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20.1.08

खून से सना हुआ एक सच ........एक पत्रकार की आत्मकथा


खून से सना हुआ एक सच ........एक पत्रकार की आत्मकथा

एक पत्रकार की वो अनसुनी कहानी जिसमे मोजूद है -----सिर्फ दर्द ...................सोचिये अगर ये पत्रकार एक की बजाए हजारो हो तो ??
कैसे टूटते है सपने ......khudh apane माँ बाप के ........न्यूज़ चेनलो के सबसे घिनोनी दास्ताँ .......एक साल मे आठ हजार पत्रकार ----नौकरिया सिर्फ और सिर्फ सिफारिश वालो को ?----क्या है ये सच ?जानने के लिए जरुर देखे ------ये केसी पत्रकारिता -----आशीष
क्या आप चाहते है की मैं ये ब्लोग लिखु .
अपनी राय मुझ तक प्रेषित करे मैं आप का आभारी रहूंगा

5 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

इस विषय पर अगर आप लिखते हैं तो बपुत ही अच्छा होगा। प्रेस के पीछे क्या चल रहा है, हमें भी पता होना चाहिए।

राजीव जैन Rajeev Jain said...

bahut khub

jarur likhiye

anil said...

मेरे भाई सस्पेंस क्यों क्रिएट कर रहे हो , जल्दी से उगल दो आपका और हमारा दोनों का मन हल्का हो जाएगा .................
अनिल यादव.......

manish said...

yar man ka bojh halka karne ke vaste puchhta kya hai?
jo likhna hai fatafat likh dal.intezar mein hun.

Amit said...

bol dijiye bhai....ab bol hi dijiye...vaise to jyadatar log is tarah ke vakyat se do-char hote rahte hain. patrakarita jagat ke log is kadvi sachchai se kuchha had tak vakif bhi hain, kuchha aap bata dijiye....