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7.3.09

मेरे हिस्से में हरदम जूठन ही आया

८ मार्च, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

महान भारतीय पेंटर राजा रवि वर्मा की पेंटिंग

जब मैं इस दुनिया में आई
तो लोगों के दिल में उदासी
पर चेहरे पर झूठी खुशी पाई।
थोड़ी बड़ी हुई तो देखा,
भाई के लिए आते नए कपड़े
मुझे मिलते भाई के ओछे कपड़े।

काठी का हाथी, घोड़ा, बांदर आया
भाई थक जाता या
खेलकर उसका मन भर जाता
तब ही हाथी, घोड़ा दौड़ाने का,
मेरा नंबर आता।

मैं हमेशा से ये ही सोचती रही
क्यूं मुझे भाई का पुराना बस्ता मिलता
ना चाहते हुए भी
फटी-पुरानी किताबों से पढऩा पड़ता।
उसे स्कूल जाते रोज रूपया एक मिलता
मुझे आठाने से ही मन रखना पड़ता।

थोड़ी और बड़ी हुई, कॉलेज पहुंचे
भाई का नहीं था मन पढऩे में फिर भी,
उसका दाखिला बढिया कॉलेज में करवाया
मेरी इच्छा थी, बहुत इच्छा थी पर,
मेरे लिए वही सरकारी कन्या महाविद्यालय था।

और बड़ी हुई
तो शादी हो गई, ससुराल गई
वहां भी थोड़े बहुत अंतर के साथ
वही सबकुछ पायाथोड़ी बहुत बीमार होती तो
किसी को मेरे दर्द का अहशास न हो पाता
सब अपनी धुन में मगन -
बहु पानी ला, भाभी खाना ला
मम्मी दूध चाहिए, अरे मैडम चाय बना दे।

और बड़ी हो गई,
उम्र के आखरी पडाव पर आ गई
सोचती थी, काश अब खुशी मिलेगी
पर हालात और भी बद्तर हो गए
रोज सबेरा और संध्या बहु के नए-नए
ताने-तरानों से होता।

दो वक्त की रोटी में भी अधिकांश
नाती-पोतों का जूठन ही मिलता।
अंतिम यात्रा के लिए,
चिता पर सवार, सोच रही थी-
मेरे हिस्से में हरदम जूठन ही क्यों आया।
प्रस्तुति:- लोकेन्द्र सिंह राजपूत. दिल दुखता है.....

भड़ास blog: गांधी के देश में ही गांधी अजनबी#links

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गांधी के देश में ही गांधी अजनबी

गांधी के दर्शन पर चलकर आगे बढ़ी कांग्रेस आज उनके मूलभूत सिद्धान्तों को ही भूलती जा रही है। ये विडम्बना ही है कि गांधी की धरोहर के रूप में न्यूयार्क में जेम्स ओटिस के पास रखा उनका चश्मा, घड़ी, चप्पलें, प्लेट और कटोरी को वापस लाने का झूठा श्रेय लेने से भी गुरेज नहीं कर रही है। बापू की इस विरासत की नीलामी रूकवाने में असमर्थ सरकार के पास जब कोई रास्ता नहीं बचा तो वह वाइन किंग विजय माल्या के देशभक्ति के जज्बे को भुनाने में लग गई। हद तो तब हो गई जब पर्यटन और संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी ने उनको अपना रिप्रेजेंटेटिव बता डाला। कोई इनसे जाके पूछे कि नीलामी होने तक माल्या का नाम ही सामने नहीं था तो क्या सपने में माल्या सरकार के रिप्रेजेंटेटिव बना दिए गए थे। शराब के पैसे ही सही,लेकिन माल्या ने एक हिन्दुस्तानी होने के नाते जो काम किया वह काबिले तारीफ है। यहां नीलामी में माल्या द्वारा चुकाए गए नौ करोड़ ३० लाख रूपए नहीं बल्कि उनकी अपने देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना मोल रखती है। संसद में एक दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले राजनेता जो देश की संपत्ति का नाहक ही नुकसान करते है, उनसे अच्छे तो विदेशों में बसे वह भारतीय उद्योगपति है जो कम से कम बाहर रहकर भी देश के बारे में सोचते है। भारतीय अमेरिकी समुदाय के नेता संत सिंह चटवाल का यह बयान कि यह पहले ही तय कर लिया गया था कि "बापू का सामान किसी विदेशी के हाथ नहीं जाने दिया जाएगा" यह जज्बा एक सच्चे देशवासी का परिचय कराता है। वहीं दूसरी तरफ बापू के सामान के वापस आने पर वाहवाही लूटने के लिए तैयार सरकार तो यह तक नहीं जानती थी कि बापू के सामान की नीलामी होने जा रही है। २७ फरवरी को राज्यसभा में सपा के सांसद महेंन्द्र मोहन ने सामने वाली पार्टी को नीचा दिखाने की गरज से ही सही बापू की अमानत को भारत लाए जाने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया, तब कहीं जाकर सरकार जागी, नहीं तो सरकार क्या अन्य राजनीतिक दलों को लोकसभा चुनावों में जीत की तिकड़म भिड़ाने को लेकर फुर्सत ही नहीं थी। चुनाव के लिए करोड़ों का बजट रखने वाले रोजाना लाखों रुपए के विज्ञापन अखबारों और चैनलों में देने वाले देश के इन सूत्रधारों के पास बापू की अमानत को बचाने के लिए एक फूटी कोड़ी नहीं थी॥ वह तो व्यस्त थे लोकसभा चुनावों के दौरान पड़ रहे आईपीएल के मैचों की मेजबानी दूसरे देशों के पास ना जाने देने के लिए॥और करोड़ों रुपए में खेलने के लिए... राष्ट्र की भलाई के नाम पर जनमानस को ठग कर अपने हितों के लिए करोंड़ों रुपए बनाने वाली किसी भी पार्टी में क्या इतना दम नहीं था कि गांधी के पड़पोते तुषार गांधी के धरोहर वापस लाने के लिए बनाए गए कोष में पर्याप्त धन एकत्र कर पाते। पार्टी के नाम पर करोड़ों रूपए पर खेलने वाले इन राजनीतिज्ञों को गांधी के कोष में नीलामी तक केवल साढ़े तीन लाख रुपए ही एकत्र होने की बात को लेकर लज्जित होना चाहिए... लेकिन फिर भी ये सीना ठोक कर कहते है हम गांधीवादी है, कोई इनसे पूछे की गांधी को मौत की नींद सुलाने वाले तो तुम हो, नाथूराम गोडसे नहीं, क्योंकि किसी इंसान की मौत शरीर के खत्म होने से नहीं बल्कि उसके विचारों के खत्म होने से होती है। सत्य, अहिंसा और राष्ट्रप्रेम के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले गांधी के ये समर्थक गांधीवादी तो है, लेकिन गांधी के विचारों पर चलने से इन्हे परहेज है और इसलिए अपने ही देश में गांधी अजनबी है...

कांग्रेस की नींद khrab

अकाली-बसपा की सोशल इंजीिनयिरंग से कांगरेस की नींद
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पंजाब में अकाली दल और बसपा की सोशल इंजीनियरिंग ने कांगरेस की नींद हराम कर दी है। िजस तरह से बसपा और अकाली दल ने अब तक लोकसभा सीटों पर उममीदवारों की घोषणा की है इससे कांगरेस की हालत खराब हो सकती है। पिछली सारी परंपरा को तोड़ते हुए इस बार अकाली दल ने पूरी तरह से सोशल इंजीनियरिंग को फालो किया है। पहली बार अकाली दल ने दो उममीदवार पिछड़ी जाति से खड़ा कर कांगरेस को झटका दिया है। जबकि बसपा ने भी दो उममीदवार पिछड़ी जाति से खड़ा कर कांगरेस की नींद हराम कर दी है। इस बार अकाली दल ने फिरोजपुर और खडूर साहिब से पिछड़ी जाति के उममीदवार उतार कर कांगरेस को पूरे पंजाब में चुनौती देने की कोशिश की है। अकाली दल ने खडूर साहिब से रतन सिंह अजनाला को खड़ा किया है जो पहले भी सांसद रह चुके है। जबकि फिरोजपुर से शेर सिंह गुबाया को खड़ा कर कांगरेस को पूरी परेशानी में डाल दिया है। शेर सिंह गुबाया राय सिख है। वहीं बसपा ने आनंदपुर साहिब से गुजर उममीदवार उतारा है। जबिक खडूर साहिब से सुरेंदर सिंह साही को उतारा है जो पिछड़ी जाति से संबंधित है। कांगरेस के लिए परेशानी यह बढ़ गई है कि पंजाब में २२ परतिशत अबादी पिछड़ी जाति से संबंधित है। इनकी आबादी आनंदपुर साहिब, पटियाला, संगरुर, फिरोजपुर में अचछी है। पर दिलचसप सिथति यह है कि कांगरेसी नेताओं दवारा आवाज उठाए जाने के बाद भी फिलहाल पिछड़ी जाति की उममीदारी पर कांगरेस ने गंभीरता से विचार शुरू नहीं किया है।दिलचसप बात है कि कांगरेस ने १९८० के बाद कभी भी पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों पर गंभीरता से विचार नहीं किया। गयानी जैल सिंह के बाद एक बार फिरोजपुर से हंसराज जोसन को कांगरेस ने लोकसभा का उममीदवार बनाया लेकिन वो चुनाव हार गए। इसके बाद एक बार भी पिछड़ी जाति के किसी उममीदवार को चुनाव मैदान में नहीं उतारा गया। इस बार नई दिलली में आयोजित चुनाव कमेटी की बैठक में कई कांगरेसी नेताओं ने पिछड़ी जाति के एक उममीदवार को लोकसभा की एक सीट देने की मांग की। कमेटी के सदसय लाल सिंह ने कहा कि कम से कम एक ओबीसी को टिकट दिया जाएगा नहीं तो अकाली दल कांगरेस को नुकसान करेगा। उधर अकाली दल और बसपा ने इस मामले को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया है।दिलचसप सिथति है कि टिकटों के बंटवारे में अकाली दल से जयादा परिवारवाद को बढ़ावा कांगरेस में मिल रहा है। पटियाला से जहां राजा अमरिंदर सिंह की पतनी परनीत कौर को टिकट मिलेगा वहीं भटिंडा से राजा अपने बेटे रणइंदर सिंह के लिए टिकट मांग रहे है। उधर विधानसभा में विधायक दल की नेता राजिंदर कौर भटटल संगरुर से अपने बेटे राहुल के लिए टिकट मांग रही है। जबकि आनंदपुर साहिब सीट से राजयसभा सदसय अंबिका सोनी सीट मांग रही है। आम कांगरेसी कैडरों में इस बात की काफी चरचा है कि इसी तरह से परिवारों को ही टिकट मिलता रहेगा तो बाकी कांगरेसी कैडर कया करेंगे। आनंदपुर साहिब सीट पर तो बसपा के गुजर उममीदार ने कांगरेस के वोट बैंक में भारी सेंध लगायी है। उधर कांगरेस के पूरव अधयछ शमशेर सिंह दुललों ने साफ तौर पर कहा है कि अगर कांगरेस ने ओबीसी और हिंदू उम्मीदवारों की अनदेखी की तो भारी नुकसान कांगरेस को होगा।दिलचसप बात है कि राजय में कई ओबीसी विधायक जनरल सीटों पर जीत कर आए है। लाल सिंह पांच बार कांगरेस की टिकट पर जीत कर लाए। संगरूर के दिड़बा से ओबीसी सुरजीत सिंह धीमान दो बार विधायक बने है। इसके अलावा कांगरेस और अकाली दल से पिछड़ी जाति से संबंधित कई विधायक जीतते रहे है। पूरे देश में दलित-पिछड़ा-मुसलिम समीकरण की बात करने वाली कांगरेस को ओबीसी को नजर अंदाज करना अकाली दल को फायदे में ले जा सकता है। हालांकि कांगरेस ने संगरुर से जसबीर सिंह, आनंदपुर साहिब से राजपाल सिंह और अमृतसर से इंदरजीत बासरके के नाम ओबीसी की लिसट में रखा है। अगर ओबीसी से एक टिकट देने का फैसला लिया गया तो इन तीनों में से एक को उमीमीदवार बनाया जा सकता है।

congress ka khel bigra

कांगरेस समझे जमीनी हकीकत
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लोकसभा चुनावों से ठीक पहले कांगरेस और समाजवादी पारटी के बीच बढ़ती खाई इस बात का संकेत देती है िक कांगरेस जमीनी हकीककत नहीं समझ रही। यूपी में कुछ कांगरेसी नेताओं की सलाह पर सपा से टकराव लेने की िसथित पैदा हुई और इसका सीधा नुकसान कांगरेस को होता नजर आ रहा है। बेशक कांगरेसी नेता इस हकीकत को न माने पर सचचाई है िक समाजवादी पारटी से समझौता न होने की िसित में वे यूपी में लोकसभा की कुल सीटों पर दस के आंकड़े के नीचे आ जाएंगे। कांगरेसी नेताओं को भारी गलतफहमी है िक वे मजबूत हुए है और सपा कलयाण गठबंधन के कारण मुसिलम वोट सपा से िछटक गया है। भदोही िवधानसभा उपचुनाव ने यूपी की जमीनी हकीकत बता दी है। हकीकत है िक यहां पर मुखय लड़ाई बसपा और सपा के बीच है और सपा बसपा में लोकसभा चुनावों के दौरान टकराव होगा। भाजपा िफलहाल तीसरे नंबर की पारटी है औऱ कांगरेस चौथे सथान के िलए लड़ेगी। भदोही में तो भाजपा जहां तीसरे नंबर पर रही वहीं कांगरेस सातवें नंबर पर चली गई। यािन का भाजपा ने अपना कुछ वोट बैंक बचा रखा है पर कांगरेस के पास तो वोट बैंक ही नहीं है। भदोही उपचुनाव ने मायावती के िलए खतरनाक संकेत िदए है। मायावती इस मुसिलम बहुल सीट पर चुनाव हार गई। यूपी सरकार के दस पंिडत मंतरी यहां पर चुनाव में तैनात थे। मुसलमान नेता और मंतरी नसीमुददीन िसददकी यहां बैठे रहे। मायावती ने काफी उममीद से हाल ही में शािमल हुए बाहुबली अंसारी बंधुओं को भी यहां पर लगाया था। अफजाल अंसारी को यहां पर कैंप कराया गया। अफजाल अंसारी को कैंप कराने के पीछे खेल था। भदोही कारपेट इंडसटी के िलए जाना जाता है। भदोही में कुल मुसिलम आबादी का दस परितशत ही सैयद और पठान है। जबिक अससी परितशत जुलाहा आबादी है। अंसारी बंधु जुलाहा है औऱ इसी उम्मीद ने मायावती ने उनहें लगाया था िक जुलाहा वोट अंसारी बंधु सपा से तोड़ बसपा में लाएंगे। पर पिरणाम उलटा हो गया। जुलाहों के बूथों पर बसपा को तीन से पांच परितशत वोट िमले जबिक सपा को ९० परितशत वोट िमले। अब गुससे में आयी मायावती कुछ िटकटों को बदल सकती है। कहीं अंसारी बंधुओं की िटकट ही न मायावती बदल दे? पर यूपी ाकंगरेस के लीडरों का हाल देिखए। वे अभी भी हवाबाजी से बाज नहीं आते। दो िदन पहले यूपी कांगरेस के पूरव अधयछ अरुण िसंह मुनना ने मुझसे कहा िक अरे भाई समाजवादी पारटी को लोकसभा चुनावों में बता देंगे िक चांद और तारा िकधर वोट देगा। ये सारा कुछ वे तब बोल रहे थे जब भदोही चुनाव ने सपषट कर िदया है िक चांद और तारा उनके िखलाफ है और सपा के साथ है। जब मैनें उनहें साइिकल की सवारी की सलाह दी तो उनहोंन कहा िक पहले कांगरेस ने हाथ की सवारी कर अपना बेड़ा गरक िकया और अब साइिकल की सवारी कर बेड़ा गरक करने की बात हो रही है। अगर कांगरेस को बचाना है तो अपने दम पर चुनाव लड़ेंगे। पर कांगरेस की िसथित इस समय काफी खराब है और कांगरेस कुछ जीती हुई सीटें भी हार सकती है। कांगरेस गािजयाबाद,अलीगढ़,कानपुर,मथुरा और मेरठ सीट हार सकती है।जबिक भाजपा इस समय कई सीटों पर ितकोणीय मुकाबला दे रही है। फतेहपुर िसकरी,गािजयाबाद,मेरठ,कानपुर,बनारस,बिलया,अयोधया,देविरया,बरेली,मुरादाबाद,गोरखपुर,लखनऊ,गौतमबुद नगर,में अचछी िसथित में है। जबिक कुछ सीटों पर अजीत िसंह के कारण भी भाजपा मजबूत हुई है। पर कांगरेस िफलहाल सुलतानपुर और अमेठी और रायबरेली को छोड़ कहीं भी मजबूत िसथित में नजर नहीं आती। कई जगहों पर संघरष करेगी पर जीत होगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं है।कांगरेस को राहुल गांधी के किरशमाई रोड शो पर भरोसा है। पर अभी तक इस रोड शो का िरकारड अचछा नहीं है। जहां भी राहुल गांधी गए है वहां कांगरेस की हार हुई। गुजरात में रोड शो िकया तो वहां भाजपा के नरेंदर मोदी जीत गए। यूपी िवधानसभा चुनावों से पहले भी राहुल गांधी ने रोड शो िकया था लेिकन इसका कोई फायदा नहीं िमला। वहां भी कांगरेस बुरी तरह से हारी। अब कांगरेसी नेताओं को समझना चािहए िक राहुल गांधी के रोड शो से कुछ नहीं होगा। राहुल गांधी से हाथ िमलाने से तो िसरफ समसया हल नहीं होगी? अगर हाथ िमलाने से गरीबी िमटती,कांगरेस के छोटे वरकरों को िटकट िमलता तो शायद कांगरेस बहुमत से सता में आती। लेिकन न तो राहुल गांधी के हाथ िमलाने से कांगरेस वरकरों की समसया घटी है और न ही देश की जनता की गरीबी खतम हुई है। वरकर अभी भी राहुल गांधी से िमलने को तरसता है और इलाके के मजबूत वरकर को िटकट िमलने के बजाए पैसे पर िकसी बड़े नेता को िटकट िमल जाता है। िफर राहुल गांधी से िमलना तो लंबा डरामा। पहले फोन पर टाइम ले और दो महीनें बाद टाइम िमलेगा। िफर तीन िमनट में आपकी बात सुनी जाएगी। िफर इससे अचछा तो मुलायम,मायावती,नीतीश,लालू है। इनके जनता दरबार में जाएं,समसया रखे और सुनी जाएगी। इनसे िमलना आसान है। ये वरकरों की समसया सुनते है और हल करते है। यही कारण है िक कई बड़े कांगरेसी नेताओं ने इन नेताओं का दामन थाम िलया। कांगरेस िबहार और यूपी जैसे बड़े राजय से उखड़ गई। अब राहुल बाबा को यह तो समझना चािहए िक चुनाव के वकत रोड शो करने से वोट नहीं िमलते। आज मायावती,मुलायम,नीतीश,लालू का काट उनके पास नहीं है।

मुंबई का सियासी गलियारा

चुनाव का यानी निर्वाचन आयोग ने जैसे ही चुनाव का घंटा बजाया. सभी राज नेता घंटा सुनते ही गंभीर हो गए. मुंबई में तो धनुष बाण हमेशा कमल पर निशाना साध रहा था. लेकिन चुनावी बिगुल बजाते ही धनुष पर कमल खिल गया.. हालाँकि अभी भी दोनों के बीच घमासान जारी है. महाराष्ट्र राज्य के मुंबई में छः लोकसभा सीटें है. १. उत्तर मुंबई (दहिसर, बोरीवली , कांदिवली, मलाड) २. उत्तर पशिम मुंबई ( जोगेश्वरी, दिन्दोशी ,गोरेगावों,वर्शोवा,अँधेरी) ३. उत्तर पूर्व मुंबई (मुलुंड, विक्रोली,भांडुप, शिवाजी नगर,और घाटकोपर)४. दक्षिन मुंबई (वरली,शिवादी, भायखला,मालाबार हिल,कोलाबा मुम्बा देवी.)५. दक्षिण मध्य मुंबई ( अणुशक्ति नगर ,चेम्बूर, धारावी, कोलीवाडा, महिम, सायन) ६. उत्तर मध्य मुंबई ( कुर्ला, बंदर, कलिना, विलेपार्ले) इन सभी में से पांच सीटों पर हाथ का कब्जा था. लेकिन एस बार हाथ और घडी दोनों बराबरी के हक़ पर ताल ठोंक रहे हैं. कांग्रेस और एनसीपी , सपा ,बसपा के पास उत्तर भारतीय वोट हैं. जिसमे सपा और बसपा तो केवल उत्तर भारतीयों के भरोसे है. जबकि शिवसेना और भाजपा के उत्तर भारतीय वोट के मराठी वोट सबसे ज्यादा है. राज्य में नए परिसीमन के तहत चुनाव हो रहे हैं. लिहाजा सभी दिग्गज नेताओं का चुनावी अखाडा बदल गया है. मुंबई और उससे सटे ठाणे जिले में एक करोड़ ५८ लाख सात हजार ६५२ मतदाता हैं.राज्य में ठाणे लोकसभा सीट सबसे बड़ी है. जिसमे १७ लाख ८८ हजार ५०० मतदाता हैं. मुंबई की हर एक सीट पर दिग्गज ही दिग्गज ताल ठोंक रहे हैं. उत्तर पश्चिम मुंबई से सपा प्रदेश अध्यक्ष अबू आसिम आज़मी चुनाव लड़ने का एलन कर चुके हैं. जबकि पिचली बार इस सीट से प्रिया दत्त संसद रह चुकी थी. लेकिन एस बार एस सीट पर कांग्रेस अध्यक्ष कृपा शंकर सिंह भाग्य अजमाना चाहते हैं. इस सीट पर अभी से ही कांटे के सामान टक्कर होने की उम्मीद बढ़ गयी है. उधर चुनावी क्षेत्र के बंटवारे से सभी राजनेता अपने अपने समीकरण बैठने में जुटे हुए हैं. अगर नए गणित का आंकला करे तो भाजपा सबसे ज्यादा फायदे में दिख रही हैं. कई सीटों पर भाजपा की सीट मजबूत दिख रही है जैसे उत्तर मुंबई सीट इस सीट पर गोविंदा संसद थे. लेकिन जनता तो अपने संसद के कभी दर्शन नहीं कर पायी लिहाजा फिर से जनता अपने पुराने नेता राम नाईक को चुन सकते है, उधर उत्तर पूर्व मुंबई से भाजपा के संभावित उम्मेदवार किरीट सोम्या को बेहद फायदा पहुंचेगा. शिवसेना भाजपा का गठबंधन भी गठजोड़ के बजाय गठ्तोड़ नज़र आ रहा है. दक्षिण मुंबई सीट पर शिवसेना ने दावा ठोंका है लेकिन भाजपा दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की बेटी प्पोंं महाजन को मैदान में उतरना चाहती है. केंद्र में यू पीए को समर्थन करने वाली सपा के उम्मेदवार उतरने से कांटे की टक्कर मुंबई में पैदा हो जायेगी. इधर बसपा भी बाहुबली नेताओं के तलाश में जुट गयी है. बसपा प्रदेशध्यक्ष ने बसपा अरुण गवली के शामिल होने की खबर दी है. ऐसे में जिश तरह से बहन जी ने यूपी में बाहुबली को मैदान में उतर रही है वैसे ही महाराष्ट्र में भी हांथी पर बाहुबली सवार हो रहे हैं.

आओ एक आवाज़ उठाएँ.....

एक आज़ाद गीत सुनाएँ
आओ एक आवाज़ उठाएँ
-
सैकडों सालों से लड़ रहे हैं
आपस में ही हम इंसान
और राज कर रहे हैं हम पर
स्वावलंबी हुक्मरान
आज स्वराज की मुहीम चलाएँ
आओ एक आवाज़ उठाएँ
-
हवा में कितनी बातें बोली
समाज के ठेकेदारों ने
कभी संस्कृति, कभी मज़हब
और कभी बिन बात ही -
जान दी हम इंसानों ने
अब हवा को साफ़ कराएँ
आओ एक आवाज़ उठाएँ
-
आवाम की ताक़त-
आजिज़ नहीं है
दरकार है विश्वास की
चलो आज विश्वास की -
एक नन्ही चिंगारी भड़काएँ
आओ एक आवाज़ उठाएँ
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मजलूमों का साथ ना देना-
ज़ुल्म को सहना भी एक ज़ुल्म है
आओ प्रेम की लहर बढाएं
आओ एक आवाज़ उठाएँ
ना धर्म की ना भगवान् की
बात है अपने स्वाभिमान की
अपने अधिकारों का रक्षक-
अपने आप को ही बनाएँ
आओ एक आवाज़ उठाएँ
-
-
---
बाबरी मस्जिद विवाद, गोधरा हत्या काण्ड, आतंकित कश्मीर, मुंबई बम धमाके, मालेगाँव बम विस्फोट, नंदीग्राम हिंसा, मंगलौर पब हमला, नारी शोषण, हिन्दू रूढ़िवाद , इस्लामी आतंकवाद और करोडों अन्य मसले------ गांधी, सुभाष, भगत सिंह, आज़ाद, बिस्मिल, अशफाक...."इसी देश के लिए जान दी? सोचते होंगे वीर बलिदानी" --
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आओ समाज आज़ाद बनाएँ
आओ भारत निर्भीक बनाएँ
आओ भविष्य सुनहरा बनाएँ
आओ एक आवाज़ उठाएँ.....
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प्रेरणा स्त्रोत - " Fearless Karnataka, निर्भय कर्नाटक "

6.3.09

वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय को जयप्रकाश शाही सम्मान


आमी नदी को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए अभियान चलाने के लिए गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसियेशन ने वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय को जयप्रकाश शाही सम्मान से नवाजने की घोषणा की है। सम्मान समारोह गोरखपुर क्लब में ८ मार्च को आयोजित होगा। गौरतलब है कि गत ३ फरवरी को दैनिक जागरण गोरखपुर के सम्पादकीय प्रभारी डा शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी की पहल पर वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय ने दैनिक जागरण में पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी आमी की मुक्ति के लिए "जहरीली हो गई गाँव की गंगा " नामक अभियान चलाया जो आज तक अनवरत रूप से जारी है। लगभग सवा माह से चल रहा यह अभियान अब लोगों की जुबान पर है। इस अभियान ने लोगों को इतना प्रेरित किया कि लोगों ने हजारों की संख्या में आमी नदी में एक मुट्ठी फिटकरी डालकर आमी को शुद्ध कराने की सार्थक पहल की। इस अभियान की देन रही कि आमी की मुक्ति के लिए लोगों ने धरना, प्रदर्शन व जुलूस निकालकर समाज में जागरूकता लेन की कोशिश की। इतना ही नही एक संगठन इतना प्रभावित हुआ कि हजारों लोगों के कारवां के साथ आमी में जहर उगलने वाले एक नाले पर पहुंचकर उसका मुंह बाँध दिया। इसे दैनिक जागरण के साथ साथ आनंद राय की सफलता मानी जा रही है। इस अभियान को हवा देने तथा अपनी पैनी लेखनी से जनता को इस मुद्दे पर आन्दोलन के लिए तैयार करने के लिए गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसियेशन ने पत्रकार आनंद राय को जयप्रकाश शाही सम्मान से नवाजने की घोषणा की है।

चाभी..................आरती "आस्था"


जैसे तालों को खोलने के  लिए

होती हैं  चाभियाँ

काश वैसे  ही होती  चाभियाँ

परत-दर-परत  चेहरों  को खोलने के लिए भी

 तब सहज होती

अपने- पराये की पहचान

तब न कदम-कदम पर

छले जाते हम

और न दोष  देते किस्मत  को .............|

अब वो कभी नहीं भागेंगे मुझे मारने के लिए

कल रात मेरी जिंदगी की सबसे खतरनाक रात रही ,जिसने कई दर्द ना सिर्फ मुझे बल्कि मेरे पुरे परिवार को दे दिए,रात के 12.20 बज रहे थे अपने ऑफिस से रोजमर्रा की तरह मैं निकल पड़ा घर के लिए ,मै नामालूम दर्द से बेहद दूर .कल व्रत था इसीलिए घर पर आकर सबसे पहले खाना खाता हूँ गली में जेसे है कदम रखता हूँ ना जाने क्यों मम्मी को केसे पता लग जाता है,हा कल भी ऐसा ही हुआ था हर बार की तरह थका हारा जेसे ही घर में कदम रखा मां ने दरवाजा खोला दरवाजा खोलने से पहले ही मेने सवाल किया की खाने में क्या बनाया है,मम्मी ने कहा की पहले अन्दर तो चल,घर में जेसे ही घुसा तो अम्मा ने बुला दिया कहा की एक बार अपने बाबा को तो देख ले .मैं थका हारा था इसीलिए बेमन से कमरे के अन्दर चला गया.जाकर कमरे में बैठ गया,बाबा सर झुका कर नीचे की और बैठे हुए थे.अम्मा ने कहा की पता नहीं क्या होगया बाबा को बाबा को सांस की परेशानी होने के कारण बाबा एक गोली खाया करते थे कल भी ऐसा ही किया ,मुझे सच में नहीं पता था की तबियत और बिगड़ जायेगी ,मैंने कहा की ठीक हो जायेगी ,गोली खा लेंगे चिंता मत करो यह कह कर मैं अपने कमरे के अन्दर चल गया वहा व्रत का खाना खाया ,अभी मैंने पानी का गिलास नीचे रखा ही था की पता चला की बाबा का स्वर्गवास हो चुका है ,मैंने बाबा को पूरा चेक किया की कही कोई आस बाकी हो लेकिन नाकामी ने मेरे परिवार एक बड़ा सदस्य छीन लिया जो अब कभी वापस नहीं आएगा कभी नहीं मैं घर में बड़ा लड़का हूँ इसीलिए रोने का हक मुझे नहीं है शायद यह मेरी बदकिस्मती है ,सबसे बड़ा पोता होने के नाते में अपने बाबा का लाडला था जिन्होंने बचपन से लेकर अब तक मुझे बहुत प्यार दिया ,लेकिन कभी बोल नहीं पाए की वो मुझे कितना प्यार करते है,लेकिन मेरे पडोसी बताते है की मेरे पैदा होने पर आँखों में खुशियों के आंसुओं को लेकर सीने से छिपा लेने की आदत बन गई थी उनकी जिसके कंधे पर बैठकर मैंने झूला झूला , उसी शरीर को मैं अब कंधा दे रहा था, मैं बाबा के गालो को खीचकर हमेशा भाग जाया करता था उसके बाद वो मुझे मारने के लिए पीछे भागते थे,आज जब अर्थी को ले जाया जा रहा था मैं उनके गालों को खीच रहा था की शायद वो मुझे मारने के लिए भागे लेकिन बाबा नहीं उठे फिर अंत में एक प्यारा सा स्पर्स बाबा के गालो पर छोड़ दिया,,,क्योंकि बाबा अब कभी नहीं जागेंगे ,अब वो कभी नहीं भागेंगे मुझे मारने के लिए..........शायद मैं निर्दोष नही रह गया ..

कल इंदौर नगरी में हूं, सचिन भाई....व्यवस्था टाइट रखना

कल सुबह इंदौर पहुंच रहा हूं। दो दिन का कार्यक्रम है। एक प्रोग्राम में शरीक होना है उसके बाद घूमना-मिलना है। जिन लोगों को मैं आनलाइन या आफलाइन जानता हूं, उनको सूचित किया। सचिन भी आजकल वहीं पत्रकारिता कर रहे हैं। उनसे अनुरोध है कि व्यवस्था टाइट रखें, बहुत दिन हुए हंगामा किए :) आशीर्ष महर्षि थे तो वहां लेकिन आजकल वे फिर भोपाल की सेवा में हैं। सुबोध इंदौरी को भी फोन कर बता दिया है। उन्होंने खाने का एडवांस निमंत्रण दे दिया है। पीन का न्योता एडवांस में सचिन ने थमा दिया है। इसी खाने-पीने में ब्लाग ब्लाग भी बतिया लेंगे और खेल लेंगे।
बहुत दिनों बाद दिल्ली से इतना दूर जा रहा हूं। दो साल से गांव भी नहीं गया। होली पर जाने का मन था लेकिन इस बार भी नहीं जा रहा हूं। इंदौर से ही दिल लगाकर वापस आने का इरादा है ताकि फिर कहीं जाने की कमी महसूस न हो।
इंदौर के अन्य साथियों से भी मिलने को उत्सुक हूं। वे मुझे 09999330099 पर रिंग कर सकते हैं।

जय हो।
यशवंत

शाकाहार के समर्थन में मेरा एक विनम्र निवेदन


विनय बिहारी सिंह

रोज मेरे घर के सामने से कुछ कसाई बकरियों का झुंड ले जाते हैं। मैं कोलकाता में रहता हूं। सुबह- सुबह ये बकरियां जिस तरह चिल्लाती हुई जाती हैं, वह विलाप से भी बदतर लगता है। साफ है कि बकरियां जानती हैं कि उनकी हत्या की जाएगी। यह वही समझ सकता है जिसने बकरियों का यह चित्कार सुना हो। मैं रोज यह चित्कार सुन कर हिल जाता हूं। इन बकरियों का मांस खा कर हम कौन सी नियामत पाते होंगे, मेरी समझ से बाहर है। मुझे यह चित्कार कभी नहीं भूलती। सचमुच जो लोग कहते हैं कि मांस खाना अपने पेट को कब्र में तब्दील करना है, वे गलत नहीं कहते। शाकाहार के तो अनगिनत फायदे हैं। आप पहले वे चित्कार सुनें, फिर मांसाहार पर गौर करें। यह चित्कार कोलकाता में ही नहीं, हर कहीं सुनाई दे सकता है। पौधों और पेड़ों के फल व सब्जियां तोड़ना उनकी हत्या नहीं है। अगर आम आप नहीं तोड़ेंगे तो वह स्वतः ही पक कर गिर जाएगा। संतों ने तो कहा ही है-वृक्ष कबहुं न फल भखै, नदी न संचै नीरपरमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर। शाकाहार ही मनुष्य के लिए श्रेष्ठ है। ऐसा श्रेष्ठ पोषक तत्व विग्यानियों ने कहा है। (मैं तकनीकी कारणों से ग्य ही लिख पा रहा हूं। इसके अलावा शाकाहार से मन शुद्ध और शांत होता है। शाकाहार सचमुच हमें फर्स्ट हैंड ऊर्जा देता है। यह सही है कि सूर्य हमारी ऊर्जा का पहला स्रोत है और वह सीधे वनस्पतियों के जरिए हमें मिलता है। शाकाहार के फायदे के बारे में जितना भी लिखा जाए कम ही है।

खरगोश,मेमना,चील,कौव्वा और गिद्ध

लोकतंत्र में
बार बार
हर बार
यही हो रहा है सिद्ध,
खरगोश, मेमने
चुनाव जीतते ही
बन जाते हैं
चील,कौव्वे और गिद्ध,
चुनाव के समय
डरे,सहमे जो
खरगोश,मेमने
जन जन के सामने
मिमियाते हैं,
चुनाव जीतने के बाद
चील,कौव्वे,गिद्ध में
तब्दील हो
देश और जनता को
नोच नोच कर खाते हैं,
लोकतंत्र की विडम्बना देखो,
यही चील,कौव्वे,गिद्ध
अपने इस रूप में
जनसेवक कहलाते हैं।

5.3.09

मीडिया की सक्रियता से खफा नेता ने फोटोग्राफर व रिपोर्टर को पीटा

नेता का वो दफ्तर जहां उपर लगा तिरंगा फटने के बावजूद 'लहरा' रहा था
नेता द्वारा हमला किए जाने के बाद थाने में पीड़ितों ने तहरीर दी
पुलिस ने केस दर्ज कर लिया
मामले के जांच के आदेश दे दिए गए हैं

उपरोक्त तस्वीरों पर क्लिक कर पूरा प्रकरण पढ़ा जा सकता है। यह खबर भड़ास4मीडिया पर भी प्रकाशित है, इसे पढ़ने के लिए www.Bhadas4Media.com खोलें।

आतंकित क्रिकेट


दिल्ली दिलवालों की.......

दिल्ली दिलवालों की, मुंबई पैसे वालों की........................................ये पंक्ति किसी फ़िल्म की है या किसी कवि की रचना है मैं नही जानता.....पर जब भी हम अपने बचपन को याद करते हैं तो उस बचपन की याद के साथ ये पंक्तिया याद आ जाती हैं। किस्मत से, या बदकिस्मती से मेरे सपने दिल्ली में ही पुरे हो सकते हैं, तो मैं बोरिया बिस्तर बाँध अपने सपनो को पुरा करने दिल्ली आ गया। सोचा थोड़े बहुत पैसे ले लेते हैं, बाकी अपना इकलौता दिल तो हैं ही दिल्ली के लिए। मुंबई थोड़े जा रहे हैं की ज्यादा पैसों की जरूरत पड़ेगी। जब हम यहाँ पहुचे, सात-आठ दिन हाथ पैर चलाये तब कम्बक्त पता चला की दिल्ली दिलवालों की क्यों है। यहाँ कोई किसी का जल्दी नही होता है। जब तक आप यहाँ नही आते तब तक तो वे लोग बुला - बुला के परेशां कर देंगे,परन्तु जैसे ही आप दिल्ली आ गए समझो वो सबसे पहले कल्टी मारेंगे। अगर आप नही समझ पाए तो समझा दू की यहाँ आधे से अधिक लोगों ने अपने दिलों के फोटो स्टेट करा लिए हैं। उनका सही दिल कौन सा है पता लगाना भी मुस्किल है। कुछ लोग ही बचे हुए हैं जिन्होंने अपने दिल का फोटोस्टेट नही कराया। मैंने तो सोच लिया की मैं जैसा था वैसा ही रहूँगा। एक बात और बता देना चाहूँगा भाई मेरे जैसे थे वैसे ही रहियो । काफ़ी तरक्की करोगे । .................दिल्ली दिलवालों की...मुंबई पैसे वालों की.......... जो लिखा वो मेरी आप बीती है....हो सकता है ऐसा आपके साथ भी हुआ हो.

बेटियां क्यूँ....होती है पराई....

जब भी किसी युवा जोड़े की शादी होती है तो उनकी आंखों में कितने अरमान होते है!जीवन की वास्तविकताओं से उनका पहला सामना तब होता है जब घर में नया मेहमान एक छोटा शिशु आता है!उनके लिए ये कोई मायना नहीं रखता की वह लड़का है या लड़की?वे उसे प्यार करते नही थकते....लेकिन यहीं से सब कुछ बदलना शुरू हो जाता है!यदि शिशु लड़की है तो अचानक बहुत से बुद्धिजीवी आ धमकते है जो माता को बार बार ये अहसास कराते है की ये लड़की है ..ध्यान रखो...!अब माता .पिता को ये लोग गाहे बगाहे ये टेंशन देते रहते है...लड़की को ज्यादा सर न चढाओ,इसके कपडों पर ध्यान दो,आख़िर ये लड़की है,ज्यादा मत .पढाओ......आदि..आदि...!सबसे ज्यादा समस्या तो .तब...खड़ी होती है..जब कोई महिला कार्यक्रम हो!यहाँ तो लड़की के माता पिता को इस तरह से ..दबाया....जाता है जैसे उन्होंने लड़का पैदा ना करके कितनी बड़ी भूल की हो?लड़कियां हमारी शान है..वो वे सब काम करके दिखा रही है,जिन पर कभी पुरुषों का आधिपत्य था....!बोर्ड एक्साम में लड़कियां हमेशा आगे रहती है..इसकी मिसाल के तौर पर बहुत लम्बी लिस्ट है..!बुढापे में जब माँ बाप को सब छोड़ जाते है...जब सब लड़के मिल कर भी उन्हें .पाल...नहीं सकते..तब लडकियां पराया धन होते हुए भी माँ बाप से जुड़ी रहती और उन्हें खुशी देने का भरसक प्रयत्न करती है....फ़िर क्यूँ समझे उन्हें .पराई....?क्यों?..क्यों?...क्यों जनम से ही उन पर पराई का ठप्पा लगा दिया जता है.....क्यों उन्हें बार बार लड़की होने का एहसास दिलाया जाता है..!क्या किरण बेदी,कल्पना चावला,इंदिरा गांधी या..लक्ष्मी बाई.के लड़की होने का हमे अफ़सोस है?????यदि नहीं तो फ़िर अपने घर में लड़की होने पर थाली क्यों न बजाये....!क्यों न हम उन्हें वे सब सुविधाएँ देन जो लड़कों को देते है क्यूंकि एक लड़की ही तो किसी की माँ,बहिन,भांजी,भतीजी,भाभी या फ़िर प्रेमिका बनेगी ...क्या इन रिश्तों के बिना जीना .सम्भव है...?फ़िर क्यूँ समझे इन्हे पराई..... !

भड़ास परिवार का आभार !

आप सभी का धन्यवाद

आप लोगों ने आगे बढ़कर एक परिवार की तरह मेरा स्वागत किया है और मैं इसके लिए सम्पूर्ण भड़ास परिवार का आभारी हूँएक नवजात की तरह मैं आपकी राहों मैं आया हूँ और आप सभी ने मेरे नन्हे से दिल को यह अहसास दिलाया है कि मुझे सँभालने के लिए कई हाथ तत्पर हैंयदि मैं कहीं राहों में डगमगाया, किसी मोड़ पर लड़खड़ाकर गिरा तो मुझे सँभालने के लिए, मुझे सहारा देने के लिए कई मार्गदर्शक मेरे आसपास हैंमुझे खुशी है कि मैंने एक बहुत ही अच्छे परिवार का साथ पाया है और मेरा प्रयास रहेगा कि में भी इस परिवार कि परम्परा को कायम रख सकूँ

लगे रहो जब्बार भाई !

कहते हैं कि प्रयास करने वालों कि हार नहीं होती और जो लाख हारने के बाद भी अपने इरादों से नहीं डिगते वे ही असली बहादुर होते हैं। इस मामले में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के 65 वर्षीय जब्बार भाई कमाल के हैं। पिछले 44 साल से 10वीं कक्षा की परीक्षा में फेल होने के बावजूद जब्बार भाई ने हार नहीं मानी है। बिना नकल किए परीक्षा पास करने की शपथ लेने वाले जब्बार इस साल 45वीं बार परीक्षा दे रहे हैं।

इसे कहते हैं कुछ कर गुजरने कि असली चाह। शुरू में
जब्बार भाई को कितने लोगों कि हँसी का पात्र बनना पड़ा होगा, लोगों ने कितना समझाया होगा कि भाई रहने दो ये फालतू का काम , यह तुम्हारे बस का नहीं। कितना विरोध सहना पड़ा होगा उन्हें अपने परिवार वालों का, समाज का, लेकिन फिर भी वो डटे रहे । इसे कहते हैं " कुछ कर गुजरने की आग " , ऐसी आग जो तमाम आंधिओं के बावजूद जलती रहे । इसी को कहते हैं असली साहस । हममें से कितने लोग होंगे जो ऐसा साहस होने का दम भर सकते हैं ? कितने लोग होंगे जिनमें ये साहस होगा कि किसी काम में ४४ बार विफल रहने के बाद भी उनमें पहली बार वाला जोश बना रहे ? हमारे देश को आगे बढ़ाने के लिए ऐसे ही " साहसी नौजवानों " की ज़रूरत है जो किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मानें। जय हो ...जब्बार भाई....जय हो !!!

सोचो गलियाँ न होती तो

सोचो जरा यदि गाली न होतीतो क्या होता मेरे हिसाब से नालियों मैं पानी की जगह खून बह रहा होता वह इसलिए की एक कमजोर आदमी अपनी भड़ास गाली देकर ही तो निकल सकता है इस के अलाबा अगर कोई और विकल्प हो तो आप जानो गालियाँ ख़राब हो सकती है पर गुस्सा काबू करने और अपने आप को मुसीबत से बचने का एक अच्छा साधन भी तो हैं ना जिसने भी गलियाँ बनाई शायद वह भी किसी न किसी से दमित जरूर रहा होगा

4.3.09

Dont't Marry Software Engg

NEVER MARRY A SOFTWARE ENGINEER.
HUSBAND - HAI DEAR,I AM LOGGED IN.
WIFE - HAVE YOU BROUGHT THE SAREE.
HUSBAND - BAD COMMAND OR FILE NAME.
WIFE - BUT I TOLD YOU ABOUT IT IN MORNING
HUSBAND - ERRONEOUS SYNTAX, ABORT,RETRY,CANCEL.
WIFE - HAE BHAGWAN !FORGET IT WHERE'S YOUR SALARY.
HUSBAND - FILE IN USE,READ ONLY,TRY AFTER SOME TIME.
WIFE - ATLEAST GIVE ME YOUR CREDIT CARD,I CAN DO SOME SHOPPING.
HUSBAND - SHARING VIOLATION,ACCESS DENIED
WIFE - I MADE A MISTAKE IN MARRING YOU.
HUSBAND - DATA TYPE MISMATCH.
WIFE - YOU ARE USELESS.
HUSBAND - BY DEFAULT.
WIFE - WHO WAS THERE WITH YOU IN THE CAR THIS MORNING.
HUSBAND - SYSTEM UNSTABLE,PRESS ctrl,alt,del TO REBOOT.
WIFE - WOULD YOU LIKE TO HAVE SOME SNACKS
HUSBAND - HARD DISK FULL.
WIFE - WHAT IS THE RELATION BETWEEN YOU & YOUR RECEPTIONIST.
HUSBAND - THE ONLY USER WITH WRITE PERMISSION.
WIFE - WHAT IS MY VALUE IN YOUR LIFE.
HUSBAND - UNKNOWN VIRUS DETECTED.
WIFE - DO YOU LOVE ME OR YOUR COMPUTER.
HUSBAND - TOO MANY PARAMETERS.
WIFE - I WILL GO TO MY DADS HOUSE.
HUSBAND - PROGRAM PERFORMED ILLEGAL OPERATION,IT WILL CLOSE.
WIFE - I WILL LEAVE YOU FOR EVER.
HUSBAND - CLOSE ALL PROGRAMS & LOG OUT FOR ANOTHER USER.
WIFE - IT IS WORTHLESS TALKING TO YOU
HUSBAND - SHUT DOWN THE COMPUTER.
WIFE - I AM GOING
HUSBAND - ITS NOW SAFE TO TURN OFF YOUR COMPUTER.

कभी शब्दों में गहराई है....

कभी शब्दों में गहराई है
कभी उदासी छाई है
इस सुनी हुई बगिया में
कभी खुशबु , कभी पतझड़ ,
कभी बहार ,कभी आवाज
खिलखिलाती आई है
चंचल तितली, मस्त पवन
शीतल जल ,चहकता मन ,
ये सब देख आस भर आई है
हमें अंधियारा उजाला लगे
शाम भी अब सबेरा लगे
जबसे एक परी
इस उजड़ी बगियाँ में आई है
कोमल कोमल स्पर्श उसके
अब दुःख भी सुख लगने लगे
हर जगह ऐसी खुशी छाई है

ग़ज़ल

थी बहुत दिन से अधूरी जो कमी पूरी हुई
तेरे आने से हमारी ज़िन्दगी पूरी हुई।

द्वार, छत, दीवार, आँगन, कोने-कोने देख लो,
सब हुए रोशन तुझी से रौशनी पूरी हुई।

आंख से चलकर उतर आए जो आंसू होंठ पर,
है बहुत राहत, चलो कुछ तो हँसी पूरी हुई।

सब लबालब हो चुके थे आँख, सपने, नींद, मन,
नाम लेते ही तेरा ये साँस भी पूरी हुई।

देख ली रोशन नज़र तेरी तो हमको ये लगा,
ये ग़ज़ल जो थी अधूरी, बस अभी पूरी हुई।

चेतन आनंद

सुखराम: शर्ट रूप सुक्रम

हेमेन्द्र मिश्र

सोमवार की सुबह पुस्तकालय में किताबों के बीच मुझे नागार्जुन रचनावली दिखी। इसके भाग-2 के पन्नों को पलटते वक्त मेरी नजर एक कविता पर टिक गई। यह कविता पी।वी. नरसिंहराव सरकार में केन्द्रीय संचार मंत्री रहे सुखराम पर लिखी गई है। 1996 ई. में लिखी गई इस कविता में सुखराम के बहाने सत्ता पर किए गए कटाक्ष को आप भी महसूस करें -


सुखराम: शर्ट रूप सुक्रम


अब तक कहां छिप थे
ये ‘भारत-रत्न’
हिमाचल में पैदा हुए...
पले-पुसे बड़े हुए
पी.वी. की गोद में
बैठे, 5 वर्ष तक मौज किया
संचार मंत्री रहे
पी.वी. ने प्यार से
पीठ सहलाई
अपने आप
जादुई तरीके से
नगदा-नगदी करोड़ों की रकम
लाॅकर में संचित
होती रही
3 करोड़ से ऊपर हो गई
परिवार की महिलाओं और
बाल-बच्चों के आभूषण...
हीरा-मोती-पन्ना-पुखराज
जड़ित गहने
और न जाने क्या-क्या
हिमाचल से बाहर, सुदूर
हैदराबाद(आंध्र) के बैंक के
अंदर लाॅकर से निकले हैं...
जय हो सुखराम की !
जय हो पी.वी. के
अंतरंग सखा की !!
मगर, दरअसल
‘सुखराम’ कोई एक
व्यक्ति नहीं गोत्र है-
पूरा का पूरा- पी.वी.
नरसिंह राव इस
गोत्र के बीज पुरुष हैं
राव अगर 5 वर्ष और
प्रधानमंत्री रह पाते तो
पट्ठा सुखराम
जाने क्या हो जाता !
सुखराम- शार्ट रूप
‘सुक्रम’ तब हो जाता
त्रिभुवनव्यापी-
‘इंटरकांटिनेंटल’
विश्व का महानगर
कोई शायद ही छूट पाता
सुक्रम की पचास -
पचपन मंजिली इमारतों से !
इयरबुक भर जाते
सुक्रम से ...
१८ अगस्त १९९६

एक लम्हा गुजर गया....

एक लम्हा गुजर गया
तेरी यादों में कही खो गया
ये क्या ? तेरी कदमों की

आहट सुन वह डर गया

तेरे कुचे से निकल
एक मुसाफिर किधर गया
एक लम्हा गुजर गया

धुप में जलता बदन
जरा सी छाँव को तलाशता मन
पसीने से लथपथ
दर - दर भटक कर

तुझे घर घर तलाशकर

एक मुसाफिर भटक गया
एक लम्हा गुजर गया

बेशर्मी कि हद है !


पाकिस्तान दौरे पर गई श्रीलंका क्रिकेट टीम पर हुए आतंकवादी हमले के बाद लाहौर के कमिश्नर ने कहा है कि इस हमले में भारत का हाथ हो सकता है ! यह तो बेशर्मी कि हद हो गई। पूरी दुनिया को पता है कि पाकिस्तान आतंकवाद का गढ़ है और आतंकियों को शरण और प्रशिक्षण देने के काम में लगा हुआ हैं । ताज्जुब कि बात है यह सब पता होते हुए भी लोग कैसे सरेआम झूठ बोल पाते हैं।

यह तो वो बात हो गई कि आपने किसी को रंगे हाथ पकड़ लिया हो लेकिन वो तब भी यही कहे कि उसने कुछ नहीं किया बल्कि उसके हाथ पर तो उसके दुश्मनों ने रंग लगाया है । इस तरह किसी को सफेद झूठ बोलते हुए सुनकर एक ही बात मन में आती है कि अभी जाकर उसके मुंह पर दस-बीस तमाचे जड़ दूँ।

मैंने अपने किचन में गैस खुला छोड़ा और छोटे बच्चों को माचिस पकड़ा कर कहा कि खेलो....

http://jwala-thepoweroflife.blogspot.com/

और अब लाल लंगोट


पिंक चड्ढी का नाम आपने जरुर सुना होगा जी हा ये एक अभियान है महिलाओ का ,लेकिन शायद आपने आपरेशन लाल लंगोट का नाम न सुना हो ? तो जान लिजीये धार्मिक नगरी बनारस में शुरू हो गया है लाल लंगोट का अभियान इस अभियान को चला रहे है सामाजिक कार्यकर्त्ता चट्टान सिंह ,चट्टान के अनुसार इस अभियान के तहत युवा वर्ग में राष्ट्र के लिए जरुरत पड़ने पे कुछ भी करने को तैयार रहने के लिये प्रोत्शाहित किया जा रहा है
चट्टान के अनुसार इस समय देश को सबसे बड़ा खतरा नेताओ से है जो अपनी कुर्सी के लिये देश को बेचने को तैयार है और सभी राजनितिक दल गुंडे और माफियाओ को टिकट देकर चुनाव की वैतरणी पार करने में लगे हुए है
इन गुंडे नेताओ का यही प्रयास रहता है की बहुबल के दम पे हर हल में चुनाव जीत लेगे ,लेकिन इस चुनाव में लाल लंगोट पहने राष्ट्रवादी कार्यकर्त्ता उन्हें गुंडई नही करने देंगे और उनका जवाब उन्ही की भासा में दिया जाएगा जिसके लिए इस तरह के राष्ट्रिय सोच वाले युवाओ को ट्रेनिंग दी जा रही है ,की चुनाव में वे इन गुंडों का मुकाबला कैसे करे, ट्रेनिंग के तहत कार्यकर्ताओ को लोकसभा की भूगौलीक जानकारी ,जातिगत समीकरण ,गुंडे प्रत्याशियों के समर्थको की संख्या के बारे में बताने के अलावा वोट देने से किसी को रोकने पे उनको जरुरत पड़ने पे शकिप्रदर्शन करने से भी न चुकने के लियए तैयार किया जा रहा है ,ट्रेनिंग के बाद इन कार्यकर्ताओ को हनुमान जी का वस्त्र लाल लंगोट pahan कर इनसे शपथ ली जा रही है की वे हर हल में चुनावी रावनो का संहार करेगे । खास बात तो तो ये है की इस अभियान में हिंदू और मुस्लमान दोनों वर्ग के युवा शामिल है और उनका कहना है की वे इस लाल लंगोट के दम पे गुंडे और माफियाओ को उनकी औकात बता देगे ,लंगोट धरी कार्यकर्ताओ से चुनाव के समय arajakta failne की संभावना के प्रश्न पे चट्टान सिंह ने कहा की हम चुनाव के पूर्व बाकायदा इस बात की घोसना करेंगे की हम क्या करने जा रहे और लिखित सुचना प्रशासन को दे dee जायेगी ।
ab


हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के लिए पिछला काफी समय समस्याओं से भरा रहा है फिर चाहे मुद्दा आतंकवादी घटनाओं का हो या फिर अंतर्ररा”ट्रीय समुदाय से सहायता का। पाकिस्तान इन समस्याओं से सुलझने के लिए हाथ पैर मार ही रहा था कि श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर आतंकवादी हमले के बाद अब इन परे’ाानियों में एक और नई कड़ी जुड़ गई है। मंगलवार सुबह हुए इस हमले के बाद पाकिस्तानी क्रिकेट के सामने अपनी साख और मान्यता दोनों बचाने की लड़ाई लड़ने पड़ेगी। पिछले काफी समय से पाकिस्तानी क्रिकेट को इस समस्या से दो चार होना पड़ रहा है कि कोई भी विदे’ाी टीम पाकिस्तान में खेलने के लिए तैयार नहीं होती है। अभी हाल ही में भारतीय टीम ने भी पाकिस्तान का अपना दौरा रद्द किया है। गौरतलब है कि इसी समस्या के चलते पाकिस्तान ने पिछले लगभग एक साल से कोई भी टेस्ट मेैच नहीं खेला था। फिर भी श्रीलंका की टीम ने पाकिस्तान का दौरा रद्द नहीं किया। दो टेस्ट मेैचों की इस सीरीज के रिकाॅर्डों से भरे पहले टेस्ट मेैच के नीरस ड्रा होने के बाद सभी की निगाहंें दूसरे मैच पर थीं। लाहौर के गद्दाकी स्टेडियम में खेले जा रहे इस मैच में के दूसरे दिन पाकिस्तान श्रीलंका के 606 रनों के वि’ााल स्कोर के जवाब में एक विकेट पर 110 रन बनाकर खेल रही थी। सभी को लग रहा था कि ये मैच पिछले मेैच की तरह ड्रा नहीं होगा। लेकिन मैच के तीसरे दिन को खेल ‘ाुरू होने से पहले जो हुआ वो ‘ाायद अंतर्ररा”ट्रीय क्रिकेट इतिहास के सबसे काले अध्याय के रूप में याद रखा जाएगा।
मंगलवार सुबह जब श्रीलंका की टीम मैच खेलने के लिए स्टेडियम में प्रवे’ा करने के लिए बस से जा रही थी उसी समय कुछ आतंकवादी जिन्होने चेहरे को ढक रखा था बस पर पहले राॅकेट लांचर से और फिर गोलियों से हमला कर दिया। इस हमले में 7 श्रीलंकाई खिलाड़ी घायल हो गये जिस तरह से पूरी श्रीलंकाई टीम को मारने की साजि’ा की गई थी उसकी जितनी भी निन्दा की जाए वो कम है। इस हमले के तुरन्त बाद श्रीलंका ने अपना दौरा रद्द करने की घो”ाणा की और अपने घर के लिए रवाना हो गए। आईसीसी ने पाकिस्तान ने क्रिकेट के हालात पर चर्चा करने के लिए आपातकाल मीटिंग बुलाई है जिसमें shayad कुछ अप्रत्या’िात निर्णय आने की उम्मीद जताई जा रही है। इस हमले ने एक बात तो साफ कर ही दी पाकिस्तान में क्रिकेटीय हालात सामान्य नहीं है। इसमें कोई ‘ाक नहीं कि कभी ‘ाोएब अख्तर, मोहम्मद आसिफ जेैसे खिलााड़ियों के चलते परे’ाानियों में घिरे रहे पाकिस्तानी क्रिकेट के लिए आने वाला समय परे’ाानियों से घिरा होगा।

काश अमरिका में खेला जाता ये खेल

श्रीलंका की टीम पर आतंकी हमला उर्फ पाकिस्तानी हमला सचमुच मन को आहत करने वाला है इससे एक बात तय होती है कि आतंकी कैसे भी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था की कमर तोड़ना चाहता है...खेल के नये फार्मेट आईपीएल ने इसे एक दुधारू गाय साबित किया है वहीं क्रिकेट की लेकप्रियता भी एक कारण है इन हमलों का....इस घटना ने भले ही लोगों को रुलाया शोक व्यक्त करने का मौक़ा दिया है मगर मुझे तो सिर्फ अफसोस है कि क्रिकेट खेल काश अमरिका में खेला जाता तो कितना अच्छा होता और ये टीम श्रीलंका की ना होकर अमरिका की होती तब तो भारत की बल्ले बल्ले हो जाती है यहां के नकारा गीदड़ नेताओं की तो जैसे निकल पड़ती मैं गीदड़ इसलिए कह रहा हूँ क्योकि गीदड़ों की तरह ये मुम्बई हमले का बदला अमरिका ले ऐंसी आस लिए बैठे हैं....जैसे शेर शिक़ार करता है गीदड़ उसकी जूठन के लिए मुं ताकते रहते हैं ठीक ऐसे ही हमारे कर्णधार कर रहे हैं...मुझे हमले की खुशी भी है कि पाक का सच दुनिया की बंद आंखों में ज़बरन घुस रहा है। आप कब तक करोगे आंखे बंद कितनी मींचोगे आंखें सच ने ठान लिया आपकी बेइमान आंखों की किरकिरी बन कर रहेगा...

3.3.09

पाकिस्तान का चेहरा

हम बार-बार दुनिया को बताते रहे हैं कि पाकिस्तान आतंकवादियों का गढ़ है। यहां के आतंकवादी सरकार पर भारी पड़ रहे हैं। सारी दुनिया जानते बूझते हुए भी अनजान बन रही है। इसका खामियाजा आज श्रीलंकाई क्रिकेट टीम को भुगतना पड़ा। दुनिया वालों अब भी जाग जागो और हकीकत को समझो। हमे मिलजुल कर इस आतंकवाद को मिटाना होगा। इस कार्य की पहल पाकिस्तानी जनता को ही करनी है। पाकिस्तानी जनता अगर चाहे तो आतंकवाद और आतंकवादियों को इस जहां में कहीं भी छिपने की जगह नहीं मिलेगी।

कहाँ गए वो दिन....

दिल ढूंढता है.......दिल ढूंढता है....... वो बचपन का ज़माना.....जब सब बच्चे मिल कर उछल कूद करते हुए स्कूल जाते थे...रस्ते में आने वाली हर चीज़ का भरपूर लुत्फ़ उठाते हुए...!फ़िर शुरू होता स्कूल का कार्यकर्म ..कब शाम हो जाती पता ही नहीं चलता था...!सब अध्यापक कितने अपनेपन से पढाते थे...कभी उनको हमने या उन्होंने हमे पराया नही समझा....!फ़िर शाम को गाँव के रेतीले धोरों पर देर तक खेलना..आज भी याद है जब माँ हाथ पकड़ कर ले जाती थी तो ही खेलना बंद करते थे..!रात को दादा-दादी के सानिध्य में पढ़ते पढ़ते सो जाते थे...वो रातें कितनी अच्छी थी...!अलसुबह सब बच्चों को उठा दिया जाता था...फ़िर सबके साथ चाय पीना और मस्ती करना....!नहा धोकर गाँव के मन्दिर में जाना कहाँ भूलते थे हम....और मंगलवार को तो शाम का खेल छोड़ कर भी मन्दिर के बहार बैठे रहते थे....प्रसाद जो लेना होता था...कोई किसी प्रकार की टेंशन या भेदभाव नहीं था....रात को देर तक गाँव की गलियों में घुमते हुए कभी हमे डर नहीं लगा...!कभी कभी जब दूर निकल जाते तो कोई भी बुजुर्ग अपने बच्चों की तरह ही हमें दांत देता...कभी किसी को बुरा नहीं लगा...!किसी के घर भी जब कोई शादी होती तो वहीँ सब खाना खाकर सो जाते..कभी काम से परेशान नहीं हुए ...!आज सब कुछ है लेकिन वो चैन वो आराम वो शान्ति नहीं है.........उसकी तलाश में यहाँ वहां भटकते है...पर तनाव है की पीछा ही नहीं छोड़ता.....इसीलिए तो किसी ने क्या खूब कहा है..... शायद फ़िर से वो तकदीर मिल जाए, जीवन का सबसे हसीं वो पल मिल जाए, चल फ़िर से बनाए वो .रेत..का महल,शायद वापस अपना वो बचपन मिल जाए.... [yeduniyahai.blogspot.com]

पूजा करने में मन न लगने की शिकायत


विनय बिहारी सिंह

अक्सर आपको यह सुनने को मिलेगा कि क्या करें पूजा का जो नियम है उसका पालन करता हूं, लेकिन मन का क्या करूं। कैसे उसे वश में करूं। दो मिनट तो ठीक रहता है, लेकिन उसके बाद मन हजार जगह भटकने लगता है। कई बार कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिलती। अब तो सोचता हूं, यह मेरे वश में नहीं है। यही सवाल एक सन्यासी से पिछले दिनों एक व्यक्ति ने पूछा। सन्यासी ने कहा- इसका मतलब है कि भगवान से भी ज्यादा आपको कोई चीज प्यारी है। उस व्यक्ति ने कहा- नहीं। ऐसा हो ही नहीं सकता। भगवान से बढ़ कर कोई हो ही कैसे सकता है। तब सन्यासी ने कहा- अगर भगवान से बढ़ कर कोई औऱ नहीं है तो फिर आपका मन भगवान से कौन हटाता है? उस व्यक्ति ने कहा- पता नहीं। लेकिन अचानक मन भटकने लगता है। सन्यासी ने पूछा- मन किसका है? उस व्यक्ति ने कहा- मेरा है। तब तो आपका मन आपके वश में होना चाहिए। उस व्यक्ति ने कहा- लेकिन यही तो समस्या है सन्यासी जी। मेरा मन है और मेरे कहने में नहीं है। सन्यासी ने कहा- यह तो बुरी बात है। तब आपका पहला काम है- अपने मन को वश में करना। जब आप चाहते हैं तो हाथ उठा देते हैं। या हाथ से काम करने लगते हैं। लेकिन जब आपका हाथ आपका कहना मानता है तो मन को आपका कहना मानना चाहिए। अगर नहीं मानता तो उसे नियंत्रण में लाने की कोशिश कीजिए। गीता में भगवान कृष्ण से अर्जुन ने पूछा कि मन को कैसे वश में करें। वह तो प्रचंड मथ देने वाला है। मन वायु के समान चंचल है। तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हां, यह सच है कि मन बहुत चंचल है। लेकिन उसे वश में करने के लिए अभ्यास और वैराग्य की जरूरत है। अभ्यास यानी जब भी मन भागे तो उसे खींच कर भगवान की तरफ लाइए। यह काम बार- बार करना पड़ेगा। ऊबने से या चिंतित होने से काम नहीं चलेगा। यह तो लगातार अभ्यास से होगा। और वैराग्य? वैराग्य यह कि यह संसार हमारा नहीं है। मेरे न रहने के पहले भी यह संसार था और मरने के बाद भी रहेगा। इसके अलावा यह संसार किसी का नहीं। सब माया का खेल है। संसार जितना लुभावना लगता है, उतना ही हमारे लिए पराया है। इसका मतलब यह नहीं कि संसार छोड़ देना चाहिए। संसार में रहना चाहिए लेकिन भगवान का हाथ पकड़ कर। रामकृष्ण परमहंस ने कहा है- संसार में एक हाथ से काम कीजिए और दूसरे हाथ से भगवान को पकड़े रहिए। यानी यह मान कर सारा काम कीजिए कि मैं अपनी ड्यूटी कर रहा हूं, असली करने वाला तो भगवान है। सारा काम भगवान को सौंप कर जीवन यापन करना ही वैराग्य है। घर- परिवार छोड़ कर जंगल में रहना वैराग्य नहीं है।

sahafee: बाल-ब्यापार और यौन शोषण

sahafee: बाल-ब्यापार और यौन शोषण

समाचारपत्र का भविष्य

हेमेन्द्र मिश्र

इन दिनों समाचारपत्र के भविष्य को लेकर बहसें तेज होने लगी है। कहा जाने लगा है कि तकनीक के हावी होने से समाचारपत्र खत्म हो जाऐंगे। अमेरिकी विश्लेषक फिलिप मेयर ने अपनी पुस्तक ‘द वेनेषिंग न्यूजपेपर’ में यहां तक भविष्यवाणी कर दी कि 2040 ई. में अमेरिका में किसी भी समाचारपत्र की अंतिम प्रति छपेगी। मेयर साहब का यह विश्लेषण अमेरिका/ब्रिटेन जैसे विकसीत देशों के लिए संभवतः सही हो भी सकता है क्योंकि इन देशों में अखबार अपनी विश्वसनीयता खो रहे है। मगर ‘सब धान बाइस पसेरी‘ नहीं होते। भारत जैसे देशों में समाचारपत्र ही सूचना के महत्वपूर्ण साधन बने रहेंगे।

बात टेलीविजन से शुरू करते हैं। 90 के दशक में अचानक विश्व में सेटेलाइट चैनलों की बाढ़ आ गई। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। स्टार टीवी, जी टीवी और न जाने कितने ही चैनल घरों में घुस गए। लगा कि सूचना सर्वसुलभ हो गई और अखबारों पर हमारी निर्भरता कम हो गई। लेकिन इस माध्यम में सूचना को उपयोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया गया। राजीव शुक्ल भारतीय विमान अपहरण का उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि नेपाल से भारत आ रहे विमान का जब अपहरण हुआ तो इलेक्ट्रॅानिक मीडिया ने इतनी उल्टी सूचनाएं दी कि आम भारतीयों के सर ही चकरा गए। लोगों को बताया गया कि अपहृत खिली धूप का आनंद ले रहे हैं जबकि मुक्त आए लोगों ने ठीक इसके उलट जानकारी दी। एलूल ने अपनी पुस्तक ‘ द टेक्नोलोजिकल सोसायटी ‘में लिखा है कि वर्तमान समय में मानव जीवन के तकनीकि अतिविशेषीकरण ने उसे विवश कर दिया है कि वह एक बंद कमरे में रहे। आस-पड़ोस में क्या हो रहा है कुछ पता ही नहीं चलता। एलूल की यह बातें टीवी पर बिल्कुल सही बैठती है। टीवी ने परिवारों में भाषाहीनता की स्थिति उत्पन्न कर दी है। व्यक्ति-से-व्यक्ति की बातचीत एकतान टेलीविजन देखने-सुनने में डूब गई है।

निश्चय ही इलेक्ट्रानिक मीडिया में आकर्षण जरूर है लेकिन इसकी अपनी सीमांए भी है। यह तमाम मुद्दों को एक साथ विस्तार से नहीं रख सकता क्योंकि इसके साथ समय और स्थान का बंधन है। यह मनोरंजन का बेहतर साधन हो सकता है मगर पाठकों की बौद्धिक भूख मिटाने की क्षमता तो अखबारों में ही है।

ठीक इसी तरह नई-नई वेबसाइटों को लेकर अभी भी आम भारतीयों के मन में संदेह बना हुआ है। तहलका डाॅट काॅम ने जोर-शोर से मनोज प्रभाकर को लेकर मैच फिक्सींग का भांडा फोड़ने का प्रयास किया लेकिन हुआ क्या? खुद मनोज अपनी जाल में फंसते नजर आए, सूचना को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। वहीं इंटरनेट अभी तक बड़े शहरों की ही शान बना हुआ है। जबकि कई वेबसाइट अस्त-व्यस्त स्थिति में चल रही है।

बात ‘इलेक्ट्रानिक पेपर ‘की भी हो रही है। इस पर विश्वप्रसिद्ध संस्थान ‘ मेसाचुसेट्स इंस्टीच्यूट आॅफ टेक्नोलाॅजी ‘ में पिछले कई सालों से शोध हो रहा है। बताया जा रहा है कि इसके आने के बाद जैसा खबर आप चाहेंगे वैसा ही आपको दिखेगा। लेकिन हमारे देश में अखबार केवल सूचना का माध्यम ही नहीं है बल्कि हमारी दैनिक जरूरतों की पूर्ति भी अन्य कई तरीकों से करता है। क्या इलेक्ट्राॅनिक परदे को कोई गृहणी रद्दी के भाव बेच सकेंगी? कागज की थैलियाॅ कैसे बनेगी? गरीबों के सोने-बिछाने में कौन से पेपर उपयोग में लाए जाऐंगे? वैसे भी, किसी सूचना का संप्रेषण किसी माध्यम से कितना लोकतांत्रिक ढ़ग से हो रहा है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सूचना का कितना प्रतिशत अंश कतार के अंतिम व्यक्ति तक पहुॅच रहा है?

निश्चित तौर पर भारत जैसे देश में जहाॅ कई गांवों में अभी टेलीफोन की सुविधा भी ठीक तरह से उपलब्ध नहीं है वहाॅ इंटरनेट की बातें करना बेमानी ही होगी। वल्र्ड एसोसियेशन आॅफ न्यूजपेपर की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय समाचारपत्र की प्रसार संख्या 2001-05 के दौरान तैंतीस प्रतिशत बढ़कर 7.86 करोड़ तक पहुॅच गई है। जबकि वैश्विक स्तर पर 9।95 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। भारत और चीन में तो पिछले एक साल में 1.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि पिछले पाॅच सालों में 8.7 फीसद की वृद्धि होकर प्रसार संख्या 51 करोड़ तक पहुॅच गई है। अगर एशिया महादेश की बात करें तो इस सबसे बड़े महादेश में समाचारपत्रों की प्रसार संख्या में 0.04 प्रतिशत की बढ़ोतरी ही हुई है।

अखबारों के साथ हमारा भावात्मक लगाव भी होता है जबकि टीवी के साथ ऐसा नहीं होता। हम चैनल लगातार बदलते रहतें हैं, हमारे अंदर बैचेनी होती है और हम किसी चैनल के साथ वफादार नहीं हो पाते। लेकिन हम रोज पेपर बदल-बदल कर नहीं पढ़ते। अनेक ऐसे लोग हैं जिनके नथुने अखबारी कागज और उसकी स्याही की मादक गंध के आदी हैं। साथ ही अखबार का सामाजिक सरोकार इस पर हमारा विष्वास बढ़ाता है।

मूलतः अखबार के भविष्य पर ही लोकतंत्र का भविष्य टिका है। आर्थिक गुलामी की कगार पर खड़े देश को बचाने के लिए जरूरी है कि अखबार जनता में अपनी विश्वसनीयता कायम रखे और अपने व्यवसायिक हितों और जनहित के बीच एक ईमानदार संतुलन कायम करे। साथ ही सामाजिक सरोकारों को ध्यान में रखते हुए ‘ अनमेट नीड ग्रोथ ‘ काॅन्सेप्ट पर काम करे। यानि, जो लोग अखबार पढ़ना चाहते हैं लेकिन किन्ही कारणवश पढ़ नहीं पाते उन तक पहुॅचे। आॅकड़े बता रहे हैं कि भारत में ही इन लोगों की संख्या 35 करोड़ है। साथ ही अखबारों में बहुलता और विविधता भी दिखनी चाहिए। अगर इसी विश्वास पर अखबार काम करे तो समाचारपत्रों का ही नहीं बल्कि देश का भी भविष्य उज्जवल है क्योंकि अखबारों का भविष्य देश के भविष्य से अलग नहीं हो सकता।



होली के बाद इंग्लिश क्लास शुरू करें, कैसा रहेंगा?

होली के बाद इंग्लिश क्लास शुरू करें, कैसा रहेंगा?
इंग्लिश फॉर आल पर होली के बाद इंग्लिश क्लास शुरू करें, कैसा रहेंगा? ठीक है न ? होली के बाद इंग्लिश फॉर आल पर इंग्लिश सिखाने के लिये तैयार रहिये...और अपने दोस्तों को भी तैयार करिये। यहाँ आप सीखेंगें ऑन लाइन इंग्लिश....बड़े आसान तरीकें से।

आपका पंकज व्यास, रतलाम

किर्केट का काला दिन .......


आखिरकार वही हुआ जिसका डर था,पाकिस्तान में कई वक्त बाद कोई किर्केट टीम पाक में जाकर खेलने के लिए तैयार हुई थी ,शायद वो यह जताने के कोशिश कर रही थी की पाक की कोई भी व्यवस्था उसके ऊपर हावी नहीं हो सकती .लेकिन किसी नामालूम मौत के साए में वो सब कुछ हुआ जिससे पाक का गन्दा इतिहास और काला हो गया ,यह बात साबित करती है की बेशक पाक में लोक्तंत्र हो लेकिन हकीकत यही है की यह परिभाषा लोकतंत्र की तो कभी नहीं है जब मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूँ उस वक्त पाक में श्रीलंका के और विश्व के बेहद शानदार खिलाडी मौत से लड़ रहे है .आतंकवाद बार बार चीख रहा है अगर पाक में किर्केट हुआ तो हश्र यही होगा .इससे पहले विश्व के कई बड़ी टीम यह बात साबित कर चुकी है पाक में हम नहीं खेलेंगे ,चाहे कुछ भी हो ,जिस पर पाक बोर्ड ने एतराज़ जताया था और कहा था की जब भारत में यह मुमकिन है तो पाक में खेल क्यों नहीं,कई बड़े न्यूज़ चेनलो को सह्यद यह खबर कुछ सुकून दे शायद कुछ को दुःख भी हो ,लेकिन शुक्रवार को टी आर पी भी तो आने वाली है ,पाक में हम आतंक के इतने सारे जख्म बदन पर झेल चुके कि अब जैसे दर्द भी नहीं होता। हमारे सामने लोग लाशों में बदल जाते हैं। राख, धुएं और कालिख के बीच किसी मां की न खत्म होने वाली रुलाई भी हम पर असर नहीं करती,किसी को नहीं पता था की किर्केट का यह सबसे शर्मनाक दिन होगा ,कुछ देर बाद पाक की आलोचना होगी लेकिन सच यही है जो टीम पाक में जाकर किर्केट को
जीताने की कोशिश करने गई थी वो अपनी मौत की जंग लड़ रही है ,वही पाक में हालत कोई नए नही होंगे क्योंकि वहा बम धमाको से अब किसी का दिल नही देहलता ,मौत से अब सन्नाटा नही पसरता .क्योंकि वो पाकिस्तान है ,जिन्ना का पाकिस्तान ,जो सिर्फ़ मौत के दस्तूर को अपना अस्तित्व बनाने की कोशिश करता है
आशीष जैन
ब्रेकिंग न्यूज़
http://www.exclusivebharat.blogspot.com/

मेरे मोहल्ले के लडक़े अब क्रिकेट नहीं खेलते



आज मैं बैठा-बैठा सोच रहा था कि आज-कल मेरी कॉलोनी के लडक़ों को क्या हो गया है। न तो वे कबड्डी खेलते हैं, न फुटबॉल, न हॉकी और तो और सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट भी नहीं खेलते। जब हम उनकी उम्र के थे तो उठा बैट-बॉल सुबह से ही क्रिकेट के मैदान की ओर निकल जाते थे। माँ पुकारते ही रह जाती थी - बेटा खाना तो खा जा, बेटा नहा तो ले। पर हमारी मस्तमौला क्रिकेट टीम कहां अपनी माँ की पुकार सुन कर रूकती थी। उसे तो मैदान कीपुकार जोर से सुनाई पड़ती थी। तो चले जाते थे माँ की आवाज को अनसुना कर। पर शाम को तो घर वापस ही आना पडता था। तब माँ की डाँट से कौन बचाता। खैर उन दिनों को याद करता हूँ तो बहुत से बिझुडे दोस्तों की भीयाद ताजा हो जाती है। कुछ ऐसे ही थे हमारे वो दिन। पर आज देखता हूँ कि मेरे कॉलोनी के लडक़े कहीं नही जाते।हाँ गली के नुक्कड पर, चौराहे पर जरूर खडे मिल जाते हैं। वहाँ वे प्रतिदिन बिना नागा के जाते हैं। पता क्यूँ ? चलो मैं बताता हूँ वो इसलिए कि उनके जीवन जीने का टेस्ट बदल गया है। उन्हे अब खेलने में मजा नहीं आता। बल्कि उन्हें चौराहों पर खडे होकर फालतू की बातें और वहाँ से गुजरने वाली लडकियों को देखना और मौका पाकर उन्हें तंग करना अच्छा लगता है। अब उनके जीवन का टेस्ट इसमें है। और हाँ एक और जादू की चीज के बारे में तो बताना ही भूल गया होता। तो सुनो वो जादू की चीज है मोबाइल फोन। क्या बात है? आज कल हर किसी लडक़े के जेब में एक से एक बेहतरीन फीचर युक्त मोबाइल आपको मिल जाएगा। भले ही बंदा कुछ काम धंधा नहीं करता हो पर मोबाइल का खर्चा तो निकाल ही लेता है। आपको क्या लगता है ये मोबाइल पर थोड़ा बहुत खर्च करते हैं। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो आप गलत हैं, कभी-कभी तो इनके मोबाइल का खर्चा आपके मोबाइल से बहुत अधिक आता है। क्यों? घण्टों मोबाइल पर जो चिपके रहते हैं, न नींद आती है, न भूख लगती है बस मोबाइल मोबाइल खेेलते रहते हैं। जब कभी अगर वे मैदान में भूले भटके पहुंच भी जाये तो यहां भी उनका मोबाइल पीछा नहीं छोड़ता। अब आप क्या सोचने लगे? बीच पिच पर वीरेन्द्र सहवाग की तरह उनकी माँ का भी फोन आता है। फोन तो आता है पर उनकी माँ का नहीं, उनकी मा-सूका का। वो भी ऐसी मासूका का जिसे अभी अपनी नाक पोंछना भी नहीं आता। खैर मैं तो सोच-सोच कर थक गया। अब आप ही सोचो मेरी कॉलोने के इन लडक़ों का क्या होगा? अरे हाँ यहकाथा सिर्फ मेरे कॉलोनी के लडक़ों की नहीं है, सर्वव्यापी है। जरा गौर से देखो अपने आस-पास। प्रयास करो उन्हें कबड्डी, हॉकी, फुटबाल के मैदान ले जाने का, नहीं तो कम से कम क्रिकेट के मैदान में ले जाकर तो खडा ही कर दो। क्योकि इनका खेलना जरूरी है।
प्रस्तुति:-- दिल दुखता है.....

2.3.09

अब समझे...पाकिस्तान....

मुंबई हमलों को इतना समय हो चुका है पर .पाकिस्तान...है की कुछ करना ही नहीं चाहता...आख़िर कब तक?हम यूँ ही उसके.सामने.झुकते...रहेंगे...वह ना समझा है ना समझेगा !अगर वाकई में उसे समझाना है तो भारत को कुछ ठोस कक्दम उठाने होंगे.!सबसे पहले तो हमे अपनी सुरक्षा को मजबूत करना होगा.फ़िर पाकिस्तान .के..आंतकी ठिकानों को निशाना बनाना होगा..अन्यथा वो हमें बार बार परेशान करता ही रहेगा...!अमेरिका में एक हमले के बाद दुबारा हमला नहीं हो सका क्यूंकि वे हमेशा के लिए सचेत हो गए...जबकि हम अभी तक आंतकवादियों से लड़ने की योजना ही बना रहे है... आख़िर ये हमारी सुरक्षा का सवाल है....

हल चलाता हुआ मंगरू

सोचता हूँ , हल चलाता हुआ मंगरू मुझसे अच्छा हैउसे अपने काम का पता तो है वह मन से कर भी रहा है
मुझे तो बहुत कुछ पता ही नही और कुछ - कुछ पता है भी तो काम नही करतामन से तो बिल्कुल ही नही
अवसर की आहट कई बार सुन कर भी अनसुना कर चुका हूँ , जिसका खामियाजा आजतक भुगत रहा हूँलगता है , कोई भी मंडप मेरे लिए नही सजेगामेरा कभी भी अभिषेक नही होगामै अकेला ही रह जाऊँगारातों में चाँदनी नसीब नही होगी
कोई राह नही कोई , कोई मंजील नही दिखती , गोल गोल घूम रहा हूँलगता है , आगे बढ़ रहा हूँ
क्या करू ,निर्दोष हिरणों को मारकर सेज नही सजा सकता ,
सो दुनिया से दो कदम पीछे रह गया
बछडे का हक़ मारकर पंचामृत नही बना सकता ,
सो प्यासा रह गया
चंदन तरु काटकर तिलक नही लगा सकता ,
सो आगे नही जा पाया

भड़ास blog

भड़ास blog

MERI MOHABBAT FANA KAUN KAREGA....,
SAB NEK BANENGE TO GUNAH KAUN KAREGA.....
AIE KHUDA SALAMAT RAKHNA US BEFAWA KO....WARNA
MERE MARNE KI DUA KAUN KAREGA....!!!!



Tamam umar Zindagi se Door rahe....,
Teri Khushi ke liye apni Khushi se door rahe......
Ab is se badhkar Wafa ki saza kya hogi.....ki
Tere hokar bhi Tujhse door rahe.....!!!!


Love is a Medicine for any kind of PAIN.........
But there is No Medicine found in the world for Pain given in
LOVE......!!!!

आज की पत्रकारिता

आज इंडिया इंटरनेशनल सेण्टर में फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल की ओर से एक परिचर्च्राका आयोजन था । विषय था " इस रेलिगिओं बेयोंड मीडिया स्क्रूटिनी" मुझे जिनकी बाते सब से अच्छी लगी वो थे मौलाना वहीदुद्दीन खान । उनका कहना था की पत्रकार करंट अफेयर्स पर लिख सकता है पर धर्मं जैसे विषय पर लिखनेवाला कोई जानकर व्यक्ति होना चाहिए , हर किसी से धर्म विषय पर नही लिखवा लेना चाहिए । उनकी बाते सैट प्रतिशत मुझे जची । उनकी बातो के जबाब में मुकेश ने कहा की पत्रकार सिर्फ़ उन ह्यूमन रिघ्ट्स का बचाव करते है जो महिलाओ से उनके पढने - नौकरी न करने और जबरदस्ती बुरका पहनने का हुकुम जारी करते है।

दूसरी बात जो मुझे ठीक लगी वो थी मधु किश्वर की पब्लिक प्रेशर का मतलब पॉलिटिकल गुंडा । दूसरा - आप नेताजी की कोल्कता में आलोचना नही कर सकते, महारास्ट्र में शिवाजी की आलोचना नही कर सकते। कुछ बहस के बीच में जब चंदन मित्र और मधु के बीच में बहस हो गए तो चंदन मित्र ने कहा अगर अपने हुसैन की विवादित पेंटिंग अपने पत्रिका में छापी तो प्रोफेट मोहम्मद का विवादित कार्टून क्यो नही छापायही ह्य्पोक्रक्य है।

फिर मुद कर बात गोधरा पर आ ही जाती है। नंदिता दस ने अपनी फ़िल्म "फिराक "में गोधरा के बाद की घटना का वर्णन किया है। जिसे पाकिस्तान में अवार्ड मिला । नंदिता का कहना है की उसके इस अवार्ड के विरुद्ध बहुत सारे लोगो ने पोस्ट डाला की २६/११ के बाद पाकिस्तान नही जाना चाहिए था । मेरा एक कहना है हर बार गोदरा को हम कब तक भुनाते रहे गे, औरतो के साथ हर कल में पुर्सो ने राजनीती , प्रेम, दबगाई गिरी में , जाती के नाम पर यही किया कभी हिन्दुओ ने मुस्लिमो पर किया , कभी मुस्लिमो ने हिन्दुओ पर। पाकिस्तान में ही हिन्दुओ को स्य्स्तेमाटिक ख़तम किया गया। "खामोश पानी " फ़िल्म इसकी गवाही है। इस के अलावा कोल्कता में ही खिदिरपुर एरिया में जिधर के बाद क्या हिन्दुओ पर अत्याचार नही हुए , क्या उसकी रिपोर्टिंग हुई। क्या कोल्कता के हिन्दी पत्रकार खिदिरपुर एरिया में आसानी से जाकर रिपोर्टिंग कर लेते है। जितनी मुस्किल अग्रेजी क पत्रकारों को गुजरात में रिपोटिंग करने में होती है उतनी ही मुस्किल कोल्कता में में हिन्दी क पत्रकारों को होती है खिदिरपुर एरिया में , क्यो की उनको वह क लोग जनसंघी मानते है .ये अविश्वाश आज हमारे समाज की सच्चाई है एक दुश्रे क प्रति। हम खानों में बाते है। रविन्द्र जी फ्रॉम स्तातेस्मन का कहना था की उनके रिपोर्टरों को इस बात की कोई ख़बर नही मिली। किसी हिंदू महिला ने यह नही बताया की उसका रैप हुआ है। मेरा कहना है जब कोई आ कर बताये गा तभी हम ख़बर छपे गे क्या ? उसके पहले क्या बैठे रहे गे? क्या कोई रिपोर्टर उस एरिया में गया?

इन सब बातो से आप कटाई न सम्जेह की मई बीजेपी की हु, क्यो की सभी पार्टी ऊपर जा कर एक ही हो जाती है । जनता का दोहन करती है , और सभी बड़े लोग सत्ता में बैठे लोगो को सलाम करते है । मरते हम गरीब लोग ही है। अटल bihari जी की कविताओ पर शाहरुख़ नाचते है, आमिर खान अडवानी जी को "तारे जमीन पर देखने " बुलाते है । सड़ते हम है जमीनी लोग।

यही हाल पत्रकारिता का है। ऊपर में लोग मलाई मरते है , सड़ते रिपोर्टर और स्ट्रिन्गेर है। जय हिंद।

sahafee: बाल-ब्यापार और यौन शोषण

sahafee: बाल-ब्यापार और यौन शोषण

घटती जमीन, घुटता किसान, संपत्ति का मौलिक अधिकार

याचिकाकर्ता संजीव कुमार अग्रवाल ने एक नई बहस छेड़ दी है। अब देखना है कि उनकी याचिका पर विचार करने और कानून मंत्रालय की दलील सुनने के बाद उच्चतम न्यायालय क्या आदेश जारी करता है? कानून मंत्रालय को जारी किए गए नोटिस के जवाब से इस केस को कोई दिशा जरूर मिलेगी। संजीव के सवाल से औपनिवेशक काल में हुई जमीन व्यवस्था इस्तमरारी बंदोबस्त की याद आती है। सरकारों ने पहले से ही भू-संपत्ति के अधिकार को अपने कब्जे में रखना चाहा है। किसान को रैयत बनाकर जमींदारों से लगान की वसूली के प्रथा को अपने फायदे के लिए ब्रिटिश शासन ने इस्तमरारी बंदोबस्त को 1793 में लागू किया। इस बंदोबस्त की समान दरों ने किसानों का खून खींचने का काम किया। लगान किसान के लिए जोंक बन गया। इस्तमरारी के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार ने जो प्रावधान बनाए थे उनसे किसान को तो कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि जमीदारों के वारे-न्यारे हो गए। लगान न चुकाने की वजह से जमींदारों ने किसानों से जमीन वापस ले ली और सरकार को लगान चुकाने में भी कोताही बरतते रहे। यह लापरवाही सरकार को नागवार गुजरी और जमींदारों की संपत्ति को नीलाम किया जाने लगा। लेकिन जमींदारों ने फर्जी ग्राहकों से बोली लगावाकर जमीन फिर अपने नाम करा ली। इस मामले का भंडाफोड़ बर्दवान के राजा की संपत्ति की नीलामी में हुआ था।
स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्मात्री सभा ने किसान हितार्थ औपनिवेशिक काल में किसान शोषण के आलोक में संविधान के अनुच्छेद 19 में मौलिक अधिकारों के वर्णन में संपत्ति के अधिकार का भी उल्लेख किया था। संसद की कार्यवाही में सत्तर के दशक से ही सवाल उठने लगे थे कि संपत्ति के मौलिक अधिकार को संविधान में संशोधन करके निकाल दिया जाए। संसद में इस संशोधन का आशय जमीदारों के कब्जे से जमीन के बड़े भू-भाग को निकालकर भूमिहीनों को देना था। 1978 को आशय पर सदन से बहुमत मिलने के बाद 44वें संविधान संशोधन को मूर्त रूप देते हुए संसद ने अनुच्छेद 19 (1) (f) को निकालकर अनुच्छेद 300 में संपत्ति के कानूनी अधिकार में डाल दिया। इस आशय पर आपातकाल का काला साया भी पड़ा और इसकी मूलभावना को सही तौर पर लागू न करके राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के चलते नेताओं ने अपने हित साधने शुरू कर दिए। किसानों और छोटे काश्तकारों को सरकारों ने कितनी जमीन दी इसके बारे में आम आदमी बेहतर तरीके से जानता है।
अब गैरसरकारी संस्थान गुड गवर्नेंस इंडिया फाउंडेशन के संजीव अग्रवाल ने इस अधिकार को फिर से संविधान में जो़ड़े जाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की है। वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने अदालत के सामने बहस करते हुए दलील दी है कि इस अधिकार को हटाने के आशय की पूर्ति हो चुकी है। इसलिए इस अधिकार को पुनः संविधान में जो़ड़ा जाना चाहिए।
दरअसल पुराने समय में जमीदारों से जमीन निकालना सरकार के लिए आसान नहीं था। अपने मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए जमीदार सरकार को तक कोर्ट कचहरी घसीट ले जाते और कोर्ट से जमीन अधिग्रहण पर रोक लग जाती थी। उन दिनों वाकई जमीन अधिग्रहण टेढ़ी खार थी। लेकिन आज सरकारें जिस तरह से जमीन अधिग्रहण कर रही हैं। उसकी वजह से नंदीग्राम जैसे आक्रोश जनता में फूट रहे हैं। दिन लद गए जब किसानों के पास ज्यादा जमीने थीं। आज या तो हिस्सों में बट गईं या फिर किसी योजना की भेंट चढ़ गईं। हमारे यहां आज भी किसान की आजीविका खेती बाड़ी ही बनी है। सरकार की उदासीनता देखकर लगता नहीं कि खेती कभी उद्योग बन पाएगी। किसान की जिंदगी चलाने का एकमात्र जरिया खेती बाड़ी उससे सरकार विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) जैसी योजनाओं के नाम पर छीन रही है। आज जमीन के सूखे टुकड़ों पर खेती कर रहे किसान की हालत खस्ता है। सरकार खाद्यान्न के भीषण संकट के बाद भी नहीं चेत रही है। औद्योगिकरण के नाम पर छोटे काश्तकारों से भूमि छीनने के लिए सरकार ने सेज योजना का दुरूपयोग किया है।
चौदहवीं लोकसभा के अनिश्चितकाल स्थगन से पहले संसद में इस योजना के अंतर्गत होने वाले अधिग्रहण पर लगाम कसने के लिए संशोधन विधेयक भी लाया गया। यूं तो सदन ने इस विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया, लेकिन अब देखना है कि सेज कानून में इस बदलाव का जमीनी असर कितना कारगर होगा। धीरे-धीरे खेती योग्य जमीन कम होती जा रही है। औद्योगिकरण के नाम पर कंपनियों को दी जा रही जमीनों पर निश्चित समय सीमा के भीतर उद्योग नहीं लगाए जा रहे हैं। विश्व को हरित क्रांति का पाठ पढ़ा चुके देश के सामने ऐसा खाद्यान्न संकट उत्पन्न हुआ कि गरीब तबके को एक वक्त की रोटी मिलना मुहाल हो गई। सरकार नहीं चेती। अब वक्त है कि संपत्ति के मौलिक अधिकार को फिर से संविधान में जोड़ जाना चाहिए। इसके साथ खेती में सुधार के समेकित प्रयास भी किए जाने चाहिएं। तभी खेती योग्य जमीन बच सकेगी और देश खाद्यान्न जैसे संकट से सफलता पूर्वक बचने के साथ ही दुनिया भर को अनाज आपूर्ति करने में सक्षम बन सकेगा।

मैं इसे दूसरी पारी कहूंगा

मैं इसे दूसरी पारी कहूंगा। बहुत समय पहले भड़ास का सदस्‍य बनने के कुछ ही महीनों के भीतर मैंने भड़ास पर लिखा कि यहां जो कुछ हो रहा है उसे देखकर लिखने का मन नहीं करता। इसी दौरान मैंने भड़ास के मूल्‍यों और मर्यादाओं की बात भी की। तब इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। हां बाद में इसके कुछ दुष्‍परिणाम भी आए। सच कहूं तो मैं इसका इंतजार कर रहा था। कुछ दिन की यायावरी के बाद यशवतं भाई अपने असली फार्म में है। अब जो भड़ास है वहां कुछ विचार हैं, कुछ आह्वान है और मैं सही सुन रहा हूं तो कुछ चीखें भी हैं। अभी आवेश जी की पोस्‍ट पढ़ रहा था। ऐसा क्‍यों हुआ कि अदालत को इस विषय में बीच में आना पड़ा। अब ब्‍लॉगिंग में हो रही अनाप शनाप बकवास के संबंध में आवेश जी कहते हैं इसको नियंत्रित करने के लिए कानून का इस्तेमाल करने के बजाय,परम्पराओं का निर्माण करना ज्यादा जरुरी हैं। मैं भी कुछ ऐसा ही कहने का प्रयास कर रहा था। 

यहां मैं कोई प्‍वाइंट जीतने नहीं आया हूं। लेकिन मुझे लगता है जब समाज का डण्‍डा काम नहीं करे तो न्‍यायपालिका का डण्‍डा बजना जरूरी हो जाता है। पिंक चड्डी कैंपेन में कितनी महिलाओं की रुचि रही होगी मुझे इसकी जानकारी नहीं है लेकिन किसी भी महिला को अपने सबसे निजी भाग से जुडे वस्‍त्र के साथ ऐसी म‍जाक अच्‍छी लगी हो, मैं नहीं मान सकता। अब भी समय है। अगर लोग चेत जाते हैं तो ठीक वरना प्रिंट, इलेक्‍ट्रॉनिक और श्रव्‍य माध्‍यमों से अधिक सशक्‍त माध्‍यम एक बार फिर आम आदमी के हाथ से निकल जाएगा। अति हर चीज की बुरी है। अश्‍लील शब्‍दों का इस्‍तेमाल, दूसरे लोगों की बुराई और सार्वजनिक भर्त्‍सना का शुरूआती दौर अब खत्‍म हो जाना चाहिए। ब्‍लॉगिंग वास्‍तव में सीरियस मैटर है। इसे जितना जल्‍दी गंभीरता से लिया जाए उतना अच्‍छा है। 
अगर मूल्‍यों और परम्‍पराओं को स्‍थापित ही करना है तो ब्‍लॉग के ऊपर की पट्टी पर दिए गए ध्‍वज के ऑप्‍शन को जोरदार तरीके से काम में लेते हुए घटिया लोगों को ब्‍लॉक करने का सिलसिला शुरू करना होगा। इससे एक ओर ऊटपटांग लिखने वालों के दिमाग में भय पैदा होगा वहीं दूसरी ओर प्रीत भी। अन्‍यथा मामला नियंत्रणकारी दूसरी शक्तियों के हाथ पहुंचा तो एक बार फिर मूषक बनना पड़ेगा। 
भड़ास पर दूसरी पारी में आपके साथ आकर सहज महसूस कर रहा हूं। 

इस लौ को जलाए रखने के लिए धन्‍यवाद, यशवंत जी। 

1.3.09

इबारत..................."आस्था"


पूजा करती  थी 

कल तुम्हारी

करती हूँ

आज भी

सोचकर  कि

भगवान  को

 हमेशा ही

हक़ होता है

गुनाह  करने का ...........|

खामोश !अदालत जारी है

-आवेश
अगर आपको सच कहने की आदत है तो फिलहाल अपने होंठ सी लीजिये , राजसत्ता के दांव-पेंचों में उलझ कर कराह रही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इस बार कानून का हथौडा पड़ा है | देश की सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है की ब्लॉग की सामग्री को लेकर किसी की खिलाफ भी कानूनी कार्यवाही की जा सकती है |न्यायालय का ये आदेश केरल के युवा अजित डी द्वारा शिवसेना के खिलाफ बनायीं गयी एक कम्युनिटी और उसमे की गयी टिप्पणियों के अनुक्रम में दिया गया है ,अजित ने सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र न्यायालय द्वारा लगातार भेजे जा रहे सम्मन के खिलाफ याचिका दायर की थी |उसके खिलाफ ठाणे में सेक्शन ५०६ एवं ५०६ -अ के तहत मुकदमा पंजीकृत किया गया है ,आरोप ये है कि उसने अपनी पोस्टिंग में ,शिवसेना पर धर्म की आड़ में देश को विभाजित करने का आरोप लगाया था |न्यायालय के इस आदेश के उपरांत उन लोगों का मार्ग प्रशस्त हो गया है जो ब्लोगिंग की ताक़तसे खौफजदा थे और उसे शिकंजे में कसने की हर सम्भव कोशिश कर रहे थे |
यह पोस्ट लिखने की वजह सिर्फ ब्लोगिंग पर अंकुश लगाने की कवायद नहीं है बल्कि वह कानून भी है जिसकी आलोचना तो दूर विवेचना करने का भी साहस नहीं किया जाता|,हम कार्यपालिका और व्यवस्थापिका का न सिर्फ पोस्टमार्टम करते हैं बल्कि न्यायपालिका के द्वारा इन दोनों अंगो पर लगायी गयी फटकारों का भी गुणगान करते हैं ,लेकिन हद तो तब हो जाती है जब अनवरत असहमति और संविधान संशोधन की पुरजोर वकालत करने के बावजूद हम कानून के कड़वे और अव्यवहारिक परिणामों का विश्लेषण भी नहीं कर पाते | ब्लोगिंग पर अंकुश लगाने की कोई भी कोशिश न सिर्फ इन्टरनेट की माध्यम से किये जा रहे विचारों की साझेदारी पर अतिक्रमण है ,बल्कि ये आम आदमी की बौद्धिकता पर अपनी सार्वभौमिकता साबित करने की कोशिश है | एक ऐसे देश में जहाँ मुक़दमे किसी परजीवी की तरह आम आदमी से चिपक जाते हैं एक ऐसे देश में जहाँ अदालतों की चौखट पर ही तमाम जिंदगियां दम तोड़ देती हैं एक ऐसे देश में जहाँ न्याय पाना उतना ही कठिन है जितना मृत्यु शय्या पर दो साँसे पाना ,एक ऐसे देश में जहाँ आतंकवाद,भ्रष्टाचार और राजनैतिक मूल्यों का अवमूल्यन चरम सीमा पर है |उस देश में व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को बंधक बनाने की कवायद किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र में वैचारिक स्वतंत्रता पर किया गया अब तक का सबसे घोर अतिक्रमण साबित होगा ,जिसे कानून के उन गणितीय समीकरणों जैसे तर्कों से सही नहीं ठहराया जा सकता जिनमे सब कुछ पूर्वनिर्धारित होता है | |ये पोस्टिंग लिखते वक़्त मुझे मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन की ६ फ़रवरी को एक जनहित याचिका कि सुनवाई के दौरान की गयी वो टिप्पणी याद आ रही है जिसमे उन्होंने स्वीकार किया था कि देश की जनता का एक बड़ा वर्ग आज भी न्याय पाने के लिए अपनी आवाज नहीं उठा पाता ,और न ही खुद को अभिव्यक्त कर पाता है |उन्होंने इस दौरान देश में १०,००० अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना की आवश्यकता जताई थी ,आश्चर्य है कि एक तरफ हमारा न्यायालय अभिव्यक्ति की पराधीनता को लेकर बेहद चिंतित नजर आता है दूसरी तरफ मौजूदा कानून उसे कैदखाने में ड़ाल रहे हैं |
हमें न्यायालय के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में तमाम भविष्यगत चिंताएँ हैं साथ ही उस मीडिया के लिए अफ़सोस है जो कि इलेक्ट्रानिक्स चैनल्स पर लगाम कसने की राजनैतिक कोशिशों के लिए तो काफी हो हल्ला मचाता है ,लेकिन ब्लागिंग को लेकर उसकी जुबान नहीं खुलती |इसकी वजह साफ़ है मीडिया भी जानती है की आने वाले कल में ब्लोगिंग का अस्त्र उसकी आर्थिक और उपनिवेशवादी सोच पर भारी पड़ने जा रहा है |

जहाँ तक ब्लागिंग कि सामग्री का प्रश्न है हम ये दावे के साथ कह सकते हैं कि सीमित संख्याओं के बावजूद हिन्दुस्तानी ब्लॉगर सर्वश्रेस्ठ कर रहे हैं ,उन तमाम मुद्दों पर खुली चर्चाएँ हो रही हैं जो कि समानांतर मीडिया के लिए वर्जित रहे हैं |लेकिन ये सच है कि हमने न्यायालय के किसी आदेश कि प्रतीक्षा किये बिना खुद के लिए सीमायें बना ली हैं विचारों के आत्मनियंत्रण का इससे अच्छा उदहारण बहुत कम देखने को मिलेगा |,यहाँ दिल्ली के एक बड़े मुस्लिम अखबार नवीस कि चर्चा करना जरुरी है जो कि मेरा मित्र भी है ,बटाला हाउस के इन्कोउन्टर के बाद वहीँ के रहने वाले मेरे मित्र ने इस पूरे इनकाउन्टर की एक तफ्तीश रिपोर्ट अपने ब्लॉग पर डालने की सोची ,लेकिन उसने नहीं डाला ,जानते हैं क्यूँ ?क्यूंकि उसे डर था कि पोस्टिंग आने के बाद पुलिस उसके खिलाफ कार्यवाही कर देगी |वो भी सिर्फ इसलिए क्यूंकि वो मुसलमान है |अभी कुछ दिनों पहले मशहूर ब्लॉगर और गासिप अड्डा
डॉट कॉम के सुशील सिंह के खिलाफ इसलिए मुकदमा दर्ज कर दिया गया क्यूंकि उनहोंने अपनी पोस्टिंग में हिन्दुस्तान अखबार के लखनऊ संस्करण के उस अंक की चर्चा कर दी थी जिसमे खुद अखबार के मालिक बिरला जी के निधन के उपरांत उनकी गलत तस्वीर प्रकाशित कर दी गयी थी |अब वो दिन दूर नहीं जब आपकी कवितायेँ ,आपकी टिप्पणियां ,आपके व्यक्तिगत विचार आपको जेल की सलाखों में कस देंगे |

ब्लागिंग को हम व्यक्तिगत कुंठाओं के परिमार्जन का जरिया कह सकते हैं ,निश्चित तौर पर इसके माध्यम से न हम खुद को अभिव्यक्त करते हैं बल्कि खुद को पूरी तरह से उडेल देते हैं ,शायद इसलिए ये अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सशक्त माध्यम बनते जा रहा है ,हाँ ये जरुर है कि हर इंसान कि तरह अभिव्यक्ति और उसको प्रर्दशित करने के तरीके भी अलग अलग होते हैं ,ऐसे में अगर न्यायालय ब्लागरों से अमृत वर्षा की उम्मीद करता है तो नहीं करना चाहिए |हाँ ये जरुर है कि अभिव्यक्ति ,निजी तौर पर किसी को आह़त करने वाली नहीं होनी चाहिए|,हम इससे इनकार भी नहीं करते कि ब्लोग्स के माध्यम से न सिर्फ भड़ास निकली जा रही है इसे दूसरो के मान-मर्दन के अस्त्र के रूप में भी इस्तेमाल किया जा रहा है ,लेकिन ये बहुत छोटे पैमाने पर हो रहा है ,और इसको नियंत्रित करने के लिए कानून का इस्तेमाल करने के बजाय,परम्पराओं का निर्माण करना ज्यादा जरुरी है |दुनिया के सबसे बड़े हिंदी ब्लॉग भड़ास को चला रहे मेरे मित्र यशवंत सिंह को इन्ही परम्पराओं को स्थापित करने के लिए तमाम झंझावातों से जूझना पड़ रहा है ,उनकी समस्या तब शुरू हुई जब उनहोंने अपने ब्लॉग पर खुलेआम गाली गलौज और अर्थं टिप्पणियों को रोकने के लिए कुछ लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया अब वही लोग अलग -अलग फोरम से यशवंत के खिलाफ अभियान चला रहे हैं|


इस पोस्ट को लिखने की वजह न्यायालय की अवमानना
करना कदापि नहीं है ,हम सिर्फ ये कहना चाहते हैं की हमें कहने दीजिये ,हमारे होठों को मत सिलिये हमारी अँगुलियों में जुम्बिश होने दीजिये ,हमारे पास सिर्फ शब्द हैं उन शब्दों को हथियार बनाकर लड़ाई करना हमेशा कठिन होता है ,अगर हम चुप रहे तो हमारे लोकतान्त्रिक अधिकारों की आत्मा का तिरस्कार होगा |हमें चुप करना उनके हाथों हमारी वैचारिक हत्या कराने की वजह बनेगा ,जो हर पल संघर्ष कर रही जनता की चुप्पी की बदौलत ही उसके सीने पर चढ़कर राज कर रहे हैं |हमें चुप करना हमारी आदमियत को ख़त्म करने जैसा होगा |हमने कभी लिखा था- कौन पूछेगा हवाओं से सन्नाटों का सबब ,शहर तो यूँही हर रोज मरा करते हैं कभी दीवारों में कान लगाकर तो सुनो ,कलम के हाँथ भी स्याही से डरा करते हैं आज कह रहे हैं ,अगर ब्लॉग पर अंकुश लगाने की कोशिश की गयी तो सच में शहर मर जायेंगे ,और निसंदेह ये एक लोकतान्त्रिक देश में किया गया हालोकोस्ट होगा |

आखरी ख़त.....

आज कहीं पर एक रचना पढ़ी...अच्छी लगी इसलिए आप सब के सामने प्रस्तुत कर .रहा..हूँ.................................. पहचान को कोई नाम .ना...दो,स्वार्थ की ..seedhhi....................चढ़े रिश्ते,कभी आकाश की ख़बर नहीं रखते,चाय के प्याले में नहीं घुलेगी,हमारे दिलों की मेल,तेरा साथ एक ..नकली...सिक्के के अलावा कुछ भी नहीं,जो हर जगह जलील करता है,पथ के मुसाफिर जरूरी नहीं है,एक ही मंजिल के राही हो!तेरे ख़त के जवाब में बस इतना ही लिख रहा हूँ....!.पसंद आए .तो...कृपया करके अपने विचारों से अवगत कराएँ....www.yeduniyahai.blogspot.com

अच्छा पढ़ना है तो साहित्य कर की टांग तोड़ दो

जब साहित्य जगत मैं सन्नाटा छाया हो और कुछ अच्छा पढने का दिल कर रहा हो तो किसी अच्छे साहित्यकरकी टांग तोड़ दो वो जरूर कुछ न कुछ लिखेगा ऐसी ही एक घटना मैंने पढ़ी थी हरी संकर पारसी के बारे मैं जब उनकी दिल्ली मैं एक हादसे के दौरान टांग टूट गई थी और उनहोंने अस्पताल मैं लघभग एक दर्जन से जादा किताबें लिख डाली थी मेरा मतलब साफ है यदि कोई सिर्फ़ अपने कम पर ध्यान लगाये भले ही वो बुरे वक्त से क्यूँ न गुजर रहा हो परिणाम अच्छे ही होंगे

a smile

a smile costs nothing but gives much।

it enriches thoses who receive without making poorer who give. it takes but a moment, but the memory of it some times forever.none is so rich or mighty that he cannot
get along without it n none is so poor that he cannot be made rich by it .yet a smile cannotbe bought,begged,borrowed or stolen,4 it is somethingthat is of no value2 anyone untill it is given away.some pepple r 2 tired 2 give u a smile.give them one of urs,as none needs a smile so much as he who has no more 2 give.
''keep smiling''