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21.2.08

भड़सी कैसे बहस मे आ गए , भागो , भगाओ

यह एक भयानक बात है कि कुछ लोगों बुद्धि-जीवी होने का चोगा ओढ़ रखा । वे महान लोग ( औरत भी ) हैं । बहुत सभ्य। वे बहुत गम्भीर बहस करते हैं । हम उनकी बहस को समझने लगें तो उन्हें दिक्कत होने लगती है । तुम जाहिल गवार लोग कैसे समझ पाओगे , हमारी बात । वे बहस खाते हैं , पीते हैं और बहस करते -करते सो जाते हैं । वे बाकि कुछ नही करते । एक भी गंदी या अश्लील बात नही करते । सफेद , साफ सुन्दर कपडे पहनते हैं । हीरे -जवाहरात खाते हैं । ऐ सी मी रहते हैं । वे हगते मुततेनही , सम्भोग नही करते गुस्सा नही करते , एक शब्द अपशब्द नही बोलते । उनकी संताने भी ह्गती मुतती नही । ये तो भड़सियों ने गंध फैला रखी है नही तो ये लोग शब्दकोशों से भी ऐसे शब्द चुन-चुन कर निकल फेंके । यशवंत भाई बौधिकों को इलाके मी जाकर आप बहस करें , आप तो गंदे भादासी हैं , बुरे और बदतमीज हैं । वे महान हैं , भड़सियों कि क्या औकात कि उनकी बहस मी हस्तक्षेप करें । दरअसल बहस करना उन्हें आता है ,उनका यह कम है -आप जल्दी बदलाव के चक्कर मे है जबकि वे देर तक बहस ईंजोय करना चाहते हैं (चाहित हैं )। बात बुझा करो भड़सियों .....

जे भड़ास

10.2.08

मेरे दर्द को आप सबने समझा, शुक्रिया--हरे प्रकाश उपाध्याय

((लीजिए, बुरे लोगों और बुरी चीजों से जीवन मंत्र निकालने वाले और भड़ासियों के लिए सर्वश्रेष्ठ कविता लिखने वाले साथी हरेप्रकाश उपाध्याय की तलाश पूरी हो गई। वे दिल्ली में ही रहते हैं। कादंबिनी मैग्जीन में बतौर सीनियर जर्नलिस्ट कार्यरत हैं। उससे पहले वे हंस में सहायक संपादक थे। कल उन्होंने भड़ास पर प्रकाशित अपनी कविताओं पर कमेंट किया तो उनके नाम के जरिए उनके ब्लाग तक पहुंचा और उनके ब्लाग पर उनका मोबाइल नंबर मिला। फोन किया तो बातचीत हुई। हरेप्रकाश ने भड़ास में प्रकाशित अपनी कविता पर जो कमेंट दिया है, वो इस प्रकार है.....बिलकुल नीचे दो लिंक दिए गए हैं जो उनकी कविताओं के है, क्लिक कर उनकी कविता संबंधी मूल पोस्ट भी पढ़ सकते हैं...यशवंत))

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हरे प्रकाश उपाध्याय has left a new comment on your post "सच ने नहीं, झूठ ने दिया संबल...सर्वश्रेष्ठ भड़ासी ...":

sb bhai logon ko nmste, shukriya...
mere drd ko aap sb ne snjha shukriya...
mera ek snkln bhartiy jnanpith me atka hai, dua kren ki jldi chhp jae, nam hai-BURAI KE PAKSH MEN


Posted by हरे प्रकाश उपाध्याय to भड़ास at 9/2/08 4:35 PM

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हरे प्रकाश उपाध्याय has left a new comment on your post "हमें नपुंसक होने से बचाया, बददिमाग और बुरे माने गय...":

bhaee login ke nmaskar
hmar do kaudi ke kvita pr kya kahte hain jrranvajee khatir...
aap sbka hee,
hare prakash


Posted by हरे प्रकाश उपाध्याय to भड़ास at 9/2/08 4:29 PM

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आप उपरोक्त कविता को, जो दो पार्ट में भड़ास पर प्रकाशित हुई थी, नीचे दी गई हेडिंग पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं...

हमें नपुंसक होने से बचाया, बददिमाग और बुरे माने गये साथियों ने

सच ने नहीं, झूठ ने दिया संबल

जय भड़ास
यशवंत

6.2.08

दिल को छू गयी कविता

हरेप्रकाश उपाध्याय जी, बहुत दिनों बाद कोई कविता इतनी प्यारी लगी कि दिल से कहने को मन हो रहा है कि वाकई, आपने जो लिखा है वो सौ फीसदी सच है। बुरे लोग ही हमेशा काम आए। आपको मेरी तरफ से ढेर सारी बधाइयां। भड़ास तो धन्यवाद, जो इतनी शानदार कविता यहां लगा रखी है, ये वाकई सर्वश्रेष्ठ कविता है।

विनोद सिंह