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6.9.12

सेब – नई अभिदृष्टि APPLE – New Wisdom

सेब – नई अभिदृष्टि    APPLE – New Wisdom
पूरा विश्व तो सेब को “किंग ऑफ फ्रूट्स” मानता है। सेब सर्वव्याप्त, स्वास्थ्यप्रद और स्वादिष्ट फल है। यह रोज़ (Rosaceae) परिवार का सदस्य है। इस परिवार के अन्य फल आढू, खुबानी, चेरी, नाशपाती, स्ट्रॉबेरी, रसबेरी, आलूबुखारा, बादाम आदि हैं। इसका वानस्पतिक नाम मेलस डोमेस्टिका (Malus domestica) है। यह हरे, पीले या लाल रंग का होता है। अन्दर का रसीला गूदा सफेद होता है। स्वाद में यह हल्का मीठा, तीखा और थोड़ा खट्टा होता है। सेब प्रायः कच्चा या ज्यूस बना कर लिया जाता है। इससे फ्रूट सलाद, सनडे, सॉस, जेली, साइडर, एप्पल साइडर विनेगार आदि बनाये जाते हैं। इसे कई व्यंजन जैसे एप्पल पाई, केक, कुकीज़, ब्रेड स्टफिंग आदि में भी प्रयोग किया जाता है। याद रखें कटे हुए सेब पर नींबू का रस लगाकर रखें, सेब काला नहीं पड़ेगा। इसके बीज कड़वे होते हैं और खाये नहीं जाते हैं।
सेब का पेड़ 3-12 मीटर लम्बा होता है। इसकी पत्तियां दिखने में साधारण, अंडाकार, 5-12 से.मी. लम्बी और 3-6 से.मी. चौड़ी होती हैं। इसके फूल बसन्त ऋतु में खिलते हैं। इसका फूल सुन्दर होता है और उसमें हल्की गुलाबी सफेद पांच पंखुड़ियों होती हैं।
आदम और ईव की कहानी ने सेब को ज्ञान, अमरत्व, लालच, पाप या मनुष्य के पतन का प्रतीक बना दिया है। लेटिन भाषा में एप्पल (apple) और इविल (evil) दोनों का मतलब एक  (mālum "an apple", mālum "an evil, a misfortune") ही होता  है। शायद इसीलिए कई पौराणिक कथाओं में इसे वर्जित फल (Forbidden Fruit) कहा जाता है। सेब को स्वास्थ्य, सेक्स, कामुकता का भी प्रतीक माना गया है।
इसकी उत्पत्ति केप्सियन सी और ब्लेक सी के बीच घने उपवन में हुई है। आज यह स्थान कज़ाखस्थान में आता है, लेकिन अब  सेब की पैदावार पूरे विश्व में होती है। विश्व में सेब की 7500 प्रजातियां  पाई जाती है। रेड डेलीशियस, गोल्डन डेलीशियस, ग्रेनी स्मिथ, मेकिंटोश, ज़ोनाथन, गाला और फ्यूजी आदि इसकी प्रमुख किस्में हैं। चीन, अमेरिका, तुर्की, पॉलेन्ड और इटली इसके प्रमुख उत्पादक देश हैं।
भारत में सेब का इतिहास
भले आज पूरा विश्व कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के सेबो का दीवाना हो, लेकिन भारत में सेब का इतिहास सिर्फ 100 वर्ष पुराना है। भारत में सेब को लाने का श्रेय सेमुअल इवान स्टोक्स नाम के अमेरिकन को जाता है। वे 26 फरवरी, 1904 को कुष्ठ रोगियों की देखभाल करने के मकसद से भारत आये थे। भारत का गरम मौसम सैमुअल को रास नहीं आया इसलिए उन्हें 1912 में शिमला भेज दिया गया। इन्हें शिमला की खूबसूरत वादियों से प्यार हो गया और यहीं बस गये। इन्हीं वादियों में एक कस्बे कोटगढ़ की सुन्दर पहाड़ी बाला एग्नस ने इनका दिल चुरा लिया। फिर क्या था इनका प्यार परवान चढ़ा और सितंबर, 1912 में दोनों ने विवाह रचा लिया। पता ही नहीं चला कि एक अमेरिकन युवा देखते देखते कब हिन्दुस्तानी बन गया। सेमुअल ने भारत को आजादी दिलाने के भी अंग्रेजो से कई पंगे लिए जिसके लिए अंग्रेजों ने इन्हें लाहौर जेल में भी बंद किया था। सन् 1916 में स्थानीय लोगों रोजगार दिलाने के मकसद से इन्होंने अमेरिका से सेब के पौधे लाकर अपने बरोबाग में लगाये। 1932 में ये आर्य समाजी बन गये थे और अपना नाम सत्यानंद स्टोक्स रख लिया था। 1937 में इन्होंने एक मन्दिर भी बनवाया था।
पोषक तत्वों का जमघट
सेब में कैलोरी कम होती है। इसमें सोडियम, संत्रप्त वसा (Saturated Fats), या कॉलेस्टेरोल नहीं होता है, लेकिन जन-घुलनशील फाइबर होता है। सेब में विटामिन-सी और बीटाकेरोटीन पर्याप्त मात्रा में होता है। इसमें फ्लेवोनॉयड और पॉलीफेनोल्स प्रजाति के अनेक एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। इसकी एंटीऑक्सीडेंट क्षमता (ORAC value) 5900 टी.ई. होती है। सेब में पाये जाने वाले प्रमुख फ्लेवोनॉयड्स क्युअरसेटिन, एपिकेटेचिन, प्रोसायनिडिन बी-12 हैं। इसमें बी-कॉम्प्लेक्स विटामिन जैसे राइबोफ्लेविन, थायमिन, पाइरिडोक्सीन प्रचुर मात्रा में होते हैं। पोटेशियम, फोस्फोरस और कैल्शियम खनिज तत्वों में प्रमुख हैं। 
हालांकि सेब में फाइबर की मात्रा बहुत अधिक नहीं होती है। 100 ग्राम सेब में 2-3 ग्राम ही फाइबर होता है, जिसमें 50% पेक्टिन होता है। लेकिन यह फाइबर सेब के अन्य पोषक तत्व के साथ मिल कर रक्त में फैट्स और कॉलेस्टेरोल की क्षमता को कई गुना बढ़ा देता है। सेब की रक्त के फैट्स को कम करने की क्षमता फाइबर से भरपूर कई अन्य खाद्य पदार्थों से भी अधिक होती है। लेकिन हृदय रोग में पूरा फायदा लेने के लिए आपको सिर्फ पेक्टिन लेने से काम नहीं चलेगा, बल्कि आपको पूरा सेब खाना पड़ेगा।

Apple (Malus domestica)  Fresh  
Nutritive value per 100 gm
Energy
50 Kcal
2.5%
Carbohydrates
13.81 g
11%
Protein
0.26 g
0.5%
Total Fat
0.17 g
0.5%
Cholesterol
0 mg
0%
Dietary Fiber
2.40 g
6%
Vitamins
Folates
3 µg
1%
Niacin
0.091 mg
1%
Pantothenic acid
0.061 mg
1%
Pyridoxine
0.041 mg
3%
Riboflavin
0.026 mg
2%
Thiamin
0.017 mg
1%
Vitamin A
54 IU
2%
Vitamin C
4.6 mg
8%
Vitamin E
0.18 mg
1%
Vitamin K
2.2 µg
2%
Potassium
107 mg
2%
Minerals
Calcium
6 mg
0.6%
Iron
0.12 mg
1%
Magnesium
5 mg
1%
Phosphorus
11 mg
2%
Zinc
0.04 mg
0%
Phyto-nutrients
Carotene-ß
27 µg
--
Crypto-xanthin-ß
11 µg
--
Lutein-zeaxanthin
29 µg
--

सेब के चमत्कारी गुण (Wonders of Apple)  
पॉवरफुल पॉलीफेनॉल्स
पिछले वर्षों में सबसे अधिक शोध पॉलीफेनोल्स पर हुई है। सेब में इन पॉलीफेनोल्स का अनूठा सन्तुलित देखने को मिलता है, कि शायद इसीलिए सेब खाने वाले लोगों से रोग भी डरते है। सेब में क्युअरसेटिन नाम का फ्लेवोनॉल प्रमुख फाइटोन्युट्रियेन्ट है, जो गूदे से ज्यादा इसके छ्लके में होता है। इसके साथ केम्फेरोल और माइरिसेटिन भी महत्वपूर्ण हैं। क्लोरोजेनिक एसिड सेब का प्रमुख फिनोलिक एसिड है, जो गूदे और छ्लके में समान रूप से पाया जाता है। सेब की लाल रंगत का राज़ हमेशा एंथोसायनिन होता है, जो अधिकतर छ्लके में ही सिमित रहता है। यदि सेब पूरा लाल है या लाल रंग बहुत गहरा है, तो उसमें एंथोसायनिन बहुत अधिक होता है। सेब में एपिकेटेचिन प्रमुख केटेचिन पॉलीफेनोल्स होता है। सेब के बीज में मुख्य पॉलीफेनोल्स फ्लोरिड्जिन ( 98% ) होता है। सेब के गूदे में कुल पॉलीफेनोल्स 1-7 ग्राम प्रति किलो हिसाब से होते हैं। विदित रहे कि सेब के छिलके में प्रकाश संश्लेषण क्रिया करने वाली कोशिकाएं सूर्य की  UV-B किरणों के प्रति बहुत संवेदनशील होती है और छिलके में विद्यमान अधिकांश पॉलीफेनोल्स UV-B किरणों को सोख लेती हैं। इस तरह पॉलीफेनोल्स सेब के लिए प्राकृतिक सनस्क्रीन की तरह काम करते हैं।
आपने देखा होगा कि सेब के टूटने या कटने से उसका गूदा भूरा होने लगता है और खराब हो जाता है। शोधकर्ता इसका कारण पॉलीफेनोल ऑक्सीडेज एंजाइम (PPOs) को मानते हैं, जो सेब के टूटने या फटने पर पॉलीफेनोल्स का ऑक्सीडाइज करने लगते हैं। या यूँ समझ लीजिये कि सेब में जंग लगने लगता है, जिसके फलस्वरूप गूदा भूरा और काला पड़ने लगता है। भूरा और खराब होने पर सेब इथाइलीन गैस भी छोड़ने लगता है, जो दूसरे सेबों को भी खराब करता है। आपने कहावत सुनी होगी कि एक सड़ा हुआ सेब पूरी डलिया के सेब खराब कर देता है।  इसलिए सेब की पेकिंग और परिवहन में बहुत एहतिहात रखनी पड़ती है। और आजकल सेबों पर वेक्स पॉलिशिंग भी इसीलिए की जाती है।  
ऑसम एंटीऑक्सीडेंट  
सेब के अधिकांश पॉलीफेनोल्स शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट माने गये हैं। ये खासतौर पर कोशिका-भित्ति के फैट्स को ऑक्सीडाइज (called Lipid Peroxidation)  होने से बचाते हैं। यह गुण हृदय और रक्त-परिवहन संस्थान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि रक्त-वाहिकाओं की आंतरिक सतह की कोशिकाओं में फैट्स के ऑक्सीडाइज होने से वाहिकाओं के बंद होने (Atherosclerosis) और अन्य विकारों का जोखिम रहता है। और ये पॉलीफेनोल्स फैट्स को  ऑक्सीडाइज होने से बचाते हैं और सेब को हृदय हितैषी का दर्जा दिलाते हैं।
सेब के शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट अस्थमा और फेफड़े के कैसर का खतरा भी कम करते हैं। पॉलीफेनोल्स के साथ सेब में 8 मिलीग्राम विटामिन-सी भी होता है। यह मात्रा बहुत सामान्य है, लेकिन फिर भी बहुत खास है क्योंकि विटामिन-सी के पुनर्चक्रण (Recycling) के लिए फ्लेवोनॉयड्स बहुत जरूरी होते हैं। और सेब में ये फ्लेवोनॉयड्स भरपूर होते हैं।
डायबिटीज डेमेजर  
पिछले कुछ वर्षों में हुई शोध के अनुसार डायबिटीज के नियंत्रण में सेब का महत्व अचानक बढ़ गया है। सेब में पॉलीफेनोल्स कई स्तर पर शर्करा के पाचन और अवशोषण को प्रभावित करते हैं और रक्त में ग्लूकोज के स्तर को बखूबी नियंत्रित रखने की कौशिश करते हैं। ये जादुई पॉलीफेनोल्स इस तरह कार्य करते हैं।
·       ये शर्करा के पाचन में गतिरोध पैदा करते हैं। सेब में विद्यमान क्युअरसेटिन और अन्य फ्लोवोनॉयड शर्करा को पचाने वाले एंजाइम्स अल्फा-अमाइलेज और अल्फा-ग्लूकोसाइडेज को बाधित करते हैं। ये एंजाइम्स जटिल शर्करा का विघटन करके सरल कार्ब ग्लूकोज में परिवर्तित करते हैं। जब ये एंजाइम्स बाधित होते हैं, तो स्वाभाविक है कि रक्त में ग्लूकोज का स्तर नहीं बढ़ेगा।
·       पॉलीफेनोल्स आंत में ग्लूकोज का अवशोषण की गति को कम करते हैं, जिससे रक्त में ग्लूकोज कम जाती है।
·       ये पेनक्रियास के बीटा सेल्स को इंसुलिन बनाने के लिए प्रेरित करते हैं, और इंसुलिन के रिसेप्टर्स को उत्साहित करते हैं ताकि इंसुलिन ग्लूकोज को कोशिका में ज्वलन और ऊर्जा बनाने के लिए भेजता है। रक्त-प्रवाह से ग्लूकोज को कोशिका में भेजने के लिए कोशिका  के इन्सुलिन रिसेप्टर्स का इन्सुलिन के चिपकना और कोशिका के मधु-द्वार को खोलना जरूरी होता है। आप यूँ समझें कि इन्सुलिन हार्मोन मधु-द्वार को खोलने की कुंजी का कार्य करता है। इस तरह सेब में विद्यमान पॉलीफेनोल्स रक्तशर्करा के नियंत्रण में मदद करते हैं।
हार्ट हीलर
सेब में जल-घुलनशील पेक्टिन और पॉलीफेनोल्स का अनूठा मिश्रण इसे हृदय के लिए हितकारी बनाता है। नियमित सेब का सेवन करने से कॉलेस्टेरोल और बुरा एल.डी.एल. कॉलेस्टेरोल कम होने लगता है। रक्त और रक्त-वाहिका की आंतरिक सतह की कोशिका-भित्ति में फैट्स का ऑक्सीडेशन (called Lipid Peroxidation) कम होना  कई हृदय रोगों से बचाव की मुख्य कड़ी है।
सेब में विद्यमान क्युअरसेटिन के प्रबल प्रदाहरोधी (Anti-inflammatory) गुण भी हृदय रोग से बचाव में खास स्थान रखते हैं। इसीलिए नियमित सेब खाने से शरीर में सी.आर.पी. (जो शरीर में इन्फ्लेमेशन का एक मार्कर है) कम होता है और हृदय रोग  का जोखिम कम करता है। इस सर्वव्याप्त और स्वादिष्ट फल में प्रकृति ने हमें कितने हृदय-हितैषी पोषक तत्व एक साथ दिये हैं।  पोषक तत्वों का ऐसा विशिष्ट संगम बहुत कम देखने को मिलता है। शायद इसीलिए हमारे बुद्धिमान पूर्वज कहते आये हैं कि रोज एक सेब खाने से आप चिकित्सक से दूर रहेंगे।  मैं तो यही कहूँगा कि –
जो नित प्राणायाम करत है और सेब फल खाय
कबहु न मिलिहे  बैदराज से  रोग न  कोई  होय
कैंसर किलर
हालांकि सेब कई तरह के (आंत और स्तन कैंसर) कैंसर में लाभदायक माना जाता है, लेकिन फेफड़े को कैंसर में यह विशेष महत्वपूर्ण है। सेब निश्चित रूप से फेफड़े के कैंसर का जोखिम कम करता है। इसके लिए पॉलीफेनोल्स के एंटीऑक्सीडेंट्स और प्रदाहरोधी (Anti-inflammatory ) गुण जिम्मेदार माने गये हैं। शोधकर्ताओं ने हजारों लोगों पर शोध किया है। लोगों को दो श्रेणियों में बांटा गया, एक श्रेणी को सेब को छोड़ कर अन्य फल और सब्जियां खिलाई गई तो दूसरी श्रेणी को सिर्फ सेब खिलाये गये। शोधकर्ताओं ने पाया कि सेब खाने वाली श्रेणी में फेफड़े के कैंसर का जोखिम आश्चर्यजनक रूप से कम हुआ था। शोधकर्ता इन नतीजों का स्पष्टीकरण नहीं ढूँढ़ पा रहे हैं और मानते हैं कि अभी और शोध की आवश्यकता है।
अन्य
नई शोध से कुछ ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सेब अस्थमा का जोखिम भी बहुत कम कर देता है। इसके लिए भी पॉलीफेनोल्स के एंटीऑक्सीडेंट्स और प्रदाहरोधी (anti-inflammatory ) गुण जिम्मेदार माने गये हैं। लेकिन शोधकर्ता मानते हैं कि सेब में पॉलीफेनोल्स के अलावा भी कोई अन्य ऐसा तत्व भी है जो अस्थमा के लिए फायदेमंद है। सेब अल्झाइमर और रेटीना के मेक्यूलर डीजनरेशन में भी गुणकारी माना गया है। फास्‍फोरस और लौह प्रधान होने से यह मस्तिष्‍क और शरीर की मांसपेशियों में शक्ति का नव संचार कर इन्‍हें सुदृढ़ बनाता है। अनुसंधानकर्ता मानते हैं कि सेब खाने से बड़ी आंत में क्लोस्ट्रिडियेल और बेक्टिरियोड्स नामक जीवाणु की संख्या  काफी कम हो जाती है। इससे बड़ी आंत का चयापचय में भी बदलाव आता है और कई फायदे होते हैं।  
तीन सेबों ने बदल दी दुनिया
तीन सेबों ने इस दुनिया का स्वरूप बदल कर रख दिया है। यूनानी पौराणिक कथाओं के अनुसार पहला सेब तो ईव ने आदम को खिलाया, जो इस धरा पर मानव संसार का कारण बना। यदि आदम और ईव ने ईडन गार्डन में  वह वर्जित सेब (Forbidden Fruit) नहीं खाया होता तो शायद आज मेरा और आपका अस्तित्व भी नहीं होता। दूसरा सेब सर आइज़क न्यूटन के सिर पर गिरा जिससे उनका भेजा घूम गया और उन्होंने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत बनाया, जिसके कारण विज्ञान ने इतनी तरक्की की और चांद पर भी फतह हासिल की। तीसरा एप्पल स्टीव जोब्स की कल्पना में पैदा हुआ, जिसकी वजह से आज आप और हम मेक कम्प्यूटर, आईफोन, आईपेड, आईट्यून और आईपोड इस्तेमाल कर रहे हैं।



जाने की कह रहा और जा भी नहीं रहा है
बेदर्द, मेरे कहने से आ भी नहीं रहा है
मैं जल रहा हूँ तो घुट वो भी रहा है, लेकिन 
दिल की अगन को कोई बुझा भी नहीं रहा है 
-कुंवर प्रीतम

कौन है यह वाशिंगटन पोस्ट और क्यों मच रहा है हल्ला

यह नहीं कि वाशिंगटन पोस्ट या टाइम गलत हैं या सही हैं। बस सवाल सिर्फ इतना है कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं वह उनकी खबर क्यों है? व्यावसायिक परिदृश्य में देखें तो मीडिया के नाम पर विदेशी मीडिया की मनमानी कतई लोक की आवाज नहीं है। यह नितांत विदेशी कूटनीति का हिस्सा है। इसलिए दुनिया के मंच पर जब देश के संदर्भ में कोई बात की जाए, तो सावधानी रखना जरूरी हो जाता है।

कायदा ए कायनात में भी इंसान को अपनी आवाज पेश करने की इजाजत हक के बतौर बख्सी गई है। यह अच्छी बात भी है। आदिकाल से इंसानी बिरादरी को अनुशासित और गवर्न करने के लिए बनाई गईं व्यवस्थाएं सबसे ज्यादा डरती भी इसी से हैं। आवाजों को अपने-अपने कालखंडों में मुख्य बादशाही ताकतों ने कुचलने की कोशिश की है। कभी कुचली भी गई हंै, तो कभी सालों कैदखानों में बंद भी कर दी गईं हैं। किंतु फिर अचानक अगर कैद करने वाली बादशाही ताकत को किसीने उखाड़ा भी, तो वह यही कैदखानों में बंद आवाजें थीं। लोकतंत्र में इसका अपना राज और काज है। काज इसलिए कि यह अपनी स्वछंदता और स्वतंत्रता के बीच के फर्क से परे प्रचलन में रहती है। और असल में गलती इस आवाजभर की भी नहीं है, दरअसल आवाज को नियंत्रित करने वाले भी इसे गवर्न के नाम पर दबोच देना चाहते हैं, तो आवाजें बुलंद करने वाले आजादी के नाम पर अतिरेक कर डालते हैं। ऐसे में न तो आवाज की ककर्शता ही खत्म हो पाती है और न ही इसकी ईमानदारी ही बच पाती है। कहने का कुल जमा मायना इतना है कि माध्यमों की सक्रियता के चलते होने वाली उथल-पुथल और अर्थ स्वार्थ पर चिंता की जानी चाहिए। साथ ही यह भी ख्याल रखा जाना चाहिए कि वह आखिरकार कहीं कैद न होकर रह जाए। मौजूदा सिनेरियो में आवाज को बकौल टीवी, प्रिंट और वेब मीडिया देखा जाना चाहिए। हर देशकाल में यह तो माना गया कि आवाज महत्वपूर्ण है। और यह भी जान लिया गया कि यह सर्वशक्तिमान से कुछ ही कम है। किंतु कहीं कोई मुक्कमल योजना नहीं बनाई जाती कि इसका इस्तेमाल कैसे करें। हर उभरते हुए लोक राष्ट्र में आवाजें भी समानांतर उभरती हैं। सरकारी व्यवस्थाएं भी सक्रिय होती हैं। किंतु दोनों ही एक खिंचाव के साथ आगे बढ़ती हैं। आवाजें उठती और बैठती रहती हैं। परंतु व्यवस्थाओं का एक ही मान रहता है कि वह इन जोर-जोर से सुनाई दे रहीं लोक ध्वनियों को सुनकर मान्यता नहीं देंगे। और यही दोनों की जिद अंतिम रूप में अतिरेक में बदल जाती है। आवाजें अपनी राह लाभ, हानि के विश्लेषण से परे होकर नापती रहती हैं, तो व्यवस्थाएं लोक सेवक का लड्डू हाथ में लिए निर्धुंध कानों में रूई ठूंसे हुई जो बन पड़ता है अच्छा बुरा काम किए जाती हैं। आवाजों का शोर और आवाजों की उपेक्षा दोनों ही इस काल में अपने चरम पर हैं। समूची दुनिया से नितनई सनसनीखेज बातें होती रहती हैं। एक माध्यम ने तो लीबिया के गद्दाफी को ही उखाड़ फेंका, तो असांज ने मुखौटे पहने हुए लोगों के गंदे चेहरे सबके सामने रखे। आवाजें अपना काम कर रही हैं। लेकिन यह इसलिए और ज्यादा कर रही हैं, कि इनकी ताकत को बादशाही शक्तियां या तो पहचानती नहीं है या फिर पहचानकर मान्यता देने के मूड में नहीं हैं। भारत में भी स्टिंग ऑपरेशन के जरिए सियासी दलों के नेता बेनकाब होते रहे हैं और कालांतर में हाफ शर्ट पहनकर नीति, रीति और व्यवस्था को कब्जाए बैठे नौकरशाह भी चाल, चरित्र में बेढंगेपन के साथ सबके सामने आए। यह कारनामा किया इन्हीं आवाजों ने। राजतंत्र में आवाजों को नहीं आने दिया जाता था। और अगर किसी तरह से कहीं से आ भी गई तो कुचलने की ऐसी वीभत्स प्रक्रिया अपनाई जाती थी, कि लोगों की रूह कांप जाए। मगर जब दुनिया को लोकतंत्र की नेमत मिली तो व्यवस्थाओं के सामने खूबसूरत विकल्प था। एक ऐसा तंत्र ऐसी व्यवस्था, जिसे लोक ही चलाएगा, लोक ही बनाएगा और लोक के लिए ही यह बनी रहेगी। किंतु लोकतंत्र, जिसे भारी खून खराबे के जरिए बरास्ता यूरोप इंसानों ने पाया उसके मूल में आखिर यही आवाज व्यवस्था की नाक में दम करने फिर हाजिर थी। और इस बार यह आवाज कुछ ऐसी है कि इसे छाना नहीं जा सकता। बादशाही ताकतों को इसे अपने कानों में बिना किसी फिल्ट्रेशन के ही सुनना पड़ेगा। कर्कशता, गालियां, मनमानापन, बेझिझकी, बेसबूतियापन और सच्चाई, शांति, समझदारी से मिश्रित रहेगी। वाशिंगटन पोस्ट ने हमारे पीएम के बारे में जो भी लिखा, टाइम ने जो भी संज्ञा दी थी। यह सब कुछ इसी आवाज से निकलने वाली कर्कश ध्वनियां हैं। इन्हें रोका नहीं जा सकता है, किंतु उपेक्षित किया जा सकता है। संसार में सबसे बड़ी ताकत या तो दमन है या उपेक्षा। दमन जब नहीं किया जा सकता तो उपेक्षा कर देनी चाहिए। यह नहीं कि वाशिंगटन पोस्ट या टाइम गलत हैं या सही हैं। बस सवाल सिर्फ इतना है कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं वह उनकी खबर क्यों है? व्यावसायिक परिदृश्य में देखें तो मीडिया के नाम पर विदेशी मीडिया की मनमानी कतई लोक की आवाज नहीं है। यह नितांत विदेशी कूटनीति का हिस्सा है। इसलिए दुनिया के मंच पर जब देश के संदर्भ में कोई बात की जाए, तो सावधानी रखना जरूरी हो जाता है। वक्त आ गया है कि इन आवाजों को बादशाही ताकतें मान्यता दें। वक्त आ गया है कि आवाजों को नीति, रीति और योजनाओं में शामिल किया जाए। मुमकिन है फिर वाशिंगटन पोस्ट का कमेंट किसी देश के पीएम के लिए पूरी जिम्मेदारी के साथ आएगा और उसपर प्रतिक्रिया भी राष्ट्रीय सीमाओं की गरिमा के अनुकूल होगी। यह नहीं कि अपने शत्रु पड़ोसी की बुराई दूसरे मुहल्ले वाले करें तो हम भी दुंधभियां बजा-बजाकर करने लग जाएं। वरुण के सखाजी चीफ रिपोर्टर, दैनिक भास्कर, रायपुर

पगथिया: कोयला

पगथिया: कोयला:  देश लुटते है।  फिरंगी की भाषा, सफेद जक्क कपड़े, चापलूसी बोली, नफ्फट , बेशर्म , वादा और भरोसा सरेआम तोड़ते हैं। मकसद है इनका चल द...

5.9.12

विवादों के बापू बन गए हैं संत आसाराम

वे देश के बड़े अखाड़ेबाज संतों में एक हैं। 71 साल के हो गए हैं। फिर भी वे जब अपने हजारों भक्तों के मजमे के बीच पहुंचते हैं, तो झूमते हुए नाचने और गाने से भी परहेज नहीं करते। पिछले पांच सालों से वे लगातार किसी न किसी विवाद में उलझे रहे हैं। इन विवादों के चलते संत आसाराम इस दौर में विवादों के बापू बन गए हैं। लेकिन ये ऐसे संत हैं जिन्हें विवादों से परहेज नहीं है। वे कहते हैं कि आख्रिर विवाद भी तो चर्चा बढ़ाते हैं। उनका सीधा रिश्ता अपने करोड़ों भक्तों से है। ऐसे में वे मुट्ठीभर आलोचकों से न डरते हैं, न दबते हैं। इसी वजह से मीडिया का एक हिस्सा उन्हें ‘दबंग’ संत करार करने लगा है। वे खुलकर कहते हैं कि उन्हें अपने ईश्वर और भक्तों में अटूट विश्वास है। इसी से वे ऐसे दबंग संत हैं, जोकि न किसी सत्ता के दबाव में आते हैं, न ही स्वार्थी मीडिया के दबाव में। बापू के देशभर में सैकड़ों आश्रम हैं। वे घूम-घूमकर आध्यात्मिक जमावड़ा लगाते रहते हैं। प्रवचन के दौरान संत आसाराम खासी नाटकीय मुद्राओं में दिखाई पड़ते हैं। कभी वे मंच पर रंगीली होली खेल रहे होते हैं, तो कभी मंच से अपनी कोई दूसरी रास लीला दिखा रहे होते हैं। चर्चित योगगुरु बाबा रामदेव की तरह बापू ने भी अपना बड़ा आध्यात्मिक साम्राज्य फैला लिया है। गुजरात से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों तक संत आसाराम के आश्रमों का विस्तार हो चुका है। विवादों के बीच उनके आश्रमों की ‘खेती’ खूब फली-फूली है। मीडिया और नास्तिक किस्म के बुद्धिजीवी भले इस संत की उपदेश कला को आध्यात्मिक स्वांग करार करें, लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता घटने की बजाए बढ़ रही है। आमतौर पर इनके आध्यात्मिक समागमों में बीस हजार से लेकर एक लाख लोगों की भीड़ जुट जाती है। उनके भक्तगण इन समागमों में अपने गुरु को खासा अमीर बना जाते हैं। इसी के चलते संत के आश्रमों की संपत्ति अरबों रुपए की मानी जाती है। आसाराम यह अच्छी तरह जानते हैं कि लोकप्रियता बढ़ाने के लिए मीडिया का हथियार बहुत कारगर है। ऐसे में उनके हर कार्यक्रम में मीडिया का प्रबंधन जमकर किया जाता है। चर्चा तो यह भी रही है कि इनके आश्रम दो-तीन क्षेत्रीय टीवी चैनलों के लिए पूरे ‘रसद-पानी’ का इंतजाम करते हैं। इसी के चलते इन चैनलों में दिन-रात बाबा के चमत्कारों के गुणगानों के खूब बखान होते हैं। बापू के आध्यात्मिक और आलौकिक चमत्कारों की हकीकत क्या है? यह तो उनके भक्त ही जाने। लेकिन हाल के वर्षों में ये आध्यात्मिक गुरु कई और वजहों से ही चर्चित हुए हैं। ताजा मामला गाजियाबाद का है। पिछले दिनों यहां बापू का एक समागम था। इस सत्संग कार्यक्रम में हजारों भक्त जुटे थे। तमाम चेले बापू का महिमा मंडन कर रहे थे। यह बताने की कोशिश की जा रही थी कि कैसे बापू का संवाद सीधे ‘ऊपरवाले’ से हो जाता है। इसीलिए ‘यमराज’ को भी मायूस होकर लौट जाना पड़ता है। बापू के तंत्र की यह खास बात है कि वह किसी संयोग को भी भुनाना अच्छी तरह जानता है। ठीक कुछ ऐसा ही पिछले दिनों हुआ। बापू एक सत्संग के लिए गोधरा (गुजरात) पहुंचने वाले थे। इसमें हिस्सा लेने के लिए वे वायुमार्ग से एक हेलिकॉप्टर के जरिए जा रहे थे। लैंडिंग के वक्त हेलिकॉप्टर में कोई बड़ी तकनीकी खराबी आ गई थी। इसी के चलते वह आकाश में ही लड़खड़ाने लगा था। लैंडिंग के वक्त हेलिकॉप्टर मुंह के बल जमीन में टकराया था। जोरदार आवाज के साथ उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए थे। इसके बाद भी बापू और उनके साथी सकुशल बच गए। दो-तीन लोगों को मामूली खरोचें भर आईं। इतनी बड़ी दुर्घटना से बाल-बाल बचे संत ने अपना जोरदार उपदेश दिया था। यह बताया था कि कैसे आकाश में ही उनका ‘संवाद’ ऊपर वाले से हो गया था। फिर क्या, पूरी कृपा हो गई। हेलिकॉप्टर टुकड़ों में बदल गया। लेकिन तुम सबका बापू यहां सकुशल खड़ा है। बापू यह बताने के बाद खुशी में ठुमके लगाने से भी नहीं चूके थे। बापू ने नाचना शुरू किया, तो सत्संग में आए हजारों लोग मस्ती में नाचते देखे गए। कुछ इसी तरह का मस्तीभरा आलम होता है, बापू के तमाम सत्संगों में। इस घटना के बाद आसाराम की लोकप्रियता तेजी से बढ़ गई है। प्रचार किया जा रहा है कि बापू पर सीधे तौर पर ईश्वर की कृपा है। इसीलिए ऐसा चमत्कार हो गया। भक्तगण समझ लें कि आलोचनाओं से कोई फर्क नहीं पड़ता। बापू अपने भक्तों को कृपा बांटते रहेंगे और कल्याण करते रहेंगे। उस दिन गाजियाबाद के सत्संग में हेलिकॉप्टर चमत्कार की ही चर्चा थी। हजारों लोग चमत्कारी संत की एक झलक पाने के लिए होड़ लगाए थे। जहां भारी तामझाम और भीड़ हो, वहां टीवी मीडिया के लिए ज्यादा से ज्यादा कवरेज जरूरी हो जाती है। वैसे भी संत आसाराम अपनी खास आध्यात्मिक पुट वाली नाटकीय अदाओं के लिए जाने जाते है। टीवी वालों के तमाम कैमरे तैनात थे। हर अदा कैद कर लेने की होड़ लगी हुई थी। इसी में कुछ शोर-गुल हुआ, तो बापू को गुस्सा आ गया। गुस्सा भी इस कदर आया कि उन्होंने एक बडेÞ टीवी चैनल के कैमरापर्सन को थप्पड़ जड़ दिया। अब यह मामला पुलिस थाने तक पहुंच गया है। यह अलग बात है कि बाबा के चेले कह रहे हैं कि बापू, तो किसी पेड़-पौधे को भी धक्का नहीं देते। ऐसे में भला वे एक युवक को चांटा कैसे मार सकते हैं? टीवी वालों की एक दिक्कत यह है कि वे चांटामार क्षणों को कैमरों में नहीं कैद कर पाए। हालांकि हजारों लोगों ने देखा था कि बापू ने जोरदार चांटा मारा था। अब उनके तमाम भक्त यहां तक कह रहे हैं कि यह तो बापू का चमत्कार ही है कि चांटा मारते हुए बापू कैमरे में कैद नहीं हुए। यानि बापू के सामने तकनीक भी टें बोल जाती है। यदि चांटा मारते हुए वे कैद भी हो जाते, तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि बापू विवादों से ज्यादा घबराते नहीं है। वे कई विवादों में कोर्ट-कचहरी भी कर रहे हैं। कई मामलों में उनके और कुछ चेलों के खिलाफ आपराधिक मामले भी गुजरात में दर्ज हो चुके हैं। 2008 में उनके अहमदाबाद आश्रम में दो किशोर बच्चों की मौत रहस्यमय ढंग से हो गई थी। आरोप लगे थे कि आश्रम के उस्तादों ने इन बच्चों के साथ कुकर्म किया और इन्हें मार डाला। इस मामले को लेकर खासा विवाद खड़ा हुआ था। अहमदाबाद के बाद गुजरात के कई और आश्रम विवादों का केंद्र बन चुके हैं। बापू पर आरोप है कि कई आश्रमों के लिए उन्होंने जमीनों पर अवैध कब्जे किए हैं। इसको लेकर बापू और गुजरात के चर्चित मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच रिश्ते काफी खराब हो चुके हैं। मोदी की नाराजगी के चलते बापू के कई आश्रमों के अवैध कब्जे हटा दिए गए हैं। इसको लेकर भारी विवाद रहा है। बापू पारिवारिक इंसान हैं। सो, उनकी एक चर्चित ‘संत’ संतान भी है। उनका यह पुत्र भी आध्यात्मिक दुनिया का एक विवादित किरदार है। आरोप है कि बापू के ये साहब जादे, अपनी तांत्रिक साधना के लिए पता नहीं क्या-क्या करते रहते हैं? आरोप लग चुका है कि तांत्रिक साधना के लिए ही बापू के आश्रमों में कई मासूम बच्चों की बलि दी गई है। हालांकि इन मामलों के पुख्ता प्रमाण पुलिस अदालतों को नहीं दे पाई है। कई मामले अभी अदालतों में लंबित हैं। अपने सत्संग में बापू नरेंद्र मोदी को ललकारते रहते हैं। एक ताजा विवाद सौराष्टÑ के एक प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर हो गया है। बापू सौराष्टÑ में एक बड़ा सत्संग करना चाहते हैं। लेकिन इसकी अनुमति मोदी सरकार ने नहीं दी। सरकार की तरफ से कहा गया है कि बापू के जमावडेÞ को लेकर एक समुदाय में नाराजगी है। इसी से शांति व्यवस्था को देखते हुए कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी जा रही है। लेकिन बापू मानते हैं कि उनकी बढ़ती लोकप्रियता से मोदी जैसों को जलन होने लगी है। ऐसे में वे बाधा डाल रहे हैं। जैसे कि सतयुग में राक्षस टोली, संतों के यज्ञ कार्यक्रम बाधित करते थे। कुछ इसी तरह का काम नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। बापू ने नाराज होकर मोदी को ‘श्राप’ दिया है कि यदि उन्होंने उनके सत्संगों में राक्षसपन दिखाया, तो चुनाव के दौरान उनकी सत्ता की नैया पूरी तरह से डूबी जाएगी। संत आसाराम का जन्म अप्रैल 1941 में भारत-पाक बंटवारे के पूर्व सिंध के नवाबशाह जिले में हुआ था। उनके गांव का नाम बेराणी है। आसाराम का मूल नाम आसुमल सिरुमलानी था। उनके पिता एक मालदार व्यापारी थे। लेकिन किशोरावस्था में ही उनका ध्यान संत महात्माओं के प्रवचनों की तरफ हो गया था। युवावस्था में ही एक दिन वे अपने गांव से वृंदावन भाग आए थे। यहीं पर वे संत लीलाशाह जी के आश्रम में रहे थे। उन्होंने कोशिश की थी कि लीलाशाह जी महाराज उन्हें दीक्षा दे दें। लेकिन अपने इस भक्त की महाराज ने कड़ी परीक्षा ली थी। इसी के बाद उन्हें अपनी ‘कृपा’ दी थी। दावा किया जा रहा है कि स्वामी लीलाशाह जी के निर्देश पर ही वे लौट गए थे। क्योंकि उन्होंने कहा था कि अपने घर में ही आध्यात्म और योग के प्रयोग करो। लेकिन आसुमल अपने घर लौटने के बजाए, गुजरात के मोटीकोरल में एक स्थानीय संत लालजी महाराज के पास पहुंच गए थे। सालों की ‘तपस्या’ के बाद आसुमल, आसाराम बापू के रूप में बदल गए थे। यानि, उनका आध्यात्मिक जन्म हो गया था। हालांकि यहां पर उनकी पत्नी और मां गांव वापस चलने के लिए मनुहार करने आए थे। लेकिन आध्यात्मिक चोला धारण करने के बाद आसाराम गुजरात में ही परिजनों के साथ बस गए। यहीं से उनकी आध्यात्मिक दुनिया का विस्तार होता गया। यह जरूर है कि बापू अपने आध्यात्मिक गुणों से कम, लेकिन तरह-तरह के विवादों की वजह से ज्यादा जाने जाते हैं। लाखों आस्थावान भक्तों के उमड़ते प्यार ने बापू को आध्यात्मिक दुनिया का नया ‘दबंग’ बना दिया है। इसी के चलते वे मोदी जैसे दबंग नेता को ठेंगा दिखाने की जुर्ररत कर लेते हैं। साभारः- डीएलए अखबार

पैदाइशी बीमार आशिक..! (गीत)


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पैदाइशी   बीमार  आशिक..! (गीत)  




नाकामयाब   मुहब्बतों  की,  यही   तो  चीख़ पुकार   है..!


क्यों,  उनके  सारे   यार   मानो,  पैदाइशी    बीमार    है ..!



(चीख़ पुकार=आर्तनाद करना) ​   




अंतरा-१.




हैरत  ये  नहीं   कि,  चाहत  का  नशा   चरम  पर  क्यों   है..!


हैरत  ये   है  कि, सारे   आशिक, तबाही   के  तीर   पर   है..! 


नाकामयाब   मुहब्बतों   की,  यही    तो   चीख़ पुकार    है..!




(चरम= पराकाष्ठा; तबाही   के  तीर= बरबादी की अंतिम हद )




अंतरा-२.




प्यार,  वफ़ा, कुर्रत,  कसम,  कुरबानी, जैसे   कई   लफ़्ज़..!


क्या  मायने  उनके  जब,  रिश्ते  ही  नाकाम,  बेज़ार    है..!  


नाकामयाब   मुहब्बतों   की,  यही    तो   चीख़ पुकार   है..!




(कुर्रत= खुशी; मायने= महत्व; बेज़ार= उबाऊ, उचाटू)




अंतरा-३.




मायूसी कि दाज  में,  उम्मीद के उजाले  भर  मुआलिज ।


तड़प  रहा  है   इश्क  उसे,  पहले  से  भी  तेज़   बुख़ार  है..!


नाकामयाब   मुहब्बतों   की,  यही    तो   चीख़ पुकार   है..!




(मायूसी= निराशा; दाज= अँधेरी रात; मुआलिज=  डॉक्टर)




अंतरा-४.




प्यार  का   ख़ून  करने   चला  है,  ये   वहशी  ज़माना,  पर..!


वो   बच  जाएगा, उस   पर    मेरे,  अँसुवन  का   ख़ुमार  है ।


नाकामयाब    मुहब्बतों   की,  यही    तो    चीख़   पुकार  है..!



(वहशी=ज़ालिम; अँसुवन= आँसू;  ख़ुमार= नशा)


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०४-०९-२०१२.



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MARKAND DAVE
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आरक्षण मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है !



सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण को लेकर जमकर बवाल मचा है...एक बड़ा गुट आरक्षण के खिलाफ है तो दूसरा गुट आरक्षण के समर्थन में हैं। ऐसे में इन दोनों ही गुटों के वोटों पर निगाह गड़ाए रखने वाले हमारे राजनेता कहां पीछे रहने वाले थे। आखिर आरक्षण का ये जिन्न बाहर भी तो इन्हीं के श्रीमुख से निकलता आया है। आरक्षण पर लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और भारतीय दलित राजनीति के प्रमुख नेता रामविलास पासवान कहते हैं कि आरक्षण हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है...तो आरक्षण पर दलित राजनिति की प्रमुख महिला नेत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती के सुर तो पासवान से भी ज्यादा बुलंद हैं...वहीं समाजवादी पार्टी के सुर आरक्षण पर कुछ बदले बदले से हैं...समाजवादी पार्टी ने तो साफ कर दिया है कि आरक्षण प्राकृतिक नियमों के खिलाफ है...लिहाजा इसके खिलाफ उनके तीखे स्वर नरम नहीं पड़ने वाले। सरकार तो पहले ही प्रमोशन में आरक्षण के पक्ष में दिखाई दी...और इसका सुबूत केन्द्रीय कैबिनेट के उस फैसले ने दे दिया...जिसने प्रमोशन में आरक्षण बिल को मंजूरी दे दी। अब बची मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी...प्रमोशन में आरक्षण को लेकर भाजपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं...शायद भाजपा इस असमंजस में है कि इस ज्वलंत मुद्दे को किस तरह भुनाया जाए...प्रमोशन में आरक्षण का समर्थन कर इससे लाभांवित होने वाले वर्ग विशेष के वोट बैंक में सेंध लगाकर या फिर इसका विरोध कर अपेक्षाकृत बड़े वर्ग की सहानुभूति बटोर कर वो भी ऐसे समय में जब कांग्रेस, बसपा, लेफ्ट समेत तमाम दूसरे राजनीतिक दल उनकी नाराजगी मोल ले चुके हैं। बहरहाल देर सबेर भाजपा भी अपने पत्ते खोल ही देगी...लेकिन सरकार को प्रमोशन में आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने के लिए अभी सदन में संविधान संशोधन विधेयक पेश करना है...और इसे पास भी कराना है...लेकिन सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी की बिल को लेकर नाराजगी और भाजपा की चुप्पी सरकार के लिए फिलहाल सबसे बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। आरक्षित वर्ग की अगुवाई करने वाले रामविलास पासवान, मायावती और इनके सरीखे दूसरे राजनेता तो अपने वोटबैंक बचाने की जद्दोजहद में जल्द से जल्द इसे लागू करवाना चाहते हैं...और इन दलों की पूरी कोशिश ये है कि इसी बहाने आगामी लोकसभा चुनाव में अपनी सीटों की संख्या को बढाया जाए। पासवान जहां बिहार में दलित वोटबैंक के सहारे अपनी खोई जमीन वापस पाने की फिराक में हैं तो मायावती भी विधानसभा चुनाव में मात खाने के बाद कम से कम 2014 के आम चुनाव में ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटों पर नीला झंडा फहराना चाहती हैं...और मायावती की कोशिश भी यही होगी कि इस बार अपनी सीटों की संख्या 21 से बढ़ाकर कम से कम 30 से 40 की जाए...ताकि केन्द्र की राजनीति में माया का कद बढ़े। चलो ये तो थे तर्क प्रमोशन में आरक्षण बिल का पुरजोर समर्थन करने वाले दो दलों के...अब बात करते हैं समाजवादी पार्टी की आखिर क्यों सपा प्रमोशन में आरक्षण के विरोध में है। सपा इसके पीछे भले ही जो भी तर्क दे...लेकिन इस बात से सपा के नेता इंकार नहीं कर सकते कि इस फैसले के विरोध के पीछे 2014 के आम चुनाव ही हैं। सपा ये बात जानती है कि अगर वो इस फैसले का पुरजोर विरोध करेगी तो देशभर में न सही कम से कम उत्तर प्रदेश के उन समान्य वर्ग के उन 16 लाख सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवार के साथ ही सामान्य वर्ग के दूसरे लोगों की सहानुभूति तो वो आम चुनाव में बटोर ही सकती है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में सपा ने 224 सीटें हासिल कर पूर्ण बहुमत हासिल किया था...औऱ बसपा को सत्ता से बेदखल कर अखिलेश यादव मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए थे। जिसके बाद मुलायम सिंह के राष्ट्रीय राजनीति में पूरी दमदारी के साथ ताल ठोकने के इरादे भी जाहिर हो गए थे। ऐसे में 2014 के आम चुनाव में सपा प्रदेश में पार्टी के पक्ष में बने माहौल को भुनाना चाहती है...सपा की पूरी कोशिश है कि प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से कम से कम 60 सीटों पर साइकिल को रेस जितायी जाए। इससे पहले भी 2004 में सपा ने 80 में से 39 सीट हासिल की थी...जबकि 2009 में उसकी सीटों की संख्या सिमटकर 23 हो गयी थी। लेकिन इस बार सपा की निगाहें कम से कम 60 सीटों पर है...ऐसे में प्रदेश के करीब 16 लाख सरकारी कर्मचारी और उनके परिवार के साथ ही सामान्य वर्ग के दूसरे लोगों के वोट सपा की इस मंशा को साकार करने के करीब तो पहुंचा ही सकते हैं...फिर भला सपा प्रमोशन में आरक्षण का विरोध क्यों न करे। उत्तर प्रदेश देश की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है क्योंकि सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश में हैं...और इस प्रदेश में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन उन्हें केन्द्र की सत्ता की तरफ लेकर जाता है। ऐसे में केन्द्र की सत्ता में काबिज होने का ख्वाब देख रही भाजपा भी शायद प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर अभी इसलिए खामोश बैठी है कि आखिर किया क्या जाए। जाहिर है 2014 का आम चुनाव भाजपा के जेहन में है और इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी इस मुद्दे पर कोई स्टैंड लेगी...जो कम से कम उसे फायदा न भी पहुंचाए तो कम से कम नुकसान भी न पहुंचाए। अब कांग्रेस की अगर बात करें तो प्रमोशन में आरक्षण पर केन्द्रीय कैबिनेट के फैसले ने जाहिर कर दिया है कि कांग्रेस देश में ये संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस का हाथ दलितों के साथ है...इसी बहाने ही सही दलित वोट बैंक के कुछ वोट छिटककर उसके पाले में आ जाएं...लेकिन 2004 लगातार केन्द्र की सत्ता में काबिज कांग्रेस की हैट्रिक में ये दलित वोट के साथ ही सामान्य वर्ग के वो वोट भी निर्णायक भूमिका में होंगे जिन्हें फिलहाल कांग्रेस नाराज कर चुकी है। लेकिन देखने वाली बात भी होगी कि लोगों की नाराजगी क्या 2014 तक बनी रहेगी क्योंकि हमारे देश के लोग चीजों को भूल बहुत जल्दी जाते हैं। बहरहाल ये तय तो मतदाताओं ने ही करना है...जिसमें हर वर्ग के लोग हैं...कि 2014 के आम चुनाव में प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा कितना हावी रहता है और ये राजनीतिक दलों के प्रदर्शन पर कितना असर डाल पाता है। हम तो यही कहेंगे कि आरक्षण जैसे मुद्दों पर तो कम से कम राजनीतिक दल वोटबैंक की राजनीति से बाज आएं...और जरूरतमंदों के साथ न्याय हो...उनको उनका हक मिले...फिर चाहे वो किसी भी जाती या बिरादरी के क्यों न हों। इस मौके पर बिल गेट्स की कही एक बात मुझे याद आती है...जो मैंने कहीं पढ़ी थी कि …“अगर आप गरीब घर में पैदा होते हैं तो इसमें आपका कोई कसूर नहीं है...लेकिन अगर आप गरीब ही मर जाते हैं तो इसमें पूरा दोष सिर्फ और सिर्फ आपका ही है”…यानि की योग्यता लंबे समय तक दबी नहीं रह सकती...उसे कोई नहीं रोक सकता...और योग्य व्यक्ति मुश्किल हालात औऱ विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी योग्यता से हर वो मुकाम हासिल कर लेता है जिसे पाने की वो ठान लेता है।

deepaktiwari555@gmail.com

4.9.12

सबका मनपसंद फॉर्मूला समस्याओं का हल इसी पल

सबका मनपसंद फॉर्मूला समस्याओं का हल इसी पल अन्याय के खिलाफ हर जेहन में आवाज होती है। उस दिमाग में तक जो खुद कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अन्याय का सहभागी पात्र होता है। यह मानवीय स्वभाव है। लंबे अरसे तक जब सत्य और असत्य के सवालों को अनसुना किया जाता है, तो वह उठना बंद नहीं करते किंतु अपनी केपिसिटी खो देते हैं। दिमाग के संसारी और भारी कोलाहल के बीच वह सुनाई नहीं देते। लेकिन जिनके दिमागों में यह प्रश्न रह-रहकर उठते रहते हैं, उन्हें चाहिए तत्काल रेमेडी।

फिल्मों की सफलता उसकी आय है तो सौ करोड़ क्लब की फिल्मे सदी की बैंचमार्क फिल्में हैं। और इनका फिल्मी फॉर्मूला एक ही है हीरो कालजयी हो। सुपरमैन हो। शक्तिमान हो और किसी भी हाल में हारे नहीं। इसीलिए शायद लोगों को ज्यादा सीधापन भी भाता नहीं। अन्याय के खिलाफ हर जेहन में आवाज होती है। उस दिमाग में तक जो खुद कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अन्याय का सहभागी पात्र होता है। यह मानवीय स्वभाव है। लंबे अरसे तक जब सत्य और असत्य के सवालों को अनसुना किया जाता है, तो वह उठना बंद नहीं करते किंतु अपनी केपिसिटी खो देते हैं। दिमाग के संसारी और भारी कोलाहल के बीच वह सुनाई नहीं देते। लेकिन जिनके दिमागों में यह प्रश्न रह-रहकर उठते रहते हैं, उन्हें चाहिए तत्काल रेमेडी। रेमेडी यानी तुरंत निवारण। इस निवारण के लिए वे छटपटाते नहीं, क्योंकि परिवार, घर, समाज, धन और अन्य मोटे रस्सों से बंधा महसूस करते हुए खुद प्रयत्न नहीं कर पाते। ऐसे में उनकी छटपटाहट एक उद्वेग में तब्दील हो जाती है। इसके लिए वह कोई ऐसी इमेज खोजते हैं, जहां पर उनके मन की इस बात का प्रतिनिधित्व होता हो। सौ करोड़ क्लब की फिल्मों का मनोविज्ञान इसी बात के इर्दगिर्द घूमता है। बिलेम भले ही सलमान पर लगता हो, किंतु फिल्मी कौशल से यह आमिर खान भी बरास्ता गजनी करते हैं। शाहरुख भी तकनीक के जरिए कुछ ऐसा जौहर दिखाने की भरशक कोशिश कर चुके हैं। अक्षय कुमार को भी राउडी में देखा जा सकता है। यूं तो हीरो की छवि देवकाल से ही अपराजेय मानी जाती रही है। मगर फिल्म के इस नए संस्करण और कलेवर ने इसे और पुख्ता कर दिया है। दक्षिण में यह और भी अतिरेक के साथ किया जाता है। माना जाता है, कि वहां पर दैनिक जीवन में बस, रेल, पगार, कार्यस्थल, सडक़, बिजली, सरकार और अन्य जरियों से आने वाली छोटी-छोटी नाइंसाफी की पुडिय़ाएं लोगों को नशे में रखती हैं। दिमाग में बनने वाली फिल्मों के जरिए तो वे कई बार दोषी को दुर्दातं मौत दे चुके होते हैं, किंतु वास्तव में यह मुमकिन नहीं होता। पर जब वह चांदी के परदे पर उछल-कूद करके हल्के फुल्के तौर तरीकों से ही दुश्मन को धूल चटाते देखते हैं, तो कुछ हद तक नाइंसाफी की नशे की पुडिय़ा से बाहर निकल पाते हैं। इसी मनोविज्ञान को सौ करोड़ क्लब की फिल्में खूब भुनाती हैं। कई बार हम भी इस बहस के खासे हिस्सा बन जाते हैं, कि इन फिल्मों में अभिनय और कहानी की उपेक्षा होती है। किंतु फिल्में अपने आपमें इतनी जिम्मेदार रहेंगी तो शायद पैसा ही न कमा पाएंगी। एक्शन प्रियता मनुष्य की सहज बुद्धि है। बचपन में हम लोग भी खेतों या नर्मदा के रेतीले मैदानों में रविवार को दूरदर्शन की फिल्मों के एक्शन सींस किया करते थे। इनमें किसी को मारने वाले सींस के साथ या अली डिस्क्यां संवाद बहुत ही आम था। दोस्तों के बीच एक पटकथा रखी जाती थी। वह पटकथा उतनी ही गंभीर होती थी, जितनी कि आज के दौर में बनने वाली सौ करोड़ क्लब फिल्मों की। यानी जोर किसी का पटकथा पर नहीं, सिर्फ मारधाड़ और कोलाहल पर। सब अपनी भूमिकाएं छीनने से लगते थे। लेकिन इस पूरी मशक्कत में कोई भी अमरीश पुरी नहीं बनता था। इसे हम इंसान की सहज सकारात्मकता के रूप में ले सकते हैं। मारधाड सब करना चाहते थे। देश दुनिया से अन्याय को सब अल्विदा कहना चाहते थे, सब शांत और समृद्ध नौकरी पेशा समाज चाहते थे। मगर एक्शन के जरिए। यानी यह मानव स्वभाव है कि वह बदलाव के लिए सबसे आसान विकल्प के रूप में शारीरिक क्षमताओं से किसी को धराशायी करना ही चुनता है। एक्शन मानव स्वभाव का हिस्सा है, किंतु यह हिंसा कतई नहीं। सकारात्मक बदलावों के लिए इस्तेमाल की जानी वाली शारीरिक कोशिशें हिंसा नहीं हो सकतीं। यह अंतस में बर्फ बना हुआ गुस्सा है, जिसे जलवायु परिवर्तन का इंतजार था। अब वह पिघलने को है। और इसी मनोशा पर आधारित होती है इन फिल्मों की कहानी। ऐसा कोई इंसान नहीं है जिसे इस तरह की फास्ट रेमेडी पसंद न आती है। सबको समस्याओं का हल, उसी पल का फॉर्मूला प्रभावित करता है, परंतु प्रैक्टिकली ऐसा होता नहीं है, इसलिए कुछ लोग या तो ऐसी फिल्में छोडक़र चले आते हैं, या जाते ही नहीं। मगर अधिकतर लोग कम से कम कल्पना में ही सही नाइंसाफी से निपटने का एक शीघ्रतम दिवा स्वप्न जरूर देखना चाहते हैं। इसका मतलब तो यह होना चाहिए, कि चॉकलेटी हीरो वाली सॉफ्ट कहानियों पर आधारित कॉलेज के प्रेम की फिल्में बननी ही नहीं चाहिए। तो इसका जवाब मेरे पास नहीं है, किंतु एक्शन फिल्मों में आम आदमी अपने गुस्से को तलाशता है। यही हुआ था, जब देश में अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत लोकपाल को लेकर खाना त्यागकर बैठ गए थे। लोगों में एक हीरो दिखा। मगर उनका हीरो सरकारी तरीकों और सियासी कुचक्रों का सामना नहीं कर पाया। टिमटिमाती लौ के साथ अरविंद कुछ हद तक सलमान खान का एक्शन कर जरूर रहे हैं, किंतु यह भी उस क्रांतिकारी बदलाव की अलख नहीं जगाता, जो कि आम लोग देखना चाहते हैं। वरुण के सखाजी चीफ रिपोर्टर, दैनिक भास्कर, रायपुर

3.9.12


राघव जी ने साबित कर दिया कि नये सतपुड़ा संभाग का मुख्यालय सिवनी में होना  ही कम खर्चीला होगा
हाल ही में विक्रयकर विभाग द्वारा भामाशाह पुरुस्कार वितरण का समारोह सिवनी जिले में आयोजित किया गया। इस समारोह में बालाघाट,छिंदवाड़ा और सिवनी जिले के लोगों को पुरुसक्ृत् किया जाना था। बड़ी होशियारी से वित्त मंत्री राधव जी ने एक हाथ से खजाने से निकाल कर दूसरे हाथ से इनाम की अधिकांश खजाने में ही जमा कर लेने का कमाल कर दिखाया। होने वाले सरकारी खर्च में मितव्ययतिा बरतने के लिये े इन तीन जिलों का कार्यक्रम बीच में स्थित सिवनी जिले में आयोजित कर राघव जी ने लोगों पर एक बहुत बड़ा उपकार भी किया है। वित्त मंत्री के निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि सिवनी का दावा उचित हैं इसीलिये अब जिले के तमाम जन प्रतिनिधियाों का यह दायित्व बन जाता है कि वे इस आधार पर जिले को जायज हक  दिलायें। मिशन 2013 और 2014 की कांग्रेा की जिले में कोई तैयारी नहीं दिख रही हैं। ना तो कमेटियों में प्रभारी महामंत्री नियुक्त हो पाये हैं और ना ही ध्वजवाहिनी समिति की कोई हलचल ही दिख रही हैं। पूरे प्रदेश में संभाग स्तर पर भाजयुमो द्वारा विवेकानंद संदेश यात्रा के नाम पर मोटर सायकिल रैली आयोजित की गयी हैं। युवा मोर्चे के नाम पर निकाली जाने वाली रैली का भार अपने वजनदार नेताओं के कंधों पर डाल दिया हैं। भाजपायियों में चल रही चर्चा के अनुसार भाजपा ने विधायक पद के जीते हारे प्रत्याशियों के साथ ही संभावित प्रत्याशियों को भी अभी से बोझ लाद दिया हैं।
संभाग की मांग को जायज ठहरा गये राघव जी-वित्त मंत्री मितव्ययिता ध्यान नहीं रखेगा तो भला कौन रखेगा? और ऐसा ही किया वित्तमंत्री राघव जी ने। हाल ही में विक्रयकर विभाग द्वारा भामाशाह पुरुस्कार वितरण का समारोह सिवनी जिले में आयोजित किया गया। इस समारोह में बालाघाट,छिंदवाड़ा और सिवनी जिले के लोगों को पुरुसक्ृत् किया जाना था। जिसके मुख्य अतिथि वित्तमंत्री राघव जी और अध्यक्षता विस उपाध्यक्ष एवं इंका विधायक हरवंश सिंह ने की थी। इसमें विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रभारी मंत्री नाना भाऊ,सांसद द्वय के.डी. देशमुख एवं बसोरी सिंह,विधायक नीता पटेरिया,शशि ठाकुर एवं कमलमर्सकोले, केबिनेट मंत्री के दर्जा प्राप्त वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन और मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर थे। इस समारोह में ना जाने क्यों राज्यसभा सदस्य फग्गनसिंह कुलस्ते को आतंत्रित नहीं किया गया।इसमें हर जिले में सर्वाधिक टेक्स देने वालों को पुरुस्कृत किया जिसमें प्रथम इनाम एक लाख रु. द्वितीय इनाम 50 हजार रु. एवं तृतीय इनाम 25 हजार रु. का दिया गया। तीनों जिलों में प्रथम एवं द्वितीय पुरुस्कार तो शासकीय विभागों को ही मिले। इसमें बड़ी होशियारी से वित्त मंत्री राधव जी ने एक हाथ से खजाने से निकाल कर दूसरे हाथ से इनाम की अधिकांश खजाने में ही जमा कर लेने का कमाल कर दिखाया। होने वाले सरकारी खर्च में मितव्ययतिा बरतने के लिये े इन तीन जिलों का कार्यक्रम बीच में स्थित सिवनी जिले में आयोजित कर राघव जी ने लोगों पर एक बहुत बड़ा उपकार भी किया है। प्रस्तावित नये सतपुड़ा संभाग का मुख्यालय सिवनी को बनायश जाने की मांग लंबे समय से चल रही हैं। इसका प्रमुख कारण भी यही बताया गया था कि छिंदवाड़ा और बालाघाट जिले के बीच में सिवनी स्थित है इसलिये प्रशासनिक एवं आर्थिक रूप से इसे ही मुख्यालय बनाया जाना चाहिये। लेकिन छिंदवाड़ा को मुूख्यालय बनाने की अपनी घोषणा के कारण मुख्यमंत्री जिले की इस जायज मांग को नहीं मान रहें हैं और मामले को लंबित रखे हुये हैं।वित्त मंत्री के निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि सिवनी का दावा उचित हैं इसीलिये अब जिले के तमाम जन प्रतिनिधियाों का यह दायित्व बन जाता है कि वे इस आधार पर जिले को जायज हक विस औा लोस चुनाव के पहले दिलायें वरना मामला फिर लटक जायेगा।
जिले में ना प्रभारी महामंत्री और ना ध्वज दिख रहा है  ना ही वाहिनी -राजनैतिक हल्कों में चर्चित है कि मिशन 2013 एवं 2014 का कांग्रेस का कार्यक्रम काफी शिथिल चल रहा हैं। राजनैतिक सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक जिला एवं ब्लाक कांग्रेस कमेटियों में प्रभारी महामंत्री की नियुक्ति तक नहीं हो पारयी हैं। कांग्रेसजनों में व्याप्त चर्चा के अनुसार कांग्रेस के जिले के पट्टेदार एवं इकलौते विधायक हरवंश सिंह ने अपने ही गुट के उप गुटों में तालमेल बिठाने चक्कर में इन पदों के लिये कई कई नेताओं को आश्वासन दे दिया था। लेकिन बनना तो एक ही को था इसलिये अब वे यह तय नहीं कर पा रहें हैं कि चुनाव के समय नेताओं की नाराजगी मोल ली जाये या फिर बिना प्रभारी महामंत्री के ही काम चलने दिया जाये। जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी की भी मजबूरी यह है कि बिना हरवंश सिंह की अनुमति के वे कोई निर्णय नहीं ले सकते हैं। प्रदेश कांग्रेस ने मिशन 2013 एवं 2014 के लिये केन्द्र की ध्वजवाहिनी योजनाओं की निगरानी एवं प्रचार प्रसार के लिये ध्वज वाहिनी समितियों का जिला स्तर पर गठन किया हैं। लेकिन जिले में यह पद भी अपने ही उप गुटों में संतुलन बिठाने की भेंट चढ़ गया है। इस पद पर मां. असलम खॉन की नियुक्ति की गयी हैं। वे जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद के दावेदार थे लेकिन इस पद पर हीरा आसवानी बैठ गये है। इसके बाद जिला इंका में उन्हें कोई पर ना दिया जाय ऐसा दवाब हरवंश समर्थक 14 नेताओं ने बनाया था। इसमें कुछ नेता ऐसे भी थे जिनका हरवंश सिंह के केवलारी क्षेत्र में प्रभाव था। वैसे असलम भाई को जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन चंदेल का खुला समर्थ था लेकिन उसके बावजूद भी असलम भाई को जिला कांग्रेस में कोई सम्मानजनक पद नहीं मिल पाया था। इसीलिये मौका हाथ लगते ही हरवंश सिंह ने उन्हें ध्वज वाहिनी योजनाओं की समिति का जिले का अध्यक्ष बना दिया। लेकिन उनके द्वारा काम नहीं करने की बात जब केई बार हुयी तो उनके समर्थक यह तक कहते देखे गये कि असलम भाई ने तो स्तीफा दे दिया हैं। इसमें सच्चायी क्या है? यह तो असलम भाई या हरवंश सिंह ही बता सकते हैं लेकिन यह जरूर है कि जिलें ना तो ध्वज दिख रहा है और ना ही वाहिनी,ऐसे में कांग्रेस चुनावी मिशन में कैसे कामयाब होगी? यह चर्चा का विषय बना हुआ हैं। 
हर्रा लगे ना फिटकरी,रंग चोखा के चोखा-पूरे प्रदेश में संभाग स्तर पर भाजयुमो द्वारा विवेकानंद संदेश यात्रा के नाम पर मोटर सायकिल रैली आयोजित की गयी हैं। इंदौर और उज्जैन संभाग की रैली फेल हो जाने कारण जबलपुर संभाग की रैली पर भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने विशेष ध्यान दिया और युवा मोर्चे के नाम पर निकाली जाने वाली रैली का भार अपने वजनदार नेताओं के कंधों पर डाल दिया हैं। भाजपायियों में चल रही चर्चा के अनुसार भाजपा ने विधायक पद के जीते हारे प्रत्याशियों के साथ ही संभावित प्रत्याशियों को भी अभी से बोझ लाद दिया हैं। जिले के भाजयुमो अध्यक्ष ठा. नवनीत सिंह और जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के नेतृत्व में भारी संख्या में जिले से कार्यकर्त्ता रैली में भाग लेने जबलपुर गये। इस आयोजन में कुछ ऐसा ही हुआ कि हर्रा लगे ना फिटकरी रंग चोखा के चोखा। भाजपा के किस बड़े नेता पर कितना आर्थिक बोझ पड़ा और कैसे और किससे इसकी व्यवस्था की गयी?इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिले के 17 मंड़लों में हर मंड़ल से पचास पचास मोटर साइकिल भेजने का लक्ष्य रखा गया था। नाम तो इा आयोजन का विवेकानंद संदेश यात्रा रखा गया था लेकिन वास्तव में शिवराज विवेकानंद जी पर भारी पड़े और हर जगह उनका ही गुणगान किया जाता रहा।“मुसाफिर“       


खुद के हित पर जनहित को कुर्बान कर देने वाले जन  प्रतिनिधियों को क्या जनता कभी सबक सिखायेगी?
सिवनी। बीते दस पंद्रह सालों से कांग्रेस और भाजपा नेताओं की नुरा कुश्ती के कारण जन          प्रतिनिधि अपने हित के लिये जन हित को कुर्बान करने में जरा भी संकोच नहीं कर रहें हैं। इसका खामियाजा इस पिछड़े हुये जिले को भुगतना पड़ रहा हैं और पड़ोसी जिलो की तुलना में सिवनी और पिछड़ता जा रहा हैं। क्या जनता कभी ऐसे जनप्रतिनिधियों को सबक सिखायेगी? यह सवाल सियासी हल्कों में चर्चित हैं।
बात चाहे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव द्वारा घोषित रामटेक सिवनी गोटेगांव नयी रेल लाइन की हो या मुख्यमंत्री शिवराजसिंह द्वारा घोषित इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज और नगर को माडल शहर बनाने की घोषणा हो उन्हें पूरा कराने की दिशा में जनप्रतिनिधियों की अनदेखी किसी से भी छिपी नहीं हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनो के ही जन प्रतिनिधियों ने इस हेतु ना तो सदन में और ना ही सड़क पर कभी कोई दवाब बनाया।
कांग्रेस और भाजपा के जन    प्रतिनिधियों की नूरा कुश्ती के चलते भी जिले ने बहुत कुछ खो दिया हैं। इसी नूरा कुश्ती के चलते सिवनी लोकसभा और घंसौर विधानसभा परिसीमन में समाप्त हो गयी। जिले के किसी भी नेता के प्रयासों के बिना जो फोर लेन सड़क जिले को मिल रही थी उसमें भी नूरा कुश्ती के चलते जो ग्रहण लगा हैं तो वह आज तक नहीं हट पाया हैं। पहली बार जब यह प्रस्ताव राज्य नेशनल लाइफ बोर्ड के पास गया था तो प्रदेश की भाजपा सरकार ने इसे अस्वीकार कर केन्द्र को भेज दिया था। जब  दूसरा प्रस्ताव राज्य से भेजा गया तब तक नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड प्रस्ताव को अस्वीकार कर चुका था। उसके बाद मामला जो उलझा तो आज तक सुलझ नहीं पाया हैं। शिवराज की गर्जना और दिल्ली ले जाकर जनमंच के प्रतिनिधि मंड़ल को मिलवाने की घोषणा भी दोनों तरफ की ढील के चलते नाकामयाब ही रही। 
कृषि महाविद्यालय की मांग भी लंबे समय से लंबित हैं। महिला महाविद्यालय का हास्टल सहित भवन,बीज निगम और कृषि विज्ञान केन्द्र की सुविधा के बावजूद भी यह मांग आज तक पूरी नहीं हो पायी हैं। भीमगढ़ जलावर्धन योजना का बिजली का बिल उसकी लागत से अधिक हो गया हैं लेकिन ना तो कांग्रेस के राज में और ना ही भाजपा के राज में इसका कोई निदान निकाला गया।
कहने को इस जिले में ती सांसद भाजपा के के.डी.देशमुख और राज्यसभा सदस्य फग्गनसिंह कुलस्ते,विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह,बकीना मंत्री का दर्जा प्राप्त डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन,नरेश दिवाकर,प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष विधायक नीता पटेरिया,शशि ठाकुर,कमल मर्साकेले, जिला पंचायत के युवा जुझारू अध्यक्ष मोहन चंदेल एवं नपा के एुवा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी हैं लेकिन इतने नाथ होने के बाद भी जिला अनाथों की भांति भुगत रहा हैं। इसमें इंका भाजपा की नूरा कुश्ती और दोनों ही पार्टियशें की गुटबाजी भी कम जवाबदार नहीं हैं।    
 
सदभाव से अब दुर्भाव क्यों?
सिवनी। जिले में आजकल फोरलेन में रुचि लेने वालों के बीच में चटखारे लेकर यह चर्चा होती देखी जा रही हैं कि सिवनी से खवासा तक फोर लेन बनाने वाली सदभाव कंपनी से कुछ उसके पुरानें अंध भक्त अब दुर्भाव क्यों रखने लगे हैं? सन 2007 से फोर लेन का काम करने वाली सदभाव कंपनी ने इस दौरान जो भी अनियमिततायें की उन्हें नजर अंदाज कर उनके प्रवक्ता क्ी भूमिका अदा करने वाले ही आज जनहित की बात करते हुये सदभाव से दुर्भाव रखते हुये उनकी कब्र्र खोदते देखे जा रहें हैं?यदि अनिमिततायें करके सदभाव ने चोरी की है तो उन्हें सजा मिलनी चाहिये लेकिन अचानक ही हुये इस हृदय के कारणों को लेकर तरह तरह की बात करते देखे जा रहे हैं।  

बेटी बचाओ,.ताकि लड़के उनको छेड़ सकें !


श्रीगंगानगर-“कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान”। “बेटी बचाओ आंदोलन”। “नारी शक्ति के लिए रैली”। और भी बहुत कुछ....ये....वो..... । किसलिए ताकि जब हमारी बेटी,बहिन,भतीजी...बड़ी हो जाए तो उनको समाज के बिगड़ैल लड़के छेड़े। उनको आते जाते रास्ते में रोक कर परेशान करें। और उसकी मजबूरी देखो ना तो वह यह बात घर में बता सकती है और ना खुद कुछ करने में सक्षम। घर बताए तो माता,पिता,भाई,चाचा...को टेंशन। कुछ करें तो मुश्किल....काम धंधा रुक जाएगा...कोर्ट कचहरी के चक्कर....लड़की की बदनामी...लड़ाई झगड़ा। परिवार कुछ  ना करे तो और मुश्किल,,,लड़की को टेंशन...या तो लड़कों की अच्छी बुरी बातें सुने.......या घर से निकलना छोड़ दे। महिला सशक्तिकरण को लगे गोली। इज्जत है तो सब कुछ है। वह दौर कुछ अलग था जब लड़कियों को घर बैठे काम चल जाता था। अच्छे  रिश्ते मिल जाते थे। अब तो लड़कियों को समय के साथ चलना जरूरी है। इसके लिए घर से और शहर से भी बाहर निकालना ही होगा...तो सुरक्षा? फिर वही सवाल...हैरानी इस बात की है कि लड़कियों को बचाने के आंदोलन चलाने वाले संगठन,नारी आंदोलन के लीडर कभी दिखाई नहीं देते इनकी रक्षा के लिए। लड़कियों को छेड़ने वाले लड़कों के खिलाफ कभी खड़े  नहीं होते ऐसे संगठन। इनको शर्म तो अब भी नहीं  आती। कांता सिंह लगा है ऐसे लड़कों से निपटने के लिए। किन्तु लड़की और नारी की रक्षा,उनको बचाने की बड़ी बड़ी बात करने वाला। बड़ी बड़ी रैली निकालने वाला। बड़े बड़े आयोजन कर लड़की के महत्व को समझने वाला कोई संगठन कांता सिंह के साथ खड़ा नहीं हुआ। किसी ने ये नहीं कहा...कांता सिंह हम तुम्हारे साथ है। कोई तो आए और ये कहे कांता सिंह तुम प्रशंसा के पात्र हो। इन संगठनों ने तो क्या आना था कुछ लड़के विरोध में जरूर आ गए। फिर ऐसे नारी वादी संगठनों का क्या मतलब। एनजीओ किस काम की। केवल प्रचार के लिए।सम्मानित होने के वास्ते। यूं तो लड़की बचाओ की बात करते है और जब कोई लड़कियों को बुरी नजरों से बचा रहा है तो ये आँख,कान,मुंह बंद किए हुए हैं। शर्म की बात है....जिस कांता सिंह का काम नहीं है वह लगा है और जो सारा दिन “लड़की बचाओ””कन्या भ्रूण हत्या बंद करो” चिल्लाते हैं वे चुप है। खामोश हैं। मौन धारण किए हैं। फिर ऐसे संगठन किस काम के। काहे के नारी बचाने के आंदोलन। क्या बेटी इसलिए बचाएं कि लड़के उनको छेड़े। जलील करें। अपमानित करें। कन्या भ्रूण हत्या रोकें....ताकि लड़की पैदा हो.....बड़ी हो और फिर लड़कों के भद्दे कमेन्ट को सुन कर प्रताड़ित हों। शायद नारीवादी संगठनों को पता लग गया होगा कि कन्या भ्रूण हत्या क्यों होती थी.....किसी जमाने में लड़की के पैदा होते ही उसे क्यों मार दिया जाता था। क्योंकि हर रोज मरने से अच्छा है एक बार मरना। अब भी चेतो मौका है। कांता सिंह है। उसके पास हौसला है। काम करने का जुनून है। बस उसे अच्छे काम के लिए साथ चाहिए। कुछ ऐसा होना चाहिए ताकि लड़कियों की राह में कोई रोड़ा ना हो...॥ वरना तो फिर शहर में बिगड़ैल लड़कों का ही राज होगा। वे लड़के भी हमारे ही हैं। बस किसी कारण से बिगड़ गए।



2.9.12


लो आ गयी है फिर से रूत प्रेम की सुहानी
इस रूत में तुम मिलो तो बने इक नयी कहानी
बादल बरस रहे और मौसम है महका-महका
शायद ये मांगता है कोई प्रेम की निशानी

-कुंवर प्रीतम
2-9-12

सीरिया संकट और संयुक्त राष्ट्र संघ-ब्रज की दुनिया

मित्रों,सीरिया में इन दिनों जो कुछ हो रहा है वह किसी भी तरह न तो सीरिया के हित में है और न ही अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के हित में। दुर्भाग्यवश सीरिया इन दिनों विश्व की विभिन्न महाशक्तियों के लिए शक्ति-प्रदर्शन की प्रयोग-भूमि बन गया है। एक पक्ष जिसमें अमेरिकादि पश्चिमी देश हैं किसी भी कीमत पर सीरिया के तानाशाह राष्ट्रपति बशर अल असद को उखाड़ फेंकना चाहते हैं वहीं दूसरा पक्ष जिसका नेतृत्व चीन और रूस कर रहे हैं चाहे कितने भी मानव जीवन की कीमत पर असद को सत्ता में बनाए रखना चाहते हैं। रोजाना पक्ष और विपक्ष दोनों की सेनाएँ थोक में मानव-हत्याएँ कर रही हैं। एक-एक ईमारत से 200-250 तक लाशों का बरामद होना हमें एक बार फिर हिटलर के यंत्रणा-शिविरों की याद दिला रहा है। ऐसा कौन व्यक्ति होगा जिसका मन इस तरह की खबरों से व्यथित न हो जाए,निराशा से न भर जाए। क्या ईन्सान की कीमत अब टिड्डों से भी कम है? यह निराशा तब और भी घनीभूत हो जाती है जब हम देखते हैं कि वैश्विक व्यवस्था बनाए रखने के लिए गठित संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ के पास इस कत्लेआम को चुपचाप देखते रहने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। तो क्या यह संगठन अब पूरी तरह से अप्रासंगिक होने के कगार पर पहुँच चुका है? अगर नहीं तो फिर क्यों वह अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पा रहा है? क्यों अपने गठन के बाद से ही संयुक्त राष्ट्र संघ वियतनाम,कोरिया,चीन,ईरान-ईराक,भारत-पाक,अफगानिस्तान और अब सीरिया में खून की नदियों को देखकर भी मूकदर्शक बने रहने को बाध्य है?
                      मित्रों,वास्तविकता तो यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ अब तक सही मायनों में एक वैश्विक संस्था बन ही नहीं पाई है बल्कि यह तो सुरक्षा-परिषद के 5 स्थाई सदस्यों का बंधक है। महासभा हालाँकि किसी भी मुद्दे पर प्रस्ताव पारित कर सकता है जैसा कि उसने सीरिया के मामले में भी किया लेकिन दुर्भाग्यवश उसके प्रस्ताव संबद्ध राष्ट्रों के लिए बाध्यकारी नहीं होते इसलिए उनका कोई वास्तविक मूल्य या महत्त्व नहीं होता। सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्य जब तक एकमत नहीं होते तब तक संयुक्त राष्ट्र कुछ कर ही नहीं सकता। परिणामतः हमारी दुनिया में फिर से वैसी ही अराजकता और अव्यवस्था कायम होती जा रही है जैसी कभी प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले कायम हो गई थी। हालाँकि भारत सहित कई देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के विस्तार को इस समस्या का हल मानते हैं परन्तु मुझे नहीं लगता कि इससे कोई खास लाभ होगा। अच्छा तो होता कि सुरक्षा परिषद को ही समाप्त कर दिया जाता और संयुक्त राष्ट्र संघ की अपनी सेना गठित कर दी जाती। साथ ही सारे कार्यकारी अधिकार महासभा को ही दे दिए जाते लेकिन इसमें भी एक बाधा है कि ऐसा होने पर वोटों की खरीद-बिक्री शुरू हो जाएगी जो एक नई समस्या होगी।
                        मित्रों,इस तरह दुनिया के सामने बड़ी विकट समस्या है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में किस तरह के परिवर्तन किए जाएँ जिससे इसकी प्रासंगिकता बचे ही नहीं बल्कि बढ़ सके। बात सिर्फ एक सीरिया या उत्तर कोरिया की नहीं है बल्कि प्रश्न यह है कि कैसे पूरे भूपटल पर मानवाधिकारों की रक्षा हो,मानव-जीवन को कैसे उच्चस्तरीय बनाया जाए और यह महती कार्य तब तक संभव ही नहीं है जब तक संयुक्त राष्ट्र संघ को हर तरह से सक्षम नहीं बना दिया जाए। इस दिशा में एक उपाय यह भी हो सकता है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों का निषेधाधिकार समाप्त कर दिया जाए और इसमें सारे फैसले स्थायी और अस्थायी सदस्यों के मतों को मिलाकर बहुमत से हो। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ की अपनी सेना होनी चाहिए या नहीं का प्रश्न भी कम जटिल नहीं है। इसकी अपनी सेना नहीं होने से तो नुकसान है ही परन्तु कुछ परिस्थितियों में ऐसा भी संभव है कि इसकी अपनी सेना का होना भी नुकसानदेह हो जाए। फिर यह सेना बनेगी तो सदस्य राष्ट्रों के लोगों से ही और उन्होंने योगदान देने से मना कर दिया तो?
                              मित्रों,समस्या जटिल है और वैश्विक स्थिति चीन के क्रमशः उभार के साथ काफी विस्फोटक होती जा रही है। अभी तक तो हमलोगों के सौभाग्यवश या फिर संयोगवश दुनिया की परमाणु हथियारयुक्त महाशक्तियों के बीच सीधा टकराव नहीं हुआ है लेकिन जिस तरह के आसार बन रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि बहुत दिनों तक इसे टाला जा सकेगा। अगर ऐसा हुआ तो तीसरा विश्वयुद्ध हुआ ही समझिए और तब संयुक्त राष्ट्र संघ तो समाप्त हो ही जाएगा शायद मानवता भी धरती पर बीते दिनों की बात हो जाए सलिए अब हाथ-पर-हाथ ऱखकर बैठने का समय नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ को अधिक शक्तिशाली बनाने का मार्ग खोजना ही पड़ेगा और नहीं मिले तो नया रास्ता बनाना पड़ेगा। 

1.9.12


ये जिन्दगी के मेले, कितने यहां झमेले
वो भाग्यवान है जो इसका मजा सके ले
प्रेम-पथ पे अक्सर चोटें मिली सभी को
कभी वो रहे अकेले, कभी ये रहे अकेले
-कुंवर प्रीतम
1-9-12

काश, हम भी मोबाईल होते..! (गीत)


(Google Images)

काश   हम   भी   मोबाईल    होते..! (गीत)


जलते   हैं    भीतर,  काश   हम   भी   मोबाईल    होते..!

उनके   करीब  रह   कर  हम, कितने   वर्सटाईल   होते? 

(versatile=वर्सटाईल= हरफ़न मौला,सर्वगुणसंपन्न)


अंतरा-१.


जब   वो, प्यार से  अपलक  देखते, दिल के  स्क्रीन  को..!

ओ..ह, इस अदा  पर  हम, जहान से  भी  हॉस्टईल  होते..!

जलते     हैं     भीतर,  काश   हम   भी   मोबाईल    होते..!

(अपलक देखना= ताकना; Hostile= हॉस्टाईल = आक्रामक,दुश्मन )


अंतरा-२.


उनके  निपट  पास   जाकर   हम,  गालों    को   सहलाते..!

ज़ुल्फ़ों  की   ख़ुशबू  से खेल, फिर गुडी-गुडाई  फिल  होते । 

जलते      हैं     भीतर,  काश    हम   भी    मोबाईल   होते..!


(निपट=  पूरी तरह से; नाज़= गर्व) 
(Goody-Gooday feel= गुडी-गुडाई  फिल = मधुर अपनापन का 
अहसास)


अंतरा-३. 


दिनभर  नर्म  हाथों  पर  और  रात  उनके  सिरहनों  पर ।

पास  रखती  तो, अपुन  के  भी  नवाबी   ईस्टाईल  होते..!

जलते     हैं    भीतर,  काश   हम   भी   मोबाईल    होते..!

( style=ईस्टाईल= ढंग, तरीक़ा; सिरहन= तकिये  के  पास)


अंतरा-४.


दिल का  सिम जवान  रहता, प्यार का पावर ऑन  रहता ।

दुःख है मगर, काश कि हम, इश्क के  आईन्स्टाईन  होते..!

जलते     हैं   भीतर,  काश    हम    भी    मोबाईल    होते..!


(दिल का सिम= SIM CARD; आईन्स्टाईन= निष्णात संशोधक)


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०१-०९-२०१२.




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MARKAND DAVE
http://mktvfilms.blogspot.com   (Hindi Articles)

बप्पारावल जुलाई 2012


विजन 2020 अगस्त, 2012


भ्रष्टतंत्र में फंसे मेरे भाई का ख़त



देवरिया में मेरा भाई जनसेवा केंद्र चलाता है, सरकार की चलाई इस योजना के तहत आम जनता को कम पैसे में उनके घर के पास सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए हैं लेकिन इस सेवा में हो क्या रहा है, वो हक़ीकत पेश करता है मेरे भाई का ये ख़त--- 

 


शायद आप लोगो को ये जान कर बहुत आश्चर्य होगा पर बहुत सोच समझकर मैंने ये फैसला लिया है की मैं अपने "जन सेवा केंद्र " की फ्रेंचाइजी को वापस कर रहा हु .
निश्चित ही आप लोग सोच रहे होंगे की मैंने अचानक ये फैसला क्यों ले लिया.
मैंने ये फैसला इसलिए लिया क्योकि मैंने ये फ्रेंचाइजी जनता की सेवा करने के लिए लिया था न की किसी भी तरह से पैसे कमाने के लिए. आपने पिछले कुछ दिनों में फेसबुक पर मेरे केंद्र से सरकारी सेवाए शुरू होने के साथ साथ एक प्रमाड पत्र भी देखा होगा.परन्तु मुझे आप लोगो को ये बताते हुए ये दुःख हो रहा है की ये व्यवस्था आधी ऑनलाइन और आधी ऑफलाइन होने की वजह से यहाँ भी भ्रष्टतंत्र स्थापित हो गया है.मैंने अभी तक अपने केंद्र से कई फ़ार्म सबमिट किया मगर समय से कोई कभी प्रमाड पत्र नहीं आया .मैं पिछले दस दिनों से लगातार तहसील के चक्कर काट रहा था और मुझे कहा जा रहा था की आपके सभी फार्मो की रिपोर्ट लग चुकी है और जल्द ही आपको प्रमाड पत्र मिल जायेंगे परन्तु जब 20 दिन बाद भी प्रमाड पत्र नहीं मिले और लोग मुझसे उसके बारे में सवाल करने लगे तो कल मैं देवरिया के जिलाधिकारी से मिला और इसकी शिकायत की,उन्होंने मुझे आश्वासन दिया की वो जल्द ही इस पर कुछ करेंगे. फिर मैंने तहसीलदार से मुलाकात की उन्होंने अपने एक आदमी से मुझे बात करने को कहा .मैं जब उनसे मिलने पहुचा तो देखा की सैकड़ो लोग उनके पीछे लगे थे और वो भाई साहब एक हाथ से लोगो से पैसे ले रहे थे और दुसरे हाथ से कागजों पर दस्तखत कर रहे थे. 4-5 घंटे उनके पास बैठने के बाद उन्हें फुर्सत मिली तो याद आया की जिलाधिकारी महोदय ने उनको प्रमाड पत्र जारी करने को कहा है. अब मुझे लगा की भाई साहब कम्प्यूटर पर बैठकर मेरे प्रमाड पत्र जारी कर देंगे,मगर भाई साहब तो अपने किसी और आदमी को खोजने लगे जो कम्प्यूटर जानता हो .खैर किसी तरह वो अपना थैला उठाये और प्रमाड पत्र जारी करने के लिए कम्प्यूटर पर बैठे. (ऐसा इसलिए क्योकि तहसीलदार महोदय को कम्प्यूटर नहीं आता और उन्होंने अपना डिजिटल सिग्नेचर इन भाई साहब को सुपुर्द कर दिया था ) 
प्रमाड पत्र जारी करने के लिए जब भाई साहब ने अपना थैला खोला तो उसमे किसी पथरदेवा के जन सेवा केंद्र के फ़ार्म थे किन्तु मेरे एक भी नहीं .मैं उनसे पूछता रहा की भाई साहब मेरे फ़ार्म कहा है मगर वो गुटका चबाने में इतना व्यस्त थे की उनके मुख से कुछ निकल ही नहीं रहा था.खैर फिर मैंने पथरदेवा के उस जन सेवा केंद्र संचालक से बाहर आकर बात की की भाई आपके फ़ार्म यहाँ हैं.मेरे क्यों नहीं. तो उन्होंने मुझे बताया की उन्होंने इनको 2000 रूपए दिए हैं इसलिए उनका काम जल्दी किया जा रहा है.मैंने उस केंद्र संचालक को डाटा की आज तुहारी एक गलती से सभी केंद्र संचालको को दिक्कत हो रही है क्योकि तुमने जो घूस देने की शुरुआत कर दी है उसका खामियाजा हम सबको भुगतना पड़ेगा .खैर मैं सिर्फ बोल ही तो सकता था, इन सबमे शाम के 7 बज चुके थे और मेरे फ़ार्म का पता नहीं था .अंत में मैंने कुछ शख्त रवैया अपनाते हुए रात को 8 बजे तहसील का ताला खुलवाकर अपनी फ़ाइल निकलवाई तो देखा की उस पर इतने दिनों में कोई रिपोर्ट नहीं लगी है. अगले दिन मैं खुद उस फ़ाइल को लेकर लेखपाल और कानूनगो के पास गया तो वो लोग भी मुझे पैसे देने का इशारा करने लगे. मैंने वह देखा की जो भी उनकी जेब में 50 रूपए दाल देता उसका काम तुरंत हो जाता और जो नहीं देता उसको कुछ भी कहकर टाल दिया जाता .
जाहिर सी बात है की अगर मुझे इनको पैसे देने पड़े तो वो पैसे मुझे जनता से ही लेने पड़ेंगे जो की मैं कर नहीं सकता क्योकि मैंने ये केंद्र जनता को सरलता और आसानी से कम पैसे में सेवा देने के लिए खोला था न की ज्यादा पैसे लेकर खुद इस भ्रष्टतंत्र का हिस्सा बन्ने के लिए .
मुझे इन चीजों को देखकर मेरे अंतर्मन में बहुत दुःख हुआ की आज के समय में हर आदमी बिक चुका है और डैडी फिल्म का वो गाना याद आया की ".ये वो जगह है जहा वफ़ा बिकते हैं,बात बिकते हैं और लफ्ते जिगर बिकते हैं,कोख बिकती है,दिल बिकते है,सर बिकते है , इस बदलती हुयी दुनिया का खुदा कोई नहीं,सस्ते दामो में हर रोज खुदा बिकते है.... 
हर खरीददार को बाज़ार में बिकता पाया ,हम क्या पायेंगे किसी ने यहाँ क्या पाया. मेरे एहसास ,मेरे फूल कही और चले....."

अहा ज़िंदगी - आयुर्वेद महा विशेषांक

दोस्तो, 
अहा ज़िंदगी के ताजा आयुर्वेद महा विशेषांक में मेरे पांच लेख प्रकाशित हुए हैं। यह सचमुच प्रसन्नता की बात है। सभी जगह से रिश्तेदार, मित्र और मेरे प्रिय पाठकों के ढेरों फोन आ रहे हैं। आज मेरा मन गा रहा है, झूम रहा है। आज तो उत्सव मना

ने का दिन है। यह सब आपके प्यार का फल है। इन पांच में से एक लेख अलसी पर है।
1-डायबिटीज - इंसुलिन की खोज
2-मोटापा और मधुमेह
3-गेहूँ का ज्वारा- प्रकृति का विशेष उपहार
4-शतावरी -कुदरत की कैंसररोधी नियामत
5-अलसी- डायबिटीज से मिलेगी मुक्ति




इस विशेषांक आयुर्वेद और स्वास्थ्य पर अनेकों  उत्कृष्ट आलेख हैं और यह अंक संजो कर रखने की चीज है। 

Dr. O.P.Verma
M.B.B.S.,M.R.S.H.(London)
President, Flax Awareness Society
7-B-43, Mahaveer Nagar III, Kota(Raj.)
E-mail – dropvermaji@gmail.com 
M +919460816360


जितने करीब आए, उतने हो दूर अब तुम
ये क्या नशा चढ़ा है, जिसमें हो चूर अब तुम
आओ पिलाएंगे हम अमृत की चन्द बूंदें
पहले तो तुम नहीं थे, जितने हो क्रूर अब तुम
-कुंवर प्रीतम
31 अगस्त 2012