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24.1.08

जरा बच के, मां-बहन भी पढ़तीं हैं ब्लॉग

भाई हमने तो अपना मामला नोट्स से हटाकर यूआरएल लिंक तक पहुंचा दिया। पहले जो जूनियर्स नोट्स या किताब मांगते थे अब वे मेरे ब्लॉग का लिंक पूछते हैं, धीर-धीरे ब्लॉग की दुकान जम रही है।परसों ही एक जूनियर मेरे ब्लॉग का लिंक लिखकर ले गई और आज मिलने पर बताया कि अच्छा लिखते हैं सर आप। मैंने तो मम्मी को भी दिखाया।
मैं मन ही मन खुश हो रहा था कि अच्छा है दिल्ली की आंटी लोग जो कि मां के बहुत दूर होने की वजह से मां ही लगती है, इम्प्रेस होगी और कभी खाने पर बुला लिया तो एक पोस्ट की मेहनत तो सध जाएगी, सो पूरे ध्यान से उसकी बात सुन रहा था। लेकिन आगे उसने जो कुछ कहा उससे मेरे सपने तो टूटे ही, आगे के दिनों के लिए चिंता भी होने लगी। जूनियर का कहना था कि सर मैं अपनी मम्मा को आपका ब्लॉग पढ़ा रही थी कि अचानक एक लाइन आ गयी। आपने लिखा था कि- हिन्दी की ही क्यों लेने लगते हो। मम्मा ने कहा ऐसा लिखना ठीक नहीं है, ऐसे नहीं लिखना चाहिए और फिर उठकर वहां से चली गई। मैं समझ गया कि आंटी ने इस शब्द को अश्लील समझा।
इधर वीचैनल को लगातार देख रहा हूं। उस पर एक कैंपस शो के लिए एड आती है जिसमें लाइन है- किसकी फटेगी। आंटी इसका अर्थ भी उसी हिसाब से लगा सकती है और चैनल को अश्लील कह सकती है। मुझे याद है मैं अपने कॉलेज के दिनों में खूब एक्टिव रहा करता था- क्या डिवेट, क्या प्ले। करता भी और कराता भी और हांफते हुए अपनी मैम के पास पहुंचता और मैम पूछती कि क्या हुआ तो अचानक मेरे मुंह से निकल जाता मैंम सब तेल हो गया या फिर मेरे दोस्त राहुल ने स्पांसर्स का केला कर दिया और मैम मेरे कहने का मतलब समझ जाती।एफएम में आए दिन आपको ऐसे शब्द सुनने को मिल जाएंगे। तीन-चार दिनपहले ही तो रेडएफएम पर बज रहा था जब इंडिया ने पर्थ में परचम फैलाया था- मैं भज्जी, आपका हरभजन सिंह रेड एफएम 93.5 बजाते रहो, किसकी पता नहीं। अब तक तो यही समझ रहे थे किरेड एफएम बजाते रहना है, अभी समझ रहे हैं कि आस्ट्रेलिया जैसी टीम को बजाते रहना है और फिर धीरे-धीरे एक मुहावरा बन जाता है कि यार उसकी तो बजा कर रख दूंगा। मेरा दोस्त कहा करता है उसकी टू मैंने रेड लगा दी, हम मतलब समझ जाते हैं लेकिन कभी भी अश्लील अर्थ की तरफ नहीं जाते।
पॉपुलर मीडिया में शब्दों की तह तक जाने की बात नही होती, लोग संदर्भ के हिसाब से उसका मतलब समझ लेते हैं, खुलापन सिर्फ जीने के स्तर पर नहीं आया है। व्हीस्पर का एड देखिए हर लड़की एक दूसरे के कन में दाम घटने की बात करती है बावजूद इसके हम सुन लेते हैं और फिर सुनेगें नहीं तो बिकेगा ।
आंटी को मेरी पोस्ट को देखने पर उठकर जाना पड़ा और मैं सोचने लगा कि वाकई कैंपस में बोली जानेवाली इस भाषा पर विचार करने की जरुरत है। ये भाषा के स्तर पर संस्कारी होने का मामला है, अच्छा बच्चा होने का आग्रह है या फिर बदलती बिंदास हिन्दी को नहीं बर्दास्त कर पाने का हादसा। फिलहाल लड़की ने मेरा हौसला बढ़ाया कि सर आप लिखिए- मैंने तो मम्मा को बताया कि हिन्दी में लोग अब ऐसे ही लिखते हैं।
अपने ब्लॉगर साथियों से तो इतना ही कहूंगा कि भाई लोग आपलोग जो इतना धुंआधार गालियां लिखते हो, जरा चेत जाओ। पहले चेक कर लो कि ये मां-बहन के पढ़ने लायक है भी या नहीं।

2 comments:

धुरंधर गजेश said...

स्टार न्यूज का एक प्रोमो चला करता था, उंगली करना, पूरे प्रोमो में यही बात थी - हमारी आदत है उंगली करने की, जहां मौका मिलता है उंगली कर देते हैं... दुर्भाग्य जानेंगे, इस प्रोमो को बेस्ट प्रोमो का एवार्ड मिला था। और वो कप या सील्ड जो भी कहिए उसके मुंबई के दफ्तर में सजा कर रखा गया है।

इतना ही नहीं लड़के तो लड़के, लड़कियों को भी कहते सुनेगे आप -- अरे यार आज तो बास ने तो मेरी ले ली , फाड़ दी
क्यों इतना पेल रहे हो

इनमें ज्यादातर वो है जो बोलचाल में ये बाते बोलना सीख तो जाती हैं पर उसका उदभव और सही तात्पर्य नहीं समझतीं। या समझतीं भी हों क्या पता, बहुत तरक्की हो रही है।

कल लू शुन की कहानी पढ़ रहा था, वही चीन के मशहूर लेखक, उन्होने एक जगह लिखा था माफ करेंगे कि मेरी भाषा परिष्कृत नहीं है और उसमें फेरीवालों और फुटपाथियों के शब्दकोश के शब्दों के इस्तेमाल का खतरा है। तो ये श्ब्द आप कर रहे हैं वो कैंपस नहीं कभी अनपढ़ो, जाहिलों और मूर्खों के शब्द हुआ करते थे, जिन्हे अब ठेठपन और उज्जड़पन या ठसक दिखाने का हथियार मान लिया गया है। और कैंपस पढ़ाई से ज्यादा ठसक ही तो सिखाता है।

हम सबकुछ सरल आसान चाहने लगे हैं, बेहतर स्तरीय शब्दों के इस्तेमाल के लिए उन्हे याद रखने की जरूरत होगी, फटाफट के जमाने में कौन इतनी मेहनत करे.... और मीडिया वो तो बस बिछावन हो गई है वेश्यालय का बस सुविधा देती है।


और मां बहनों की चिन्ता किसे है... बस हम की बात है स्व सब कुछ वहीं से शुरू होकर स्व पर ही खत्म होता है

Saurabh said...

भडासी जी
इसी किस्म का एक कार्यक्रम बिंदास टीवी चैनल पर भी आता है लगेगी ! किसकी और क्या - ये पता नहीं ;)
वैसे बिंदास चैनल ने तो द्विअर्थी डेलोग मारने में पी एच डी कर रखी है. कोई भी कार्यक्रम उठा लें - सुन यार चिल मार या फ़िर हस ले इंडिया या थर्ड डिग्री. अब आज की पीढ़ी को यही पसंद है तो यही परोसा जाएगा!
वैसे व्यवहारिकता को ध्यान में रखा जाए तो यही पायेंगे कि यह लिंगो आज काफ़ी पोपुलर हो चुका है और लड़कियां भी इसका भरपूर प्रयोग करती हैं :)
सौरभ