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20.8.12

भ्रष्ट सरकार गिराओ, तो ईद हो प्यारी............


वन्दे मातरम दोस्तों,

आप सभी को ईद की हार्दिक शुभकामनायें

आग नफरत की मिटाओ, तो ईद हो प्यारी,
नाग वहशत के जलाओ, तो ईद हो प्यारी............
भूखे प्यासे जो आये हैं, शरण में अपनी
ख़ुशी ढूंढ उनकी जो लाओ, तो ईद हो प्यारी............
है रहीम भी मेरा, राम का वंसज मैं,
सिंवई घर मेरे जो खाओ,तो ईद हो प्यारी...........
पार सरहद के पनाह पाए हैं, जो आतंकी,
सबक उनको सिखाओ, तो ईद हो प्यारी............
जान हथेली पे रख, खड़े हैं जो सरहद पे,
हीरो उनको जो बनाओ, तो ईद हो प्यारी............
मैं हिन्दू बन के दहाडा, तू मुसलमां बनके,
इंसान  बन के दिखाओ, तो ईद हो प्यारी............
सियासत से है, पशेमां बहुत ये देश मेरा,
भ्रष्ट सरकार गिराओ, तो ईद हो प्यारी............

भ्रष्ट सरकार गिराओ, तो ईद हो प्यारी............


वन्दे मातरम दोस्तों,

आप सभी को ईद की हार्दिक शुभकामनायें

आग नफरत की मिटाओ, तो ईद हो प्यारी,
नाग वहशत के जलाओ, तो ईद हो प्यारी............
भूखे प्यासे जो आये हैं, शरण में अपनी
ख़ुशी ढूंढ उनकी जो लाओ, तो ईद हो प्यारी............
है रहीम भी मेरा, राम का वंसज मैं,
सिंवई घर मेरे जो खाओ,तो ईद हो प्यारी...........
पार सरहद के पनाह पाए हैं, जो आतंकी,
सबक उनको सिखाओ, तो ईद हो प्यारी............
जान हथेली पे रख, खड़े हैं जो सरहद पे,
हीरो उनको जो बनाओ, तो ईद हो प्यारी............
मैं हिन्दू बन के दहाडा, तू मुसलमां बनके,
इंसान  बन के दिखाओ, तो ईद हो प्यारी............
सियासत से है, पशेमां बहुत ये देश मेरा,
भ्रष्ट सरकार गिराओ, तो ईद हो प्यारी............

19.8.12

तुम से प्यार करने की ऋत छा गई है ।



 प्यार करने की ऋत।
(courtesy-Google images)


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प्रिय दोस्तों,

संसार में, मानव के अलावा सभी प्राणीओ के व्यवहार के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है,किंतु जब कोई मानव, प्रेम जैसे नाज़ुक और पवित्र बंधन को निभाने के बजाय, हर अंग को जलाने वाली तेज़ धूप बनकर, अपना भाग्य विधाता खुद बनने की कोशिश करता है, तब ऐसे इन्सान को खुद ईश्वर भी सहायता नहीं कर सकता ।

तत पश्चात, सुलग कर राख के ढेर समान, अवशेष प्रेम को बचाने के लिये, उस मानव  के सारे प्रयत्न ऐसे लगते हैं जैसे कि..!!

 समूलं वृक्षं उत्पाट्य शखां उच्छेत्तुं कुतः श्रमः।

अर्थातः- जड़ के साथ पेड़ को काटने के पश्चात, शाखाएँ काटने की जहेमत क्यों उठाना?

वैसे अगर कोई सच्चा प्रेमी, चाहे तो राख से,  फिर से फीनिक्स पंखी कि भांति प्रेम भी सजीवन हो सकता है, मगर यह शक्ति प्राप्त करने से पहले प्रेम क्या है, यह जानना अति आवश्यक  है।

वास्तव में प्रेम क्या  है?

प्रेम इच्छा है - प्रेम महेच्छा है ।
प्रेम बिंब है - प्रेम प्रतिबिंब है ।

प्रेम पुकार है - प्रेम स्वीकार है ।
प्रेम मदहोश है -प्रेम बेहोश है ।


प्रेम हार है -प्रेम जीत है ।
प्रेम धड़कन है -प्रेम तड़पन है।


प्रेम घटा है -प्रेम बिजली है।
प्रेम सावन है -प्रेम पावन है ।


प्रेम चमन है - प्रेम वसंत है।
प्रेम शर्म है -प्रेम वहम है।


प्रेम शराब है -प्रेम शबाब है।
प्रेम निकट है -प्रेम विकट है ।


प्रेम मिलन है -प्रेम विरह है ।
प्रेम बंदगी है -प्रेम जिंदगी है ।


प्रेम नित है -प्रेम सत्य है ।
प्रेम शिव है प्रेम सुंदर है ।

प्रेम ईश्वर है -प्रेम ही परमेश्वर है ।

जब ईश्वर कि कृपा होती है तब प्रेम का बीज अंकुरित होता है । आशा के पुष्प खिलते हैं और लगता है जैसे पपिहे की हर एक बोली के साथ वसंत पूर्ण रुप में खिल उठी है , किसी को प्यार करने की ऋत छा गई है ।

हे प्रीतम, स्वर्ग से भी सुंदर चमन सजायेंगे ।
देखो देखो हरी-भरी वसंत छा रही है ।
हे प्रीतम, प्रेमांकुर अंकुरित होते ही, आशा का संचार हुआ है ।
क्या कहूं,तुमसे प्यार करने की ऋत छा गई है ।


यह सितारे, ये नक्षत्र स्थानांतरित होंगे फिर से । 
विधाता भी लेख लिखें फिर से ।
विधाता को भी ये ज्ञात हो गया है । 
क्या कहूं, तुमसे प्यार करने की ऋत छा गई है ।


प्रेम की धारा बहेगीं यहाँ फिर से ।
ये पुष्प भ्रमर को मनायेंगे फिर से ।
फूलों को भी ये ज्ञात हो गया है ।
क्या कहूं, तुमसे प्यार करने की ऋत छा गई है ।


ये धरती ये अंबर एक हो जायेंगे फिर से ।
मेरे दिल  में चूपके से कोई आयेगा फिर से ।
हवा गुनगुना रही कानों में धीरे से ।
क्या कहूं, तुमसे प्यार करने की ऋत छा गई है ।


प्यार ही पूजा । प्यार ही परमात्मा । प्यार ही बंदगी । यह तीनों का सुलभ समन्वय, इसी का नाम है जिंदगी ।

प्रिय दोस्तों, आपका अनुभव क्या कहता है ?

इसी प्यार को सुरों की माला में  पिरोकर, पेश है, उस्ताद श्री बड़े ग़ुलाम अली साहब की एक रचना,"भोर भयी ।"

आप इस लिंक पर, इसे डाउनलोड भी कर सकते हैं ।

http://goo.gl/EIEoa


मार्कण्ड दवे. दिनांकः ०७ -मार्च - २०११.

कर्त्तव्य ,अकर्त्तव्य ,व्यापार और राजनीति


कर्त्तव्य ,अकर्त्तव्य ,व्यापार और राजनीति 

साहब ,आजादनगर झोपड़ पट्टी के पास बलात्कार की घटना घटी है।

साहब- पकड़ के धांसू दफा लगा कर अन्दर कर दूँगा साले को ,भविष्य में किसी की हिम्मत ही
           नहीं पड़ेगी किसी लड़की को छेड़ने की .

साहब उसके कपडे और रहन-सहन से ठीक घर का नजर आता है. 

साहब-  बढ़िया !उसने ऐश की,मजे लूटे ,अब देखना भारी दफा को हल्की करवाने के भरपूर
            नोट मिलेंगे .वैसे भी ऐसे मामले में ज्यातर दोनों पक्ष दोषी होते हैं .अपनी तो ऐश हो
            जायेगी .

साहब वह लड़की अपने बाप की जगह आपका नाम दे रही है!!!

साहब- छोड़ना मत उस कमीने को .आज उसकी मौत ने दावत दे दी है .पूरी रात मार मार कर
           हुलिया बदल दूँगा और ऐसा फिट करूंगा की सालो बाहर नहीं आ पायेगा
.
साहब ,वह बहुत बड़े नेता का बेटा है !!

साहब- क्या बात करते हो ?अब उस नेता ने मेरी लड़की के साथ अपने लड़के की शादी नहीं
           की तो उसका तो पूरा दाँव  ही फेल हो जाएगा .उस लड़के को मारना मत ,पहले बात
           करके देख लेता हूँ ,बात बन गयी तो बल्ले-बल्ले .बड़े घर का जमाई बैठे -बैठे मिल सकता
           है.वैसे ही बेटी तो पराया धन होती है ,हाथ तो पीले करने ही थे .भूल सुधार भी हो जायेगी
           और बेटी भी ऊँचे घर में राज करेगी .    

18.8.12

कॉरपोरेट युग में शर्मिन्दा श्रम-ब्रज की दुनिया

मित्रों,अर्थशास्त्र बताता है कि किसी भी तरह के उद्योग को स्थापित करने के लिए 4 आधारभूत तत्त्वों की आवश्यकता होती है-(1) भूमि,(2) पूँजी,(3) श्रम और (4) बाजार। बदलते समय के साथ इनका आनुपातिक महत्व भी घटता-बढ़ता रहता है। जब इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति हुई तब वहाँ के श्रमिकों की दशा काफी ज्यादा ख़राब थी शायद जानवरों से भी ज्यादा ख़राब। धीरे-धीरे वहाँ के श्रमिक जागरूक हुए और अपना एक राजनीतिक दल लेबर पार्टी ही बना डाली जो आज भी वहाँ की मुख्य विपक्षी पार्टी है। इंग्लैंड की संसद ने समय-समय पर श्रमिकों के कल्याण के लिए कई कानून बनाए। धीरे-धीरे ऐसे कानूनों का निर्माण दुनिया के अन्य देशों में भी किया गया।
             मित्रों,हम सब यह जानते हैं कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का साम्यवाद के प्रति खासा झुकाव था। फिर भी उन्होंने न तो विकास का साम्यवादी मॉडल अपनाया और न ही पूरी तरह से पूँजीवादी मॉडल को ही स्वीकार किया। फिर भी आरंभ में भारत सरकार का झुकाव साम्यवाद और समाजवाद की ओर ही ज्यादा रहा और पूँजी पर श्रम को वरीयता दी गई। फिर 1990 में सोवियत संघ के विघटन के साथ वक़्त ने करवट बदला और श्रम धीरे-धीरे पूरी दुनिया में हाशिए पर जाने लगा। पूरी दुनिया की सरकारें अधिक-से-अधिक विदेशी पूँजी देश में लाने की जद्दोजहद में श्रमिकों की अत्यावश्यक मांगों की भी अनदेखी करने लगी और आज हमारे देश भारत में स्थिति ऐसी हो गई है कि देश में वर्तमान श्रम-कानूनों का मतलब ही नहीं रह गया है। भारतीय श्रम-कानूनों से बचने के लिए कोई भी कम्पनी या राज्य/केंद्र सरकार (जिनमें बिहार सरकार अव्वल कही जा सकती है) पुरानी सेवा-शर्तों पर श्रमिकों की बहाली करती ही नहीं है बल्कि संविदा (कांट्रेक्ट) के आधार पर करती है और नियुक्ति के समय ही कर्मचारियों से लिखवा लेती  है कि उसको सरकारी कानूनों से कुछ भी लेना-देना नहीं है और वह नियोक्ता की सारी सेवा-शर्तों को मानता है। मुझसे भी तब ऐसे कागजात पर हस्ताक्षर करवाया गया था जब मैंने 2007 में पटना,हिंदुस्तान ज्वाईन किया था। आज हम पत्रकारों को भी सरकार द्वारा समय-समय पर स्थापित वेतन आयोगों के लाभ नहीं दिए जा रहे हैं और सरकार जान-बूझकर अंधी-बहरी बनी हुई है।
               मित्रों,आज से नहीं बल्कि दशकों से श्रमिक सरकार और संसद से ऐसी मांग करते आ रहे हैं कि ऐसा कानून बनाया जाए जिससे संविदा पर नियुक्त श्रमिकों/कर्मियों को भी श्रम-कानूनों का लाभ मिले परन्तु उनकी न तो सरकार ही सुन रही है और न तो संसद ही। उल्टे सरकार खुद भी बड़े पैमाने पर संविदा के आधार पर श्रमिकों और कर्मचारियों की भर्ती कर रही है और कथित रूप से पैसे बचा रही है। उदाहरण के लिए बिहार में संविदा पर बहाल प्राथमिक शिक्षकों को मात्र 6000 रू. मासिक और माध्यमिक शिक्षकों को मात्र 8000 रू. का मानदेय दे रही है। अब शिक्षक बेचारा खाएगा क्या और बचाएगा क्या? स्थिति कुल मिला कर इतनी भयावह है कि आज की तारीख में सार्वजानिक क्षेत्र में 55% श्रमिक संविदा पर नियुक्त हैं। अब मानेसर के मारुति प्लांट को लें तो वहाँ भी पुरानी सेवा शर्तों पर बहाल अथवा स्थायी श्रमिकों और संविदा पर बहाल श्रमिकों के वेतन में काफी अंतर है। जहाँ स्थायी श्रमिकों को 17000 रू. प्रति माह दिया जाता है वहीं संविदा पर बहाल श्रमिकों को मात्र 7000 रू./माह जबकि काम दोनों एक ही करते हैं और बराबर ही करते हैं। क्या कोई व्यक्ति 7000 रू./माह में घर से बाहर रहकर अपने परिवार को भरपेट रोटी-दाल भी दे सकता है,शिक्षा-दीक्षा तो दूर की कौड़ी रही। जब श्रमिकों ने वेतन बढ़ाने को कहा तो उनसे सिर्फ वार्ता की गई। मालूम हो कि यहाँ संविदा पर बहाल मजदूरों की संख्या कुल मजदूरों की संख्या की लगभग एक तिहाई है। अक्टूबर 2011 से 25 बार वार्ताएँ की गई लेकिन कोई भी मांग नहीं मानी गई। हाँ,इस बीच काम के घंटे जरूर दो गुने-तक कर दिए गए। अब ऐसी स्थिति में अगर श्रमिकों को बोनस में वक़्त-बेवक्त गालियाँ भी दी जाए और विरोध करने पर निकाल बाहर कर दिया जाए तो उनके पास सिवाय मरने-मारने के और विकल्प भी क्या बचता है? अनशन-धरना पर बैठने पर हरियाणा पुलिस पीटती है और ऐसा वह हीरो-हौंडा के श्रमिकों के साथ बखूबी कर चुकी है। इसलिए गुस्से में श्रमिकों ने आगजनी शुरू कर दी और कदाचित दुर्घटनावश इसमें एक सुपरवाईजर सह मानव संसाधन विभाग पदाधिकारी मारा गया। वैसे आजकल सारी कंपनियों का मानव संसाधन अधिकारी बस इतनी ही कोशिश करता है कि श्रमिकों से किस तरह कम-से-कम वेतन में काम लिया जाए इसलिए उसके प्रति श्रमिकों का रोष भी सर्वाधिक होता है।
             मित्रों,मेरा दावा है कि आप बिना संगणक के हिसाब नहीं लगा सकते हैं कि एक साधारण श्रमिक और मुकेश अंबानी के वेतनों में कितने गुना का अंतर है?उस पर तुर्रा यह कि अख़बार आजकल बड़े उत्साह से छापते हैं कि फलाँ उद्योगपति अब से अपनी कंपनी से मात्र 20 या 40 करोड़ सालाना का ही वेतन लेगा। कम होने पर भी क्या इतना वेतन लेना वो भी ऐसे देश में जहाँ की 80% आबादी की रोजाना की आमदनी 20 रू. भी नहीं हो,क्या उचित है?हम देखते हैं कि एक तरफ तो टाटा कंपनी का मुनाफा लगातार बढ़ता जा रहा है और वह भारत की सबसे बड़ा व्यापारिक समूह बन गई है वहीं दूसरी ओर वह न केवल अपनी खानों में श्रमिकों और कर्मियों का वेतन ही आधा से कम कर दे रही है बल्कि उन की छुट्टियों में भी भारी कटौती कर दे रही है;वहीं टाटा मोटर्स,जमशेदपुर के श्रमिकों के वेतन में भी जानलेवा महंगाई को देखते हुए समुचित वृद्धि करने के बदले भारी कमी कर दे रही है। फिर भी रतन टाटा भारत समेत दुनिया भर की सरकारों की आँखों के तारे बने हुए हैं,भारत के अनमोल रतन। क्या इसी को पूंजीवादी या कॉरपोरेटी नैतिकता या उदारता कहते हैं? कितनी बड़ी बिडम्बना है कि एक तरफ जहाँ कंपनियों के मुनाफे का ग्राफ 90 डिग्री का कोण बनाता रहता है कम्पनियाँ धनपशु बनकर निर्लज्जतापूर्वक श्रमिकों के वेतनों में कटौती करने पर तुली रहती है। क्या लाभ कमाने की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?या लाभ में से मजदूरों को भी अनुपातिक लाभ नहीं देना चाहिए?क्या अपनी जिंदगी को ज्यादा खुशहाल बनाने के लिए दूसरों की ज़िंदगियाँ तबाहकर देना एक आपराधिक कृत्य नहीं है?उनको इस बात की तनिक भी चिंता नहीं है कि श्रमिक कैसे जीएगा? नहीं तो क्या कारण है कि कुल मिलाकर भारी लाभ में चल रहे राज्यसभा सदस्य और उद्योगपति विजय माल्या की विमानन कंपनी के पायलटों को भी वेतन पाने के लिए भी बार-बार हड़ताल करनी पड़ रही है?क्या श्रमिक ईन्सान नहीं होते और उनको भी अपने धनवान मालिकों की तरह ईज्जतभरी गुणवत्तापूर्ण ज़िन्दगी जीने का अधिकार नहीं है?अगर है तो फिर हमारी आम आदमी की सरकार ने क्यों उन्हें पूँजी के हाथों पिटने और मर जाने के लिए बेसहारा छोड़ दिया है?क्यों भारतीय औद्योगिक क्षेत्र में मत्स्य न्याय अस्तित्व में है?श्रमिकों के नाम पर राजनीति करनेवाले भारतीय कम्युनिस्टों की तो बात ही करना बेकार है। ये लोग अगर सरकार और पूँजी के दलाल नहीं हो जाते तो मजदूरों की स्थिति इतनी ख़राब भी नहीं होती।अभी-अभी कोयला घोटाले में ज्योति बसु के बेटे चन्दन बसु का नाम आ रहा है।वास्तव में भारत के सारे कम्युनिस्ट चिथड़ा ओढ़कर मलाई खाने में लगे हैं।
                    मित्रों,सोवियत संघ के पतन के बाद सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में श्रम का महत्व घटा है और पूँजी का महत्त्व बढ़ा है। अभी परसों ही श्रमिकों के साथ दुनिया में दो दर्दनाक घटनाएँ घटी हैं। पहली भारत में और दूसरी दक्षिण अफ्रिका में। भारत में जहाँ मारुति के मानेसर संयंत्र के 500 श्रमिकों को एकबारगी बर्खास्त करने की नोटिस दी गयी है जबकि इनमें में कई लोग घटना के दिन शहर में भी नहीं थे। वहीं दूसरी घटना में दक्षिण अफ्रिका में हड़ताल कर रहे हजारों निहत्थे मजदूरों पर वहाँ की पुलिस ने गोलियाँ चलाई है और इस तरह चलाई है जैसे कि निशानेबाजी की कोई प्रतियोगिता चल रही हो। परिणामस्वरुप क़म-से-कम 18 मजदूर मारे गए हैं और सैकड़ों घायल हो गए हैं। अच्छा होता अगर भारत सरकार या हरियाणा सरकार भी इन बर्खास्त किए गए 500 मजदूरों को गोलियों से उड़ा ही देती वे कम-से-कम इस प्राणघातक महंगाई में बेरोजगार होकर और बलवाई होने का कलंक माथे पर लेकर तिल-तिल कर रोज-रोज मरने से तो बच जाते।

17.8.12

जिस गंदगी को गाली दी, उसी में जा गिरे रामदेव


करीब डेढ़ साल पहले 25 फरवरी 2011 को अनेक न्यूज पोर्टल पर अपने एक आलेख में मैने आशंका जाहिर की थी कि कहीं खुद की चाल भी न भूल जाएं। आखिर वही हुआ, जिस गंदगी को वे पानी पी पी कर गालियां दे रहे थे, आखिर उसी गंदगी में जा कर गिरे।
बेशक हमारे लोकतांत्रिक देश में किसी भी विषय पर किसी को भी विचार रखने की आजादी है। इस लिहाज से बाबा रामदेव को भी पूरा अधिकार है। विशेष रूप से देश हित में काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना और उसके प्रति जनता में जागृति भी स्वागत योग्य है। इसी वजह से कुछ लोग तो शुरुआत में ही बाबा में जयप्रकाश नारायण तक के दर्शन करने लगे थे। अब तो करेंगे ही, क्योंकि बाबा अब उसी राह पर चल पड़े हैं। जयप्रकाश नारायण ने भी व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर कांग्रेस सरकार के खिलाफ मुहिम छेड़ी। मुहिम इस अर्थ में कामयाब भी रही कि कांग्रेस सरकार उखड़ गई, मगर व्यवस्था जस की तस ही रही। उस मुहिम की परिणति में जो जनता पार्टी बनी, उसका हश्र क्या हुआ, किसी से छिपा हुआ नहीं है। बाबा पहले तो बार बार यही कहते रहे कि उनकी किसी दल विशेष से कोई दुश्मनी नहीं है, मगर आखिर कांग्रेस मात्र के खिलाफ बिगुल बजाने के साथ ही उनका एजेंडा साफ हो गया है। बाबा का अभियान देश प्रेम से निकल कर कांग्रेस विरोध तक सिकुड़ कर रह गया है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि बाबा का अभियान एनडीए की रामदेव लीला बन कर रह गया है। पिछले साल रामलीला मैदान में संपन्न हुई रणछोड़ लीला के बाद साख की जो शेष पूंजी बची थी, वो 13 अगस्त को रामलीला मैदान में कांग्रेस विरोध के नाम पर एनडीए के हाथों लुट गयी।
ऐसा नहीं कि हमारे देश में आध्यात्मिक व धर्म गुरू राजतंत्र के जमाने से राजनीति में शुचिता पर नहीं बोलते थे। वे तो राजाओं को दिशा देने तक का पूरा दायित्व निभाते रहे हैं। हालांकि बाबा रामदेव कोई धर्म गुरू नहीं, मात्र योग शिक्षक हैं, मगर जीवन चर्या और वेशभूषा की वजह से अनेक लोग उनमें भी धर्म गुरू के दर्शन करते रहे हैं। लाखों लोगों की उनमें व्यक्तिगत निष्ठा है। उनके शिष्य मानें या न मानें, मगर यह कड़वा सच है कि राजनीतिक क्षेत्र में अतिक्रमण करते हुए जिस प्रकार आग उगलते हैं, जिस प्रकार अकेली कांगे्रस के खिलाफ निम्न स्तरीय भाषा का उपयोग करते हैं, उससे उनकी छवि तो प्रभावित हुई ही है। उनकी मुहिम कितनी कामयाब होगी, ये तो वक्त ही बताएगा, मगर मगर योग गुरू के रूप में उन्होंने जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति व प्रतिष्ठा अर्जित की है, उस पर आई आंच को वे बचा नहीं पाएंगे। असल में गुरु तुल्य कोई शख्स राजनीति का मार्गदर्शन करे तब तक तो उचित ही प्रतीत होता है, किंतु अगर वह स्वयं ही राजनीति में कूद पड़ता है तो फिर कितनी भी कोशिश करे, काजल की कोठरी में काला दाग लगना अवश्यंभावी है।
यह सर्वविदित ही है कि जब वे केवल योग की बात करते हैं तो उसमें कोई विवाद नहीं करता, लेकिन भगवा वस्त्रों के प्रति आम आदमी की श्रद्धा का नाजायज फायदा उठाते हुए राजनीतिक टीका-टिप्पणी की तो उन्हें भी दिग्विजय सिंह जैसे शातिर राजनीतिज्ञों की घटिया टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। तब बाबा के शिष्यों को बहुत बुरा लगता था। भला ऐसा कैसे हो सकता था कि केवल वे ही हमला करते रहते। हालांकि शुरू में वे यह रट लगाए रहते थे कि उनकी कांग्रेस से कोई दुश्मनी नहीं है, मगर काले धन के बारे में बोलते हुए गाहे-बगाहे नेहरू-गांधी परिवार को ही निशाना बनाते रहे। शनै: शनै: उनकी भाषा भी कटु होती गई, जिसमें दंभ साफ नजर आता था।
रहा सवाल जिस कालेधन की वे बात करते हैं, क्या वे उस काले धन की वजह से ही आज वे सरकार पर हमला बोलने की हैसियत में नहीं आ गए हैं। हालांकि यह सही है कि अकूत संपत्तियां बाबा रामदेव के नाम पर अथवा निजी नहीं हैं, मगर चंद वर्षों में ही उनकी सालाना आमदनी 400 करोड़ रुपए तक पहुंचने का तथ्य चौंकाने वाला ही है। कुछ टीवी चैनलों में भी बाबा की भागीदारी है। बाबा के पास स्कॉटलैंड में दो मिलियन पौंड की कीमत का एक टापू भी बताया जाता है, हालांकि उनका कहना है वह किसी दानदाता दंपत्ति ने उन्हें भेंट किया है। भले ही बाबा ने खुद के नाम पर एक भी पैसा नहीं किया हो, मगर इतनी अपार धन संपदा ईमानदारों की आमदनी से तो आई हुई नहीं मानी जा सकती। निश्चित रूप से इसमें काले धन का योगदान है। इस लिहाज से पूंजीवाद का विरोध करने वाले बाबा खुद भी परोक्ष रूप से पूंजीपति हो गए हैं। और इसी पूंजी के दम पर वे अब खम ठोक कर कह रहे हैं कि कांगे्रस को उखाड़ कर नई सरकार बनाएंगे।
ऐसा प्रतीत होता है कि योग और स्वास्थ्य की प्रभावी शिक्षा के कारण करोड़ों लोगों के उनके अनुयायी बनने से बाबा भ्रम में पड़ गए हैं। उन्हें ऐसा लगने लगा है कि आगामी चुनाव में जब वे खुल कर भाजपा सहित कुछ पार्टियों के प्रत्याशियों को समर्थन देंगे तो वे सभी अनुयायी उनके कहे अनुसार मतदान करेंगे। योग के मामले में भले ही लोग राजनीतिक विचारधारा का परित्याग कर सहज भाव से उनके इर्द-गिर्द जमा हैं, लेकिन जैसे ही वे सक्रिय राजनीति का चोला धारण करेंगे, लोगों का रवैया भी बदल जाएगा।
जहां तक देश के मौजूदा राजनीतिक हालात का सवाल है, उसमें शुचिता, ईमानदारी व पारदर्शिता की बातें लगती तो रुचिकर हैं, मगर उससे कोई बड़ा बदलाव आ जाएगा, इस बात की संभावना कम ही है। ऐसा नहीं कि वे ऐसा प्रयास करने वाले पहले संत है, उनसे पहले करपात्रीजी महाराज और जयगुरुदेव ने भी अलख जगाने की पूरी कोशिश की, मगर उनका क्या हश्र हुआ, यह किसी ने छिपा हुआ नहीं है।  इसी प्रकार राजनीति में आने से पहले स्वामी चिन्मयानंद, रामविलास वेदांती, योगी आदित्यनाथ, साध्वी ऋतंभरा और सतपाल महाराज के प्रति कितनी आस्था थी, मगर अब उनमें लोगों की कितनी श्रद्धा है, यह भी सब जानते हैं। कहीं ऐसा न हो कि बाबा रामदेव भी न तो पूरे राजनीतिज्ञ हो पाएं और न ही योग गुरू जैसे ऊंचे आसन की गरिमा कायम रख पाएं।
कुल मिला कर यह बेहद अफसोस की बात है कि जनभावनाओं के अनुरूप पिछले एक डेढ़ साल में राजनीतिक दलों के खिलाफ दो बड़े आंदोलन पैदा हुए लेकिन अन्ना का आंदोलन राजनीतिक दल बनाने की घोषणा के साथा खत्म हो गया तो बाबा रामदेव का गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों का समर्थन लेकर व उनका समर्थन करने की घोषणा के साथ समाप्त हो गया।
-तेजवानी गिरधर


16.8.12

नाज़ुक दिल । (गीत)




(GOOGLE IMAGES)

नाज़ुक  दिल । (गीत)


नाज़ुक   दिल    तोड़ने   का,   उसे    भी    अहसास  था ।

वो     ज़ालिम    यहीं  -  कहीं,   मेरे   ही   आसपास  था ।


अंतरा-१.


अश्क,  आह,  जुनून, इश्क   से  उसे  क्या  वास्ता..!

हर   बेमानी    लफ़्ज़,  उन   क़दमों   का   दास  था ।

वो    ज़ालिम   यहीं  -  कहीं,  मेरे  ही  आसपास  था ।

(अश्क=आंसु; ल़फ्ज़=शब्द )


अंतरा-२.

क्या   कहें    उसे,  हम   ही   थे    बिकने   को   तैयार ..! 

फिर   उसका   ख़ुद  का   भी  तो  बड़ा सा  नख़ास  था ।

वो    ज़ालिम   यहीं  -  कहीं,  मेरे   ही   आसपास  था ।

( नख़ास=  पशु बाज़ार = नासमझ आशिक बाज़ा२)


अंतरा-३.


गहराने    को    रुज,  सलाक   बहुत   थे  उसके   पास ।

ये  भी  है   कि  उसका  इल्म, अंदाज़   कुछ  खास  था ।

वो     ज़ालिम    यहीं  -  कहीं,  मेरे   ही   आसपास  था ।

(रुज=ज़ख़्म; सलाक=तीर; इल्म=जानकारी; अंदाज़=तरीक़ा)


अंतरा-४.


ज़ख़्मी  दिल    कहाँ   देखेगा    ख़्वाब    रौशनी    का..!

शशिज   का   मेरा   चाँद   तो,  सियाही   अमास  था ।

वो    ज़ालिम   यहीं  -  कहीं,  मेरे   ही   आसपास  था ।

(शशिज=पूनम; सियाही=काली )

मार्कण्ड दवे । दिनांकः१६-०८-२०१२.

Flaxseed - Gate Way to Success


15.8.12

स्वतंत्र भारत की समस्याएं और संभावित निराकरण


स्वतंत्र भारत की समस्याएं और संभावित निराकरण 

1.राष्ट्रप्रेम के जज्बे का गिरता हुआ स्तर .
2.दम तोडती मातृभाषा,घुटती हुयी राष्ट्रभाषा ,पोषण पा रही अंग्रेजी भाषा .
3.चरित्र निर्माण विहीन शिक्षा पद्धति,जो सफल नागरिक देने में पूर्ण रूप से असफल हो रही है ।
4.देश में नागरिक भारतीय की जगह हिन्दू,मुस्लिम, इसाई आदि से जाने जाते हैं यानि फुट डालो
   और राज करो .
5.आर्थिक असमानता -97% पूंजी 3% जनता के हाथ में यानी गलत और असफल आर्थिक नीतियाँ .
6.गुलामी की मानसिकता में जीने वाली जनता .
7.अपरिपक्व न्याय व्यवस्था .
8.संविधान सुधार में ढिलाई .
9.दोषपूर्ण सार्वजनिक वितरण प्रणाली
10.पदलोलुप,भ्रष्ट और चरित्रहीन होता शासक वर्ग
11.नारे ज्यादा ,काम कम
12.बेलगाम चुनावी खर्च
13.राष्ट्र के धन का भरपूर दुरूपयोग और लूट .
14.बुनियादी जरुरत की जगह लोकलुभावन अपव्यय बढ़ाने वाली योजनाओं पर बेशुमार खर्च
15.साख खोती पत्रकारिता

समस्याओं का निराकरण

1.राष्ट्रप्रेम की भावना को राष्ट्रपुरुषो के जीवन चरित्र  से जगाया जाता है ,महापुरुषों के सिद्धांतो
   को जीवन में उतार कर पोषित किया जाता है और श्री कृष्ण गीता के दैवीय गुणों से पराकाष्ठा
   पर पहुंचाया जा सकता है .
2.मनुष्य मातृभाषा में ही पहले सोचता है और फिर बोलता है .मातृभाषा का महत्व हमें समझना
   होगा और पुरे हिन्दुस्थान को राष्ट्र भाषा से ही जोड़ना होगा .विदेशी भाषा का स्थान राष्ट्र भाषा से
   ऊपर कभी भी नहीं होना चाहिए ,चीन इसका जीवंत उदाहरण है।
3.शिक्षा पद्धति में भयंकर खामियां हैं ,यह सम्यक और समग्र विकास नहीं करती है सिर्फ आर्थिक
   नागरिक पैदा करती है जो थोडा सा ज्ञान पाकर संवेदनाहिन  बन रहे हैं.
4.संविधान में जरुरी संशोधन किया जाना चाहिए .शिक्षा में नाम के बाद जाती की जगह नागरिकता
   को स्थान दिया जाना चाहिए.संविधान में अगडी जाती  ,पिछड़ी जाती ,अनुसूचित जाती का
   इस्तेमाल नहीं हिकार संपन्न भारतीय,मध्यम वर्ग,गरीब वर्ग का इस्तेमाल हो ताकि सभी का
   सम्यक विकास हो सके।  
5.कर ढाँचे में सुधार ,शिक्षा व्यवस्था को निशुल्क ,आर्थिक आधार पर आरक्षण व्यवस्था लागू कर
   सुधार किया जाना चाहिए .किसान और असंगठित मजदूरो के हितो का ख्याल जरुरी बन गया है .
6.गुलामी की मानसिकता को हटाने के लिए हमें गुलामी के चिन्हों को हटाना होगा .हमें स्वदेशी
   भावना को बढ़ाना होगा .नागरिक मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के बल पर सर्वोच्च सेवा क्षेत्र में पहुँच
  सके ऐसी व्यवस्था देनी पड़ेगी .
7.न्याय व्यवस्था पर पुन: विचार होना चाहिए ,पुरे राष्ट्र में सेमीनार हो,बहस हो ,श्रेष्ठ न्यायविदो को
  इस क्षेत्र में जरूरी सुधार के काम पर लगाना चाहिए ताकि त्वरीत न्याय मिल सके .
8.संविधान की कुछ धाराओ में कमी रह गयी है जिसका फायदा शातिर लोग उठा रहे हैं ,उन्हें बदलना
   चाहिए ताकि भ्रष्ट व्यवस्था से हम उबार सके.राजनैतिक पार्टियां यदि राष्ट्र हित में जरुरी संशोधन
   नहीं करती है तो जनता के मत को प्रमुखता दी जानी चाहिए .
9.सार्वजनीक वितरण प्रणाली में खामियां हैं और इसी कारण सरकार द्वारा खर्च किया गया एक रुपया
   जनता तक पहुँचते-पहुँचते दस पैसा बन जाता है और 90पैसा सरकारी अमला लुट लेता है.इसलिए
   सत्ता का विकेंद्रीकरण आवश्यक हो गया है.हर गाँव के पास सत्ता हो ताकि पैसे का सदुपयोग हो सके।
10.सांसदों ,विधायको,पार्षदों ,सरपंच आदि के उम्मीदवारों की योग्यता पुन:तय की जाए .उनकी
    शैक्षणिक योग्यता,उम्र,और निष्कलंक होने के मायने तय हो .भ्रष्टाचार में लिप्त जन प्रतिनिधियों
    के परिवार को चुनाव लड़ने के अयोग्य माना  जाए और भ्रष्टाचार पर कडक कानून बने .
11.कथनी और करनी के फर्क को हटाया जाए .सरकारी नौकरशाहों के कार्य को तय समय सीमा में
    पूरा किया जाने पर जोर दिया जाए.राजनैतिक दल जो भी वादे  अपने चुनावी मेनिफेस्टो में रखते
    हैं और सत्ता में आने पर पूरा नहीं करते हैं तो उन पर जनता से धोखाधड़ी के तहत कानूनी कार्यवाही
    हो
12.चुनावी खर्च में उम्मीदवार को पोस्टर ,बैनर नहीं लगाने दे ,उनके प्रचार के लिए उन्हें आकाशवाणी ,
    दूरदर्शन का निशुल्क उपयोग तय किया जाए.
13.राष्ट्र के धन का सदुपयोग होना चाहिए .किस गाँव या शहर के लिए किस मद पर कितना खर्च होगा
    इसकी जानकारी सम्बंधित विभाग के कार्यालय के बाहर बोर्ड पर लगी हो
14.वोटो की राजनीती के लिए लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च बंद हो ,हर क्षेत्र  की बुनियादी जरुरतो
    को तय किया जाए और धन को पहले बुनियादी जरुरतो पर ही खर्च किया जाना चाहिए.
15.पत्रकारिता की जबाबदेही तय हो ,उनके सही और सच्चे प्रश्नों का उत्तर देने की जबाबदारी तय हो .
    उनके अधिकारों को बढाया जाए और मिडिया गलत पाया जाए या खोटी सुचना देता है तो समुचित
    दंड की व्यवस्था हो      

मुस्कुराओ सनम । (गीत)




(GOOGLE IMAGES)

मुस्कुराओ   सनम । (गीत)



मुस्कुराओ   सनम  कि, दिल  को  मैं ने  बहुत  डाँटा  है ।

समझा   दिया   उसे   कि,  इश्क में   घाटा  ही  घाटा  है ।



अंतरा-१.



अब तक  जो  ग़म  तेरा  था, आज  से   वो  सब   मेरा   है । 

चुन-चुनकर  बड़ी  मुश्किल  से,  दोनों  ग़म  को  छाँटा  है ।

मुस्कुराओ   सनम   कि,  दिल  को   मैं ने  बहुत  डाँटा  है ।



अंतरा-२.


लोगों    की   उकसाई   को,  अनसुनी   सी  कर   दे   जानाँ ।

इस  ग़मज़दे  ने  ग़म  अपना,  कब   किसी   से   बाँटा   है..!

मुस्कुराओ   सनम   कि,  दिल  को  मैं ने   बहुत  डाँटा   है ।


(उकसाई=खिजाना;  अनसुनी = न  मानना; ग़मज़दा=शोकमग्न)



अंतरा-३.



सुना   हैं,  तेरे   वसीम  लब   पर,  खिलता  हैं   कोई  फूल ।

दीवाने   के    दामन   में    तो,   हिक़ारत   का   काँटा   है ।

मुस्कुराओ   सनम   कि, दिल  को  मैं ने  बहुत  डाँटा  है ।

(वसीम= ख़ूबसूरत;  लब=होठ; हिक़ारत= उपेक्षा )



अंतरा-४.


दफ़नाया  है   इश्क   यहाँ,   कई   बार   वहशी  दुनिया  ने ।

तभी   तो   कायनात   में   क़ब्रिस्तान   का    सन्नाटा   है ।

मुस्कुराओ   सनम   कि,  दिल को  मैं ने  बहुत  डाँटा   है ।

(कायनात=ब्रह्मांड; वहशी = ज़ालिम, हिंसक)

मार्कण्ड दवे । दिनांकः१५-०८-२०१२.

उस नदी के दो किनारे..

इस किनारे चलते हुए चुन्नी लाल ने बहती नदिया के पार देखा. इस किनारे बड़े बंगले थे, बड़े बाजार थे, उन बाजारों में केवल कुछ हजार लोग थे। वे लोग ऐसे थे जो चलते थे, उड़ते थे, कभी कभी तो कर्म ऐसा करते थे, जिन कर्मों में कोई धर्म नहीं, जिन आदमियों में कोई सच्चा कर्म नहीं,पर उनका उड़ना कभी कम नहीं हुआ, उनका चलना कभी कम नहीं हुआ. इतने में चुन्नी लाल ने नदिया के उस पार देखा। उस पार
 कुछ भूखे नंगे लोग चल रहे थे, हाथ में सूखी रोटी थामे, गले में पानी के अरमान पाले, न बंगले दिखे, न बाजार दिखे, पर उसे भूखे आदमी कई हजार दिखे,सभी और प्रश्न थे और सभी इस पार देख रहे थे. उस पार लोग इस पार आने का रास्ता ढूंढ रहे थे। बीच में एक छोटा सा कमजोर पुल बन रहा था, पुल ऐसा कि दोनों किनारों को जोड़ता नहीं था, पर काम उसका पुलिया का ही था। इस पार लोग उस पार के लोगों के बारे में भाषण दे रहे थे, उनके लिए काम करने का दावा कर रहे थे।

व्यथित चुन्नी लाल आगे चल पड़े, आगे चला तो दोनों का नाम दिखा,नदिया का नाम "लोकतंत्र" और पुलिया का नाम "सरकार" था। तभी दोनों छोर कभी मिलते नहीं थे, इस पार के लोग कभी उस पार जाते नहीं थे, उस पार के लोगों को पुलिया इस पार आने नहीं देती थी। नदिया के ये दोनों छोर न कभी मिले थे, और न कभी मिलेंगे।-रविन्द्र सिंह/ 15 अगस्त 2012.

Satyamev Jayate made a powerfull effect on society.... Thanks Aamir for this show....
Many Doctors opposed Generic Medicines issue..... but Dr. Vipin Jain  i like you, thanks for this effective article...

its just a message to ourselves.......DOCTORS....
Already we had said enough about Aamir on Facebook...but now we have to realize the actuality of situation......
WE ARE BEHAVING LIKE A MORON
INSTEAD OF TALKING ABOUT INCREASED gdp, narayana hrudyalaya,dr devi shetti or Dr Gulati,we are blaming khan for the things, for which, only a "tapori" or goon will argue like that{but they don't

have technical/medical language to do so}.......
even i had seen IMA secretory & a padamshree cardiologist(whom i used to admire a lot) arguing with amir to apologize on a vague basis, in a layman language ( there knowledge aired on a national tv about public health and stats of medicine in india was worst than amir........they mademe feel embarassed about my priffessional communities' representatives.......)
NOW COME TO THE POINT.........
amir attended a meeting of parliamentary standing committee on FDI and FII in pharmaceuticals a witness..........
now doctors & IMA is questioning his authority. ( but he can do so with the research he and his team has done).....
i just want to say, we have to realize that, we are neither good at public health nor our knowledge on the public health condition of our country).
WE SHOULD THINK ON IT.
WE SHOULD WORK ON IT.
WE SHOULD ACT ON IT.
Only this will helps us in clearing the allegations.....(most of that are actually true and 20% of cases are actually undergoing this kind of fake practices........but 4/5th of community is actually doing best for the society)
I salute amir for his initiatives & undermine the authority of so called representative assosiations and their bourgeoisie mentality....they know nothing of ground realities,and interviews of their heads appear regularly on the CHIKNEE-CHIKNEE journals on public health funded by pharmaceuticals)......
if u r in the better 4/5th of our community,u can share it.......
LET THE TRUTH PREVAIL...
SATYAMEVJAYATE..........

visfot.com - चंबल के देशभक्त डकैत

visfot.com - चंबल के देशभक्त डकैत


आजादी के बाद पैसठ साल के सियासी सफर में जिले ने भी तरह तरह के कई मुकाम देखे और कई रिकार्ड भी बना लिये है
आज देश में स्वतंत्रता दिवस की 65 वीं साल गिरह मनायी जा रही हैं। आजादी के बाद इन 65 सालों में देश की राजनीति ने बहुत बदलाव देखे। लेकिन देश में हर बड़ा परिवर्तन बैलेट के माध्यम से ही हुआ। भारतवर्ष में प्रजातंत्र की जड़े मजबूत हुयीं हैं। लेकिन जनता के बीच राष्ट्रीय पार्टियों की पकड़ कम होने तथा क्षेत्रीय दलों के उभरने से राष्ट्रीय स्तर पर प्रजातांत्रिक प्राथमिकताओं में फर्क आया है। पिछले पंद्रह बीस सालों से गठबंधन की सरकारे देश चला रहीं हैं। इन पैंसठ सालों के सियासी सफर में जिले ने भी बहुत से मुकाम देखे हैं। वैसे तो सियासी रूप से यह जिला आजादी के समय से ही अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं। केन्द्र और प्रदेश सरकार में जिले के जनप्रतिनिधियों ने भागीदारी की हैं। आजादी के पहले बनी अंतरिम सरकार से लेकर अभी तक कभी ऐसा नहीं हुआ था कि सत्ता दल का विधायक जिले से चुना गया हो और मंत्री ना बना हो। पहले गैर कांग्रेसी मंत्री का रिकार्ड स्व. पं. महेश प्रसाद शुक्ला के नाम दर्ज है जो कि राज्य मंत्री बने थे। 2003 की उमा सरकार में पहले गैर कांग्रेसी केबिनेट मंत्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन बने थे। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राज में शिव की नगरी सिवनी के मंत्री विहीन रहने का रिकार्ड बन गया हैं।
देश में हर परिवर्तन बैलेट से हुआ बुलैट से नहीं -आज देश में स्वतंत्रता दिवस की 65 वीं साल गिरह मनायी जा रही हैं। आजादी के बाद इन 65 सालों में देश की राजनीति ने बहुत बदलाव देखे। लेकिन देश में हर बड़ा परिवर्तन बैलेट के माध्यम से ही हुआ। चाहे वह जयप्रकाश जी की सम्पूर्ण का्रंति के बाद जनता सरकार के रूप में हुआ हो, या फिर ढ़ाई साल बाद ही इंदिरा गांधी की वापसी हो या फिर 415 सांसदों के ऐतिहासिक बहुमत वाली कांग्रेस की राजीव गांधी की सरकार को नकारा गया हो या फिर कांग्रेस के नरसिंहा राव की सरकार के बाद अटल जी सरकार का बनना हो या फिर दो बार से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यू.पी.ए. सरकार का आना हो सभी कुछ जनता ने अपने वोटों से ही किया जबकि भारत के साथ ही आजाद होने वाले पाकिस्तान में ना केवल अधिकांश परिवर्तन बुलैट से हुये और सालों में वह विभाजित भी हुआ और बांगलादेश का उदय हुआ। भारतवर्ष में प्रजातंत्र की जड़े मजबूत हुयीं हैं। पंचायत से लेकर लोकसभा के सभी बदलाव प्रजातंत्र के जरिये ही सफलता पूर्वक हुये हैं। लेकिन जनता के बीच राष्ट्रीय पार्टियों की पकड़ कम होने तथा क्षेत्रीय दलों के उभरने से राष्ट्रीय स्तर पर प्रजातांत्रिक प्राथमिकताओं में फर्क आया है और पिछले पंद्रह बीस सालों से गठबंधन की सरकारे देश चला रहीं हैं। इस कारण कई बार राष्ट्रीय हितों पर क्षेत्रीय हित हावी हो रहें हैं जो कि भारत जैसे एक प्रगतिशील देश के लिये चिता का विषय हैं। इसका निदान होना जरूरी हैं। इसके लिये आवयक है कि या तो राष्ट्रीय पार्टियां अपना जनाधार बढ़ायें या फिर क्षेत्रीय पार्टियां अपना नजरिया बदलें और राष्ट्रीय हितो पर क्षेत्रीय हितों को हॉवी ना होनें दे या फिर संविधान में संशोधन कर कुछ ऐसी व्यवस्था की जाये कि देश में राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल ही लोकसभा का चुनाव लड़ने की पात्रता रखें। जाति,भाषा और क्षेत्रीयता पर आधारित राजनैतिक दलों का राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ता प्रभाव देश के व्यापक हितों के लिये एक चिंता का विषय बनता जा रहा हैं। वैसे इस बात से कई लोगों के विचार अलग हो सकते हैं और हमारा भी कहने का यह आशय नहीं हैं कि क्षेत्रीय दलों राष्ट्रीय हितो की चिंता नही रहती लेकिन यह जरूर रहता हैं अपने प्रभाव क्षेत्र के हितो को प्राथमिकता देना उनकी राजनैतिक मजबूरी रहती हैं। अंर्तराज्यीय मुद्दों के मामलों में भी जो सोचएक राष्ट्रीय पार्टी की होती हैं वह एक क्षेत्रीय दल की नहीं होती। क्योंकि यदि मुद्दा क्षेत्रीय दल के अपने प्रदेश का होता हैं तो वह संबंधित दूसरे प्रदेश के हितो को स्वीेकार ना करना उसकी राजनैतिक मजबूरी होती हैं।इसलिये वर्तमान व्यवस्था में कुछ सुधार होना आज समय की मांग बन गयी है। जिससे राष्ट्रीय हितों पर क्षेत्रीय हित हावी ना हो सकें और देश तेजी से प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सके।     
भरपूर प्रतिनिधित्व मिला जिले है को-इन पैंसठ सालों के सियासी सफर में जिले ने भी बहुत से मुकाम देखे हैं। वैसे तो सियासी रूप से यह जिला आजादी के समय से ही अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं। आजादी की लड़ाई के कई महान सेनानी सिवनी की जेल में रहे हैं। महान क्रांतिकारी पीर पगारो, नेताजी सुभाष चंद बोस,रविशंकर शुक्ला, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र सहित कई नेता इसी जेल में रहे हैं। देश आजाद होने के पहले बनी अंतरिम सरकार में जिले के डी.के.मेहता मंत्री मंड़ल में शामिल किये गये थे। आजादी के बाद से तो देश में वैसे भी कांग्रेस का वर्चस्व रहा था उसी तरह जिले में भी कांग्रेस का बोल बाला था। जिले के राजनैतिक परिदृश्य में पहला परिवर्तन 1962 के विधानसभा चुनाव में आया जब राम राज्य परिषद ने जिले के तीनों सामान्य विधानसभा क्षेत्रों सिवनी,केवलारी और बरघाट में कांग्रेस केा हरा दिया था। लेकिन उसके बाद हुये 1967 के अगले विधानसभा चुनाव में ही कांग्रेस ने फिर पांचों सीटों को जीत लिया था और यह सिलसिला लगातार 1990 तक चला।  और तो और  1977 के पहले गैर कांग्रेसी दौर में जनता पार्टी की आंधीं  में भी जिले में पांचों विधानसभा सीटें जीत कर कांग्रेस ने संपूर्ण उत्तर भारत में एक कीर्तिमान कायम किया था। 1990 की रामलहर में 1962 की तरह तीनों सामान्य सीटें तो कांग्रेस हार गयी लेकिन दोनों आदिवासी सीटों पर उसका कब्जा बरकरार रहा। 1993 और 1998 के विस चुनाव में बरघाट और सिवनी से भाजपा और शेष तीन सीटों से कांग्रेस ने जीत हासिल की थी। लेकिन 2003 की उमा भारती की लहर में कांग्रेस के सिर्फ हरवंश सिंह ही जिले में अकेले जीते थे और पहली आर दोनो आदिवासी सीटों पर कांग्रेस को हारना पड़ा था। पिछले 2008 के चुनाव में भी केवलारी में कांग्रेस के हरवंश सिंह के अलावा शेष तीनों सीटों पर भाजपा ने जीत ली थीं। जिले के सांसद रहे पं. गार्गीशंकर मिश्रा और कु. विमला वर्मा ने केन्द्रीय मंत्री मंड़ल में प्रतिनिधित्व किया था। प्रदेश सरकार में तो जिले के एक से अधिक विधायक ही अधिकांश समय मंत्री मंड़ल में रहे हैं। पहले डी.के.मेहता और वसंतराव उइके,फिर वसंतराव उइके और कु. विमला वर्मा, फिर उर्मिला सिंेह और हरवंश सिंह मंत्री रहें हैं। सन 1993 से 1998 के दिग्गी सरकार के दौरान तो दो मंत्रियों के अलावा आदिवासी वर्ग के शोभाराम भलावी और गीता सिंह,अनुचूचित जाति के इंद्रेश गजभिये,पिछड़ा वर्ग के पुसऊलाल राहंगडाले और नेहा सिंह भी विभिन्न निगमों और आयोगों में मंत्री का दर्जा प्राप्त लाल बत्तीधारी नेता रहें हैं। आज भी जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक विधानसभा में उपाध्यक्ष हैं।
लोस और नपा में भी जीत रही है भाजपा-लोकसभा चुनावों में जिले के विधानसभा क्षेत्र छिंदवाड़ा और जबलपुर संसदीय क्षेत्र में शामिल थे। आजादी के बाद से 1975 तक कांग्रेस के ही सांसद रहें। पहले गैर कांग्रेसी सांसद के रूप में उप चुनाव में शरद यादव जीते थे जब जबलपुर क्षेत्र में जिले का लखनादौन विस क्षेत्र शामिल था। सन 1977 में सिवनी संसदीय क्षेत्र अस्तित्व में आया जिसके पहले सांसद स्व. निर्मलचंद्र जैन बने। फिर 80 से 90 तक स्व. गार्गीशंकर मिश्र रहे जिन्हें कमल चुनाव चिन्ह धारी भाजपा के बागी प्रहलाद पटेल ने हराया। फिर 91 और 98 में विमला वर्मा जीतीं। 1999 से लगातार भाजपा के रामनरेश त्रिपाठी और नीता पटेरिया चुनाव जीते। नये परिसीमन में जिले के सिवनी और बरघाट क्षेत्र बालाघाट में जहां से भाजपा के के.डी.देशमुख और केवलारी और लखनादौनक्षेत्र मंड़ला में शामिल हो गये जहां से कांग्रेस के बसोरीसिंह मसराम चुनाव जीते हैं। इसी तरह 1994 से लेकर आज तक कांग्रेस नगरपालिका सिवनी का चुनाव भी नहीं जीत पायी हैं और लगातार तीन चुनाव हार चुकी हैं। पिछले दो बार से भाजपा चुनाव जीत रही हैं। 
जिले को मंत्रीविहीन रखने का रिकार्ड शिवराज के नाम-आजादी के पहले बनी अंतरिम सरकार से लेकर अभी तक कभी ऐसा नहीं हुआ था कि सत्ता दल का विधायक जिले से चुना गया हो और मंत्री ना बना हो। 1977 में पहली बार जिला मंत्री विहीन रहा था क्योंकि जनता पार्टी का कोई भी विधायक जिले से नहीं जता पाया था। 1990 में बनने वाली भाजपा सरकार के पटवा मंत्री मंड़ल में पहले गैर कांग्रेसी मंत्री का रिकार्ड स्व. पं. महेश प्रसाद शुक्ला के नाम दर्ज है जो कि राज्य मंत्री बने थे। 2003 की उमा सरकार में पहले गैर कांग्रेसी केबिनेट मंत्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन बने थे जो कि बाबूलाल गौर के मंत्रीमंड़ल मेंभी शामिल थे। लेकिन जब पहली बार शिवराज सिंह चौहान मुख्य मंत्री बने तो भाजपा के तीन विधायकों डॉ. बिसेन, नरेश दिवाकर और शशि ठाकुर में से कोई भी मंत्री नहीं बन पाया। चौहान की दूसरी पारी में भी शिव की नगरी सिवनी मंत्री विहीन ही रह गयी जबकि नीता पटेरिया,शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले भाजपा के विधायक हैं। और तो और भाजपा ने चार सांसदों को विधान सभा का चुनाव लड़ाया था जिसमें नीता पटेरिया को छोड़ कर शेष सभी तीनों सांसद रहें नेता कबीना मंत्री हैं। आजादी के बाद के 65 सालों के सियासी सफर का एक सियाह मुकाम यह भी है। हालांकि शिवराज ने नरेश दिवाकर और डॉ. बिसेन को लाल बत्ती देकर कबीना मंत्री का दर्जा जरूर दिया हैं।
और अंत में-जिले के सियासी हालात आज ऐसे हैं कि कांग्रेस और भाजपा आलाकमान में जिले के किसी भी नेता की सीधी कोई एप्रोच नहीं हैं। इसका खामियाजा जिला भुगत रहा हैं। लोकसभा चली गयी, एक विधानसभा चली,बड़ी रेल लाइन आयी नहीं,पेंच परियोजना बनी नहीं  और फोरलेन का मामला भी अटका पड़ा हैं। ना जाने यह भुगतमान जिले को और कब तक भुगतना पड़ेगा? “मुसाफिर“    


परिवर्तनों के लिये राजनैतिक विकल्प मिलने वाले देश की संसद को सड़क से संचालित करने की नाकाम कोशश हुयी 
आज पूरा देश स्वतंत्रता दिवस की 65 वीं वर्षगांठ मना रहा हैं। एक प्रजातांत्रिक देश होने के नाते इन 65 सालों की राजनैतिक यात्रा के दौरान कई परिवर्तन और पड़ाव देखें हैं। देश में पहला राजनैतिक परिवर्तन जयप्रकाश जी की संपूर्ण क्रांति के बाद हुआ और जनता पार्टी की दो तिहायी बहुमत वाली सरकार ने देश की सत्ता संभाली लेकिन इंदिरा हटाओ के मुद्दे पर एक हुये विभिन्न विचारधाराओं वाले राजनैतिक दल ढ़ाई साल में ही तितर बितर हो गये और इंदिरा गांधी की वापसी हो गयी। फिर वी.पी.सिंह के द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाये गये  आंदोलन और राम मंदिर के मुद्दे पर देश में दूसरी बार राजनैतिक पविर्तन हुआ और कांग्रेस के 415  सांसदों के ऐतिहासिक बहुमत वाली राजीव गांधी की सरकार धराशायी हो गयी। वी.पी.सिंह के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में विचारधारा में एक दूसरे के धुर विरोधी वाम दल और भाजपा सरकार में शामिल थे। लेकिन इसका भी वही हश्र हुआ और 1991 में राजीव गांधी की चुनाव के दौरान हुयी हत्या के बाद केन्द्र में कांग्रेस के स्व. पी.वी.नरसिंहा राव के नेतृत्व में सरकार बनी। 1996 और 1998 के खंड़ित जनादेश के कारण अस्थिरता का वातावरण रहा और 1999 में भाजपा के नेतृत्व वाले राजग गठबंधन की अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी और देश में गठबंधन की राजनीति की शुरुआत हुयी। सन 2004 और 2009 में कांग्रेस के नेतृत्व में यू.पी.ए. की सरकार डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवायी मे चल रही हैं। यू.पी.ए. के दूसरे कार्यकाल में देश में उजागर हुये लगातार घोटालों और केन्द्रीय मंत्री सहित बड़े बड़े नेताओं और अधिकारियों की जेल यात्राओं के बाद देश में एक बार फिर भ्रष्टाचार और विदेशों में जमा कालेधन को लेकर आंदोलन जारी है। समाजसेवी अन्ना हजारे और योग गुरू बाबा रामदेव के नेतृत्व में हो रहे इन आंदोलनों में निर्वाचित सदन के भ्रष्ट और आपाधिक स्वरूप को भी मुद्दा बनाया गया हैं। लेकन यहां एक विचारणीय प्रश्न यह भी है कि यदि ऐसा है तो क्या इसके लिये सिर्फ सदन में बैठे सदस्य ही जवाबदार हैं? मेरे विचार से नहीं। पहले तो वे राजनैतिक दल दोषी हैं जो ऐसे नेताओं को प्रत्याशी बनाते हैं और अंततः हम मतदाता जो कि ऐसे उम्मीदवारों को अपना वोट देकर उन्हें सदन का सदस्य चुन लेते हैं। अपराधियों के खौफ और धन की चकाचौंध हमें प्रभावित करती रहेगी तो बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगा। यदि ऐसे नेताओं को नकारा नहीं गया तो वही सब कुछ चलता रहेगा जो चल रहा हैं। सिर्फ चलाने वाले बदल सकतें है। इन आंदोलनों में बिना राजनैतिक विकल्प दिये निर्वाचित सदन को सड़क से संचालित करने की नाकाम कोशिश भी गयी। टीम अन्ना ने तो पार्टी बनाने की घोषणा के साथ अपना अनशन खत्म कर दिया है और बाबा रामदेव के मंच पर राजग नेताओं की उपस्थिति में राजनीति का दौर भी खूब चला। आने वाले साल में सरकार,विपक्ष और आंदोलन चलाने वाले अन्ना और बाबा भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के सपने को साकार करने की दिशा में कारगर कदम उठायें, यही स्वतंत्रता दिवस पर हमारी शुभकामनायें हैं।  

14.8.12

राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा के नेतृत्व में घोषित रूप से लड़े जाने पर अभी असमंजस बना हुआ है। भाजपा का संघनिष्ठ धड़ा हालांकि भाजपा की सरकार बनने पर श्रीमती वसुंधरा को ही मुख्यमंत्री बनाने पर सहमत है, मगर उन्हें पहले से मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट न करने पर जोर डाल रहा है। इस संबंध में उसका तर्क ये है कि जिस प्रकार गुजरात में मुख्यमंत्री नरेद्र मोदी के कहीं न कहीं पार्टी लाइन से ऊपर होने के कारण वहां हालात दिन ब दिन खराब होते जा रहे हैं, ठीक उसी प्रकार की स्थिति राजस्थान में भी होती जा रही है। ऐसे में बेहतर ये होगा कि उन्हें पहले से मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित न किया जाए, बाद में भले ही भाजपा को बहुमत मिलने पर उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया जाए।
इसी के साथ एक महत्वपूर्ण जानकारी ये भी है कि संघ का धड़ा वसुंधरा को फ्रीहैंड दिए जाने के पक्ष में भी नहीं है। उसका कहना है कि ऐसा करने पर वे अपने समानांतर धड़े को निपटाने की कोशिश कर सकती हैं, जैसा कि वे पहले भी कर चुकी हैं। कई पुराने नेता हाशिये पर धकेल दिए गए। और यदि ऐसा हुआ तो चुनाव में पार्टी को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। असल में उनका इशारा इस संभावना की ओर है, जिसके तहत यह माना जा रहा है कि चुनाव से पहले वसुंधरा राजे को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का जिम्मा सौंपा जा सकता है। संघ का यह धड़ा मौजूदा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी को हटाए जाने के पक्ष में भी नहीं है। चतुर्वेदी को हटाए जाने को वह अपनी हार के रूप में देख रहा है।
वस्तुत: श्रीमती राजे को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए दबाव बनाने वालों का कहना है कि अगर पार्टी को चुनाव में जीत हासिल करनी है तो वसुंधरा को टिकट वितरण अपने हिसाब से करने की छूट देनी होगी। इसके पीछे उनका तर्क ये है कि यदि प्रदेश अध्यक्ष कोई और होता है तो वह टिकट वितरण के समय रोड़ा अटका सकता है, जिसकी वजह से गलत प्रत्याशियों को टिकट मिल जाने की आशंका रहेगी। अपनी इस बात पर जोर डालने के लिए वे पिछले चुनाव का जिक्र करते हैं कि तब प्रदेश अध्यक्ष ओम माथुर के कुछ टिकटों के लिए अड़ जाने के कारण ऐसे प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारने पड़े, जो कि हार गए और भाजपा जीती हुई बाजी हार गई। हालांकि वे इस बात पर सहमत हैं कि संघ लॉबी को भी पूरी तवज्जो दी जानी चाहिए और उनके सुझाये हुए प्रत्याशियों को भी टिकट दिए जाएं, मगर कमान केवल वसुंधरा के हाथ में दी जाए। वसुंधरा खेमा इस बात पर भी नजर रखे हुए है कि कहीं संघ लॉबी कुछ ज्यादा हावी न हो जाए। अगर ऐसा होता है तो वे पहले की ही तरह फिर से इस्तीफा हस्ताक्षर अभियान जैसी किसी मुहिम की रणनीति अपना सकते हैं।
समझा जाता है कि फिलहाल पार्टी हाई कमान इस बात को लेकर असमंजस में है कि वसुंधरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए अथवा नहीं। इस बात की संभावना भी तलाशी जा रही है कि वसुंधरा विरोधी लॉबी को संतुष्ट करने के लिए किसी ऐसे नेता को प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व सौंपा जाए, जो कि संघ और वसुंधरा दोनों को स्वीकार्य हो। इस सिलसिले में पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया का नाम सामने आ रहा है। हालांकि पिछले दिनों कटारिया की प्रस्तावित मेवाड़ यात्रा को लेकर जो बवाल हुआ, उससे ऐसा प्रतीत हुआ कि वे वसुंधरा को चुनाती देने जा रहे हैं और दोनों के बीच संबंध काफी कटु हो चुके हैं, जबकि वस्तुस्थिति ये है कि वह विवाद केवल मेवाड़ अंचल में व्याप्त धड़ेबाजी की वजह से उत्पन्न हुआ। वहां वर्चस्व को लेकर कटारिया व किरण में जबरस्त खींचतान है और उसी वजह से इतना बड़ा नाटक हो गया। उस झगड़े की जड़ किरण माहेश्वरी थीं। अर्थात वसुंधरा व कटारिया के संबंध उतने कटु नहीं हैं, जितने कि समझे जा रहे हैं। कटारिया के अतिरिक्त पूर्व अध्यक्ष ओम माथुर का नाम भी सामने आ रहा है।
कुल मिला कर ताजा स्थिति ये है कि हाईकमान इस मुद्दे पर और विचार कर लेना चाहता है। विशेष रूप से दिसंबर में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का कार्यकाल बढ़ाए जाने अथवा स्थितियां बदलने की संभावना के बीच राजस्थान के मसले को एक तरफ ही रखने के पक्ष में है। वैसे उसका एक मात्र मकसद राजस्थान पर फिर काबिज होना है। इसके लिए वह दोनों धड़ों के बीच तालमेल बनाए रखने पर ही पूरी ताकत लगाएगा। वजह ये है  कि एक ओर जहां वसुंधरा खेमा ताकतवर होने के कारण आक्रामक है, वहीं संघ के हार्डकोर नेताओं की मंशा ये है कि इस बार येन केन प्रकारेण वसुंधरा को राजस्थान से रुखसत कर दिया जाए। यह स्थिति पार्टी के लिए बेहद घातक साबित हो सकती है। लब्बोलुआब राजस्थान भाजपा का मसला बेहद नाजुक है और उसे बड़ी सावधानी से निपटाए जाने की कोशिश की जा रही है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?-ब्रज की दुनिया

सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?
भूल गई अपने आपको राहुल-प्रियंका के बाप को?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?


आपके राजीव ने किया था 1985 में
असम के लोगों से समझौता;
बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का
किया था वादा;
वोट बैंक तो याद रहा पर असम समझौता
याद नहीं रहा आपको?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?
भूल गई अपने आपको राहुल-प्रियंका के बाप को?

मुम्बई में आगजनी बरेली में दंगा;
हत्याएं कर रहा नक्सली लफंगा;
आसमान छू रही महंगाई है,
अर्थव्यवस्था धराशायी है;
समर्थकों की सहायक और
विरोधियों की शत्रु सी.बी.आई. है;
राज करना तो याद रहा पर
राजधर्म याद नहीं रहा आपको?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?
भूल गई अपने आपको राहुल-प्रियंका के बाप को?

राष्ट्रमंडल,2-जी,कोयला और
अंतरिक्ष घोटाला,
फिर भी लगा रहा आपकी
जुबान पर ताला;
क्या है रहस्य इसमें
क्या है गड़बड़झाला?
क्वात्रोची है क्या सचमुच
राजीव गाँधी का साला?
सच को हमसे छिपा लीजिए भले ही
ऊपरवाले से कैसे छिपाएंगी पाप को?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?
भूल गई अपने आपको राहुल-प्रियंका के बाप को?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?

सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?-ब्रज की दुनिया

सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?
भूल गई अपने आपको राहुल-प्रियंका के बाप को?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?


आपके राजीव ने किया था 1985 में
असम के लोगों से समझौता;
बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का
किया था वादा;
वोट बैंक तो याद रहा पर असम समझौता
याद नहीं रहा आपको?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?
भूल गई अपने आपको राहुल-प्रियंका के बाप को?

मुम्बई में आगजनी बरेली में दंगा;
हत्याएं कर रहा नक्सली लफंगा;
आसमान छू रही महंगाई है,
अर्थव्यवस्था धराशायी है;
समर्थकों की सहायक और
विरोधियों की शत्रु सी.बी.आई. है;
राज करना तो याद रहा पर
राजधर्म याद नहीं रहा आपको?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?
भूल गई अपने आपको राहुल-प्रियंका के बाप को?

राष्ट्रमंडल,2-जी,कोयला और
अंतरिक्ष घोटाला,
फिर भी लगा रहा आपकी
जुबान पर ताला;
क्या है रहस्य इसमें
क्या है गड़बड़झाला?
क्वात्रोची है क्या सचमुच
राजीव गाँधी का साला?
सच को हमसे छिपा लीजिए भले ही
ऊपरवाले से कैसे छिपाएंगी पाप को?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?
भूल गई अपने आपको राहुल-प्रियंका के बाप को?
सोनियाजी सोनियाजी क्या हुआ आपको?


बाबा रामदेव  जी का आन्दोलन आने वाले समय में भारत के प्रमुख आन्दोलनों में एक होगा 


बाबा रामदेव  जी का आन्दोलन आने वाले समय में भारत के प्रमुख आन्दोलनों में एक होगा 

अच्छा नहीं लगता । (गीत)



(GOOGLE IMAGES)


अच्छा  नहीं  लगता । (गीत)


http://mktvfilms.blogspot.in/2012/08/blog-post_14.html

बार-बार   यूँ    रूठना    तेरा,  अच्छा   नहीं   लगता ।


बेवजह  का  ये  गुस्सा  तेरा,  सच्चा   नहीं   लगता ।



अंतरा-१.


धुआँ - धुआँ   सा  हो  रहा  है,  जलता   हुआ  ये  दिल ।


फिर  तेज़  आँच  पर  दर्दे-दिल ? अच्छा  नहीं  लगता ।


बार-बार    यूँ    रूठना    तेरा,  अच्छा   नहीं   लगता ।


अंतरा-२.


चराग़ों  से  जब   पूछा   कि,  मेरा   गुनाह   तो   बता ?


तब  रौशनी  चुराती  तेरी  आह ? अच्छा  नहीं  लगता ।


बार - बार   यूँ    रूठना    तेरा,  अच्छा   नहीं   लगता ।


अंतरा-३.


पता    है    तुझे,  मर  रहा   हूँ  मैं,  इंतज़ार  में   तेरे ।


वस्ल   की   रात  हो   बेज़ार ? अच्छा  नहीं  लगता ।


बार-बार   यूँ    रूठना    तेरा,  अच्छा  नहीं  लगता ।


(वस्ल=मिलन; बेज़ार=उचाट)


अंतरा-४.


माना  कि   इश्क   कभी-कभी  इम्तिहान  लेता   है ।


पर  मासूम को  सज़ा -ए- मौत ? अच्छा नहीं लगता ।


बार-बार   यूँ    रूठना    तेरा,  अच्छा   नहीं   लगता ।


मार्कण्ड दवे । दिनांकः१४-०८-२०१२.

आधी अधूरी आजादी में जी रहे हैं हम

इस बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस की एक और वर्षगांठ मना रहे हैं। जाहिर सी बात है कि हर बार की तरह यह वर्षगांठ भी महज एक रस्म अदायगी मात्र ही है। हम सिर्फ यह कह-सुन कर आपस में खुश हो लेते हैं कि हम आजाद हैं, लेकिन सच में हम कितना आजाद हैं, यह तो हमारा दिल ही जानता है। यही वजह है कि आजादी का आंदोलन देख चुकी हमारी बुजुर्ग पीढ़ी बड़े सहज भाव में कहती सुनाई देती है कि इससे तो अंग्रेजों का राज अच्छा था।  वस्तुत: हमारी आजादी आधी अधूरी ही है। इसकी वजह ये है कि हम 15 अगस्त 1947 को अग्रेजों की दासता से तो मुक्त हो गए, मगर जैसी शासन व्यवस्था है, उसमें अब हम अपनों की ही दासता में जीने को विवश हैं। सबसे बड़ी समस्या है आतंकवाद और सांप्रदायिक विद्वेष की। इसके चलते देश के अनेक इलाकों में आजाद होने के बावजूद व्यक्ति को अगर अपने ही घर में संगीनों के साए में रहना पड़े, तो यह कैसी आजादी। लचर कानून व्यवस्था और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण संगठित अपराध इतना बढ़ गया है कि हम निर्भीक होकर सड़क पर चल नहीं सकते। हमारी बहन-बेटियों को अपने ही मोहल्लों में अपनी अस्मिता का भय बना रहता है। हम अपने ही देश में न्याय के लिये भटकते रहते हैं। शासन और प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने के लिये यदि हमें फिल्म शोले के वीरू की तरह टंकी या टॉवर पर चढना पड़े या आत्मदाह की कोशिश करनी पड़े तो उसे आजादी कैसे कहा जा सकता है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या हमारे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी आजादी के लिये अपना बलिदान दिया था? क्या महात्मा गांधी ने ऐसी ही आजादी के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था? क्या हम सिर्फ फिरंगियों की सत्ता से घृणा करते थे? फिरंगियों की सत्ता से हमने भले ही मुक्ति पा ली, लेकिन फिरंगी मानसिकता से आज हम 62 साल बाद भी मुक्त नहीं हो सके हैं। जो काम फिरंगी करते थे, उससे भी कहींं आगे हमारा राजनीतिक तंत्र कर रहा है।  'फूट डालो, राज करोÓ की जगह 'फूट डालो और वोट पाओÓ की नीति चल रही है। राजनीतिक हित साधने के लिए सत्ताधीशों को दंगा-फसाद कराने से भी गुरेज नहीं है। सत्ता को भ्रष्टाचार की ऐसी दीमक लग चुकी है की पूरा देश इससे कराह रहा है।  संविधान में जिस स्वतंत्रता और समानता की बात की जाती है, वह स्वतंत्रता और समानता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। पहले हम फिंरगियों के जुल्म सहते थे, अब अपनों के जुल्म सह रहे हैं। पहले भी सत्ता के खिलाफ बोलने पर आवाज बंद करने की कोशिश की जाती थी, आज भी ऐसा चल रहा है। पहले आजादी के संघर्ष में जान जाती थी, आज तो पता नहीं, कब चली जाए। पहले अंग्रेज देश को लूट रहे थे, आज वही काम नेता कर रहे हैं। पहले भी सत्ता की ओर से तुगलकी फरमान जारी होते थे, आज भी ऐसे फरमान जारी हो रहे हैं। आजादी के लिए बलिदान देने वालों को देश भुला चुका है। आज ऐसे सत्ताधीशों की पूजा हो रही है, जिनका न कोई चरित्र है, न जिनमें नैतिकता है और न ईमानदारी। पहले भी लोग भूख से मरते थे, आज भी मर रहे हैं। सत्ता से चिपके रहने वाले लोग फिंरगी  शासन में भी ऐश कर रहे थे, आज भी सत्ता से चिपके रहने वाले ही सारे सुख भोग रहे हैं। आखिर यह कैसी आजादी है? क्या आम आदमी को भय और भूख से मुक्ति मिली है?  क्या आम आदमी को उसके जीवन की गांरंटी दी जा सकी है? क्या नारी की अस्मिता सुरक्षित है? क्या व्यक्ति अपनी बात निर्भीकता से रखने के लिए स्वतंत्र है? जाहिर है, इनके जवाब ना में ही होंगे। और जब ऐसा है, तब फिर इस आजादी के आम आदमी के लिए क्या मायने?  दरअसल, अब हम एक  ऐसी परंतत्रता में जी रहे हैं, जिसके खिलाफ अब दोबारा संघर्ष की जरूरत है। हमें अगर पूरी आजादी चाहिए, तो हमें एक और स्वाधीनता संग्राम के लिये तैयार हो जाना चाहिये। यह स्वाधीनता संग्राम जमाखोरों, कालाबाजारियों के खिलाफ होना चाहिए। यह संग्राम भ्रष्टाचारियों से लड़ा जाना चाहिए। यह संग्राम चोर, उचक्कों, लुटेरों और ठगों के खिलाफ छेड़ा जाना चाहिये। यह संग्राम देश को खोखला कर रहे सत्ता व स्वार्थलोलुप नेताओ के विरुद्ध लड़ा जाना चाहिए। यह संग्र्र्राम उन लोगों के खिलाफ किया जाना चाहिये, जो गरीबों, दलितों, मजलूमों और नारी का शोषण कर फल-फूल रहे हैं। अगर हम ऐसे लोगों को परास्त कर सके, अगर हम ऐसे लोगों से देश को मुक्त करा सके , तब हम कह सकेंगे कि हम वास्तविक रूप से आजाद हो चुके हैं। हालांकि हाल ही समाजसेवी अन्ना हजारे और योग गुरू बाबा रामदेव ने भ्रष्ट तंत्र व काले धन के खिलाफ पूरे देश को जगाने का काम किया है, मगर यह ताकतवर भ्रष्ट ताकतों के कारण यह आंदोलन सिरे चढ़ता नजर नहीं आ रहा। लोगों के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष तो है, मगर व्यवस्था परिवर्तन के लिए कोई तैयार नहीं है। हर भारतीय की इच्छा है कि आजादी केवल किताबों और शब्दों में ही नहीं, बल्कि धरातल पर भी दिखनी चाहिये। हमें गंाधी के सपनों का भारत चाहिये। हमें देश के महान क्रांतिकारियों के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देना है। विडंबना यह है कि हम आजादी के पर्व पर इन तथ्यों पर जरा भी चिंतन नहीं करते। हम सिर्फ इस दिन रस्म अदायगी करते हैं। सुबह झंडा फहरा कर और बड़े-बड़े भाषण देकर हम अपने कत्र्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और दूसरे ही दिन पुराने ढर्ऱे वाली आपाधापी में व्यस्त हो जाते हैं।
 -तेजवानी गिरधर

शहीद की वेदना


शहीद की वेदना 

अमर जवान ज्योति से,
निकली थी एक सिसकी .
मेने पूछा  -
शहीद,
तुम-
वीर थे,बहादुर थे. 
वतन पर मर मिटे थे. 
तुम्हारी वीर गाथा से, 
इतिहास भरा पड़ा है. 
तुम- 
हँसते-हँसते, 
चढ़ गए थे सूली पर. 
गोरों की गोलियों को, 
लेते थे सीधा छाती पर.
मगर- 
आज तुम मायूस क्यों?
आज तुम सुबकते क्यों?
शहीद बोला-
गैरो ने ढाया सीतम, 
तब इन्कलाब कह गये. 
देखा -
अपनों का अपनों पर सीतम ,
हाय!अब आंसू सिसकी रह गये !!