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9.8.12

बाबा ने शहीदों का अपमान किया


काले धन को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में योग गुरु बाबा रामदेव का आंदोलन शुरू होने से पहले विवादों में घिर गया। रामलीला मैदान में रामदेव के मंच पर देश के अमर शहीदों के साथ रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण की तस्वीर नजर आई। चंद्र शेखर आजाद, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस सरीखे देश के महान सपूतों के साथ बालकृष्ण की तस्वीर ने रामदेव के आंदोलन पर सवाल खड़े कर दिए। मालूम हो कि बालकृष्ण फर्जी पासपोर्ट मामले में जेल में हैं। मिडिया ने जैसे ही यह खबर दिखाई मंच के दोनों ओर लगे पोस्टरों को हटा लिया गया। जाहिर सी बात है कि बालकृष्ण को अमर शहीदों के समकक्ष दिखाने की पूरी कोशिश की गई ! कहीं- -कहीं बालकृष्ण जैसे आरोपी की तस्वीर शहीदों के बीच लगाकर बाबा ने शहीदों का अपमान किया ! मै आज बाबा रामदेव के अनशन की खबर पर लगातार नजर बनाये हुए हूँ क्यूंकि अन्ना की टीम के राजनैतिक विकल्प देने के ऐलान के बाद से पूर्व घोषित आज के अनिश्चितकालीन आन्दोलन की हवा निकलनी तय मानी जा रही है ! कालाधन-भष्टाचार के मुद्दे पर बाबा पहले भी हुंकार भर चुके है आज भी काफी देर तक बोलते रहे ! पिछले साल के आन्दोलन में बाबा को लड़की के कपडे पहन कर भागना पड़ा,इस बार क्या होगा भगवान् जाने ! हालाकि पूर्व नियोजित आन्दोलन की शक्ल को बाबा ने दूसरा स्वरुप दे डाला है ! उन्होंने रामलीला मैदान से तीन दिन का सांकेतिक अनशन करने की बात कही है ! इस बीच सरकार के कानों में जूं रेंगती है तो ठीक नही तो आगे की रणनीति का ऐलान बाबा बाद में करेंगे
         आज बाबा रामदेव करीब एक घंटे से ज्यादा बोले,रामलीला मैदान पर जुटी भीड़ को उन्होंने ऐतिहासिक बताया ! हालांकि देश के कुछ प्रख्यात पत्रकारों ने भीड़ को इकठ्ठा किया जाना बताया ! बाबा के इस आन्दोलन को शक्ति प्रदर्शन का नाम भी दिया गया ! मैंने बाबा को पुरे वक्त सुना,इस बार सिर्फ आवाज भर में दम दिखा ! सरकार के खिलाफ बाबा की नरमदिली उनके बेक फुट पर जाने का साफ़ संकेत दे गई ! इस बार बाबा संभलकर बोले,पिछला अनुभव यकीकन याद था ! बाबा जी ने आज जिन मुद्दों पर जनता से हुंकारी भरवाई उसे लालकृष्ण आडवाणी पहले ही संसद में उठा चुके है ! माना तो ये भी जा रहा है की बाबा जी भाजपा का मुखौटा लगाकर रामलीला के मैदान में केवल लीला कर रहे है !  केंद्र सरकार के खिलाफ हुँकार भरने की शुरुवात ऐसे विवाद में फंसा की बाबा को मिडिया से कहना पड़ा पोस्टर को ज्यादा तूल ना दे,हालाकि खबरे दिखाए जाने के बाद सरकार और रामदेव के विरोधियों को खासा मौका मिल गया है ! मंच से रामदेव ने शहीदों के अपमान पर मंच से कह दिया की देश के लिए शहीद हुए महापुरुषों को काफी प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी ! उन्होंने जेल में बंद अपने सहयोगी बालकृष्ण को जनता का सेवक बताया ! उन्होंने ये तक कह दिया की बालकृष्ण ने जितनी जनसेवा की उसके बदले में दूसरे देश की सरकार नोबेल पुरस्कार दे देती ! कई बाते बालकृष्ण के सहयोग में करने वाले बाबा ने फिर क्यूँ मंच के दोनों और लगे पोस्टर को हटवाया ? क्या बाबा अपने ही निर्णय पर कायम नही है ? क्या बाबा की आन्दोलन के जरिये लीला व्यक्तिगत है ? क्या इस बार बाबा सरकार को घेर पाएगी ? ऐसे कई सवाल है जिनके जवाब जनता जानना चाहती है
                           कालाधन-भ्रष्टाचार का मुद्दा देश हित में है,लेकिन मुद्दे की बागडोर गलत हाथों में है ! हो सकता है मेरी व्यक्तिगत राय से दूसरा कोई सहमत ना हो लेकिन मुझे ये सच लगता है की ये आन्दोलन बाबा रामदेव का व्यक्तिगत आन्दोलन है ! बाबा शक्ति प्रदर्शन के जरिये एक राजनीतिक माहोल बना रहे है ! बाबा देश की हुकूमत को बताना चाहते है की लोग उनके साथ है ! हालाकि पिछली बार बाबा की जो फजीहत हुई उसके बाद सड़क पर कोई जन-विरोध ना होना बाबा की भीतरी ताकत और लोगो के समर्थन का सच दिखा चूका है ! बाबा ने आज गलती की उससे साफ़ हो गया की उनकी दशा-दिशा दोनों तय नही है ! जिन महापुरुषों ने देश में बड़े-बड़े आन्दोलन चलाकर इस मुल्क को आज़ाद करवाया उनकी तस्वीरों के बीच दो आरोपियों की फोटो आखिर किस जनांदोलन की और इशारा करती है ! क्या बाबा रामदेव इस मंच के जरिये भीड़ दिखाकर जेल में बंद फर्जी आचार्य बालकृष्ण को बाहर निकलवाना चाहते है ? क्या बाबा ये बताने की कोशिश में लगे है उनके पास जो अरबो-खरबों की संपत्ति है वो काली नही है ? सवालों से घिरे बाबा जी ने रामलीला मैदान पर अनशन के पहले दिन जो लीला रचाई वो बेहद शर्मनाक और निंदनीय है ! चन्द दिनों पहले टीम अन्ना की भीतरी ख्वाहिश {सियासत} जब बाहर आई तो देश हित के लिए जारी जंग ख़त्म हो गई ! जिस आन्दोलन को देश की दूसरी क्रांति से जोड़कर देखा जा रहा था वो दूसरे साल कहूँ या दूसरी बार १० दिनों में ही ख़त्म हो गया ,टीम अन्ना ने खा देश हित में सियासी विकल्प तैयार किया जायेगा ! यक़ीनन अन्ना भीतर से खुश नही थे इसी लिए उन्होंने ने टीम अन्ना ही भंग कर दी और ये भी साफ़ कर दिया की वो राजनीति के दलदल में कूदकर पाक दामन को दागदार नही करेंगे !   
ऐसे में योग गुरु से देश का गुरु बनने की खवाहिश बाबा की फडफडाती आँखों में दिखाई पड़ती है ! गले से निकलते स्वर उनकी महत्वकांक्षा को बताते है ! मै ये जानने की कोशिश पिछले कई बरसो से कर रहा हूँ की ये बाबा-वो बाबा ना जाने कौन कौन से बाबा आये और नेपथ्य में भी चले गए ! उन बाबाओं ने कभी इस मुल्क की गरीबी या फिर गरीबो पर कोई तल्ख़ टिपण्णी क्यूँ नही की ! क्यूँ किसी बाबा ने सरकार से पूछा की ६४ बरस के आज़ाद हिन्दुस्तान में आज भी कई गाँव के बच्चो को स्कूल की छत नसीब नही हो सकी ? क्यूँ देश का अन्नदाता आत्महत्या कर रहा है ? क्यूँ इस मुल्क में बेटियों को कोख में मारने पर फांसी नही होती ? क्यूँ आज भी देश के गोदामों में अनाज को सड़ने के लिए रखकर एक बड़ी आबादी को भूखे सोने पर मजबूर किया जा रहा है ? मेरे जहन में कई ऐसे सवाल है जिनका जवाब वातानुकूलित मंच पर खड़े होकर इस मुल्क की रहबरी का दावा करने वाले बहरूपिये नही दे सकते !        

SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH


प्यारे दोस्तों,


जन्माष्टमी के पावन अवसर पर सभी हरिभक्तों को एम.के.टीवीफील्म्स की ओर से ढेरों बधाईयाँ और शुभकामनाएं ।


MARKAND DAVE PRESENTS,


"SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH PART- 1 TO 9"


SONG WRITER-COMPOSER-SINGER-MUSIC BY  MARKAND DAVE.


SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH -1.flv


http://youtu.be/Mc1yQ97Jpvk





SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH -2.flv


http://youtu.be/C1IsyvgX2dY


SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH -3.flv


http://youtu.be/_R_oGHOimYA


SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH -4.flv


http://youtu.be/13sRmVOU0mI


SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH -5.flv


http://youtu.be/13sRmVOU0mI


SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH -6.flv


http://youtu.be/sANuo-I9kxc


SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH -7.flv


http://youtu.be/rfO675AAMr8


SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH -8.flv


http://youtu.be/kOJEH_wB3Ls


SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH -9.flv


http://youtu.be/OSKqcLgbcnU


SHRI HARI DHUN--1.flv


http://youtu.be/XHeyFG22NtE





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SHRI KRISHNA DHUN-1.flv


http://youtu.be/fTWNuGNBsqM





SHRI KRISHNA DHUN-2.flv


http://youtu.be/c8IZuB84ako





SHRI KRISHNA DHUN-3.flv


http://youtu.be/ohPBXXJjyKg






8.8.12

कौभांडी नेतागण - सेक्स समस्या ।




(courtesy-Google images)

" हमको अगर कोई छेड़ेगा तो हम छोड़ेगें नहीं ।"
योगगुरु बाबा रामदेवजी उवाच..!!

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प्रिय मित्र,

यह लेख काल्पनिक है ।

साम्यता योगानुयोग है ।

इसका हाल की घटनाओं से कोई लेनादेना नहीं है ।
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मगध के राजा धननंद के दरबार में, ऋषिवर चणक के युवा पुत्र विष्णुगुप्तने अपने राजा को, उनके शासन में प्रवर्तमान भ्रष्टाचार और भ्रष्ट अधिकारीओंके बारे में जानकारी दी, तब विष्णुगुप्त की यह बात राजा धननंद के मन को रास न आयी. राजा को यह बात में अपना अपमान भाव महसूस हुआ और उन्होंने अपने सेनापति को आदेश देकर विष्णुगुप्त को अपने राज्य की सर हद के पार फेंकवा दिया ।

राजा के इस कृत्यसे आहत विष्णुगुप्त तक्षशिला जाकर विद्यार्थीओं को अर्थ शास्त्र पढ़ाने लगे और चाणक्य के नाम से प्रसिद्ध हुए । इधर विलासी राजा धननंदके भ्रष्ट शासन से जनता त्रस्त हो गई, तब चाण्क्यने चंद्रगुप्त की सहायता से मगध में राजा धननंद से सत्ता छीन ली और प्रजा को सुशासन व्यवस्था कैसी होती है, यह बात का परिचय करवाया ।

शायद आज के भारत वर्ष में यही परिस्थिति का फिर से निर्माण हुआ है । रोज़ नये नये भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठानेवालोंकी आवाज़ दबाने के लिए दिल्ली के आका के इशारे पर , संत, साधु और पत्रकारों से लेकर स्वच्छ अधिकारीओंको जिंदा जलाने तक के जघन्य कृत्य को अंजाम दी ये जा रहे है ।

जनता- "महँगाई कब कम होगी?"

नेताजी -" मैं ज्योतिषि नहीं..!!"

जनता-" महँगाई क्यों इतनी बढ़ गई?"

नेताजी-" लोगों की आमदनी और ख़र्च क्षमता बढ़ने की वजह से..!!"

अब आप ऐसे हास्यास्पद बातों का क्या करें । सारे नेतागण करीब करीब करोड़पति हैं, ऐसे में सावन के अंधे को सारी कायनात हरी देखना स्वाभाविक बात है ।

यह सब देखकर मेरे मन में एक सवाल उठा ।

* अगर कई   भ्रष्ट नेताओं  को  बाबा  रामदेवजी और  अण्णाजी की भ्रष्टाचार निर्मूलन की बातें कड़वी लगती हैं, तो फिर बाबा की योग शिबिरमें वह उपस्थित क्यों रहते हैं ?

मेरे मित्र ने इस सवाल का उत्तर दिया की," ये अभी भ्रष्टाचार में पकड़े गये सभी नेतागण को तनाव की वजह से सेक्स समस्या सताती है और वह सब योगासन के द्वारा सेक्स क्षमता वापस पाना चाहते हैं ।

यह उत्तर पाकर, मेरे मन में यह विचार आया, अगर ये भ्रष्ट नेता बाबा जी के पास अपनी सेक्स समस्या लेकर जाते तब यह सब पे गुस्साए बाबा जी उनको कौन सा उपाय बताते?

उपाय काल्पनिक है, फिर भी आप सुनिए ।

बाबा जी - " बताइए नेताजी, आप तो वही एस-बेन्ड वाले इसरो के, दो लाख करोड़ कौभांड वाले हैं ना? आप को क्या समस्या है?"

नेताजी -१," बाबा जी, मेरी सेक्स लाइफ़ समाप्त हो चली है, मानो सभी अंग पर तालें लग गये हैं, मैं क्या करुं?"

बाबा जी -" समझ लीजिए आपको अपनी ही तपास समिति के अध्यक्ष बना दिये गये हैं, अब आप अपने दोनों पैर फैला के, अपना सर नीचे कर के अपना ताला खुद खोलने का योगाभास कीजिए,सब ठीक हो जायेगा । चलो नेक्स्ट?"

नेताजी - २," बाबा जी मैं कोलाबा की आदर्श सोसाइटी कौभांडवाला, मुझे पहचाना?"

बाबा जी - " परिचय बाद में । समय कम है, समस्या क्या है?"

नेताजी -२," बाबा जी, दूसरों के मुकाबले मैं जल्दी क्लाईमेक्स पर पहुंच गया । देश-विदेश के दूसरे भ्रष्ट लोगों का वीडियो देखकर मैं लधुता का अनुभव कर रहा हूँ ।"

बाबा जी -" आप एक काम कीजिए । पर्यावरण वाले `तयराम नरेश` को आपत्ति न हों, ऐसी एकान्त जगह, स्थान ग्रहण करके श्वासोश्वास स्तम्भन की क्रिया करें ।आपका परफोर्मन्स सुधर जायेगा ।  नेक्स्ट?"

नेताजी -३,"बाबाजी, मैं माईन्स और मीट्टीचोरी कौभांडवाला । मेरे इतने सारे प्रयत्न के बावजूद मेरे सारे साथीदारों को संतोष नही हो रहा? क्या करुं?"

बाबा जी -" बचपन में आप मिट्टी में लेटकर खेलते (प्लॅ..!!) थे?"

नेताजी ३ -" हाँ, मैं तीन बार खेला था ।"

बाबा जी," जाइए, अपने सारे साथीदारों के साथ माईन्स और मिट्टी में लंबे समय तक चौथी बार ( 4 PLAY) खेलिए । आप के साथीदारों को परमानंद प्राप्त होगा ।"

अचानक बाबा जी किसी को देखकर, उठ खड़े हुए ।

बाबा जी," आइए,आइए, कॉमनवेल्थवाले दला तरवाडीजी, क्या समस्या है?"

नेताजी ४-" बाबा जी, मेरे पकाये हुए भोजन का स्वाद सभी ने चखा है, अब वही लोग मुझे ब्लॅकमेल की चिट्ठियाँ भेज रहे हैं । मुझे फिर से कारावास में बंद करने की धमकी दे रहे हैं ? मैं हताशा के मारे ठंडा हो गया हूँ ।"

बाबा जी," अरे..!! तरवाडीजी, आप तो बगैर गेम खेले सब को पछाडनेवाले काबिल खिलाड़ी हो फिर भी ठंडे हो गए? आप एक काम करें, सब के सामने, आप अपने एक हाथ की जगह दोनों हाथ का उपयोग करें ।"

नेताजी ४ -(चौंककर)" मतलब?"

बाबा जी," आप ठंडे पड गये हैं ना? सब के सामने आप दो हाथ की हथेली को परस्पर ज़ोर से घींसे? सारा बदन गर्म हो जायेगा । देखो, ऐसे..ऐसे..!! ठीक है?"

नेताजी ५ -" ओँ..ओँ..ओँ..ओँ..!! बा..बा..जी, मैं टू जी स्पेक्टम घोटालेवाला खाजाबाबु..!! मेरी बीबी तलाक चाहती है । कहती है, तुमने अपनी जेब-तिजोरी तो गर्म कर ली,अब ये ठंडे बिस्तर का मैं क्या करुं? ओँ..ओँ..ओँ..ओँ..!! "

बाबा जी,"चुप हो जा । सारे देश को खून के आँसू रूलाकर अब खुद रोता है? मेरे यह शिष्य को साथ ले जा, तेरा बिस्तर गर्म कर देगा ।"

नेताजी ५ (अचानक चुप होकर)" बाबा जी, यह आप क्या बक रहे हो..!!"

बाबा जी," तेरा दिमाग सड़ गया है? ज्यास्ती नहीं समझने का..!! मेरा शिष्य तेरे ठंडे बिस्तर के नीचे आग जला कर गर्म कर देगा । चल अब भाग यहां से..!!"

शिष्य -" बाबा जी, आप जल्दी समाधी लगा लें । मध्यप्रदेशवालें `बकबकविज्यसिंह` आ रहे हैं । फोगटमें आपका सर खपायेगें ।"

बाबाजी," अरे..!! उसे रोकना मत, आने दे और सारे रूममें गुलाबजल छीडक दे । उसे सेक्स की समस्या नहीं है । उसके उदरमें, नेता होनेका अभिमान का गेस भर गया है, आने दे, वायुमूक्तासन कराके उसका सारा गेस अभी नीकाल देता हूँ ।"

MARKAND DAVE. DT: 25/02/2011.

7.8.12

तेरी रुसवाई । (गीत)




(सौजन्य-गूगल)

तेरी रुसवाई । (गीत)  



जब   हमें   तेरी   रुसवाईयाँ   डसती   हैं ।

ज़िंदगी   गहरी   सिसकीयाँ   भरती   है ।

भली-चंगी तो  लग  रही  थीं  अभी  तक !

हम    नहीं,  ये   गुमनामियाँ   कहती   है ।

ज़िंदगी   गहरी   सिसकीयाँ   भरती   है ।

(रुसवाई=बदनामी)

अन्तरा-१

ग़मज़दा  दिल  को  अब,  कुछ  ना  भाता  है ।

रह रह कर  ये   कलेजा,  मूँह   को  आता  है ।

लग  रही   थीं   ये,  आईने   की  रौनक अयां !

हम     नहीं,  धुंधली   परछाईयाँ  कहती  है ।

ज़िंदगी   गहरी   सिसकीयाँ   भरती   है ।

(अयां=साफ)

अंतरा-२.

ग़म  ग़लत  करने  का  बहाना  है  पीना ।

यारों,  जीना   भी   ऐसा, है   कोई   जीना ?

नामुराद ज़िंदगी अब, क्या संभल पायेगी !

हम   नहीं,  ज़बर  मजबूरियाँ  कहती है ।

ज़िंदगी   गहरी   सिसकीयाँ   भरती   है ।

(नामुराद=विफल ; ज़बर=प्रचंड )

अंतरा-३.

मयक़दे  का   साक़ी,  बड़ा   ही  जालिम  है ।

यहाँ    मदहोशी  भी,  लूटने  का  आलम  है ।

लूटा  दे  सब   कुछ, ख़ुदकुशी  भी  कर  लें ।

हम  नहीं,  निगोड़ी गमगिनियाँ  कहती  हैं ।

ज़िंदगी   गहरी   सिसकीयाँ   भरती   है ।

(निगोड़ी=बदनसीब)

अंतरा-४.

पैमाने   फिसलना,  बात   आम   होती   है ।

कभी  न  कभी,  ज़िंदगी  तमाम  होती  है ।

ग़द्दार  सांसो  का  ग़म  मत करना  यारों ?

टूटे  ख़्वाबों  की  बदरंगिनियाँ  कहती  है ।

ज़िंदगी   गहरी    सिसकीयाँ   भरती   है ।

(बदरंग=मलिन)

मार्कण्ड दवे । दिनांक-०६-०८-२०१२.

6.8.12

एक महान आन्दोलन की हत्या-ब्रज की दुनिया

मित्रों,हम भारतीय बहुत ही स्वप्नदर्शी हैं। हमारी आँखों में एकसाथ कई-कई सपने हमेशा तैरते रहते हैं और इस हकीकत को देश में कोई अगर सबसे बेहतर जानता है तो वह है नेता। यही कारण है कि वह कभी गरीबी मिटाने तो कभी बेरोजगारी दूर करने तो कभी भोजन की गारंटी देने का झूठा वादा करके हमारे सपनों को मीठी थपकी देता रहता है। यह वह कौम है जो पिछले 65 सालों से हमारे सपनों के साथ खिलवाड़ करता रहा है और जब तक हम उसके दिखाए सपने से बाहर आते हैं वह हमारे सूबे और वतन को बहुत-कुछ लूट चुका होता है। शायद इसलिए हमारे नेताओं पर हमारे विश्वास का ग्राफ हमारे देश के इन दिनों के विकास-दर की तरह लगातार गोंतें खाता जा रहा है।
                मित्रों,सपनों का सौदागर तो इस बार भी भ्रष्टाचार को मिटाने का सपना अपनी गठरी में लेकर हमारे सामने हाजिर था। परन्तु इस बार परंपरा से अलग सपनों का सौदागर कोई राजनेता नहीं था बल्कि एक प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता था जिसका नाम था अन्ना हजारे। वह और उसकी टीम पिछले डेढ़ सालों से जनता को बार-बार भ्रष्टाचारमुक्त भारत के सुनहरे सपने दिखा रही थी। भ्रष्टाचार से हताश-परेशान लोग उसके झांसे में आ भी रहे थे। वह कभी वन्दे मातरम का नारा ऊँची आवाज में लगाता तो कभी जनता की सहायता से व्यवस्था को बदल देने के दावे करता। इस बार पहले उसके शागिर्दों ने आमरण अनशन शुरू किया और शुरू भी किया तो इस ऐलान के साथ कि वे देश के लिए बलिदान देना चाहते हैं। लोग उसमें और उसकी टीम में शहीदे आज़म भगत सिंह की छाया देखने लगे थे कि तभी उसने अचानक यू टर्न लेते हुए अपना आमरण अनशन तोड़ दिया और सियासत में उतरने की घोषणा कर दी। हालाँकि अभी भी लग ऐसा रहा था कि इस मामले में टीम अन्ना के अन्य सदस्य अन्ना की नहीं सुन रहे थे और अन्ना हजारे स्वयं अभी भी पार्टी बनाकर सियासत में उतरना नहीं चाहते थे। जनता को जोर का झटका लगा वो भी धीरे-से नहीं बल्कि जोर से। भला ऐसा कैसे संभव है कि कल तक जो लोग राजनीति और राजनेताओं से सख्त नफरत करता था आज उनमें से ही एक हो जाना चाहते हैं? क्या यह सारा नाटक,आन्दोलन का तमाम तामझाम,बलिदानी तेवर सिर्फ इसलिए था ताकि संसद में चंद कुर्सियाँ पाई जा सके? क्या सिर्फ इन मुट्ठीभर लोगों के सांसद बन जाने से (अगर वे चुनाव जीत जाते हैं तो) व्यवस्था सचमुच बदल जाएगी?
           मित्रों,इससे पहले भी कभी साम्यवाद,तो कभी समाजवाद तो कभी हिंदुत्ववाद के नाम पर हमें ठगा जाता रहा है। आज राजनीति समाजसेवा का साधन नहीं रहकर एक गन्दा पेशा बन चुकी है। क्या कोई इस गंदे पेशे में आकर भी शुद्ध रह सकता है? असंभव तो यह भी नहीं है लेकिन देश का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य हमें इस बात की ईजाजत भी नहीं देता कि हम टीम अन्ना की बातों पर आँख मूंदकर भरोसा कर लें। इस समय कांग्रेस की हालात देश की अर्थव्यवस्था की ही तरह काफी पतली है और उसके अगले चुनावों में हार जाने के पूरे आसार हैं। वह तभी चुनाव जीत सकती है जब कोई तीसरी शक्ति बीच में आकर मुख्य विपक्षी दल भाजपा के वोट काट ले और वह शक्ति बनने जा रही है जाने-अनजाने में टीम अन्ना। चाहे वह कांग्रेस से अंदरखाने मिली हुई हो अथवा नहीं मिली हुई हो उसके द्वारा राजनीतिक पार्टी के गठन और उसके झंडे तले चुनाव लड़ने से अगर किसी को थोड़ा या बहुत फायदा होने जा रहा है तो वह है महाभ्रष्ट कांग्रेस पार्टी। कुछ इसी तरह बिना होश और भरपूर जोश वाली लड़ाई 1995 में बिहार विधानसभा के चुनाव में आनंद मोहन ने छेड़ी थी और अंततः उससे लाभ उठाया था उनके कथित महाशत्रु लालू प्रसाद यादव ने।
               मित्रों,मैं बार-बार टीम अन्ना से अनुरोध करता रहा हूँ कि वह पहले जनता के बीच जाकर सामाजिक कार्यक्रम चलाए फिर आन्दोलन में उतरे। मैंने उससे यह भी अनुरोध किया था कि वह राजनीति में नहीं आए परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। मैंने उसकी भ्रष्टाचार के अंत के प्रति निष्ठा पर संदेह भी व्यक्त किया था (देखें मेरा आलेख "अन्ना तुम गद्दार तो नहीं हो" ब्रज की दुनिया ब्लॉग पर)। लेकिन सब व्यर्थ! अंत हुआ वही जो नहीं होना चाहिए था। अब अचानक हम जैसे भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के अहितचिंतकों को ऐसा लग रहा है जैसे सबकुछ एकबारगी समाप्त हो गया है। बड़ी मुश्किल से तो जनता ने इस सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर टीम अन्ना पर विश्वास किया था अब निकट-भविष्य में शायद ही वह किसी अन्ना-सदृश व्यक्ति पर विश्वास करे। टीम अन्ना का राजनीति का हिस्सा बन जाना वस्तुतः एक महान आन्दोलन मात्र की उसके जनक द्वारा हत्या नहीं है बल्कि यह जनता के इस पुनीत विश्वास की भी अकाल-मृत्यु है कि भ्रष्टाचार को मिटाया जा सकता है,यह उस जन-आस्था का देहांत है जो यह मानने लगी थी कि अब सत्ता बदलेगी या नहीं लेकिन व्यवस्था बदलेगी। आईये इस पवित्र और महान जनविश्वास की जघन्य हत्या पर हम दो सौ वर्षों का मौन धारण करें। आप भी मेरे साथ स्वर-में-स्वर मिलाते हुए नारा लगाईये-जब तक सूरज चांद रहेगा,अन्ना आन्दोलन तू बदनाम रहेगा। अंत में अन्ना स्टाईल में-वन्दे कुर्सियम.