Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

4.1.11

छिद्रान्वेषण ---डा श्याम गुप्त....

छिद्रान्वेषण " को प्रायः एक अवगुण की भांति देखा जाता है , इसे पर दोष खोजना भी कहा जाता है...(faultfinding). परन्तु यदि सभी कुछ ,सभी गुणावगुण भी ईश्वर - प्रकृति द्वारा कृत/ प्रदत्त हैं तो अवगुणों का, जो मूलतः मानवीयता के विरुद्ध नहीं हैं, कोई तो महत्त्व होता होगा मानवीय जीवन को उचित रूप से परिभाषित करने में ? जैसे-- न कहना भी एक कला है, हम उनसे अधिक सीखते हैं जो हमारी हाँ में हाँ नहीं मिलाते , 'निंदक नियरे राखिये....' नकारात्मक भावों से ..... आदि आदि ... । मेरे विचार से यदि हम वस्तुओं/ विचारों/उद्घोषणाओं आदि का छिद्रान्वेषण के व्याख्यातत्व द्वारा उन के अन्दर निहित उत्तम व हानिकारक मूल तत्वों का उदघाटन नहीं करते तो उत्तरोत्तर, उपरिगामी प्रगति के पथ प्रशस्त नहीं करते । आलोचनाओं / समीक्षाओं के मूल में भी यही भाव होता है जो छिद्रान्वेषण से कुछ कम धार वाली शब्द शक्तियां हैं। प्रस्तुत है आज का छिद्रान्वेषण ----
छिद्रान्वेषण एक
---आगरा महानगर से एक समाचार है कि वहां नगर निगम ने नये वर्ष की पहली जनवरी से पोलीथीन के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया है, पोलीथीन प्रयोग करते पाये जाने पर दन्ड का विधान है। दुकानदारों व ग्राहकों/उपभोक्ताओं ने कागज़ के लिफ़ाफ़े , थेले आदि प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया है व दुकानदारों ने अपनी दुकानों पर सूचक-पट्ट(केप्शन) लगा दिये है कि ग्राहक अपने साथ कपडे आदि के थेले लेकर आयें । और वर्ष के प्रथम दिवस काफ़ी राजस्व
भी दन्ड स्वरूपबसूल हुआ।
----यद्यपि हमने स्वयं जाकर नहीं देखा है कि किस स्थिति तक यह सफ़ल है और कहां तक ; किन्तु क्या अन्य राज्य या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस प्रकार के कदम नहीं उठाये जाने चाहिये , क्या यह एक सार्थक पहल नहीं है तथा इसे कडाई से पालन नहीं करना चाहिये ...सभी मतभेद आदि भुलाकर...
छिद्रान्वेषण दो--बेन्ग्लूरसे सचित्र समाचार है कि में राज्य हस्त करघा विकास निगम द्वारा आयोजित शिल्प प्रदर्शनी में हस्त-शिल्प उत्पादों के साथ अभिनेत्री रूपाश्री का चित्र-----
----क्यो भई, क्यों...वहां एक अभिनेत्री क्या कर रही है, और क्यों?.....क्या उसके स्थान पर वहां , उस कलाकार का चित्र नहीं हो्ना चाहिये जिसने ये कलाक्रितियां बनाई हैं



2010 की खाली झोली में जिले को क्या 2011 में कुछ मिलेगा

बीते साल 2010 में तो जिले की झोली खाली ही रही क्या 11 में जिले की झोली में कुछ आयेगार्षोर्षो यह सवाल बीते साल की बिदाई और नये के स्वागत की स्वागत की बेला पर लोगो के मन में उठ रहा हैं।

बीता साल 2010 जिले की उपलब्धि की दृष्टि से शून्य ही रहा। शिव की नगरी सिवनी को इस साल कुछ भी हासिलनहीं हुआ। हालांकि पिछले कई सालों से हम कुछ ना कुछ खोते ही आये हैं। नेताओं की नूरा कुश्ती से सिवनी लोकसभा और घंसौर विधानसभा क्षेत्र तो हमने खो ही दिया था। जिले का हक होने के बाद भी संभाग हमें नहीं मिला। हां यहां के सूरमा नेताओं के खाते में इतना जरूर आया हैं कि छिन्दवाड़ा संभाग अभी तक घोषित नहीं हुआ हैं जबकि मुख्यमन्त्री इसकी घोषणा कर चुके थे। नक्सल प्रभावित जिलों की सूची में शामिल हो जाने के बाद भी ना जाने क्यों इसे काट दिया गया। जबकि नक्सलियों की शरण स्थली के रूप में इस जिले में गतिवधियां एस.पी. श्री डी.एम.मित्रा के समय ही नोट की गईं थीं।

हमासरे निर्वाचित जन प्रतिनिधियों ने जिले में इंजीनियरिंग कालेज, मेडिकल कालेज और एग्रीकल्चर कालेज खोले जाने की मांग भी उठायी थी। मुख्यमन्त्री जी ने मेडिकल कालेज के बारे में घोषणाभी की थी। इसहेतु जिलाकलेक्टर ने एक समिति भी गठित की थी। लेंकिन बीते साल में इस दिशा में उपलब्धि शून्य ही रही। बड़ी रेल लाइन के लिये प्रयासतोबहुत हुये और नेताओं ने अपनी फोटो के साथ तेल मन्त्री के आभार के विज्ञापन भी छपवा डाले लेकिन छिन्दवाड़ा सिवनी नैनपुर लाइन के लिये एक पैसा भी नहीं मिला। रामटेक गोटेगांव लाइन का मामला भी सर्वे के लिये मिली राशि से अधिक नहीं बढ़ सका। फोर लेन मामला का मामला भी एक सोचे समझे षड़यन्त्र के चलते आज लटक गया हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। जिसका शायद अब जल्दही निपटारा कोर्ट से हो जावे।

नये साल 2011 में बड़ी रेल लाइन जिसके लिये जगदगुरू शंकरायार्च की पहल रंग दिखा सकती हैं। रहा सवाल फोर लेन का तो बाल कोर्ट के पाले में हैं और जो कुछ भी तय होगा वो वहीं तय होगा। संभाग,इंजीनियरिंग,मेडिकल और एग्रीकल्चर कालेज मिलना या ना मिलना जिले के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा। अपने खुद के लिये बहुत कुछ पाने की तमन्ना रखने वाले हमारे जन प्रतिनिधि यदि जिले के लिये कुछ दिलाने को संकल्पित हो जायें तो कोई ऐसी बड़ी बात नहीं हैं कि नये साल में हमारी झोली में कुछ ना कुछ ना अयों और यदि ऐसा ही चलता रहा तो खाली झोली रहना तो हमारी नियति बन ही चुकी हैं। हर साल हम ऐसेही जाने वाले की बिदाई और आने वाले साल का स्वगत खाली हाथ ही करते रह जायेंगें।









Journey with Words..: माँ तरकारी बना रही है…

Journey with Words..: माँ तरकारी बना रही है…

नोट, घडी और बैग !

पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ कि यह पोस्‍ट लिखने बैठना पडा। वैसे इस  विषय पर दीपावली के बाद ही लिखना चाहता था लेकिन सोचा चलो जाने दो। भगवान इन लोगों को सदबुघ्दि दे देगा लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं और मुझे दीपावली में जो हुआ उसके बाद नए साल में भी उसकी पुनरावृत्ति हो गई। ... और मैंने कल अखबारों में पढा कि उत्‍तर प्रदेश के मुजफफरपुर में जल निगम के एक अफसर ने वहां के जिलाधिकारी को नए साल पर मिठाई के डिब्‍बे के साथ नोटों का ‘उपहार’ दिया। अपने मातहत अफसर की इस ‘गुस्‍ताखी’ पर जिलाधिकारी महोदय संतोष कुमार यादव हतप्रभ रह गये और उन्‍होंने अभियंता के खिलाफ भ्रष्‍टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज करा दिया। हालांकि जिलाधिकारी को नोटों का ‘उपहार’ देने वाले अभियंता इसे ‘गुस्‍ताखी’ नहीं कहते, वे कहते हैं कि वे जल्‍दबाजी में कोई उपहार नहीं खरीद सके इसलिए उन्‍होंने नोट ही दे दिया और उन्‍हें अपने किए पर पछतावा भी नहीं है।
मुझे याद आ गए हमारे एक जनप्रतिनिधि। प्रदेश की राजधानी में रहने वाले इन महाशय ने इस दीपावली पर एक नई परंपरा शुरू की। पत्रकारों को नोट बांटने की। राजनांदगांव में उनकी पार्टी के मीडिया मेनेजमेंट का काम देखने वाले और मुंह में हर समय ‘जय श्री राम’ रखने वाले शख्स को इस ‘महति’ जिम्‍मेदारी के योग्‍य समझा गया और उन्‍होंने दीपावली के बाद पत्रकारों को फोन कर अपने कार्यालय बुला-बुलाकर ‘लिफाफा’ थमाया।  किसी पत्रकार को हजार का एक नोट किसी को दो तो किसी को तीन। जिसकी जितनी औकात, उसे उतना मिला(मुझे मेरी औकात का पता ही नहीं चल पाया क्‍योंकि मैं इन महाशय के दरवाजे गया ही नहीं)।
दीपावली के महीने भर बाद तक इस बात की चर्चा होती रही कि यह कैसी परंपरा शुरू कर दी गई ? इसके बाद आया नया साल। नए साल में फिर संदेश आया उन्‍हीं महाशयजी की ओर से कि एक और तोहफा है, आकर ले जाएं। चलो इस बार पत्रकारों को नोटों में नहीं नापा गया, चंद पत्रकारों को घडियां दी गईं। इस पर भी बवाल मच गया। कुछ पत्रकारों ने घडियों को अपने योग्‍य नहीं पाया और हो गए उत्‍तेजित। जला डाला एक नेता का पुतला। वे इस बात से नाराज नहीं थे कि नोट बांटने या घडी बांटने की यह क्‍या परंपरा, उनकी नाराजगी थी घडी घटिया है! अब देने वाले और लेने वाले ही जाने कि घडी कैसी थी?
दीपावली में बंटा नोट तो नए साल में इसी पार्टी के एक लालबत्‍ती धारी सज्‍जन भी कहां पीछे रहने वाले थे, उन्‍होंने भी उपहार बांटने का फैसला ले‍ लिया।  वैसे बता दूं कि ये सज्‍जन कई बार जनता का प्रतिनिधित्‍व कर चुके हैं, मध्‍यप्रदेश के जमाने में मंत्री भी रहे, निगम मंडलों में भी काबिज रहे पर उनकी ओर से पत्रकारों को तोहफा पहली बार मिला। यहां भी मध्‍यस्‍थ बने वही जयश्रीराम वाले सज्‍जन। घडी घटिया है, यह कहते हुए पत्रकारों ने पुतला तक जला दिया, लेकिन बैग की शिकायत अब तक सामने नहीं आई है, सो ना जाने वह कैसा होगा।
पत्रकारवार्ताओं में उपहार, डायरी और पेन तक पत्रकारों को दिए जाने की बातें तो होती रहीं हैं लेकिन 2010 के आखिर में नोट बंटने और साल के शुरूआत में घडी और बैग बंटने ने एक नया अनुभव दिया। चुनावों के दौरान भी पत्रकारों को तोहफे और ‘पैकेज’ की आड में नोट मिलते हैं, पैड न्‍यूज की चर्चा होती है, लेकिन दीपावली और नए साल पर इस तरह के उपहारों ने एक नया अनुभव दिया।
उपहारों के इस आमंत्रण को अस्‍वीकार कर मैंने अपने मन की मान ली और शांत हो गया लेकिन कल जब अखबारों में उत्‍तरप्रदेश के जिलाधिकारी के कदम को देखा तो लगा कि यहां रिपोर्ट तो नहीं लिखा सकता, शायद कोई थाना मेरी रिपोर्ट लिखे भी न लेकिन मैं यह पोस्‍ट तो लिख ही सकता हूं। किसी को यदि बुरा लगे तो माफ करना।


क्या प्रहलाद पटेल के भाजपा में पुन: स्थापित होने से महाकौशल के भाजपायी राजनैतिक समीकरणों में बदलाव आयेगा?

राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में पद लेकर राजनैतिक रूप से पुन: स्थापित हाने वाले पूर्व केन्द्रीय मन्त्री प्रहलाद पटेल की सक्रियता एवं नेतृत्व से मिलने महत्व के चलते महाकौशल की भाजपायी राजनीति में काफी हल चल मची हुयी हैं। अब देखना यही हैं कि जिले के भाजपा नेताओं में से कौन कौन किस किस बहाने से उनके कार्यक्रम से किनारा करता हैं और कौन कौन बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता हैं। लेकिन इतना तो तय है कि प्रहलाद पटेल के कारण भाजपायी समीकरणों में बदलाव अवश्य आयेगा। मुख्य अतिथि की आसन्दी से बोलते हुये मन्त्री बिसेन ने यह कहने में कोई संकोच नहीं किया उनसे जब कहीं गड़बड़ हो जाती हैं तो एक पड़ोसी के नाते हरवंश सिंह जी का उनको सहयोग मिलता हैंवैसे भी इस जिले में कांग्रेस और भाजपा नेताओं की नूरा कुश्ती के आरोप कोई नये नहीं हैं। पहले भी कई नेताओं पर हरवंश सिंह से सांठ गांठ के आरोप लगते रहें है। वकीलों के ही इस कार्यक्रम सम्भवत: हरवंश सिंह के विधानसभा उपाध्यक्ष बनने के बाद विधायक नीता पटेरिया पहली बार विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन दिखीं। दोनों के चुनाव जीतने बाद ऐसा ना जाने क्या हो गया कि दोनों एक दूसरे को फिलहाल फूटी आंख नहीं सुहा रहें हैं। इसमें राजनीति तलाशने की गुजाइश नहीं मान रहें हैं। अब वारस्तविकता क्या हैंर्षोर्षो यह तो समय ही बतायेगा। सपा के प्रदेश अध्यक्ष गौरी सिंह यादव का नगर प्रवास हुआ। उनके इस एक दिवसीय प्रवास के दौरान नये बस स्टेन्ड के सामने आम सभा रखी गई थी। जिसमें उन्होंने इंका और भाजपा को जम कर कोसा।

प्रहलाद के कारण बदलेगे भाजपायी समीकरण-राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में पद लेकर राजनैतिक रूप से पुन: स्थापित हाने वाले पूर्व केन्द्रीय मन्त्री प्रहलाद पटेल की सक्रियता एवं नेतृत्व से मिलने महत्व के चलते महाकौशल की भाजपायी राजनीति में काफी हल चल मची हुयी हैं। वैसे तो इस अंचल में कई छत्रप ऐसे हैं जिन्हें छ़त्रप बनाने में ही प्रहलाद पटेल का हाथ था। हाल ही में बालाघाट जिले में हुये उनके शानदार प्रोग्राम ने एक अलग ही छाप छोड़ दी हैं। इसमें सोने में सुहागे का काम किया उनके प्रोटोकाल में हुयी चूक के कारण प्रदेश सरकार द्वारा किये गये एस.पी. के तबादले ने। अब 4 जनवरी को प्रहलाद पटेल का सिवनी आगमन हो रहा हैं। हालांकि जिला भाजपा द्वाराउनके प्रोग्राम की कोई विज्ञप्ति जारी नहीं की गई हैं। उनके कार्यक्रम के बारे में विज्ञप्ति उनके कट्टर समर्थक एवंजिला भाजपा के उपाध्यक्ष सुदामा गुप्ता ने जारी की हैं। हालांकि बालाघाट जिले में जिले के संगठन ने उनसे किनारा कर लिया था लेकिन सिवनी के बारे में कहा जाता हैं कि यहां कोई ऐसी स्थिति बनने की संभावना नहीं हैंं।यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि प्रहलाद पटेल सिवनी लोकसभा क्षेत्र से चार बार चुनाव लड़ चुके हैं जिसमें उन्हें दो बार जीत हासिल हुई हैं और दो बार वे चुनाव हारे हैं। इसके बाद वे बालाघाट से सांसद चुने गये थे और केन्द्रीय मन्त्री भी बने थे। इसलिये इन क्षेत्रों में उनकी काफी पकड़ मानी जाती हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में व्याप्त चर्चा के अनुसार अब अभी तक भाजपायी राजनीति में दरकिनार पड़े उनके समर्थकों के दिन फिरने में भी कोई समय नहीं लगने वाला हैं। अब देखना यही हैं कि जिले के भाजपा नेताओं में से कौन कौन किस किस बहाने से उनके कार्यक्रम से किनारा करता हैं और कौन कौन बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता हैं। लेकिन इतना तो तय है कि प्रहलाद पटेल के कारण भाजपायी समीकरणों में बदलाव अवश्य आयेगा।

पड़ोसी होने नाते हरवंश से सहयोग मिलने की बात कही गौरी भाऊ ने-जिला अधिवक्ता संघ के तत्वावधान में प्रदेश स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।इस के समापन समारोह में मन्त्री गौरी शंकर बिसेन,विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह एवं विधायक द्वय नीता पटेरिया और कमल मर्सकोले के अलावा नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी भी उपस्थित थे। मुख्य अतिथि की आसन्दी से बोलते हुये मन्त्री बिसेन ने यह कहने में कोई संकोच नहीं किया उनसे जब कहीं गड़बड़ हो जाती हैं तो एक पड़ोसी के नाते हरवंश सिंह जी का उनको सहयोग मिलता हैं जबकि अध्यक्ष रोहाणी जी जरा सख्त मिजाज रहते हैं। वैसे भी नये परिसीमन के बाद हरवंश सिंह और गौरीशंकर बिसेन के क्षेत्र सीमायें और नजदीक आ गईं हैं। पिछले विस चुनाव के बाद केवलारी में जब भाजपा हारी थी तो कई कार्यकत्ताZओं ने खुलकर भीतरघात के आरोप भी लगाये थे जिसकी चपेट में कई बड़े नेता भी आ गये थे। वैसे भी इस जिले में कांग्रेस और भाजपा नेताओं की नूरा कुश्ती के आरोप कोई नये नहीं हैं। पहले भी कई नेताओं पर हरवंश सिंह से सांठ गांठ के आरोप लगते रहें है।

एक ही मंच पर काफी दिनों बाद दिखे हरवंश और नीता-वकीलों के ही इस कार्यक्रम सम्भवत: हरवंश सिंह के विधानसभा उपाध्यक्ष बनने के बाद विधायक नीता पटेरिया पहली बार विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन दिखीं। इस बाबद एक स्थानीय अखबार ने टिप्पणी भी की हैं कि ऐसी क्या बात हैं कि वे इस मंच पर शामिल हुयीं। वैसे तो विस चुनाव के चलते तक कहीं कोई विरोध नहीं दिख रहा था जबकि दोनेां ही अलग अलग पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे।ना तो हरवंश सिंह को सिवनी से कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे प्रसन्न मालू की कोई चिन्ता दिखी और ना ही नीता जी को केवलारी से भाजपा से चुनाव लड़ने वाले ढ़ालसिंह की कोई चिन्ता फिकर दिखी। फिर दोनों के चुनाव जीतने बाद ऐसा ना जाने क्या हो गया कि दोनों एक दूसरे को फिलहाल फूटी आंख नहीं सुहा रहें हैं। हालांकि इतने के बाद भी आमानाला कांड़ का चालान तो पेश नहीं ही हो सका हैं जिसमें हरवंश पर धारा 307 का आरोप लगा था। लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं हैं कि नीता जी ने हरवंश सिंह के किसी भी कार्यक्रम में भाग नहीं फिर चाहे वो राष्ट्रीय कार्यक्रम हों या फिर प्रदेश का स्थापना दिवस समारोह हो। इस बात की परवाह किये बिना कि इसके परिणाम क्या होंगें र्षोर्षो वे अपने इस निर्णय पर अड़िग रहीं। इसीलिये लोग वकीलों के इस कार्यक्रम में,जिसकी अध्यक्षता हरवंश सिंह कर रहे थे ,वे क्यों शामिल हुयीर्षोर्षोइसके लोग कारण तलाश रहें हैं। कुछ लोग इसे अच्छे सम्बंधों के बनने की शुरुआत मान रहें हैं तो ज्यादातर लोगों का यह मानना हैं कि चूंकि वे स्वयं भी वकील रहीं हैं तथा इस आयोजन में उनके भी कई समर्थक सक्रिय रूप से शामिल थे इसलिये वे विशिष्ट अतिथि के रूप में इस कार्यक्रम में शरीक हुयीं थी। इसमें राजनीति तलाशने की गुजाइश नहीं मान रहें हैं। अब वारस्तविकता क्या हैंर्षोर्षो यह तो समय ही बतायेगा।

सपा के प्रदेश अध्यक्ष ने इंका भाजपा को कोसा आम सभा में -कई दिनों बाद इंका और भाजपा के अलावा किसी अन्य दल की गतिविधियां दिखायी दी। मौका था सपा के प्रदेश अध्यक्ष गौरी सिंह यादव के नगर प्रवास का। उनके इस एक दिवसीय प्रवास के दौरान नये बस स्टेन्ड के सामने आम सभा रखी गई थी। सपा के जिला अध्यक्ष धर्मराज सिंह ठाकुर केवलारी विस क्षेत्र के पलारी इलाके के हैं। आप इस क्षेत्र में भारी संख्या मेंरहने वाले किरार समाज के हैं जो कि भाजपा के प्रति समर्पित मानी जाती हैं। श्री ठाकुर ने इंका के दिगग्ज हरवंश सिंह के खिलाफ चुनाव भी लड़ा था। लेकिन चुनाव हारने के बाद गतिविधियां शून्य सी ही हो गईं थी। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष के दौरे के दौरान ना केवल झंका मंका ठीक ठाक था वरन लोग भी जुटे थे। अपनी रणनीति के तहत सपा नेताओं ने कांग्रेस और भाजपा को बराबरी से कोसा लेकिन स्थानीय नेतृत्व को हाथ लगाने की जरूरत भी नहीं समझी। पड़ोसी जिले बालाघाट के लांजी क्षेत्र के पूर्व विधायक किशोर समरीते ने भी सभा को संबोधित किया। कुल मिलाकर कई दिनों बाद किसी तीसरे मोर्चे के राजनैतिक दल की उपस्थिति ठीक ठाक हीरही।वैसेभी बसपा,सपा,कम्युनिस्ट,राजद,जदयू आदि राजनैतिक दलों की उपयोगिता इस जिले में कांग्रेस को हराने और भाजपा को जिताने भर की हैं। जीत दर्ज करने लायक स्थिति बनाने में ना तो अभी तक इन राजनैतिक दलों ने और ना ही इनके आकाओं ने कोई कारगर प्रयास किया हैं। हां जीत सकने वाली सीटों के लिये रसद जुटाने के काम भले ही आ जायें तो यही बहुत हैं।

क्या हुआ तेरा वादा मनमोहन-ब्रज की दुनिया

आज अभी-अभी लौटा हूँ वहां से जहाँ जाकर आदमी का दिमाग परम शांति की अवस्था में पहुँच जाता है.मेरा मतलब है कि मैं शौचालय से आ रहा हूँ.वहीँ विश्रांति अवस्था में बैठे-बैठे मेरे दिमाग में एक आइडिया ने जन्म लिया.रफ़ी साहब का गाया प्रसिद्ध गीत क्या हुआ तेरा वादा का कैसेट दिमाग में बजने लगा और एक कविता की रचना-प्रक्रिया आरंभ हो गई.जहाँ १९७७ में हम किसी से कम नहीं फिल्म में यह गाना ऋषि कपूर ने काजल किरण के लिए गाया था मैंने इसे भारत के कथित प्रधानमंत्री और भ्रष्टाचारियों के दल के कथित ईमानदार सरदार सरदार मनमोहन सिंह के लिए लिखा है.भाषा सरल है,शब्द आसान हैं.इसलिए उम्मीद करता हूँ कि आपको न तो इस गीत को समझने में ही परेशानी होगी और न ही गुनगुनाने में दिक्कत.मूल गीत जिसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था इस प्रकार है-
क्या हुआ तेरा वादा
वो कसम वो इरादा;
भूलेगा दिल जिस दिन तुम्हें
वो दिन जिंदगी का आखिरी दिन होगा
क्या हुआ तेरा वादा
याद है तुझको,तूने कहा था
तुमसे नहीं रूठेंगे कभी
दिल की तरह से हाथ मिले हैं
कैसे भला छूटेंगे कभी
तेरी बाहों में बीती हर शाम
बेवफा ये भी क्या याद नहीं
क्या हुआ..
ओ कहने वाले मुझको फरेबी
कौन फरेबी है ये बता
ओ जिसने गम लिया प्यार की खातिर
या जिस ने प्यार को बेच दिया
नशा दौलत का ऐसा भी क्या
के तुझे कुछ भी याद नहीं
क्या हुआ...
मेरे द्वारा इसके तर्ज पर रचित गीत कुछ इस प्रकार है-
क्या हुआ तेरा वादा
वो कसम वो इरादा
भूल गए तुम तुमने कहा था
कि दिसंबर तक महंगाई हो जाएगी कम
क्या हुआ...
याद है तुझको तुमने कहा था
कि सीडब्ल्यूजी के दोषियों को दिलवाओगे सजा
मजे में फ़िर क्यों है घोटालेबाज कलमाड़ी
सीबीआई है क्यों लाचार
अगले चुनाव में हम मांगेंगे तुमसे इसका जवाब
क्या हुआ...
हम तो समझे थे यह कि
कम-से-कम तुम हो ईमानदार
चालीस चोरों के अली बाबा
हो तुम मेरे प्यारे सरदार
उम्मीदें हमारी टूटी क्यों जालिम
देश है क्यों अराजकता का शिकार
क्या हुआ...
आम आदमी को किया था रोटी का वादा
कहा था अब हर हाथ को मिलेगा काम
हर बच्चे को दोगे शिक्षा मुफ्त में
किसान को मिलेगा फसल का दाम
आम आदमी के नारे पे जीते थे तुम
बेवफा ये भी तुम्हें याद नहीं
क्या हुआ...
चीनी रानी पहुंची ३५ पर
९० की हो गई अरहर की दाल
प्याज रूलाए ५० पर जाकर
तेरे मंत्री उडाएं माल
फरेबी शर्म क्यों नहीं आती तुझे
चुल्लू भर पानी में डूब मरो
क्या हुआ तेरा वादा
वो कसम वो इरादा;
भूलेगा दिल जिस दिन तुम्हें
वो दिन जिंदगी का आखिरी दिन होगा
क्या हुआ तेरा वादा
तो कहिए कैसी लगी राम प्रभु द्वारा मुझसे करवाई गई यह संगीतमय शरारत?वर्तमान परिस्थितियों पर सटीक टिपण्णी है न यह गाना.

3.1.11

ये मेरी भावनाएं...


सुनों ये मृदु हैं,
सोम्‍य, नर्म और बुद्धिहीन हैं.
इन्‍हें देखो
ये मेरी भावनाएं हैं.
अरे-अरे छूओ नहीं,
कुछ कमजोर भी हैं ये.
तुम बस इन्‍हें देखो...
देखो कुछ देर यूं ही,
क्‍योंकि वे जरा संकोची भी हैं,
लचीली और बेहद कोमल,
महसूस करो इनकी
मृदुलता को, सोम्‍यता को
और,
अट्हास करो इनकी बु‍द्धिहीनता का...
अंत में इन्‍हें छूना,
इनसे खेलना,
इन्‍हें चूमना,
तोड़-मरोड़ कर इनके बदन को,
कर देना इनका बलात्‍कार,
वह भी एक नहीं,
कई कई बार,
ताकि ये डर, सहम कर जाएं बैठ
कोने में कहीं,
और दोबारा न कर पाएं
किसी पुरुष संग जुड़ने का दुस्‍साहस...
अनिता शर्मा

'सी.एम.ऑडियो क्विज़-4'- की प्रथम विजेता - 'सुश्री शुभम जैन जी'

आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं --- क्रिएटिव मंच
'नूतन वर्ष करें अभिलाषा, नयी उमंगें नयी हो आशा,
मिलजुल कर रहें सदा, बोलें बस एक प्यार की भाषा'
नव वर्ष में हर दिन हो खुशियों की भरमार,
हो निर्मल मन नेक इरादे पायें सबका प्यार
-----अल्पना वर्मा-----


'सी.एम.ऑडियो क्विज़-4' का रिजल्ट देखने के लिए क्लिक करें।

नई सदी की ग़मगीन शाम..

नई सदी का नया सवेरा नया वर्ष,नया उत्साह,नया हर्ष,नई उम्मीदें,आशा की नई किरण....जो कल था वो आज नहीं रहा,और जो आज समय है वो कल नहीं रहेगा...वक़्त तो अपनी रफ़्तार से दौड़ता ही रहता है....लेकिन जो वक़्त कि रफ़्तार के साथ कदम मिला के चला,वही तो बनता है सिकंदर... लेकिन पत्रकारिता विश्वविध्यालय का एक योद्धा दौड़ने के पहले ही कदम ठिठका कर खड़ा हो गया....दोस्तों ने कहा..तुझे चलना होगा....तुझे पत्रकारिता जगत को नया आयाम देना है...तुझे बोलना होगा...उठाना होगा...मौत से जीतना होगा....लड़ना है जमाने से....देखो पूरा विश्वविद्यालय बुला रहा है तुम्हे...उठो मनेन्द्र....चलो....परिक्षये ख़त्म हुई....घर पर सब इंतजार कर रहे है.......जाने नहीं देंगे तुझे...जाने तुझे देंगे नहीं....मां ने ख़त में क्या लिखा था...जिए तू जुग-जुग ये कहा था....चार पल भी जी न पाया तू........लेकिन वो ऐसे नीद के आगोश में सोया की फिर उठ नहीं पाया......

अभी कल की ही तो बात है,जब मैंने नई सदी का नया सवेरा की मंगल कामना की थी....मगर अफ़सोस की पत्रकारिता विश्वविद्यालय से समय ने एक ऐसा योद्धा छीना....जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता....

भोपाल के रेडक्रास अस्‍पताल में इलाज के दौरान पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय के एक होनहार छात्र हम सबको छोड़कर चला गया. वह विज्ञान पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था. छात्र के सहपाठियों ने इलाज करने वाले डाक्‍टर पर गलत इंजेक्शन लगाने का आरोप लगाया है. डाक्‍टर उक्‍त छात्र की मौत हार्ट अटैक के चलते होने की आशंका जता रहे है. पुलिस ने छात्र के शव को पोस्‍टमार्टम के लिए हमीदिया अस्‍पताल भेज दिया है.

रचना नगर में रहने वाले छात्र मनेंद्र पांडेय (28 वर्ष) को अचानक सीने में दर्द हुआ. जिसके बाद उसे इलाज के लिए रेडक्रास अस्‍पताल में भर्ती कराया गया. दर्द तेज होने पर वहां मौजूद डाक्‍टर अजय सिंह ने उसे इंजेक्शन लगाया. इसके करीब पंद्रह-बीस मिनट बाद मनेंद्र की मौत हो गई. मनेंद्र को इसके पहले भी सीने में दर्द हुआ था. जिसे कम करने के लिए उसने दर्द निवारक दवाएं ली थी.

पता नहीं इस नई सदी के आगाज में हम लोगो से कहाँ गलती हुई कि हमारा एक मित्र ऐसे रूठा....कि पूरा विश्वविद्यालय उसके कदमो में बैठा है...पर वह अड़ियल है....किसी कि बात नहीं मान रहा है.....वो हमसे दूर जाने की ठान चुका है....देखो कैसे हाथ छुड़ा के भाग रहा है.....कोई रोको उसे...कोई तो मनाओ.....कोई तो होगा जिसकी बात माने.....एकलव्य जी आप ही समझाए......पी.पी.सर आप ही आदेश दो इसे...आपकी बात नहीं काटेगा....

लेकिन शायद पी.पी.सर में भी अब मनेन्द्र को आदेश देने की ताकत नहीं बची....सबके गले रुंधे है....सबको मनेन्द्र से विछोह का दुःख है.....लौट आओ मनेन्द्र ...जुबान पर यही लब्ज है.....लेकिन वो जा रहा है...हम सबको अकेला छोड़कर.....

लौट आओ मनेन्द्र....हम चाय पीने चलेगे.....


-कृष्ण कुमार द्विवेदी

छात्र(मा.रा.प.विवि,भोपाल)

ek naye shodh ki jaroorat

एक नए शोध की आवश्यकता है .भ्रष्टाचारी और ह्रदय रोग .जब भी कोई भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़ा जाता है उसके दिल में दर्द शुरू हो जाता है .ऐसा क्यों होता है ? यही शोध क़ा विषय होना चाहिए .जिस जनता क़ा शोषण कर ये लोग इतना बड़ा रोग पाल लेते है वो जनता इनके पकडे जाने पर यह आस भी नहीं रख पाती कि अब भ्रष्टाचार क़ा भांडा फूटेगा मगर कमबख्त भ्रष्टाचारी क़ा ह्रदय बीच में आ जाता है और सारा मजा किरकिरा हो जाता है .इतना पैसा तिजोरियों में छुपा कर रखना भी तो आसान बात नहीं न !इतने भेद ! इतने झूठ  ! आखिर दिल तो दर्द करेगा ही .मेरा सभी शोधार्थियों से नम्र निवेदन है कि इस खास विषय पर गहन शोध कीजिये .सफल होने पर शायद नोबेल पुरस्कार तक मिल जाये .मेरी शुभकामनाये आप सभी के साथ है .

''अपनी माटी'' वेब मंच का दिसंबर-2010 अंक

नए साल के हित बहुत  सी कामनाओं के साथ प्रस्तुत है इस अंक की सामग्री

  • साधक उम्मेदसिंह बैद की कहानी:-पशु-सम्मेलन

  • माणिक की कविता:-अब अकुलाते है मुद्दे समाज के

  • आयोजन रपट:-''संस्कृति को और आगे ले जाने की जरूरत''...

  • आयोजन रपट:-''पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बने कानून...

  • पच्चीस सदस्यों का दल स्पिक मैके पटना अधिवेशन हेतु ...

  • आयोजन आमंत्रण:- एस.के. पंजम की कृतियों का विमोचन

  • आयोजन रपट ''आदिवासी कीमत पर देष का विकास नहीं चाहि...

  • डॉ. मंगत बादल को केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार-...

  • पुस्तक समीक्षा:-''रचना में समाज का निर्मित होना''-...

  • आयोजन ;-कुम्भलगढ़ महोत्सव इक्कीस से

  • समाचार:-पी.एच.डी बनाम नेट: एक राहत भरी खबर

  • आयोजन रपट:-''समय की सचाइयाँ और मीडिया'' विषय पर पर...

  • पंकज त्रिवेदी का निबंध :-रंग और समुद्र

  • श्रृद्धांजली -हिंदी खेल पत्रकारिता का स्तम्भ ढह गय...

  • प्रस्तावना :--11 वां राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन 2...

  • आयोजन रपट:-हिन्दू कालेज में अज्ञेय पर राष्ट्रीय सं...

  • गीत:-चितौड़ के ही दिलीप गांधी द्वारा सध्य रचित

  • आयोजन आमंत्रण:-हिन्दू कोलेज में अज्ञेय पर संगोष्ठी...

  • पुस्‍तक समीक्षा:-लोक.मिथक यात्राएं जीवन और गद्य

  • पत्रिकाओं के अंक:-''संवेद'' और ''सब लोग''

  • आयोजन रपट:-इतिहास में ढूंढें वर्तमान के हल :-रेणु ...

  • आयोजन आमंत्रण :-स्पिक मैके का हेरिटेज वॉक चित्तौड़...
  •   मासिक रूप से हमारा पत्र पाने हेतु यहाँ अपना ई-मेल पता भर कर क्लिक करिएगा. :
       - सादर,
                         - माणिक;संस्कृतिकर्मी
                         - C/o कांती लाल जी बंडी,डी-39,पानी की टंकी के पास,
                         - कुम्भा नगर,चितौडगढ़ (राजस्थान)-312001
                         - Cell:-09460711896,http://apnimaati.com
                         - http://apni-maati.blogspot.com/              


    चंद नन्द और चूतिया की घोड़ी

    मित्रो

    नव-वर्ष २०११ की आप सभी को शुभ-कामनाये,

    आशा करता हूँ कि यह वर्ष सभी को ज्यादा सुख , ज्यादा कमाई (सफ़ेद और काली दोनों मलाई ) का अवसर देगा ,
    जो किन्ही भी कारणों से नही खा पा रहे हो सफ़ेद के संग काली मलाई , उन्हें अवश्य सर्वजन हित में संसद से गैर-भ्रष्टाचार  कानून पास कराकर उठा ले जाय सी.बी.आई.........!!
    खैर मुद्दे पर आता हूँ...
    वर्षों पहले जब कुछ काल-पात्र-स्थान मुझको दुखित कर रहे थे तो उन्ही परिस्थित जन्य कारणों से उपजे आवेग में उक्त पंक्तिया मेरी डायरी के पन्नो में संकलित हुयी थी , और उस समय की अपनी ज्यादा लपलपाती जिह्वा से मैंने इसका बहुत बार प्रसार कर काफी तारीफे भी बटोरी थीं (अपने जैसे ही प्रताणित जनो से), शायद इसी कारण से ये पंक्तिया बार बार मेरे मानस पटल छाई रहती हैं ।
    पर जब मैंने ब्लॉग लिखने का फैसला किया तो सबसे पहले मुझे सलाह दिया गया कि ब्लॉग पर कुछ भी लिखना मगर चंद नन्द और घोड़ी या उसके जैसा और कुछ मत लिखना... और मैंने भी उक्त सलाह को गाँठ बांध कर रख ली थी... मगर देश-समाज-धर्म-राजनीति और रोजी-रोटी से जुड़े हालात को देखते देखते ना जाने कब और कैसे वो गाँठ कहीं चुपके से खुल गयी...
    तो अंतत: आज आपके समक्ष ब्लाग पर भी प्रस्तुत है... "चंद नन्द और चूतिया की घोड़ी जनाब"
    वैसे आपको सजग कर दूँ कि "चूतिया" शब्द हमारे लखनऊ में सामान्यतया मूर्खों के लिए प्रयोग किया जाता है  पर जिस जगह पर रहकर मै ब्लाग अपडेट कर रहा हूँ वहां के लोग इसका मनमाना संधि-विच्छेद कर के इसे गाली में गिनते है .. अब आप चाहे जो समझे एक चूतिया की घोड़ी के हाथो तीर कमान से निकल रहा है.......तो आप मेरे तीर पर अपनी नजरे इनायत कीजिये.....

    चंद लोग चूतिया होते है ,
    उनसे आगे चूतिया-नन्द भी होते है ,
    और जब-जब ऐसे चंद चूतिया ,
    या फिर उनके नन्द चूतिया ,
    तलवे चाटकर या किस्मत से ,
    भूले भटके सत्ता में होते है ,
    तो फिर चारो तरफ जहाँ तक ,  
    उनकी भूंखी-नंगी दृष्टि पसरती है ,
    और फिर जिनकी किस्मत के ,
    वो बन जाते है भाग्य विधाता ,
    वो सब जन आखिर मजबूरन या ,
    स्वयं अपनी इच्छा से जुटते है ,
    जब जब उनके रथ के आगे ,
    तो फिर हाल देखकर उनका ,
    जग देता है उन्हें एक ख़िताब ,
    है अगर चूतिया स्वामी तेरा ,
    तो फिर क्यों ना हुए आप
    चूतिया की घोड़ी जनाब ।।
     © सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG

    2.1.11

    तेरे जैसा यार कहाँ कहाँ ऎसा याराना.........


    तेरे जैसा यार कहाँ कहाँ ऎसा याराना....... लगभग बीस वर्षों पूर्व ली गयी इस तस्वीर में, बाँये से - कवि विनय सौरभ, शहंशाह आलम, अविनाश ( मोहल्ला लाइव) एवं ऊपर पसरे अरविन्द श्रीवास्तव।
    नये वर्ष में इससे बेहतरीन तोहफ़ा और क्या हो सकता है मित्रों के लिए..
                                                                                 - अरविन्द श्रीवास्तव

    नई सदी का नया सवेरा

    नया वर्ष,नया उत्साह,नया हर्ष,नई उम्मीदें,आशा की नई किरण....जो कल था वो आज नहीं रहा,और जो आज समय है वो कल नहीं रहेगा...वक़्त तो अपनी रफ़्तार से दौड़ता ही रहता है....लेकिन जो वक़्त कि रफ़्तार के साथ कदम मिला के चला,वही तो बनता है सिकंदर...
    पुराना साल,हर साल की तरह कुछ खट्टी मीठी यादें छोड़ गया...कुछ अनसुलझे सवाल,गुत्थियाँ भी...जिनको हम आगे आने वाले समय में विचार कर सकें,और सही डगर पर चल सकें.....इस साल की शुरुआत के साथ एक ख़ुशी और...की इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक की शुरुवात भी हो गई.....जैसा पहला दशक निकला समाज में कुछ विसंगतियों के साथ,कुछ नए अनुभवों के साथ गुजरा....इस दशक की एक अनसुलझी गुत्थी आरुशी हत्याकांड...जिसमे सी.बी.आई. ने भी हाथ खड़े कर दिए...इसे अपराधी की शातिरता कहें या सी.बी.आई. की नाकामी...खैर...एक उम्मीद कि ये नया दशक भी कुछ उसी तरह या उससे बेहतर साबित हो.....
    मुझे याद है कि जिस समय इक्कीसवीं सदी के पहले दशक कि शुरुआत होने वाली थी,उस समय मै कक्षा सात में पढने वाला गाँव का एक भोला सा आम लड़का था...जिसकी न एक अलग सोच थी...न विचार...हाँ...नए साल से एक उम्मीद जरूर थी...कि शायद दुनिया ख़त्म नहीं होगी...क्यों कि उस समय भी ये अफवाह जोरों से चल रही थी कि १ जनवरी २००० को दुनिया ख़त्म हो जायेगी....लेकिन तर्क किसी के पास नहीं था......लेकिन समय गया...गुजरा ...दुनिया आज भी कायम है....समय आज भी अपनी गति से चलायमान है....लेकिन अब २०१२ का भी दर लोगों के ज़ेहन में है.....लेकिन हम भारतीय भी आशावादी है....हम जीतेगे....क्यों कि हम सबमे परिस्थितियों से जूझने का जज्बा है...एक दशक के बाद आज मै एक ऐसे समाज का हिस्सा बन गया हूँ...जिसे अपने अलावा समाज के हर वर्ग के बारे विचार करना पड़ता है...अपने आप में एक सुखद एहसास...हर हिन्दुस्तानी की तरह मुझे भी नए साल से ढेरों उम्मीदें है....
    १-क्रिकेट का वर्ल्ड कप इस बार भारत में आएगा.
    २-भारत विश्व की एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा.
    ३-संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता मिल जायेगी.
    ४-युवाशक्ति अपने होने का एहसास राजनीति में जरूर कराएगी.
    ५-साहित्य लेखन बढेगा.
    ६-पत्रकारिता के वेद व्यासों,और नारदों को सद्बुद्धि आएगी.
    ७-हर गरीब को रोजगार मिलेगा
    8-हर बच्चे को पढने का अधिकार मिलेगा.
    9-चिकित्सा के क्षेत्र में विकास होगा.
    १०-हम आर्थिक रूप से भी मजबूत होंगे.
    इन्ही अपेक्षाओं और उम्मीदों के साथ हम होंगे कामयाब की भावना के साथ सभी लोगों को
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं'


    -कृष्ण कुमार द्विवेदी
    छात्र(मा।रा।प।विवि,भोपाल)

    कविता: प्रतिकार

    राजा सशंकित, प्रजा सशंकित और यह ध्वजा सशंकित,
    सोंचता हूँ देश की धरती, तुझे त्याग ही दूँ ।
    पर, ... ... ...
    (भ्रष्टाचार, राष्ट्रद्रोह के प्रतिकार में यह पूरी कविता जरूर पढ़े)
    http://pankaj-patra.blogspot.com/2010/11/pratikar-poem-by-prakash-pankaj.html


    पिछले  कुछ दिनों से मेरे मन की स्थिति दयनीय थी। चाह रहा था कुछ लिखना पर लिख नहीं पा रहा था। अचानक उस रात फूट परे ये शब्द। करुण स्थिति में लिखी गई यह कविता समाज के कुछ ऐसे (कु)ख्यात प्रकार के लोगों को समर्पित है जो की "निम्न" हैं :

    अनुच्छेद।।१।।  कलमाड़ी, अशोक चव्हाण, ए. राजा और उन जैसे भ्रष्ट लोगों के लिए।
    अनुच्छेद।।२।। आई.आई.पी.एम  के चोटी वाले उन जैसे अन्य शिक्षा के व्यापारियों के लिए।
    अनुच्छेद।।३।। गिलानी, अरुंधती और उन जैसे अन्य देशद्रोहियों राष्ट्र-विरोधियों के लिए।

    कला और कलाकार

    कला और कलाकार
    दिनांक – 31/12/2010
    राज्य ललित कला एकाडमी लखनऊ मे दिनांक – 1 जनवरी 2011 से लगने वाली कला प्रदर्शनी मे भाग लेने वाले हमारे सभी कलाकार साथीयो को एवं राजिव तिवारी जी, राम बाबू , अनिल शर्मा (दैनिक हिन्दुस्तान) राजेन्द्र करन, को नव बर्ष की सुभकामनाओं के साथ, सादर समर्पित ।
    एक कलाकार होना अपने आप में एक बहुत बड़ी उपल्बधि है। कलाएँ भी बहुत तरह की होती हैं और कलाकार भी बहुत हैं लेकिन कला को समझने वालों की संख्या उसकी तुलना में कम हैं। कला का शाब्दिक अर्थ- कला- Arts , आकार- shape, जो व्यक्ति अपने अन्दर के कला और दृश्य को देख कर अनुभव होने वाली स्थिति या अवस्था को अपने अन्दर से उभार कर बाहर लाने वाला ही सही मायने में एक कलाकार है। एक कलाकार के प्रस्तुति में उसकी क्षमता के अनुसार प्रदर्शित करने का ढंग, प्रस्तुति को मूर्तरुप दे सकने की क्षमता एवं प्रस्तुति की जीवंतता उसके कला के स्तर का मापदन्ड होने के साथ ही साथ कलाकार को शीर्ष तक पहुँचाने का मार्ग प्रसस्थ करता है। दरअसल सभी कलाकारों में मुखतः एक अवस्था सामान्य सी पाई जाती है। वह है, सोचने समझने के स्तर की उच्चता में अन्तर, खुद समझ कर और अनुभव कर अपने कलाकृति के माध्यम से वैसे का वैसा ही उतार कर रख देने की क्षमता या उस स्तर तक अपने आप को पहुँचा पाने की क्षमता की कमी अधिक्तर कलाकारो में एक मुख्य कमी के रुप में एक जैसी है। किसी भी कला को जानने और सीखने के लिए सबसे पहली शर्त यह है कि धैर्य रखना। यह एक साधना है, जो निरन्तर एक ही काम को जब तक सही न बन जाये, सही न करने लगें या सही ना हो जाये तब तक निरन्तर जारी रखने का प्रयास करते रहना ही साधना है। इस तरह व्यक्ति के अन्दर धैर्य बनाये रखने की क्षमता का विकास होता है। दूसरी क्षमता बह है कि किसी भी दृश्य या किसी भी चीज को देख कर आपके सम्पूर्ण अदृश्य अर्न्तआत्मा उसमें प्रवेश कर नस-नस की जानकारी कर वापस पुनः अपनी अवस्था में लौट कर हूबहू वैसा का वैसा बना देना या पेश करना यह मनुष्य के उस कला का चर्मोत्कर्ष अवस्था है। यहाँ तक पहुँच कर एक कलाकार एवं उसकी कला, कला में विलीन होकर अमरत्व को प्राप्त करता है।
    MyFreeCopyright.com "Registered & Protected" ©2010 gkchakravorty.
    Chakravortyg1@gmail.com

    हिन्दू आतंकवाद सच्चाई कम साजिश ज्यादा-ब्रज की दुनिया

    कुछ साल पहले तक मैं अपने हिन्दू होने पर गर्व करता था और सार्वजनिक रूप से कहा करता था कि मेरे धार्मिक स्थलों पर तो हजारों सालों से आतंकी हमले होते रहे हैं लेकिन हमने कभी ऐसा करके आतंक का जवाब आतंक से देने की कोशिश नहीं की.लेकिन जबसे केंद्र में यूपीए की सरकार काबिज हुई है बार-बार उसके मंत्रियों और कांग्रेस के उच्च पदाधिकारियों द्वारा भगवा या हिन्दू आतंकवाद की रट लगाई जा रही है.मैंने इससे पहले भी मुट्ठीभर पथभ्रमित मुस्लिमों की बदमाशी को इस्लामिक आतंकवाद या जेहाद की संज्ञा देने का विरोध किया था.हो सकता है कुछ हिन्दू ऐसे असामाजिक कृत्यों में लिप्त भी हों लेकिन मैं दावे से कह सकता हूँ कि अगर यह सच भी है तो उनकी संख्या गंगा नदी में नमक की मात्रा से भी कम है.फ़िर भी सरकार बार-बार भगवा आतंक की रट लगाकर सारे हिन्दुओं को आतंकी घोषित करने में जुटी है.सरकार को क्या लगता है कि गोब्यल्स की तरह बार-बार झूठ बोलने से झूठ सच में बदल जाएगा.सिर्फ हिन्दुओं की ही नहीं बल्कि समग्र भारतीय संस्कृति सहस्तित्व की नीव पर खड़ी है.हमारे यहाँ धर्म के प्रचार के लिए तलवार का सहारा कभी नहीं लिया गया.मतभिन्नता को हम अपराध नहीं मानते बल्कि समाज का स्वाभाविक गुण मानते हैं,मुंडे मुंडे मति भिन्नाः और हमारे देश में मतभिन्नता शस्त्र द्वारा नहीं वरन शास्त्रार्थ द्वारा दूर की जाती रही है.इसलिए उँगलियों पर गिने जा सकने वाले आततायियों के चलते सभी हिन्दुओं को आतंकवादी कहना शरारत ही नहीं है बल्कि अपराध भी है.क्यों किया जा रहा है ऐसा?इसके पीछे कौन-सी सोंच काम कर रही है और ऐसा करनेवालों को इससे क्या लाभ मिल सकता है?एक साथ कई प्रश्न हिन्दू अस्मिता के आगे मुंह बाये खड़े हैं.अगर हम इतिहास के आईने में झांकें तो १८३५ में भारत में नई शिक्षा नीति और अंग्रेजी शिक्षा को लागू करनेवाले लॉर्ड मैकाले ने इंग्लैंड में बैठे अपने आकाओं से दावा और वादा किया था कि उसकी शिक्षा नीति से प्रभावित होकर अगले ५० सालों में भारत में हिन्दू धर्मं का कोई नामलेवा तक नहीं बचेगा और पूरा भारत ईसाई हो जाएगा.कुछ इसी तरह की मंशा से मिशनरी लॉर्ड कैनिंग को १८५६ में भारत का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा गया था.वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व द्वारा जिस तरह पूरे हिन्दू धर्म को बेवजह बदनाम किया जा रहा है उससे प्रत्येक हिन्दू मन में इस तरह के संदेह उत्पन्न हो रहे हैं और ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है कि कहीं गर्व से कहो हम हिन्दू हैं के नारे को शर्म से कहो हम हिन्दू हैं के नारे में बदलने के प्रयास के पीछे भी कहीं इसी तरह की सोंच तो नहीं काम कर रही है?कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस प्रोपेगेंडा के निर्माता और निर्देशक सोनिया एंड कंपनी यह समझती है कि बदनाम करने से हिन्दू अपने धर्म को लेकर हीन भावना से ग्रस्त हो जाएँगे और धड़ल्ले से करोड़ों की संख्या में ईसाई धर्म अपनाने लगेंगे और अगले १००-५० सालों में भारत से इस धर्म का नामोनिशान ही मिट जाएगा.अगर ऐसा है तो फ़िर यह भी निश्चित है कि सोनिया एंड कंपनी को एक बार फ़िर निराश होना पड़ेगा जैसे भूतकाल में मैकाले और कैनिंग को होना पड़ा था.हिन्दू धर्म कोई गाजर-मूली नहीं है कि कोई भी देसी-विदेशी आए और इसे उखाड़ फेंके बल्कि यह तो खट्ठा-कांरा का वह पौधा है जिसकी पत्तियों में तलवार की धार की तरह की तेजी होती है.मैं ऐसा करनेवालों को सावधान करना चाहूँगा कि इसे उखाड़ने की कोशिश करने की सोंचे भी नहीं क्योंकि उन्होंने अगर ऐसा किया तो उनके खुद के ही हाथ (यह कांग्रेस का चुनाव-चिन्ह भी है) जख्मी हो जाएँगे.

    जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज रामटेक गोटेगांव रेल लाइन के लिये प्रधानमन्त्री से चर्चा कर इस साल बजट में धनराशि आवंटित करने की जनापेक्षा से अवगत करायेंगें। इस हेतु परियोजना का विस्तृत विवरण तथा अब तक इसके लिये चलाये गये आन्दोलनों कह जानकारी भी महाराजश्री को दी गई हैं।

    उक्ताशय की बात इंका नेता आशुतोष वर्मा ने प्रेस को जारी एक विज्ञप्ति में बतायी हें। इंका नेता वर्मा ने आगे उल्लेख किया है कि शंकराचार्य जी के नगर प्रवास के दौरान उन्होंने इस सम्बंध में विस्तार से चर्चा कर यह बताया कि पिछले रेल बजट में इस योजना के लिये सर्वे अपग्रेट करने के लिये राशि आवंटित की गई हैं। महाराज श्री से आग्रह किया गया हैं कि उनका आशीZवाद इस परियोजना को मिले ताकि उनकी तपोस्थली में देश के तत्कालीन प्रधानमन्त्री ने क्षेत्रीय सांसद एवं तत्कालीन केन्द्रीय मन्त्री कु. विमला वर्मा की मांग पर विशाल आमसभा में की गई घोषणा शीघ्र ही पूरी हो सके। रामटेक गोटेगांव नई रेल रेल लाइन की लंबाई 275 कि.मी. तथा लागत 528 करोड़ रुपये आंकी गई थी।

    उल्लेखनीय हैं कि इंका नेता आशुतोष वर्मा की पहल पर सन 2004 - 2005 का रेल बजट पेश होने के बाद जिले में पूरे साल भर सर्व दलीय और सर्व वर्गीय पोस्टकार्ड अभियान चलाया गया था। जिसमें पूरे जिले से लगभग पच्चीस हजार नागरिकों ने संप्रग अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी, प्रधानमन्त्री डॉ0 मनमोहन सिंह एवं रेल मन्त्री श्री लालू यादव को पोस्ट कार्ड लिखकर जनभागीदारी की थी। इसके अलावा जिले के सौ से अधिक राजनैतिक, सामाजिक, व्यापारिक, साहित्यिक, कर्मचारी, पत्रकार और जातीय संगठनों नें पत्र लिखकर सरकार से सौ करोड़ रूपये का प्रावधान करने की मांग की थी। इस अभियान में भागीदारी करते हुये जिले के सांसद विधायकों सहित विभिन्न स्थानीय निकायों के दो सौ सैन्तीस जनप्रतिनिधियों ने पत्र लिखकर बजट आवंटन की गुहार लगायी थी।

    इंका नेता आशुतोष वर्मा ने आगे बताया हैं कि महाराजश्री ने प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह से चर्चाकर इससाल बजट आवंटन किये जाने की जनभावना से अवगत करायेंगें। महाराजश्री के निज सचिव स्वामी सुबुद्धानन्द जी को समस्त दस्तावेज एवं जानकारी भी दी गई हैं।



























    सी.एम.ऑडियो क्विज़ - 4

    happy-new-year-celebration
    "God gives You..
    12 Month of Happiness,
    52 Weeks of Fun,
    365 Days Success,
    8760 Hours Good Health,
    52600 Minutes Good Luck,
    3153600 Seconds of Joy..and that’s all!"

    'नूतन वर्ष करें अभिलाषा, नयी उमंगें नयी हो आशा,
    मिलजुल कर हम रहें सदा, बोलें बस एक प्यार की भाषा'
    नव वर्ष में हर दिन हो खुशियों की भरमार,
    हो निर्मल मन नेक इरादे पायें सबका प्यार
    --- अल्पना वर्मा---


    सी.एम.ऑडियो क्विज़ - "सुनें और बताएं" [क्रमांक- चार]
    क्विज में शामिल होने के लिए क्लिक करें

    नए साल में तीसरे प्रेस आयोग का गठन करे सरकार-ब्रज की दुनिया

    भारत की आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता क्षेत्र का अहम योगदान रहा है.२०वीं शताब्दी की शुरुआत से ही जब स्वतंत्रता आन्दोलन जोर पकड़ने लगा था स्वतंत्रता प्राप्ति तक आन्दोलन का सक्रिय समर्थन करने के लिए पत्रकारों को पग-पग पर प्रताड़ित किया गया.कई पत्रकारों को आजादी के प्रति दीवानगी रखने की गंभीर सजा भी भुगतनी पड़ी और जिंदगी के कई अमूल्य वर्ष जेल की चहारदीवारी में काटने पड़े.इसलिए जब देश आजाद हुआ तो पहली स्वतंत्र सरकार ने पत्रकारों की स्थिति को बेहतर बनाने का प्रयास कर उनके त्याग के प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन किया.नेहरु युग में पहले प्रेस आयोग का गठन किया गया जिसकी सिफारिश पर श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम,१९५५ संसद द्वारा पारित किया गया.अधिनियम में पत्रकारों को बांकी श्रमिकों से अलग विशेष वर्ग के रूप में मान्यता दी गई और उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की विशेष कानूनी व्यवस्था भी की गई.बाद में जनता सरकार ने १९७८ में दूसरे प्रेस आयोग का गठन किया जिसने अपनी रिपोर्ट १९८२ में दी.इसके गठन का मुख्य उद्देश्य आपातकाल (१९७५-77) के परिप्रेक्ष्य में प्रेस की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना था.कुल मिलाकर पत्रकारों के कल्याण के लिए जो भी सरकारी प्रयास किए गए वे नेहरु युग में ही किए गए.देश और सरकार धीरे-धीरे पत्रकारों के सामाजिक योगदान को भूलते चले गए और उनकी सुरक्षा के लिए बने कानूनों का उल्लंघन बढ़ता गया.कितनी बड़ी बिडम्बना है कि आज जब मीडिया महाशक्ति है और उसमें समाज के एक बहुत बड़े तबके को शासन-प्रशासन को अपनी नजर से देखने के लिए बाध्य कर देने की शक्ति समाहित है तब मीडियाकर्मियों की हालत कुत्ते से भी बदतर है.जब चाहा रख लिया जब चाहा निकाल दिया.श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम आज सिर्फ कागजों पर लागू है व्यवहार में कोई भी मीडिया संस्थान इसका पालन नहीं कर रहा.सरकार समय-समय पर प्रेसकर्मियों के लिए औपचारिकतावश नए वेतनमान की घोषणा करती है लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि पत्रकारों को कृतज्ञ भाव से वही लेना पड़ता है जो उन्हें दिया जाता है.अभी कल ही यानी ३१ दिसंबर,२०१० को न्यायमूर्ति मजीठिया की अध्यक्षतावाले वेतन आयोग ने पत्रकारों और गैरपत्रकार प्रेसकर्मियों के वेतन में तीन गुना की भारी बढ़ोतरी की सिफारिश की है लेकिन वास्तविकता तो यह है कि मात्र १०% पत्रकारों को ही इसका लाभ मिल पाएगा.ये भी वे लोग हैं जो अब रिटायरमेंट तक पहुँच चुके हैं.अधिकतर पत्रकार वेतन आयोग की आकर्षक सिफारिशों के बावजूद फांकामस्ती की जिंदगी बिताते रहेंगे.कई बार तो उनका वेतन इतना कम होता है कि एक अकेली जान का खर्च भी नहीं निकल सके.इसके लिए मीडिया समूह कई तरह की चालबाजियां करते हैं.वे नियमित पत्रकारों से यह लिखवा लेते हैं कि वह नियमित पत्रकार है ही नहीं बल्कि अंशकालिक पत्रकार है.इन परिस्थितियों में यह जरूरी हो गया है कि नए प्रेस कानून बनाए जाएँ जिससे अंशकालिक और संविदा पर नियुक्त पत्रकार भी श्रमजीवी पत्रकार माने जाएँ.पेड न्यूज आज की मीडिया की सबसे कड़वी सच्चाई है.बड़े-बड़े मीडिया समूहों के संचालक ही जब पैसे लेकर चुनाव जिताने-हराने का ठेका ले लेते हैं तब फ़िर कस्बाई पत्रकार पैसे लेकर समाचार क्यों नहीं छापे?वैसे भी उनको नियमित वेतन के बदले प्रकाशित समाचार के अनुसार पैसा दिया जाता है.उसकी स्थिति वस्त्रविहीन नंगे आदमीवाली है,नंगा नहाए क्या और निचोड़े क्या?ईधर जबसे नीरा राडिया टेलीफोन टेप प्रकरण में कई वरिष्ठ पत्रकारों की संलिप्तता उजागर हुई है एक नई बहस ने जन्म ले लिया है.कुछ पत्रकार अब सिर्फ लेख या समाचार प्रकाशित-प्रसारित नहीं कर रहे हैं बल्कि वे किसी भी ऐरे-गैरे को मंत्री बनवा सकते हैं और किसी को मंत्री पद से हटवा भी सकते हैं.उनकी सीधी पहुँच आज सत्ता तक है.नीरा राडिया जैसे हाईप्रोफाईल दलालों के निर्देश पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखे और छापे जा रहे हैं.टीवी चैनल से लेकर अख़बार तक में हर जगह विज्ञापनों की भरमार रहती हैं.यूं तो भारतीय प्रेस परिषद् ने इस सम्बन्ध में नियम बना रखा है लेकिन पालन कोई नहीं कर रहा.ऊपर से पैसे लेकर विज्ञापननुमा समाचार भी छापे जा रहे हैं.इन दिनों कई टीवी चैनलों पर अन्धविश्वास बढ़ानेवाले व कामुक कार्यक्रमों की भरमार हैं.भूत-प्रेत,जंतर-मंतर और अंगप्रदर्शन के सहारे उच्चतर टीआरपी हासिल की जा रही है.कुल मिलाकर लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहलानेवाली मीडिया में चौतरफा अराजकता का माहौल है.आश्चर्य है कि जिस संस्था का जन्म ही शासन-प्रशासन पर पहरा देने के लिए हुआ वह खुद ही बिना नियामक का है.अनाथ की स्थिति में है.सरकार ने खानापूर्ति करते हुए भारतीय प्रेस परिषद् का गठन कर दिया है जिसके पास सिर्फ परामर्शदात्री अधिकार हैं.सरकार को चाहिए कि वह भारतीय प्रेस परिषद् को दंडात्मक अधिकारों से युक्त करे.अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो फ़िर प्रेस की आजादी का कोई मतलब ही नहीं है.मीडिया क्षेत्र में पिछले ३०-४० सालों में एक सर्वथा नई प्रवृत्ति ने जन्म लिया है.जिस तरह इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में केन्द्रीयकरण बढ़ रहा है उससे तो यही लगता है कि कुछेक सालों में मीडिया का मतलब दो-चार परिवार मात्र रह जाएगा.इस दिशा में पहल करते हुए एकाधिकार-विरोधी कानून बनाने की सख्त जरूरत है.साथ ही छोटे पत्र-पत्रिकाओं को सरकारी सहायता दी जानी चाहिए.कुल मिलाकर तृतीय प्रेस कमीशन वक़्त की जरुरत है.प्रेस कमीशन को उपरोक्त सभी मुद्दों पर प्रभावकारी सुझाव देने के लिए निर्देशित किया जाए जिससे लोकतंत्र के इस चौथे खम्भे को भरभराने से समय रहते बचाया जा सके और वर्तमान और भविष्य के पत्रकारों के लिए एक सम्मानित और गुणवत्तापूर्ण जीवन सुनिश्चित किया जा सके.

    1.1.11

    यह युग परिवर्तन की भविष्यवाणी के सच होने का समय तो नहीं ? newidea


    स्वामी विवेकानंद ने कहा था  'देश का पुराना गौरव विज्ञान, राज्य सत्ता अथवा धन बल से नहीं वरन आध्यात्मिक सत्ता के बल पर लौटेगा....'

    अब १८३६ में युग परिवर्तन के संधि काल की अवधि १७५ वर्ष को जोड़िए. उत्तर आता है २०११.  यानी हम युग परिवर्तन की दहलीज पर खड़े हैं.... 

    आगे पढ़ें: http://newideass.blogspot.com/


    दिख रहा है बदलाव

    - हो रही है बात...
    बदलाव दिखता है और आज मुझे यह दिखा। सुबह-सुबह अखबार देखे तो एक सुखद अनुभुति हुई कि हिन्दी के समाचार पत्रों में अंग्रेजी नववर्ष के धूम-धड़ाके के बीच सादगी, लेकिन मजबूति के साथ भारतीय नववर्ष और भारतीय परंपरा की बात की गई। ये आवाज और लेखनी आज से कुछ समय पहले तक कहीं गुम थी। दरअसल इसे पाश्चात्य संस्कृति में डूबे दिमागों ने पीछे धकिया दिया था। 
     क ई दिन से अंग्रेजी कलेण्डर बदलने पर समाचार-पत्रों द्वारा विशेष पाठ्य सामग्री प्रकाशित की जा रही थी। नए-पुराने फोटो। साल की खास घटनाएं तो कहीं दशक की खास उपलब्धियां और भी अन्य। नाना-दादा ने इस दौरान अखबार पर अधिक समय खर्च किया। क्योंकि समाचार पत्रों में खूब पठनीय सामग्री उपलब्ध थी। प्रतिदिन नए ले-आउट और प्रयोगवादी प्रस्तुतीकरण के माध्यम से अखबारों ने २०११ के आगमन से पूर्व एक माहौल बना दिया। ऐसा माहौल जैसे २०११ आते ही सबको कुछ न कुछ दे देगा। जैसे खुशियों का सैलाब-सा कहीं से बहकर आ रहा है। मेरी भी कामना है कि २०११ सबके की उम्मीदें, आशाएं और चाहतें पूरी हों।
        दरअसल मेरी प्रसन्नता का कारण आज के अधिकतर समाचार पत्रों के संपादकीय पृष्ठ (संपादकीय पृष्ठ अखबार की आत्मा है) थे। संपादकीय, मुख्य आलेख, अन्य लेख, व्यंग और पाठकों के पत्रों में भारतीय नववर्ष का जिक्र था। कहीं-कहीं तो विशेष आग्रह था कि हमें इस नववर्ष के धूम-धड़ाके में अपने नववर्ष (अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें) को भूलना नहीं चाहिए। हमें अपनी संस्कृति को भी उतना ही महत्व देना चाहिए, जितना हम अन्य को दे रहे हैं अर्थात् हमें इसी उमंग, उल्लास और जोश के साथ चैत्र प्रतिपदा को पडऩे वाले भारतीय नववर्ष का स्वागत करना चाहिए। आज से कुछ समय पहले इस तरह के आलेख और आग्रह न तो समाचार पत्रों में देखे जाते थे और न ही टीवी चैनल्स पर, लेकिन परिवर्तन आया है। हमारे देश की नई पौध अपने गौरव चिह्नों को शनै: शनै: चिह्नित कर रही है। यह पत्रकारिता और साहित्य जगत का सकारात्मक चेहरा है। जिसकी तस्वीर धीमे-धीमे स्पष्ट हो रही है। 
            मेरी ओर से सभी सज्जन लोगों को २०११ की हार्दिक शुभकामनाएं और आग्रह कि अपने नववर्ष को भी इसी जोश-ओ-खरोश के साथ मनाएं, उसका स्वागत करें और माहौल बनाएं।

    नव बर्ष की शुभ कामनाओ सहित .....

    नव बर्ष की बहुत-बहुत शुभ कामना .............
    जो गुजर गया उसे भूल जाते ह़े
    कुछ भूली -बिसरी यादों को ,
    कुछ खुशनुमा पलो को साथ ले
    इक नये सफ़र की शुरुआत करते हे ,
    क्या हुआ गर दिल टूट गया !
    क्या हुआ गर साथ छूट गया!
    दुबारा मिलने की दुआ और नए दोस्तों के साथ
    नये साल की शुरुआत करते हे
    नव बर्ष की सभी मित्रो को बहुत-बहुत शुभकामनाये।

    संगीता मोदी "शमा"


    नव वर्ष की शुभ कामनाये और आने वाला हर दिन आप के लिए मंगलमय सुखमय आनंदमय
    और प्यार से भरा हो .....यही माँ भगवती त्रिपुरसुन्दरी और भगवान श्री कृष्ण से मेरी प्रार्थना हे /
    Sagar tiwari 12.blogspot.com
    mobile-9410227070-virndavan


    नए साल पर दो कविताएं

    सभी पाठकों और ब्‍लागरों को नया  साल मुबारक हो
    

    दार्जलिंग की पहा‍डियों से कंचनजंघा की चोटियों पर सुर्योदय का नजारा
    
          1
    मेरे जीवन का 
    एक वर्ष और
    बीत गया....,
    धूमिल छवि 
    जिसकी
    है मेरे पास
    थोडी खुशियां, थोडे गम
    कहीं जीत, कहीं हार
    यही तो है
    जिनके साए  में
    कट जाती है
    जिंदगी
    एक स्‍वच्‍छंद आकाश
    और है मेरे पास
    जिसमें लिखना है
    मुझे अपना कल
    अपना  आने  वाला कल
    उस कल को
    खुशगवार बनाएगी
    तुम्‍हारी,
    सिर्फ तुम्‍हारी 
     दुआएं 

         2

    नए वर्ष की
    पहली सुबह
    तुम्‍हारी जिंदगी में
    खुशी का  पैगाम
    ले  के आए
    जो हुआ, सो हुआ
    अब यही तमन्‍ना
    आंसू तेरी आंखों में
    न छलक पाए।
    संग चलें हम तुम
    इस नीले गगन के तले
    आओ यही कसम लें,
    हम जीवन पथ पर चलें।
    हो एक दूसरे के
    दिलों पर राज
    चलो कर  लें हम तुम
    यह प्रण आज
    तुम्‍हे मेरी
    गर जरूरत पडे
    मुडकर  पीछे आवाज देना
    मैं सदा तुम्‍हारे साथ हूं।