24.4.13
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Dr Dwijendra vallabh sharma
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23.4.13
बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है
बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है
प्राथमिक शाला के बच्चों को नैतिक ज्ञान के पीरियड में अध्यापक सुलेख लिखा रहे थे।
अलग -अलग बच्चों को अलग-अलग पंक्ति लिख कर दी गयी थी और सभी बच्चे उसी
पंक्ति को बार-बार लिख रहे थे।कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थी
माता -पिता की आज्ञा का पालन करो
झूठ कभी मत बोलो
अपने देश पर गर्व करो
अनुशासन में रहना सीखो
समय को व्यर्थ मत गवाओं
वृद्धों की सेवा करो
नारी को सम्मान दो
माता के चरणों में स्वर्ग होता है
सभी बच्चे सुन्दर अक्षरों में सुलेख लिख रहे थे।जिस जिस बच्चे का सुलेख पूरा हो
जाता था वह बच्चा अपनी नोटबुक मास्टरजी को दिखाने उनके पास आ जाता था।
मास्टरजी बच्चो के अक्षर देख कर दस में से दस,नौ,आठ अंक देते जा रहे थे।मैं इस
प्रक्रिया को देख रहा था।एक बच्चे को छोड़कर सभी बच्चे अध्यापकजी को अपनी
अपनी कॉपी दिखा चुके थे।जो बच्चा नहीं आया था उसको मास्टरजी ने अपने पास
बुलाया और डाँटते हुए पूछा -सब बच्चो ने सुलेख लिख लिया तुमने अभी तक क्यों
नहीं लिखा? क्या तुझे लिखना नहीं आता है ?
बच्चा बोला -मुझे लिखना तो आता है ....
मास्टरजी बोले -फिर लिखा क्यों नहीं ?
वह बच्चा कुछ बोला नहीं।मास्टरजी ने कहा -नहीं लिखता है तो मुर्गा बन जा।
बच्चा मुर्गा बन गया।बच्चे को दंड पाते देख मेने मास्टरजी से कहा -मास्टरजी
यह बच्चा कहता है कि उसे लिखना आता है फिर भी उसने नहीं लिखा और आपने जो
दंड इसे दिया उसने स्वीकार कर लिया इसके पीछे बच्चे का कोई भाव रहा होगा लेकिन
आपने इसे कुछ नहीं पूछा और दंड दे दिया आखिर एक बार उससे पूछ लेते कि उसने
क्यों नहीं लिखा।
मास्टरजी ने उस बच्चे को खड़े होने का आदेश दिया और पूछा -तुम्हे लिखना आता था
फिर भी क्यों नहीं लिखा ?
बच्चा बोला -स्कुल आने से पहले मेरे दादा ने मुझे अपनी लकड़ी और चश्मा देने को
कहा था लेकिन मेने उन्हें नहीं दिया और वहां से भाग गया।अभी आपने मुझे जो लिखने
के लिए दिया वह यह था कि "वृद्धों की सेवा करो "जब मैं लिखने को बैठा तो मुझे अपनी
करनी याद आई।मुझे लगा जिस बात को आज सवेरे ही मैं नहीं कर पाया क्या केवल
लिखने मात्र से मेरा अवगुण दूर हो जाएगा ,इसलिए मेने कुछ भी नहीं लिखा।
बच्चे की बात सुनकर मास्टरजी सन्न रह गए।मैं भी सोचने पर मजबूर हो गया।मुझे
लगा बच्चे ने कडवा सत्य कह दिया है।
मुझे लगा आज मेरा देश इसलिए रुग्ण हो गया है कि सभी तथाकथित बुद्धिजीवी सिर्फ
प्रवचन देते हैं ,देश प्रेम के भाषण करते हैं,अच्छी बातें कहते हैं ,सुभाषित लिखते हैं मगर
उसका पालन नहीं करते हैं।बिना शुभ आचरण को धारण किये धर्म व्यर्थ का ढकोसला ही
तो है।किताबों में बंद पड़ी नैतिकता से कब कल्याण हुआ है।
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22.4.13
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय.
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क्या इनका काम सिर्फ निंदा करना है..?
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21.4.13
भ्रष्टाचार : अपराध की जड़
भ्रष्टाचार : अपराध की जड़
किसी भी देश के सिस्टम में यदि भ्रष्टाचार घुस जाता है तो उस देश को चलाने वाला शासक
और प्रजा दोनों पर संकट आ जाता है।हमारे देश में भ्रष्टाचार के कारण ही अपराध रुक नहीं
पा रहे हैं।हर विभाग में कुछ भ्रष्ट लोग सिस्टम को तहस नहस कर रहे हैं।
पुलिस जो शांति और व्यवस्था का काम देखती है वह भी अपराध को रोक नहीं पा रही
है क्योंकि जब भी किसी चौकी पर अफसर की नियुक्ति होती है उसके पहले उसे भी भ्रष्ट लोगों
को खुश करना पड़ जाता होगा और उसे जिसे खुश करना है वो कोई छोटा व्यक्ति नहीं होता है।
यदि किसी ने किसी को किसी भी नियुक्ति के लिए कुछ भी आर्थिक या अन्य कोई फायदा दिया
है तो सबसे पहले वह जनता के काम को कर्तव्य समझ कर क्यों करेगा,वह व्यक्ति जिस पद पर
है उसी पद से खुद के द्वारा दिए गए पैसे वसूल करेगा और उस पद से अतिरिक्त लाभ भी लेगा।
यह भ्रष्टाचार सिस्टम के उपरी भाग का है और यहीं से सिस्टम खराब होना शुरू हो जाता है
क्या किसी अव्यवस्था के प्रति हम आन्दोलन और नारे लगाकर व्यवस्था को पा सकते है ?
इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा।जब तक सिस्टम का उपरी हिस्सा सही नहीं होगा तब तक
अपराध रोकने में बड़ी बड़ी बाधाएं आती रहेगी।
सिस्टम के उपरी हिस्से को स्वस्थ करने के लिए मुलभुत परिवर्तन करना पडेगा।चुनाव
प्रणाली को कम खर्चीली बनाना होगा।आज एक-एक निकायों के चुनाव में पैसे लाखो में खर्च
हो रहे हैं ताज्जुब यह है कि पैसा जो खर्च हो रहा है वह आम जनता को दिखाई देता है पर
सिस्टम को दिखाई नहीं देता है। हर राजनैतिक दल को पार्टी चलाने के लिए पैसे की आवश्यकता
होगी और उसकी पूर्ति या तो जनता करे या फिर उम्मीदवार खुद खर्च करे। यदि चुनावों के
खर्च में कमी आ जाए तो कुछ व्यवस्था सुधार की बात शुरू की जा सकती है।
जो उम्मीदवार एक बार जीत के व्यवस्था का अंग बना गया है यदि उसने जीतने के लिए
बेफाम पैसा खर्च किया है तो वह उस खर्च किये पैसे की उगाही में लग जाता है और जनता का
काम करने की जगह पैसा बनाने में लग जाता है।अब वह बन्दा जिस भी विभाग का हेड बनेगा
वह अपने से नीचे के बड़े पदों पर या बड़े ठेकों पर पैसा बनाने लगेगा और यहीं से भ्रष्टाचार शुरु
हो जाता है।
जब भी कोई छात्र बड़ी परीक्षा पास कर लेता है तब अगली कड़ी के रूप में उसे साक्षात्कार
देना होता है।साक्षात्कार के समय क्या होता होगा यदि साक्षात्कार लेने वाली व्यवस्था में भ्रष्ट
लोग शामिल हो गए हो।छात्र को नौकरी चाहिए और नौकरी के लिए योग्यता के अलावा रिश्वत
भी देनी पड़ जाती है यदि उसे किसी भ्रष्ट व्यवस्था को खुश करके नौकरी मिली है तो वह छात्र
काम करने से पहले दिए गए धन की उगाही में लग जाएगा,सेवा भावना खत्म हो जायेगी।
अभिभावक अपनी संतानों के सुन्दर भविष्य के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था बनाते हैं
बच्चे भी लग्न से पढ़ते हैं परीक्षा पास कर लेते हैं और चयन के समय अभिभावक भी गलत
तरीके से संतानों की नियुक्ति का झुगाड़ लगाते हैं।यदि यह तरीका रहेगा तो फल क्या होगा
इसे आसानी से समझा जा सकता है।
इस देश की समस्या केवल यह नहीं है कि केवल तंत्र में भ्रष्टाचार है बल्कि इस देश का नागरिक
भी भ्रष्ट बन कर आगे बढ़ रहा है।किसी भी नियुक्ति में लिखित परीक्षा में यदि उसका बच्चा पास
हो गया है और साक्षात्कार के लिए जाना है तो अभिभावक खुद भ्रष्ट तरीके से अपनी संतान की
नियुक्ति चाहने लग जाता है,उसे अपने बच्चे की योग्यता पर भरोसा कम और रिश्वत देकर काम
पूरा करने की पद्धति पर विश्वास ज्यादा होता है,और इस तरह से नौकरी मिल जाती है तो फिर
नतीजा ................
यदि सुशासन को पाना है तो हम भारतीयों की पहली लड़ाई भ्रष्टाचार के विरोध में होनी चाहिए
अगर मूल बिमारी का ईलाज हम नहीं करेंगे तो सुन्दर व्यवस्था सपना ही बन जायेगी और
हम लोग नारे लगाकर और आन्दोलन करके फोटो खिचाते रहेंगे।अगर दिल में बदलाव की
भावना है तो डटकर संघर्ष करो भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ यही एक रास्ता है जो हमे मार्ग दिखा
सकता है।केवल अच्छी बाते किताबों में लिख देने से या प्रभावशाली भाषण देने दे देने से या
आफत आने पर केवल संवेदना जता देने से काम बनने वाला नहीं है।
नए भारत के निर्माण के लिए आवश्यकता है दृढ इच्छा शक्ति और दृढ संकल्प के साथ आगे
बढ़ने की।क्या हम सुन्दर भारत चाहते हैं .........?
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स्थान परिवर्तन
स्थान परिवर्तन
कल शाम की बात है ,मैं अपने रिश्तेदार के ग्रह प्रवेश के अवसर पर उपस्थित था।गाँव से आये
भैया ने मुझसे कुशल क्षेम पूछी। मेने कहा -मैं यहाँ प्रसन्न हूँ।मेने उनके बारे में पूछा -
वो बोले - आप शहरी लोगों जैसी जिन्दगी हमारी नहीं है,बस ठीक ठाक चल रहा है।
मेने उनसे पूछा -आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ?
वो बोले -यह इसलिए कह रहा हूँ कि आप लोग गाँव छोड़ कर शहर मैं आ गए और हम वहीं
रह गये।आप ने तकलीफ झेलकर स्थान परिवर्तन कर लिया इसलिए उन्नति के अवसर भी
आप लोगों को हमारे बनस्पत ज्यादा मिले।
बात यहीं खत्म हो गयी और मैं भी स्व रूचि भोज लेकर घर आ गया।
सुबह जब मैं उठा तो घर की वाटिका में टहलने लगा।मेरा ध्यान अनायास एक गमले पर
चला गया जिस गमले में मेने 9 -10 महीने पहले कुछ बीज बिल्व के पेड़ के डाल दिए थे
उस समय गमले में पाँच पौधे लगे थे।उन पौधों में से मेने एक पौधा दुसरे गमले में लगा दिया
था और एक पौधा उस गमले में लगा दिया जिसमे पहले से गुलाब का पौधा लगा था। मेने
जिस गमले में अकेले बिल्व को लगाया था वह पौधा चार फुट लम्बा हो गया था और तना भी
काफी मोटा हो गया था।जिस गमले में गुलाब के साथ बिल्व के पौधे को लगाया था वह पौधा
ज्यादा नहीं पनप पाया केवल छह सात इंच का था और जिन पौधों का स्थान परिवर्तन नहीं
किया था उनमे से एक-एक करके दौ पौधे नष्ट हो गए और अंतिम पौधा नष्ट होने की कगार
पर था।
मुझे यह देख कर अचानक रात का वाकया याद आ गया कि गाँव से आये भैया ने बहुत
सटीक बात कही थी कि आप लोगों ने स्थान परिवर्तन कर लिया और उन्नती के अवसर पकड़ते
रहे।
मेने उस बिल्व को देखा जो चार फुट लंबा था शायद मेरे से यह कह रहा था कि खुद को
उन्नती के पायदान पर देखना हो तो अकेले ही चल पड़ो और संघर्ष करो ,डटे रहो।
गुलाब के साथ वाला पौधा यह कह रहा था कि अपने से बड़े पेड़ की छाया में मत पलो ,एक
बड़े पेड़ की छाया तले दूसरा बड़ा पेड़ विकसित नहीं हो सकता अगर खुद को बड़ा बनाना है तो
बड़े पेड़ की छाया से दूर जाकर संघर्ष करो।
जिस गमले के बिल्व का स्थान परिवर्तन नहीं किया था वह मुझसे यह कह रहा था कि
यदि एक ही स्थान पर पड़े रहोगे और मजे की जिन्दगी जीना चाहोगे तो कुछ समय बाद पतन
की ओर चले जाओगे। लक्ष्य को हासिल करने के लिए गतिशील रहना होगा,अवसर की प्रतीक्षा
में समय खोना मुर्खता है।
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20.4.13
बलात्कार कानून की नहीं मानसिक सोच की लड़ाई
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Apni zami apana aasam
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सिर्फ तारीख बदली...तस्वीर नहीं...!
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माफ करना प्यारी गुड़िया हम शर्मिंदा हैं!
-नितिन सबरंगीराजधानी दिल्ली में 5 साल की कोमल उम्र में गुड़िया रूह कंपा देने वाली हैवानियत का शिकार हो गई। घटना दम तोड़ती इंसानी संवेदनाओं का घिनौना चेहरा भर है। चमक-दमक के बीच कंकरीट के जंगलों में लगी भीड़ में इंसान तो हैं, लेकिन उनकी इंसानियत मर चुकी है ओर जो बची भी है वह कोढ़ग्रस्त है। दरिंदगी की शिकार हुई होनहार छात्रा दामिनी के मामले को भी नया-पुराना कहना बेमानी होगा क्योंकि ऐसी घटनाओं के दर्द उन परिवारों से पूछिए जो इससे रू-ब-रू
19.4.13
"rape टूरिज्म"
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अनुशासन
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18.4.13
मोदी के इस पैंतरे के मायने क्या हैं?
वर्तमान में सर्वाधिक सशक्त व चर्चित हिंदूवादी चेहरे की बदोलत भाजपा में प्रधानमंत्री पद के सशक्त दावेदार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी छवि के विपरीत एक ऐसी पहल की है, जिसने राजनीतिक हलके को तो भौंचक्का किया ही है, विश्लेषकों को भी असमंजस में डाल दिया है। अकेले गुजरात दंगों के आरोप की वजह से भाजपा के धर्मनिरपेक्ष सहयोगियों के लिए अछूत बने नरेन्द्र मोदी की सरकार ने तय किया है कि वह नरोड़ा पाटिया में दोषी करार दिये गये उन दोषियों के लिए सजा-ए-मौत मांगेगी, जो अभी विभिन्न विभिन्न सजाओं के तहत जेलों में बंद हैं। ज्ञातव्य है कि नरोडा पाटिया नरसंहार के लिए बाबू बजरंगी को आजीवन कारावास मिला था, जबकि माया कोडनानी को 28 साल के जेल की सजा सुनाई गई थी। गुजरात सरकार ने तय किया है कि वह माया और बजरंगी सहित सभी दसों आरोपियों के लिए फांसी की सजा के लिए हाईकोर्ट जाएगी और अन्य 22 दोषियों के लिए सजा बढ़ाने की मांग करेगी। असल में पहल एसआईटी ने की है, मगर जिस तरह राज्य के कानून विभाग ने इसे मंजूरी दी है, उससे यह समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसा उसने मजबूरी में किया है अथवा जानबूझकर सोची-समझी रणनीति के तहत। मोदी सरकार की ओर से गठित तीन सदस्यीय वकीलों का पैनल सारी तैयारी पूरी करने के बाद अगले हफ्ते गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है।
दरअसल सन् 2002 दंगों के बारे में जब तहलका ने स्टिंग ऑपरेशन किया था तो बाबू बजरंगी ने साफ कहा था कि नरेन्द्र मोदी के कहने पर ही ऐसा हुआ हुआ था। बजरंगी ने मोदी को मर्द बताते हुए दावा किया था कि वे उनको बचा लेंगे। वे मोदी के इतने कट्टर व अंध भक्त थे कि यह तक कह दिया कि हिंदू हित के लिए नरेन्द्र भाई कहेंगे तो वे अपने शरीर पर बम बांध कर विस्फोट कर देंगे। बाद में हालात बदले और कोर्ट में यही स्टिंग ऑपरेशन बतौर सबूत पेश किया गया, नतीजतन नरोडा पाटिया नरसंहार में अभियुक्त दोषी साबित किए जा सके। ऐसे में यह सवाल कौंधना स्वाभाविक है कि ऐसे अनन्य भक्त बजरंगी और उनकी ही सरकार में मंत्री रही माया कोडनानी के लिए फांसी की सजा मांगने के लिए तैयार कैसे हो गई? हालांकि अब तक हिंदूवादी संगठनों की ओर से इस पर कुछ खास प्रतिक्रिया नहीं आई है, मगर मोदी के राजनीतिक गुरु रहे शंकर सिंह वाघेला ने जरूर इसे सियासी स्टंट बताया है। उन्होंने कहा है कि 2002 में मुसलमानों के कत्लेआम के बाद अब मोदी को समझ आ रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों के बगैर नहीं जीता जा सकता, इसलिए अपनी छवि ठीक करने के लिए मोदी ऐसा करने जा रहे हैं। संभव है वाघेला की बात सही हो। लगातार सांप्रदायिकता का आरोप ढ़ो रहे और अकेले इसी वजह से बहस का मुद्दा बने मोदी को फिलवक्त इसी की जरूरत है कि वे अपने आपको सर्वस्वीकार्य बनाएं। अब देखना ये है कि मोदी के इस कदम को हिंदूवादी किस रूप में लेते हैं। मगर इतना तय है कि यह कदम बिना सोचे-समझे नहीं उठाया जा रहा।
-तेजवानी गिरधर
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तेजवानी गिरधर
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मोदी के खिलाफ क्यों हैं नीतीश..?
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17.4.13
असरदार ब्लॉग@ Makemytrip.com
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शिक्षा की भिक्षा और हमारा समाज
आरपी सिंह
अब
पत्रकारिता में भी पत्रकारों की योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं हमारे काटजू
जी। समझ में नहीं आता की जहां 90 प्रतिशत लोग मूर्ख हों वहाँ पत्रकार
शिक्षित रहकर क्या कर लेगा ? इस देश की दुर्दशा तभी से शुरू हुई जब से
शिक्षा को अत्यंत जरूरी बताया गया और उसका सरकारीकारण किया गया। पहले अल्प
शिक्षित लोग होते थे तो वे ईमानदार और सद्गुणों से युक्त होते थे। पूरे
समाज में मातृशक्ति का सम्मान किया जाता था। लोग घूंस जैसी चीजों से घृणा
करते थे। जब से देश में तथाकथित उच्च शिक्षित लोगों की बाढ़ आई रंगीन
डिग्रियों को ही सबकुछ समझा जाने लगा तब से देश ही नहीं समाज की भी
दुर्दशा होनी शुरू हो गई। आलम ये है की शिक्षा का स्तर जितना ही ऊपर गया
आदमीं का नैतिक चरित्र नीचे गिरता गया। प्रशासनिक बहानेबाजी ने भी जोर पकड़
लिया। न्यायाधीश महोदय भी फैसले से जयादा तारीखें देने में विस्वास करने
लगे। आयोग बैठाए तो गए मगर कितने आयोगों की रपट पर कार्यवाही हुयी ये
पूरादेश जनता है। बस एक ही रटा -रटाया जुमला चलता जा रहा है की हम जांच कर
रहे हैं न? सांच को जांच की आंच पर चढ़कर चमकने की बजाय उसपर लेट लतीफी की
कालिख पोतकर लोग अपनी किस्मत चमकाने में लगे हैं। ऐसे लोग अतिउच्च शिक्षित
और सभ्य बताये जाते हैं। हर युग में द्रोणाचार्य हमारे समाज में रहे हैं।
जो मेहनत करके आगे बढ़ानेवाले एकलव्य का अंगूठा कटाने को तत्पर दिखाई देते
हैं। हमारे समाज में एक खून की सजा तो फांसी या फिर उम्र कैद होती है मगर
जो तीस-तीस लोगों को सरेआम गोलियों से भूनती है उसको हमीं चुनकर संसद में
बैठाते हैं? उसदिन कहाँ थे ये सभ्य समाज के लोग? दुर्भाग्य का विषय है कि
एक डकैत को सांसद बनाया तो जा सकता है मगर एक गरीब जो किसी तरह कलम के
सहारे अपनी रोजी रोटी जुगाड़ करना चाहता है उसको अयोग्य बताकर और कमजोर
बनाया जा रहा है। तो क्या ये मानलिया जाये की अब इन शिक्षितों और सभ्य समाज
के देश में गरीब और लचर व बेबस लोगों के लिए कोई जगह नहीं है? काटजू जैसे
लोग ये क्यों नहीं मानते की जितनी भी अच्छी रचनाएँ हमारे कवियों संतों और
महात्माओं ने रची थी उनके पास आपके इस भारत सरकार की रंगीन और चमकीली
डिग्रियां नहीं थीं। आज कबीर दास जी को एम ए में पढाया जाता है उन्हों ने
खुद लिखा है की मसि कागद छुयो नहीं कलम गह्यो नहि हाथ। अच्छ तो तब होता की
इस शिक्षा का बाजारीकरण रोका जाये। जो मीडिया हाउसेस बड़े-बड़े कालेज खोलकर
धड़ल्ले से चला रहे हैं जाहाँ मोटी फीस वसूली जा रही है पहले उसको बंद
कराएँ। अगर गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना शुरू कर देंगे तो बहुत जल्दी
एक अच्छी और योग्य पत्रकारों की बैच आपको चुनौती देने के लिए खादी मिलेगी।
यही हाल चिकित्सा और दूसरे क्षेत्रों में भी लागू होती है। धन्वन्तरि वैद्य
को किसी मेडिकल काउन्सिल ने पंजीकृत नहीं किया था। हेनीमैन भी एलोपैथिक
डॉक्टर होते हुए भी होम्योपैथी ईजाद की , लुकमान हकीम को भी किसी यूनानी
कौंसिल या फिर किसी सरकार ने डिग्री नहीं दी थी मगर ये आज के चिकित्सकों से
ज्यादा योग्य थे। चोरी की थीसिस खरीद कर जो डॉक्टर बनाये जा रहे हैं उनको
रोकना होगा। जो डॉक्टर गरीबों का खून चूस रहे हैं उनको रोकना होगा। जो
न्यायाधीश महोदय मुकदमें के फैसलों से ज्यादा तारीखें दे कर वेतन बटोर रहे
हैं उनको सुधरन होगा। इसके साथ ही साथ बयानबाजी से ज्यादा कामकाजी होने पर
जोर दिया जाये। वादों से ज्यादा काम को अंजाम तक पहुँचाने की कवायद करनी
होगी। बयानवीरों को समाज जबतक धकियाकर बाहर का रास्ता नहीं दिखाएगा तब तक
भारत में सुधार होना संभव नहीं दिखाई देता। यहाँ खाली उपाय बतानेवालों की
तादाद जयादा है मगर जैसे ही धरातल पर काम करने की बात आती है तो
अच्छे-अच्छों को सांप सूंघ जाता है। माइक पकड़कर लम्बी हांकना और बात है और
उसको जमीनी स्तर पर खरा उतारन दूसरी बात। अगर हम सच्चे देश भक्त हैं तो
हमें बयां से ज्यादा अपने कर्म के मर्म को समझाना होगा वरना ऐसे लोगों को
शर्म कैसे आयेगी? जो सिर्फ सस्ती प्रसिद्धि के लिए कुछ भी अनाप-शनाप बोलकर
सुर्ख़ियों में रहने के आदी होते जा रहे हैं।
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Kaput bhatkav
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काश मैं भी संजय दत्त होता..!
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Unknown
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