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23.6.09

पहली प्रेस वार्ता


बात अधिक पुरानी नहीं हे मेने अपना पत्रकारिता का करियर स्वदेश समाचार पत्र से सुरु किया हे .२००८ मई को मेने स्वदेश ज्वाइन किया .मेने वहाप्रेस नोट बनने से सुरू किया और धीरे धीरे अंगे बढ़ रहा था .संपादक लोकेन्द्र पराशर जी के साथ बहुत कुछ सीखा .एक दिन हमारे सिटी चीफ प्रवीण दुबे मुझसे बोले जाओ मराठी समाज की एक पत्रकार वार्ता हे उसे कवर कर लो में अपने अन्दर एक अलग सी स्फूर्ति लिए पारकर वार्ता को कवर करने पहुच गया .वहा देखे की मेरा एक मित्र भी नै दुनिया से आया हुआ था .पत्रकार वार्ता सुरु होने से पहले वहा सभी के सामने नास्ता रख दिया जाता हे ,सभी लोग खाने लगते हे सिर्फ़ एक दो लोगो ने ही प्रश्न पूछा .उसके बाद एक एक करके पत्रकार जाने लगे में वहा से उठकर बहार निकलने लगा तभी एक महाशय ने मुझे आवाज लगाकर रोका और करीब आकर बोले जरा ठहरिये में रुक गया वो महाशय एक पैकेट अंगे करते हुए बोले लीजिये मेने पुछा की इसमे क्या हे तो उन्होंने हसकर जवाब दिया की गिफ्ट हे मेने कहा किस लिए ,तो उन्होंने कहा की सभी के लिए हे .मेने उनसे मन कर वहा से अंगे चल दिया उन्होंने काफी अनुरोध किया लकिन मेने उनकी नहीं सुनी और चला आया .जब में प्रेस बापस पंहुचा तो वहा सभी ने पुछा की कैसी रही पहली पत्रकार वार्ता और क्या गिफ्ट मिला मेने कहा पत्रकार वार्ता ने तो मेरे होश उदा दिए। मेने अपने सर से पढ़ाई के समय सीखा था की अगर आप किसी की ची भी पीते हे तो आप रिश्वत ले रहे हें। लकिन वर्तमान में जो मेने देखा उसे देखकर दंग रह गया। आजकल सभी बड़े से बड़े पत्रकार प्रेस वार्ता में मजे से खाना खाते हे और गिफ्ट ले रहे हे। ऐसे लोग पत्रकारिता का अपमान कर रहे हें.जीवन के इस अनुभव ने मुझे झकझोर दिया। कुछ दिनों तक में बस यही सोचता रहा की अपने आपको सच का पहरेदार कहने वाले ये पत्रकार ऐसा कैसे कर सकते हें। में सभी लोगो से सुझाव चाहता हूँ की किस तरह पत्रकारिता को दूषित होने से बचाया जा सकता हे। मेरा पत्रकारिता में अनुभव कुछ अधिक नही हे लकिन में सीख रहा हूँ।

7 comments:

Sunil Sharma said...

आपको यह अजीब लगता होगा लेकिन यह सच्चाई है कि आज पत्रकारिता में यह सब चलता है बडे़ से बडे़ पत्रकार भी प्रेस कान्फेन्स में जाते हैं गिफ्ट लेकर आते है जम कर खाना खाते हैं। आज छोटे शहरों के पत्रकारों की तरफ अंगुली उठाई जाती है लेकिन सच्चाई यह है कि इस काम में बडे़ शहरों के नामचीन पत्रकार भी शामिल हैं बड़ी बड़ी पार्टियां अटेन्ड करते हैं तथा गिफ्ट भी लेते हैं और न जाने क्या क्या नही लेते यह किसी से छुपा नही है। आप अभी नये हैं धीरे धीरे आदत सी पड़ जायेगी।

Sunil Sharma said...

आपको यह अजीब लगता होगा लेकिन यह सच्चाई है कि आज पत्रकारिता में यह सब चलता है बडे़ से बडे़ पत्रकार भी प्रेस कान्फेन्स में जाते हैं गिफ्ट लेकर आते है जम कर खाना खाते हैं। आज छोटे शहरों के पत्रकारों की तरफ अंगुली उठाई जाती है लेकिन सच्चाई यह है कि इस काम में बडे़ शहरों के नामचीन पत्रकार भी शामिल हैं बड़ी बड़ी पार्टियां अटेन्ड करते हैं तथा गिफ्ट भी लेते हैं और न जाने क्या क्या नही लेते यह किसी से छुपा नही है। आप अभी नये हैं धीरे धीरे आदत सी पड़ जायेगी।

PD soni said...

vijay ji aapke bichar acche he lekin patrakar biradri me yahi ho raha he kuch sathi aqut sampati ke malik bane bethe he to kuch apni do jun ki roti jutane me hi jindgi jugar chuke he abhi aap dhekege ki jin bato ko hamara samaj bura batata he unhi bato se kuch sathi paisa kama rahe he

vipin said...

मै आपको बताना चाहुंगा कि रिर्पोटर की एक इमेज जो हमारे मन मे बनी होती है और जो हमे बाद मे पता चलती है इसमे जमीन आसमान का अंतर होता है। हकीकत ना ही लिखु तो ठीक है। दुसरो की खबर बनाना बहुत आसान होता है और यदि उसी रिर्पोटर की असली जिन्‍दगी को देखा जाये तो होश्‍ उड जाते है आप इसे दुर के ढोल सुहावने जैसी कहावत से समझ सकते है

vipin kumar harit said...

मैं आपको बताना चाहता हुं कि दुर से दिख्‍ने वाले रिर्पोटर हकीकत मे कुछु और ही होते है। वो एक सामान्‍य व्‍यकित से भी अधिक कार्य ऐसे करते है कि जिन पर शर्म महशुश होती है आगे हकीकत ना ही जाने तो ठीक होगा। परन्‍तु जब कमेंट की बात आयी है तो लिख रहा हुं जहां तक मै समझता हुं कि जो लोग दुसरो की खबरे प्रकाशित एवं प्रसरित करते है करके उनको दुसरो के सामने लाते है मिडिया हाउसो मे इसके बिल्‍कुल विपरित होता है दुसरे आंरगेनाइजेशन मे लोग इतने नही सताये जाते है जितने कि मीडिया हाउसो मे।रिर्पोटर की बात को कहने वाला कोई नही, यहां सब कुछ चलता है दोस्‍त जरा सी बात से निराश ना हो, पसंद आये तो बताना । आगे भी बहुत से राज बाकी है समय मिला तो बताउंगा

Anonymous said...

विजय जी, इस अनुभव से गुजरने पर हैरत क्यों? आपने गिफ्ट न लेकर अपने आदर्शों के अनुरूप काम किया। दूसरों के आदर्श आपसे अलग हो सकते हैं या उनके पास कोई आदर्श नहीं भी हो सकते हैं। फिर दूसरों के आचरण से क्यों आहत होना। और जहां तक खाने या चाय-नाश्ते की बात है तो इसे शायद बड़ा मुद्दा नहीं बनाया जा सकता। हां खबर के बदले गिफ्ट लेना जरूर अनैतिक है और आप इससे बचे रहें तो अच्छा। लालच पर जीत के लिए बधाई और शुभकामनाएं कि आप भविष्य में भी ऐसा ही करते रह सकें।
श्रीकांत

shivansh said...

samandar ko samajhana hai to uski tah men tahala kar, sahil per to machalian kapde badalti hain.

dost
agar tumne patrakarita ko apni pahli press confrence se samjhne ki koshish ki hai to ye tumhare liye patrakariy jivan ki anant yatra ka sabse rochak lamha sabit ho sakta hai. dunia ke apne raste, apni manjilen alag ho sakti hai. tay tumhen karna hai ki rasta aur manjilen tumri ho ya dunia jo bataye...wo
salaam