Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

24.4.13

शमशाद बेगम का जाना और में पिया गए रंगून वहाँ से आया टेलीफून --------------

‘ke’kkn csxe dk fu/ku gks x;k gS vkt A pkSjkuos o”kZ dh vk;q esa A ckWyhoqM xexhu gksxk A ‘kk;n A ijaijk fuokZg A ys ds igyk igyk I;kj A vkt igys I;kj tSls ‘kCn viuk vFkZ [kks pqds gSa A esjs fi;k x;s jaxwu ogka ls vk;k VsyhQwu rqEgkjh ;kn lrkrh gS A vc ,l ,e ,l vkSj bZesy eksckbZy dk tekuk gS A fpV~Bh dk bartkj ugah ;k iM+kslh ds ;gka ij vk;s vius VsyhQksu dk Hkh bartkj ugha A ckgj /kwi rst gS vkSj dejs esa ia[kk A cxy esa ,d lar dk izopu py jgk gS A va/ks gSa A vdy ls ugha A vkt dy vdy ls va/kksa dh ck<+ vk;h gqbZ gS A Jh izdk’k tk;loky tks dks;yk ea=h gSa dgrs gSa & f’kans dk dke ugha gS fd os cykRdkj jksdsa A os rks iqfyl dks ,fDVo j[k ldrs gSa A b/kj lik ds ,d ea=h dg jgs gSa & D;k etky fd dksbZ Mh ,e ;k njksxk gekjs dgs cxSj cSB tk;s A ge pkSchl ?k.Vs esa mldh onhZ mrjok nsaxs A ge ljdkj esa gSa A gekjs b’kkjs ij yskx mBrs cSBrs gSa A ,d nwljs ea=h t;iqj esa tk;loky th ds vuU; HkDr yxrs gSa & dgrs gSa & bu okjnkrska dks dksbZ ugha jksd ldrk A ;s okjnkrsa rks gksrh jgsaxh A ljdkj pkgs fdlh dh Hkh vk, A pyks ,d Hkze rks VwVk A esjs fi;k x;s jaxwu tSls xkus vc ugha vkrs A ckts T;knk cu x;s gSa blfy, cksy de iM+ x;s gSa A vc xkao Hkh ugha jgs A ukf;dk,a uxjh; gks xbZ gSa blfy, fQYeksa eas ujd ijkslk tk jgk gS A vc [kyuk;d ugha feyrs A uk;d gh og lc dj ysrs gSa fQYeksa esa A Bhd oSls gh tSls gdhdr ftUnxh esa A ge ftUgsa pqurs gSa os A vkSj ikap lky xkfy;ka nsrs gSa vkSj fQj cgsfy, ds }kjk Qsads x;s tky esa iM+s ,d :Ik;s fdyks ds pkoyksa dks [kkus ds fy, dcwrjska dh ekfuan muesa Qal tkrs gSa A vkSj fQj ikap lkyk lQj A dgkuh i<+h Fkh ,d A cpiu esa A ,d cgsfy;k A jkst taxy esa tkrk A mij dcwrj mM+ jgs Fks A mUgksaus tky ns[kk A dqN le>s dqN ukle>s A eqf[k;k us euk fd;k A uSfrdrk o`)koLFkk tSlh gks x;h gS A dksbZ ugha lqurk A vks<+uk Hkh ugha pkgrk A lc mrj vk;s A pkoy iM+s Fks A Qal x;s tky esaA mudh rks cfy p<+ xbZ gksxh A ;k fcd x;s gksaxs A budk D;k gksxk A ;s Hkh pkj lky ds tatky ls fudy dj vpkud vafre o”kZ esa vk;h ck<+ dks ns[kdj ] ,d :Ik;s fdyks ds pkoyksa dks ns[kdj ] Ng lkS :Ik;s gj flysaMj ds fy, vius ,dkmaV esa ns[kdj ] gj ekg vafre o”kZ eas rsy ds ?kVrs nke dsk ns[kdj Qal tk,axs tky esa A vkSj fQj ,d iap o”khZ; vUrghud”V dh ;k=k A vkSj xkyhiqjk.k A FkksM+s ls ykyp esa lc dqN [kYykl A f’kans th us xr o”kZ flracj 12 esa dgk Fkk & turk dh ;knnk’r detksj gksrh gS A og cksQkslZ dks Hkwy x;h A dks;yk ?kksVkys dks Hkh Hkwy tk,xh A lgh dgk Fkk A dbZ ckrsa gesa cqjh t:j yxrh gSas ysfdu os lp gksrh gSa A
‘ks”k fQj dHkh ---------------------------------------------


23.4.13

बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है


बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है 

प्राथमिक शाला के बच्चों को नैतिक ज्ञान के पीरियड में अध्यापक सुलेख लिखा रहे थे।
अलग -अलग बच्चों को अलग-अलग पंक्ति लिख कर दी गयी थी और सभी बच्चे उसी
पंक्ति को बार-बार लिख रहे थे।कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थी
माता -पिता की आज्ञा का पालन करो
झूठ कभी मत बोलो
अपने देश पर गर्व करो
अनुशासन में रहना सीखो
समय को व्यर्थ मत गवाओं
वृद्धों की सेवा करो
नारी को सम्मान दो
माता के चरणों में स्वर्ग होता है
सभी बच्चे सुन्दर अक्षरों में सुलेख लिख रहे थे।जिस जिस बच्चे का सुलेख पूरा हो
जाता था वह बच्चा अपनी नोटबुक मास्टरजी को दिखाने उनके पास आ जाता था।
मास्टरजी बच्चो के अक्षर देख कर दस में से दस,नौ,आठ अंक देते जा रहे थे।मैं इस
प्रक्रिया को देख रहा था।एक बच्चे को छोड़कर सभी बच्चे अध्यापकजी को अपनी
अपनी कॉपी दिखा चुके थे।जो बच्चा नहीं आया था उसको मास्टरजी ने अपने पास
बुलाया और डाँटते हुए पूछा -सब बच्चो ने सुलेख लिख लिया तुमने अभी तक क्यों
नहीं लिखा? क्या तुझे लिखना नहीं आता है ?

बच्चा बोला -मुझे लिखना तो आता है ....

मास्टरजी बोले -फिर लिखा क्यों नहीं ?

वह बच्चा कुछ बोला नहीं।मास्टरजी ने कहा -नहीं लिखता है तो मुर्गा बन जा।

बच्चा मुर्गा बन गया।बच्चे को दंड पाते देख मेने मास्टरजी से कहा -मास्टरजी
यह बच्चा कहता है कि उसे लिखना आता है फिर भी उसने नहीं लिखा और आपने जो
दंड इसे दिया उसने स्वीकार कर लिया इसके पीछे बच्चे का कोई भाव रहा होगा लेकिन
आपने इसे कुछ नहीं पूछा और दंड दे दिया आखिर एक बार उससे पूछ लेते कि उसने
क्यों नहीं लिखा।

मास्टरजी ने उस बच्चे को खड़े होने का आदेश दिया और पूछा -तुम्हे लिखना आता था
फिर भी क्यों नहीं लिखा ?

बच्चा बोला -स्कुल आने से पहले मेरे दादा ने मुझे अपनी लकड़ी और चश्मा देने को
कहा था लेकिन मेने उन्हें नहीं दिया और वहां से भाग गया।अभी आपने मुझे जो लिखने
के लिए दिया वह यह था कि "वृद्धों की सेवा करो "जब मैं लिखने को बैठा तो मुझे अपनी
करनी याद आई।मुझे लगा जिस बात को आज सवेरे ही मैं नहीं कर पाया क्या केवल
लिखने मात्र से मेरा अवगुण दूर हो जाएगा ,इसलिए मेने कुछ भी नहीं लिखा।

बच्चे की बात सुनकर मास्टरजी सन्न रह गए।मैं भी सोचने पर मजबूर हो गया।मुझे
लगा बच्चे ने कडवा सत्य कह दिया है।

  मुझे लगा आज मेरा देश इसलिए रुग्ण हो गया है कि सभी तथाकथित बुद्धिजीवी सिर्फ
प्रवचन देते हैं ,देश प्रेम के भाषण करते हैं,अच्छी बातें कहते हैं ,सुभाषित लिखते हैं मगर
उसका पालन नहीं करते हैं।बिना शुभ आचरण को धारण किये धर्म व्यर्थ का ढकोसला ही
तो है।किताबों में बंद पड़ी नैतिकता से कब कल्याण हुआ है।            

22.4.13

बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय.



   हमेशा की तरह आज का अखबार भी अपनी पिछली सुर्ख़ियों से आगे निकलने की होड़ करता मिला, जैसे ध्रितराष्ट्र को हर बीते कल से ज्यादा भयावह खबरें देने को शापित संजय. देश के हर कोने से आती सोच और कल्पना से परे अपराधों के ख़बरें.
बहुत बेबस महसूस करता हूँ अपने-आप को, क्यूंकि जहाँ से मैं देख रहा हूँ, वहां से यह स्थिति सुधरने वाली नहीं दिखती, पिछले साल भर में नौकरी के दौरान मैंने यह निष्कर्ष निकाला है (यहाँ मुझे वर्त्तमान और आने वाली पीढ़ी को देखने और समझने का मौका मिला ). 
नेता, नौकरशाह, पुलिस, माफिया, गुंन्डे, मवाली, मुहल्लेवाला, नुक्कड़ वाला, पडोसी, हम-तुम, ये -वो वगैरह-वगैरह ये सब सिर्फ उदहारण मात्र है, हमने पूरे तालाब में ही भंग घोल दी है, 
ये सब इंसान ही हैं और समाज के किसी न किसी संभ्रांत परिवार से संबध रखते हैं, आज के दौर में सामाजिक ताने-बाने को बुनने वाली ये परिवार नाम वाली इकाई ही भ्रस्ट हो चुकी हैं, इसकी शुरुआत पिछली पीढ़ी ने कई दशक पहले की थी जिसका परिणाम आज के पतित नागरिकों के रूप में सामने आ रहा है. 
हमने अपने बच्चों को स्वस्थ और अच्छे संस्कार देने के बजाय किसी भी तरह धनी बनने का लक्ष्य दिया, पोर्नोग्राफी और अश्लील सामग्री से लबालब, फिल्मों, पत्रिकाओं और इन्टरनेट जैसा सूचना संसार दिया, और इससे पोषित और पल्लवित हुआ आज अब अपना प्रभाव दिखाने लगा है, अभी तो महज़ शुरुआत है, वर्त्तमान परिस्थितियों में भविष्य की कल्पना बहुत डरावनी है, भ्रस्ट परिवारों से भ्रस्ट संस्कारों और लक्ष्यों के साथ आने वाली ये फसल बढती ही जा रही है. 
एक परिजन का यह कथन काबिले गौर हैं - मेरा बेटा डाकू बने या आईएस नम्बर एक का बने.....
मतलब साफ़ है- बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय.


क्या इनका काम सिर्फ निंदा करना है..?

महिलाओं और बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं का ग्राफ आसमान छू रहा है...हर घंटे बलात्कार की एक नयी घटना सामने आ रही है..! विकृत मानसिकता के लोग दरिंदगी की हदें पार करते हुए अपनी हवस की भूख मिटाने के लिए महिलाओं और बच्चियों की जिंदगी को नर्क बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। अपराधियों पर लगाम कसने के लिए तैनात पुलिस अपनी फरियाद लेकर थाने पहुंचने वालों के साथ ही अपराधियों जैसा सलूक करती है तो सरकार में बैठे जनता के नुमाइंदे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं..!
अति होने पर जनाआक्रोश फूटता है तो सरकार की भी नींद टूटती है। पुलिस को दोषियों को पकड़ने का अल्टीमेटम दिया जाता है और पीड़ित को दुत्कारने वाली पुलिस हरकत में आते हुए अपराधियों को गिरफ्तार करने में पूरी ताकत लगा देती है लेकिन ये तब होता है जब 16 दिसंबर जैसी या फिर 5 साल की मासूम के साथ बलात्कार और दरिंदगी की घटना सामने आती है। (जरूर पढ़ें- सिर्फ तारीख बदली…तस्वीर नहीं…!)
ऐसी ही किसी दरिंदगी के बाद हमारे माननीय राष्ट्रपति का मन आहत हो जाता है..! वे घटना पर दुख प्रकट करते हुए घटना की निंदा करते हैं..! अक्सर मौन रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी दुखी हो जाते हैं...वे भी घटना की निंदा करते हैं..! महिलाओं की सुरक्षा के लिए अभी बहुत काम किए जाने की बात करते हैं...संवेदनशील होने की बात करते हैं..! लेकिन कब..? इसका जवाब किसी के पास नहीं है..?
वजह साफ है समय गुजरने के साथ लोग अपनी रोजी रोटी के जुगाड़ में जुट जाते हैं तो सरकार भी सब भूलकर चैन की नींद सो जाती है..! फिर ऐसी ही किसी दरिंदगी पर जब लोगों का खून खौल उठता है तो फिर से घटना की निंदा की जाती है...महिला सुरक्षा की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं...दोषियों को हर हाल में सख्त सजा दिलाने के साथ ही पीड़ित को इंसाफ दिलाने की बातें की जाती हैं लेकिन नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात..!
क्या हमारे माननीय 16 दिसंबर जैसी या फिर 5 साल की मासूम के साथ दरिंदगी जैसे किसी घटना के घटित होने के बाद सिर्फ इसकी निंदा करने के लिए ही हैं..?  क्या महिलाओं और बच्चियों को सुरक्षित वातावरण देना इनकी जिम्मेदारी नहीं है..?  जाहिर है सरकार में शामिल लोग अगर चाहें तो दोषियों को तय समय सीमा के अंदर सजा दिलाने के लिए कड़े कानून बनाने की दिशा में काम कर सकते हैं ताकि अपराधियों को जल्द से जल्द उसके अंजाम तक पहुंचाने का रास्ता साफ किया जा सके लेकिन कड़े कानून बनाने की जब बात आती है तो उसके लिए कमेटियां गठित कर दी जाती हैं...आयोग बनाए जाते हैं और उनकी रिपोर्ट का इंतजार किया जाता है। रिपोर्ट आती भी है तो उसके बिंदुओं को लेकर कैबिनेट में मतभेद उभर कर सामने आते हैं..!
एंटी रेप लॉ जैसा कोई नया कानून सामने आता है तो उसमें भी ऐसे दरिंदों को फांसी की सजा देने के लिए शर्तें रख दी जाती हैं..! अब नये एंटी रेप लॉ को ही देख लें...इसकी धारा-376 ए में प्रावधान है कि रेप किए जाने के कारण अगर लड़की की मौत हो जाए या फिर उसे ऐसा जख्म हो जाए कि वह लंबे समय तक के लिए विजिटेटिव स्टेट(निष्क्रिय) में पहुंच जाए तो ऐसे मामले में कम से कम 20 साल कैद जबकि ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद अथवा फांसी तक हो सकती है। मतलब साफ है कि ऐसे दरिंदों को मौत की सजा के लिए भी या तो लड़की का रेप के बाद मरना जरूरी है या फिर विजिटेटिव स्टेट में पहुंचना..!
ऐसा हो भी जाता है तो लंबी कानूनी प्रक्रिया के चलते अदालत में ये मामले सालों तक लंबित रहेंगे। माना आरोपी को फांसी की सजा हो भी जाती है तो राष्ट्रपति के पास दया याचिका डालने का भी तो अवसर है..! ये छोड़िए इनके मानवाधिकारों की बात करने वालों की भी लंबी फौज है...जो इनको जेल में जरा सी तकलीफ होने पर उनके मानव अधिकारों की बात करते हैं लेकिन उसके मानवाधिकार का क्या जो ऐसे दरिंदों की हवस की शिकार बनीं..?
कुल मिलाकर ऐसे दरिंदे किसी मासूम को दर्द भरी मौत देने या फिर उसकी जिंदगी नर्क से भी बदतर बनाने के बाद भी जिंदा रहेंगे लेकिन जरा सोचिए उसका क्या जिसकी जिंदगी नर्क से भी बदतर हो गयी या फिर जिसने अपनी बेटी, बहन या फिर अपने किसी जिगर के टुकड़े को तड़प तड़प कर मरते देखा है..?
विडंबना देखिए 16 दिसंबर 2012 की घटना हुई तो एंटी रेप लॉ वजूद में आता है...दिल्ली में 5 साल की मासूम के साथ दरिंदगी होती है तो प्रधानमंत्री कहते हैं कि महिला सुरक्षा के लिए बहुत काम किया जाना बाकी है। सवाल ये उठता है प्रधानमंत्री जी कि क्या अब इस बहुत कुछ को अमल में लाने के लिए एक और घटना का इंतजार किया जा रहा है..? (जरूर पढ़ें- बलात्कार- 1971 से 2012 तक!)
खैर छोड़िए कहां तक सवाल करेंगे..? किससे सवाल करेंगे..? सवालों की फेरहिस्त तो काफी लंबी है लेकिन अफसोस जवाब किसी के पास नहीं है...क्योंकि किसी घटना के घटित होने के बाद इनका मन आहत हो जाता है...ये घटना की निंदा करते हैं और बहुत जल्द पीड़ित के दर्द को भूल जाते हैं..!

deepaktiwari555@gmail.com

21.4.13

भ्रष्टाचार : अपराध की जड़


भ्रष्टाचार : अपराध की जड़

किसी भी देश के सिस्टम में यदि भ्रष्टाचार घुस जाता है तो उस देश को चलाने वाला शासक
और प्रजा दोनों पर संकट आ जाता है।हमारे देश में भ्रष्टाचार के कारण ही अपराध रुक नहीं
पा रहे हैं।हर विभाग में कुछ भ्रष्ट लोग सिस्टम को तहस नहस कर रहे हैं।

        पुलिस जो शांति और व्यवस्था का काम देखती है वह भी अपराध को रोक नहीं पा रही
है क्योंकि जब भी किसी चौकी पर अफसर की नियुक्ति होती है उसके पहले उसे भी भ्रष्ट लोगों
को खुश करना पड़  जाता होगा और उसे जिसे खुश करना है वो कोई छोटा व्यक्ति नहीं होता है।
यदि किसी ने किसी को किसी भी नियुक्ति के लिए कुछ भी आर्थिक या अन्य कोई फायदा दिया
है तो सबसे पहले वह जनता के काम को कर्तव्य समझ कर क्यों करेगा,वह व्यक्ति जिस पद पर
है उसी पद से खुद के द्वारा दिए गए पैसे वसूल करेगा और उस पद से अतिरिक्त लाभ भी लेगा।

    यह भ्रष्टाचार सिस्टम के उपरी भाग का है और यहीं से सिस्टम खराब होना शुरू हो जाता है
क्या किसी अव्यवस्था के प्रति हम आन्दोलन और नारे लगाकर व्यवस्था को पा सकते है ?
इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा।जब तक सिस्टम का उपरी हिस्सा सही नहीं होगा तब तक
अपराध रोकने में बड़ी बड़ी बाधाएं आती रहेगी।

  सिस्टम के उपरी हिस्से को स्वस्थ करने के लिए मुलभुत परिवर्तन करना पडेगा।चुनाव
प्रणाली को कम खर्चीली बनाना होगा।आज एक-एक निकायों के चुनाव में पैसे लाखो में खर्च
हो रहे हैं ताज्जुब यह है कि पैसा जो खर्च हो रहा है वह आम जनता को दिखाई देता है पर
सिस्टम को दिखाई नहीं देता है। हर राजनैतिक दल को पार्टी चलाने के लिए पैसे की आवश्यकता
होगी और उसकी पूर्ति या तो जनता करे या फिर उम्मीदवार खुद खर्च करे। यदि चुनावों के
खर्च में कमी आ जाए तो कुछ व्यवस्था सुधार की बात शुरू की जा सकती है।

  जो उम्मीदवार एक बार जीत के व्यवस्था का अंग बना गया है यदि उसने जीतने के लिए
बेफाम पैसा खर्च किया है तो वह उस खर्च किये पैसे की उगाही में लग जाता है और जनता का
काम करने की जगह पैसा बनाने में लग जाता है।अब वह बन्दा जिस भी विभाग का हेड बनेगा
वह अपने से नीचे के बड़े पदों पर या बड़े ठेकों पर पैसा बनाने लगेगा और यहीं से भ्रष्टाचार शुरु
हो जाता है।

  जब भी कोई छात्र बड़ी परीक्षा पास कर लेता है तब अगली कड़ी के रूप में उसे साक्षात्कार
देना होता है।साक्षात्कार के समय क्या होता होगा यदि साक्षात्कार लेने वाली व्यवस्था में भ्रष्ट
लोग शामिल हो गए हो।छात्र को नौकरी चाहिए और नौकरी के लिए योग्यता के अलावा रिश्वत
भी देनी पड़ जाती है यदि उसे किसी भ्रष्ट व्यवस्था को खुश करके नौकरी मिली है तो वह छात्र
काम करने से पहले दिए गए धन की उगाही में लग जाएगा,सेवा भावना खत्म हो जायेगी।

  अभिभावक अपनी  संतानों के सुन्दर भविष्य के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था बनाते हैं
बच्चे भी लग्न से पढ़ते हैं परीक्षा पास कर लेते हैं और चयन के समय अभिभावक भी गलत
तरीके से संतानों की नियुक्ति का झुगाड़ लगाते हैं।यदि यह तरीका रहेगा तो फल क्या होगा
इसे आसानी से समझा जा सकता है।

इस देश की समस्या केवल यह नहीं है कि केवल तंत्र में भ्रष्टाचार है बल्कि इस देश का नागरिक
भी भ्रष्ट बन कर आगे बढ़ रहा है।किसी भी नियुक्ति में लिखित परीक्षा में यदि उसका बच्चा पास
हो गया है और साक्षात्कार के लिए जाना है तो अभिभावक खुद भ्रष्ट तरीके से अपनी संतान की
नियुक्ति चाहने लग जाता है,उसे अपने बच्चे की योग्यता पर भरोसा कम और रिश्वत देकर काम
पूरा करने की पद्धति पर विश्वास ज्यादा होता है,और इस तरह से नौकरी मिल जाती है तो फिर
नतीजा ................

यदि सुशासन को पाना है तो हम भारतीयों  की पहली लड़ाई भ्रष्टाचार के विरोध में होनी चाहिए
अगर मूल बिमारी का ईलाज हम नहीं करेंगे तो सुन्दर व्यवस्था सपना ही बन जायेगी और
हम लोग नारे लगाकर और आन्दोलन करके फोटो खिचाते रहेंगे।अगर दिल में बदलाव की
भावना है तो डटकर संघर्ष करो भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ यही एक रास्ता है जो हमे मार्ग दिखा
सकता है।केवल अच्छी बाते किताबों में लिख देने से या प्रभावशाली भाषण देने दे देने से या
आफत आने पर केवल संवेदना जता देने से काम बनने  वाला नहीं है।

नए भारत के निर्माण के लिए आवश्यकता है दृढ इच्छा शक्ति और दृढ संकल्प के साथ आगे
बढ़ने की।क्या हम सुन्दर भारत चाहते हैं .........?                  

स्थान परिवर्तन


स्थान  परिवर्तन 

कल शाम की बात है ,मैं अपने रिश्तेदार के ग्रह प्रवेश के अवसर पर उपस्थित था।गाँव से आये
भैया ने मुझसे कुशल क्षेम पूछी। मेने कहा -मैं यहाँ प्रसन्न हूँ।मेने उनके बारे में पूछा -

वो बोले - आप शहरी लोगों जैसी जिन्दगी हमारी नहीं है,बस ठीक ठाक चल रहा है।

मेने उनसे पूछा -आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ?

वो बोले -यह इसलिए कह रहा हूँ कि आप लोग गाँव छोड़ कर शहर मैं आ गए और हम वहीं
रह गये।आप ने तकलीफ झेलकर स्थान परिवर्तन कर लिया इसलिए उन्नति के अवसर भी
आप लोगों को हमारे बनस्पत ज्यादा मिले।

बात यहीं खत्म हो गयी और मैं भी स्व रूचि भोज लेकर घर आ गया।

सुबह जब मैं उठा तो घर की वाटिका में टहलने लगा।मेरा ध्यान अनायास एक गमले पर
चला गया जिस गमले में मेने 9 -10 महीने पहले कुछ बीज बिल्व के पेड़ के डाल दिए थे
उस समय गमले में पाँच पौधे लगे थे।उन पौधों में से मेने एक पौधा दुसरे गमले में लगा दिया
था और एक पौधा उस गमले में लगा दिया जिसमे पहले से गुलाब का पौधा लगा था। मेने
जिस गमले में अकेले बिल्व को लगाया था वह पौधा चार फुट लम्बा हो गया था और तना भी
काफी मोटा हो गया था।जिस गमले में गुलाब के साथ बिल्व के पौधे को लगाया था वह पौधा
ज्यादा नहीं पनप पाया केवल छह सात इंच का था और जिन पौधों का स्थान परिवर्तन नहीं
किया था उनमे से एक-एक करके दौ पौधे नष्ट हो गए और अंतिम पौधा नष्ट होने की कगार
पर था।

              मुझे यह देख कर अचानक रात का वाकया याद आ गया कि गाँव से आये भैया ने बहुत
सटीक बात कही थी कि आप लोगों ने स्थान परिवर्तन कर लिया और उन्नती के अवसर पकड़ते
रहे।
        मेने उस बिल्व को देखा जो चार फुट लंबा था शायद मेरे से यह कह रहा था कि खुद को
उन्नती के पायदान पर देखना हो तो अकेले ही चल पड़ो और संघर्ष करो ,डटे रहो।

       गुलाब के साथ वाला पौधा यह कह रहा था कि अपने से बड़े पेड़ की छाया में मत पलो ,एक
बड़े पेड़ की छाया तले दूसरा बड़ा पेड़ विकसित नहीं हो सकता अगर खुद को बड़ा बनाना है तो
बड़े पेड़ की छाया से दूर जाकर संघर्ष करो।

      जिस गमले के बिल्व का स्थान परिवर्तन नहीं किया था वह मुझसे यह कह रहा था कि
यदि एक ही स्थान पर पड़े रहोगे और मजे की जिन्दगी जीना चाहोगे तो कुछ समय बाद पतन
की ओर चले जाओगे। लक्ष्य को हासिल करने के लिए गतिशील रहना होगा,अवसर की प्रतीक्षा
में समय खोना मुर्खता है।                      

20.4.13

बलात्कार कानून की नहीं मानसिक सोच की लड़ाई

ये इंसान ही है जो सृष्टि पर सबसे सर्वोत्तम माना जाता है। इस उत्कृष्टता की पराकाष्ठा अब इस स्तर पर उतर आई है कि मासूम बच्चियां हवस का शिकार हो दम तोडऩे लगी हैं। मासूमों के साथ होने वाले ये दर्दनाक और वीभत्स हादसे कुछ कहते हैं... सजग हो जा ऐ इंसान की मातृशक्ति पर चलने वाली इस सृष्टि पर ये कहर अब और नहीं। मासूमों के देह से होता ये खिलवाड़ उस कुत्सित मानसिकता का भौंडा स्वरूप है जहां पुरुष की मानसिकता स्त्री को केवल यौन संतुष्टि का साधन समझती है। जब-तक नारी जाति का अस्तित्व उसके शरीर को लेकर तोला और मापा जाएगा, तब -तक हमारी बच्चियां हमारे खुद के घरों में भी महफूज नहीं होंगी। किसी भी कानून या प्रदर्शन से ये हादसे तब-तक नहीं रूक सकते, जब-तक  स्त्री को केवल और केवल वासना और उपभोग का पर्याय मानने की सोच नहीं बदलेगी। उसे केवल और केवल इंसान की तरह से देखने और समझने का नजरिया नहीं विकसित होगा। केवल शारीरिक भिन्नता से एक स्त्री इस दुनिया में किसी भी दिल और दिमाग रखने वाले इंसान की प्रताडऩा का शिकार कैसे हो सकती है। गर्भ धारण कर जीवन के नए अंकुर में जान फूंक कर उसे मानव का आकार देने वाली यही है, फिर आखिर क्यों उसी की कोख से जन्मा मानव रूपी पुरुष उसे हीन या मांस का एक लोथड़ा भर मान बैठता है। क्यों उसकी सोच उसे शारीरिक संबंध बनाकर पा लेने की सोच पर आकर खत्म हो जाती है। देश में ही नहीं पूरे विश्व में क्योंकर कोई स्त्री दामिनी, निर्भया का दर्द अनगिनत बार सहने को मजबूर हो। प्रत्येक घर में पत्नी के इतर मां, भाभी, बहन और बेटी जैसे पवित्र रिश्ते हैं और क्या ये रिश्ते घर की चारदीवारी पर ही सिमट जाते हैं। मौजूदा दौर में दिल यही सब मानने को मजबूर होता है,क्योंकि जिस भी घर में मां और बेटी है शायद ही उस घर का पुरुष किसी पराई स्त्री को गलत नजर से दिखने की कल्पना भी कर पाएं। कोई भी धर्म या समाज किसी भी पुरुष को ये सोच रखने की इजाजत नहीं देता, कानूनों के बल पर नहीं बल्कि ये लड़ाई सोच और मानसिक स्तर पर लड़कर जीतने की है। सरकार, राजनेताओं और राजनीतिक दलों पर आरोप लगाने से पहले समाज को स्वंय भी अपने अंदर झांककर देखना जरूरी है, हमारी सोच इस दिशा तक गिर गई है कि वासना शांत करने के लिए मासूम बच्चियों की तरफ नजर उठाने से भी इंसानी दिल को धिक्कारना गंवारा नहीं समझती। अब कोई गुडिय़ा रूसवा न हो और सिसकियों में अपना दर्द संभाले, इससे पहले ही संस्कारों के बीज हमको और आपको अपने घरों से बोने होंगे और समाज में इस पौधों को वृक्ष बनाकर छांव के लिए तैयार करना होगा। 

सिर्फ तारीख बदली...तस्वीर नहीं...!



तारीख बदल गयी...मौसम भी बदल गया लेकिन नहीं बदले तो हालात...नहीं बदली तो लोगों की सोच और नहीं बदली दिल्ली की तस्वीर...नहीं बदली देश की तस्वीर..! 16 दिसंबर 2012 की वो तारीख आज भी नहीं भूलती...! उस दिन को याद करते हुए आंखें आज भी डबडबा जाती हैं...शब्द आसूंओं में डूब जाते हैं..! आंसुओं से तरबतर घटना के बाद के वो दिन भले ही एक हंसती खेलती जिंदगी को इस क्रूर दुनिया से बहुत बहुत दूर लेकर चले गए हों लेकिन अपने पीछे कई सवाल भी खड़े करके चले गए..? (जरूर पढ़ें- क्या लड़की होना उसका कसूर था ?)
सड़कों पर देश का गुस्सा और कुछ भी कर गुजरने को तैयार बैठे युवाओं के आक्रोश के बाद नींद से जागी सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बड़े बड़े वादे औऱ दावे करते हुए भले ही कड़े कदम उठाने की कवायद शुरु कर दी हो लेकिन इन वादों और दावों का सच एक बार फिर से छलावा साबित हुआ..! (जरूर पढ़ें- दिल्ली गैंगरेप- यार ये लड़की ऐसी ही होगी !)
दो दिन पहले ही दिलदार दिल्ली का खिताब हासिल कर इतराने वाली दिल्ली एक बार फिर से सबको शर्मशार कर गयी। नवरात्र में एक तरफ घर-घर में कन्याओं के पैर धोए जा रहे थे...कन्याओं का पूजन किया जा रहा था दूसरी तरफ दिल्ली के गांधीनगर में विकृत मानसिकता एक पांच साल की मासूम की जिंदगी को रौंद रहा था..!  विकृत मानसिकता ने एक बार फिर से दिखा दिया कि उनके लिए उनकी हवस की भूख के आगे कोई मायने नहीं रखता फिर चाहे वह पांच साल की मासूम हो या फिर कोई और..? (जरूर पढ़ें- पहले पूछी उम्र…फिर किया बलात्कार..!)
उनके लिए घर- परिवार, रिश्ते नाते, समाज कुछ भी मायने नहीं रखते उनके लिए मायने रखती है तो किसी भी कीमत पर अपनी हवस की भूख को शांत करना..!
विकृत मानसिकता का कोई ईलाज नहीं है लेकिन दिल्ली पुलिस को क्या हो गया..? क्या उनकी सोच भी इतनी विकृत हो गयी है कि वे 16 दिसंबर की दिल दहला देने वाले घटना के बाद भी किसी मासूम के गुम होने पर उसे तलाश करना तो दूर एफआईआर तक दर्ज नहीं करते हैं..?  अलग-अलग मामलों में पीड़ित के परिजनों की एफाईआर दर्ज न करने के लिए तो पुलिस पहले ही बदनाम है..! यहां तक तो समझ में भी आता है लेकिन 5 साल की मासूम के साथ बल्ताकार और हैवानियत का पता चलने के बाद आरोपी को गिरफ्तार करने की बजाए पीड़ित के परिजनों को दो हजार रूपए की पेशकश करके चुप होने की बात करना क्या दर्शाता है..? जाहिर है दिल्ली पुलिस की ये हरकतें किसी विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति से अलग तो नहीं है..! फर्क सिर्फ इतना है कि एक हैवानियत की सारी हदें पार करते हुए मासूम की जिंदगी को नर्क से भी बदतर बना देता है और दूसरा उसका साथ देता है..! (जरूर पढ़ें- अबोध कन्याओं से यौन अपराध क्यों..?)
16 दिसंबर 2013 के बाद भी न रुकने वाली हैवानियत भरी बलात्कार की घटनाएं और अब पांच साल की मासूम के साथ दरिंदगी ये साबित करने के लिए काफी है कि महिलाएं और बच्चियां न तो तब सुरक्षित थी और न ही अब..! (जरूर पढ़ें- बलात्कार- 1971 से 2012 तक !)
माना हम विकृत मानसिकता को नहीं बदल सकते...ऐसे लोगों की सोच को नहीं बदल सकते लेकिन ऐसा तो नहीं कि इस तरह की घटनाओं को कम भी नहीं किया जा सकता..? एक भी बच्ची को ऐसे लोगों की हवस का शिकार बनने से नहीं रोका जा सकता..? शिकायत मिलने पर पुलिस की सख्ती और त्वरित कार्रवाई के बाद दोषियों के मामले के निपटारे के लिए फास्ट ट्रेक कोर्ट की स्थापना और तय समय सीमा के अंदर दोषियों को मौत की सजा क्या ऐसे लोगों के मन में खौफ पैदा नहीं करेगा..? जाहिर है ऐसी घटनाओं को पूरी तरह नहीं भी रोका जा सकता तो इन में कमी तो आ सकती है लेकिन ऐसा तब होगा न जब की पुलिस शिकायत मिलने पर त्वरित कार्रवाई करे और फास्ट ट्रेक कोर्ट दोषियों को मौत की सजा सुनाए..!
एक बार फिर से महिला सुरक्षा को लेकर बहस शुरु हो गयी है और दोषियों को मौत की सजा देने की वकालत भी होने लगी है लेकिन एक सुलगता सवाल जेहन में बार-बार उठ रहा है कि क्या अब बदलेगी दिल्ली पुलिस..? क्या अब बदलेगी दिल्ली की तस्वीर..? क्या अब बदलेगी देश की तस्वीर..? क्या अब सुरक्षित रहेंगी महिलाएं और बच्चियां..? या फिर कुछ दिनों या महीनों बाद फिर से आएगी एक ऐसी ही दर्द भरी तारीख..! जिसका एहसास भर ही डरा देता है।

deepaktiwari555@gmail.com

माफ करना प्यारी गुड़िया हम शर्मिंदा हैं!

-नितिन सबरंगी
राजधानी दिल्ली में 5 साल की कोमल उम्र में गुड़िया रूह कंपा देने वाली हैवानियत का शिकार हो गई। घटना दम तोड़ती इंसानी संवेदनाओं का घिनौना चेहरा भर है। चमक-दमक के बीच कंकरीट के जंगलों में लगी भीड़ में इंसान तो हैं, लेकिन उनकी इंसानियत मर चुकी है ओर जो बची भी है वह कोढ़ग्रस्त है। दरिंदगी की शिकार हुई होनहार छात्रा दामिनी के मामले को भी नया-पुराना कहना बेमानी होगा क्योंकि ऐसी घटनाओं के दर्द उन परिवारों से पूछिए जो इससे रू-ब-रू
होते हैं। झूठी तसल्लियां उनके जख्मों को ओर भी दर्दनाक बनाती हैं। ऐसी घटनाओं के लिये किसी एक को दोषी नहीं बल्कि समूची व्यवस्था जिम्मेदार होती है। टूटती-बिखरती परम्पराएं, रिश्ते-नाते, जीवनशैली, मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता, विज्ञापनों में भावनाओं को भड़काने वाली कलाएं व ओर भी बहुत कुछ।  घटनाएं हमारे उस देश की हैं जहां कन्याओं पूजा जाता है, लेकिन क्या कोई दावे से कह सकता है कि नौ दिन तक चलने वाले आस्था के व्रतों में कन्याओं के भू्रण कत्ल व उन पर होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लग जाता है।  ऐसी घटनाएं गुस्से के साथ सभी को शर्मसार करती हैं। लाख टके का सवाल वही कि आखिर कब तक?

19.4.13

"rape टूरिज्म"

क्या आप को ऐसा नहीं लगता कि दिल्ली को "rape टूरिज्म" के लिए विकसित कर देना चाहिए ?? आखिर हमारी सरकार पूरी शिद्दत से इसके लिए प्रयास कर रही है. बढ़िया फुल पेज फ़ोर कलर विज्ञापन छापे जाएँ _ आइये. २ साल से लेकर १०० साल तक की  "जवान महिलाएं" उपलब्ध हैं ... कोई केस दर्ज नहीं होगा.. आप जगह का चुनाव कर के पैसा अदा कर दें ... काम पूरा होते तक पुलिस के न आने कि गारंटी , पकडे जाने पर सरकारी वकील कि सुविधा, सजा होने पर फरार होने का विशेष पॅकेज .... सरकार  की नीयत ऐसी ही लग रही है क्योंकि कोई ठोस कदम न उठाना एक चमत्कार ही लग रहा है ....

18.4.13

मोदी के इस पैंतरे के मायने क्या हैं?


वर्तमान में सर्वाधिक सशक्त व चर्चित हिंदूवादी चेहरे की बदोलत भाजपा में प्रधानमंत्री पद के सशक्त दावेदार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी छवि के विपरीत एक ऐसी पहल की है, जिसने राजनीतिक हलके को तो भौंचक्का किया ही है, विश्लेषकों को भी असमंजस में डाल दिया है। अकेले गुजरात दंगों के आरोप की वजह से भाजपा के धर्मनिरपेक्ष सहयोगियों के लिए अछूत बने नरेन्द्र मोदी की सरकार ने तय किया है कि वह नरोड़ा पाटिया में दोषी करार दिये गये उन दोषियों के लिए सजा-ए-मौत मांगेगी, जो अभी विभिन्न विभिन्न सजाओं के तहत जेलों में बंद हैं। ज्ञातव्य है कि नरोडा पाटिया नरसंहार के लिए बाबू बजरंगी को आजीवन कारावास मिला था, जबकि माया कोडनानी को 28 साल के जेल की सजा सुनाई गई थी। गुजरात सरकार ने तय किया है कि वह माया और बजरंगी सहित सभी दसों आरोपियों के लिए फांसी की सजा के लिए हाईकोर्ट जाएगी और अन्य 22 दोषियों के लिए सजा बढ़ाने की मांग करेगी। असल में पहल एसआईटी ने की है, मगर जिस तरह राज्य के कानून विभाग ने इसे मंजूरी दी है, उससे यह समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसा उसने मजबूरी में किया है अथवा जानबूझकर सोची-समझी रणनीति के तहत। मोदी सरकार की ओर से गठित तीन सदस्यीय वकीलों का पैनल सारी तैयारी पूरी करने के बाद अगले हफ्ते गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है।
दरअसल सन् 2002 दंगों के बारे में जब तहलका ने स्टिंग ऑपरेशन किया था तो बाबू बजरंगी ने साफ कहा था कि नरेन्द्र मोदी के कहने पर ही ऐसा हुआ हुआ था। बजरंगी ने मोदी को मर्द बताते हुए दावा किया था कि वे उनको बचा लेंगे। वे मोदी के इतने कट्टर व अंध भक्त थे कि यह तक कह दिया कि हिंदू हित के लिए नरेन्द्र भाई कहेंगे तो वे अपने शरीर पर बम बांध कर विस्फोट कर देंगे। बाद में हालात बदले और कोर्ट में यही स्टिंग ऑपरेशन बतौर सबूत पेश किया गया, नतीजतन नरोडा पाटिया नरसंहार में अभियुक्त दोषी साबित किए जा सके। ऐसे में यह सवाल कौंधना स्वाभाविक है कि ऐसे  अनन्य भक्त बजरंगी और उनकी ही सरकार में मंत्री रही माया कोडनानी के लिए फांसी की सजा मांगने के लिए तैयार कैसे हो गई? हालांकि अब तक हिंदूवादी संगठनों की ओर से इस पर कुछ खास प्रतिक्रिया नहीं आई है, मगर मोदी के राजनीतिक गुरु रहे शंकर सिंह वाघेला ने जरूर इसे सियासी स्टंट बताया है। उन्होंने कहा है कि 2002 में मुसलमानों के कत्लेआम के बाद अब मोदी को समझ आ रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों के बगैर नहीं जीता जा सकता, इसलिए अपनी छवि ठीक करने के लिए मोदी ऐसा करने जा रहे हैं। संभव है वाघेला की बात सही हो। लगातार सांप्रदायिकता का आरोप ढ़ो रहे और अकेले इसी वजह से बहस का मुद्दा बने मोदी को फिलवक्त इसी की जरूरत है कि वे अपने आपको सर्वस्वीकार्य बनाएं। अब देखना ये है कि मोदी के इस कदम को हिंदूवादी किस रूप में लेते हैं। मगर इतना तय है कि यह कदम बिना सोचे-समझे नहीं उठाया जा रहा।
-तेजवानी गिरधर

मोदी के खिलाफ क्यों हैं नीतीश..?


2014 में एनडीए की सरकार बनने का तो कुछ पता नहीं लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी को लेकर तकरार चरम पर पहुंच गयी है। एनडीए का कुनबा बिखरने को है लेकिन पीएम की कुर्सी को लेकर रार में कोई कमी नहीं है..! यहां तक तो ठीक था लेकिन अब गड़े मुर्दे उखाड़कर एक दूसरे के सिर आरोप मढ़ने का खेल शुरु हो गया है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा की तरफ से संभावित पीएम के उम्मीदवार हैं लेकिन एनडीए का 17 साल पुराने घटक दल जनता दल यूनाइटेड को भाजपा की तरफ से पीएम की उम्मीदवारी के लिए एक धर्मनिरपेक्ष चेहरा चाहिए क्योंकि जद यू मोदी को 2002 के गुजरात दंगों की वजह से सांप्रदायिक मानती है..!
जद यू को मोदी के मुस्लिम टोपी न पहनने पर भी ऐतराज है और जदयू ने फिलहाल साफ कर दिया है कि मोदी उनको बिल्कुल भी मंजूर नहीं है। भाजपा के कुछ नेताओं को मोदी के खिलाफ जदयू नेताओं की बयानबाजी रास नहीं आ रही है ऐसे में भाजपा ने नीतिश कुमार को ही गुजरात दंगों के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। भाजपा नेता कहते हैं कि नीतीश कुमार तत्कालीन रेल मंत्री थी ऐसे में रेल मंत्री गोधरा में हुए साबरमती ट्रेन अग्निकांड रोक देते तो गुजरात दंगे नहीं होते।
नीतीश कहां चुप रहने वाले थे वे पलटवार करते हुए कहते हैं कि उन्होंने साबरमती ट्रेन अग्निकांड की रिपोर्ट संसद में पेश की थी और दंगे रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी न की उनकी।
कुल मिलाकर भाजपा और जदयू के बीच तकरार लगातार बढ़ती ही जा रही है जो साफ इशारा कर रही है कि निकट भविष्य में एनडीए के कुनबे में जदयू के दिखाई देने की उम्मीद कम ही है..! (जरूर पढ़ें- नरेन्द्र मोदी-नीतिश कुमार...क्यों है तकरार ?)
मोदी को सांप्रदायिक बताने वाले बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू नेता नीतीश कुमार की एक बात समझ में नहीं आती..? नीतीश कहते हैं कि वे ऐसे नेता का नाम भाजपा से पीएम की उम्मीदवारी के लिए स्वीकार करेंगे जो जरूर पड़ने पर टोपी भी पहने और तिलक लगाने से भी जिसे कोई ऐतराज न हो..!
नीतीश को अगर मोदी सांप्रदायिक लगते हैं तो फिर 2002 में एनडीए सरकार में रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार ने गुजरात में दंगों के बाद क्यों खुद की पार्टी को एनडीए से अलग नहीं किया..? उस वक्त क्यों नीतीश ने रेल मंत्री की कुर्सी से इस्तीफा देकर अपने रास्ते अलग कर लिए..?
क्यों नीतीश कुमार ने उसके बाद बिहार में भाजपा के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा और अपनी सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन लिया..?
जाहिर है 2002 में नीतीश रेल मंत्री की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पाए और उसके बाद बिहार में सत्ता के मोह में नीतीश बंधे रहे और भाजपा के साथ मिलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर सरकार चलाते रहे..!
2002 से 2012 तक जिस नीतीश को मोदी सांप्रदायिक नहीं दिखाई दिए वो मोदी अब अचानक से नीतीश की आंख की किरकिरी बन गए हैं..! नीतीश को जब लगा कि उनकी ही तरह एक राज्य का मुख्यमंत्री पीएम की कुर्सी की दौड़ में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है तो नीतीश को 10 साल पुराने 2002 के गुजरात दंगों की भी याद आ गयी..!
जाहिर है पीएम की कुर्सी की महत्वकांक्षा तो नीतीश भी रखते होंगे ऐसे में कैसे नीतीश जिस मोदी को वे खुद के बराबर के कद का नेता मानते हैं उन्हें पीएम की कुर्सी की दौड़ में इतनी आसानी से आगे निकल जाने देंगे..! (जरूर पढ़ें- मोदी, नीतीश और शिवराज..!)
राजनीति में कुछ भी संभव है ऐसे में इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जदयू का मोदी का विरोध करना सिर्फ जदयू का ही विरोध है या फिर इसके पीछे कुछ भाजपा के ऐसे नेता है जो जदयू के सहारे मोदी के नाम पर विरोध की लकीर को लंबी करना चाहते हैं ताकि मोदी पीएम की उम्मीदवारी की दौड़ से बाहर हो जाएं और एनडीए की सरकार बनने की स्थिति में पीएम की कुर्सी के लिए वे दावेदारी कर सकें..!
बहरहाल तकरार अपने चरम पर है ऐसे में ये देखना रोचक होगा कि 17 साल पुरानी भाजपा और जदयू की दोस्ती टूटने से एनडीए का कुनबा बिखरेगा या फिर जदयू की 17 साल पुरानी दोस्ती की खातिर भाजपा मोदी के पीएम की कुर्सी के अरमानों पर पानी फेर देगी..!

deepaktiwari555@gmail.com

17.4.13

असरदार ब्लॉग@ Makemytrip.com




ख़बर का असर तो आपने सुना और देखा होगा लेकिन क्या बलॉग का असर सुना है। मेरे साथ तो कुछ ऐसा ही हुआ। Makemytrip.com का अपना एक कटु बस यात्रा का अनुभव कल आप सभी लोगों के साथ साझा किया था। (जरूर पढ़ें- अनुभव@Makemytrip.com)। रवि मिश्रा जी ने नवभारत टाइम्स के मेरे ब्लॉग को अपने ट्विटर अकाउंट पर Share किया था जिस पर Makemytrip.com की Customer Care Team की भी नजरें पड़ गयी और मेरा ये अनुभव Makemytrip.com के लोगों तक  तक भी पहुंच गया। आज शाम 3 बजकर 54 मिनट पर Makemytrip.com से किन्हीं सलमान अहमद का फोन आया था और उन्होंने मुझसे पूरी घटना की जानकारी ली और अपने स्तर पर भी इसकी जांच कराने की बात कही।
4 बजकर 20 मिनट पर फिर से सलमान अहमद साहब का फोन आता है और मुझे हुई असुविधा के लिए Makemytrip.com की तरफ से माफी मांगते हुए यात्रा का पूरा पैसा रिफंड करने की बात कहते हैं। साथ ही संबंधित बस ऑपरेटर International Tourist Centre को तत्काल Blacklist किए जाने की भी मुझे जानकारी दी। ऐसा नहीं है कि यात्रा का अनुभव या इसकी शिकायत मैंने Makemytrip.com से नहीं की थी लेकिन ईमेल और फोन से फीडबैक देने के बाद Makemytrip.com से कोई जवाब नहीं मिला।
खैर ब्लॉग के माध्यम से देर से ही सही Makemytrip.com की सकारात्मक प्रतिक्रिया आयी तो अच्छा लगा। लेकिन Makemytrip.com किसी शिकायत के आने से पहले ही यात्री सुविधाओं से कोई समझौता न करते हुए पहले ही बेहतर सर्विस देने वाले बस ऑपरेटर्स से समझौता करता तो ज्यादा अच्छा लगता।
फिलहाल तो Makemytrip.com का सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया। उम्मीद करता हूं कि भविष्य में किसी का मेरी तरह इस कटु अनुभव से सामना न हो।

deepaktiwari555@gmail.com

शिक्षा की भिक्षा और हमारा समाज

आरपी सिंह
अब पत्रकारिता में भी पत्रकारों की योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं हमारे काटजू जी। समझ में नहीं आता की जहां 90 प्रतिशत लोग मूर्ख हों वहाँ पत्रकार शिक्षित रहकर क्या कर लेगा ? इस देश की दुर्दशा तभी से शुरू हुई जब से शिक्षा को अत्यंत जरूरी बताया गया और उसका सरकारीकारण किया गया। पहले अल्प शिक्षित लोग होते थे तो वे ईमानदार और सद्गुणों से युक्त होते थे। पूरे समाज में मातृशक्ति का सम्मान किया जाता था। लोग घूंस जैसी चीजों से घृणा करते थे। जब से देश में तथाकथित उच्च शिक्षित लोगों की बाढ़ आई रंगीन डिग्रियों को ही सबकुछ समझा जाने लगा तब से देश ही नहीं समाज की भी दुर्दशा होनी शुरू हो गई। आलम ये है की शिक्षा का स्तर जितना ही ऊपर गया आदमीं का नैतिक चरित्र नीचे गिरता गया। प्रशासनिक बहानेबाजी ने भी जोर पकड़ लिया। न्यायाधीश महोदय भी फैसले से जयादा तारीखें देने में विस्वास करने लगे। आयोग बैठाए तो गए मगर कितने आयोगों की रपट पर कार्यवाही हुयी ये पूरादेश जनता है। बस एक ही रटा -रटाया जुमला चलता जा रहा है की हम जांच कर रहे हैं न? सांच को जांच की आंच पर चढ़कर चमकने की बजाय उसपर लेट लतीफी की कालिख पोतकर लोग अपनी किस्मत चमकाने में लगे हैं। ऐसे लोग अतिउच्च शिक्षित और सभ्य बताये जाते हैं। हर युग में द्रोणाचार्य हमारे समाज में रहे हैं। जो मेहनत करके आगे बढ़ानेवाले एकलव्य का अंगूठा कटाने को तत्पर दिखाई देते हैं। हमारे समाज में एक खून की सजा तो फांसी या फिर उम्र कैद होती है मगर जो तीस-तीस लोगों को सरेआम गोलियों से भूनती है उसको हमीं चुनकर संसद में बैठाते हैं? उसदिन कहाँ थे ये सभ्य समाज के लोग? दुर्भाग्य का विषय है कि एक डकैत को सांसद बनाया तो जा सकता है मगर एक गरीब जो किसी तरह कलम के सहारे अपनी रोजी रोटी जुगाड़ करना चाहता है उसको अयोग्य बताकर और कमजोर बनाया जा रहा है। तो क्या ये मानलिया जाये की अब इन शिक्षितों और सभ्य समाज के देश में गरीब और लचर व बेबस लोगों के लिए कोई जगह नहीं है? काटजू जैसे लोग ये क्यों नहीं मानते की जितनी भी अच्छी रचनाएँ हमारे कवियों संतों और महात्माओं ने रची थी उनके पास आपके इस भारत सरकार की रंगीन और चमकीली डिग्रियां नहीं थीं। आज कबीर दास जी को एम ए में पढाया जाता है उन्हों ने खुद लिखा है की मसि कागद छुयो नहीं कलम गह्यो नहि हाथ। अच्छ तो तब होता की इस शिक्षा का बाजारीकरण रोका जाये। जो मीडिया हाउसेस बड़े-बड़े कालेज खोलकर धड़ल्ले से चला रहे हैं जाहाँ मोटी फीस वसूली जा रही है पहले उसको बंद कराएँ। अगर गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना शुरू कर देंगे तो बहुत जल्दी एक अच्छी और योग्य पत्रकारों की बैच आपको चुनौती देने के लिए खादी मिलेगी। यही हाल चिकित्सा और दूसरे क्षेत्रों में भी लागू होती है। धन्वन्तरि वैद्य को किसी मेडिकल काउन्सिल ने पंजीकृत नहीं किया था। हेनीमैन भी एलोपैथिक डॉक्टर होते हुए भी होम्योपैथी ईजाद की , लुकमान हकीम को भी किसी यूनानी कौंसिल या फिर किसी सरकार ने डिग्री नहीं दी थी मगर ये आज के चिकित्सकों से ज्यादा योग्य थे। चोरी की थीसिस खरीद कर जो डॉक्टर बनाये जा रहे हैं उनको रोकना होगा। जो डॉक्टर गरीबों का खून चूस रहे हैं उनको रोकना होगा। जो न्यायाधीश महोदय मुकदमें के फैसलों से ज्यादा तारीखें दे कर वेतन बटोर रहे हैं उनको सुधरन होगा। इसके साथ ही साथ बयानबाजी से ज्यादा कामकाजी होने पर जोर दिया जाये। वादों से ज्यादा काम को अंजाम तक पहुँचाने की कवायद करनी होगी। बयानवीरों को समाज जबतक धकियाकर बाहर का रास्ता नहीं दिखाएगा तब तक भारत में सुधार होना संभव नहीं दिखाई देता। यहाँ खाली उपाय बतानेवालों की तादाद जयादा है मगर जैसे ही धरातल पर काम करने की बात आती है तो अच्छे-अच्छों को सांप सूंघ जाता है। माइक पकड़कर लम्बी हांकना और बात है और उसको जमीनी स्तर पर खरा उतारन दूसरी बात। अगर हम सच्चे देश भक्त हैं तो हमें बयां से ज्यादा अपने कर्म के मर्म को समझाना होगा वरना ऐसे लोगों को शर्म कैसे आयेगी? जो सिर्फ सस्ती प्रसिद्धि के लिए कुछ भी अनाप-शनाप बोलकर सुर्ख़ियों में रहने के आदी होते जा रहे हैं।

काश मैं भी संजय दत्त होता..!


फिल्म अभिनेता संजय दत्त के लिए राहत भरी खबर है...अरे भई सुप्रीम कोर्ट से सरेंडर करने के लिए चार सप्ताह की मोहलत जो मिल गई है। पांच साल की सजा के बचे हुए साढ़े तीन साल के लिए जेल में सजा काटनी थी...ऐसे में चार सप्ताह की मोहलत के बहाने साढ़े तीन साल की एडवांस कमाई करने का मौका जो मिल गया..! संजय दत्त ने भी तो यही दलील दी थी कि बॉलिवुड का 278 करोड़ रूपया उनकी फिल्मों में लगा है लिहाजा फिल्मों को पूरा करने के लिए उन्हें 6 माह की मोहलत दी जाए। हालांकि कोर्ट ने संजय दत्त को 6 माह की तो नहीं लेकिन एक माह की मोहलत तो दे ही दी है। (जरूर पढ़ें- तो 35 साल हो बालिग होने की उम्र..!)
एक दिन पहले ही कोर्ट ने जैबुनिस्सा अनवर काजी की अर्जी खारिज कर दी लेकिन संजय दत्त को 4 सप्ताह की मोहलत दे दी। हालांकि संजय को मोहलत मिलने की उम्मीद कम ही जतायी जा रही थी लेकिन कोर्ट का फैसला सबके सामने है। वैसे ये सिर्फ हिंदुस्तान में ही हो सकता है कि एक व्यक्ति को उसकी व्यवसायिक जिम्मेदारियां पूरी करने के लिए सरेंडर करने के लिए 4 सप्ताह की मोहलत दे दी जाती है जबकि अलग-अलग मामलों में सजा पाए लोगों को एक घंटे की भी मोहलत नहीं दी जाती..!
हिंदुस्तान में विभिन्न अपराधों में जेल में बंद अपराधियों की भी व्यवसायिक जिम्मेदारियां होती होंगी..? व्यवसायिक न सही पारिवारिक जिम्मेदारियां तो होंगी ही..? कईयों की हालत तो ऐसी होती है कि उनके घर में परिवार के मुखिया के या किसी कमाऊ सदस्य के जेल जाने पर परिवार के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जाता है..! बच्चों की स्कूल की फीस जमा करने की कोई व्यवस्था नहीं होती है..! जवान हो रही लड़की की शादी के इंतजाम के लिए पैसा उनके पास नहीं होता है लेकिन किसी को अपनी इन जिम्मेदारियों को पूरा करने की मोहलत नहीं मिलती है..!
संजय दत्त व्यवसायिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हैं। बॉलिवुड की 278 करोड़ की फिल्मों का काम अधूरा रहने की दलील देते हैं और उन्हें पैसा कमाने के लिए 4 सप्ताह की मोहलत मिल जाती है। एक तरह से देखें तो साढ़े तीन साल जेल में रहते हुए भी संजय दत्त की फिल्में रीलीज हो रही होंगी..! वे अपनी फिल्मों से जेल में रहते हुए भी पैसा कमा रहे होंगे और जेल से निकलने के बाद उनके पास कम से कम पैसे की तो कोई कमी नहीं होगी..! लेकिन लाखों लोग जो जेल में बंद रहते हैं तो उनके परिवार की क्या हालत होती होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है..! वे भी आज यही सोच रहे होंगे कि काश हम भी संजय दत्त की तरह फिल्म अभिनेता होते..बड़े आदमी होते तो हमें भी अपनी व्यवसायिक या पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने की मोहलत मिल जाती..! वे सोच रहे होंगे कि हमारे लिए भी कोई जस्टिस काटजू राष्ट्रपति के पास हमारी सजा माफ करने की अपील करते..! लेकिन अफसोस ये लाखों लोग न तो संजय दत्त हैं और न ही जस्टिस काटजू जैसे कोई सज्जन उनकी सजा माफी के लिए राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखने वाले हैं..! (जरूर पढ़ें- संजय दत्त निर्दोष हैं..!)
मैं न तो संजय दत्त को सरेंडर करने की मोहलत दिए जाने के समर्थन में हूं और न ही जेल में बंद लाखों अपराधियों के लिए मेरे मन में कोई नरम भाव है लेकिन एक ही देश में कानून के अलग-अलग रूप कम से कम मुझे तो समझ में नहीं आते..! कानून सबके लिए समान होना चाहिए फिर चाहे वो कोई फिल्म अभिनेता संजय दत्त हो...कोई राजनेता हो...कोई उद्योगपति हो या फिर कोई दूसरा अपराधी..!

deepaktiwari555@gmail.com