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22.6.09

साहित्यकार पत्रकार

मेरा एक दोस्त
साहित्यकार पत्रकार
तन के लिए पत्रकारिता
मन की भूख मिटाने के लिए
अपनी कल्पना को
कागज पर उतारता है
और मै पत्रकार
सिर्फ़ पत्रकार
ऐसा मानता हूँ
दूसरों का पता नहीं
वो कहानियां लिखता है
पुरस्कार पाता है
लिखता मै भी हूँ
कभी स्क्रिप्ट
कभी स्टोरी
बदले में पुरस्कार तो नहीं मिलता
लेकिन कुछ पैसा मिला जाता हैं
तन के लिए
उसे गुलज़ार से ले कर यादव तक
जानते हैं
मै खुद को खोज रहा हूँ
जानने के लिए
पहचानने के लिए
मन की भूख मिटाने के लिए

शशि शेखर
shekhar2k89@yahoo.com

4 comments:

Dhiraj Shah said...

मै भी इक चित्रकार हु
लोगो के मन देखता हु
भाव देखाता हु
पर
न मन की भुख मिटती
न पेट की भुख मिटती
बस कल्पना करता हु
लोग चन्द पैसे दे जाते है
यही हमारी कहानी......

Anonymous said...

हमारे साथ काम करने वाला एक पत्रकार साथी यतीन्द्र ठैनुआ जो कल तक खवर के लिये दौडता था सभी से मेलजोल रखने में विश्वास रखता था आत्म सम्मान के लिये जीने बाला पत्रकार समाज में एक समाज सेवी बराबर मान सम्मान इज्जत भी नहीं पा सका नव भारत टाइम्स से शुरू हुई उसकी यात्रा कुछ छोटे बडे़ अखवारों में चक्कर काट काट कर गुजर गई। हर बक्त कुछ करने और अपने आप को स्थापित करने की जुगत में लगे रहते रहते एक एसी बीमारी ने उसे जकड़ा कि फिर उसके जाॅल से निकल ही नहीं पाया।
पत्रकारों के संगठन में भी रह कर भी वह अपनों का न हो सका। जीवन भर पत्रकारिता का स्वयं का ओहदा ओढ़े घूमने पर भी समाज पत्रकार को एक समाज सेवा जेसा कार्य तक नहीं मानता है।
ठैनुआ ने अपना शरीर छोडा है कुछ ही दिन की वात है लोगों ने न तो एक पत्रकार के निधन पर शोक संवेदना जताई न ही किसी राजनैतिक पार्टी के नेता ने ही उसके निधन पर उसके घर बालों से वात की न ही उसे कोई शान्तना दी गई और तो और अपनों ने भी उसके लिये दो शव्द लिखे। ठैनुआ ने अपने पीछे छोटे छोटे चार वच्चों को रोते विलखते छोडा है। प्रतिवर्ष पत्रकारों के नाम पर कितने आयोतन होते हैं। किन्तु पत्रकारों के हित व उनके दीन हीनता पर भी किसी को कोई दर्द नहीं आता है। ऐसे न जाने कितने पत्रकार होंगे जो ठैनुआ की तरह ही अन्दर ही अन्दर घुल रहे होंगे। लेकिन झूठी शान की खातिर जिन्दा रहने की जिद लिये जी रहे हैं।
समाज के उन वर्गों सेे टीस का अहसास कराने का प्रयास है कि कमसे कम दिन रात एक करने बाले समाज के हर दुख दर्द को आम जन मानस में प्रकाशित करने व कराने बालों के प्रति भी संवेदनाएं व्यक्त करने से कंजूसी न करिये यह भी समाज का एक हिस्सा हैं सहानुभूति की आवश्यकता है।
सुनील शर्मा

Sunil Sharma said...

हमारे साथ काम करने वाला एक पत्रकार साथी यतीन्द्र ठैनुआ जो कल तक खवर के लिये दौडता था सभी से मेलजोल रखने में विश्वास रखता था आत्म सम्मान के लिये जीने बाला पत्रकार समाज में एक समाज सेवी बराबर मान सम्मान इज्जत भी नहीं पा सका नव भारत टाइम्स से शुरू हुई उसकी यात्रा कुछ छोटे बडे़ अखवारों में चक्कर काट काट कर गुजर गई। हर बक्त कुछ करने और अपने आप को स्थापित करने की जुगत में लगे रहते रहते एक एसी बीमारी ने उसे जकड़ा कि फिर उसके जाॅल से निकल ही नहीं पाया।
पत्रकारों के संगठन में भी रह कर भी वह अपनों का न हो सका। जीवन भर पत्रकारिता का स्वयं का ओहदा ओढ़े घूमने पर भी समाज पत्रकार को एक समाज सेवा जेसा कार्य तक नहीं मानता है।
ठैनुआ ने अपना शरीर छोडा है कुछ ही दिन की वात है लोगों ने न तो एक पत्रकार के निधन पर शोक संवेदना जताई न ही किसी राजनैतिक पार्टी के नेता ने ही उसके निधन पर उसके घर बालों से वात की न ही उसे कोई शान्तना दी गई और तो और अपनों ने भी उसके लिये दो शव्द लिखे। ठैनुआ ने अपने पीछे छोटे छोटे चार वच्चों को रोते विलखते छोडा है। प्रतिवर्ष पत्रकारों के नाम पर कितने आयोतन होते हैं। किन्तु पत्रकारों के हित व उनके दीन हीनता पर भी किसी को कोई दर्द नहीं आता है। ऐसे न जाने कितने पत्रकार होंगे जो ठैनुआ की तरह ही अन्दर ही अन्दर घुल रहे होंगे। लेकिन झूठी शान की खातिर जिन्दा रहने की जिद लिये जी रहे हैं।
समाज के उन वर्गों सेे टीस का अहसास कराने का प्रयास है कि कमसे कम दिन रात एक करने बाले समाज के हर दुख दर्द को आम जन मानस में प्रकाशित करने व कराने बालों के प्रति भी संवेदनाएं व्यक्त करने से कंजूसी न करिये यह भी समाज का एक हिस्सा हैं सहानुभूति की आवश्यकता है।
सुनील शर्मा

Sunil Sharma said...

हमारे साथ काम करने वाला एक पत्रकार साथी यतीन्द्र ठैनुआ जो कल तक खवर के लिये दौडता था सभी से मेलजोल रखने में विश्वास रखता था आत्म सम्मान के लिये जीने बाला पत्रकार समाज में एक समाज सेवी बराबर मान सम्मान इज्जत भी नहीं पा सका नव भारत टाइम्स से शुरू हुई उसकी यात्रा कुछ छोटे बडे़ अखवारों में चक्कर काट काट कर गुजर गई। हर बक्त कुछ करने और अपने आप को स्थापित करने की जुगत में लगे रहते रहते एक एसी बीमारी ने उसे जकड़ा कि फिर उसके जाॅल से निकल ही नहीं पाया।
पत्रकारों के संगठन में भी रह कर भी वह अपनों का न हो सका। जीवन भर पत्रकारिता का स्वयं का ओहदा ओढ़े घूमने पर भी समाज पत्रकार को एक समाज सेवा जेसा कार्य तक नहीं मानता है।
ठैनुआ ने अपना शरीर छोडा है कुछ ही दिन की वात है लोगों ने न तो एक पत्रकार के निधन पर शोक संवेदना जताई न ही किसी राजनैतिक पार्टी के नेता ने ही उसके निधन पर उसके घर बालों से वात की न ही उसे कोई शान्तना दी गई और तो और अपनों ने भी उसके लिये दो शव्द लिखे। ठैनुआ ने अपने पीछे छोटे छोटे चार वच्चों को रोते विलखते छोडा है। प्रतिवर्ष पत्रकारों के नाम पर कितने आयोजन होते हैं। किन्तु पत्रकारों के हित व उनके दीन हीनता पर भी किसी को कोई दर्द नहीं आता है। ऐसे न जाने कितने पत्रकार होंगे जो ठैनुआ की तरह ही अन्दर ही अन्दर घुल रहे होंगे। लेकिन झूठी शान की खातिर जिन्दा रहने की जिद लिये जी रहे हैं।
समाज के उन वर्गों सेे टीस का अहसास कराने का प्रयास है कि कमसे कम दिन रात एक करने बाले समाज के हर दुख दर्द को आम जन मानस में प्रकाशित करने व कराने बालों के प्रति भी संवेदनाएं व्यक्त करने से कंजूसी न करिये यह भी समाज का एक हिस्सा हैं सहानुभूति की आवश्यकता है।
सुनील शर्मा