Rachana Priyadarshini-
- सराहनीय है सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला
आज सुबह-सवेरे जैसे ही मैंने अखबार हाथ में उठाया, तो सबसे पहले जिस खबर पर मेरी नजर गई, उसका शीर्षक था- "सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक रूढ़िवादिता से लड़ने के लिए लॉन्च किया हैंडबुक- अब कोर्ट में महिलाओं के लिए बिन ब्याही मां, हाउसवाइफ और अफेयर जैसे शब्द नहीं चलेंगे"
इस खबर पढ़ते ही दिल से एक आवाज आयी कि 'चलो, आखिरकार देर आये पर दुरुस्त आये...'
23.8.23
अब कोर्ट में महिलाओं के लिए बिन ब्याही मां, हाउसवाइफ और अफेयर जैसे शब्द नहीं चलेंगे
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21.8.23
कल्याण सिंह की दूसरी पुण्यतिथि पर अलीगढ़ पहुंचे योगी और शाह ने क्या कहा...
अजय कुमार,लखनऊ
योगी आदित्यनाथ ने आज अलीगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की द्वितीय पुण्यतिथि पर कहा 2024 की जनवरी में 500 वर्षों का इंतजार खत्म करके भगवान राम अपने मंदिर में विराजमान होंगे। बाबू जी की आत्मा भी कहेगी कि 1992 में जिसके लिए कुर्सी छोड़ी, वह सपना अब पूरा हुआ।

योगी ने कहा कि यूपी में डबल इंजन की सरकार है और विकास हो रहा है। काशी में कशी विश्वनाथ धाम बन रहा है। बाबू जी के नाम से कैंसर संस्थान का नाम है। बुलंद शहर में मेडिकल कॉलेज भी बाबू ज़ी कल्याण सिंह के नाम निर्माण कार्य चल रहा है। यहां प्रवेश की प्रक्रिया चल रही है।बीजेपी कल्याण सिंह की पुण्यतिथि को हिन्दू गौरव दिवस के रूप में मना रही है.
सीएम योगी आदित्यनाथ ने मंच से कार्यकर्ताओं से कहा कि बाबू जी की द्वितीय पुण्यतिथि को हिन्दू गौरव दिवस के रूप में मना रहे हैं। बाबूजी के द्वारा प्रदेश के विकास व सम्मान के लिए किये गए कार्यों के लिए श्रद्धांजलि देते हैं। 1991 में जब पहली बार प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो प्रदेश के लोगों को इसका एहसास हुआ था। आज नाग पंचमी व विश्व उद्यमिता दिवस है। सभी व्यापारियों को बधाई। 1991 में बाबू जी ने यहां तालानगरी का गठन किया था। 2017 से अब सरकार ने विकास पर काम किया है। परम्परा के उद्योग को बढ़ाने के लिए काम किया है। वन डिस्ट्रिकट वन प्रोडेक्ट पर काम किया है।
इस मौके पर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अपने भाषण की शुरुआत भारत माता की जय के साथ की। उन्होंने कहा कि यूपी की 80 सीट भाजपा की झोली में डालने के लिए बोलिये जय श्री राम। भाजपा के वरिष्ठ नेता व राम भक्त कल्याण को श्रद्धांजलि देने आया हूं। देश के करोड़ों कार्यक्रताओं की और से श्रद्धांजलि देता हूं। जो लोग जानते हैं पिछड़े और गरीबों के प्रति कल्याण सिंह संवेदनशील थी। कोरोना के कारण मैं अस्पताल में था, जब राम मंदिर की नींव पीएम मोदी ने रखी थी।
अमित शाह ने कहा कि तब बाबू ज़ी ने फोन पर कहा था मेरा जीवन धन्य हो गया। बाबूजी ने पिछड़ों को आगे बढ़ाया। गरीबों का कल्याण किया, अब यही मोदी ज़ी कर रहे हैं। आवास, सिलेंडर दिए जा रहे हैं। मुफ्त राशन दिया जा रहा है। बाबू जी ने कभी जाति की बात नहीं की। लेकिन उन्होंने पिछड़ों को आगे बढ़ाया। अब मोदी भी यही कर रहे हैं। पिछड़ी जातियों को लाभ मिल रहा है। नीट में दाखिला दिया जा रहा है, पिछड़ा वर्ग से समान अधिकार दिया। मोदी ने अब गरीब कल्याण को आगे बढ़ाया। तीन कामों को किया। कांग्रेस आजादी के बाद मंदिर को लटका रही थी, भटका रही थी। पीएम मोदी ने जजमेंट लाकर बिना एक खून का कतरा बहाए मंदिर की नींव रखी। बाबू जी के जीवन में एक समय ऐसा आया कि बाबू जी ने कहा कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा। भले कुर्सी चली जाए।
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19.8.23
इतिहास सुधारने के पहले, ऐतिहासिक गलतियों को सुधारना होगा
हम विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा ठोक रहे हैं और चंद्रमा के दरवाजे पर खड़े होकर दस्तक दे रहे हैं। हम विश्वगुरु के पद पर आसीन हैं। इतिहास का यह अमृतकाल है। सुनकर सचमुच अच्छा लगता है। लेकिन बस्तर में यहां पहुंच कर यह समझ में आने लगता है कि बहुचर्चित 'विकास' जी को इन आदिम बस्तरिया के इस टूटे फ़ूटे आंगन तक पहुंचने में अभी काफी वक्त है। विश्वगुरु की नजरे इनायत से भी ये मरहूम हैं, और 'अमृतकाल' नामक चिड़िया का तो यहां दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं है।*
"राजधानियों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर आदिम जनजातीय समाज की जमीनी बस्तरिया हकीकत को बिना भली-भांति समझे बूझे किए त्रुटिपूर्ण सर्वेक्षण एवं उसके आधार पर जारी किए गए एक अपवित्र शासकीय ज्ञापन 'नोटिफिकेशन ने एक पूरे समुदाय की किस्मत बदल कर नरक बना दिया। आज इनके पास ना तो खेती की जमीन है, और ना ही जल जंगल जमीन का इनका शाश्वत नैसर्गिक अधिकार, ना सामाजिक प्रतिष्ठा बची है, और ना ही कोई आर्थिक आधार। "
देश हाल में ही 77-वां गौरवशाली स्वतंत्रता-दिवस मना कर हटा है।आज हम विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा ठोक रहे हैं, और चंद्रमा के दरवाजे पर खड़े होकर दस्तक दे रहे हैं। हम विश्वगुरु के पद पर स्वस्थापित आसीन हो ही चुके हैं। यह इतिहास का अमृतकाल चल रहा है, सुनकर सचमुच बहुत अच्छा लग रहा है। अच्छा लगना भी चाहिए। वैसे भी बिलावजह देशद्रोहियों में अपनी गणना भला कौन कराना चाहेगा।
यह स्थापित तथ्य है कि किसी सांकल की मजबूती का आकलन सबसे कमजोर कड़ी की मजबूती से किया जाता है। हमारे देश-समाज की सबसे कमजोर कड़ियों में से एक महत्वपूर्ण कड़ी की आर्थिक-सामाजिक मजबूती का आकलन करने के लिए इस 77-वीं "स्वतंत्रता-दिवस" की पूर्व संध्या पर इस बार मैं वहां पहुंचा ... जहां अब तक 'आजादी' डरते-झिझकते, दबे पांव खरामा खरामा ही पहुंचती रही है...और यहां पहुंच कर मुझे यह समझ में आने लगा कि बहुचर्चित माननीय 'विकास' जी को मेरे इन आदिम बस्तरिया साथियों के इस टूटे फ़ूटे आंगन तक पहुंचने में अभी भी काफी वक्त है। विश्व गुरु की नजरे इनायत से ये बेचारे अभी भी मरहूम हैं। और अमृतकाल नामक चिड़िया का तो यहां दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं है। यह जगह है, छत्तीसगढ़ के बस्तर के घनघोर जंगलों के बीच का एक छोटा सा गांव 'कोटगांव'। यह गांव संभवतः नारायणपुर जिले में पड़ता है, या हो सकता है कोंडागांव जिले में आता हो, पर जिला कौन सा है इससे इन बेचारों के हालातों पर भला क्या फर्क पड़ता है और मुझे भी कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था ,सो मैंने ज्यादा पूछा भी नहीं? मेरे ये साथी परिवार प्राचीनकाल के 'दंडकारण्य नामक अभिशप्त वन क्षेत्र, रियासत कालीन बस्तर स्टेट, और आजादी के बाद बने बस्तर जिले से 2011 में अलग होकर बने नक्सल प्रभावित जिला कोंडागांव तथा नारायणपुर जिले के उन मूल निवासियों में से हैं, जिनके पूर्वजों ने हजारों साल पहले बस्तर की लोहे की पहाड़ियों से लुआ पखना (लौह पत्थर) तोड़ कर,लाकर सरगी लकड़ी के कोयले की भट्ठी में गलाकर इस धरती पर सबसे पहले लोहा बनाया था, टाटा से भी पहले और अन्य उन सभी से पहले,जो इस बात का दावा करते हैं। इनका रहन सहन, बोली-भाषा ,देवी-देवता, तिथि-त्योहार ,शादी-विवाह जीवन-मरण संस्कार, गीत-संगीत ,नृत्य, बाजे, खानपान, कपड़ा-लत्ता, घर की बनावट सब कुछ अन्य सहजीवी आदिवासियों की भांति ही है, क्योंकि यह उन्हीं में से एक रहे हैं हमेशा से,,, सदियों सदियों से। यहां तक कि इनके कुल गोत्र, टोटम सभी अन्य सहजीवी आदिवासियों की भांति ही है। इनके बुजुर्गों ने विस्तार से बताया कि ये भी पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानीय जनजातीय समुदायों के देवी देवताओं,पेन पुजारी,तथा 'बूढ़ा-देव' को ही मानते आए हैं और उन्ही की पूजा आराधना भी करते हैं ( मौके पर की गई रिकार्डिंग मौजूद )। ये स्थानीय भाषा में वाडे, लौरा कहलाते हैं। यहां उपस्थित लगभग 50 परिवारों के टोटम कुल गोत्र नाम (सरनेम) नेताम, सोड़ी, सलाम मरकाम, बघेल,पटावी कहीं किसी भी स्तर पर कोई भेद नहीं दिखाई देता। हम साथ साथ इन जंगल पहाड़ों में पीढ़ी दर पीढ़ी रहते आए हैं, हमारे कहीं और से आने का कहीं कोई इतिहास नहीं है।
किंतु आजादी के उपरांत त्रुटिपूर्ण, हवा-हवाई, तथ्यहीन विधिक सर्वेक्षण की अक्षम्य गलती के कारण इन्हें आदिवासियों से विलग मान लिया गया और इस सरकारी गलती की अंतहीन कठोर सजा पिछले लगभग 70 सालों से यह समुदाय भुगत रहा है।
*यह समझने वाली बात है कि कैसे राजधानियों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर आदिम जनजातीय समाज की जमीनी बस्तरिया हकीकत को बिना भली-भांति समझे-बूझे किए त्रुटिपूर्ण सर्वेक्षण एवं उसके आधार पर जारी किए गए एक अपवित्र शासकीय ज्ञापन 'नोटिफिकेशन ने एक पूरे समुदाय की किस्मत बदल कर नरक बना दिया,आज इनके पास ना तो खेती की जमीन है और ना ही जल जंगल जमीन का इनका शाश्वत नैसर्गिक अधिकार, ना सामाजिक प्रतिष्ठा बची है, और ना ही कोई आर्थिक आधार ।। "*
सरकारी कार्यालयों और योजनाओं में जब इन्हें आदिवासियों से अलग पिछड़े वर्ग में वर्गीकृत कर अलग कर दिया गया, तो परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे आदिवासी समाज ने भी सरकारी आदेशों के अनुरूप इन्हें अपनों से अलग इकाई मानने लगा। *इस पक्षपातपूर्ण वर्गीकरण से कभी गांव के किसानों के कृषि औजार, घरेलू औजार, शिकार-पारद के तथा स्थानीय देवी देवताओं के अस्त्र-शस्त्र,निशान बनाने वाले गांव व के महत्वपूर्ण अंग समझे जाने वाले इस समुदाय की स्थानीय सामाजिक स्थिति में पिछले 70 वर्षों में बहुत ज्यादा गिरावट आई है*। बड़े आश्चर्य का विषय है कि आग में तपाकर लोहे का कार्य करने वाले अघरिया लोहार समुदाय को इसी छत्तीसगढ़ के सरगुजा में आदिवासी माना जाता है तथा छत्तीसगढ़ के पितृ राज्य मध्यप्रदेश में भी इन्हें आदिवासी माना जाता है, किंतु देश के सबसे पिछड़े और आदिम जनजातीय क्षेत्र बस्तर के मूल आदिम निवासी लौह कला के जनक इस छोटे से समुदाय को पिछड़ा वर्ग में दर्ज कर आदिम निवासी के सभी अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। इस अतार्किक,अनैतिक, अवैधानिक कृत्य के पीछे पीछे वोट आधारित राजनीतिक षड्यंत्र एवं दुरभसंधि से इनकार नहीं किया जा सकता। कारण चाहे कुछ भी हो किंतु वर्तमान में अपने पुरखों की जल जंगल जमीन के नैसर्गिक अधिक अधिकारों से वंचित होकर एवं सरकारी अनुदानों एवं आरक्षण से मरहूम होकर आज ये दर-दर को भटकने को बाध्य हो गए हैं। सर्वव्यापी वैश्विक बाजारवाद के चलते कल-कारखानों की बनाई गई कुल्हाड़ी, फावड़े ,गैंती , छुरी व सभी जरूरी कृषि औजार अब इनके द्वारा कठोर श्रम करके,भट्टी में अपने आप को तपाकर इनके हाथों से बनाए गए बनाए गए कृषि-औजारों की तुलना में काफी सस्ते पड़ते हैं। ऊपर से अभिलेख कोयला और लोहा दोनों बाजार से खरीदना पड़ता है। इन सभी कारणों से इनका लोहे का कार्य भी पिछले कई दशकों से लगातार कम होते होते अब लगभग समाप्त प्रायः हो चला है। *इससे गांवों की आर्थिक संरचना में भी अंतिम पायदान पर धकेल दिए गए इनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति में गिरावट का यह भी एक महत्वपूर्ण कारण है*। स्थानीय छात्रावासों में भी इन के बच्चों के लिए जगह नहीं होती।
इनके कुछेक परिवार लौह शिल्प कला की ओर उन्मुख हुए हैं और किसी तरह परंपरागत जीवन यापन करने की कोशिश कर रहे हैं। कई परिवार गांव से निकलकर शहरों में पेंट शर्ट धारी हो गए हैं, और छोटे-मोटे काम करके मेहनत मजदूरी करके किसी तरह अपनी जीवन की गाड़ी को घसीट रहे हैं। इस समुदाय के जो बचे खुचे परिवार आज भी गांवों में रह रहे हैं वो दरअसल स्थानीय जनजातीय समाज की सदाशयता, उनकी मदद और सदियों साथ रहने से उत्पन्न सहजीविता,सामंजस्य व सहृदयता के कारण ही बचे हुए हैं। इतिहास सुधारने के इस नए दौर में इस समुदाय के प्रति की गई इस गंभीर कानूनी त्रुटि को भी अब जल्द से जल्द सुधार लिया जाना चाहिए।
दरअसल इस समुदाय की समस्याओं का अंत ही नहीं है।अशिक्षा, निराशा और शराब खोरी अन्य वंचित समुदायों की तरह इस समुदाय की भी एक बड़ी समस्या बन गई है। ये आज भी बेहद सीधे और भोले भाले हैं। मैंने इनके साथ काफी वक्त बिताया है। इनके परिवारों, रिश्तेदारियों व इनके पूर्वजों का इतिहास तथा और भी ढेर सारी बातें की।
*इनके भोलेपन का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि ढलती शाम में जब मैं इन से विदा होने लगा तो इन परिवारों की दयनीय दशा को देखकर मेरा मन काफी खराब हो चला था। जब मैंने वापस जाने की इजाजत मांगी तो फोटो में मेरे साथ दिख रहे ये दोनों बुजुर्ग जिनका नाम बुद्धू नेताम तथा बुद्धसन नेताम है, लपक कर मेरे पास आए और बड़े भाई ने बड़े अधिकार पूर्वक मुझसे कहा कि अब तक आप हमारे काफी फोटो खींच चुके हो और हमसे ढेर सारी बातें भी है, तो आप यहां से रवानगी डालने से पहले हमें शराब पीने के लिए कुछ पैसे देते जाइए । मैं हक्का-बक्का रह गया। मैं कुछ जवाब देता इससे पहले छोटे भाई ने एक बार मेरी गाड़ी की ओर भरपूर नजर से देखा और फिर सीधे मेरी आंखों में झांकते हुए कहा , और हां जब दे ही रहे हो तो पैसे कुछ ज्यादा ही दीजिएगा क्योंकि कल झंडेवाला त्यौहार है,, और आखिर कल हमें भी तो झंडा त्योहार मनाना है। और बिना शराब के त्यौहार कैसा? मैं कुछ पल तक उन दोनों भाइयों को देखता रहा, शरीर पर लंगोटी के अलावा कोई कपड़ा नहीं, मिट्टी खपरैल का टूटा फूटा घर, घर के एक किनारे लटका हुआ बिजली का लट्टू, जाने क्यों मुझे मुंशी प्रेमचंद के घीसू-माधव की याद आ गई। सचमुच इनका इतना भोलापन भी ठीक नहीं है। सदा की तरह आज भी मेरे जेब में नगदी नदारद थी मैंने साथी तीजू भाई से कुछ पैसे लेकर उन्हें दिए उनकी आंखों में खुशी की चमक देखकर मुझे सचमुच अच्छा लगा।*
यह तो तय रहा कि कल यह दोनों भाई निश्चित रूप से देश का 77 वां स्वतंत्रता दिवस यानी कि झंडा तिहार (हल्बी), अथवा झंडा-पंडुम (गोंडी) अपने तरीके से मनाएंगे। *आपको शायद इस बात पर यकीन ना हो, पर कड़वी हकीकत यही है कि हमारे ज्यादातर गांवों में अधिकांश लोगों को 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी गणतंत्र-दिवस के त्योहारों का अर्थ व अंतर कुछ भी पता नहीं है। हमारे यहां के लोगों के लिए तो दोनों ही पर्व बस झंडा-तिहार (हल्बी), या झंडा-पंडुम (गोंडी) ही हैं।*
आपने हमने तो स्वतंत्रता-दिवस धूमधाम से मना लिया, लेकिन हमारे इन आदिम पुरखों के इस बचे खुचे समुदाय के लिए तो असल स्वतंत्रता और अमृतकाल तो तभी आएगा जब इन्हें इनका छीना गया वाजिब हक तथा सम्मान वापस इन्हें मिल पाएगा। इसके लिए इनके ऊपर एक विस्तृत जमीनी रिपोर्ट, मय प्रमाण एवं साक्ष्यों के साथ तैयार कर रहा हूं ,ताकि इनके साथ जरूरी न्याय हो पाए। क्योंकि मुझे पूरा यकीन है कि इनके साथ न्याय होगा। क्योंकि मैं आज भी आशावादी हूं । क्योंकि बचपन में मेरे प्राथमिक स्कूल 'ककनार' की मिट्टी की दीवाल पर लिखी गई कहावत 'अंततः सच्चाई की जीत होती है' मुझे आज भी न केवल याद है, बल्कि इसपर आज भी पक्का यकीन है।
डॉ राजाराम त्रिपाठी
जनजातीय शोध एवं कल्याण संस्थान, छत्तीसगढ़।
WWW.DrRajaramTripathi.COM
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यशवंत सिंह yashwant singh
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7.8.23
कांग्रेसी हुड्डा के नाम पर किसी भाजपाई का इंटरव्यू छाप दिया अमर उजाला ने, देखें
इस इंटरव्यू को ध्यान से पढ़िए. कहने को तो ये इंटरव्यू पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा का है. लेकिन अंदर सवाल जवाब पढ़िए, खासकर आखिरी सवाल जवाब तो पता चलेगा कि ये इंटरव्यू भाजपा के नेता का है जिसे हुड्डा का इंटरव्यू बताकर छाप दिया गया. भला कांग्रेसी हुड्डा खुद को क्यों भाजपा पार्टी संगठन और मनोहर का सिपाही बताएंगे, जैसा कि आखिरी सवाल जवाब में पढ़ने को मिल रहा है. पिछले महीने जुलाई की 17 तारीख को ये इंटरव्यू अमर उजाला में प्रकाशित हुआ है. इसे ईपेपर में ठीक किया जा चुका है लेकिन जो छप गया, उसका क्या होगा... पता नहीं अमर उजाला ने कुछ खंडन वंडन छापा या नहीं...
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यूपी सरकार पर भारी सरकारी मशीनरी की मनमानी
अजय कुमार,लखनऊ
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के नेतृत्व में प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है.अपराधों पर नियंत्रण है.अपराधी खौफजदा हैं.योगी के मंत्रियों के कामकाज की भी समीक्षा हो रही है, जिसके चलते प्रदेश की बदहाली दूर हो रही है.सरकार ने नौकरशाही और पुलिस की लगाम कस रखी गई है,जिससे लाल फीताशाही पर लगाम लगी है.प्रदेश में अमन चैन है.बार-बार योगी सरकार इस तरह के दावे करती रहती है. फिर भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने अधिकारियों को नसीहत देना पड़ रहा है कि जनता की समस्याएं न सुनना अब अधिकारियों को भारी पड़ेगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गत दिनों अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए कि आम लोगों की समस्याओं के निस्तारण पर पूरा जोर दिया जाए। ऐसे अधिकारी जो जनता की समस्याएं नहीं सुनेंगे और बेवजह उन्हें कार्यालयों के चक्कर लगवाएंगे तो उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
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सत्येंद्र कुमार
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19.7.23
समय के साथ ‘मिजाज’ बदलता लूडो गेम
लूडो में ‘दिल’ हारने वाली सीमा जैसी ‘प्रेम कहानी’ इकरा की भी थी
संजय सक्सेना,लखनऊ
विश्व स्तर पर सबसे लोकप्रिय बोर्ड गेम लूडो का समय के साथ अपना ‘मिजाज’ बदलता जा रहा है.कभी यह बच्चों का खेल हुआ करता था तो अब लूडो को जवां दिलों की धड़कन बनते भी देखा जाता है. लूडो एक बौद्धिक खेल भी है. इसकी प्रसांगिकता को देखते हुए अब कई स्कूल-कालेजों में भी बच्चों का बौद्धिक विकास करने के लिए लूडो और शतरंज जैसे परम्परागत खेलों का आयोजन होने लगा है. इसी तरह से कल तो जो महिलाएं किटी पार्टी में ताश खेला करती थीं,अब वह भी लूडो खेलने लगी हैं. लूडो बुजुर्गो का टाइम पास का जरिया भी बनता जा रहा है.
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17.7.23
मनाली के रास्ते से लापता 11 लोगों के प्रकरण में तहसील प्रशासन ने शुरू की छानबीन
दिनेश कुमार जायसवाल-
एसडीएम मिल्कीपुर और तहसीलदार ने पिठला गांव पहुंच लापता अब्दुल मजीद के दामाद से की वार्ता।
कुल्लू मनाली जा रहे एक ही परिवार के 10 सदस्य सहित 11 लोग हो गए हैं लापता।
अनहोनी की आशंका के चलते गांव में पसरा सन्नाटा।
मिल्कीपुर अयोध्या।
कुमारगंज थाना क्षेत्र के पिठला गांव से हिमाचल प्रदेश के कुल्लू मनाली के लिए निकले एक ही परिवार के 10 सदस्य सहित 11 लोगों के रास्ते से लापता होने के मामले में अब तहसील प्रशासन मिल्कीपुर की ओर से जांच पड़ताल और छानबीन शुरू कर दी गई है। हालांकि अभी लापता लोगों का कोई सुराग नहीं लग सका है। फिलहाल गांंव में सन्नाटा पसरा हुआ है और चर्चाओं का बाजार भी गर्म है। हिमाचल प्रदेश स्थित ब्यास नदी में आई बाढ़ और भूस्खलन के चलते अब लापता लोगों के सगे संबंधियों सहित ग्रामीणों में किसी बड़ी अनहोनी की आशंका समा गई है। बता दें कि कुमारगंज थाना क्षेत्र स्थित पिठला गांव निवासी 62 वर्षीय अब्दुल मजीद कंकाली अपने दामाद रहबर एवं अपने पूरे परिवार सहित हिमाचल प्रदेश के कुल्लू मनाली में रहकर मेहनत मजदूरी करके जीवन का गुजर-बसर कर रहा था।
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The Bhojpuri Legend Manoj Bhawuk Bestowed “Bhojpuri Icons" Filmfare and Femina Award
In a historic moment, two iconic brands “Filmfare and Femina”known for their steadfast dedication to recognising talent and excellence honoured eminent Bhojpuri writer, poet, lyricist and critic Mr. Manoj Bhawuk for his indelible contribution in the history of Bhojpuri cinema and literature. In a grand celebration at Ramada, Lucknow on 16 July 2023,Mr. Manoj Bhawuk was bestowed “Filmfare and Femina Bhojpuri Icons-Reel & Real Star”honour by Ambika Muttoo, Editor-in-Chief of Femina and Vikram Vasudev Narla, Director from South industry in presence of many celebs. This is first time Filmfare and Femina collaborated to honour Bhojpuri Icons who have made remarkable contributions to Bhojpuri entertainment industry.
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16.7.23
मुंह मोड़ते संगी-साथी,अकेले पड़ते अखिलेश
अजय कुमार,लखनऊ
समाजवादी पार्टी पिछले करीब दस वर्षो में हार का ’चैका’ लगा चुकी है. 2014 के लोकसभा चुनाव से शुरू हुआ हार का यह सिलसिला 2017 के विधान सभा और 2019 के लोकसभा चुनाव के पश्चात एक बार फिर 2022 के विधान सभा में मिली हार तक जारी रहा था. हर बार सपा को भाजपा से मात खानी पड़ी.बीजेपी के समाने अखिलेश ने सभी दांव अपना चुके हैं. अब 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर सपा के अध्यक्ष और पूर्व सीएम अखिलेश यादव की ’ चुनावी परीक्षा’ होगी,लेकिन इस बार भी अखिलेश की राह आसान नहीं लग रही है. अब तो अखिलेश के पास कोई नया ‘प्रयोग’ भी नहीं बचा है. वह कांगे्रस,बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ चुके हैं. राष्ट्रीय लोकदल और ओम प्रकाश राजभर की पार्टी का भी साथ करके देख लिया हैं,लेकिन कोई भी प्रयोग उनकी हार के सिलसिले को रोक नहीं पाया. स्थिति यह हो गई है कि आज की तारीख मंे 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव बिल्कुल ‘तन्हा’ नजर आ रहे हैं.कांगे्रस और बहुजन समाज पार्टी तो समाजवादी पार्टी से दूरी बनाकर चल ही रहे हैं,इसके अलावा उसके मौजूदा साथी राष्ट्रीय लोकदल के चैधरी जयंत सिंह और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर भी भाजपा गठबंधन की तरफ पेंगे बढ़ा रहे हैं.
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आदरणीय रामेश्वर पांडेय जी तो पीड़ित थे, मुलजिम नहीं
Rakesh Sharma-
बात आज जुबान पर आ ही गई है इसलिए आदरणीय रामेश्वर पांडेय जी की विनोदप्रियता और उनकी कुछ बातें जो आज तक नहीं भूला वे भी आप सभी के साथ साझा करने का प्रयास कर रहा हूं। दोस्तों पिछले कई महीनों से तकनीकी तौर पर अपंग था और संसाधनों की तंगी से जूझ रहा था इसी कारण उनके स्वर्गवास के बाद उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित नहीं कर पाया था। पिछले 23 साल पुरानी वे बातें आज भी यूं ही दिमाग में अंकित हैं। मैं ये सभी बातें इसलिए आप लोगों के सामने ला रहा हूं कि जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन लोगों की भलाई करने में बिताया वे इस सम्मान के हकदार हैं कि हमारी आगामी पीढ़ी के लोग उनके बारे में जरूर जानें।
आदरणीय अतुल जी भी अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन पत्रकारिता की दुनिया को निष्कलंक आगे बढ़ाने के लिए इन दोनों महानुभावों का योगदान में कभी कम नहीं आंकना हूं। एक दिन अतुल जी मेरी डेस्क से गुजर रहे थे तो अचानक रुक गए और मेरे द्वारा संपादित की जा रही खबर को देखने लगे और वर्तनी को लेकर कुछ सवाल पूछे। उस समय मैं यह भी नहीं जानता था कि वे कौन हैं, लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े तो कई वरिष्ठ साथी आकर मेरे समाचार के संपादन को देखने लगे और घोषणा कर दी कि मुन्ना कल सुबह अपना बोरिया बिस्तर बांध लो और घर जाने के लिए अगली टिकट बुक करा लो। मैं बहुत परेशान और उस समय मेरी पत्नी अस्पताल में मेरे पहले बच्चे के जन्म के लिए भर्ती थी। पांडेय जी ने अगले दिन दोपहर में ही मुझे कार्यालय में किसी को संदेश भेजकर बुलवा लिया...
पत्रकारिता के जगत में आपके इर्द गिर्द जो भी पर घटनाएं घटती हैं उसके साक्षी मात्र हम ही नहीं होते हैं, परन्तु कुछ मामले इस तरह के होते हैं कि प्रत्यक्ष तौैर पर हम लोग एक मुलजिम नजर आते हैं लेकिन असल में हम पीड़ित होते हैं। इन अवस्थाओं की जानकारी हमें बाद में होती है तो उस समय सिर्फ पछतावे के अलावा कुछ किया नहीं जा सकता। भाई अमरीक ने हाल ही में अपनी तरफ से स्पष्ट किया है कि हर किसी का नजरिया किसी के लिए एक नहीं हो सकता और कुछ बातें हम इसलिए नजरअंदाज कर जाते हैं। किसी इंसान की अच्छी बातों को सिर्फ अपने कारणों से हम भुला दें तो उसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता...
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वन स्टॉप सेंटर से एक पीड़ित नाबालिग किशोरी गायब!
देवरिया : प्रदेश के देवरिया जिले के वन स्टॉप सेंटर से एक पीड़ित नाबालिग किशोरी के फरार हो जाने की घटना ने पुलिस विभाग की सक्रियता पर सवालिया निशान लगा दिया है। जानकारी के अनुसार भटनी थाना क्षेत्र की एक गांव निवासी बलात्कार पीड़िता नाबालिग किशोरी बुधवार को रहस्यमई परिस्थितियों में फरार हो गई।
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ज्ञानवापी : सबूतों का खजाना, फिर भी आक्रांता औरंगजेब महान?
Suresh Gandhi-
वेद-पुराणों से लेकर इतिहास में दर्ज है काशी दुनिया के सबसे प्राचीनतम से प्राचीन शहरों में से एक है। 2,500 साल से भी अधिक पुराना इसका इतिहास है। सारनाथ में अशोक की सिंह राजधानी को पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में बुद्ध के पहले उपदेश की स्मृति के रूप में व्याख्या किया गया है। जबकि इस्लाम का इतिहास 14 सौ साल पुराना है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है कथित ज्ञानवापी मस्जिद हजारों साल पुरानी कैसे हो सकती है? दस्तावेजों के मुताबिक इस्लाम की पहली मस्जिद कुवत-उल-इस्लाम मस्जिद 12वीं सदी के अंत की है, तो कथित ज्ञानवापी का निर्माण कैसे हो गया? जबकि स्कंद पुराण में कहा गया, देवस्य दक्षिणी भागे वापी तिष्ठति शोभना। तस्यात वोदकं पीत्वा पुनर्जन्म ना विद्यते। अर्थात प्राचीन विश्ववेश्वर मंदिर के दक्षिण भाग में जो वापी है, उसका पानी पीने से जन्म मरण से मुक्ति मिलती है
सुरेश गांधी-
दरअसल, वाराणसी के ज्ञानवापी केस में सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हो रही है। हिंदू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष की याचिका पर अपना जवाब दाखिल करते हुए सर्वे में मिले शिवलिंग को फव्वारा बताना 125 करोड़ हिन्दुओं के अपमान का आरोप लगाया है। इसमें हिंदू पक्ष की तरफ से वादी महिलाओं ने अपनी दलील में औरंगजेब को क्रूर शासक बताते हुए आदि विश्ववेश्वर मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने की बात कहीं है। जबकि मुस्लिम पक्ष का कहना है कि हिंदू पक्ष का दावा बिल्कुल बेबुनियाद है। ज्ञानवापी मामला सुनवाई योग्य नहीं है. मस्जिद हजारों साल पुराना है। जिसे शिवलिंग कहा जा रहा है, वो फव्वारा है. ज्ञानवापी के दीवार पर त्रिशूल, डमरू, ओम जैसी कलाकृतियां का अंकित कहना गलत है। औरंगजेब निर्दयी नहीं था और उसने किसी मंदिर पर आक्रमण नहीं किया था. हालांकि मुस्लिम पक्ष की इस दलील के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को अपना जवाब दाखिल करने को कहा है. बता दें, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्ञानवापी में मिले कथित शिवलिंग का साइंटिफिक सर्वे कराने का आदेश दिया था. इस फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी. पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी. ऐसे में कोर्ट का फैसला क्या होगा, यह आने वाला वक्त बतायेगा। लेकिन औरंगजेब निर्दया नहीं था, वो मुस्लिमों का आदर्श रहा, यह 125 करोड़ हिन्दुओं का अपमान नहीं तो और क्या है? वह औरंगजेब जिसके क्रूरता के किस्से मथुरा, वृंदावन, काशी, अयोध्या से लेकर दिल्ली तक में टूटे सैकड़ों मंदिरों के अवशेष चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं।
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कुल्लू मनाली जा रहे एक ही मुस्लिम परिवार के 11 सदस्य लापता, अनहोनी की आशंका के चलते गांव में पसरा सन्नाटा
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2.7.23
स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य देवता भी नहीं जानते, मनुष्य कैसे जान सकता है ?
सत्येंद्र कुमार
त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम देवो न जानाति, कुतो मनुष्य: अर्थात स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य देवता भी नहीं जानते, मनुष्य कैसे जान सकता है ?
आपने वो फ़िल्म देखी होगी जिसका एक बड़ा मशहूर गाना था "ठुकरा के मेरा प्यार... मेरा इंतकाम देखेगी । इस फ़िल्म का वास्तविक चित्रण आजकल देखने को मिल रहा है ।उत्तर प्रदेश की फिज़ा में एक बेवफा एसडीएम की बेवफाई की चर्चा जोरों पर है । मतलब अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का ! यह तराना आज लगभग हर वो शख्श गुन गुना रहा है जिसके सूख चुके जख्मों को फिर से एस डी एम साहिबा की बेवफाई वाले नए किस्से ने कुरेद दिया है । आज सोशल मीडिया में एक पति की दर्द भरी कहानी सभी की जुबानी चर्चा में शामिल हो चुकी है। सच के धरातल पर बेवफाई का नजारा ऐसा है कि एक पत्नी भक्त बेचारा सिसकता हुआ कह रहा है कि "अगर बेवफाओं की अलग कोई दुनिया होती... तो मेरी बीवी वहाँ की महारानी होती..!"
चारों तरफ शोर है, और सोशल मीडिया में उस बेवफा पत्नी के चरित्र का बेबाक वर्णन हो रहा है जो एक बड़ी पदाधिकारी है । दिल में चोट लगी पति आलोक मौर्या को और दर्द से कराहने लगे वे पत्नी भक्त, जो अपनी पत्नियों को सरकारी नौकरी या अधिकारी बनाने का ख्वाब लेकर तैयारी करवा रहे थे। आज बेवफाई के इस नए किस्से ने मुसीबत का ऐसा पहाड उन महिलाओं के सामने खड़ा कर दिया जो सपनो की उड़ान में अपने पतियों के भरोसे मचल रही थी । एक तरफ आज महिला सशक्तिकरण के इस युग में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ जैसे स्लोगनों के जरिये देश का परिवेश बदलने का प्रयास चल रहा है वहीं दूसरी तरफ एस डी एम साहिबा के किस्से ने लोगों को दिलों में एक नई पटकथा का संवाद पिरोना शुरू कर दिया है । इस किस्से ने चर्चाओ के बाजार में उठे सवाल पर बवाल पैदा कर दिया है कि "बीबी मत पढ़ाओ वर्ना हश्र देख रहे हो भाई" ! आखिर एक ही मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है वाली कहावत को बतौर पत्नी एस डी एम साहिब ने लोगों के बीच साबित कर दिया !
दर दर भटकता दो बच्चियों का बाप आज भविष्य के ताने बाने में ठीक वैसे ही उलझकर रह गया है जैसे दहेज प्रताड़ना के झूठे किस्सों में कई परिवार उलझे हुए बेचारगी से घूम रहे हैं । बेवफाई के इल्ज़ाम के लिए पहले से ही बदनाम नारी जाति के लिए नफ़रत की जो लहर आज फिर हिलोरें मारने लगी हैं उसका सारा श्रेय एस डी एम साहिब को जाता है , लेकिन साथ ही इसका खामियाजा उन औरतों को भी भुगतना पड़ सकता है जिनके लिए उनका घर परिवार ही सब कुछ होता है। तमाम उदाहरण ऐसे भी मौजूद हैं जहाँ पति और परिवार की खुशी के लिए बड़े ओहदे की नौकरी को भी लात मार दी है वफ़ा की देवियों ने !समाज में मान सम्मान के साथ जीने का हक दिलाने वाली अर्धांगिनियों की बदौलत ही सभ्य समाज में पुरुष ने नारी को पूज्यनीय का दर्जा देकर खुशहाल जीवन जीने की परिकल्पना को साकार किया है। सदियों से एस डी एम साहिब जैसे बेवफाई के किस्से मशहूर जरुर है- मगर "छोड़ेंगे न हम तेरा साथ ओ साथी मरते दम तक का तराना भी मशहूर है" ! क्यों किसी को वफ़ा के बदले वफ़ा नहीं मिलती जैसा तराना सवाल बनकर भले आज की फ़िज़ाओं में गूंज रहा है लेकिन वफ़ा की देवियों की सुरीली आवाज में आज भी यह गीत सुनाई दे रहा है कि " तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है " !
आज पति चपरासी और पत्नी एस डी एम वाले किस्से को लेकर सोशल साईट पर जबरदस्त ज़ुबानी फाइट चल रही है और लोग कहने लगे हैं कि "तोता मैना की कहानी तो पुरानी और पुरानी हो गयी" ! इस किस्से ने समाज के भीतर, भीतरखानों में बैठे भेड़ियों को आज सवाल पूछने का मौका दे दिया है कि क्या पतियों को अपनी पत्नियों को उच्च शिक्षा नहीं दिलानी चाहिए ? क्या वास्तव में वक्त के साथ औरत बदल जाती है ? इस पर समाज ने फिर नये सिरे से मंथन करना शुरु कर दिया है। एसडीएम साहिबा की बेवफाई को किसी भी महिला सामाजिक संगठन ने समर्थन नहीं दिया है लेकिन हकीकत के धरातल पर चपरासी पति की विवशता ने सभी के दिलों मे हमदर्दी का तूफान खड़ा कर दिया है । कल क्या होगा यह तो नहीं पता लेकिन इस किस्से ने आज हर एक पति के मन मे एक सशंकित भाव पैदा कर दिया है जो अपनी पत्नी को आईएस पीसीएस की तैयारी करवा रहे हैं । एक की ग़लती ने तमाम लोगों के भविष्य को गर्त के किनारे लाकर खड़ा कर दिया है । सरकार द्वारा चलाए जा रहे महिला सशक्तिकरण अभियान का ज्वलंत उदाहरण बनकर उभरी हैं एस डी एम साहिब ! दूसरी तरफ अपनी कुर्बानी देकर और कर्ज लेकर अपनी पत्नी को आसमान की बुलन्दी पर पहुँचाने वाले चपरासी पति की बेबसी बयां कर रही है कि ..
"पढ़ रहा हूँ मैं भी इश्क की किताब ! अगर बन गया वकील तो, बेवफओं की खैर नही.."
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1.7.23
अपराधों के नये नये रिकार्ड रचता उत्तर प्रदेश
केपी सिंह-
योगी सरकार के समय उत्तर प्रदेश में हैरतअंगेज आपराधिक वारदातों के नये नये रिकार्ड रचे जा रहे हैं। कभी जेल के अन्दर माफिया को गोलियों से भून दिया जाता हैं तो कभी पुलिस हिरासत में माफिया भाई मीडिया के कैमरों के सामने फायरिंग की अंधाधुंध बौछार करके ढ़ेर कर दिये जाते हैं तो कोर्ट रूम में घुसकर जज के सामने माफिया को शूट कर दिया जाता हैं। एक ओर यह दावा किया जा रहा है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था इतनी मजबूत की जा चुकी है कि बड़े बड़े अपराधी अपनी जान की खैर मांगते हुये बाहरी राज्यों में भाग निकलें हैं या उन्हें बाहर रहने में डर लग रहा है जिसकी वजह से वे खुद थाने पहुंच कर पुलिस से अपने को जेल भेजने की भींक मांग रहे हैं। दूसरी ओर इन वारदातों की मिसाल है जो यह जाहिर करती है कि प्रदेश में कहीं भी, कोई भी सुरक्षित नहीं बचा है। अभैद्य सुरक्षा के रहते हुये भी शूटर कहीं भी प्रकट हो सकते है और कुछ भी कर सकते हैं। शूटर भी ऐसे जो नादान उम्र के हैं और जिनको वे टारगेट कर देते हैं उनसे अदावत का कोई कारण भी किसी को पता नहीं होता लेकिन उनकी प्लानिंग और तैयारी प्रशिक्षित आतंकियों से भी ज्यादा कमाल की रहती है। प्रयागराज में अतीक और अशरफ जैसे दुर्दान्त अपराधियों को मौत के घाट उतारने वाले नौजवानों के पीछे किसका मास्टर माइंड था और ऐसे कई सवालों को लेकर रहस्य बना हुआ है लेकिन यह भी रहस्य है कि अब उन सवालों की चर्चा न पुलिस के तीरंदाज कर रहे है न मीडिया के लाल बुझक्कड़। इसमें कौन सा आका है जिसका हुकुम बजाने के लिये उनको चुप्पी साधनी पड़ गयी है।
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चौबीस लाख की गाड़ी में भी सुरक्षा तकनीक भगवान भरोसे ही है !
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अमर उजाला : नम्बर एक या फ्रेश रद्दी
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद मंडल में खुद को नम्बर एक अखबार कहने वाले अमर उजाला की हालत खराब हो गई है। रिपोर्टर के माध्यम से दवाब बनाकर प्रसार बढ़ाने की कोशिश में एजेंटों पर अखबार जबरन रद्दी कराया जा रहा है। रामपुर जिले की मिलक तहसील के एक अखबार विक्रेता ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट व स्टोरी साझा की है, जिसमें अमर उजाला अखबार के बंडल का फोटो डालकर लिखा है कि किसी को अमर उजाला की फ्रेश रद्दी चाहिए तो सम्पर्क करें। विक्रेता ने अपना नाम और मोबाइल नम्बर भी दिया है।
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30.6.23
अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में काॅलेजों के एडमिशन में अश्वेतों को आरक्षण को गैरकानूनी बता दिया है। भारत में भी एक प्रभावशाली मुखर वर्ग आरक्षण के प्रावधानों के खिलाफ लंबे समय से मोर्चा खोले हुये है जिसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुत उत्साहित करेगा।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में 9 सदस्यीय पीठ द्वारा बहुमत से दिये गये इस फैसले में कहा गया है कि भले ही एक समय अश्वेत छात्रों को काॅलेज में एडमिशन के लिये न्यायपूर्ण रहा हो लेकिन अब इसे जारी रखने की तुक नहीं है। भेदभाव समाप्त करने के नाम पर लागू की गयी इस व्यवस्था में खुद ही भेदभाव के तत्व हैं क्योंकि इसमें यह देखना पड़ता है कि एडमिशन लेने वाला छात्र किस नस्ल का है - श्वेत या अश्वेत। जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट का अभिमत यह रहा कि आरक्षण की परिधि में श्वेत छात्र का प्रवेश विचारणीय नहीं होता जो उसके साथ अन्याय का द्योतक है।
अमेरिका में विशेष अवसर के सिद्धांत को सकारात्मक कार्रवाई का नाम दिया गया था ताकि पहले नस्लीय भेदभाव के कारण अश्वेत हर अवसर में दरकिनार कर दिये जाते थे जिससे काॅलेजों, प्रशासन, प्राइवेट नौकरियों आदि में एक ही पक्ष को स्थान मिल पाता था उसमें एकरूपता आ सके। मतलब यह है कि इसके पीछे कोई नकारात्मक भावना न होकर समाज में विविधता को संजोने की सकारात्मक ललक निहित रही। यह टर्म बेहद सदभावपूर्ण था और अभी तक इस पर अमल जारी था। पूर्व रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाॅल्ड ट्रम्प ने अपने अनुदारवादी रूझान के तहत कई फैसले किये जिनमें से एक में उन्होंने अमरीकी सुप्रीम कोर्ट मे 3 जड़वादी न्यायाधीशों की नियुक्ति कर दी। इसका प्रभाव यह हुआ कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से ऐसे फैसले आने शुरू हो गये जो उसकी प्रगतिशील दिशा को पलटने वाले थे। काॅलेजों के एडमिशन में आरक्षण को समाप्त करने वाली बैंच में भी 6 अनुदार जज शामिल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर वहां बटी हुयी प्रतिक्रिया सामने आयी है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाॅल्ड ट्रम्प ने जहां इसका स्वागत किया है वहीं वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस पर असहमति जताई है।
लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्थानीय प्रभाव तक सीमित नहीं है। समूचा विश्व समाज इससे आंदोलित होने वाला है। भारत में लोग यह समझते है कि आरक्षण के प्रावधान सिर्फ उनके यहां लाद दिये गये हैं जबकि अन्य देश इससे मुक्त हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। जब मानवता के पैमाने पर समूचे विश्व समाज को तौले जाने की प्रवृत्ति जाग्रत हुयी तो ग्लोबल आॅर्डर इसी अनुरूप व्यवस्थित हुआ। नस्ल, जाति, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर वंचित बनाये गये वर्गों के साथ न्याय के लिये विशेष अवसर के सिद्धांत का प्रवर्तन हुआ जिसके तहत कई देशों में भेदभाव के शिकार वर्गों के लिये आरक्षण का प्रावधान किया गया। भारत में वर्ण व्यवस्था के दुराग्रह सर्वाधिक कठोर थे इसलिये आजादी की लड़ाई के समय प्रबल हुयी नैतिक चेतना के चलते समाज के अगुआ वर्ग में भेदभाव से पीड़ितों के प्रति सहानुभूति का भाव उमड़ा और इन वर्गों द्वारा अपने अधिकारों के लिये किये जा रहे आंदोलनों के प्रति उन्होंने सकारात्मक दृष्टिकोंण अपनाया। जाहिर है कि यहां अफरमेटिव एक्शन अमेरिका की तरह सृजित न होकर स्वतः स्फूर्त था। यह अजीब विरोधाभास है कि भारत में रेनेेसां का उभार गुलामी के दौर के समय देखने में आया जबकि स्वदेशी शासन में उत्तरोत्तर पुनरूत्थान के भाव जोर मारने लगे। वैसे यह भी एक सच है कि आज सारी दुनिया रूढ़िवाद की लहर का सामना कर रही है। अमेरिका में डोनाॅल्ड ट्रम्प इसी के प्रतिबिम्ब थे। भारत में भी यह प्रवृत्ति आज चरमोत्कर्ष पर है।
2014 के बाद से ही भारत में वर्ण व्यवस्था की पैरवी का दौर शुरू हो गया था। जिसके तहत वंचितों को अपमान का पात्र ठहराये जाने को जायज माना जाने लगा था। भाजपा मुख्य धारा की पार्टी है इसलिये उसके सामने इसके कारण असमंजस की स्थिति बन गयी थी। जो तत्व उसकी वर्ग सत्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे भाजपा उनके खिलाफ भी नहीं जा सकती थी लेकिन दूसरी ओर खुलेआम हठधर्मियों के साथ भी खड़ी नहीं हो सकती थी। उसे एकतरफा माहौल बनने तक सब्र करने की जरूरत का एहसास था। इसलिये उसने पहले आरक्षण को खत्म करने वालों के दबाव के प्रतिकार का आभास कराया लेकिन व्यवहारिक स्तर पर वह उनके अनुकूल कार्य करती रही। लेटरल इंट्री जैसी व्यवस्थाओं से उसने आरक्षण को निष्प्रभावी करने के लिये चोर दरवाजा खोला। कई विभागों में भर्तियों में आरक्षण को चकमा दे दिया। इस बीच उसके समर्थक संत धर्मभीरूता के एहसास को गहराते रहे। उन्होंने वंचितों में यह भावना भरने की कुशलता दिखायी कि अच्छे अवसरों से वंचित रहना उनके लिये ईश्वरीय नियति है। नोबल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन ने प्रतिपादित किया था कि शोषण के चक्र के पुराने होने के साथ शोषित वर्ग यह अनुभव करने के लिये विवश हो जाता है कि उत्पीड़न और भेदभाव को सहना ही उसका जीवन है। उसके अंदर इसके प्रतिरोध तक की इच्छाशक्ति समाप्त हो जाती है, विद्रोह तो बहुत दूर की बात है। आज स्थिति कुछ इसी तरह की है।
आरक्षण विरोधी तबके ने 2014 के शुरूआती वर्ष में जो तेवर दिखाये थे रणनीति के तहत उसने इसे बदल दिया था। उसे विश्वास हो गया था कि सत्ता में बैठे उसके चंद्रगुप्त आरक्षण को ठिकाने लगाने के अपने कर्तव्य को निश्चित रूप से अंजाम तक पहुंचायेंगे। आरक्षण की व्यवस्था एक प्रतीक है जो स्थापित करती है कि देश के बहुसंख्यक वर्ग को लंबे समय तक अन्याय का शिकार बनाया गया वरना वंचितों के पास भी योग्यता और पुरूषार्थ कम नहीं है। विशेष अवसर के सिद्धांत से इसको प्रस्फुटित किया जा रहा है जिससे देश की पूरी आबादी की क्षमताओं का लाभ उसे मिलेगा और यह देश के लिये अत्यंत फायदेमंद होगा। इस स्थिति के तार्किक परिणति पर पहुंचने के पहले आरक्षण की प्रतिबद्धता से मुकरने का मतलब वर्ण व्यवस्था के औचित्य को सिद्ध करना है और यही होने का अवसर आ गया है।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद विशेष अवसर के प्रावधानों को वापस लिये जाने की पूरी उम्मीद वर्ण व्यवस्था की समर्थक ताकतों की थी और तब तक वे सब्र करने के लिये अपने को मानसिक रूप से तैयार किये हुये थे लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उन्हें जैसे नया हांैसला दे डाला है। वैसे तो पूरे विश्व में इसका प्रभाव पड़ने की संभावना जतायी जा रही है लेकिन भारत में तो निर्णायक बदलाव का जोश ठाठें मार सकता है। हालांकि लोकसभा चुनाव के पहले तक सरकार के सामने इधर कुंआ उधर खाई की स्थिति बन सकती है क्योंकि वह न तो आरक्षण समर्थकों को नाराज करने का जोखिम मोल ले सकती है और न ही आरक्षण समर्थकों से एक सीमा से आगे दुराव कर सकती है। आखिर बहुसंख्यक जनता तो वंचित वर्ग से है। यह दूसरी बात है कि बहुसंख्यक होते हुये भी इस वर्ग में पर्याप्त चेतना नहीं है, धर्मभीरूता सर्वाधिक है और दूसरे वह दूसरे वर्ग का जितना मुखर भी न होने से बहुत प्रभावी नहीं है। सामाजिक न्याय के आंदोलनों की धार भी इस बीच बहुत भौथरी हो चुकी है।
वैसे सरकार और जिस वर्ग सत्ता पर वह टिकी है दोनों ही बहुत हुनरमंद हैं। आंखों से अंजन चुरा ले जाने में उन्हें महारथ हांसिल है इसलिये 2024 तक आपदामोचन का कोई प्रबंध वे कर लें तो आश्चर्य न होगा। लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ध्वनि इतनी असरदार है कि भारत में जल्द ही इसके तख्तापलट जैसे परिणाम घटित होंगे।
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इमरजेंसी की ज्यादतियों का सच और वर्तमान दौर
केपी सिंह-
भारतीय राजनीति में वर्तमान दौर गड़े मुर्दों के विमर्श का दौर है। इसी रिवाज के कारण इमरजेंसी की दफन हो चुकी चर्चा फिर सतह पर ला दी गयी है। जबकि आज की नयी पीढ़ी को इमरजेंसी में कोई रूचि नहीं होनी चाहिये थी। उसने न इमरजेंसी को देखा है न भोगा है। उसने जब होश संभाला था तब के बहुत पहले इमरजेंसी की चर्चा बंद हो चुकी थी। पर 2014 के बाद इमरजेंसी का प्रेत एकदम से जिंदा किया गया। इसकी चर्चा से आज कई मतलब साधे जा रहे हैं। कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व को भी इमरजेंसी का बहुत अनुभव नहीं है लेकिन फिर भी उसे इस चर्चा से अपराध बोध में धकेलने में सहूलियत देखी गयी है। दूसरे वर्तमान सत्ता पर लोकतंत्र को कुचलने का जो आरोप तीव्रता से उछाला जाता है उसकी भी काट इमरजेंसी का मुद्दा कर देता है।
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Assamese newspaper trolled for using fake photograph
Guwahati: A city-based acclaimed Assamese newspaper has been trolled
in social media for using a fake photograph to narrate the horrible
story of Manipur in the front page of 19 June 2023 issue. The social
media users slammed the editor of Amar Asom for using a photograph,
which has been lifted from Myanmar’s influential Mizzima newspaper,
with a completely different content.
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किसके इशारों पर फ़िल्म निर्माता हमारे प्रभु श्री राम और भगवान हनुमान की छवि को बिगाड़ने में लगे हैं ?
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प्रतिदिन एक करोड़ रुपये से अधिक की रेती तस्करी
छत्तीसगढ़ राज्य में बीजापुर ज़िले के अंतिम छोड़ में मौजूद है तारलागुड़ा गाँव , जो की तेलंगाना राज्य के सीमा से लगता है । हमारी टीम को खबर मिली थी की , तारलागुड़ा गाँव से लगे गोदावरी नदी पर रेत तस्करों की बुरी नजर लग चुकी है । जहां से प्रति दिन सैकडो ट्रक अवैध रेत उत्खनन हों रहा है । रेत माफियायो ने शासन - प्रशासन को अपनी मुट्ठी में कर , प्रतिदिन गोदावरी नदी के घाट लाखों टन रेत उत्खनन कर पड़ोसी राज्य तेलंगाना भेजा जा रहा है ।
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ये है बस्ती का शशि शेखर, गिरा दिया एक और ब्यूरो चीफ का विकेट
हिन्दुस्तान अखबार के गोरखपुर यूनिट अंतर्गत बस्ती जिला भी आता है। जागरण, उजाला, सहारा समेत अन्य प्रमुख अखबारों ने दशकों से यहां अपना ब्यूरो कार्यालय खोल रखा है। हिन्दुस्तान ने भी अपना ब्यूरो कार्यालय जिला मुख्यायल पर गांधीनगर पक्के बाजार पर अरबन कोआपरेटिव बैंक बिल्डिंग में खोल रखा है। इस जिले और ब्यूरो कार्यालय का इतिहास जितना पुराना है उतना ही रोचक यहां तैनात होने वाले ब्यूरो चीफ साहबों का कार्यकाल भी रहा है। कहने को तो यहां गोरखपुर यूनिट के सम्पादक महोदय की कृपा से अनुभव और कार्य में ज्यादा तर्जुबा रखने वाले रिपोर्टर को तैनात किया जाता है लेकिन इस कार्यालय में तैनात एक अदना सा स्ट्रिंगर/ संवाददाता सुरेंद्र पांडेय इतना ‘ताकतवर’ है कि लोग उससे पनाह मांगते हैं। मजाल है कि कोई उसके सामने पनप पाए या उसका विरोध कर टिक पाए। साम, दाम और दंड भेद का ऐसा मर्मज्ञ कि पूर्व में कार्यरत रहे ब्यूरो चीफ मारे दहशत के सुरेंद्र पांडेय को बस्ती ब्यूरो का शशि शेखर कहते हैं। अभी हाल ही में उसने यहां तैनात रहे एक और ब्यूरो चीफ का विकेट गिराकर अपनी यह पदवी/ नाम चरितार्थ कर दिया है।
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Stop Manipur Violence Say NAJ, DUJ
The National Alliance of Journalists (NAJ) and the Delhi Union of Journalists (DUJ) in a joint statement today condemned the ongoing violence in Manipur including attacks on journalists covering the violence. We call for an immediate cessation of violence by armed groups belonging to all sides.
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बढ़ती बेरोजगारी भारत के लिए नई चुनौती
-डॉ. अशोक कुमार गदिया
विश्व पटल पर नजर दौड़ाएं तो पायेंगे कि भारत विश्व का सबसे युवा देश है। भारत की कुल आबादी लगभग 140 करोड़ है। इसमें लगभग 80 करोड़ युवा हैं। जबकि भारत की जनसंख्या ढाई प्रतिशत की दर से हर साल बढ़ रही है और रोजगार की व्यवस्था लगभग शून्य है। आज भारत सरकार, भारतीय समाज एवं भारतीय परिवार के लिये सबसे बड़ी चुनौती अपने देश के युवाओं को ठीक से पढ़ा-लिखाकर अच्छा प्रशिक्षण देकर उसे रोजगार के काबिल बनाना है। हमारा प्रत्येक युवा ठीक से रोजगार से जुड़ा हो, उद्यमी हो या पेशेवर हो या व्यापारी हो। हर युवा भारत की मुख्यधारा का हिस्सा हो और हमारी सकल आय में थोड़ा या ज्यादा योगदान देता हुआ दिखे, यह हम सब लोगोें का सपना है। फिर वह देश में काम करे या विदेश में काम करे इससे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। इसी स्वप्न के पूरे होने पर ही हम विश्व की सबसे बड़़ी अर्थ व्यवस्था बन सकते हैं और हम विश्वगुरु बनने का लक्ष्य भी पुनः प्राप्त कर सकते हैं। इस स्वप्न को पूरा करने के लिये हमें सबसे पहले अपना ईमानदारी से आंकलन करना होगा।
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ईसाई मशीनरी का प्रार्थना सभा बना मौत का अड्डा, इलाज कराने आए वृद्ध की मौत
----गंभीर बीमारी का इलाज करने के नाम पर किया जाता है धर्म परिवर्तन का खेल
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28.6.23
पब्लिक ऐप में रिपोर्टरो का जमकर शोषण
पब्लिक ऐप में रिपोर्टरो का जमकर शोषण किया जा रहा है और धमका कर काम कराया जा रहा है और इतना ही नही जुर्माना भी रोज लगाया जाता है जिसमे रिपोर्टर के काम की धनराशि से 50 से लेकर 200 रुपये तक काट लिए जाते है। इसके लिए बाकायदा धमकी भरा मैसेज भी ग्रुप में दिया जाता है । पब्लिक ऐप में काम करने वाले रिपोर्टरों को बेइज्जत भी किया जाता है और उत्तर प्रदेश भर में काम करने वाले पत्रकारों पर जुर्माना लगाने के बाद उनकी सूची भी ग्रुप में सार्वजनिक की जाती है कि कितना किस पर देर से खबर लगाने का जुर्माना लगाया गया, कितना खबर न लगाने पर लगाया गया ,कितना दूसरे तहसील की खबर पर लगाया गया है और जब चेतावनी दी जाती है तो भी स्पष्ट धमकी दी जाती है कि कारण स्पष्ट करो नही तो आई डी बन्द कर दी जाएगी या तो आप पर जुर्माना लगा दिया जाएगा।
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रिपब्लिक के एंकर पर 10 हजार रुपए का जुर्माना
अश्लील वीडियो बनाकर प्रसारित करने के मामले में 8 में से 7 पत्रकार न्यायालय में हुए पेश,आरोप तय पर बहस नहीं करने को लेकर कोर्ट ने लगाया रिपब्लिक के एंकर पर 10 हजार रुपए का जुर्माना
नाबालिका के वीडियो को अश्लील बनाकर प्रसारित करने के मामले में गत 31 मई को गुरुग्राम के पॉक्सो की अदालत में सुनवाई हुई,जिसमे 8 में से 7 आरोपी चित्रा त्रिपाठी,अजीत अंजुम, रिपब्लिक भारत के एंकर सैयद सोहेल,ललित सिंह, अभिनव राज,सुनील दत, राशिद सभी पेश हुए। न्यायालय की कार्यवाही में आरोप तय पर बहस जारी है। चित्रा त्रिपाठी, राशिद, अभिनव राज,अजीत अंजुम के वकीलों ने गत 18 अप्रैल को ही दलील पूरी कर ली है,बचे चार आरोपियों (दीपक चौरसिया, सैयद सोहेल,सुनील दत,ललित बडगुर्जर) के विरुद्ध आरोप तय पर बहस होनी थी। जानकारी के मुताबिक पिछली तीन तारीख से केस स्टडी नही करने का कारण बताकर बहस हेतु समय की मांग की जा चुकी है।
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लोकसभा चुनाव के लिये बिछने लगी बिसात, क्या खरगे बनेंगे विपक्ष की ट्रंप
केपी सिंह-
लोकसभा
चुनाव वैसे तो अगले वर्ष होने हैं लेकिन राजनैतिक माहौल अभी से गर्माने
लगा है। इसी बीच बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यू के नेता नीतिश कुमार
ने कहा है कि चुनाव के लिये अगले वर्ष के इंतजार में बैठना ठीक नहीं है
क्योंकि चुनाव का ऐलान कभी भी हो सकता है। कुछ और लोग भी लोकसभा चुनाव इसी
वर्ष संपन्न करा लिये जाने की अटकलें व्यक्त कर रहे हैं लेकिन अभी रामजन्म
भूमि मंदिर का उद्घाटन होना है जो अगले वर्ष जनवरी में प्रस्तावित है। इसके
पहले तो चुनाव होने से रहा। उधर भाजपा के एजेंडे में शामिल रहे समान
नागरिक संहिता को लागू करने के मसले पर एकाएक सरकार में तेजी आयी है और
उसका यह उतावलापन जाहिर करता है कि भले ही चुनाव इस वर्ष न हों लेकिन
रामजन्म भूमि मंदिर के लोकार्पण के बाद तत्काल निर्धारित समय से पहले चुनाव
करा लेने की तैयारी कहीं न कहीं सरकार की ओर से है। ऐसा मानने वाले
राजनैतिक प्रेक्षकों की धारणा यह है कि मोदी का करिश्मा फीका हो चला है
इसलिये केन्द्र सशंकित है इसलिये समान नागरिक संहिता लागू करने के साथ
रामजन्म भूमि मंदिर का उद्घाटन होते ही फिर उसके लिये मुफीद माहौल बनेगा
जिसमें देरी न करके समय से पहले फरवरी मार्च में ही चुनाव करा लेने का
फैंसला लिया जा सकता है। प्रतिपक्षी दल सरकार के इस संभावित पैतरे को लेकर
सतर्क रूख अपना रहे हैं इसलिये उन्होंने किसी भी समय चुनावी युद्ध में
कूंदने की मानसिकता बना ली है और इसके लिये अपनी रणनीति तय कर डाली है भले
ही इसका खुलासा न किया जा रहा हो।
भाजपा को शिकस्त देने के लिये
प्रतिपक्ष के सोचने की जो पहली बात है वह भाजपा विरोधी मतों को बंटने न
देने या एकजुट करने की है इसके लिये सारे प्रतिपक्षी दलों का एक बड़ा मोर्चा
बनाने की जो बात है वह बहुत आसान नहीं है। कांग्रेस ने जब से कर्नाटक
विधानसभा का चुनाव मैदान जीता है तब से विपक्षी कुनबे में उसकी स्थिति
मजबूत हुयी है। जदयू, राजद और द्रमुक जैसे दल तो पहले से ही नेतृत्व उसको
सौंपने के लिये सहमत थे लेकिन ममता बनर्जी जैसे नेता भी पहले के रूख को
बदलते नजर आने लगे हैं। अखिलेश यादव को अभी भी कांग्रेस से परहेज है और वे
नीतिश की अगुवाई में मोर्चा गठित करने की ओर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे।
केसीआर की मानसिकता क्या रहेगी। स्वयं कांग्रेस नेतृत्व के सवाल पर क्या
रूख अपनायेगी यह भी अभी स्पष्ट नहीं है। पश्चिम बंगाल में मोर्चा कैसे काम
करेगा यह भी एक बड़ा सिर दर्द है। कांग्रेस, वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस
तीनों का पश्चिम बंगाल में सीटों के बटवारे को लेकर तालमेल पर मंथन एक
म्यान में तीन तलवारें डालने जैसा है। केरल को लेकर कांग्रेस और वाम मोर्चा
के बीच भी टकराव रहेगा। मोदी द्वारा प्रतिपक्षी दलों के लिये अस्तित्व का
सवाल बना दिये जाने को देखते हुये पहले उन्हें हटाने की जरूरत बड़ी होने को
तो सभी दल स्वीकार कर रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि इस खातिर अन्य बातें
भुलाने को कोई तैयार हो। खास तौर से कांग्रेस इस बात को झेल चुकी है कि
गर्दिश के समय भाजपा के अलावा प्रतिपक्षी दलों ने भी उसे आप्रासंगिक करार
देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी इसलिये वह विपक्षी कुनबे को एहसास कराना
चाहती है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प के रूप में लोग उसी का वजूद
मानते हैं और इस हकीकत को नकारना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
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yashwant
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