Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

29.3.13

महान हैं आसाराम जैसे संत..!


संत का नाम लेते ही मन में एक ऐसी छवि उत्पन्न होती है जो सांसारिक सुख-सुविधाओं से कोसों दूर हो। उसका आचरण ऐसा हो कि लोग उसे अपने जीवन में अपनाएं। उसका रहन सहन ऐसा हो कि लोग उसकी मिसाल दे। वो सिर्फ लोगों को उपदेश ही न दे बल्कि अपनी कही बातों को अपने जीवन में भी आत्मसात करे। वह लोगों को सतमार्ग में चलने की और बुराइयों से दूर रहने की सीख दे।
लेकिन क्या आज के समय में वाकई ऐसे लोग हैं..? क्या आज के समय में ऐसे लोग हैं जो संत कहलाने लायक हैं..? जिनका हमें आंख मूंद कर अनुसरण करना चाहिए..? अगर आप इसका जवाब हां में देने की सोच रहे हैं तो पहले आसाराम बापू के बारे में अपना सामान्य ज्ञान अपडेट कर लीजिए।
आसाराम बापू...नाम तो सुना ही होगा आपने...कभी टीवी पर प्रवचन देते भी सुना होगा। मन को मोह लेनी वाली बड़ी अच्छी और मधुर बातें करते हैं आसाराम बापू। लेकिन क्या वाकई में यही आसाराम बापू का वास्तविक चरित्र है..? क्या आसाराम बापू अपनी कही बातों को अपने जीवन में आत्मसात करते हैं..? वैसे तो दिल्ली गैंगरेप के मसले पर आसाराम बापू की बेतुकी टिप्पणी ही काफी थी उनके चरित्र को जानने के लिए लेकिन बापू के बोल  यहीं नहीं थमे। (जरूर पढ़ें- दिल्ली गैंगरेप- "राम राम" आसाराम)
होली पर आसाराम खूब पानी बहाते हैं लेकिन पानी की बर्बादी आसाराम को गलत नहीं लगती..! वे कहते हैं कि पानी किसी के बाप का नहीं है...जब पानी किसी के बाप का नहीं है तो फिर आपके बाप का भी नहीं है न महाराज..! (पढ़ें- भगवान से है यारी, बारिश करवा दूंगा: आसाराम)
आसाराम कहते हैं वे जब चाहें बारिश करवा सकते हैं...तो करवा दो न महाराज बड़ी कृपा होगी आपकी इस देश पर..! कम से कम हिंदुस्तान को आप जैसे संत होने का फायदा तो मिलेगा..! आज तक तो सिर्फ अंधविश्वास ही मिला है..!  कम से कम सूखे से परेशान  किसान आत्महत्या तो नहीं करेंगे..!
खुद को संत कहते हैं लेकिन आसाराम का अभिमान देखिए...इनका आचरण देखिए..! धर्म के नाम पर लोगों की आंखों में अंधविश्वास की पट्टी बांधकर अपना धंधा चलाना कोई इनसे सीखे..! बात सिर्फ आसाराम बापू की ही नहीं है...हिंदुस्तान में ऐसे संतों की फेरहिस्त कभी न खत्म होने जितनी लंबी है।
वैसे दोष आसाराम या इनके जैसे दूसरे संतों का भी नहीं है...जब अंधविश्वास में डूबे लोग आंख मूंदकर ऐसे संतों की जय जयकार करेंगे तो ऐसा ही होगा। क्यों न ये खुद को भगवान समझेंगे..? क्यों न ये भगवान को अपना यार कहेंगे..? क्यों न ये कहेंगे की मैं जब चाहूं...जहां चाहूं बारिश करवा सकता हूं..!
ये अच्छी तरह जानते हैं कि इनके अंध भक्त इनकी हर बात पर आंख मूंदकर यकीन कर लेंगे और ये उन्हें मूर्ख बनाते रहेंगे..! और  ये सब उस वक्त तक चलता रहेगा जब तक कि इनके अंध भक्तों के आंखों से अंधविश्वास की पट्टी नहीं खुलेगी और ये लोग ऐसे लोगों को भगवान का दर्जा देना बंद नहीं करेंगे..! लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा कभी होगा इसकी उम्मीद कम ही है..!

deepaktiwari555@gmail.com

28.3.13

“राज” नीति- जम्मू कश्मीर से तमिलनाडु तक


कौन कहता है कि नेता जनता के लिए नहीं लड़ते..? उनकी हक की आवाज़ नहीं उठाते..? उनके लिए लड़ाई नहीं लड़ते..? उन्हें जनता की चिंता नहीं है..? नेताओं को जनता की चिंता भी है और वे उनके हक की आवाज़ भी उठाते हैं बशर्ते इसमें उनका भी तो कुछ फायदा होना चाहिए। नेताओं को वैसे भी जनता से क्या चाहिए एक अदद वोट। इस एक वोट के लिए तो हमारे नेतागण किसी भी हद तक जा सकते हैं..! वोटों को साधने का कोई मौका ये नेता नहीं छोड़ते चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े..!
हिंदुस्तान की राजनीति कुछ ऐसे ही चलती है। बरसों से यही तो होता आ रहा है। अलग – अलग राज्यों की भाषा, संस्कृति अलग- अलग है लेकिन नेताओं का चरित्र बिल्कुल एक  जैसा है..! उत्तर से लेकर दक्षिण तक की हालिया राजनीतिक हलचलें इस तस्वीर की धुंधलाहट को और साफ करती है। शुरुआत वर्तमान में सबसे चर्चित दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से करते हैं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को चेन्नई में आईपीएल मैचों में श्रीलंकाई खिलाड़ियों के खेलने पर एतराज है। इतना ही नहीं वे भारत सरकार से श्रीलंका से मैत्रीपूर्ण संबंध खत्म करने तक की वकालत करती हैं। उन्हें श्रीलंका को भारत का मित्र देश कहने में तक आपत्ति है। जयललिता तो जयललिता द्रमुक प्रमुख करुणानिधि को ही देख लिजिए।
श्रीलंकाई तमिलों के लिए केन्द्र सरकार से समर्थन तक वापस लेने से पीछे नहीं हटे। आखिर क्यों..? श्रीलंका के तमिलों के हितों की रक्षा के बहाने खुद को तमिलों का सबसे बड़ा हितैषी जो साबित करना है तभी तो तमिलनाडु में तमिलों की सहानुभूति हासिल कर पाएंगे..!
जयललिता के तेवर देखकर तो ऐसा लगता है कि जैसे तमिलनाडु में रहने वाले तमिलों को कोई दुख तकलीफ है ही नहीं..! जैसे तमिलनाडु में न तो तमिलों के मानवाधिकारों का हनन होता है और न ही तमिलों के साथ किसी तरह की ज्यादती..!
मैडम जी अच्छा लगा सुनकर कि आपको श्रीलंकाई तमिलों की चिंता है लेकिन पहले अपने राज्य के हालात तो सुधार लें...उनकी सुध तो ले लें...फिर करना श्रीलंकाई तमिलों की चिंता..!
जयललिता जी राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो(एनसीआरबी) के आंकड़े कहते हैं कि 2011 में देश में अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश(33.4 %) के बाद दूसरा नंबर तमिलनाडु (11.5 %) का है। आपको अपने घर को आग से बचाने की चिंता नहीं है लेकिन दूसरे के घर की आग की भभक आपको परेशान कर रही है।
वोटों के लिए हमारे एक और राज्य बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आजकल कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उन्हें बिहार को हर हाल में विशेष राज्य का दर्जा जो दिलवाना है। कभी बिहार में तो कभी दिल्ली में बिहार के लोगों के नाम पर उनके हक की बात करते दिखाई दे रहे हैं। इस बहाने बिहार की जनता का हितैषी कहलाने का तमगा भी हासिल कर लेंगे ताकि आम चुनाव में भी बिहार की जनता इनकी पार्टी के उम्मीदवारों को जिता कर संसद पहुंचाए..!
इन सब से दो कदम आगे हैं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला। साहब जिस देश में रहते हैं...जिस देश की खाते हैं उसके खिलाफ बोलने में नहीं हिचकते..! मानवता की दुहाई देकर देश के दुश्मनों की पैरवी करने का कोई मौका नहीं चूकते..! अफजल गुरु की फांसी के बाद उमर की प्रतिक्रिया को याद ही होगी आप सभी को। उमर की प्रतिक्रिया से तो ऐसा लग रहा था मानो अफजल को फांसी देकर सरकार ने बड़ी गलती कर दी..!
इन साहब को भी सिर्फ वोट ही दिखाई देते हैं। सीमा पार से आकर भारतीय सैनिकों का सिर कलम करने वाले या देश की संसद पर हमला करने वाले इन्हें नहीं दिखाई देते..! इन्हें तो कश्मीर में जवानों का हथियार लेकर चलने में तक आपत्ति है..! इनका बस चले तो आतंकी अगर जवानों पर हमला करें तो ये जवानों को मुकाबला करने के लिए लाठी पकड़ा दें..! हाल ही में सीआरपीएफ जवानों पर आतंकियों ने जब हमला किया तो क्या ऐसा नहीं हुआ था..?
ये कहानी सिर्फ तमिलनाडु, बिहार या जम्मू-कश्मीर की ही कहानी नहीं है...सभी राज्यों में कुछ ऐसा ही हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि हर राज्य में ये काम करने वाले सत्ताधारी दल के नेता अलग – अलग हैं...उनकी पार्टी अलग है लेकिन सबके तीर का निशाना एक ही है...वोटबैंक..! आखिर सत्ता की चाबी हासिल करने का यही तो सबसे सटीक तरीका जो लगता है इन्हें..!
विडंबना देखिए फैसला तो जनता को ही करना होता है लेकिन हमारे देश की जनता बड़ी भोली है...हर बार नेताओं की मीठी बातों पर इनके झूठे वादों पर एतबार कर लेती है...और इन्हें सौंप देती है सत्ता की चाबी...लेकिन बड़ा सवाल तो ये है कि आखिर कब तक..? क्या जनता समझ पाएगी इन नेताओं का चरित्र..?

deepaktiwari555@gmail.com

ddd

27.3.13

कल होलिका दहन था । वह तो हो चुका  । अब होली की बारी है ।
होली मुबारक हो -

vkt gksyh gS A esjh Hkh gksyh gS A FkksM+h nsj igys ?kj ls fudyk gSyesV igu ds A vki lkspsaxs \ gka ] blls igys fd eq>s muds xys yxuk iM+s ftuds xys eSa ugha yxuk pkgrk ;k fd tks esjs xys ugha yxuk pkgrs ;k ge nksuks gh ,d nwljs ds xys ugha iM+uk pkgrs ysfdu gksyh dh etcwjh gesa xys feyokuk pkg jgh gS A eSa igys gh ,slh fdlh Hkh laHkkouk ls fuo`Rr gksdj ds fudyk gwa A mxys laca/kksa dsk fuxyuk vkSj fQj ls mUgsa fdlh pkSjkgs ij mxys gq, dh rjg [kM+k gksdj ns[kuk vkSj fQj >sai >saikdj eaqg eksM+rs gq, nk;sa ck;sa flj mBk;s py nsuk vkSj fQj nksuksa ckrksa ds fy, eu elksl dj jg tkuk fd D;ksa dj rks jax yxk;k Fkk vkSj D;ksa eqag eksM+ fy;k ]esjs cl esa bruh fofp= jaxhu fp=dkjh dk dkS’ky ugha gS A
xkao ds ikl dk ,d pkSjkgk ftl ij ,d Qyokyk vkt Hkh [kM+k gS A vius pwYgs dks ftank j[kus dh mEehn esa A eSa dHkh dHkkj gh blls Qy ysrk gwa A mlds psgjs ij dqN jax gSa A yky ihys gjs A nks rhu ckbzd esa dqN ;qod vkrs gSa vkSj mldsk jax yxkrs gSa A mlds ,d ntZu dsys mBkdj mM+Uk Nwa gks tkrs gSa A og xkfy;ka nsrk gS vkSj os gksyh gS ls mldk tokc ns nsrs gSa A Qy okys ds psgjs ds jax mM+ x;s gSa A lksprk gwa ] vkt ds fnu Qy dh nqdku A fgEer gS A
,d yM+dh thal VkWi esa lt /kt ds fcuk jax vius [kwclwjr ilZ dks dka/ks ij Vkaxs pyh tk jgh gS A fdlh dke ls ;k dke ij A fgEer gS A vkt ds fnu ,sls dkSu fudy ldrk gS \ [kqn ls iz’u gS A dkSu lk vkWfQl [kqyk gS \
FkksM+k vkxs c<+rk gwa A ,d ifjfpr feyrs gSa A gSyesV mrkjrk gwa A gksyh gS --------------------
,d fe= ds ?kj tkuk gS A vkokt yxkrk gwa A dksbZ ugha gS ‘kk;n A ij Q’kZ ij ikuh fc[kjk iM+k gS A ysfdu iksaNk Hkh yxk gS A--------------
,d LFkku gS A nqdku A Hkjh xeZ nqigjh esa Hkh ;gka dk ‘kVj vDlj vk/kk [kqyk gh jgrk gS vkSj vkB nl csofM+;s vDlj ;gka lqjk lsou gsrq lTt jgrs gSa vkSj Hkjld dksf’k’k gksrh gS fd mudh gj ‘kke eLrkuh gks tk, A oSls os fnu esa Hkh eLr jgrs gSa A blfy, dqN djrs ugha A mudsk vki dqN ugha dg ldrs A dgsaxs rks vkidks pqVdqyk ;kn vk,xk &
,d O;fDr & fHk[kkjh ls & Hkh[k D;ksa ekaxrs gks \
fHk[kkjh & rks D;k d:a \
O;fDr & dke djks A
fHk[kkjh & mlls D;k gksxk \
O;fDr & iSlk dekvksxs A
fHk[kkjh & mlls D;k gksxk \
O;fDr & lkjh phtsa rqEgkjs ikl gksaxh A dksbZ deh ugha gksxh A
fHk[kkjh & mlls D;k gksxk \
O;fDr & mlls fQj vkjke djksxs A
fHk[kkjh & vkjke rks eSa vc Hkh dj jgk gwa A mlds fy, bruh esgur D;ksa d:a A
-----------------------------------------------------
Rks ;gh fLFkfr bu csofM+;ksa dh gS A vkt budk fnu gS A bUrtke iq[rk gSa vkSj lHkh izlUu gSa A oSls Hkh vc mRrjk[kaM ljdkj us ubZ ckj ikWfylh ykxw dh gS A Hkfo”; buds fy, lqugjk gS A esjs tSls ‘kq”d iq:”k bl ckjs esa viuh dye dh L;kgh gh cckZn dj ldrs gSa A
---------------------------------------------------
Ekgkjk”Vª esa vdky gS A lar vklkjke ij fiNys fnuksa gksyh ij ikuh cckZnh ds vkjksi yxs A os ehfM;k ij xfj;k, A iqu% vkt mudh gksyh dk izlkj.k gqvk gS A ty izlkn ls mUgksaus vius HkDrksa dks ljkcksj dj fn;k gS A lar dk dFku gS & gekjh tc fdLer vPNh gS rks tyus okys tyk djsa A lar dh ;g ok.kh lqudj eSa lar dh ifjHkk”kk Hkwy x;k gaw A mnsfr lfork rkez% rkez ,okLresfr p A laiRrkS p foiRRkkS p egrkesd:irk AA laifRr vkSj foifRr esa lar mn; vkSj vLr ds lw;Z dh rjg ,d o.kZ gh jgrs gSa A eSaus rks ;gh i<+k gS A gSyhdkWIVj nq?kZVukls cps lar dks mudh fdLer dk gh lgkjk gS vkSj ‘kk;n blh us mUgssa izeknh cuk fn;k gS A luRlqtkrh;e~ ,d laLd`r xzUFk gS A dgrk gS & izekn ,o e`R;q% A ;kfu izekn ;kfu ykijokgh gh e`R;q gS A bZ’oj larHkDrksa dh j{kk djs A
eSa vDlj gksyh ls cprk gwa A jaxksa dh feykoV fj’rksa dh cukoV dh rjg jkl ugha vkrh A vc og lkewfgd <ksye`nax dh Fkki ugha gksrh tks cpiu ls ns[krs vk;s Fks A rc iSlk ugha Fkk A fj’rs Fks A iSls ds l vkSj fj’rs ds ‘k esa fe=rk gks xbZ gS vkSj ‘k ‘k ‘k-------------------nwjh cuk, j[ksa A iSlk flQZ vgadkj gh ugha c<+krk A nwfj;ksa esa bZtkQk dj nsrk gS A mipkj ds Qsj esa u iM+s A vc esjs ikl iSlk vk,xk rks dkSu tkus eSa Hkh ---------------------A
gksyh esa yksx igpkus ugha tkrs A tc jax mrjrk gS ;k vkokt lqurk gwa rHkh igpku ikrk gwa A tc gksyh ugha gksrh rc rks fcYdqy ugha igpku ikrk gwa A tc Hkh th pkgs ubZ nqfu;ka clk ysrs gSa yksx A ,d psgjs ij dbZ psgjs yxk ysrs gSa yksx AA
vkJeksa esa Hkh gksyh gS A gfj}kj vkJeksa vkSj eafnjksa dk ‘kgj gS A lar Hkh gksyh ds jax esa ljkcksj gSa A ,d Lokeh th nl chl x`gLFk x`gfLFkfr;ksa o vius psys pikfVfu;ksa ds chp ?ksjs esa jkx jax esa O;Lr gSa A ‘kk;n ;gh czg~e gS A mifu”kn~ Hkys gh bUgsa jaxckt dgsa A Lokeh th jax esa ljkcksj gSa A vks’kks ls rks Bhd lh gh lekf/k yxok,saxs ] ,slh mEehn djrk gwa A
vc nksigj gS A bl ckj gks gYyk vkSj de gks x;k gS A yksx ?kj esa can gSa A nksigj djhc <kbZ cts ,d lqjklsod yM+[kM+krk lk vius ?kj dk jkLrk <wa<rk lk pyk tk jgk gS A eqag ls v.M c.M cd jgk gS A mlds ‘kk;n fdlh us dqN dg fn;k gS A cqjk yxk gS A mldh tqcku ij mlh O;fDr ds fy, vc ;gh vi’kCn gSa A gksyh dk ,slk gh lekiu vc vDlj ns[kus dsk fey tkrk gS A
L;kgh [kRe gks jgh gS A dye j[krk gwa A
-------------gksyh eqckjd ---------------



किराए के समर्थकों से चाटुकारिता का तड़का..!


बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है जब मैं शिरडी जाने के लिए ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था कि अचानक स्टेशन परिसर में भारतीय जनता पार्टी का झंडा थामे एक हुजूम दाखिल हुआ। कुछ के हाथों में फूलों के हार थे तो कुछ के हाथों बंदूकों से तने थे। ग्वालियर - चंबल अंचल में जिसके पास जितनी बंदूकें उसे उतना बड़ा और ताकतवर समझा जाता है लिहाजा बंदूक थामे लोगों की तादाद भी फूल और झंडा लिए लोगों से कम नहीं थी।  
ये नजारा देख इतना तो समझ आ गया था कि भाजपा का कोई कद्दावर नेता ट्रेन से ग्वालियर पहुंचने वाला है और उसके स्वागत में ही स्थानीय नेता कार्यकर्ताओं की भीड़ के सहारे अपना शक्ति प्रदर्शन के साथ ही चाटुकारिता का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते थे।
जिज्ञासा हुई कि आखिर कौन भाजपा नेता यहां पहुंचने वाला है जिसके स्वागत मे ये लोग पलकें पावड़ें बिछाए बैठे हैं..? भाजपा का झंडा थामे एक व्यक्ति से पूछा तो वो तपाक से बोला उमा दीदी आ रही हैं और हम उन्हीं के स्वागत के लिए यहां आए हुए हैं। दरअसल भाजपा की फायर ब्रांड नेत्री और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती दिल्ली से ग्वालियर पहुंच रही थी। रेलवे स्टेशन भाजपा कार्यकर्ताओं और भाजपा के झंडे थामे कार्यकर्ताओं से भाजपामय दिखाई दे रहा था और सभी लोग बेसब्री से ट्रेन का इंतजार करते दिखाई दे रहे थे।
इसी बीच मेरी नज़र कार्यकर्ताओं की भीड़ में सबसे पीछे भाजपा का झंडा थामे कुछ लोगों पर पड़ी तो बड़ी हैरानी हुई। संख्या में ये लोग करीब दो दर्जन से अधिक होंगे। कपड़ों से और इनके चेहरे देख इतना तो समझ आ रहा था कि ये लोग रिक्शा या रेहड़ी चलाने वाले, मजदूरी करने वाले या फिर रेलवे स्टेशन में पल्लेदारी करने वाले लोग थे। समझते देर न लगी कि उमा भारती का स्वागत करने पहुंचे स्थानीय नेताओं ने ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाने के लिए चाटुकारिता की सारी हदें पार करते हुए रिक्शा चालकों, मजदूरों और पल्लेदारों के हाथों में तक झंडा थमाने से गुरेज नहीं किया।
हालांकि राजनीति में ये कोई नई बात नहीं है क्योंकि हमारे देश में आमतौर पर चुनावी रैलियों में इस तरह के नजारे आम हैं। नेताओं की सभा में भीड़ जुटाने के लिए पैसे देकर इसी तरह लोगों को बुलाया जाता है और यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ था..!
मध्य प्रदेश में इसी साल नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में टिकट की होड़ अभी से शुरु हो गयी है। टिकट की चाह रखने वाले नेता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को उनके आगमन पर ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं और इसी बहाने टिकट के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करने में लगे हुए हैं।
उमा भारती की भाजपा में वापसी होने के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में उमा भारती की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता लिहाजा उमा भारती के स्वागत में भी टिकट की चाह लगाए बैठे उमा समर्थक स्थानीय नेताओं ने उमा के स्वागत के बहाने कार्यकर्ताओं की भीड़ के साथ शक्ति प्रदर्शन का कोई मौका नहीं छोड़ा।
विडंबना देखिए किराए के समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन करने वाले ऐसे नेताओं को न सिर्फ चुनाव में टिकट मिल जाता है बल्कि ये लोग विधानसभा और संसद तक भी पहुंच जाते हैं..!
ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों सब कुछ जानते हुए भी जनता ऐसे नेताओं को चुनकर विधानसभा और संसद तक भेज देती है..!  क्या ऐसे नेताओं को चुनना जनता की मजबूरी है या फिर चुनाव में विकल्पविहीन जनता को नेताओं की पूरी जमात में कोई फर्क  ही नजर नहीं आता और इसका फायदा ऐसा नेताओं को मिलता है..?
जाहिर है सिर्फ बेहतर विकल्प न होना ही इसकी वजह नहीं है बल्कि कहीं न कहीं योग्य प्रत्याशी की बजाए पार्टी को वोट देने की प्रवृत्ति भी इसके लिए जिम्मेदार है। जब तक जनता राजनीतिक दलों के मोहपाश से खुद को मुक्त करके चुनाव मैदान में खड़े योग्य प्रत्याशी का चुनाव नहीं करेगी चाहे वो किसी भी दल से क्यों न हो तब तक ऐसे चाटुकार नेता ही संसद और विधानसभा में पहुंचते रहेंगे जिन्हें न तो अपने देश और प्रदेश की फिक्र है और न ही जनता से कोई सरोकार। (जरूर पढ़ें- आम आदमी जाए भाड़ में..!)।
उम्मीद करते हैं कि जनता पर छाया राजनीतिक दलों का मोहपाश टूटेगा और जनता आगामी विधानसभा और आम चुनाव में योग्य प्रत्याशियों को चुनकर विधानसभा और संसद में भेजेगी और देश और जनता को जूते की नोंक पर रखने खुद का विकास को सर्वोपरी रखने वाले चाटुकार नेताओं को सबक सिखाएगी।

deepaktiwari555@gmail.com

जिन्दगी एक सजा हो गई हो जैसे-ब्रज की दुनिया

जिन्दगी एक सजा हो गई हो जैसे,

जिन्दगी बेमजा हो गई हो जैसे।

 

यूँ तो जीते रहे हम जिंदादिल की तरह,

पर कहीं कोई कमी-सी रह गई हो जैसे।

 

कतरा-कतरा करके बालू की तरह,

मुट्ठी से जिंदगी रिस गई हो जैसे।

 

जाड़े की धूप की तरह खुशियाँ,

चढ़ते-चढ़ते ढल गई हों जैसे।

 

किसी को फर्क नहीं मेरे होने या न होने से,

स्टेशन पर खड़े-खड़े ट्रेन छूट गई हो जैसे।

 

अब बेरंग है हर होली और बेनूर दिवाली,

मेरी तरह इनमें भी तासिर नहीं हो जैसे।

 

जिन्दगी एक सजा हो गई हो जैसे,

जिन्दगी बेमजा हो गई हो जैसे।

लक्ष्य को स्पष्ट बनायें


लक्ष्य को स्पष्ट बनायें

आज आप कहाँ पर खड़े हैं इस बात का ज्यादा महत्व नहीं है ,महत्व है तो इस बात
का है कि आपको जाना कहाँ है ?

आप आज क्या हैं इस बात का कोई मुल्य नहीं है ,मुल्य है तो इस बात कि आप क्या
बनना चाहते हैं ?

इस बात का बहुत फर्क नहीं पड़ता कि आप अब तक कितनी बार गिरे,पर फर्क इस
बात से पड़ता है कि आप वापिस कितनी बार उठ खड़े हुये

यह बात कोई मायने नहीं रखती कि आप कितनी ऊँचाई से गिरे ,मगर इस बात का
फर्क पड़ता है कि आप वापस कितने ऊपर उछले

रफ्तार तेज हो या धीमे मगर आपको गन्तव्य स्थान मालुम होना चाहिए

जिन्दगी में चलते तो अरबों प्राणी है मगर कुछ भाग्यशाली ही अपने साथ राडार रखते
हैं और सही दिशा में चलते हैं

पूरी चिड़ियाँ को देखने वाला लक्ष्यवेध नहीं कर पाता,सही निशाने के लिए नजर सिर्फ
आँख पर ही होनी चाहिये

जो पगडण्डी बनाता है वही तो सबसे पहले मंजिल पर पहुँचता है

घाणी का बैल दिन भर चलता है मगर शाम ढलने तक भी कहीं भी नहीं पहुँचता है

अपने हाथ में विकल्प रखने वाला प्राय: लक्ष्य से भटक जाया करता है 
  
लक्ष्य को पाने के लिए दोड़ने को किसने कहा,सिर्फ निरन्तरता ही काफी है

लक्ष्य खुली आँखों से देखा गया सपना ही तो है और सपना देखो तो फिर एकदम छोटा
क्यों देखते हो ?

लक्ष्य के करीबी मोड़ पर पहुचते ही मुसाफिर निराश हो जाता है और चलना छोड़ देता है

उठो,जागो और चल पड़ो क्योंकि विजय श्री आपका इन्तजार कर रही है

बार-बार लक्ष्य बदलने वाला कड़ी मेहनत के बाद भी असफल हो जाता है

आत्म अनुशासन नहीं होने के कारण ही मनुष्य परिस्थियों का दास बन जाता है और
परिस्थियाँ उसे नियंत्रित करके लक्ष्य विहीन कर देती है

अपना लक्ष्य खुद तय करो लोगों को तय मत करने दो,अनुभवी लोगों से सिर्फ इतना
ही जानो कि मार्ग ठीक और सुगम कौनसा है

लक्ष्य यदि बड़ा है तो मार्ग भी पथरीला होगा और ठोकरे भी मिलेगी यदि उठने का
साहस रखते हो  तो निश्चित रूप से फूलों से आपका स्वागत होगा

अन्धे भी मार्ग पार कर लेते हैं फिर क्यों घबराते हो ,ईश्वर ने आपको दौ आँखें जो दी है

26.3.13

और कैंसर हार गया .......

दोस्तों, निरोग सुख पत्रिका में मेरा लेख प्रकाशित हुआ है। आप इसे जरूर पढ़े शायद आप किसी को जीवन दान दे सकें। ...... 

 और कैंसर हार गया ....... 
 (डॉ. रोबर्ट विलनर की डॉ. सीगफ्रेड अर्न्स्ट से यादगार मुलाकात) 

डॉ. रोबर्ट विलनर का परिचय 

डॉ. रोबर्ट विलनर (जन्म – 21 जून, 1929 मृत्यु – 15 अप्रेल, 1995) फ्लोरिडा के विख्यात चिकित्सक थे। वे एम.डी. और पीएच.डी. थे और चालीस वर्षों तक रोगियों की चिकित्सा सेवा में संलग्न रहे। वे एक महान वैज्ञानिक, अनुसंधानकर्ता और चिंतक थे। उन्होंने “द कैंसर सोल्यूशन” और “डेडली डिसेप्शन : “द प्रूफ दैट सैक्स एण्ड एचआईवी डू नॉट कॉज एड्स” जैसी विवादास्पद पुस्तकें लिखी थी। 1978 में उनकी पत्नि को कैंसर हो गया था और कीमोथैरेपी के कारण बहुत वेदना और तकलीफ झेलनी पड़ी थी। उनकी मृत्यु के बाद उन्होंने प्राकृतिक और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में रुचि लेना शुरू कर दिया। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने देश-विदेश की कई यात्राएं की, अनेकों वैकल्पिक चिकित्सकों तथा रोगियों के साक्षात्कार किया और बहुत प्रभावित हुए। वे अचंभित कि ये उपचार बहुत सरल, सुरक्षित और प्रभावशाली थे। उन्हें लगने लगा कि अब सचमुच वह समय आ गया है जब हमें कैंसर में कीमोथैरेपी और रेडियेशन जैसे मारक उपचार की जगह अन्य वैकल्पिक उपचार को भी अपनाना चाहिये। 

फ्रुडेनस्टेड में डॉ. बुडविग से साक्षात्कार 

कैंसर के वैकल्पिक उपचार की खोज के सिलसिले में मैं डॉ. जोहाना बुडविग से भी कई बार मिला। शुरू में तो मुझे भी बुडविग के उपचार और विज्ञान पर इतना विश्वास नहीं हो पा रहा था। एक बार मैं फ्रुडेनस्टेड में डॉ. बुडविग के घर पर उनसे साक्षात्कार कर रहा था। तभी अचानक फोन की घंटी बजी और उनकी जर्मन भाषा में एक लंबी वार्तालाप शुरू हो गई। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे फोन का रिसीवर थमाया और बोली, “यह डॉ. सीगफ्रेड अर्न्स्ट का फोन है, जिनके बारे में मैंने आपको बतलाया था, आप भी इनसे बात कर लीजिये। ये मेरे उपचार से ठीक होकर आज मजे से जी रहे है।” मेरी उनसे लगभग दस मिनट तक बात हुई। मैं उनके अनुभव सुन कर हैरान था, हालांकि उनके बारे डॉ. बुडविग मुझे बहुत कुछ बता चुकी थी। मैंने हॉटल आकर सारी बातें डायरी में लिख ली। अगले दिन शुक्रवार था और मैं स्टुटगर्ट से सुबह 8 बजे की फ्लाइट से फ्लोरिडा लौट जाना चाहता था। मैंने सोचा कि मैं आज ही स्टुटगर्ट चला जाऊं ताकि अगले दिन में सुबह जल्दी नहीं उठना पड़े। इसलिए मैंने हॉटल के रिशेप्सनिस्ट को फ्लाइट के टिकिट बुक करने के लिए कहा। थोड़ी देर बाद वह आकर बोला कि स्टुटगर्ट की फ्लाइट में कोई सीट खाली नहीं है, लेकिन यदि मैं ट्रेन से म्यूनिक चला जाऊँ तो वहां से मुझे फ्लोरिडा के लिए आसानी से फ्लाइट मिल जायेगी। मुझे भी यही ठीक लगा। मैंने चेकऑउट किया और टेक्सी से सीधा रेल्वे-स्टेशन पहुँचा। 

म्यूनिक के लिए ट्रेन आने ही वाली थी। मैंने टिकिट लिया और वहीं बुक-स्टॉल से बुडविग की कुछ किताबें खरीद ली। इतने में ट्रेन भी प्लेटफॉर्म पर पहुँच गई थी। म्यूनिक यहाँ से 136.7 किलोमीटर दूर था। मौसम काफी सर्द था और हल्का सा कोहरा भी था। मैंने बुडविग की किताब खोली परन्तु मेरे दिमाग में तो अभी तक डॉ. अर्न्स्ट की एक-एक शब्द गूँज रही थी। इतने में ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी, मैंने बाहर देखा तो यह उल्म स्टेशन था, तभी याद आया कि डॉ. अर्न्स्ट यहीं तो रहते हैं। बस मेरा मन डॉ. अर्न्स्ट से मिलना चाह रहा था। बस मैंने तुरन्त अपना सूटकेस पकड़ा और वहीं उतर पड़ा। तब शाम के साढ़े सात बज चुके थे, सर्दी बढ़ चुकी थी और कोहरा भी घना हो चला था। मैंने स्टेशन से ही डॉ. अर्न्स्ट को फोन करके सुबह मिलने का समय ले लिया। उन्होंने कहा कल कि कल पूरा दिन हम साथ रहेंगे और दिन का भोजन भी साथ ही करेंगे। 

मैंने स्टेशन से सीधा गोल्डन ट्यूलिप हॉटल पहुँचा। मैं थक चुका था और भूख भी लग रही थी। मैंने वेटर के बुलाया और पूछा कि उनके रेस्टॉरेन्ट में क्याक्या व्यंजन बनते हैं। उसने कहा, “सर, आज रात बहुत सर्द रहने वाली है। बर्फ भी गिर सकती है। इसलिए पहले आप सोनाबाथ का लुफ्त लें और फ्रेश हो जायें। हमारे हॉटल का सोनाबाथ बहुत मशहूर है। तब तक मैं आपके लिए पक्ड प्राइड ड्राई वाइन, एवोकाडो वसाबी सलाद और गर्म सिज़लिंग फज़ीता तैयार करवाता हूँ। अगला दिन मैंने डॉ. अर्न्स्ट (1915-2001) के साथ बिताया। 78 वर्ष की उम्र में भी वे काफी बुद्धिमान, मिलनसार, सक्रिय और ऊर्जावान थे। उन्होंने कहा कि डॉ. विलनर, मेरी कहानी बड़ी दर्दनाक है। यह 18 मार्च, 1978 की बात है जब मेरे पेट में दर्द हुआ और मैंने उल्म के सर्जरी क्लिनिक में पेट का एक्स-रे करवाया। मेरे आमाशय में कैंसर की गांठ का पता चला और तीन दिन बाद 21 मार्च को हाइडलवर्ग की सर्जीकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्रश्चियन हरफर्थ ने मेरा ऑपरेशन किया। जब मुझे होश आया तो मुझे बताया गया कि मेरी कैंसर बड़ी आंत में भी 1.1 इंच की गांठ हो गई था और कैंसर तिल्ली तक फैल गया था। हरफर्थ यह सब देख कर घबरा गये थे और बिना शल्य किये पेट सिल देना चाह रहे थे, तब नर्सिंग इंचार्ज आर्थर बोह्म ने कहा कि अगर हमें डॉ. अर्न्स्ट की जान बचानी है तो हर जोखिम उठा कर भी ऑपरेशन करने चाहिये। टोली के बाकी लोंगो की भी यही राय थी। डॉ. हरफर्थ आखिर ऑपरेशन के लिए राजी हुए और मेरा ऑपरेशन साढ़े छः घन्टे चला। उन्होंने मेरा आमाशय निकाल दिया। गया। । आर्थर की गुजारिश पर फादर रुपर्ट मेयर से मेरे लिए प्रार्थना की। 

 लेकिन आठ दिन बाद मेरे डायफ्राम के नीचे पस पड़ गया, जिसके कारण मुझे तेज बुखार हो गया। दोबारा ऑपरेशन करके पस निकाला गया, लेकिन दो दिन बाद ही मेरे फेफड़ों में पानी भर (पल्मोनरी एडीमा) गया। मैंने बहुत तकलीफ सही, सांस बहुत फूलती थी और तीन दिन तो मैं बेहोश ही रहा। मुझे नहीं लगता था कि मैं कभी ठीक हो पाऊँगा। मेरे लिए बहुत लोगों (2000 से ज्यादा) ने मन्नतें मांगी, प्रार्थनाएं की। जापान जैसे सुदूर देश में भी मेरे लिए प्रार्थना की गई। लेकिन आठ हफ्ते बाद धीरे-धीरे मेरी स्थिति में सुधार आने लगा। सभी के प्रयास और प्रार्थना से मैं आखिरकार स्वस्थ हो ही गया। मेरा ठीक होना सभी के लिए खुशी और अचरज की बात थी। 3 मई, 1987 को म्यूनिक के ओलम्पिक स्टेडियम में फादर रुपर्ट मेयर ने मेरे लिए एक सभा आयोजित की थी। इसके बाद फादर से मेरे करीबी रिश्ते बने रहे और वे समय-समय पर मेरी मदद भी करते रहे। परन्तु इससे बाद भी मुझे बहुत कमजोरी और पाचन समबन्धी विकार रहने लगा और मरीज देखना भी बंद करना पड़ा। मुझे मालूम था कि इस तरह के कैंसर में मरीज मुश्किल से एक साल जी पाते हैं। 

दो साल बाद फिर कैंसर ने फिर अपना असर दिखाया और पूरे पेट में फैल गया, अब कीमोथैरेपी ही एकमात्र उपचार बचा था। वे जानते थे कि कीमो के बड़े खतरनाक दुष्प्रभाव होंगे और फिर भी जीवन शायद ही बच पायेगा, इसलिए उन्होंने कीमो नहीं लेने का निर्णय लिया। तभी किसी ने उन्हें डॉ. बुडविग के प्रोटोकोल के बारे में बतलाया। वे तुरन्त डॉ. बुडविग से मिले, उनसे उपचार अच्छी तरह समझा और पूरे विश्वास से उनका उपचार लेना शुरू कर दिया। वे रोज अपने पेट पर एलडी ऑयल पेक लगा कर सोते थे और एलडी तेल की ही रोज मालिश भी करवाते थे। उन्हें इस उपचार से बहुत फायदा हुआ। मार्च, 1983 में उल्म के प्रोफेसर डॉ फाइफर ने उनकी जाच की और कहा कि वे पूरी तरह कैंसर से ठीक हो चुके हैं। यह सचमुच एक चमत्कार ही था। इसका पूरा श्रेय उन्होंने डॉ. बुडविग के उपचार और एलडी तेल को दिया। परन्तु इसके बाद भी उन्होंने अपनी जीवन-शैली को नहीं बिगाड़ा और रोज अलसी का तेल व पनीर लेना उनके जीवन का नियम ही बन चुका था। वे नियमित डॉ. बुडविग से संपर्क करते रहते थे। आज 15 वर्ष बाद भी वे पूर्णतया स्वस्थ हैं, बस थोड़ा बहुत पाचन संबन्धी विकार रहता है क्योंकि उनका आमाशय निकाल दिया गया था। 

आज उनके शरीर में आज कैंसर का नामोनिशान भी नहीं है। उन्होंने कहा कि सचमुच ये मेरा दूसरा जीवन है जो डॉ. बुडविग का दिया हुआ है। पूरे दिन वे उन्हें धन्यवाद देते रहे। उन्होंने कहा कि यह उपचार कैंसर का सबसे बढ़िया उपचार है। हां वे कुछ बातों में बुडविग से सहमत नहीं थे जैसे उन्होंने कहा कि यदि कैंसर की बड़ी गांठे हैं तो शल्य-क्रिया करनी ही चाहिये। जब कि बुडविग कहती थी शल्यक्रिया का निर्णय भी सोच समझ कर लेना चाहिये। डॉ. अर्न्स्ट से मेरी बहुत बातें हुई। उन्होंने बहुत सारी ऐसी बातें बतलाई जो मैं डॉ. बुडविग से सुन चुका था पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। डॉ. अर्न्स्ट से मुलाकात मेरे जीवन की एक यादगार घटना बन कर गई। इस उपचार को लेकर मेरे मन में जो भी संशय या शक थे, वे सब अर्न्स्ट से मिल कर दूर हो चुके थे। जब मैं उनसे विदा ले रहा था तभी उनके पुत्र डॉ. मार्टिन भी आ गये थे। उनसे भी कुछ मिनट अच्छी बातें हुई और मैं हॉटल के लिए निकल पड़ा। 

संदर्भ-ग्रंथ सूची - 
 डॉ. अर्न्स्ट के उपचार का पूरा विवरण निम्न समाचार-पत्रों और पुस्तकों में प्रकाशित हुआ है। 

 • 4 मई 1997 का म्यूनिख चर्च अखबार 
 • डा. फ्रिट्ज की पुस्तक के "शुट्जएन्जल वुन्डर"
 • डॉ. रॉबर्ट विलनर एम.डी., पीएच.डी. की पुस्तक "The Cancer  Solution"
 • डा. जोहाना बुडविग की पुस्तक Cancer-The Problem and the Solution"


कांग्रेस में पद बांट बांट कर हरवंश सिंह अपने ही समर्थकों में समन्वय बनाने और प्रसन्न करने का प्रयत्न कर रहें हैं
भाजपा के जन  अभियान में विधायकों और जिले के शीर्ष नेताओं के बदले आम कार्यकर्त्ताओं को लोगों के आक्रोश का समाना करना पड़ा। आम आदमी में विधायकों की बेरुखी, अधिकारियों द्वारा बातें ना सुनी जाने और भारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जम कर आक्रेाश दिखा। इसके बाद भी भाजपा कांग्रेस की गुटबंदी और भीतरघात को लेकर आशान्वित है कि वो एक बार फिर तीन सीट जीत लेगी। विदेशी युवती से हुये सामूहिक बलात्कार के विरोध में कांग्रेस ने एक दिवसीय धरना देकर ज्ञापन सौंपा। कांग्रेस नेताओं ने अपने भाषण में कई घटनाओं का उल्लेख करते हुये प्रदेश की बदतर कानून व्यवस्था को लेकर शिवराज सरकार को आरोपों के कठघरे में खड़ा किया। जिला कांग्रेस की कार्यकारिणी घोषित होने के पहले से कांग्रेसियों के बीच 1.16 का किस्सा चर्चित था। कांग्रेस के 16 नेताओं ने हरवंश सिंह को साफ साफ यह कहा था कि यदि कार्यकारिणी में मो. असलम को पद दिया गया तो वे अपने अपने पदों से स्तीफा दे देंगें। अब हाल ही में जिन पांच नेताओं को जिला कांग्रेस मे पदाधिकारी बनाया गया है उनमें मो. असलम भी शामिल है जिन्हें महामंत्री बनाया गया है। अब देखना यह है कि 1.16 का किस्सा कितना जोर पकड़ता है?
भाजपा के महा जन संपर्क अभियान में लोंगों का दिखा आक्रोश-भाजपा का महा जन संपर्क अभियान समाप्त हो गया हैं। समूचे प्रदेश में चलाये गये इस अभियान का जिले में भी शुभारंभ और समापन समारोह पूर्व किया गया जिसमें भाजपा के बड़े नेता शामिल हुये। बाकी समूचे अभियान की कमान मंड़ल स्तर के कार्यकर्त्ताओं ने ही संभाली थी। जाहं तक विधायकों का सवाल है तो तो विस सत्र चलने के कारण उनका अधिकांश समय उसमें ही बीत गया। औपचारिक रूप से जिले के भाजपा विधायकों नीता पटेरिया,शशि ठाकुर एवं कमल मर्सकोले ने भी आपने अपने विस क्षेत्रों में इस अभियान में भाग लिया। जिला भाजपा एवं मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर एवं वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन ने भी इस अभियान में भाग लिया। लेकिन मुख्य रूप से लोगों के घर घर जाकर अभियान चलाने का काम जिन स्थानीय भाजपा नेताओं ने किया उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा। लोगों ने विधायकों की बेरुखी, भ्रष्टाचार और स्थानीय समस्याओं को लेकर भाजपाइयों को जम कर खरी खोटी सुनायी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नाम पर तीसरी पारी खेलने को बेंताब भाजपा के नेताओं की आंखे इस भारी जन असंतोष को देखकर खुली की खुली रह गयीं। हाल ही में हुयी ओला वृष्टि से पीड़ित किसानों ने नुकसानी के आकलन में हुयी लापरवाही को लेकर भी भाजपा नेताओं की जम कर परेड ली। भाजपा कार्यकर्त्ताओ की भी यह शिकायत भी रही कि जब वे प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बातें अनसुनी किये जाने की शिकायत विधायकों और जिले के बड़े नेताओं से करते हैं तो वे भी टका सा जवाब दे देते हैं कि क्या करें हमारी बातों को अधिकारी सुन रहें हैं। ऐसे में आम आदमी अपनी समस्याओं को लेकर भाजपा नेताओं से हताश हो चुका है और अपने दरवाजे पर आये भाजपा नेताओं पर लोगों ने अपना आक्रोश जम कर निकाला। इन हालातों पर काबू पाये बिना जिले में भाजपा अपने बूते पर मिशन 2013 में फतह नहीं पा सकती हैं लेकिन शीर्षस्थ भाजपा नेताओं का मानना  है कि हमेशा की तरह कांग्रेस नेताओं की गुटबंदी और भीतरघात केवलारी छोड़कर अन्य क्षेत्रों में उनके लिये मददगार साबित होगा और एक बार फिर भाजपा जिले में चार में से तीन विस क्षेत्रों में अपना कब्जा बरकरार रखने में कामयाब हो जायेगी। 
धरने की रस्म निभायी कांग्रेस ने-विदेशी युवती से हुये सामूहिक बलात्कार के विरोध में कांग्रेस ने एक दिवसीय धरना देकर ज्ञापन सौंपा। प्रदेश कांग्रेस के निर्देश पर यह धरना नगर पालिका के सामने दिया गया। इसमें जिला कांग्रेस के उपाध्यक्ष नदेश मरावी एवं नगर इंकाध्यक्ष इमरान पटेल सहित कई इंका नेताओं ने भाग लिया। कांग्रेस नेताओं ने अपने भाषण में कई घटनाओं का उल्लेख करते हुये प्रदेश की बदतर कानून व्यवस्था को लेकर शिवराज सरकार को आरोपों के कठघरे में खड़ा किया। लकिन इस धनरे में भी कांग्रेस नेताओं के वही गिने चुने चेहरे दिखायी दिये जो हमेशा देखे जाते हैं। चुनावी साल में भी इस संख्या में भले ही बढ़ोतरी ना हुयी हो लेकिन पांच बार से लगातार चुनाव हारने वाले सिवनी विस क्षेत्र से संभावित प्रत्याशियों की संख्या अवश्य बढ़ती जा रही हैं। अब तो बाकायदा भाषण के संबोधनों में संभावित प्रबल दावेदारों के रूप में नेताओं को संबोधित किया जाने लगा हैं।राजनैतिक विश्लेषकों की यदि बात माने तो यही कहा जा सकता हैं कि पांच बार चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेसियों ने कोई सबक नहीं सीखा हैं।
पद देकर समर्थकों में समन्वय बिठा रहे हरवंश -जिला कांग्रेस की कार्यकारिणी घोषित होने के पहले से कांग्रेसियों के बीच 1.16 का किस्सा चर्चित था। बताया जाता है कि कांग्रेस के 16 नेताओं ने हरवंश सिंह को साफ साफ यह कहा था कि यदि कार्यकारिणी में मो. असलम को पद दिया गया तो वे अपने अपने पदों से स्तीफा दे देंगें। इन 16 नेताओं में कुछ नेता ऐसे भी थे जिनका केवलारी विस क्षेत्र में खासा प्रभाव था। इसी कारण कई दिनों तक तो कार्यकारिणी की ही घोषणा नहीं हुयी। फिर जब कार्यकारिणी को घोषणा हुयी तो उसमें मो. असलम को कार्य सदस्य तो बनाया गया लेकिन पद नहीं दिया गया। अपनी सुनियोजित रणनीति के तहत विरोध करने वाले 16 नेताओं और उनके शुभचिंतकों को कुछ इस तरह पद दिये गये कि धीरे धीरे उनमें ही फुट फैल होने लगी। बीच बीच में समन्वय बनाने के नाम पर हरवंश सिंह ने जिला इंका में नाम लुड़वाने का सिलसिला जो चालू किया तो वो अभी तक जारी हैं। वक्त की नजाकत को भांपने के लिये हरवंश सिंह ने मो. असलम को पहले जिला इंका की ध्वज वाहिनी समिति का अध्यक्ष बनाया। इसका कोई विरोध तो नहीं हुआ लेकिन कांग्रेस के 16 नेताओं में बना एका तोड़ना जरूरी मान कर कुछ ऐसी सियासी चाले चलीं गयीं कि आज से नेता चार गुटों में बंटे दिखायी दे रहें हैं। अब हाल ही में जिन पांच नेताओं को जिला कांग्रेस मे पदाधिकारी बनाया गया है उनमें मो. असलम भी शामिल है जिन्हें महामंत्री बनाया गया है। अब देखना यह है कि 1.16 का किस्सा कितना जोर पकड़ता है?इसी बीच सिवनी विस क्षेत्र से किसी मुस्लिम को प्रत्याशी बनाने की बात भी तेजी से उभर कर आयी हैं। प्रदेश इंका के महामंत्री साजिद अली ने भी अपने प्रवास के दौरान इसका समर्थन कर मामले को और गंभीर बना दिया है। वैसे यह कोई नयी बात नहीं हैं। पिछले कुछ चुनावों से विस और सिवनी नपा अध्यक्ष के लिये जो कांग्रेस के दिग्गज नेता मुस्लिम प्रत्याशी की बात करते हैं वे ही उन्हें टिकिट दिलाने में गंभीर नहीं रहते हैं। लेकिन टिकिट की दौड़ के बाद जब उन्हें टिकिट नहीं मिलती हैं तो अल्प संख्यकों में उभरने वाला असंतोष कांग्रेस प्रत्याशी को निपटाने में कारगर भूमिका निभाता है और कांई ना कोई ऐसा मुस्लिम निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतर जाता है जिसे भाजपा भी जीतने की रणनीति के तहत परदे के पीछे से सहयोग करने में पीछे नहीं रहती हैं। पिछले परिणामों को यदि देखा जाये तो मुस्लिम और आदिवासी वोटों का विभाजन ही इस क्षेत्र से भाजपा की जीत में मददगार रहा हैं जिसे असंतुष्ट कांग्रेसियों का भी सहयोग मिल जाता हैं। ऐसा ही कुछ आने वाले समय में भी हो जाये तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। आगे चाहे जो भी हो लेकिल विस चुनाव के पहले जिले के इकलौते इंका विधायक ठा. हरवंश सिंह कांग्रेस में पद बांट बांट कर अपने ही समर्थकों में समन्वय बिठाने में लगे हुये हैं ताकि उनके विस क्षेत्र केवलारी का चुनावी समीकरण ना बिगड़े और वे एक बार फिर चुनाव जीत सकें।“मुसाफिर”
सा. दर्पण झूठ ना बोले
26 मार्च 2013 से साभार

गुटका ले लेगा उसकी जान कर दो सभी को सावधान ....

दोस्तो अलबेला भाई ने बहुत हा सार्थक प्रेरणादायक कविता लिखि है। मैं उन्हें बधाई देता हूँ नमन करता हूँ और आप सभी को कहता हूँ कि इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर किया जाये।


आईये,असफल बनें।


आईये,असफल बनें।

असफलता के कंटीले मार्ग से गुजर कर ही मुकाम पाया जाता है। जो व्यक्ति अपनी
जिन्दगी में असफल नहीं हुआ इसका मतलब यह भी है कि उसमे साहस और आत्म-
विश्वास की भारी कमी है और वह निश्चित घेरे में ही दौड़ रहा है।

असफलता यह सिखाती है कि काम बिगड़ता कैसे है और उसे सही ढंग से कैसे किया
जाना चाहिए

असफलता से व्यक्तित्व की चमक बढती है क्योंकि असफलता की रगड़ से ही सही
क्या होना चाहिए था कि पहचान होती है.

रात और दिन का होना तय है रात विश्राम देकर दिन भर मेहनत करने के योग्य बनाती
है अगर रात नहीं होती तो ....?

दुःख दुनियाँ वास्तव में क्या है,इसका ज्ञान देने के लिए ही आते हैं अगर दुःख नहीं होता
तो सुख मूल्यहीन हो जाता

विपत्तियाँ हमारे चरित्र को मापती है कि हम कितने धेर्यवान और उत्साही हैं

प्रतिकुल परिणाम हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि सफलता पाने का उचित
मार्ग क्या होना चाहिए

हम निर्धनता को पराजित करने के किस्से चाव से सुनते हैं मगर उस कारण पर गौर
नहीं करते जिससे निर्धनता पराजित होती है

हम जानते हैं कि बच्चा चलना सीखता है तब बहुत बार गिरता है परन्तु बड़े होकर भी
बच्चे के गिरने का मुल्य नहीं समझना चाहते

जीत का पदक दुनियाँ को यह कहता है कि बहुत बार हारने के बाद ही मुझे पाया जा
सकता है

जो हारने के लिए तैयार नहीं है उसे किसी ना किसी का गुलाम बनकर जिन्दगी गुजारनी
पड़ती है

तेरना सीखना है तो डूबने की जोखिम उठानी ही पड़ेगी

सोने का मुल्य उसकी कष्ट सहने की क्षमता के कारण ही है।

यदि परिस्थियाँ बुरी है तो उनका आलिंगन करना छोडो उनके प्रेम में मत पड़ो
सफलता सही स्ट्रोक खेलने से मिलती है और सही स्ट्रोक खेलने के लिए बहुत बार गलत
स्ट्रोक खेल कर क्लीन बोल्ड होना पड़ता है

जब धोनी का इतिहास लिखा जाएगा तब लोग उसे भारत का बेहतरीन कप्तान ही कहेंगे
क्योंकि वह हारना जानता है

अटल बिहारी जी के कुशल नेता और प्रधान मंत्री बनने के पीछे उनके नेतृत्व में उनकी
पार्टी की हार होना भी एक कारण था

नरेन्द्र मोदी को इसीलिए कुशल प्रशासक कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने समय में
बड़ी प्रशासनिक असफलता झेली थी

राजा बेटे के इर्दगिर्द बड़ा सुरक्षा घेरा है इसलिये वो प्रतिभा नहीं दिखा सके

सपने को साकार करने की तमन्ना है तो जल्दी-जल्दी नयी-नयी गलतियां करते जाईये
और गलतियां के दोहराव को रोकते जाईये

शिखरों को विजय करने वाले खाइयों में गिरने का साहस रखते हैं

यदि आपको अपनी असफलता का सही तथ्य मिल जाए तो ठहाका लगाईये क्योंकि
आपने अब सफलता का मन्त्र जान लिया है

मैं एक असफल व्यक्ति था पर अब नहीं हूँ

अगर आप सुरक्षित जीना पसंद करते है तो किताबों का रट्टा मारते रहिये क्योंकि आप
नौकरी पा सकते हैं अगर नौकरी देना चाहते हो तो पहले असफलता का स्वाद चखिए और
साहस कीजिये फिर देखिये दुनिया आपकी मुट्ठी में
 

25.3.13

सिर्फ हक़ की बात


भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष पूर्व न्यायमूर्ति मारकंडे काटजू  संजय दत्त की सजा माफ़ करवाने की वकालत कर रहे हैं। मगर देश के जो संघर्षशील पत्रकार दुर्गति भोग रहे हैं उनके कल्याण की बात जब भी आती है तो उनको पता नहीं क्या हो जाता है। मजेदार बात तो ये की श्रम मंत्रालय क्या ये बात नहीं जनता? जरूर जनता है मगर आखिर मीडिया से कौन पंगा ले? क्या पता कोई कदम उठाने के पहले ही छीछालेदार शुरू हो जाये। और तो और सरकार तक जहां लाचार नजर आ रही है ऐसे में श्रम विभाग भला किस खेत की मूली है? लाख टके का सवाल तो ये है की आखिर कब तक दूसरों का सच उजागर करने वाले पत्रकार सत्ता और पूंजीवादियों के इस अँधेरे को झेलने पर मजबूर रहेंगे? दूसरों का हक दिलानेवालों का हक आखिर कबतक मारा जाएगा? इसपर श्रम विभाग को शर्म आनी चाहिए।


तो 35 साल हो बालिग होने की उम्र..!

फिल्मी पर्दे से असल जीवन में तक खलनायक साबित हुए संजय दत्त की सजा माफ करने के लिए एक मुहिम छिड़ी है। मुहिम का झंडा मायानगरी से लेकर नेतानगरी तक बुलंद है। हर किसी को संजय दत्त निर्दोष नजर आ रहे हैं। मुहिम को देखकर ऐसा लगता है कि मानो ये मुहिम किसी अपराधी की सजा माफ करने के लिए न होकर किसी देशभक्त को न्याय दिलाने के लिए चल रही हो। बड़बोलेपन के लिए मशहूर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को तो संजय दत्त निर्दोष होने के साथ ही नासमझ भी नजर आते हैं।
दिग्गी बाबू कहते हैं कि जिस वक्त संजय दत्त के घर से पुलिस ने हथियार बरमद किए थे उस वक्त संजय दत्त नासमझ थे और नासमझी में संजय दत्त ने ये गलती कर दी। दिग्विजय सिंह को संजय दत्त के इस अपराध के पीछे उनकी नादान उम्र का दोष नजर आता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि दिग्विजय जिस नादान उम्र की बात कर रहे हैं वो उस वक्त 33 साल थी और बकौल दिग्विजय सिंह इस उम्र में संजय दत्त नासमझ थे। (पढ़ें- संजय दत्त- मेकिंग ऑफ रियल खलनायक..!)
अगर दिग्विजय सिंह की बात मान लें कि 33 साल की उम्र में कोई व्यक्ति नासमझ या नादान होता है तो फिर तो दिग्विजय सिंह को एक कदम और आगे बढ़ाकर केन्द्र सरकार से बालिग होने की उम्र 35 साल करने की अपील करनी चाहिए क्योंकि अभी तो हमारे देश में बालिग होने की उम्र 18 साल है।
जब 33 साल के व्यक्ति को इतनी समझ नहीं है कि अंडरवर्ल्ड के संपर्क में रहना, फोन पर अपराधियों से बात करना और अपने घर में अवैध हथियार रखना गैरकानूनी है तो फिर 18 साल से 33 साल के बीच के युवा को कितनी समझ होगी..! (पढ़ें- 'मासूम' मुन्ना ब्लास्ट के बाद भी करते थे 'भाई' से बात)
फिर तो दिग्विजय सिंह को सरकार से ये भी मांग करनी चाहिए कि 33 साल से कम उम्र के उन सभी अपराधियों को माफ कर दिया जाए जिन्हें अदालत सजा सुना चुकी है लेकिन दिग्विजय सिंह ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि 33 साल तक की उम्र के सभी अपराधी कांग्रेसी रहे सुनील दत्त की औलाद जो नहीं हैं..!
कांग्रेस ने भले ही दिग्विजय सिंह के इस बयान से पल्ला झाड़ लिया हो लेकिन कांग्रेस में दिग्विजय सिंह वही बोलते हैं जो आलाकमान चाहता है..! भले ही बाद में दिग्विजय के बयान से कांग्रेस पीछा छुड़ाने का प्रयास करती दिखाई देती है लेकिन विवादित मुद्दों पर दिग्विजय का बयान तब तक मीडिया की सुर्खियां बटोर चुका होता है। मुझे तो ऐसा एक भी मौका याद नहीं आता जब दिग्विजय सिंह के बड़बोलेपन पर कांग्रेस आलाकमान ने सख्ती दिखाते हुए दिग्विजय सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई की हो।
जाहिर है ये दिग्विजय के बड़बोलेपन को कांग्रेस आलाकमान का मौन समर्थन नहीं तो और क्या है..? खैर सरकार के फैसलों पर विपक्ष की घेराबंदी पर तो दिग्विजय की बोली समझ में आती है लेकिन एक अपराधी के लिए माफी की अपील क्या दर्शाती है..? वो भी तब जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अपराध साबित होने पर संजय दत्त को 5 साल कारावास की सजा सुना चुका है वो भी इस टिप्पणी के साथ कि संजय दत्त के अपराध की प्रकृति काफी गंभीर थी जो माफी लायक नहीं है। (पढ़ें- संजय दत्त निर्दोष हैं..!)
बहरहाल संजय दत्त की सजा माफी को लेकर मुहिम जारी है...कोई राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख रहा है तो कोई राज्यपाल से मुलाकात कर रहा है लेकिन विभिन्न अपराधों में जेल में बंद लाखों अपराधी जिन्हें अदालत सजा सुना चुकी है उन तक अगर ये खबर पहुंच रही होगी तो एक सवाल उनके जेहन में भी जरूर उठ रहा होगा कि काश मैं भी एक फिल्म स्टार होता तो मेरे लिए भी कोई आवाज उठाता...मेरे अपराध को भी कोई नादानी कहता और एक दिन मेरे भी सारे गुनाह माफ होते और अपने परिवार के साथ मैं भी खुली हवा में  सांस ले पाता..!

deepaktiwari555@gmail.com

शादी से पहले सेक्स क्यों..?


इंडिया टुडे- नीलसन के अध्य्यन में ये बात सामने आई है कि कैजुअल सेक्स की बढ़ती पहुंच के बावजूद आज लगभग 65 प्रतिशत पुरुष अपने लिए कुंवारी(वर्जिन) पत्नी की तलाश कर रहे हैं। यानि कि वह ऐसी महिला को अपनी जीवनसंगिनी नहीं बनाना चाहते जिसने विवाह से पहले किसी के साथ सेक्स किया हो। भारतीय युवाओं की मानसिकता को केन्द्र में रखकर किया गया ये सर्वेक्षण अलग अलग लोगों की सोच और मानसिकता पर फिट नहीं बैठता लिहाजा इसको लेकर विवाद गहराना लाजमी था।
इस सर्वे के बाद कुछ लोगों का ये मत है कि वर्तमान हालात और युवाओं की बदलती सोच और मानसिकता को देखते हुए वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त कर देना चाहिए और शादी से पहले युवक- युवती के बीच शारीरिक संबंध को नैसर्गिक संबंध की तरह देखना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ परंपराओं और नैतिक समाज के पक्षधर लोगों का कहना है कि वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त करने का अर्थ है युवाओं को सेक्स की खुली छूट दे देना। उन्हें किसी भी प्रकार की नैतिक जिम्मेदारियों से मुक्त कर देना। अगर हम ऐसा कुछ भी करते हैं तो यह सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को पूरी तरह समाप्त कर देगा। (जरूर पढ़ें- कामसूत्र ने किया फेल..!)
वर्जिनिटी की आवधारणा को लेकर अपनी अपनी सोच और मानसिकता के लिहाज से लोगों के अलग – अलग मत हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब कई पुरुष शादी से पहले सेक्स संबंधों में लिप्त रहते हैं तो उनका वर्जिन बीवी का तलाश करना कितना सही है..? जैसे कि ये सर्वे भी कह रहा है कि 65 प्रतिशत पुरुष शादी के लिए वर्जिन बीवी की तलाश कर रहे हैं। सर्वे में भले ही ये प्रतिशत 65 हो लेकिन वास्तव में सौ प्रतिशत लोग ऐसा ही चाहते हैं..! फिर चाहे वो पुरुष हो या फिर कोई महिला..!
लेकिन मेरा व्यक्तिगत ये मत है कि अगर कोई पुरुष शादी से पहले सेक्स कर रहा है तो फिर उसे शादी के लिए किसी वर्जिन महिला की तलाश करने की बात करने का कोई हक नहीं है। जाहिर है ऐसे पुरुष महिला से अपेक्षा कर रहे हैं कि वो शादी से पहले किसी के साथ सेक्स न करे लेकिन खुद पर वे इस बात को लागू नहीं कर रहे। वो खुद को इससे अलग कैसे कर सकते हैं..? इसका मतलब तो ये है कि ऐसे पुरुष महिला को सिर्फ घर में रखा एक सामान समझते हैं जिसकी न तो कई सोच है...न ही कोई इच्छाएं..! (जरूर पढ़ें- अबोध कन्याओं से यौन अपराध क्यों..?)
निश्चित तौर पर शारीरिक संबंध एक व्यक्तिगत मसला है लेकिन भारतीय समाज शादी से पूर्व खासकर महिलाओं(महिलाओं इसलिए क्योंकि पुरुष ऐसा करते आए हैं और उन पर ऊंगली उठाने की बजाए महिलाओं को ही सॉफ्ट टारगेट बनाया जाता है।) को शारिरिक संबंध स्थापित करने की अनुमति नहीं देता और ऐसे तमाम उदाहरण मिल जाएंगे जहां शादी से पूर्व शारीरिक संबंध उजागर होने पर महिलाओं को प्रताड़ित करने या समाज से बेदखल करने का कोई मौका नहीं छोड़ा गया और कई बार महिला को अपनी जान से तक हाथ धोना पड़ा है...ऐसी स्थिति में हमने महिला के परिजनों को भी उसके साथ खड़ा होने की बजाए उसके विरोध में ही देखा है..!
जहां तक वर्जिनिटी की अवधारणा को लेकर भारतीय समाज की बात है तो मौजूदा हालात भले ही बदल गए हों। महिला और पुरुष दोनों की सोच और मानसिकता में बड़ा बदलाव आया हो लेकिन इसके बाद भी मूल्यों और आदर्श के पक्के भारतीय समाज में सेक्स जैसे विषय पर जहां आज भी खुलकर बात करने में लोग संकोच करते हैं वहां इसकी अवधारणा आज भी उतना ही स्थान रखती है जितना कि आज से पहले..! (जरूर पढ़ें- सेक्स एजुकेशन- कितनी कारगर..?)
वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त करने से न सिर्फ विवाह पूर्व सेक्स संबंधों को बढ़ावा मिलेगा बल्कि ये भविष्य में शादी जैसे बंधन में आपसी विश्वास को भी कम करने में अपनी भूमिका अदा करेगा जिसका सीधा असर वैवाहिक जीवन पर पड़ेगा और कहीं न कहीं आपसी विश्वास से जुड़ी रहने वाली दांपत्य जीवन की डोर भी कमजोर पड़ेगी।
ऐसे में अगर वर्जिनिटी के महत्व को समाप्त कर दिया जाता है तो भारतीय समाज के लिए इसकी स्वीकारोक्ती आसान नहीं होगी क्योंकि जिस देश में सर्वे के मुताबिक 65 प्रतिशत युवा शादी के लिए वर्जिन पत्नी की तलाश करते हैं और महिलाओं के लिए वर्जिनिटी ही उनका गहना माना जाता है वो समाज कभी वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त करने को अपनी मान्यता नहीं देगा..!

deepaktiwari555@gmail.com

मांगी सूचना मौत मिली-ब्रज की दुनिया


मित्रों,सुशासन की सरकार बिहार के निवासियों को सूचना का अधिकार अद्वितीय तरीके से प्रदान कर रही है। उनको सूचना मांगने का अनन्य अधिकार तो दे दिया गया है लेकिन सूचना पाने का अधिकार नहीं दिया गया है अलबत्ता कोई सूचनार्थी अगर सूचना मांगने की गुस्ताखी करने बावजूद जीवित या बिना जेल गए रह जाए तो उसे जरूर सुशासन का शुक्रगुजार होना चाहिए। इस बार सूचना मांगने की सजा पाई है एक अधिवक्ता रामकुमार ठाकुर ने। मुजफ्फरपुर जिले के मनियारी थाना के पुरुषोत्तमपुर गांव में शनिवार 23 मार्च की शाम घात लगाए अपराधियों ने जिले के रतनौली गांव निवासी सिविल कोर्ट के अधिवक्ता रामकुमार ठाकुर की गोली मारकर हत्या कर दी। अधिवक्ता रामकुमार ठाकुर ने अपने ही ग्रामीण रतनौली पंचायत के मुखिया राजकुमार सहनी से सरकारी योजनाओं की जानकारी आरटीआई से मांगने का अक्षम्य अपराध किया था। उम्मीद के मुताबिक सूचना उपलब्ध नहीं हुई थी। दैनिक जागरण,मुजफ्फरपुर के अनुसार अधिवक्ता बिहार मनरेगा वाच संगठन से भी जुड़े थे। मुखिया व उनके समर्थकों द्वारा कई बार उन्हें धमकी भी दी जा चुकी थी। जिसकी शिकायत थाने में भी की गई थी। लेकिन, थाना स्तर से उनके आवेदन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अधिवक्ता ने अपनी सुरक्षा को लेकर पुलिस के वरीय अधिकारियों व मुख्यमंत्री तक को आवेदन दिया। कार्रवाई नहीं हुई और अंतत: वे अपराधियों के निशाने पर चढ़ गए। इतना ही नहीं थानेदार ने ईलाज के लिए ग्रामीणों द्वारा ले जाए जा रहे घायल अधिवक्ता को पुलिस जीप पर बिठा लिया और डेढ़ घंटा रास्ते में ही लगा दिया जिससे अधिवक्ता की जान चली गई।
                         मित्रों,बिहार में सुशासन किस तरह से काम कर रहा है मैं समझता हूँ कि यह उदाहरण देने के बाद बताने की आवश्यकता ही नहीं रह गई है। मैंने खुद भी कई-कई बार सूचना मांग कर देखा है मगर कभी मुझे सूचना प्राप्त नहीं हुई। मैं गारंटी के साथ नहीं कह सकता कि मुझ पर भी कभी जानलेवा हमला नहीं होगा या फिर मुझे कभी झूठे मुकदमे का सामना नहीं करना पड़ेगा। वास्तव में वर्तमान बिहार में लोकशाही का शासन है ही नहीं बल्कि नौकरशाही का निरंकुश शासन है जिस पर नियंत्रण करना न तो नीतीश कुमार उद्देश्य है और न तो अभीष्ट ही अर्थात् प्राथमिकता सूची में कहीं है ही नहीं।

24.3.13

राजनीति- चोर-चोर मौसेरे भाई..!

अब तक तो सिर्फ सुना ही था कि चोर- चोर मौसेरे भाई होते हैं...लेकिन उत्तराखंड में इसकी बानगी भी खूब देखने को मिल रही है। मीडिया मे भले ही कांग्रेसी और भाजपाई एक दूसरे को आरोपों की बौछार कर खूब गरियाते देते फिरते दिखाई देते हों लेकिन पर्दे की पीछे की सच्चाई कुछ और ही है..!  भाजपा सरकार के कार्यकाल के घोटालों की जांच के लिए गठित भाटी जांच आयोग की टीडीसी घोटाले में रिपोर्ट सरकार को सौंपने के बाद भाजपा के खिलाफ बहुगुणा सरकार के नरम रवैये को देखते हुए तो कम से कम ऐसा ही लग रहा है..! (जरूर पढ़ें- विजय बहुगुणा कैसे बने मुख्यमंत्री..?)
दरअसल भाटी जांच आयोग की रिपोर्ट में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बजाए बहुगुणा सरकार दोषियों को बचाते हुए मामले की लीपापोती करने में लगी है..! सरकार ने जांच आयोग की रिपोर्ट में उजागर नेताओं और अफसरों को अलग – अलग वर्ग में बांट दिया है। सरकार ने जहां एक ही अपराध में शामिल नेताओं के खिलाफ आयोग की रिपोर्ट को तहरीर में बदलकर अज्ञात के नाम से थाने में मुकदमा दर्ज कराया है तो वहीं रिपोर्ट में दोषी ठहराए गए अफसरों पर कार्रवाई की बजाए उसका परीक्षण कराने का फैसला लिया है। यानि की तहरीर के आधे हिस्से का परीक्षण सरकार करेगी और बाकी की विवेचना पुलिस करेगी जबकि कानून के जानकारों की नजरों में ये गलत है।
सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने भाजपा शासन में घोटालों की बाढ़ आने का आरोप लगाते हुए भाजपा शासन के सभी घोटालों को बेनकाब कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का दम भरा था। घोटालों की जांच के लिए बकायदा बहुगुणा सरकार ने भाटी जांच आयोग का गठन भी किया था। इसके तहत भाटी जांच आयोग ने टीडीसी घोटाले पर हाल ही में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी जिसके बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का दम भरने वाले बहुगुणा सरकार के तेवर ही बदल गए और अब सरकार दोषियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कराने से भी पीछे हट रही है..! जबकि भाटी आयोग ने जब सरकार को जांच रिपोर्ट सौंपी थी तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने साफ कहा था कि रिपोर्ट में भाजपा के एक पूर्व मुख्यमंत्री और जिन लोगों को दोषी ठहराया गया है उनके खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करायी जाएगी लेकिन अब अचानक बहुगुणा साहब को लगता है कि नामजद रिपोर्ट कराना जरूरी नहीं है। बहुगुणा अब कह रहे हैं कि नामजद रिपोर्ट दर्ज कराना अवश्यक नहीं था। (जरूर पढ़ें- शराब के लिए पैसे हैं...रसोई गैस के लिए नहीं..!)
आखिर बीते कुछ दिनों में ऐसा क्या हुआ कि भाजपाईयों के खिलाफ आक्रमक तेवर दिखाने वाले कांग्रेसी मुख्यमंत्री के तवर एकदम से नरम पड़ गए..? (जरूर पढ़ें- विजय बहुगुणा- कैसा गैरसैंणकैसा स्वाभिमान..? )
क्या भाजपा और कांग्रेस में पर्दे की पीछे कोई बड़ी डील हुई या फिर बहुगुणा साहब ये समझ गए कि सत्ता से बेदखल होने के बाद भविष्य में कभी उनकी बारी भी आ सकती है लिहाजा ज्यादा तेवर दिखाए तो कल कहीं उनके ये तेवर उन पर ही भारी न पड़ जाएं..!
जाहिर है अगर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो फिर दर्ज रिपोर्ट नामजद होनी चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जनता के सामने तो विपक्षी दलों को चोर और भ्रष्टाचारी बताने वाले राजनीतिक दल खुद को जनता का हितैषी साबित करने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन जब भ्रष्टाचार और घोटालों की जांच के लिए गठित भाटी जांच आयोग जैसे किसी आयोग की रिपोर्ट आती है तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है..! (जरूर पढ़ें- 50 लाख का जनता दरबार..!)
कहा भी जाता है कि राजनीति में न तो कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही स्थाई दुश्मन। क्या पता कब..? कहां किसका वक्त बदल जाए..? किसकी जरूरत कब..? कहां आन पड़े..? इसलिए वक्त के साथ अपने तेवर बदलते चलो क्या पता कल कहीं अपने ही पाप का घड़ा फूट जाए..! तब कौन काम आएगा..? कहीं बहुगुणा साहब भी तो यही नहीं कर रहे..? लगे रहो बहुगुणा साहब...लगे रहो अभी तो सिर्फ टीडीसी घोटाले की जांच रिपोर्ट आई है अभी तो 5 और घोटालों की जांच रिपोर्ट आनी हैं तब भी तो आपको अपने भविष्य की चिंता करते हुए भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों का वर्तमान सुरक्षित करना है फिर चाहे वो विपक्षी पार्टी के ही क्यों न हों...आखिर सवाल आपके भविष्य से भी तो जुड़ा हुआ है..!
  
deepaktiwari555@gmail.com