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14.1.12

दिल्ली....


-  अतुल कुशवाह 
मैनें जब भी देखा है 
एक छोटे बच्चे के तबस्सुम की तरह
पुरानी चीजों को विदा कर दिया तूने,
तू पुरानी से नई हो गई
दरख्तों के जंगल जला दिए
इमारतों का हिसार खड़ा करके
चारो तरफ बेशुमार चेहरे
तुझमें आने को, तुझसे जाने को
यहाँ एक-दो नहीं हजार मोहरे
अब रह ही क्या गया है
इन ऊंची इमारतों के शिवा
जंगलों की कब्र में दफ़न
हैं ताजी खुशफरास हवा..
और बचा ही क्या है अब इसके शिवा....
पता चले तो बताना..कि
कहाँ है इस शहर में उन पुरानी 
बहारों का आशियाना...

9.12.11

खामोशियां आकाश से बरसती हैं

  यहां हर रात उजाले से विदा लेती है,
हर इक राह मुसाफिर से जुदा होती है।
सुबह से शाम तक तनहाइयों का मेला है,
कहीं खामोशियां आकाश से बरसती हैं।।- अतुल

कामयाब आदमी

 वो गाली खा के मुस्कुराता है
हर जिल्लत को भूल जाता है
हर एक की हां में हां मिलाता है
उसे कामयाबी का रास्ता मिल गया है
वो बहुत जल्द
दूसरों को सताने के काबिल हो जाएगा।।
सच्चाई
वो किसी एक मर्द के साथ
ज्यादा दिन नहीं रह सकती
ये उसकी कमजोरी नहीं
सच्चाई है
लेकिन जितने दिन वो जिसके साथ रहती है
उसके साथ बेवफाई नहीं करती
उसे लोग भले ही कुछ कहें
मगर!!
किसी एक घर में
जिंदगीभर झूठ बोलने से
अलग-अलग मकानों में सच्चाइयां बिखेरना
ज्यादा बेहतर है।

30.10.11

मौजों की रवानी है इस फुरसत के शहर में..

- अतुल कुशवाह  
सन्देश बनके आया हूँ मैं ख़त के शहर में,
रहता हूँ आजकल मैं मोहब्बत के शहर में.

फूलों से जो निकली है वो खुशबू भी साथ है,
हूँ सादगी के साथ अदावत के शहर में.

हैं लोग सब अपने यहाँ कोई न पराया.
रहता है बनके सुख यहाँ दुःख-दर्द का साया,

हो यकीं गर ना तो खुद आकर के देख लो,
मौजों की रवानी है इस फुरसत के शहर में...

26.10.11

समझ ये क्यूँ नहीं आती..


दीपावली के मौके पर गजल के चाहने वालों को एक गजल बतौर तोहफा भेंट कर रहा हूँ....पसंद आये तो जरूर बताइयेगा...दीवाली की शुभ कामनाएं..

है क्यूँ खामोश दरिया ये जो कल तक शोर करता था,
उदासी झील की शायद इसे देखी नहीं जाती.

तेरी खामोशियों के लफ्ज जब कानों में पड़ते हैं.
ये सांसें रोक लूं पर धडकनें रोकी नहीं जातीं.

अँधेरी रात से मिलना उजाले की भी ख्वाहिश है,
मगर किस्मत यहाँ ऐसी कभी शय ही नहीं लाती.

तमन्ना रह गई हर बार उसके पास जाने की,
कभी हम खुद नहीं जाते कभी वो ही नहीं आती.

मेरा जब नाम उसके लब को छूता है तो मत पूछो,
धडकता है ये दिल कब तक मुझे गिनती नहीं आती.

मोहब्बत में 'अतुल' तेरा यही अंजाम होना था,
वफ़ा मिलती नहीं सबको समझ ये क्यूँ नहीं आती..
                           - अतुल कुशवाह 

29.9.11

जो मैंने की इबादत डूबकर उनकी तो हंगामा

अतुल कुशवाह-
मैं पाता हूँ तो हंगामा, मैं खोता हूँ तो हंगामा, 
किसी की वेबफाई में मैं रोता हूँ तो हंगामा

मैं आता हूँ तो हंगामा, मैं जाता हूँ तो हंगामा,
किसी को देख एक पल मुस्कुराता हूँ तो हंगामा.
.
यही तो एक दुनिया है, ख़्यालों की या ख़्वाबों की, 
मोहब्बत में उन्हें पाने कि कोशिश की तो हंगामा

सभी तालीम देते थे मोहब्बत ही इबादत है, 
जो मैंने की इबादत डूबकर उनकी तो हंगामा.
                                                       

18.9.11

अपनी तो लकड़ी की टाल है साहिब..

विशेष टिप्पणी-                  अतुल कुशवाह   
इस बार पहले दिल्ली को दहलाया, और अब आगरा के जय अस्पताल में विस्फोट. मकसद वाही, बेगुनाहों की मौत, मागी किसलिए, पता नहीं. आतंक का एक और तमाचा.हम फिर गाल सहलाते रह गए. दिल्ली ब्लास्ट. दो संगठनों ने ली जिम्मेदारी.मगर देखिये. जाँच एजेंसियां खाली हाथ. प्रधानमंत्री ने कहा.अख़बारों ने छापा. आतंक से निपटा जायेगा.हमला निंदनीय है. पक्ष-विपक्ष के बयान. पब्लिक का हंगामा.बेअसर सत्ता. पीड़ितों के गुस्से की आग पर मुआवजे की सहानुभूति का पानी. लेकिन नहीं. जरा सोचिये. क्या यह अंतिम धमाका है. नहीं. तो फिर अगला ब्लास्ट किस शहर में.? पता नहीं. लेकिन वो शहर देश में ही होगा. लोग मरेंगे. नेता बयान देंगे. ख़ुफ़िया तंत्र चूकेगा. मीडिया छापेगा. कहाँ हुई चूक. जाँच होगी. जाँच चलेगी. चलती रहेगी. मगर इस बीच. दोषियों पर ठोस कार्रवाई के बयान भी उड़ेंगे. खुद सोचिये. लोकतंत्र निशाना, जनतंत्र की हत्या. मगर आतंक के आगे सत्ता नपुंसक . २६-११ तो फिर लौटेगा. जख्म हरे और दर्द ताजा करने. कहीं ऐसा न हो. की नए जख्म और दे जाये. तो संभलो. योद्धा बनो. सियासत पर भरोसा मत करो. क्योंकि. हर धमाके के बाद सियासत जंग लगे तर्कों के खोल में घुस जाती है. काला हो चुका चेहरा छिपाने. बेशर्म सरकार. भयानक भ्रष्टाचार. बस यहीं तक सीमित इसका आकार. अफजल जिन्दा है. कसब भी. सजा हो गई. फिर भी क्या हुआ. किस बात का इंतज़ार. अब नए की तलाश. क्यों. पकड़ भी लिया तो फिर. क्या कर पाओगे. जाँच कर रहे हैं, मगर किसलिए. ? उठो. जागो. देखो. समझो. जांबाज योद्धाओं. तुम ही करोगे.तुम ही बढ़ोगे.और जब तुम ही तलाशोगे. इसका हल. तभी बचेंगी, बेगुनाह, मासूम, और लाचार जिंदगियां. जो हो रही हैं. आतंक की शिकार. अन्यथा. सियासत में महफूज रहना भ्रम है...क्योंकि. सियासत तो यही चाहती है....
लोग मरते रहें तो अच्छा है,
अपनी तो लकड़ी की टाल है साहिब..

8.9.11

मोहब्बत से रिटायर हूँ

मैं ग़ालिब के ज़माने का अदद सा एक शायर हूँ.
प्रेम के गीत लिखता हूँ मोहब्बत से रिटायर हूँ.. - अतुल कुशवाह

20.8.11

SPIRITS SOARED AT THE LAUNCH OF O GOD SAARE HAI FRAUD

- Atul Kushwah


It was indeed a fantastic evening which saw a wonderful turnout of celebrities. The lead pair of Shreyas Talpade and Mugda Ghodse, looked every inch ravishing while Johny Lever and Sharat Saxena lent a lot of spice to the glittering evening, like only they could. Incidentally, it is after a long gap of 50 years that a Maharashtrian pair has been teamed in a Hindi film in the romantic lead. In the presence  of  Ajay Nath Sahadeo, Mayor of Ranchi and S.K. Sinha, The Superintendent of Police, Jharkand, all the four actors performed in front of the camera for the mahurat shot of the film O God Saare Hai Fraud and regaled every one with their own inimitable brand of satirical comment on the political situation today. The veteran producer Pahalaj Nihalani was the chief guest of the evening, who blessed the producers. Dolly Bindra arrived late at the venue with her brother in tow, wearing a bandana and looking like a yogini.

Also present at the function were the stand up comedy artiste Navin Prabhakar, Yogesh Lakhani, Mamta Sharma ( of the song Muni Badnaam Huwi fame), Kunal Ganjawala and Manish Raisinghani, besides Udit Narayan and Divya Dutta, who had come with her mother. Director Ashu Trikha explained that his film is not just a comedy and the seriousness can be gauged with whatever is happening in and around us in society today. Mugda, who had to catch a flight to Vaishnodevi left the venue earlier after obliging all the snap shooters, while Johny and Shreyas shared their thoughts about how the film was different and meaningful, yet an out and out commercial entertainer which has not been seen till date on the Indian screen. The spirits soared higher and higher as the exciting evening carried on well beyond midnight.

21.7.11

सिनेमा के ये नए शिल्पकार


 यह दौर विद्रोही निर्देशकों का है, जो कम बजट में समाज की सच्चाइयों से रू-ब-रू कराने वाली साफ सुथरी छोटी फिल्में बनाकर साबित कर चुके हैं कि सिनेमा मनोरंजन का माध्यम मात्र नहीं बल्कि इससे आगे भी कुछ है। ये वे निर्देशक हैं जिन्हें सिने जगत कभी सनकी कहकर पुकारता था लेकिन आज बॉलीवुड इनकी सनक का कायल है। 


इतने दिन भी नहीं बीते कि याद दिलाने पर भी याद न आएं। पच्चीस-तीस बरस पहले का यथार्थ है। हिंदी में मुख्यधारा के सिनेमा की पत्रकारिता करने वालों को तीसरे दर्जे का नागरिक माना जाता था। किसी बडे प्रकाशन गृह से उनके जीते जी कोई किताब छप जाए, यह तो असंभव ही था। क्योंकि तब हिंदी के प्रकाशक भी उच्चस्तरीयता  के दंभ में रहते थे। जो इस प्रतिकूल परिदृश्य में जिद की तरह तने थे। उन्हें अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए या तो विदेशी सिनेमा का आधार लेना पडता था या दौर के तथाकथित बौद्धिक सिनेमा का। 
इसे बाजार का खुलापन कहें या दबाव, हिंदी का व्यावसायिक सिनेमा क्षितिज पर इस कदर हावी हुआ कि व्यावसायिक सिनेमा की पत्रकारिता मीडिया के लिए अनिवार्य बन गई है। इस पत्रकारिता के जानकार भी सहसा ग्लैमर और वैभव की गर्म सुखद धूप के हिस्सेदार बन बैठे और इसी के साथ आरंभ हुआ उनकी सिने पुस्तकों का प्रतिष्ठित हिंदी प्रकाशकों द्वारा नियमित  प्रकाशन। पिछले कुछ वर्षों में नए पुराने अनेक फिल्म पत्रकारों का बाजार में आना इसका प्रमाण है। 
व्यावसायिक सिनेमा पर नजर रखने वाले और उस पर कलम चलाने वाले प्रहलाद अग्रवाल मध्य प्रदेश के सतना जैसे छोटे शहर में सक्रिय रहकर भी जब तक अपनी उपस्थिति कराते रहते हैं। इसके बावजूद कि वह किसी राष्ट्रीय दैनिक की फिल्म पत्रकारिता से बावस्ता नहीं हैं। हाल ही में हिंदी के प्रसिद्ध राजकमल प्रकाशन से उनकी पुस्तक छपी है ‘बाजार के बाजीगर’। अनेक सीमाओं के बावजूद इस पुस्तक का स्वागत इसलिए होना चाहिए क्योंकि यह सिनेमा के नए शिल्पकारों और उनके काम को आत्मीय अंदाज में एक साथ प्रस्तुत करती है। यह बताती है क्यों यह नए लोग अपने पूर्ववती लोगों से भिन्न तथा विरल हैं। अनुराग कहते हैं-’वह जिसे प्रथम गुरू कहा जाता है, कोई चालीस साल बाद अपनी किताबी जुबान की चौहद्दी से बाहर निकला है। आज आशुतोष गोवारिकर, संजय लीला भंसाली, मधुर भंडारकर, राजकुमार हीरानी, करण जौहर और आदित्य चोपडा उन फिल्मकारों के नाम हैं जो अपनी फिल्म से नई राहें बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बडी बात यह है कि यह अपने-अपने हुनर के साथ दाखिल हो रहे हैं। अपने-अपने देखने सुनने और कहने के अलग-अलग नजरिये के साथ। काबिले गौर है कि डेढ से साठ करोड लागत तक की फिल्म बनाने वाले यह लोग गहरी व्यावसायिक समझदारी  रखते हैं।
आज वर्तमान परिदृश्य इसलिए संभावनापूर्ण है। करणआदित्य मंडली का वर्चस्व होते हुए भी बहुआयामी प्रतिभाशाली लोगों के लिए सृजन के दरवाजे खुले हुए हैं। आज ऐसा कोई मुकाम नहीं, जहां पर एक बिल्कुल नयी पीढी अपने हस्ताक्षर न कर चुकी हो। किताब में छोटे-छोट नौ अध्याय हैं। मुख्यतः  सूरज बडजात्य, करण जौहर, आदित्य, राकेश रोशन, रामगोपाल वर्मा, विधु विनोद चोपडा, मधुर भंडारकर, और प्रकाश झा पर खुद को फोकस करते हैं और इनकी चर्चा के बहाने पूर्ववर्ती इनके समकालीन और इनके बाद वालों की भी टोह लेते हैं। अनेक फिल्मकारों और उनके काम के लिए अनुराग जी द्वारा प्रस्तुत की गयी सूक्तियां दिलचस्प होने के साथ साथ सारगर्भित भी हैं। मसलन रामगोपाल वर्मा का महत्व इसलिए है कि वह सिनेमा के व्यवसाय में छोटी मछली का प्रभुत्व स्थापित करते हैं। उनका कभी कोई गॉडफादर नहीं रहा, लेकिन आज वे बेशुमार लोगों के गॉडफादर हैं। या ''ब्लैक'' का अंधेरा हिंदी सिनेमा के लिए ''उजाला'' बनकर आया या रंग दे बसंती एक घटना है, जो घटते हुए जितनी विलक्षण है घटने के बाद उससे कहीं पुरअसर होती जाती है, अथवा महेश भट्ट बखूबी जानते हैं कि बाजार के मायावी तिलिस्म के बीच अपना पुराना और खोटा सिक्का किस तरह से असली से बढकर कीमत पर भुनाया जा सकता है। वह अपनी निजी जिंदगी को किस्सा बनाकर तरह तरह से रंगकर न जाने कितनी बार परोस चुके हैं। लगता नहीं कि ये सिलसिला रूकने वाला है क्योंकि बाजार उनके किस्से कहने के अंदाज का मुरीद है।
सिनेमा के वर्तमान परिदृश्य में सक्रिय निर्देशकों कलाकारों का परिचय पाने के लिहाज से प्रहलाद अग्रवाल की पुस्तक पठनीय और दिलचस्प है लेकिन इसकी सबसे बडी कमजोरी यह है कि नए सिनेमा के गंभीर विमर्श से किनारा करती नजर आती है। यानी यह मुख्यधारा  के सिनेमा में निहित गंभीर तथा दूरगामी संदेशों को पकडने की जहमत नहीं उठाती है। न ही इस बात को रेखांकित करती है कि एक ही कालखंड में सक्रिय अनेक नौजवान फिल्मकार किन अर्थों में सफल होने के बावजूद केवल एक फार्मूले पर नहीं टिकी है। कथ्य-प्रस्तुतिकरण-नजरिए की कौन सी भिन्नता उन्हें अलग-अगल सिने व्यक्तित्वों में ढालती नजर आती है..? क्यों कोई ढाई करोड में भी अपनी पहचान बना लेता है और क्यों किसी को पचास करोड भी कम पडते हैं.? क्या अपने होने को सिद्ध करने के लिए केवल प्रतिभा ही काफी है या उस प्रतिभा को करोडों रूपये की भी दरकार है...? सबसे अंत में यह प्रश्न कि जिन फिल्मकारों के कारण प्रहलाद जी को हिंदी का वर्तमान सिने परिदृश्य सुनहरा नजर आता है वह तमाम लोग क्या केवल ’बाजार के बाजीगर हैं‘ अथवा नयी सोच व ऊर्जा से लबरेज नए सिनेमा के पैरोकार...।

20.7.11

''गाँधी'' तुम ग़लतफ़हमी में हो!

''गांधी'' तुम्हारा अहिंसा का पाठ
कृष्ण अगर मानते-तो
महाभारत ही न हो पाती
और धर्म पर अधर्म की
विजय हो जाती
''गांधी'' तुम्हारी अहिंसा की बात पर
राम-अगर चलते-तो
युद्ध रोककर
सीता-रावण को ही सौंपकर
तसल्ली कर लेते....
''गांधी'' तुम्हारी गलतफहमी है- कि
तुम्हारा अहिंसा का पाठ
दुनिया में पढा जा रहा है
गांधी सच तो ये है कि 
तुम्हारा अहिंसा का प्रचार
सिर्फ वे लोग कर रहे हैं
जिन्हें खौफ है कि
भूखी-खूंख्वार भीड
बदले की गरज से
अपने हक के लिये कहीं एक दिन
                                                  उनकी देह पर आक्रमण न कर दे... - अतुल कुशवाह

15.7.11

क्षण में जीती क्षणभंगुर बनी पीढी

- अतुल कुशवाह

यंग,  डायनेमिक, एनर्जेटिक और ओपन माइंडेड पीढी का जीने का अंदाज बिल्कुल बदल चुका है। ब्रान्डेड  और डिजाइनर कपडे, तेज रफ्तार बाइक-कार का दीवाना यूथ अब रूकने को तैयार नहीं। रोटी, कपडा और मकान पिछली पीढियों की तरह इनके पारंपरिक खांचे में नहीं आते। बेहतरीन करियर की दीवानी यह पीढी खूब कमाने और जी भर के खर्चने में विश्वास रखती है।
अंतर्राष्ट्रीय बैंक, शापिंग माल्स, मल्टीप्लेक्स और क्लब इसी पीढी के भरोसे चल रहे हैं।
जूते, मोजे, अंडरगारमेंट, शर्ट, टी-शर्ट, टाप, जीन्स, घडी, टाई, चश्मा, परफ्यूम, बाडी लोशन, फेस पैक, बर्तन, फर्नीचर, सिगरेट, वाइन- सब कुछ मंहगा, ब्रांडेड और डिजाइनर। तीन-तीन, चार-चार बैंकों के कर्जदार, मोटी सेलरी, लेकिन बैंक में ढेला तक नहीं। न एलआईसी, न मेडीक्लेम। चमचमाती बाइक या कार,  रहने को किराये का ही सही, बडा सा घर या फिर किसी पाश इलाके में पेइंग गेस्ट। पब, डिस्कोथेक, ड्रग पार्टियां। आमदनी तीस-चालीस-पचास हजार। खर्च अस्सी, नब्बे हजार।
यह हिंदुस्तान की वह युवा पीढी है जो सही मायने में अस्तित्ववादी दर्शन की संवाहक बनी सिर्फ क्षण में जीती है। अंतर्राष्ट्रीय बैंक, शापिंग माल्स, मल्टीप्लेक्स और क्लब इसी पीढी के भरोसे चल रहे हैं। यह जमकर कमा रही है और धडल्ले से खर्च कर रही है। इसे अतीत से मतलब नहीं और यह भविष्य के बारे में सोचने को फिजूल मानती है। यह सिर्फ वर्तमान में जीती है। गरीबी की रेखा और दर्द से अनजान यह उन लाखों युवाओं का रहस्यमय और अभेद संसार है जो जेब में पांच-सात बैंकों के क्रेडिट कार्ड लिए, कोक पीते, बर्गर चबाते, कंप्यूटर स्क्रीन पर आंख गडाए छह, आठ, दस या पंद्रह मंजिला इमारतों के वातानुकूलित कमरों में दिन रात खुद को सिद्ध करने में जुटा है। इनके जीवन का लक्ष्य है-पैसा। निरंतर हाहाकार है जो चौबीस घन्टे अनवरत उपस्थित है। राग-द्वेष, संवेदना, लगाव, रिश्ते, सरोकार से अछूता यह संसार मुंबई, दिल्ली, पुणे, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलूर और अहमदाबाद जैसे हर शहर में है।
 यह क्षणभंगुर पीढी है, जो चेहरे पर शिकन लाये बिना किसी राक शो का तीन हजार का टिकट भी खरीद लेती है और किसी फाइव स्टार होटल के सैलून में जाकर दो हजार रूपये में अपने बाल भी कलर करा लेती है। इस पीढी के लडके कानों में और लड़कियां नाभि में रिंग पहनती हैं। उत्तर आधुनिक समय की कोख में पैदा हुआ युवाओं का यह मायावी संसार है। आईटी कंपनियों, बैंकों, काल सेंटरों, टीवी चैनलों, एफ.एम.रेडियो, शापिंग माल्स, विज्ञापन एजेन्सियों, फिल्म तथा सीरियल निर्माता कंपनियों, फैशन हाउसों तथा मल्टीप्लेक्स थियेटरों में अठारह से अट्ठाइस की उम्र वाले युवाओं की बडी फौज है, जो अठारह से बीस-बीस घंटे काम कर रही है। ऊपर से चकाचक यह पीढी काम के भारी तनाव और दबाव से गुजर रही है। यहाँ बिना परिचय के कोई भी किसी से पूछ लेता है - डू यू वान्ट टू स्मोक अप.. अनिद्रा, तनाव, हांथों में कंपन, नजर की कमजोरी, हाई ब्लड प्रेशर, कमर दर्द, हड्डियों  की कमजोरी, कैल्सियम और हीमोग्लोबिन की कमी, यूरिक एसिड की बढती सीमा, हाईपर टेंशन, एसीडिटी, अल्सर, पाइल्स, एग्जिमा, बीसियों ऐसी बीमारी हैं, जिनसे एक जमाने में युवाओं का कोई लेना-देना नहीं था, अब यह सब युवा वर्ग के संग-साथ हैं।
  और सेक्स..बताते हैं सेक्सोलाजिस्ट डा.प्रकाश कोठारी। आफिस का तनाव सेक्सुअल लाइफ पर खतरनाक ढंग से असर डाल रहा है। नव दंपतियों में अनबन हो रही है। अपने ऐशो आराम के लिए मोटी तनख्वाह के लालच में नयी पीढी लगातार काम में व्यस्त है। नतीजा यह कि पति-पत्नी एक-एक महीने तक यौन सुख से वंचित रहते हैं। सेक्स नैसर्गिक प्रक्रिया है। इसे रोकने से यौन विकृतियां पैदा होती हैं। तनाव अगर शयनकक्ष तक पहुंचता है तो पारिवारिक जीवन पर असर लाजिमी है। यही कारण है कि इन दिनों तलाक के मामले तेजी से बढ रहे हैं।
मुबई के मालाड वेस्ट के काल सेंटर में काम करने वाला रितेश कालसेकर बताता है- सेक्स के लिए समय ही कहां है..पत्नी आईटी कंपनी में काम करती है। रात को दस-ग्यारह बजे लौटती है। मेरी ड्यूटी रात आठ से सुबह आठ की है। नौ-साढे नौ बजे सुबह मैं घर पहुंचता हूं, तब तक पत्नी जा चुकी होती है या जा रही होती है। सन डे को हम दोनों या तो सोते रहते हैं या झगडा करते रहते हैं। रितेश को इस सच के पीछे जो दर्द छिपा है, उससे पूरी युवा पीढी रूबरू है। इस यथार्थ का दूसरा पहलू है- वन नाइट स्टैंड-एक रात के लिए सेक्स। यह नयी पीढी का नया फंडा है। इजी मनी इजी सेक्स। नो नैतिकता, नो शर्म। पूनम ने निःसंकोच कहा, कुंआरापन पिछडेपन की निशानी है। कंट्रासेप्टिब्स किस मर्ज की दवा है..यह जीवन क्या  बार-बार मिलने वाला है। जो भी है वह अभी है तो सेक्स से परहेज क्यों ..जो पसंद है, उसके साथ सोने में क्या परेशानी है..
 यह वर्जनामुक्त, बंधनमुक्त समाज है जो अपने शौक और जरूरतों की गिरफ्त में है। मुंबई की प्रसिद्ध योग शिक्षिका डा.सुनीता पटेल बताती हैं, शहर की युवा पीढी आचार, विचार, विहार और आहार चार समस्याओं से जूझ रही है। उनको नहीं पता कि वे जिंदगी से क्या चाहते हैं। यह उनके जीवन में विचार का लोप है। उनके शरीर को क्वालिटी रेस्ट नहीं मिल पा रहा है। यह उनके जीवन में विहार का लोप है। जिंदगी के प्रति उनका नजरिया क्या हो इसका अज्ञान उनके जीवन आचार का लोप है। उन्हें नहीं पता कि वह क्या खा रहे हैं। वह सही आहार की उपेक्षा कर रहे हैं। यह उनके जीवन में आहार का लोप है। महीने में अगर बीस नये रोगी मेरे पास आते हैं तो उनमे से पन्द्रह युवा हैं। वे डिप्रेशन के शिकार हैं। वे अनिद्रा के रोगी हैं। उन्हें नयी उम्र में डायबिटीज़ और ब्लड प्रेशर है। वे मानसिक और शारीरिक रूप से थके हुए हैं। उनके जीवन में रिश्तों की गर्मी नहीं है। उनकी सोशल लाइफ डैड है। मल्टीनेशनल कंपनियों के वे सबसे आकर्षक शिकार हैं।
मुंबई के गोरेगांव के एक घर में पेइंग गेस्ट के बतौर रह रहे आनंद ठक्कर ने बताया, मैंने अपने मम्मी डैडी को तीन साल से नहीं देखा। वे कानपुर उत्तर प्रदेश में रहते हैं। मैं जब बहुत थक जाता हूं तो तब मैं चला जाता हूं। काम इतना ज्यादा है कि मैं उनसे फोन पर भी बात नहीं कर पाता। सुविधाओं की भारी कीमत चुका रही इस पीढी के पास पर्याप्त नींद है, न समय पर पौष्टिक भोजन करने की मोहलत। व्यायाम तो ख्वाब है। भारी तनख्वाह..लेकिन एट दि कास्ट आफ व्हाट..डा.यश पूछते हैं,- उनके बैंकों में पैसा है लेकिन वह डैड मनी है, उसका प्रयोग नहीं हो रहा है। उनकी नौकरियों की उम्र भी उनकी अपनी उम्र की तरह कम है। इस पीढी की औसत उम्र चालीस बरस है। यह डाक्टर का गुस्सा है या हकीकत।
आज के नौजवान...
               उत्साह और ऊर्जा 
                                       से मस्त ये जुझारू बेहतरीन करियर के साथ-साथ खुलकर जीने में भी विश्वास रखते हैं
               सरकारी नौकरी करने वाला कोई भी 55..56॰ साल का पिता अपने 22 साल के बेटे की आदतों से परेशान देखा जा सकता है। यह बेटा न तो बेरोजगार है, ना ही ऐसा कोई अनैतिक काम कर रहा है जो परिवार का नाम डुबा दे पर उसके जीने का अंदाज पारंपरिक खांचे में फिट नहीं होता। वह अपने बाबू पिता की सीखों को दरकिनार करते हुए खूब खर्चने और जुट कर कमाने को जीवन का ध्येय मानता है। उसके लिए जीवन के चालीस साल एक ही कुर्सी से चिपके रहना घुटन भरा है। वह साल में पांच नौकरियां बदलता है, साथ में तीन मोबाइल सेट और एक बाइक भी। सुबह दस बजे तक सोना, 12 बजे दफ्तर और रात दो बजे बापसी घर वालों को चिडचिडा ज्य्ाादा बनाती है। घंटों फोन पर बातें, खाने की थाली की जगह पिज्जा, पानी की बजाए कोक और ब्रांडेड शर्ट। 65 साल के आरके सक्सेना चश्मे के मोटे ग्लास के पीछे से आंखें तरेरते हुए कहते हैं, मैं रेलवे से जब 36 साल की नौकरी के बाद रिटायर हुआ तो मेरी तनख्वाह २० हजार थी। उसी में मैंने यह  मकान बनाया और बेटी की शादी की। आज मेरा 28 साल का बेटा 30 हजार रूपए कमा रहा है पर ये भी उसके लिए कम हैं। उनकी पत्नी परेशान हैं कि वह शादी के लिए तैयार नहीं है। उनको समझ नहीं आता कि वह क्यूँ वो कहता है इतने पैसों से परिवार नहीं चला सकता। इस दंपति की शिकायत है कि वह तीन हजार रूपए की जींस खरीदता है और पांच हजार का जूते जबकि ये चाहते हैं कि दस हजार में गुजारा कर के वह 20 हजार रूपए बचाए। यहीं से शुरू होता है आज के युवाओं और बुजुर्गों के बीच बैचारिक मतभेद, जो तेजी से इतना फैल जाता है कि दोनों अपनी-अपनी दुनिया में ही रम जाते हैं। किसी भी माल में चले जाइए, वहां से निकलने वाले युवाओं के हाथ में परिवार वालों से ज्यादा थैले होंगे। दिल्ली में अकेला रहने वाला 26 साल का शांतनु बीपीओ में काम करता है। शाम के 6 बजे से सुबह के 6 बजे तक काम करने के बाद उसको केवल बिस्तर ही नजर आता है। मगर वीकेंड्स में मैं राजा होता हूं, बेहद उल्लास से वह कहता है, दिन भर बीयर पीकर हम फिल्म देखते हैं और शाम को पार्टी करते हैं। उसके रूम मेट मयंक  की प्रेमिका सुबह आ जाती है, दोनों मिलकर खाना पकाते हैं और खूब सारी मस्ती करते हैं। मयंक कहता है, आप घर में रहकर क्या ये सब कर सकते हैं। 25 साल का मयंक जानता है कि उसकी उम्र में उसके पापा के दो बच्चे हो चुके थे और उनको अपनी बहन की शादी के लिए पैसा जुटाना था। उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है, क्योंकि वह अकेला है और मम्मी पापा दोनों सरकारी नौकरी में हैं, उनको पेंशन मिलेगी, घर वे बनवा ही चुके हैं। मयंक और उसकी प्रेमिका कनाडा जाकर बसना चाहते हैं।
Email- atulkushwaha99@gmail.com

14.7.11

सड़क खामोश है और दहशत में हैं हवाएं

फिर मुंबई हो गयी आतंक की शिकार
सड़कों पर सन्नाटा
लोगों में दहशत
शहर के शिलालेख पर फिर
खिंच गयीं खौफ की लकीरें
सहम गया इस शहर का आसमान
डर गयी धरती..
कानाफूसी करने लगीं हवाएं
मीडिया के लिए ब्रेकिंग न्यूज़
सियासी दलों के लिए
नया मुद्दा...
आतंक से अघाए लोग
जब मजबूरन 
दर्दों की गाँठ पीठ पर लादकर
भूखे पेट में लगी आग
को बुझाने निकल पड़े
पानी (रोजी कमाने) की तलाश में
सत्ता के नेताओं ने 
फिर से किया
मुम्बईकरों के 
जज्बे को सलाम...
ठीक वैसे ही
जब इससे पहले 
आतंक के शेर ने नोचा था मांस 
और उसी हाल में हम निकल पड़े थे
पेट की भूख लिए...
अब अगला धमाका कहाँ होगा,
...जहाँ भी होगा!
वो होगा हमारे ही देश का
होगा दिनरात दौड़ने वाला कोई शहर
बच्चे, बूढ़े, नौजवान होंगे 
बेगुनाही के शिकार..
उनके परिवारों में 
बच जायेंगे जो लोग
हमारे माननीय उन्हें
सांत्वना के साथ 
लाखों का मुआवजा भी दे जायेंगे...
लेकिन आतंकियों को 
पकड़ने के बावजूद
कसाब की तरह रखेंगे उन्हें सुरक्षित
...रो पड़ेंगा नन्हा आजाद
ये कहकर...
ओये काके...चल अपना काम कर
यहाँ तो होते रहेंगे
धमाके........!


10.7.11

My Film Riview: Murder 2 And Chillar Party


Pls read n give ur views.............

3.7.11

नसीबों के नस्तर...!


- अतुल कुशवाह

ट्रेन की तरह हर रोज मांगने की डियूटी करने वाले भिखारी अब पेशेवर हो गए हैं. आप भले ही एक, दो या सामर्थ्य के अनुसार ऐसे भिखारियों को दान करें जो बड़े दीन-हीन दिखाई देते हों लेकिन यकीं कीजिये..आपकी इसी श्रृद्धा-भावना ने उन्हें पेशेवर बना दिया है. उनकी आकांक्षाओं को बढाया है और उन्हें बाकायदा पोशा भी है. भिखारी अब पहले से अधिक आशावादी हो चले हैं. उन्हें भी भौतिक सुख सुविधाओं की छह जगी है और वे उन्हें पाने के लिए अपने तरीके से जद्दोजहद भी करते हैं. देखिये..भिखारी होना उनकी बदनसीबी थी. और पुण्य कमाने के लिए दान दक्षिणा देना आपका कर्त्तव्य. दुनिया में अच्छा या बुरा होना नसीब की बात नहीं, अमीर या गरीब होना नसीब की बात है...अब जरा बताइए कि क्या ये नसीब की बात नहीं है कि एक मजदूर के घर पैदा होने वाली औलाद पढाई की उम्र से ही कमाई करने लगती है. और बचपना ढो रहे बच्चे अमीरों के घरों में नौकर बनकर बड़े होते हैं. 
साँरी, ये था पेशेवर भिखारी...!
भगवान् भला करेगा साहब! सिर्फ एक रुपये का सवाल है साहब..पेट की खातिर, साहब एक रूपया दे दीजिये..आपका भला होगा..! रफ़्तार पकड़ रही ट्रेन में सरपट दौड़कर डिब्बे में दाखिल हुआ वो भिखारी इन्ही लाइनों का राग अलापते हुए भीख मांग रहा था.ट्रेन कानपुर सेन्ट्रल के करीब थी. हालाँकि उस भिखारी हालत मुझे तरस खाने को मजबूर नहीं कर सकी.ऐसा शायद उस डिब्बे में बैठे सभी लोगों के साथ हुआ.किसी का भी हाथ भिखारी पर तरस खाकर जेबों में पैसे तक नहीं पहुंचा. डिब्बे में दो राउण्ड लगाने के बाद यह बोलते हुए वाहर का रास्ता पकड़ा कि लगता है पहले ही कोई मांगने वाला यहाँ आ चुका है...क्या इस डिब्बे में कोई मांगने वाला आया था? और आँखों से अँधा सा दिखने वाला वो भिखारी नीचे उतर गया..! उसकी बात सुनकर मेरे दिमाग की नियन लाइट जलने बुझने लगी...साँरी, ये थे पेशेवर भिखारी...!
भिखारी की शर्तों के मारे..चाचा बेचारे
अखबार में साथ काम करने वाले एक साथी धार्मिक हैं. खूब दान देते हैं. व्रत रखते है. भिखारियों को खाना खिलाते हैं. वे कई नियम कायदों के पक्के हैं. दफ्तर में सब उन्हें चाचा बोलते हैं, और मैं भी. हर रोज हम दोनों रात को ऑफिस से घर साथ-साथ जाते हैं. रस्ते में एक मंदिर है, अचलेश्वर महादेव. सोमवार को बहुत भीड़ जमा होती है. इस मंदिर के चारो ओर करीब दो दर्जन से ज्यादा बदनसीब यानि भिखारी जमे होते हैं. चाचा अपने व्रत के दिन मांगने वालों को भोजन कराते हैं. वे काफी समय से एक भिखारी को खाना खिलाते आ रहे हैं और उसे दक्षिणा के रूप में ११ रुपये भी देते हैं. कुछ दिन पहले उस भिखारी ने खाना खाने से मना कर दिया है. कारन, चाचा उसे ११ रुपये दक्षिणा दे रहे थे जबकि उसकी मांग अब २१ या इससे ज्यादा हो गयी थी..चाचा ने इधर मंदिर के पास वाले लोगों से संपर्क साधा. खाना खाने के लिए घर पर चलने को कहा. लेकिन चाचा का ये प्रयास बेकार हो गया. भिखारी ने घर जाने से मना कर दिया और बोला..खाना खिलाना चाहता है तो यहीं लेकर आ..मुझे कहीं नहीं जाना, बहुत गर्मी है..उसकी बात सुनकर आगे बढे. दूसरे से कहा, वो घर जाने को तो तैयार हो गया लेकिन उसने भी अपनी शर्त सामने रख दी. शर्त ये थी, कि या तो घर तक चाचा कि बाइक से जायेगा या ऑटो का दोनों तरफ का किराया और दक्षिणा अलग से देनी होगी...! भिखारी की शर्तों के मारे..चाचा बेचारे...!
इनके पाप माफ़ कर दे खुदा..!
इस बच्चे का क्या कसूर, टेल मी ओ खुदा...! आज मुझे वो बच्चा याद आ रहा है जो शायद एक साल पहले मुझे ट्रेन में मिला था. एक हाथ से अपने अंधे दादा जी की लाठी और दूसरे में भीख का कटोरा लिए लोगों के चेहरे निहार रहा था. उसके चेहरे की मासूमियत ने मुझे रुला दिया था. लेकिन उसके लिए कर कुछ नहीं सका, शिवाय उसे पांच का एक नोट देने के. ऐसे अनाथ बच्चों के लिए सरकारों ने योजनायें तो बनाई लेकिन इन योजनाओं को अंजाम देने के लिए देश में ए.राजा, और कलमाड़ी जैसे माननीय विराजमान हैं. ये बात अलग है की जिसकी पोल खुल गई वो भ्रष्ट और जो छिपा ले जाये वो श्रेष्ठ बना बैठा है. लेकिन ये तो तय हो ही गया है कि सरकारों की टीम में ज्यादातर ऐसे ही लोग होते हैं...खुदा खैर करे, उन बच्चों की जिनके लिए योजनायें बनी और फिर भी उनसे महरूम हैं..वे बच्चे जिनके मासूम बचपन को गरीबी का लकवा मार रहा है..इनके पाप माफ़ कर दे खुदा..इनका क्या कसूर..!


फोटो- साभार: गूगल

25.6.11

मेरा फतवा उनका सर कलम करने का...


मेरा भी फतवा उनका सर कलम करने का,
जिनकी हवेलियों ने
धूप रोक ली झोपडी की...
जिनकी हवस ने पूरा चाँद ढककर
रात और काली कर दी गरीब की...
मेरा भी फतवा उनका सर कलम करने का,
जिनकी वासनाओं ने हवाओं को
इस कदर बरगलाया -कि
आत्महत्याओं का तूफ़ान
थम नहीं रहा बस्ती में...
मेरा फतवा उनका सर कलम करने का
जो शर्म के नाम पर 
आदमी का 
सर कलम करने का फतवा देते हैं.
कुत्ता पालते हैं/आदमी मरते हैं....
मेरा फतवा उनका सर कलम करने का
जो अपने मांस के लोथड़े पर
सदन में खद्दर लपेटे हुए
कार्यालयों में गर्दन पर
साहबियत कि टाई ऐंठे हुए.
जिन्हें गरीब की बात पर भी
घिन आ जाती है....----अतुल कुशवाह 

24.6.11

मर्यादा की मजबूरी...आखिर तब तक?




- अतुल कुशवाह

हम जख्म भी झेलें और जलालत भी! भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की यह उलटबांसी नै नहीं है. हर बार रिश्ते सुधारने की बातचीत में भारत को बड़प्पन का बोझ उठाना पड़ता है, जबकि पाकिस्तान कूटनीति भी फिदायीन अंदाज में करता है. मर्यादाओं के दायरे तोड़कर भी वह शहादत का ख़म ठोंकता है और हम अपमान का घूँट पीने के बावजूद दोस्ती का हाथ बढ़ाने को मजबूर नजर आते हैं. बातचीत की मेज अक्सर यह सवाल छोड़ जाती है कि आखिर ऐसा क्यों और कब तक..?
किस्सा आगरा का हो, हवाना का या फिर शर्म-अल शेख और अब इस्लामाबाद का, हर जगह पाकिस्तान के हुक्मरान संकेतों में ही सही, लेकिन नीचा दिखने का कोई मौका नहीं चूकते. कूटनीति में जहाँ इशारों और हाव-भाव की खासी अहमियत मानी जाती है वहां सुनियोजित चूकों का इतिहास पाकिस्तान की नीयत पर सवाल खड़े करने को मजबूर करता है. वैसे भी पहली गलती हो तो उसे चूक माना जाये, दोबारा हो तो संयोग, लेकिन तीसरी बार भी वही गलती हो तो उसे नीयत में खोट नहीं तो और क्या कहा जाए?
मुंबई हमले के बाद भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम जब पहली बार पाकिस्तान गए तो द्विपक्षीय वार्ता की मेज पर भारतीय ध्वज उल्टा था. गृहमंत्री और भारत ने इसे मानवीय भूल बताकर टाल दिया.मगर पाकिस्तान के प्रति सख्त रवैया रखने वाले चिदंबरम से बातचीत के दौरान तिरंगा उलटा रखने को महज संयोग की वजाय इरादतन शरारत मानने वालों की भी कमी नहीं है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि अप्रैल २००५ में जब जनरल परवेज मुशर्रफ भारत पहुंचे थे तो उनके विमान में तिरंगा उलटा था.वहीँ जब २००६ में भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान के दौरे पर थी तो न केवल उनके होटल में भारतीय ध्वज उलटा था.बल्कि पेशावर में खेले गए एक दिवसीय मैच के लिए बेचीं गई टिकटों पर भी. बार-बार और बिना किसी चूक के तिरंगा उलटा करने की चूक को बदनीयती न भी कहें तो यह मानना भी मुश्किल है कि पाकिस्तान में भारत का झंडा नहीं पहचाना जाता. इसी तरह २००१ कि आगरा शिखर वार्ता में मुशर्रफ का मेजबान से पहले ही वार्ता को असफल बताने का पैंतरा हो या फिर भारतीय विदेश मंत्री एस.एम्.कृष्णा के पाकिस्तान में रहते ही कैमरों के आगे शाह महमूद कुरैशी का बडबोलापन.द्विपक्षीय बातचीत का हर पड़ाव भी ऐसी कई शरारतों के घाव छोड़ जाता है. बीच-बीच में कई बार ऐसा हुआ है कि भारतीय पक्ष ने पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के सामने नजरंदाज कर सख्त सन्देश दिया है.मसलन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने २००३ में पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ को बिलकुल तवज्जो न देकर अपनी नाराजगी का इजहार किया था. इसी तरह २००९ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को मीडिया के सामने कठघरे में खड़ा कर तगड़ा जवाब दिया था.अब जुलाई में कृष्णा और पाकितानी राज्य विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार एक-दूसरे से मुखातिब होंगे.इस मुलाकात में कृष्णा हिना रब्बानी से मुस्कराकर मिलें तो भी इतना जरुर बता दें कि भारत की कूटनीतिक मर्यादा उसकी मजबूरी नहीं है

20.6.11

ये इस दौर का सिनेमा है...



- अतुल कुशवाह 
लीक से हटकर कथानक ,जीवन का यथार्थ और तैयार है नए दौर का यथार्थवादी सिनेमा । अब फिल्मे हमारे समय के दबाव में हैं । और रूढ़ियाँ टूट रही हैं। बालीवुड इस समय बहुत बड़े बदलाव से गुजर रहा है। नए-नए फिल्मकारों का जो समूह आया है, उसने कमाल कर दिया है। वे दर्शकों का स्वाद नए सिरे से गढ़ रहे हैं । लार्जर दैन लाइफ हीरोज की छाया से फिल्में मुक्त हो रही हैं. डकैत, विलेन, तस्कर और मरने मरने वाली लव स्टोरी के चंगुल से ऊपर उठकरफिल्मे आपकी रोजमर्रा की जिंदगी और उसकी समस्याओं में झांकने लगी हैं।
उनके पास एक सामाजिक संदेश है मगर भीड़ को आकर्षित करने की छमता नही है । छोटे बजट की बौद्धिक फ़िल्म आम जन को फोकस नही करती बल्कि भद्रलोक की परवाह करती है। उसे कोई ज्युबिली नही मनानी बस एक सप्ताह या दो सप्ताह चल गई तो सारा खर्च निकल आया और निर्देशक के मन को रचनात्मक संतोष भी मिला। नए साल में रोशन अब्बास, चंद्रकांत सिंह, सागर बलारी, अंकुश भट्ट, विनोद चबर, सुनीत अरोरा सरीखे निर्देशक अपनी ही जमीन तोड़ते नजर आयेंगे। चितकबरे, भिन्डी बाजार, माय हसबैंड'स  वाइफ, भेजा फ्राई टू सरीखी इन फिल्मो में चमकते चेहरे नही हैं, तीखे मसाले नही है और न ही ये फिल्मे उस बंधी बंधाई उस लीक पर चलती हैं जिस पर हिन्दी सिनेमा बरसों से चलकर सफल हो रहा है । इसके बाबजूद इन फिल्मो को स्वीकार गया और दर्शकों ने अपनी मेहनत की कमाई को इन पर खर्चकरना उचित समझा तो इसके सही मायने निकले जा सकते हैं की आने वाला वक्त शायद इसी किस्म के सिनेमा का है जो न तो पुरी तरह से सोलह मसालों वाली चाट है। और न ही दुरूह किस्म का सामानांतर सिनेमा है जो यथार्थ के नाम पर बोरियत परोसने का आदी हो चला था। ।

13.6.11

बाबा रामदेव: ये भूख है बड़ी


- अतुल कुशवाह

एक सवाल उनसे जिन्होंने बाबा रामदेव पर सवाल खड़ा किया.. आप क्या चाहते थे कि बाबा सरकार के कट्टरपंथी रवैये का शिकार हो जाते. मॅ बाबा का भक्त नहीं हूँ मगर बाबा की एक शानदार कोशिश का समर्थक जरूर हूँ. बाबा की कोशिश को दाद देता हू. दुनिया मे आदमी को उर्जा भोजन से ही मिलती है बिना भोजन के आदमी का स्वास्थ्य बिगाड़ना तय है. इंसान के पास ऐसा कोई तिलिस्म भी नही है जो कि बिना भोजन के हॅस्ट पुस्त बना रह सके. कोई जादू नही है ऐसा. अगर ऐसा होता तो शायद दुनिया मे पापी पेट के लिए महिलाओं और मासूम अनाथ बcचो को मज़दूरी की झुलसती भट्टी मे खुद को मजबूरन तपाना नही पड़ता. हम बात कर रहे थे बाबा रामदेव की. योग के ज़रिए उन्होने दुनिया मे यश और वैभव कमाया  जिसके लिए हम और आप (आप भले ही न लेकिन मॅ ज़रूर) दिन रात खुद को सिद्ध करने मे जुटे रहते हैं. माना की ग़लत तरीके से उन्होने पैसा कमाया लेकिन हम और आप या वो कितने ईमानदार हैं. कड़वा सच है की हम इमानदर तभी तक हैं जब तक बेईमानी का अवसर नहीं मिलता. सॉफ है की हमाम मे सब.....! सवाल पैदा हुआ कि अगर सभी भूखे हैं तो फिर कौन किसको भोजन परोसे. ? संभव है भोजन मिलते ही भूखा उस पर टूट पड़ेगा. भर पेट खाने के बाद बचा के रख लेगा. जिस चुनाव मे सभी उम्मीदवार भ्रस्ट हो तो ऐसे मे किसे चुनेंगे आप. माना कि दूध का धुला कोई नही मिलेगा. फिर तो केवल यही एक चारा है की जो कम भ्रस्ट हो उसे ही नेत्रत्व सौंप दिया जाए रामदेव ने काले धन का मुद्दा उठाकर सरकार से मामले पर अमल करने की गुहार लगाई. उन्होने लोकतंत्र की व्यवस्था के तहत अपनी बात मनवाने की ज़िद की. लेकिन सरकार तानाशाह निकली. उसने सत्याग्रह का दमन कर दिया. सरकार ने जता दिया कि हम तुम्हारे (जनता) की काले धन जैसी किसी भी माँग को आसानी से पूरा नहीं कर सकते. इस बात पर मत चौंकिये कि पिछले एक दशक में करीब 4.8 लाख करोड़ रुपये (ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी रिपोर्ट) अवैध ढंग से विदेश पहुंचे हैं बल्कि अचरज इस बात पर करिये कि भारत की यह सामानांतर अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है कि देश के भीतर काले धन को खपाने के तमाम विकल्प मिलकर भी इतनी कालिख नहीं पचा पाते। रामदेव आम इंसान से खास बने हैं. उन्हें भूख लगती है प्यास लगती है. 45 डिग्री वेल मौसम मे ज़रा दो दिन उपवास कर के तो देखिए. कोई भले ही ऐसे दो क्या बाबा की तरह 9 दिन तक रह ले. मगर अपन की हालत तो ख़स्ता से भी ख़स्ता हो जाएगी. बाबा ने तो 9 दिन तक भूखा रह के कमाल कर दिया.....