Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label kavita. Show all posts
Showing posts with label kavita. Show all posts

15.8.14

आजादी

आजादी 








निरी अहिँसा के बुते तो सपना बन जाती आजादी  
दुश्मन के सर कलम किये उसका नतीजा आजादी 

निशस्त्र खड़े होते रण में तो सपना रहती आजादी
लावा बनके बही जवानी उसका नतीजा आजादी 

भूखे रह कर तप करने से किसने किसको दी आजादी
वीर शहीदों ने जब खेली होली उसका नतीजा आजादी 

आग्रह अनशन करने भर से कभी ना मिलती आजादी
चुन चुन कर दुश्मन को मारा उसका नतीजा आजादी 

शांति मन्त्र जपते रहने से सपना बन जाती आजादी 
इन्कलाब और जय-हिन्द जिसका नतीजा आजादी 

4.1.14

मैं धर्म निरपेक्ष हूँ

मैं धर्म निरपेक्ष हूँ

मेरा परिचय यही
कि-
मैं धर्म निरपेक्ष हूँ।
मौका परस्त नेताओं की गोद में,
फलता हूँ -फूलता हूँ।
मेरा आतंक
मेरी अराजकता
मेरा राष्ट्रद्रोह
मेरा अनाचार
मेरा अत्याचार
सत्ता के दलालों को नहीं दीखता
उन्हें दीखता है -सिर्फ
सत्ता की ओर ले जाने वाला
मेरा कुटिल चेहरा
जो फूलों के आवरण में लिपटा है।
लोग पूछते हैं-
मेरे मजहब पर सवाल ?
होता है मेरा जबाब -
ना मैं हिन्दू हूँ
ना मैं मुस्लिम हूँ
ना ईसाई हूँ
ना मैं इन्सान हूँ
क्योंकि-
हर मज़हब जुड़ा है सद्भाव से।
कोई भगवान में मानता है
कोई पैग़म्बर में मानता है
कोई यीशु में मानता है
जबकि मैं तो कुटिल हूँ
गंदे राजनेता
अपना उल्लू सीधा करने
मुझे धर्म से जोड़ देते हैं
जाति से जोड़ देते हैं
जबकि
मैं खुद को जानता हूँ
खुद को पहचानता हूँ
मैं जहाँ भी रहता हूँ
वहाँ के संप्रदायों को
आपस में लड़ा देता हूँ        

18.9.13

इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरी माँ के आँचल में पनाह पाता हर धर्म
मेरी माँ कि छाती से पोषित सब संस्कृति
मेरी माँ की गोदी में प्रफुल्लित है हर कोम
इसीलिये गर्व है -मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरे वेद की ऋचाएँ मुझे सम दृष्टा बनाती है
मेरे उपनिषदो से धारा स्नेह की बरसती है
मेरे पुराणों की गाथा सत्य की लौ जलाती है
इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरे राम सिखाते हैं जीना आदर्श जिन्दगी
मेरे श्याम गाते हैं निष्काम कर्म है बन्दगी 
मेरे शंकर पीते रहे गरल बचाने को सृष्टि
इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरे दिल में है रसखान मेरे मन में कबीरा है
मेरे दर्शन में महावीर भुजा में गुरु गोविन्दा है
मेरी धडकन में बसी टेरेसा मेरे कर्म में बुद्धा है 
इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।


    

24.2.13

यह देश चलता कैसे है


यह देश चलता कैसे है


सीधे-सुलझे रिश्ते भी,वो उलझाते कुछ ऐसे हैं 
नहीं जानता राम-रहीम,यह देश चलता कैसे है 

समस्या से समस्या का,वो गुणाकार ही करते हैं 
इसकी टोपी उसके सिर पर,खेल खेलते रहते हैं
चोर-चोर मोसेरे भाई, ये चेहरे मिलते जुलते हैं
नहीं जानता राम-रहीम,यह देश चलता कैसे है

भूखे बेबस लोगों को भी,वो पल में धनी बनाते हैं
चुपके-चुपके प्रेम जताते ,सभा भवन में लड़ते हैं
भारत का नक्शा कागज पर लगता सुंदर ऐसे है
नहीं जानता राम-रहीम, यह देश चलता कैसे है

क्लर्क किरोड़ीमल,अफसर लक्ष्मी पुत्र से लगते हैं
नेता हैं कुबेर मित्र, लोग निर्धन बेहाल बिलखते हैं
काले धन की भरी तिजौरी,स्विस  बेंक  में  पैसे हैं
नहीं जानता राम रहीम, यह  देश चलता  कैसे है

दशहत में जीती है जनता,वो जेड सुरक्षा रखते हैं
होते रहते बम्ब धमाके वो पैसे मुर्दों पर बरसाते हैं
संवेदन बातों की मरहम,फिर सबकुछ जैसे वैसे हैं
नहीं जानता राम-रहीम, यह  देश चलता कैसे है 
    

14.2.13

तितली

तितली 

उड़ने दो तितलियों को मुक्त गगन में
इनके बिना यह गगन बेरंग लगता है

रहने दो तितलियों को हर उपवन में
इनके बिना उपवन बदरंग लगता है

मंडराने दो तितलियों को गमलों में
इनके बिना गमले रंगहीन लगते है

गाने दो तितलियों को प्रीत के गीत
इनके बिना सब सुर बेजान लगते हैं

फैलने दो पंख तितलियों के गली में
इनके बिना गली सुनसान लगती है

फलने दो तितलियों को हर कोख में
इनके बिना सोगात अधूरी रहती है

बेरहम बनकर इनके पंख मत कुचलो
इन्ही से हर रिश्तें की शरुआत होती है                            
                                                                                 
इंसान हो तो इंसानियत की राह चलो
इनके अपमान से धरा बदनाम होती है
                                                                                      (छबि -गूगल से साभार )

25.1.13

रँग


रँग 

आह ! रँग -
तुझे भी नहीं बख्शा
इन शैतानों ने,
आखिर डस ही लिया,
इन आस्तीन के सांपों ने!!

-----------------------------

अरे,रँग !
देखा लिया कुसंगत का असर?
कभी,
तू त्याग और प्रेम का प्रतीक था,
क्योंकि
तब  तू मानवता के संग था।
अब
तेरी इतनी दुर्दशा और दुर्गति,
कारण
तू  विकृत शैतानों के संग है।

---------------------------------

रँग -
तू है मानवता का प्रतीक
त्याग और प्यार का गीत
ख़ुशी और अमन का संगीत
मगर
सत्ता के भूखे गिद्धों ने
तुझे भी नोच खाया है
इसलिए -
अब बन गया
मजहब का प्रतीक!
तुष्टिकरण का प्रतीक!!
आतंक का प्रतीक!!!

14.1.13

अहसास होना चाहिये .....................

अहसास होना चाहिये .....................


गणतंत्र के बदलाव का अहसास होना चाहिये
कागज की इन कश्तियों को अब बदलना चाहिये

देखना है, देखेंगे, कब तक फुसलाते जाओगे ?
पक चुके हैं कान सब के अब काम होना चाहिये

कुटनीति संवाद के मोहरे हार खा कर पीट गये
हर ईंट का जबाब अब चट्टान होना चाहिये 

निंदा या आलोचना का पापी पर है असर कहाँ ?
लातों के भूतों पर अब लातें बरसानी चाहिये 

क्षमा किया उपद्रव झेले आखिर हमने पाया क्या?
जैसे को तैसे की भाषा अब सिखलानी चाहिये  

8.1.13

सिंहासन खाली चाहिये ...........


सिंहासन खाली चाहिये ...........

देश के गणतंत्र का  नव निर्माण चाहिये
अंधे-खोड़े तंत्र से, अब छुटकारा चाहिये

न्याय की उम्मीद में, दीप बुझने को चला
हर बार की तरह अब तारीख नहीं चाहिये

अपराधी तो अपराधी है,छोटा हो या बड़ा
विषेले नागों का फण,अब कुचला जाना चाहिये 

गीदड़ों की फौज से भय,भेड़ियों को है कहाँ     
जंगल के जर्रे-जर्रे से,अब दहाड़ शेर की चाहिये 

शिखंडीयों की ओट से,तीर चलाओगे कब तक ?
दुराचार से भिड़ने को,अब चौड़ी छाती चाहिये

कोरी बातों के पुलिंदे, कब तक यूँ बहलाओगे ?
लक्ष्यभेद से चुक गये तो,सिंहासन खाली चाहिये 
     

14.8.12

शहीद की वेदना


शहीद की वेदना 

अमर जवान ज्योति से,
निकली थी एक सिसकी .
मेने पूछा  -
शहीद,
तुम-
वीर थे,बहादुर थे. 
वतन पर मर मिटे थे. 
तुम्हारी वीर गाथा से, 
इतिहास भरा पड़ा है. 
तुम- 
हँसते-हँसते, 
चढ़ गए थे सूली पर. 
गोरों की गोलियों को, 
लेते थे सीधा छाती पर.
मगर- 
आज तुम मायूस क्यों?
आज तुम सुबकते क्यों?
शहीद बोला-
गैरो ने ढाया सीतम, 
तब इन्कलाब कह गये. 
देखा -
अपनों का अपनों पर सीतम ,
हाय!अब आंसू सिसकी रह गये !!

30.7.12

अन्ना की हार के मायने


अन्ना की हार के मायने 


मर्यादा पुरषोत्तम-
यदि हार जाते रावण से ,
तो ,
उस हार के मायने क्या होते ?
लीला पुरषोत्तम-
यदि हार जाते कंस से ,
तो,
 उस हार के मायने क्या होते ?
हार जाते गोरों से टकराते यदि भारत के सपूत -
तो,
उस हार के मायने क्या होते ?
शायद ,
मर्यादाएं तार-तार हो जाती ,
छद्म और फरेब अमर हो जाते ,
अन्याय की सर्वत्र पूजा होती ,
हठी और कामी के जयकारे होते .
मगर -
प्रकृति को कब मंजूर होता है घिनोना खेल ,
समय ने कब किया आततायियों से मेल,
सत्य ने कब सहा झूठ और फरेब .
कर्म की गति विचित्र हो सकती है -
कुछ काल के लिए राहू सूर्य को ग्रस सकता है ,
अमावस की रात चाँद को छिपा सकती है ,
मगर -
क्या काल का डंडा कभी रुका है ?
पाप का घट कभी साबूत बचा है?
कोई असुर पृथ्वी पर जिन्दा बचा है?
क्या सत  कभी असत से हारा है?
यदि ,नहीं ,तो फिर 
अब -
सत्य की हार के मायने- क्या? 
अन्ना की हार के मायने - क्या?
है ये  प्रश्न निश्चय ही डरावने ,
अन्ना की हार ,असुरों की जीत है.
अन्ना की हार ,असत्य की जीत है .
अन्ना की हार ,अनीति की जीत है .
अन्ना की हार ,समय की हार है .
मगर -
समय कभी हारा नहीं है .
समय से कोई बचा नहीं है. 
समय कभी ठहरा नहीं है .
समय घूमता है निरंतर लट्ठ लिये,
इसीलिए ,
पापी के पाप  का घट निश्चय ही  फूटता है। 

7.3.12

साम्प्रदायिकता


साम्प्रदायिकता 

लोकतंत्र के आँगन में-
फलती फूलती है साम्प्रदायिकता.
कोई बहुसंख्यक में साम्प्रदायिकता देखता है,
कोई अल्पसंख्यक में  साम्प्रदायिकता देखता है,
मगर सत्य यही है कि-
हर बार जीतती है साम्प्रदायिकता .
कोई बाटला काण्ड पर आंसू बहाता है,
कोई भिंडरावाले पर फूल चढ़ाता है,
कोई मालेगांव बम्ब कांड पर उकसाता है, 
लक्ष्य इतना ही कि भड़कती रहे साम्प्रदायिकता.
कोई आरक्षण को धर्म  से जोड़ता है,
कोई राम को राजनीती से जोड़ता है,
कोई मोलवी से फतवे करवाता है,
कोई जाती को राजनीती में ढकेलता है,
सपना इतना ही,
कि,
सुलगती रहे साम्प्रदायिकता.
लोकतंत्र के आँगन में,
हम-
एक दूजे को सांप्रदायिक कहते हैं, 
हिन्दू-मुस्लिम- सिक्ख- इसाई ,
सब आपस में झगड़ते हैं .
एक दूजे पर आरोप -प्रत्यारोप लगाते हैं,
कि -
सिर्फ तुम सांप्रदायिक हो .
मगर -
कहाँ फुरसत है किसी को,
अपने गिरेबान में झाँकने की,
खुद को टटोलने की,
आत्म अवलोकन करने की,
कि,
क्या मैं खुद साम्प्रदायिक हूँ ?
हम सांप्रदायिक सियासत करते हैं,
क्योंकि-
यह आसान रास्ता है सत्ता के गलियारे का,
यह आसान रास्ता है जनता को भरमाने का,
यह आसान रास्ता है सत्ता सुख भोगने का ,
यही कारण है कि-
हम साम्प्रदायिकता को मरने नहीं देते, 
येन  केन  प्रकारेण,
साम्प्रदायिकता को जिन्दा रखते हैं,
ताकि
सियासत कि दूकान चमकती  रहे .
मानवता रोती रहे सियासत चलती रहे .  

27.11.11

शहीदों को नमन ........


 शहीदों को नमन ........


देश के सपूत  को,    हर लाल का  सलाम है. 
माँ भारती का गुलिस्ता तुझसे ही आबाद है. 

हम सभी सुख से यहाँ, तुम कितने दूर हो ? 
दिल में तेरी यादें हैं, होंठो पर तेरी बात है .
देश पर कुर्बान होकर, दी गर्व की सोगात है. 
जिन्दा है कसाब फिर भी,बड़े शर्म की बात है.


देश के सपूत को,    हर लाल का  सलाम है. 
माँ भारती का गुलिस्ता तुझसे ही आबाद है. 

माँ भारती की गौद में, तुम चीर निद्रा ले रहे .
चर्चा हर चौपाल पर ,तेरी वीरता की बात है .
बच गया संसद भवन, दी फख्र की सौगात है .
जी रहा अफजल गुरु ,यह बड़े शर्म की बात है. 


देश के सपूत को,    हर लाल का  सलाम है. 
माँ भारती का गुलिस्ता तुझसे ही आबाद है. 

25.10.11

दीपज्योती नमोस्तुते


दीपज्योती नमोस्तुते 

जीवन -
क्षण भंगुर है ,
नश्वर है,
अल्प है,
मगर-
दीये की तरह 
सार्थक जीयें तो ,
अमृत है,
ज्योतिपुंज है.

--------------------------

दीप -
तुम खुद के अस्तित्व को 
तिल -तिल जला 
जग को रोशन करते हो ;
मगर-
प्रतिफल में क्या पाते हो ?
दीप ने कहा-
अँधेरे की दया तले
जीना अर्थहिन है ,
बेमकसद है.
अँधेरे से जंग,
अर्थहिन जीने से बेहतर है . 

----------------------------------------

नन्हें दीप -
तमस से टकराना, 
तेरे बूते से बाहर है .
दीप ने कहा -
अँधेरे की गहनता से डरना,
मेरी फितरत नहीं है .
तमस से जंग खेलने में , 
ताकत की नहीं,
 जज्बे की जरुरत है . 
  -----------------------------------
भ्रष्ट नेता ने 
दीप से पूछा- 
तुम भी काला खाते हो, 
काला उगलते हो .
मैं भी काला खाता हूँ, 
काला उगलता हूँ .
फिर भी तुम पूजे जाते हो, 
और 
मैं जूते खाता हूँ .
दीप ने कहा -
मैं जनहित में ऐसा करता हूँ 
तुम जन अहित में करते हो .
इसीलिए तुम जग में जूते खाते हो .  

28.9.11

नारी....?


नारी -
तुझ से लेकर ,
अनुत्तरित है प्रश्न ?
 नहीं ढूढ़ पाया हूँ हल,
कि-    
तेरा पूजन ,
अब पंडालो में ,
या -
मंदिरों तक क्यों सिमट गया है ?
इसी आर्यावृत में कभी  ,
तुम-
शक्ति और श्रद्धा थी , 
शुचिता और आद्या थी ,
दुर्गा और लक्ष्मी थी . 
इसी आर्यावृत में अब ,
तुम-
 भोग्या, 
 काम्या , 
अबला ,
 निर्लज्जा बन रही हो .
क्या,
 इसे स्वतंत्रता  कहें?
इसे प्रगति पथ कहें ?  
 तुम्हारी -
इस दुर्दशा का जबाबदार कौन ?
तुम खुद,
 या 
पुरुष  समाज !!

31.7.11

हाँ, हाँ मैंने वक्त बदलते देखा है.......

हाँ, हाँ मैंने वक्त बदलते देखा है.......

मैंने वक्त बदलते देखा है,
दुनिया के दस्तूर बदलते देखे हैं,
मैंने, मैंने, रिश्ते और रिश्तेदार बदलते देखे हैं
मैंने, अपनो को बैगाना होते देखा है,
हाँ, हाँ,  मैंने वक्त बदलते देखा है......

मैंने लोगो की मधु-मुस्कान में  स्वार्थी बदबू को आते देखा है...
कथनी और करनी में अंतर को देखा है....
मैंने, मैंने, रंग बदलते इंसानी गिरगिट देखे हैं,
मैंने अपनेपन की केचुली पहने इंसानों को देखा है
हाँ, हाँ मैंने वक्त बदलते देखा है....

मैंने अपने लियें सजी 'अपनो' की महफ़िल  भी देखी है
मैंने गैरों की गैरत को देखा है, और 'अपनो' के 'अपनेपन' पन को भी देखा है,
मैंने, हाँ, हाँ, मैंने इस 'अपनो की दुनिया ' में अपने को अकेला भी देखा है.
हाँ, हाँ मैंने  वक्त बदलते देखा है.......
- पंकज व्यास, रतलाम 

28.7.11

''अमर सुहागन''-.शत-शत नमन इन वीर नारियों को

यूँ तो भारतीय नारी का हर स्वरुप   प्रेरणादायी है पर एक शहीद की पत्नी के रूप  में   स्त्री  कितना  बड़ा  त्याग करती है सोचकर भी ह्रदय  गदगद हो जाता है और आँखें नम .इन्ही भावों को संजोये है यह रचना  .शत-शत नमन इन  वीर नारियों को -


हे!  शहीद की प्राणप्रिया
तू ऐसे शोक क्यूँ करती है?
तेरे प्रिय के बलिदानों से
हर दुल्हन मांग को भरती है.
******************************************
श्रृंगार नहीं तू कर सकती;
नहीं मेहदी हाथ में रच सकती;
चूड़ी -बिछुआ सब छूट गए;
कजरा-गजरा भी रूठ गए;
ऐसे भावों को मन में भर
क्यों हरदम आँहे भरती है;
तेरे प्रिय के बलिदानों से
हर दीपक में ज्योति जलती है.
*********************************************
सब सुहाग की रक्षा हित
जब करवा-चोथ -व्रत करती हैं
ये देख के तेरी आँखों से
आंसू की धारा बहती है;
यूँ आँखों से आंसू न बहा;हर दिल की
धड़कन कहती है--------
जिसका प्रिय हुआ शहीद यहाँ
वो ''अमर सुहागन'' रहती है.
                        
                     shikha kaushik
[do you want to join ''BHARTIY NARI ''blog .please send me E.mail-shikhakaushik666@hotmail.com .Blog's URL-http://bhartiynari.blogspot.com/ ]

25.6.11

मेरा फतवा उनका सर कलम करने का...


मेरा भी फतवा उनका सर कलम करने का,
जिनकी हवेलियों ने
धूप रोक ली झोपडी की...
जिनकी हवस ने पूरा चाँद ढककर
रात और काली कर दी गरीब की...
मेरा भी फतवा उनका सर कलम करने का,
जिनकी वासनाओं ने हवाओं को
इस कदर बरगलाया -कि
आत्महत्याओं का तूफ़ान
थम नहीं रहा बस्ती में...
मेरा फतवा उनका सर कलम करने का
जो शर्म के नाम पर 
आदमी का 
सर कलम करने का फतवा देते हैं.
कुत्ता पालते हैं/आदमी मरते हैं....
मेरा फतवा उनका सर कलम करने का
जो अपने मांस के लोथड़े पर
सदन में खद्दर लपेटे हुए
कार्यालयों में गर्दन पर
साहबियत कि टाई ऐंठे हुए.
जिन्हें गरीब की बात पर भी
घिन आ जाती है....----अतुल कुशवाह 

5.6.11

नेताओं से अच्छे ये सूअर के बच्चे

मुझे इन नेताओं से अच्छे
ये सुअर के बच्चे लगे...
जो रोजाना मेरी गली तो घूम जाते हैं,
और अपने स्तर से गन्दगी खाकर
कुछ तो साफ़ कर जाते हैं...
लेकिन, वो कमबख्त
आएगा सिर्फ चुनाव के वक्त
बस, वोट मांगने...
और ये सफाई देने कि
मैं...सुअर से अच्छा हूँ और कुछ नहीं....- अतुल 


29.5.11

मेरी बेटी


मेरी  बेटी                                               ''गूगल से साभार ''

फूल सी प्यारी है वो और मखमल सी नरम ,
है चपल तितली के जैसी ;रेशमी उसकी छुअन ,
दौड़ती खरगोश सी,कोयल के जैसी बोलती,
मीठी-मीठी बातों से कानों में अमृत घोलती ,
खिलखिलाती धूप-सम ;मुस्कुराती चांदनी,
बाँटती खुशियों के मोती ,क्रोध में है दामिनी ,
वो क्षमा है ,वो शिवा है,वो है काली-भैरवी , 
वो जया है ;वो है दुर्गा,वो है सारा-वाभ्रवी,
मुझसे ही जन्मी है वो ,मेरा ही तो रूप है ,
सृष्टि की संचालिका ,अनुपम है वो अनूप है .
                                         शिखा कौशिक


18.1.11

'ध्रुवतारा'

तारा टूटा है दिल तो नही 
चहरे पर छाई ये उदासी क्यों 
इनकी तो है बरात अपनी 
तुम पर छाई ये विरानी क्यों 


न चमक अपनी इन तारों की 
न रोशनी की  राह दिखा सके 
दूर टिमटिमाती इन तारों से 
तुम अपना मन बहलाती क्यों 


कहते है ये टूटते तारे 
मुराद पूरी करता जाय 
पर नामुराद मन को तेरी 
टूटते हुए छलता  जाए क्यों 


मत देखो इन नक्षत्रों को 
इसने सबको है भरमाया 
गर देखना ही है देखो उसे 
जो अटल अडिग वो है 'ध्रुवतारा'