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10.3.15

नापाक पाकिस्तान को हौंसला देंगे ऐसे इरादे!

-नितिन शर्मा 'सबरंगी'
जम्मू कश्मीर में सरकार बनते ही अलगाववादियों/कट्टरपंथियों/आतंकियों को अच्छी खबर मिली। सरकार का उनके प्रति नरम रूख भले ही देश को झटका दे गया हो, लेकिन विरोधी नापाक मुल्क के लिए खुशी जैसा है। सरकार ने अलगाववादी मसरत को रिहा करके अपने इरादे भी साफ कर दिए। भला कौन सी ऐसी रहमदिली है कि जिस शख्स पर गंभीर आरोप हों, बेगुनाहों की मौत के दाग जिसके दामन पर लगे हों और वह 5 लाख का इनामी रहा हो उसे रिहा कर दिया जाये। 
दरअसल जिस मसरत को रिहा किया गया है वह अलगाववादी हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी का करीबी माना जाता है। मसरत 2008-10 में राष्ट्रवि
रोधी प्रदर्शनों का मास्टरमाइंड रहा है। उस दौरान पत्थरबाजी की घटनाओं में 112 लोग मारे गए थे। मसरत के खिलाफ देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने समेत दर्जनों मामले दर्ज थे। उसे चार महीनों की तलाश के बाद अक्टूबर 2010 में पकड़ा गया था। मसरत पर संवेदनशील इलाकों में भड़काऊ भाषण के आरोप भी लग चुके हैं। मसरत आलम को अक्टूबर 2010 में श्रीनगर के गुलाब बाग इलाके से 4 महीने की मशक्कत के बाद गिरफ्तार किया गया था। गिलानी के करीबी माने जाने वाले मसरत आलम पर दस लाख रुपये का इनाम भी था। मसरत 2010 से पब्लिक सेफ्टी एक्ट यानी पीएसए के तहत जेल में बंद था। उसे बारामूला जेल में रखा गया था
इस रिहाई का न सिर्फ पूरे देश में विरोध हुआ बल्कि सहायोगी पार्टी भाजपा भी घिर गई। ऐसे कदम की उम्मीद किसी को नहीं थी। इतना ही नहीं आतंकियों के लिये कार्ययोजना बनाने पर भी विचोर किया जाने लगा। यह तब ओर भी गंभीर है जब पूरा मुल्क आतंकी घटनाओं से गुजर रहा हो ओर आतंक को रोकने के लिये नई-नई योजनाएं भी बनायी जा रही हों। मुफ्ती मोहम्मद सईद सरकार के प्रति भाजपा भी सख्त रूख दिखा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह कि सरकार ऐसा करके संदेश क्या देना चाहती है। जाहिर है कि मुल्क के प्रति वफा रखने वालों को तो इससे खुशी मिलेगी नहीं ओर मुल्क के प्रति घिनौनी सोच व नफरत रखने वाले खुश होंगे। शर्मनाक ही है कि जिनके दामन पर बेगुनाहों की मौत के दाग हैं उन्हेें आजाद किया जा रहा है। कोई दोराय नहीं कि ऐसे लोग सजा के ही हकदार होते हैं। ऐसे इरादे नापाक पाकिस्तान को भी हौंसला देंगे। जो भारत को हिंसा की आग में झोंकने का मंसूबा हमेशा पाले रहता है। आतंक की नई खेप तैयार करता है।


21.11.12


कसाब की मौत से खुश सच्चे हिन्दुस्तानी
आज सुबह पाकिस्तान की हांडी के सड़े चावल अजमल कसाब की मौत की खबर मिली तो मन सच्चे हिन्दुस्तानी की तरह खुश हो गया कि आखिर देश का दुश्मन 166 लोगों की मौत का जिम्मेदार मर ही गया। उसके शव को जेल में ही दफना दिया गया। कहा जा रहा है कि कब्रिस्तान वालों ने उसके लिये जगह नहीं दी। ठीक ही किया जो नापाक जिस्म को जगह नहीं दी। हालांकि उसे बहुत पहले मर जाना चाहिए था, लेकिन कानूनी अड़चनों के बीच उसे जिंदा रखा गया। अफसोस यह भी कि उसे जिंदा रखने में करोड़ों रूपये खर्च हो गए। उसकी हाई सिक्योरिटी में बहुत खर्चा हो रहा था। यह पैसा जनता था। जेल में रहने के दौरान कसाब में इतना गुस्सा था कि सीसीटीवी कैमरों पर थूकता था। मनचाहा खाना चाहता था। गालियां देता था। नापाक जिस्म को नापाक पाकिस्तान ने लेने से इंकार कर दिया क्योंकि दोगले चरित्र से दुनिया को वह यह नहीं बताना चाहता था कि आतंक का पक्षधर है जबकि दुनिया हकीकत जानती है। वैसे पाकिस्तान खुद भी अब आस्तीन के सांपों आतंकवाद की आग में झुलस रहा है। सवाल उठाये जा रहे हैं कि कसाब की मौत डेंगू से हुई है और सरकार श्रेय ले रही है। अब कसाब डेंगू से मरा हो या फांसी से इससे फर्क भी क्या पड़ता है, उसने मरने से हर हिन्दुस्तानी खुश है क्योंकि उसने कभी ने भरने वाले जख्म दिये हैं। यह संदेश भी जाना चाहिए कि आतंकी हरकतें करने वालों का अंजाम ऐसा ही होगा। अभी ओर भी आतंकी हैं जिन्हें फांसी दी जानी है। दुआ करे जल्द उनका नंबर आये। अफसोस यह भी कि ऐसे गद्दार भी होंगे जो उसकी मौत पर गुपचुप मातम मना रहे होंगे।

27.11.08

कल का ताज और आज का ताजमहल होटल

धधकता ताज महल होटल। आतंकियों ने इस पुराने होटल को अपना निशाना बनाया है।



कुछ माह पूर्व जब मैं मुंबई गया तो ताज में कुछ ऐसी थी रौनक। पर कुछ भी हो ये आतंकी सिर्फ़ जान ले सकते हैं हमारे हौसलों का खून नही कर सकते। उसके लिए अभी और प्रशिक्षण लेने की ज़रूरत है। जय मुंबई जय भारत।

31.10.08

एक बार फ़िर हमारी माँ रक्तरंजित

एक और धमाका, लाल हुई माता,जिम्मेदार कौन ?

एक और धमाका, हमारी धरती रक्तरंजित, इस बार निशाना पूर्वांचल और रक्त रंजित हुआ आसाम। यहां हुए 13 सीरियल ब्लास्टों में कम से कम 66 लोगों की मौत हो गई और दो सौ से अधिक लोग घायल हो गए। सभी विस्फोट कल सुबह 11.30 से 11.40 बजे के बीच हुए। कोकराझाड़ में तीन जगहों पर, गुवाहाटी में पांच जगहों पर और बोंगाईगांव तीन व बरपेटा में दो जगहों में धमाके १० मिनट के दरम्यान हो गए। पूरा आसाम खून से लाल हो गया। भइयादूज को लेकर बाजार में काफ़ी भीड़ भाड़ थी, और नुक्सान आतंकियों के अनुरूप रहा।
पहले सिमी फ़िर बजरंग दल, उसके बाद मनसे यानी की धमाके और विस्फोटों का ठीकडा फोड़ने के लिए सरकार के पास लम्बी फेरहिस्त है और इस बार बारी किसकी जबकी तेज तर्रार उल्फा ने मना कर दिया अपनी भागीदारी से। सरकार इस धमाके के जिम्मेदारी का ठीकडा किसके सर फोडेगी?
पिछले कई महीनो से हो रही आतंकी घटना का नुकसान सिर्फ़ आम आदमियों पर होता है, हजारो की तादाद में आम लोग मारे गए। नुकसान सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारा, जवाबदेह सिर्फ़ और सिर्फ़ निकम्मी सरकार और उसके बेकार हो चुके तंत्र। गोधरा होता है तो फलां दोषी, मालेगांव तो फलां, हैदराबाद, जयपुर, दिल्ली, या फ़िर मुम्बई तमाम घटनाओं पर अगर नजर डालें तो हरेक बार सरकार ने सिर्फ़ पल्ला झाडा है, चंद चूतियों की कमिटी बनी और जांच बिठा दिया, और सरकार के इस चुतियापा में बड़ा बड़ की भागीदार हमारी मीडिया भी रही है, ख़बरों को चुतियापा के स्तर पर संपादित कर सिर्फ़ अपने लाला जी के फायदे वाली ख़बर, लोगों की वास्तविकता से कोसों दूर की ख़बर, और इसको प्रसारित कर बड़े बड़े स्वयंभू पत्रकार बड़े गर्वान्वित होते हैं।
एक बार फ़िर हमारा देश खून से लाल हुआ, किस किस रिश्ते की हत्या हुई ये कोई नही जानता मगर जिम्मेदार नि:संदेह सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारी निकम्मी सरकार के निकम्मे नुमाइंदे हैं जिन्होंने हमारे तंत्र को सिर्फ़ और सिर्फ़ जी हुजूरी करने की सीख दी है और साथ ही इस में बड़ाबड़ के भागीदार तमाम वो मीडियावाले जो ख़बर की जगह अपने संस्थान को सनसनी खबरियागाह बनाते हैं।
बाद में कोई कुछ भी कर ले मगर नुकसान होनेवाले लोगों के लाशों पर राजनीति करनेवाले लोग ही हमारे इस नुकसान के जिम्मेदार हैं.

3.8.08

भड़ास का आतंक

भड़ास के भडासी अंदाज ने बड़े बड़े मीडिया हाउस की नींद उदा दी है, पत्रकारों के शोषण का केन्द्र बना ये बड़े बड़े लाला जी की दूकान का पोल पट्टी भड़ास पर आने के बाद से ही तमाम समूंह में हल चल का वातावरण सा आ गया था, अखबारनवीस के सूचनाओं का भण्डार भड़ास पर होता है जिस से पत्रकारों के सामने विभिन्न रास्ते सामने आते हैं, मगर ये अखबार चलाने वाले लालाओं के के लिए खुली चुनोती सी हो गयी है।
भड़ास का डर अख़बारों में ऐसा समां गया है की अखबार के मालिकान के साथ मालिकों के पिछलग्गू बड़े बड़े पत्रकार व सम्पादकों के आदेश पर कार्यालय से भड़ास प्रतिबंधित करा जा रहा है। पहले हिन्दुस्तान और अब अमर उजाला के पत्रकारों से भडास का अधिकार छीन लिया गया है, अब यहाँ के लोग अपने अपने कम्पूटर पर भड़ास नही देख सकते हैं।
पत्रकार और पत्रकारिता का हित और पत्रकारिता के इनदुर्योधन लाला जी से लड़ने वाला भड़ास धंधेबाजों के लिए एक खतरा सा बनता जा रहा है क्यूंकि इनकी काली कारिस्तानी भड़ास के माध्यम से सामने आ रही है।और इसी तरह आती रहेगी भले ही ये दूकान चलाने वाले लोग और इनके तेल लागोऊ पत्रकार को ये रास ना आए क्यूंकि बड़े मियां ये आपके लाला और अखबार का मोहताज नही है, अधिकार और कर्तव्य के साथ भड़ास पोल पट्टी को सामने लाता रहेगा।

जय जय भड़ास

14.5.08

सुबाना का तो मजहब वो नहीं है.


पाणिनी आनंद बी बी सी

संवाददाता, जयपुर से

मुंबई से नाना-नानी के घर आई एक छोटी सी बच्ची सुबाना. साथ में थी माँ और दो मौसियां. स्कूल बंद था सो गर्मी की छुट्टियों के लिए नानी के घर और जयपुर शहर से अच्छा क्या हो सकता था.
पर मंगलवार की शाम आतंक का जो तांडव जयपुर में हुआ उसके बाद सुबाना की दुनिया बदल गई. माँ का आंचल छिन गया, मौसियां सदा के लिए सो गईं.
सुबाना अपनी मां और दोनों मौसियों के साथ नेशनल हैंडलूम से ख़रीदारी करके लौट रही थी. उसे जल्दी थी घर जाने की और नाना-नानी, भाई को ख़रीदारी का सामान दिखाने की.
पर रिक्शा लेते वक्त एक भीषण विस्फोट हुआ जिसमें सुबाना की माँ और दोनों मौसियों की मौत हो गई.
सुबाना बुरी तरह से घायल है. नाना-नानी की हालत अपनी तीन बेटियाँ खोकर ख़राब है और उन्हें अस्पताल में इलाज कराना पड़ रहा है.
कुछेक रिश्तेदार सुबाना के पास पहुंचे हैं। अब्बा मुंबई से रवाना हो चुके हैं पर सुबाना सदमे में है. कुछ नहीं बोल रही. उसे नहीं पता की अम्मी कहाँ हैं, किस हाल में हैं.

सुबाना की नम और सवाल करती आखों में एक ऐसा मंज़र दर्ज हो चुका है जिसके बारे में सोचना बड़े-बड़ों के लिए मुश्किल है।
सुबाना इस ख़रीदारी के लिए इसलिए गई थी क्योंकि उसे चंद दिनों में वापस अपने शहर मुंबई जाना था और वहाँ जाने से पहले अपने दोस्तों को दिखाने के लिए उसे बहुत कुछ ख़ास ख़रीदना था.
पर अब अपनी जिस्म की चोटों से उबरकर जब सुबाना वापस लौटेगी तो उसके पास बताने के लिए शब्द कम और आंसू ज़्यादा होंगे.
अब सुबाना के लिए जयपुर बदल चुका है. नानी के पास अब शायद इस दर्द भरी सच्चाई से उसका ध्यान बंटाने के लिए कोई परियों, जादुगरों वाली कहानी न हो.
पहली क्लास में पढ़नेवाली सुबाना के लिए शायद गर्मी की छुट्टियाँ और जयपुर शहर अब दोनों ही डरावने हो चुके हैं.
आतंकवाद को सियासतदान चाहे जो भी नाम दें या जिस भी मजहब से जोड़ें, पर सुबाना का तो मजहब वो नहीं
है.

sabhar - B.B.C