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6.6.14


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-नितिन सबरंगी
जैसे सबकुछ महंगा है ओर जिंदगी ही बेहद सस्ती है। देश में हर साल 1 लाख 50 हजार से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। घायल होने वालों का आंकड़ा इससे भी बड़ा है। 30 लाख घायल होते हैं।  दुर्घटनाओं में हम दुनिया के मुकाबले नंबर वन हैं। हर घंटे करीब 13 लोगों की मौत हादसों में हो जाती है। 36 लाख किलोमीटर लंबी सड़कों पर मौत दनदनाती है। दुर्घटनाओं से 1 लाख करोड़ रूपये का नुकसान भी होता है। दुर्घटनाओं में हर साल सामाजिक ओर आर्थिक कीमत चुकानी पड़ती है। नेशलन क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट में दुर्घटनाओं में होने वाली मौत का चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। 2011 में देश में हर दिन100 लोग दुर्घटना में मारे गए। लापरवाही व शराब की प्रवृत्ति ने इस रफ्तार को ओर भी तेज कर दिया है। कभी रफ्तार, कभी लापरवाही, तो कभी शराब का सुरूर लोगों को तेजी से मौत के मुंह में ले जा रहा है। कानून बिल्कुल लचीला हो ऐसा भी नहीं है बल्कि कड़वी हकीकत यह है कि उसका पालन करने से गुरेज किया जाता है। कई लोग इसे अपनी झूठी शान के खिलाफ समझते हैं नतीजा मौत के रूप में भी सामने होता है। देशभर में रोजाना 377 लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवाते हैं। कारों की भिडंत के बाद हुई गोपीनाथ मुंडे की मौत ने बैक सीट पर एयर बैग्स की अहमियत याद दिला दी है। जिंदगी की तेज रफ्तार ओर लापरवाही की कीमत ही शायद ऐसी है।

9.12.13

त्रस्त जनता तख्ता पलट देती है, यही जनतंत्र है!

-वक्ती ताकत के अहंकारी गिरते जरूर हैं।
-जनता के दर्द को समझने की जरूरत।
-नितिन सबरंगी
दिल्ली चुनाव के हालिया नतीजे बहुत कुछ साबित कर गए। एक आईना भी बनकर आये जिसमें पार्टियां अपने चेहरे को देख रही हैं। यह साबित हुआ कि जनतंत्र की ताकत ही सबसे बड़ी होती है। कोई दोराय नहीं कि जनता त्रस्त थी। केवल दिल्ली ही नहीं पूरे देश का एक सा हाल है महंगाई से हर कोई हलकान है। आम आदमी को जिंदगी बसर करने के लिये जरूरी सामान भर चाहिए होता है, लेकिन घोटाले करके उनकी भरपाई महंगाई का बोझ डालकर की जाती रही। जनता दर्द से कराहती रही किसी को ख्याल नहीं आया बल्कि उलटा मजाक बनाया गया। लोकसभा चुनावों के नतीजे ओर भी चौंकाएंगे। शायद राजनीति से चश्मे से सबसे पहले वोट का ताज नजर आता है पिफर उसके बाद शतरंज के मोहरों के रूप में लोगा की जरूरतंे, गरीबी, उनके हालात ओर मजबूरियों के वह गर्म ढेर जो मेहरबानियों की बूंदों के लिये हमेशा तरसते हैं। लोकतंत्र की ताकत ही बड़ी है। नेताओं को सत्ता के गुरूर, मनमानी, भ्रष्टाचार के कीर्तिमान, झूठे किले खड़े करके सिंघासन सजाने की गलतफहमी से निकल जाना चाहिए। आम जरूरत की सभी चीजों ने होश उड़ा दिए। आम आदमी पार्टी को जो सीटे मिली हैं वह इस बात का प्रमाण हैं कि जनता सत्ताधारियों से नाराज है। वह ओर ठगी का शिकार नहीं होना चाहती। यह गलतफहमी भी निकल गई कि सबकुछ धन-बल से नहीं चलता। शराब से ओर धन का खेल इस चुनाव में भी हुआ। बड़े-बड़े दिग्गज पटखनी खा गए। सोचने की जरूरत है क्यों? जिस दर्द को कांग्रेस अब समझने की बात कर रही है वह पहले ही समझ लिया जाता। अरविंद केजरीवाल आम जनता के बीच हीरो सरीखे हो गए। जनता चिल्लाती रही ओर कभी आवाज नहीं गई? चुनावी नतीजे अन्य पार्टियों के लिये भी सबक हैं। वह अपना रवैया सुधारें वरना जनता को असली मौका मिलेगा। त्रस्त जनता तख्ता पलट कर देती है। यह भी निर्विवाद सच है कि वक्ती ताकत ओर रसूख के अंहकारी सवार एक दिन गिरते जरूर हैं। सत्ता के गुरूर में जनता का दर्द दिखायी न दे, तो अंजाम वही होता है जो जनता चाहती है।

20.4.13

माफ करना प्यारी गुड़िया हम शर्मिंदा हैं!

-नितिन सबरंगी
राजधानी दिल्ली में 5 साल की कोमल उम्र में गुड़िया रूह कंपा देने वाली हैवानियत का शिकार हो गई। घटना दम तोड़ती इंसानी संवेदनाओं का घिनौना चेहरा भर है। चमक-दमक के बीच कंकरीट के जंगलों में लगी भीड़ में इंसान तो हैं, लेकिन उनकी इंसानियत मर चुकी है ओर जो बची भी है वह कोढ़ग्रस्त है। दरिंदगी की शिकार हुई होनहार छात्रा दामिनी के मामले को भी नया-पुराना कहना बेमानी होगा क्योंकि ऐसी घटनाओं के दर्द उन परिवारों से पूछिए जो इससे रू-ब-रू
होते हैं। झूठी तसल्लियां उनके जख्मों को ओर भी दर्दनाक बनाती हैं। ऐसी घटनाओं के लिये किसी एक को दोषी नहीं बल्कि समूची व्यवस्था जिम्मेदार होती है। टूटती-बिखरती परम्पराएं, रिश्ते-नाते, जीवनशैली, मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता, विज्ञापनों में भावनाओं को भड़काने वाली कलाएं व ओर भी बहुत कुछ।  घटनाएं हमारे उस देश की हैं जहां कन्याओं पूजा जाता है, लेकिन क्या कोई दावे से कह सकता है कि नौ दिन तक चलने वाले आस्था के व्रतों में कन्याओं के भू्रण कत्ल व उन पर होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लग जाता है।  ऐसी घटनाएं गुस्से के साथ सभी को शर्मसार करती हैं। लाख टके का सवाल वही कि आखिर कब तक?

22.8.12

महंगाई से खुश मंत्री, जनता बेहाल


देश की जनता भले ही महंगाई से त्रस्त हो। आम आदमी की कमर भले ही टूट रही हो, लेकिन ऐसे में कोई मंत्री महंगाई से खुश हो, तो आश्चर्य ही होता है। केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने यह कहकर सभी को चौंका दिया कि महंगाई बढ़ेगी तो किसानों का फायदा होगा। इसलिए वह बढ़ती महंगाई से खुश है। पता नहीं ही चला कि मंत्री का यह कोन सा गणित था। प्रधानमंत्री महंगाई पर चिंता जाहिर करते हैं उसे चुनौती भी बताते हैं ओर उन्हीं का मंत्री उनकी चिंता की हवा निकाल देता है। जमीनी हकीकत यह है कि महंगाई का असल फायदा दलालों, बिचौलियों को होता है। कृषि प्रधान देश में किसान ही आत्महत्या करते हों, तो दुर्भाग्य को समझा जा सकता है। महंगाई, भ्रष्टाचार व घोटालों से जनता में पहले ही आक्रोश है। इस तरह के बयान जनता के जख्मों पर नमक डालने जैसा है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब हरविंदर नामक एक युवक ने कृषि मंत्री शरद पंवार को चाटा जड़ दिया था। कानूनी रूप से यह अपराध था जिसके लिये उसे जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उसके आक्रोश को झलकाता था। वह महंगाई से परेशान था। पंवार महंगाई पर अपने बयानों को लेकर चर्चित रहे थे। कभी कहते थे कि वह कोई ज्योतिष नहीं कि बताये कब घटेगी महंगाई, कभी कहते थे कि चीनी या दूध के दाम बढेंगे। उनके बयान के बाद ही रेट बढ़ जाते थे। जरूरी हो जाता है कि जनता के आक्रोश को समझना चाहिए। क्योंकि जनता की मार कुछ-कुछ वैसी ही है जैसे खुदा की बेआवाज लाठी।

2.4.11

जनता जब भीड़ में तब्दील हो जाती है तो भीड़ का न्याय अकल्पनीय होता है|

जनता जब भीड़ में तब्दील हो जाती है
तो भीड़ का न्याय अकल्पनीय होता है|

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

सुधि पाठक इस आगे पढने से पूर्व केवल इतना सा जान लें कि प्रत्येक सरकारी अधिकारी और कर्मचारी भारत के संविधान के अनुसार पब्लिक सर्वेण्ट हैं, जिसका स्पष्ट अर्थ है कि प्रत्येक सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी न तो भारत सरकार का नौकर है और न हीं वह अफसर या कर्मचारी है, बल्कि वास्तव में वह देश की ‘‘जनता का नौकर’’ है| जिसे जनता की खून-पसीने की कमाई से एकत्रित किये जाने वाले अनेकों प्रकार के राजस्वों (करों) से संग्रहित खजाने से प्रतिमाह वेतन मिलता है| जनता का प्रत्येक नौकर जनता की सेवा करने के लिये ही नौकरी करता है और दूसरी बात यह समझ लेने की है कि प्रत्येक पब्लिक सर्वेण्ट अर्थात् जनता के नौकर का पहला और अन्तिम लक्ष्य है, ‘‘पब्लिक इण्ट्रेस्ट अर्थात् जनहित|’’ जनहित को पूरा करने के लिये जनता के नौकर केवल आठ घण्टे ही नहीं, बल्कि चौबीसों घण्टे कार्य करने को कानूनी रूप से बाध्य होते हैं| इसके उपरान्त भी जनता के नौकर स्वयं को जनता का नौकर या सेवक नहीं, बल्कि जनता का स्वामी मानने लगे हैं, जिसके विरुद्ध जनता चुप रहती है और अपने नौकरों की मनमानियों का विरोध नहीं करती है, जिसके चलते हालात इतने बदतर हो गये हैं कि नौकर तो मालिक बन बैठा है और मालिक अर्थात् जनता अपने नौकरों की सेवक बन गयी है| यह स्थिति विश्‍व के सबसे बड़े भारतीय लोकतन्त्र के लिये शर्मनाक और चिन्ताजनक है| इस स्थिति को कोई एक व्यक्ति न तो बदल सकता है और न हीं समाप्त कर सकता है, लेकिन कोई भी व्यक्ति जनता के नौकरों को यह अहसास तो करवा ही सकता है कि वे जनता के नौकर हैं और जनता के सुख-दुख की परवाह करना और जनता के हितों का हर हाल में संरक्षण करना, जनता के नौकरों का अनिवार्य तथा बाध्यकारी कानूनी एवं संवैधानिक दायित्व है! इसी बात को पाठकों की अदालत में प्रस्तुत करने के लिये कुछ तथ्य प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है|

कुछ समय पूर्व की घटना है| मैंने एक जिला स्तर के अफसर अर्थात् लोक सेवक अर्थात् जनता के नौकर से किसी जरूरी काम से बात करना चाहा, फोन उनके पीए ने उठाया और मुझे बताया कि ‘‘साहब यहॉं नहीं हैं’’ और आगे मेरी बात सुने बिना ही फोन काट दिया गया| संयोग से मेरे पास उनका मोबाइल नम्बर भी था, मैंने उन्हें मोबाइल लगाया, तो बोले ‘‘कौन?’’ मैंने कहा, ‘‘देश का एक आम व्यक्ति अर्थात् पब्लिक!’’ उधर से जवाब आया, ‘‘अभी मैं मीटिंग में हूँ, बाद में बात करना|’’ मैंने पूछा, ‘‘मीटिंग कब खत्म होगी?’’ जवाब मिला, ‘‘साढे पांच बजे...’’ और उन्होंने मोबाइल काट दिया| मैंने सोचा मैं ‘‘पब्लिक’’ हूँ और ‘‘पब्लिक का नौकर’’ ‘‘पब्लिक हित’’ में कोई जरूरी मीटिंग में व्यस्त हैं, लेकिन अचानक मेरा माथा ठनका कि उनके पीए ने तो बताया था कि ‘‘साहब यहॉं नहीं हैं’’ जबकि साहब स्वयं को मीटिंग में बतला रहे हैं| मैंने फिर से उनके पीए को फोन लगाया और पूछा, ‘‘आपके साहब कहॉं हैं?’’ जवाब आया, ‘‘जरूरी काम से बाहर गये हैं|’’ इस बार जवाब देने वाला कोई सज्जन पब्लिक सर्वेण्ट था, जिसने फोन नहीं काटा तो मैंने दुबारा पूछा ‘‘कब तक आयेंगे|’’ पीए साहब बोले, ‘‘जरूरी काम हो तो आप मोबाइल पर बात कर लें, साहब तो शायद ही ऑफिस आयेंगे, वे मैडम के साथ बाजार गये हैं|’’ उनको धन्यवाद कहकर मैंने फोन रख दिया और साढे पांच बजने का इन्तजार करने लगा, लेकिन कार्यालय समय (छह बजे) समाप्त होने तक उनका कोई फोन नहीं आया| आप सोच रहे होंगे कि अधिकारी से मैंने फोन करने की आशा ही क्यों की?

अगले दिन मैंने दस बजे फोन लगया तो पीए ने बताया, ‘‘साहब साढे दस बजे तक आने वाले हैं|’’ साढे दस बजे लगाया तो जवाब मिला, ‘‘बस आने ही बाले हैं, कुछ समय बाद दुबारा फोन लगालें|’’ ग्यारह बजे फोन लगाया तो पूछा, ‘‘आप कौन बोल रहे हैं?’’ मैंने अपना नाम बता दिया, किन्तु फिर से उनके पीए ने पूछा कि ‘‘आपकी कोई पहचान?’’ मैंने कहा कि ‘‘मैं पब्लिक हूँ!’’ पीए ने अपने साहब को न जाने क्या बोला होगा, लेकिन उन्होंने मेरी बात करवा दी| अब आप हमारी बातचीत पर गौर करें :-

‘‘बोलिये कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘क्यों, क्या आपके पीए ने नहीं बताया कि मैं कौन बोल रहा हूँ?’’

‘‘हॉं बताया तो था, बोलिये क्या काम है?’’

‘‘आपको मैंने कल फोन किया था, तब आप मीटिंग में थे, लेकिन आपने मीटिंग समाप्त होने के बाद मुझसे मोबाइल पर बात नहीं की, जबकि आपके मोबाइल में मेरा मोबाइल नम्बर भी आ ही गया होगा|’’

कुछ क्षण रुक कर, सकपकाते हुए ‘‘हॉं..हॉं.. आ तो गया होगा, लेकिन आप हैं कौन?’’

‘‘अभी-अभी आपके पीए ने बताया तो है!’’

‘‘हॉं.. मगर आप चाहते क्या हैं’’

‘‘मैं आपसे बात करना चाहता हूँ और बात कर रहा हूँ, लेकिन आप मेरी बात का जवाब ही नहीं दे रहे हैं, आखिर आपने मुझसे कल मीटिंग खत्म होने के बाद बात क्यों नहीं की?’’

‘‘आप ये बात मुझसे किस हैसियत से पूछ रहे हैं, आप हो कौन....?’’

‘‘अभी तक आपको मेरा परिचय समझ में नहीं आया है, मैं फिर से बतला दूँ कि मैं पब्लिक हूँ और आप पब्लिक सर्वेण्ट हैं| आपका मालिक होने की हैसियत से आपसे पूछ रहा हूँ कि आपने मुझे साढे पांच बजे मीटिंग समाप्त होने के बाद फोन क्यों नहीं किया?’’

कुछ क्षण तक सन्नाटा, कोई जवाब नहीं!

मैं फिर से बोला, ‘‘आप मेरी बात सुन तो रहे हैं? कृपया बोलिये...?’’

(अत्यन्त नम्रता से)

‘‘हॉं आपकी बात सही है, मीटिंग देर तक चलती रही और बाद में, मुझे याद नहीं रहा| आप अब बतायें क्या सेवा कर सकता हूँ|’’

‘‘आप मीटिंग में थे या पत्नी को शॉपिंग करवा रहे थे? शर्म नहीं आती झूठ बोलते हुए?’’
एकदम से सन्नाटा! कोई जवाब नहीं!

फिर से मैंने ही बात की, ‘‘आप कोई जवाब देंगे या आपके बॉस से बात करूँ.....?’’

‘‘नहीं...नहीं इसकी कोई जरूरत नहीं है| शौरी आपको तकलीफ हुई, आप मुझे सेवा का मौका तो दें....काम तो बतायें|’’

इसके बाद मैंने उन्हें पब्लिक इण्ट्रेस्ट का जो कार्य था, वह बतलाया और साथ ही यह भी बतलाया कि जब भी पब्लिक फोन/मोबाइल पर बात करती है, तो उसमें पब्लिक का खर्चा होता है, इसलिये पब्लिक की ओर से उपलब्ध कराये गये सरकारी फोन/मोबाइल पर, अपने कार्य से फ्री होने पर पब्लिक से बात की जानी चाहिये| यह प्रत्येक पब्लिक सर्वेण्ट का अनिवार्य दायित्व है और अपने पीए को भी समझावें कि वे जनता की पूरी बात न मात्र सुनें ही, बल्कि नोट करके समाधान भी करावें| जिससे जनता के नौकरों के प्रति जनता की आस्था बनी रहे, अन्यथा लोगों के लिये अपने नौकरों को हटाना असम्भव नहीं है| जनता जब भीड़ में तब्दील हो जाती है तो भीड़ का न्याय अकल्पनीय होता है| प्रत्येक पब्लिक सर्वेण्ट का प्रथम कर्त्तव्य है कि जनता के असन्तोष को जनाक्रोश में तब्दील नहीं होने दें|

इस घटना के कुछ दिनों बाद राजस्थान के सवाई माधोपुर जिला मुख्यालय पर थाना प्रभारी फूल मोहम्मद को भीड़ द्वारा जिन्दा जला देने की दुखद घटना धटित हो गयी तो इन महाशय ने मुझे फोन करके कहा कि मीणा जी आपने सही कहा था कि ‘‘जनता जब भीड़ में तब्दील हो जाती है तो भीड़ का न्याय अकल्पनीय होता है|’’ मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मुझे अपने कर्त्तव्यों के प्रति सचेत किया और मुझे संवेदनशील पब्लिक सेर्वेण्ट बनने का अवसर दिया| थैंक्स|’’

मैंने उन्हें इतना ही कहा परमात्मा आपका और अपके स्वजनों का भला करें और आप आपनी मालिक आम जनता के हित में संजीदगी से कार्य करते रहें, जिससे हमारा समाज और देश उन्नति करता रहे| धन्यवाद|

18.7.08

अत्यंत खुशी की बात है .....

एक अत्यंत खुशी की बात है जो मैं अकेले नहीं पचा पा रहा हूं तो आप सब को भी थोड़ी-थोड़ी सी खाने चबाने को दे रहा हूं। देश आजाद हुआ तब मात्र एक दो राजनैतिक पार्टियां थी जिससे कि हमारे दादाजी-दादीजी का मनोरंजन का सर्वथा अभाव था। जैसे जैसे समय बीतता गया पिताजी के समय मनोरंजन के साधन बढ़ गये बहुत सारी पार्टियां बन गयीं और अब हमारे समय में तो नेता लोग जनता के भरपूर मनोरंजन के लिये अपने सर्कसों का गठबंधन करके साझा मनोरंजन करती हैं। हमारे देश की जनता बहुत मनोरंजन की ही भूखी है खाना-कपड़ा हो न हो पर क्रिकेट वगैरह होते रहना चाहिये जिसका हमारी सरकार बराबर ध्यान रखती है,मीडिया भी अब इसमें साझेदारी करने लगा है इस लिये न्यूज चैनल भी अब मनोरंजन के कार्यक्रम बिना नागा दिखाते हैं। खुशखबरी है कि एक नया सर्कस बनाया गया है जनता के मनोरंजन के लिये जिसके पुरोधा हैं -शिव खेड़ा,अरे ये वो ही है भाई जो शिक्षाविद हैं और कहते हैं कि आप अपने बच्चों का गार्जियन जिन लोगों को नहीं बनाना चाहेंगे उन्हें देश का गार्जियन कैसे बना देते हैं आदि .. आदि .. इत्यादि..। इन्होंने अपनी पार्टी का जो नाम रखा है उससे तो लगता है कि उसमें लोकतंत्र के सारे मसाले हैं -भारतीय राष्ट्र्वादी समानता पार्टी... लेकिन चुनावी घोषणा पत्र जो जारी करा है उसमें तमाम बातें ऐसी हैं जो हम सीधे सादे भोले भारतीयों को पसंद नहीं आती हैं जैसे कि आर्थिक आधार पर आरक्षण, राजनैतिक पदों के लिये शैक्षिक योग्यता , जाति और धर्म की बात पर राजनीति नही करी जाएगी.....। अरे कोई तो इसे समझाओ यार कि ये भारत(माफ़ करना इंडिया) में रह रहा है ... यहां के लोग अपनी बातें मनवाने के लिये कानून-वानून जैसी चीज पर यकीन नहीं करते सीधे सड़क पर आकर बाजार बंद,चक्का जाम और बसों को आग लगाना शुरू कर देते हैं उन्हें ये सब बातें पसंद नहीं आयेंगी, इनके प्रत्याशियों की जमानतें जब्त हो जाएंगी। इन लोगों ने न तो कोई आंदोलन ऐसा करा है कि लोग इन्हें जानें न ही किसी घोटाले में नाम आया है तो ये किस आधार पर खुद को जनता का नेता बनाने का योग्य मान रहे हैं? मेरी विनती है वोट देने वाली जनता से कि इन स्वप्नजीवी लोगों को जल्द ही हकीकत का मुंह दिखा कर नींद से जगाए। इस देश में सिर्फ़ लालू, मुलायम, ठाकरे, करात, मायावती जैसे ही लोगों का राज्य चलेगा। खुशी इस बात की है कि जनता इनकी हार में भी मनोरंजन तलाश लेगी।
जय जय भड़ास

26.3.08

अधिकारियों को जनता से मजाक का संवैधानिक अधिकार



जब कोई भी व्यक्ति अपने मस्तिष्क द्वारा ईश्वर प्रदत्त क्षमता से अधिक कार्य करता है तो वह न सिर्फ़ थक जाता है बल्कि अनिद्रा ,मानसिक अवसाद यानि डिप्रेशन , चिड़चिड़ापन और तात्कालिक याददाश्त का लोप होना जैसी गम्भीर बीमारियों से ग्रस्त हो जाता है । २६ जनवरी १९५० से लेकर अप्रेल २००५ तक एक-एक दिन हमारे जनप्रिय नेताओं ने यह बात बड़ी गहराई से निरीक्षण करके जानी और यह निष्कर्ष निकाला कि सरकारी अधिकारियों के लिये मानसिक बोझ येन-केन-प्रकारेण कम करा जाए । लेकिन चूंकि राष्ट्र को तो दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करनी है तो काम का बोझ कम कैसे हो सकता है ? इसलिए हमारे नेताओं ने तमाम विकसित राष्ट्रों का दौरा कर करके एक मूल्यवान तथ्य खोज निकाला कि यदि सरकारी कार्यालयों का माहौल मजाहिया बना रहे तो अधिकारीजन मजाक करते और हंसते-मुस्कराते हुए अपने काम के बोझ को उठा लेंगे । यह बात कार्यालयीन मनोविज्ञान एवं मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में एक मील का पत्थर सिद्ध हुई है । सरकार की तरफ से इस बात को अप्रेल २००५ में बाकायदा संवैधानिक जामा पहनाया गया और ब्यूरोक्रेसी को RTI act यानि कि सूचना प्राप्ति का अधिकार के रूप में सौंप दिया गया । अब अधिकारी अच्छी तरह से जानते हैं कि एक बार उनके निजी साले-साली और सलहजें नाराज हो सकते हैं पर भारत की उदार हृदय जनता हरगिज़ बुरा नहीं मानेगी बस आपके गम्भीर से गम्भीर मजाक पर बस सूखे होंठो से मुस्करा कर रह जाएगी इस इंतजार में कि आप अगला चुटकुला कब सुनाएंगे । तो ज्ञानी जनों अगर आप भी सरकारी अधिकारियों को मजाक का मौका देकर राष्ट्र के उत्थान में सहयोग करना चाहते हैं तो बस दस रुपए खर्च करिये और सरकारी अधिकारियों को अपने साथ मजाक करने का मौका देने के लिये RTI act के अंतर्गत कोई भी जानकारी मांग लीजिये आप समझ जाएंगे कि सरकारी अधिकारी कैसे मजाक कर करके अपने काम के बोझ को हलका करते हैं । इसी मजाक में सहयोग की नियत से मैंने अपने शहर की नरक पालिका(माफ़ करें ,सुधार कर नगर पालिका पढ़िए) से यह जानकारी मांगी कि जिस अपार्टमेंट में मैं रहता हूं उसके बिल्डिंग कन्स्ट्रक्शन का सुपरविजन किसने करा था और लगाई हुई भवन निर्माण सामग्री का सुपरविजन किसने करा था तो यह जानकारी एक फ़ार्म के रूप में बिल्डर विभाग को देता है जिसका कि एक निश्चित फ़ार्मेट रहता है और जिसके प्रत्येक कालम को भरे बिना यह फ़ार्म अपूर्ण रहता है व भवन निर्माण शुरू ही नहीं करा जा सकता लेकिन मुझे मेरी नगर पालिका के अधिकारियों ने RTI act के अंतर्गत उस बिल्डर द्वारा जमा करे गए फ़ार्म की जेराक्स प्रति उपलब्ध करा दी लेकिन वो तो कोरा है एकदम सादा उसमें तो कुछ भरा ही नहीं है लेकिन बिल्डिंग तो सीना ताने कबकी खड़ी है तो आप समझ लीजिये कि साहब लोगों ने तो बस होली पर एक हलका सा मजाक किया है आखिर काम का बोझ जो हल्का करना है ।