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26.5.13

बैंड,बाजा,बारात और आगे?-ब्रज की दुनिया

मित्रों,इन दिनों शादी-ब्याह का मौसम पूरे शबाब पर है। हो सकता है कि इस साल अब तक आपलोग भी कई-कई बार बाराती बन चुके हों। वैसे अब बारात जाने में वो बात कहाँ रही जो 20-30 साल पहले थी। पहले जो शान बैलगाड़ी और डोली में थी अब वो मर्सिडीज में भी कहाँ। तब अहले सुबह ही बारात गाँव से निकल पड़ती थी। रास्ते में कई जगहों पर जनवासा रखा जाता था। बैलगाड़ियों और कभी-कभी हाथियों पर भी सिर्फ आदमी ही लदे-फदे नहीं होते थे बल्कि जानवरों का चारा और बारातियों के लिए कच्ची-पक्की पर्याप्त खाद्य-सामग्री भी होती थी। लंबी यात्रा की थकान को ध्यान में रखते हुए विवाहोपरांत एक दिन मर्यादा के लिए रखा जाता था। इस दिन गीत-संगीत की महफिल सजती थी। वारांगनाएँ नृत्य करती थीं और आल्हा-गायक ओजस्वी स्वरों में आल्हा गाया करते थे जिनको सुनकर खाट पर पड़े बूढ़ों की भा नसें फड़कने लगती थीं। बार-बार बारातियों पर इत्रदानगुलेपाश से इत्र और गुलाबजल की बौछारें की जातीं और बार-बार परात में पान-सुपारी पेश किए जाते। जब नर्तकी किसी पोपले वृद्ध के साथ घूंघट साझा करके मुँहमांगी रकम की जिद करके बैठ जाती तब पूरा जनवासा कहकहों से गूँज उठता। महफिल के दौरान प्रश्नोत्तर का भी सत्र चलता और अंग्रेजी में बहस भी होती। बड़े-बुजुर्ग जहाँ महफिल का आनंद लेते बच्चे हाथियों को घेरे रहते। विदाई से बाद जब हाथी जाने लगते तब बच्चे उनके पीछे-पीछे हाथी-हाथी दाम दे घोड़े को लगाम दे चिल्लाते हुए दौड़ते। कभी-कभी हाथी पलटकर उनका पीछा भी करता मगर वे कौन-से उसके हाथ आनेवाले थे तीर की तरह भाग निकलते।
                       मित्रों,बारातियों को तब आदरपूर्वक बैठाकर भोजन कराया जाता था। समधी और दुल्हे के बहनोइयों का खास ख्याल रखा जाता था। पियक्कड़ई का तो नामोनिशान तक नहीं था। अगर कोई पियक्कड़ होता भी था वो अपवाद। जबकि आज बारात में अगर कोई शराब नहीं पीनेवाला होता है तो वह अपवाद बन जाता है। बारातियों को भरपुर शरबत पिलाई जाती थी और कभी-कभी तो अत्यंत अनूठे तरीके से। किसी कुएँ में पाँच-दस बोरी चीनी डाल दी फिर पीते रहिए जितनी शरबत पीनी हो। बारात अगर नजदीक के गाँव से आती थी तब बाराती नाश्ता-पानी करके घर चले जाते और फिर माल-मवेशी को चारा-पानी देकर भोजन के समय फिर से वापस आ जाते।
                 मित्रों,अब तो बिना डोली की शादियाँ होती हैं। आज से 20-25 साल पहले बिना डोली की शादी अकल्पनीय थी। दुल्हा और दुल्हन जब अलग-अलग डोलियों में बैठकर विदा होते तब रास्ते में बच्चे काफी दूर तक दुल्हे को छेड़ते हुए उनका पीछा करते। कई बार तो नावों पर दुल्हनों के आपस में बदल जाने की घटनाएँ भी हो जाया करती थीं। लेकिन अब शादियों में वो बात रही कहाँ? बाँकी संस्कारों की तरह शादियाँ भी अब औपचारिकता मात्र रह गईं हैं। लोग गाड़ियों में लद-फदकर रात में बारात लाते हैं। रास्ते में जनवासा होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। बल्कि गाड़ियों को शराब की दुकानों पर अवश्य रोका जाता है और जमकर शराब पी जाती है। पहले जहाँ तुरतुरिया, सिम्हा और अंग्रेजी बैंड बजा करते थे अब मुआ डीजे पर बजनेवाले अश्लील गानों की धुन पर और शराब की पिनक पर लोग अजीबोगरीब नृत्य करते हैं। कई दफे तो महिलाएँ भी बाराती बनकर ऐसा करती हैं। फिर नाश्ता-पानी होता है और विदेशी कंपनियों द्वारा निर्मित कोल्ड-ड्रिंक पिलाई जाती है। फिर एक-दो घंटे के भीतर ही ताबड़तोड़ भोजन भी करा दिया जाता है। उसके बाद वर-पक्ष के 5-10 लोगों को छोड़कर बाँकी बाराती रात में ही गाड़ियाँ खुलवाकर घर चले आते हैं। बाँकी लोगों को भी सुबह होते ही वधू के साथ विदा कर दिया जाता है। एक दिन की मर्यादा और महफिल का तो सवाल ही नहीं।
                    मित्रों,अगर टेबुल-कुर्सी पर बिठाकर बारातियों को ससम्मान भोजन कराया गया तो ठीक नहीं तो बुफे सिस्टम में कुत्तों की तरह छीना-झपटी करते हुए खड़े-खड़े भोजन करना पड़ता है। कई बार तो इस धींगामुश्ती में परमादरणीय बुजूर्ग भूखे भी रह जाते हैं। लड़की वाले शांतिप्रिय रहे तो ठीक नहीं तो पियक्कड़ई के चलते गाली-गलौज और मारपीट की आशंका लगातार बनी रहती है। विवाह के किसी भी चरण में,विधि में कहीं भी भाव नहीं,आस्था नहीं,प्रेम नहीं,सबकुछ महज औपचारिकता।
                       मित्रों, जहाँ पहले जहाँ शादी से पहले वर-वधू के मिलने-जुलने और बातचीत करने को बुरा माना जाता था अब मोबाईल और कंप्यूटर के चलते ऐसी कोई रूकावट नहीं रह गई है। शादी के पहले अगर मंगनी हो गई हो तब तो वे साथ-साथ मौज-मस्ती और सैर सपोटे भी कर सकते हैं। वैसे जिस कुमार्ग पर हमारा समाज अग्रसर हो चुका है और जिस तरह कामुकता का जोर बढ़ रहा है,जिस तरह लिव ईन रिलेशनशिप का प्रचलन बढ़ रहा है मुझे तो इस बात का भी डर सता रहा है कि भविष्य में शादी नाम की यह औपचारिकता भी कहीं इतिहास के पन्नों में सिमट कर न रह जाए अथवा आपवादिक घटना न बन जाए। तब न तो कोई मैरेज एनिवरसरी ही मनाएगा,अखबारों में वर-वधू चाहिए का विज्ञापन नहीं दिखेगा,शादी डॉट कॉम जैसी वेबसाईटों के दफ्तरों पर ताले लटक जाएंगे और बैंडवालों,डीजेवालों,डोलीवालों,कैटरिनवालों के साथ-साथ शादी का लड्डू,चट मंगनी पट ब्याह,हड़बड़ी की शादी कनपटी में सिंदूर,कानी की शादी में 9-9 गो बखरा,हँसुआ के लगन आ खुरपी के बियाह जैसी अनगिनत कहावतें भी बेरोजगार हो जाएंगी।

1 comment:

Dr. O.P.Verma said...

आप सही कह रहे हैं। इसमे आजकल की फिल्में आग में घी का काम कर रही हैं। और इसका विरोध होना चाहिये।