होगा इसमें वो हर सामग्री हो जो आप लोग पढ़ना चाहते हो। संचालक,संपादक और पाठक की पसंद अलग अलग होती है। जरूरी नहीं है कि जो सामग्री पाठक पढ़ना चाहे वह संपादक दे। ऐसा भी हो सकता है कि संपादक तो देना चाहता है मगर संचालक की नीति में नहीं है। इसके बावजूद कोशिश रहेगी कि यह वेबसाइट सबकी चहेती बने। हम सबकी बात सबके साथ करेंगे। किसी की निंदा या चापलूसी करना कोई उद्देश्य नहीं। हां,आलोचना,प्रशंसा तो होगी ही। व्यक्तिगत छींटाकसी हमारी पत्रकारिता का हिस्सा नहीं रहा। फिलहाल इसको अंतिम रूप दिया जा रहा है। उम्मीद है कि यह जल्दी ही आपकी दिनचर्या का हिस्सा बनेगी।
----गोविंद गोयल,संपादक

गोरखालैंड- त्रिपक्षीय करार या भविष्य की टकरार

शंकर जालान



बीते कुछ सालों से गोरखालैंड के नाम पर पश्चिम बंगाल के विभाजन की मांग
को बीते सप्ताह उस वक्त विराम लगा, जब केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम,
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा
(जीजेएम) के लोगों के बीच त्रिपक्षीय करार हुआ और एक समझौते पर हस्ताक्षर
किए गए। राजनीतिक से प्रभावित लोग भले ही इस समझौते को गोरखालैंड का सटीक
हल माने, लेकिन जानकारों के मुताबिक इस त्रिपक्षीय करार में कहीं न कहीं
भविष्य में होने वाली टकरार नजर आ रही है। तृणमूल कांग्रेस समर्थकों के
शब्दों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पहल के कारण राज्य के विभाजन की
नौबत नहीं आई। वहीं वाममोर्चा, भाजपा समेत एवं अन्य विपक्षी दलों के
नेताओं ने समझौते पर असंतोष जताया। दूसरे शब्दों में कहे को समझौते के
कारण पहाड़ में कही खुशी तो कही गम का माहौल है।
समझौते पर हस्ताक्षर के लिए आयोजित समारोह में बनर्जी ने कहा- राज्य का
विभाजन नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल एक है और एक ही रहेगा। दार्जीलिंग
पश्चिम बंगाल का अविभाज्य अंग है। यह राज्य और इसके पर्वतीय हिस्सों का
हृदय-स्थल है। अब पर्वतीय और मैदानी भागों के लोग समृद्धि एवं विकास की
ओर बढ़ेंगे।
जिले के कुर्सियांग उपमंडल के पिनतैल गांव में आयोजित समझौता समारोह में
केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम भी शामिल हुए। यह ऐतिहासिक समझौता गोरखा
जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम), पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार के बीच हुआ है।
इस दौरान चिदंबरम ने कहा कि नई स्वायत्त संस्था का गठन इस समझौते का मूल
तत्व है। स्वायत्त संस्था को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन (जीटीए) नाम
दिया गया है जो निर्वाचित सदस्यों की अधिकार सम्पन्न परिषद होगी। इस
परिषद के पास 1980 के दशक में गठित दार्जीलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद
(डीजीएचसी) की तुलना में अधिक अधिकार होंगे।
खबर है कि नई पर्वतीय विकास परिषद का नाम गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन
रखे जाने के कारण मुख्यमंत्री बनर्जी को आलोचना का सामना करना पड़ रहा
है। कयास लगाया जा रहा है कि परिषद में शामिल लोग अंतत: अलग गोरखालैंड
राज्य गठन के लिए बाध्य कर सकते हैं। इस बाबत ने बनर्जी ने सफाई दी हमने
केवल अंग्रेजी के 'रीजनल' शब्द को 'टेरिटोरियल' में बदला है। इसके अलावा
विशेष कोई बदलाव नहीं हुआ है।
त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के विरोध में बंगाल और बांग्ला
भाषा बचाओ समिति ने 48 घंटे के बंद किया। इस वजह से के सिलीगुड़ी उपमंडल
और उसके पड़ोसी जलपाईगुड़ी इलाके में जनजीवन आंशिक रूप से प्रभावित रहा।
कस्बे में बड़ी दुकानें बंद रहीं, निजी बसें नहीं चलीं। सड़कों पर वाहनों
और ऑटो-रिक्शा की संख्या कम रही। सरकारी कार्यालयों में सामान्य रूप से
काम-काज हुआ। पुलिस ने बताया कि धरना देने वाले तीन लोगों को गिरफ्तार कर
लिया गया।
राजनीतिक के जानकारों के मुताबिक, त्रिपक्षीय समझौते के बावजूद अलग
गोरखालैंड राज्य की मांग पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, लेकिन गौरतलब यह
है कि यह मांग फिलहाल दब गई है। जीजेएम के अध्यक्ष विमल गुरुंग करार के
बाद भी अलग गोरखालैंड की मांग सिर्फ राजनीतिक विवशता के कारण कर रहे हैं।
गुरूंग भली-भांति जानते हैं कि यदि वे इस मांग से पीछे हटे तो उनका भी
हाल वही होगा जो कभी सुभाष घीसिंग का हुआ था।
मोटे तौर गुरुंग द्वारा पृथक गोरखालैंड की मांग किए जाने से फिलहाल इलाके
में किसी अशांति की आशंका नहीं है। जीटीए का चुनाव यदि छह महीने बाद होता
है तब भी चुनाव के बाद उसके पांच वर्ष के कार्यकाल तक पर्वतीय क्षेत्र
में शांति कायम रखने की कोशिश जीजेएम के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम
नहीं होगी।
वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि समझौते पर दस्तखत होने के साथ
ही चालीस महीने से पर्वतीय इलाके में जारी संघर्ष पर लगभग विराम लग गया
है। यही नहीं, समझौते पर दस्तखत होने के साथ ही पूरे पर्वतीय क्षेत्र के
लोग खुशी से झूम उठे उससे साफ है कि सरकार व प्रशासन पर यहां के लोगों का
भरोसा फिर से कायम हुआ है। ममतापंथी लोग इसे उनकी (ममता) की बड़ी
उपलब्धि मान रहे हैं। वे कहते हैं कांग्रेस जो काम सात साल में तेलंगाना
में नहीं कर पाई, उसे तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने महज दो महीने में कर
दिखाया। जीजेएम अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर अस्तित्व में आया और जल्द
ही पूरे दार्जिलिंग में उसकी तूती बोलने लगी। विमल गुरुंग उसके सबसे
शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे। उसी गुरुंग को ममता बनर्जी आज यदि जंगी
आंदोलन से विरत रहने के लिए राजी करा सकी हैं तो क्या यह कम बड़ी बात है?
त्रिपक्षीय करार कर ममता ने एक संदेश यह भी दिया है कि छोटी-छोटी
सांस्कृतिक अस्मिताओं को मान्यता देने में सरकारों को उदारता दिखानी
चाहिए। अलगाववादी आंदोलनों से निपटने के लिए सरकारें जब-जब बल प्रयोग
करती हैं तब-तब परिस्थिति और जटिल होती है।
वहीं, वाममोर्चा व भाजपा समेत अन्य दलों के नेता इस समझौते को
दार्जिलिंग समस्या का अंतिम समाधान नहीं मान रहे हैं इन नेताओं का कहना
है कि समझौता और समाधान एक चीज नहीं हैं। यह भी सही है कि सुलह-समझौता
दरअसल समाधान की तरफ बढ़ने वाला एक कदम होता है। इस कदम से यदि अंतिम
समाधान की राह प्रशस्त होती है तब भी यह बेहद तात्पर्यपूर्ण है।
दार्जिलिंग के लोगों की बड़ी शिकायत यह रही है कि सरकार इस क्षेत्र से
खूब राजस्व उगाहती है, पर यहां के विकास पर खर्च बहुत कम करती है।
सरकारी पक्ष के लोग यह दलील दे रहे हैं कि तितरफा समझौते में जीटीए को
सिर्फ भारी बजट ही नहीं दिया गया है, उसे विकास काम में अपने हिसाब से
खर्च करने की आजादी भी दी गई है। यदि इस धनराशि का दुरुपयोग नहीं हुआ तो
निश्चित ही पहाड़ का परिदृश्य बदलेगा। ममता दार्जिलिंग समेत विकास में
पिछड़े पूरे उत्तर बंगाल में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए
सचेष्ट हैं। जीटीए करार के उपरांत उन्होंने पूरे उत्तर बंगाल के लिए जो
पैकेज घोषित किया है, उसका यदि सही-सही क्रियान्वयन हुआ तो उत्तर बंगाल
से भेदभाव बरतने और विकास में सौतेला व्यवहार किए जाने से बढ़ती गई
क्षेत्रीय असंतुलन की खाई पाटने में निश्चित ही मदद मिलेगी।

क्यों, आखिर मैं क्यों हूँ...

कौन हूँ मैं...
अभी कुछ दिनों पहले ही तो
ये सवाल आया था मेरी जिंदगी में
जवाब खोज पाता इससे पहले ही
एक नया सवाल आ खड़ा हुआ है
मेरे वजूद के आगे...
क्यों हूँ मैं???
हाँ... आखिर क्यों हूँ मैं
जरूरत क्या है मेरी इस धरती पर
किसे है, क्यों है
क्या हर बार हारने के लिए मैं हूँ
या फिर ग़मों का बोझ उठाने के लिए मैं हूँ
क्या हर कदम पर अपनी इक्षाओं की
अर्थी उठाने के लिए मैं हूँ
ये फिर अपनी हसरतों को खोने के लिए मैं हूँ
मैं क्यों हूँ... हाँ, मैं क्यों हूँ...
दुनिया की कटुता पाने के लिए मैं हूँ
या फिर रात अँधेरे आंसुएं बहाने के लिए मैं हूँ
अकेलेपन में जीते हुए मरने के लिए मैं हूँ
या सिर्फ दुनिया की भीड़ बढाने के लिए मैं हूँ
क्यों, आखिर मैं क्यों हूँ...
अपने सपनो को आँखों के भीतर ही ख़त्म करने को मैं हूँ
या रात भर जागते हुए मौत के सपने देखने को मैं हूँ
दिन रात खुशियों का इन्तजार भर करने को मैं हूँ
या फिर मैं सिर्फ न होने के लिए मैं हूँ...
क्यों हूँ मैं, आखिर क्यों हूँ मैं???

बाबा रामदेव और अन्ना हजारे अलग-अलग क्यों?


बाबा रामदेव और अन्ना हजारे अलग-अलग क्यों? 

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बाबा रामेदव लम्बे समय से अपने योग शिविरों में जनान्दोलन चलाते आ रहे हैं| उन्होंने कुछ बड़ी रैलिया भी की हैं और देशभर में जनजागरण अभियान चलाया हुआ है| वहीं दूसरी ओर अन्ना हजारे भी लम्बे समय से महाराष्ट्र में रहकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ते आ रहे हैं| जन्तर-मन्तर पर अनशन से पूर्व उनको बाबा रामदेव की तुलना में बहुत कम लोग जानते थे| अन्ना के अनशन का असर यह हुआ कि बाबा रामेदव ने स्वयं अन्ना के मंच पर पहुँचकर, अन्ना हजारे के आन्दोलन को समर्थन दिया| जिससे देश को लगा कि बाबा रामेदव का असल मकसद भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूद करना है, न कि उन्हें स्वयं सत्ता हासिल करनी है|अनशन समाप्त हुआ और जन लोकपाल बिना बनाने की कमेटी के गठन के साथ ही बाबा रामेदव एवं अन्ना हजारे के बीच वैचारिक मतभेद की खबरें भी मीडिया के माध्यम से जनता तक आने लगी| जो लोक अन्ना का प्रचार-प्रसार करते नहीं थक रहे थे, अचानक वे अन्ना के विरोधी और बाबा रामेदव के समर्थक हो गये| बाबा रामेदव ने रामलीला मैदान में अनशन किया| पहले सरकार ने बाबा की अगवानी की| बाबा से बन्द कमरें में चर्चाएँ की और उसी सरका ने अनशन को समाप्त करने के लिये अनैतिक, असंवैधानिक और अमानवीय रास्ता अख्तियार किया| इसके बाद बिना किसी उपलब्धि के बाबा का अनशन टूट गया| इससे बाबा रामेदव का ग्राफ एकदम से चीचे आ गया|इसके बाद फिर से अन्ना हजारे ने अनशन करने की घोषणा कर दी और साथ ही अपने मंच पर बाबा रामेदव के आने पर सार्वजनिक रूप से शर्तें लगा दी हैं| जो बाबा रामेदव आगे से चलकर जन्तर-मन्तर पर अन्ना हजारे को समर्थन देने गये थे, उन्हीं बाबा रामेदव को अब अन्ना हजारे अपने मंच पर नहीं आने देना चाहते हैं! यह अकारण नहीं हो सकता| देश के लोगों के बीच इस बारे में अनेक प्रकार की भ्रान्तिया पनप रही हैं|इस प्रकार से दोनों अनशनों के बाद से देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाले दो बड़े नाम उभरकर सामने आ रहे हैं-बाबा रामेदव एवं अन्ना हजारे| इस कारण से देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रहा आन्दोलन बौंथरा होता जा रहा है| जनता को समझ में नहीं आ रहा है कि देश का मीडिया बता रहा है, उसमें कितनी सच्चाई है?दूसरी ओर इस देश के मीडिया की विश्‍वसनीयता सन्देह के घेरे में है| ऐसे में आम व्यक्ति का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी वैकल्पिक मीडिया की है| जिसे वैकल्पिक मीडिया एक सीमा तक निभा भी रहा है, लेकिन वैकल्पिक मीडिया भी सामन्ती मीडिया, साम्प्रदायिक मीडिया, वामपंथी मीडिया, धर्मनिरपेक्ष मीडिया, दलित मीडिया, धर्मनिरपेक्ष मीडिया, अल्पसंख्यक मीडिया आदि कितने ही हिस्सों में बंटा हुआ नजर आ रहा है| केवल इतना ही नहीं, वैकल्पिक मीडिया पर आधारही आलेखों के प्रकाशन और लेखन का ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ नहीं जानने वाले घटिया पाठकों की घटिया, संकीर्ण, स्तरहीन और असंसदीय टिप्पणियों को बिना सम्पादकीय नियन्त्रण के प्रकाशन के कारण भी वैकल्पिक मीडिया की उपस्थिति एवं समाज में विश्‍वसनीयता संन्देह के घेरे में है|ऐसे में बाबा रामेदव और अन्ना हजारे के बीच बंट चुके भ्रष्टाचार विरोधी जनान्दोलन के बारे में आम जनता को सही, पुष्ट एवं विश्‍वसनीय जानकारी नहीं मिल पाना दु:खद और निराशाजनक है| इन हालातों में देशभर में प्रभावी प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से तो पूर्ण निष्पक्षता की आशा नहीं की जा सकती और ले-देकर वैकल्पिक मीडिया से ही इस बारे में कुछ करने की अपेक्षा की जा सकती है|अत: वैकल्पिक मीडिया को चाहिये कि देशहित में बाबा रामदेव एवं अन्ना हजारे के बारे में अभी तक सामने आये पुष्ट एवं विश्‍वसनीयों तथ्यों और जानकारी के प्रकाश में कुछ बातें ऐसी हैं, जिन पर खुलकर चर्चा की जाये और देश के लोगों को अवगत करवाया जाये कि ये दोनों अलग-अलग क्यों हैं और देश के प्रमुख तथा विवादास्पद मुद्दों पर दोनों के क्या विचार हैं| जिससे देश की जनता को दोनों में से एक को चुनने में आसानी हो सके या दोनों को मिलकर कार्य करने के लिये सहमत किया जा सके| इस चर्चा को विस्तार देने के लिये विद्वान लेखकों और पाठकों को आगे आना चाहिये| मेरा मानना है कि बाबा रामदेव एवं अन्ना हजारे के बारे में निम्न विषयों पर चर्चा होनी चाहिये और भी बिन्दु जोड़े जा सकते हैं:-१. संविधान की गरिमा के प्रति कौन कितना संवेदनशील हैं?२. आमजन से जुड़े भ्रष्टाचार, अत्याचार, व्यभिचार, कालाबाजारी, मिलावट आदि विषयों के प्रति दोनों के क्या विचार हैं?३. देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में किसको कितनी आस्था है?४. संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार के तहत स्त्रियों को समान नागरिक मानने और हर एक क्षेत्र में स्त्रियों को समान भागीदारी के बारे में दोनों के विचार?५. चुनावी भ्रष्टाचार के समाधान के बारे में दोनों के विचार और समाधान के उपायों का कोई खाका?६. इस देश की व्यवस्था पर आईएएस का कब्जा है जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबकर भी पाक-साफ निकल जाते हैं| इनकी तानाशाही पर नियन्त्रण पर दोनों के विचार?७. दलित, आदिवासी और पिछड़े, जिनकी देश में लगभग ६५ प्रतिशत आबादी मानी जाती है को प्रदत्त आरक्षण एवं इसकी सभी क्षेत्रों में अनुपातिक भागीदारी के बारे में दोनों के विचार क्या हैं? मेरी दृष्टि में इस देश में इस ६५ प्रतिशत आबादी का यह मुद्दा किसी भी मामले में निर्णायक भूमिका निभाने वाला है, क्योंकि लोकतन्त्र में वोटबैंक की ताकत सबसे बड़ी ताकत है और इस वर्ग का वोट ही सत्ता का निर्धारक है|८. अल्पसंख्यकों, विशेषकर इस्लाम के अनुयाईयों के बारे में दोनों के क्या विचार हैं? यह मुद्दा इस कारण से अधिक संवेदनशील है, क्योंकि भारत में से पाकिस्तान का विभाजन इस्लामपरस्त लोगों की अलग राष्ट्र की मांग को पूरा करने के लिये हुआ था| लेकिन देश के स्वतन्त्र और निष्पक्ष चिन्तकों के एक बुद्धिजीवी वर्ग का साफ मानना है कि इस्लाम के नाम पर अलग से राष्ट्र का निर्माण हो जाने के बाद भी इस्लाम के जो अनुयाई धर्मनिरपेक्ष भारत में ही रुक गये| उनकी देशभक्ति विशेष आदर और सम्मान की हकदार है| अत: उनके धार्मिक विश्‍वास एवं राष्ट्रीय आस्था को जिन्दा रखना भारत की धर्मनिरपेक्ष सरकारों का संवैधानिक दायित्व है|९. भूमि-अधिग्रहण के बारे में आजादी से पूर्व की नीति ही जारी है| जिसका खामियाजा देश के किसानों को भुगतना पड़ रहा है| इस बारे में दोनों के विचार|१०. जिन धर्मग्रंथों में हिन्दु धर्म की बहुसंख्यक आबादी का खुलकर अपमान और तिरस्कार किया गया है| यह देश के भ्रष्टाचार से भी भयंकर त्रासदी है| इन सभी धर्मग्रंथों पर स्थायी पाबन्दी के बारे में दोनों के विचार? ११. भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ पहली बार आन्दोलन नहीं हो रहा है| पूर्व में भी भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को सफलता मिली थी| सरकारें भी बदली, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही| ऐसे में अब सत्ता नहीं, व्यवस्था को बदलना जनता की प्राथमिकता है| अत: दोनों में से कौन तो व्यवस्था को बदलने के लिये कार्य कर रहे हैं और कौन स्वयं सत्ता पाने या किसी दल विशेष को सत्ता दिलाने के लिये काम करे हैं|पाठकों, विचारकों से मेरा विनम्र निवेदन है कि इस बारे में खुलकर चर्चा (बहस नहीं) करनी चाहिये| इन विषयों में कोई गलत चयन किया गया है तो उसे सतर्क सुचिता पूर्वक नकारें और यदि कोई महत्वूपर्ण विषय शेष रह गया है, तो उसे जोड़ें| आशा है कि इस बारे में देश का प्रबुद्ध वर्ग अवश्य ही विचार करेगा?

राष्ट्र निर्माण की ओर कैसे बढ़ें ?

श्री अटल बिहारी वाजपेयी को मैं यह आलेख समर्पित करता हूँ । इसलिए कि अपनी असफलता के बावजूद वो भारतीय प्रजातंत्र में अबतक के महानतम प्रधान मंत्री हैं ।हिन्दुओं के साथ साथ लखनवी मुसलमानों का भी आदर उन्हें प्राप्त रहा है ।


जब राष्ट्र निर्माण की बात आती है तो प्रश्न उठता है कि क्या आज राष्ट्र नहीं है ? है भी और नहीं भी ।


है ,क्योंकि नहीं होने पर इसके निर्माण का भी प्रश्न नहीं उठता । 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । ' -गीता । मेरी कल्पना में राष्ट्र है और चारों ओर वह सामग्री विखरी पड़ी है , जो इसके इतिहास का जीवित भग्नावशेष है । उसी की तलाश और रचनात्मक अव गुम्फन । यही तो करना है हमें ।





राष्ट्रनिर्माण कोरा आदर्शवाद नहीं है । अतः ऐसे लोगों को हमें सादर दरकिनार कर देना चाहिए जो आदर्शवादी लफ्फाजी से हमें खतरों के प्रति असावधान करते हैं तथा सब्जबाग दिखा कर भोले भाले लोगों की वाह वाहियाँ लूटते हैं । ऐसे लोग स्वयं भी भोले होते हैं अतः सादर ।





दूसरा बड़ा ख़तरा गद्दारों से है । गद्दार हमारे घर में ही रहते हैं । फिर हरेक व्यक्ति में अनेक व्यक्ति रहते हैं ।


अतः गद्दार हमारे मन में भी हो सकते हैं । उनके प्रति हमें उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाना चाहिए । क्योंकि निकाले जाने पर वो विभीषण (यद्यपि विभीषण अपनी श्रीराम भक्ति के लिए आदरणीय हैं ) की तरह शत्रु के संबल बन जाते हैं ।


पर उपेक्षित होने पर उनके अन्दर राष्ट्रभक्त अगर कहीं है तो वह जागना चाहता है । जगे हुए राष्ट्रभक्त को उपेक्षित नहीं करना चाहिए पर गद्दारी के हर एक कृत्य की उन्हें सजा अवश्य मिलनी चाहिए । अपनी गलती के लिए अपने खिलाफ भी सजा मुक़र्रर करनी चाहिए । क्रमशः ।








SHRI RADHA-KRISHNA SONG.



M.K.TV.FILMS 

AND 

MARKAND DAVE 

AHMADABAD-
GUJARAT 

PRSENTS

SHRI RADHA-KRISHNA SONG.

"BAHIYAN PAKADO NA OHRE GIRIDHARI"



SINGER-KRUTI JANI.

SONG WRITER-COMPOSER-

MUSIC DIRECTOR.

MARKAND DAVE.

RECORDIST-NILESH RATHOD.

MARKAND DAVE-DATE-28-07-2011.

पाक हिना का रंग !


पाक  हिना का रंग   !
Hina Rabbani Kher
हिंद-पाक वार्ता  आशा नयी जगाती है ;
भाइयों के बीच आई दूरियां मिटाती  है ;
''कृष्ण ''की बंसी  सदा से प्रेम राग गाती है ;
देखते हैं  पाक हिना  कैसा रंग दिखाती है ?
      
                        शिखा कौशिक



भारत में बहुलवाद : एक महान परम्परा


बहुलवाद का भारत में एक महान परम्परा रहा है  और हम भारतीयों के लिए कोई नयी चीज नहीं है | हमारा इतिहास बहुत से ऐसेपरम्पराओ से भरा पड़ा है | भला हम वसुधैव कुटुम्बकम को कैसे भूल सकते है ये उस समय कहा गया था जब सारी दुनिया सभ्यता की ककहारा पढ़ रही थी तभी से हमने सारे विश्व को एक परिवार माना था | प्राचीनभारत में भले ही वैदिक धर्म मुख्य धर्म थालेकिन समय के साथ कितने ही हमारे महापुरुषों ने अपनी अपनी विचारधाराओ को लोगो के सामने रखा है और वो नए धर्म कोहमने हमेशा स्वागत किया है और कई राजाओ ने तो इन्हें संरक्षित घोषित कर रखा था |

प्राचीन भारत में जब वैदिक धर्म अपने उत्कर्ष पर था तभी भारत में दो नए धर्मो का उदय हुआ और वो आगे चलकर पुरे दक्षिणऔर पूर्व एशिया में फ़ैल गया यह वही समय था जब यूनान में सुकरात और येरुसलम में महात्मा यीशु को अपने नए विचारधाराओकी कीमत जान दे कर चुकानी पड़ी | भारत बहुत से धर्मो के लिए आश्रय भी साबित हुआ और दुनिया के तकरीबन सारे धर्म यहाँएक साथ शांति के साथ मनाया जाता था | चाहे वो यहूदी धर्म हो या महर्षि जरथुस्त्र के द्वारा पारसी धर्म हो सभी धर्म भारत आयेऔर कभी भी इन धर्मो ने यहाँ प्रतिरोध या दमन का सामना नहीं करना पड़ा | फारस में जब इस्लामिक धर्म अपने उदय पर था तबवह के पुराने पारसी धर्म का जबरदस्त हिंसक दमन हुआ और कुछ पारसी अपने जहाजो पर सवार होकर गुजरात और महाराष्ट्र मेंशरण लिया और ये धर्म आज अपने मूल स्थान इरान से बिलुप्त होने के कगार पर है लेकिन भारत में यह धर्म अभी भी फल फुलरहा है|

बहुत सारे लोगो का मानना है की इस्लाम भारत में उस समय आया जब मोह्हमद - बिन कासिम ने सिंध को फतह किया था लेकिन ये सरासर गलत बात है इस्लाम उससे पहले ही भारत आ चूका था और दक्षिण भारत के इलाके खास कर केरल में यह पहले ही अरब व्यापारियों के माध्यम से आ चूका था | और उसके बाद अरब और तुर्क शासक
अपने साथ इस्लाम को यहाँ लाये और यहाँ भी इस्लाम खूब फला फुला |
 धर्म ही नहीं हमने तो दुसरो के कलाओ का भी बहुत क़द्र किया है इसी लिए आपको अगर उतर भारत में अफगान और ईरानी स्थाप्य कला मिलेगी तो दक्षिण भारत के कुछ स्मारक आपको रोमन स्थाप्य कला की झलक दिखाते है |

वर्तमान में भी भारत की छवि पुरे विश्व में एक ऐसे भारत की है जहा भिन्न भिन्न समुदाय, धर्मं के लोग एक साथ शांति और भाईचारे के साथ रहते है और आपको यहाँ हर धर्मं के प्रार्थना स्थल मिल जायेंगे अभी हाल में ही संपन्न हुए राष्ट्रमंडल खेलो में जहाप्राचीन भारत की झलक योग और ताप द्वारा दिखाया गया वही मध्य कल का झलक सूफी नृत्यों और गान के जरिये भी सारेविश्व को यहाँ के महान सभ्यता का सन्देश दिया गया | अनेक संस्कृतियों और भाषाओ के चलते हमारे देश में अनेकता में एकतावाली बात दिखती है और बहुलवाद का ऐसा सुंदर उदहारण शायद ही कही और मिले
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