6.6.14
9.12.13
त्रस्त जनता तख्ता पलट देती है, यही जनतंत्र है!
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Nitin Sabrangi
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Labels: अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, चुनाव, जनता, महंगाई, वोट
20.4.13
माफ करना प्यारी गुड़िया हम शर्मिंदा हैं!
-नितिन सबरंगीराजधानी दिल्ली में 5 साल की कोमल उम्र में गुड़िया रूह कंपा देने वाली हैवानियत का शिकार हो गई। घटना दम तोड़ती इंसानी संवेदनाओं का घिनौना चेहरा भर है। चमक-दमक के बीच कंकरीट के जंगलों में लगी भीड़ में इंसान तो हैं, लेकिन उनकी इंसानियत मर चुकी है ओर जो बची भी है वह कोढ़ग्रस्त है। दरिंदगी की शिकार हुई होनहार छात्रा दामिनी के मामले को भी नया-पुराना कहना बेमानी होगा क्योंकि ऐसी घटनाओं के दर्द उन परिवारों से पूछिए जो इससे रू-ब-रू
22.8.12
महंगाई से खुश मंत्री, जनता बेहाल
देश की जनता भले ही महंगाई से त्रस्त हो। आम आदमी की कमर भले ही टूट रही हो, लेकिन ऐसे में कोई मंत्री महंगाई से खुश हो, तो आश्चर्य ही होता है। केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने यह कहकर सभी को चौंका दिया कि महंगाई बढ़ेगी तो किसानों का फायदा होगा। इसलिए वह बढ़ती महंगाई से खुश है। पता नहीं ही चला कि मंत्री का यह कोन सा गणित था। प्रधानमंत्री महंगाई पर चिंता जाहिर करते हैं उसे चुनौती भी बताते हैं ओर उन्हीं का मंत्री उनकी चिंता की हवा निकाल देता है। जमीनी हकीकत यह है कि महंगाई का असल फायदा दलालों, बिचौलियों को होता है। कृषि प्रधान देश में किसान ही आत्महत्या करते हों, तो दुर्भाग्य को समझा जा सकता है। महंगाई, भ्रष्टाचार व घोटालों से जनता में पहले ही आक्रोश है। इस तरह के बयान जनता के जख्मों पर नमक डालने जैसा है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब हरविंदर नामक एक युवक ने कृषि मंत्री शरद पंवार को चाटा जड़ दिया था। कानूनी रूप से यह अपराध था जिसके लिये उसे जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उसके आक्रोश को झलकाता था। वह महंगाई से परेशान था। पंवार महंगाई पर अपने बयानों को लेकर चर्चित रहे थे। कभी कहते थे कि वह कोई ज्योतिष नहीं कि बताये कब घटेगी महंगाई, कभी कहते थे कि चीनी या दूध के दाम बढेंगे। उनके बयान के बाद ही रेट बढ़ जाते थे। जरूरी हो जाता है कि जनता के आक्रोश को समझना चाहिए। क्योंकि जनता की मार कुछ-कुछ वैसी ही है जैसे खुदा की बेआवाज लाठी।
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Nitin Sabrangi
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2.4.11
जनता जब भीड़ में तब्दील हो जाती है तो भीड़ का न्याय अकल्पनीय होता है|
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Anonymous
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Labels: अधिकारी, अफसर, कर्मचारी, जनता, जनता का नौकर, पब्लिक सर्वेण्ट
15.12.08
18.7.08
अत्यंत खुशी की बात है .....
एक अत्यंत खुशी की बात है जो मैं अकेले नहीं पचा पा रहा हूं तो आप सब को भी थोड़ी-थोड़ी सी खाने चबाने को दे रहा हूं। देश आजाद हुआ तब मात्र एक दो राजनैतिक पार्टियां थी जिससे कि हमारे दादाजी-दादीजी का मनोरंजन का सर्वथा अभाव था। जैसे जैसे समय बीतता गया पिताजी के समय मनोरंजन के साधन बढ़ गये बहुत सारी पार्टियां बन गयीं और अब हमारे समय में तो नेता लोग जनता के भरपूर मनोरंजन के लिये अपने सर्कसों का गठबंधन करके साझा मनोरंजन करती हैं। हमारे देश की जनता बहुत मनोरंजन की ही भूखी है खाना-कपड़ा हो न हो पर क्रिकेट वगैरह होते रहना चाहिये जिसका हमारी सरकार बराबर ध्यान रखती है,मीडिया भी अब इसमें साझेदारी करने लगा है इस लिये न्यूज चैनल भी अब मनोरंजन के कार्यक्रम बिना नागा दिखाते हैं। खुशखबरी है कि एक नया सर्कस बनाया गया है जनता के मनोरंजन के लिये जिसके पुरोधा हैं -शिव खेड़ा,अरे ये वो ही है भाई जो शिक्षाविद हैं और कहते हैं कि आप अपने बच्चों का गार्जियन जिन लोगों को नहीं बनाना चाहेंगे उन्हें देश का गार्जियन कैसे बना देते हैं आदि .. आदि .. इत्यादि..। इन्होंने अपनी पार्टी का जो नाम रखा है उससे तो लगता है कि उसमें लोकतंत्र के सारे मसाले हैं -भारतीय राष्ट्र्वादी समानता पार्टी... लेकिन चुनावी घोषणा पत्र जो जारी करा है उसमें तमाम बातें ऐसी हैं जो हम सीधे सादे भोले भारतीयों को पसंद नहीं आती हैं जैसे कि आर्थिक आधार पर आरक्षण, राजनैतिक पदों के लिये शैक्षिक योग्यता , जाति और धर्म की बात पर राजनीति नही करी जाएगी.....। अरे कोई तो इसे समझाओ यार कि ये भारत(माफ़ करना इंडिया) में रह रहा है ... यहां के लोग अपनी बातें मनवाने के लिये कानून-वानून जैसी चीज पर यकीन नहीं करते सीधे सड़क पर आकर बाजार बंद,चक्का जाम और बसों को आग लगाना शुरू कर देते हैं उन्हें ये सब बातें पसंद नहीं आयेंगी, इनके प्रत्याशियों की जमानतें जब्त हो जाएंगी। इन लोगों ने न तो कोई आंदोलन ऐसा करा है कि लोग इन्हें जानें न ही किसी घोटाले में नाम आया है तो ये किस आधार पर खुद को जनता का नेता बनाने का योग्य मान रहे हैं? मेरी विनती है वोट देने वाली जनता से कि इन स्वप्नजीवी लोगों को जल्द ही हकीकत का मुंह दिखा कर नींद से जगाए। इस देश में सिर्फ़ लालू, मुलायम, ठाकरे, करात, मायावती जैसे ही लोगों का राज्य चलेगा। खुशी इस बात की है कि जनता इनकी हार में भी मनोरंजन तलाश लेगी।
जय जय भड़ास
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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Labels: जनता, नयी पार्टी, भड़ास, मनोरंजन, मीडिया, राजनीति, शिव खेड़ा
26.3.08
अधिकारियों को जनता से मजाक का संवैधानिक अधिकार
जब कोई भी व्यक्ति अपने मस्तिष्क द्वारा ईश्वर प्रदत्त क्षमता से अधिक कार्य करता है तो वह न सिर्फ़ थक जाता है बल्कि अनिद्रा ,मानसिक अवसाद यानि डिप्रेशन , चिड़चिड़ापन और तात्कालिक याददाश्त का लोप होना जैसी गम्भीर बीमारियों से ग्रस्त हो जाता है । २६ जनवरी १९५० से लेकर अप्रेल २००५ तक एक-एक दिन हमारे जनप्रिय नेताओं ने यह बात बड़ी गहराई से निरीक्षण करके जानी और यह निष्कर्ष निकाला कि सरकारी अधिकारियों के लिये मानसिक बोझ येन-केन-प्रकारेण कम करा जाए । लेकिन चूंकि राष्ट्र को तो दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करनी है तो काम का बोझ कम कैसे हो सकता है ? इसलिए हमारे नेताओं ने तमाम विकसित राष्ट्रों का दौरा कर करके एक मूल्यवान तथ्य खोज निकाला कि यदि सरकारी कार्यालयों का माहौल मजाहिया बना रहे तो अधिकारीजन मजाक करते और हंसते-मुस्कराते हुए अपने काम के बोझ को उठा लेंगे । यह बात कार्यालयीन मनोविज्ञान एवं मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में एक मील का पत्थर सिद्ध हुई है । सरकार की तरफ से इस बात को अप्रेल २००५ में बाकायदा संवैधानिक जामा पहनाया गया और ब्यूरोक्रेसी को RTI act यानि कि सूचना प्राप्ति का अधिकार के रूप में सौंप दिया गया । अब अधिकारी अच्छी तरह से जानते हैं कि एक बार उनके निजी साले-साली और सलहजें नाराज हो सकते हैं पर भारत की उदार हृदय जनता हरगिज़ बुरा नहीं मानेगी बस आपके गम्भीर से गम्भीर मजाक पर बस सूखे होंठो से मुस्करा कर रह जाएगी इस इंतजार में कि आप अगला चुटकुला कब सुनाएंगे । तो ज्ञानी जनों अगर आप भी सरकारी अधिकारियों को मजाक का मौका देकर राष्ट्र के उत्थान में सहयोग करना चाहते हैं तो बस दस रुपए खर्च करिये और सरकारी अधिकारियों को अपने साथ मजाक करने का मौका देने के लिये RTI act के अंतर्गत कोई भी जानकारी मांग लीजिये आप समझ जाएंगे कि सरकारी अधिकारी कैसे मजाक कर करके अपने काम के बोझ को हलका करते हैं । इसी मजाक में सहयोग की नियत से मैंने अपने शहर की नरक पालिका(माफ़ करें ,सुधार कर नगर पालिका पढ़िए) से यह जानकारी मांगी कि जिस अपार्टमेंट में मैं रहता हूं उसके बिल्डिंग कन्स्ट्रक्शन का सुपरविजन किसने करा था और लगाई हुई भवन निर्माण सामग्री का सुपरविजन किसने करा था तो यह जानकारी एक फ़ार्म के रूप में बिल्डर विभाग को देता है जिसका कि एक निश्चित फ़ार्मेट रहता है और जिसके प्रत्येक कालम को भरे बिना यह फ़ार्म अपूर्ण रहता है व भवन निर्माण शुरू ही नहीं करा जा सकता लेकिन मुझे मेरी नगर पालिका के अधिकारियों ने RTI act के अंतर्गत उस बिल्डर द्वारा जमा करे गए फ़ार्म की जेराक्स प्रति उपलब्ध करा दी लेकिन वो तो कोरा है एकदम सादा उसमें तो कुछ भरा ही नहीं है लेकिन बिल्डिंग तो सीना ताने कबकी खड़ी है तो आप समझ लीजिये कि साहब लोगों ने तो बस होली पर एक हलका सा मजाक किया है आखिर काम का बोझ जो हल्का करना है ।
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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