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11.10.12

क्या शादीशुदा औरतें बलात्कारियों से सुरक्षित होती हैं?-ब्रज की दुनिया


मित्रों,हरियाणा के खाप-पंचायतवाले और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री मान्यवर ओमप्रकाश चौटाला इन दिनों एक सर्वथा नए राग 'राग बालविवाह' का आलाप लेने में लगे हैं। इन लोगों को न जाने क्यों आजकल ऐसा लग रहा है कि अगर राज्य के दलित अपनी बेटियों का कम उम्र में विवाह कर दें तो वहाँ के जाट युवक उनका बलात्कार करना बंद कर देंगे,उनको अपनी माँ-बहन जैसी मानते हुए सम्मान देने लगेंगे और उनकी तरफ पलटकर देखना तो दूर उनके घरों की तरफ मुँह करके सोयेंगे भी नहीं। उनकी नजरों में सारे बलात्कारों और यौनापराधों का एक ही रामवाण ईलाज है कि दलित व अन्य लड़कियों का बालविवाह कर दिया जाए।
        मित्रों,बीमारी कुछ और है और ईलाज इन जाटों द्वारा कुछ और ही सुझाया जा रहा है। ये इस बात पर विचार नहीं कर रहे कि लगभग सारे मामलों में दलित लड़कियों के साथ ही दुष्कर्म की घटनाएँ क्यों घट रही हैं? क्या जाटों की लड़कियाँ नहीं होतीं या क्या वे उनकी शादी छुटपन में ही कर देते हैं? अगर जाटों के घर में भी लड़कियाँ जन्म ले रही हैं और उनकी शादी भी उनके जवान होने के बाद ही होती है तो फिर जाट युवक उनका बलात्कार क्यों नहीं करते? कहीं-न-कहीं ऐसा नहीं होने के पीछे दलितों के बराबरी के ख्याल को कुचल डालने की मानसिकता काम कर रही है। कुछ जाट सोंचते हैं कि दलितों की बहू-बेटियों के साथ बलात्कार कर दो जिससे उनके अन्दर हीनभावना घर कर जाए। चूँकि वहाँ के जाट काफी शक्तिशाली और संगठित हैं इसलिए दलित प्रतिकार में कुछ कर नहीं पाते और कई बार तो लज्जावश सपरिवार आत्महत्या भी कर लेते हैं। यहाँ तक कि वहाँ की सरकार चाहे वो काँग्रेस की हो या चौटाला की खाप-पंचायतों से डरती हैं और इनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं करतीं।
                         मित्रों,ताजा मामले में पीड़ित परिवार के जले पर नमक छिड़कने का काम किया है कांग्रेस अध्यक्षा कथित त्यागमूर्ति,करूणायतन सोनिया गांधी ने यह कहकर कि बलात्कार कहाँ नहीं हो रहा है? उनके अनुसार यह तो एक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समस्या है। संवेदनहीनता की हद है यह। इसलिए शायद दलित साहित्यालोचक भोगे हुए यथार्थ को देखे हुए यथार्थ से ज्यादा प्रामाणिक और महत्त्वपूर्ण मानते हैं। यही बात कुछ अलग अंदाज में जब बाबा रामदेव ने कह दी है तो पूरा कांग्रेस और उसकी पिट्ठू मीडिया आसमान को सिर पे उठाए जा रहा है। बाबा के बयान के विवाद में बलात्कार का मूल मुद्दा पृष्ठभूमि में चला गया है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था क्योंकि बाबा ने कुछ भी गलत नहीं कहा है। कुछ ऐसा ही बयान कभी कांग्रेस की वरिष्ठ नेता रीता बहुगुणा जोशी ने मायावती के लिए दिया था। तब तो कांग्रेस ने उनका बचाव किया था। क्या बाबा के बयान पर इसलिए हंगामा नहीं बरपा हुआ है क्योंकि सोनिया मायावती की तरह दलित न होकर प्रतिष्ठित नेहरू परिवार की बहू हैं?
                              मित्रों,वैसे सोनिया जी का कथन भी पूर्णतः असत्य नहीं है। सत्य है कि भारत में इस समय सर्वत्र बलात्कार की घटनाएँ घट रही हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर मामलों में बलात्कारी अपने रक्तसंबंधी ही होते हैं या फिर पास-पड़ोस के लोग होते हैं। लेकिन हरियाणा में तो जाति-विशेष की लड़कियों के साथ जाति-विशेष के लोग लक्ष्य करके ऐसी जघन्य घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। साथ ही हरियाणा में ऐसी घटनाओं की बारंबारता भी अन्य प्रदेशों से काफी ज्यादा है। अमूमन हर दो दिन पर एक दलित लड़की जाटों की कामुकता की शिकार हो रही हैं और कई बार तो शादीशुदा दलित महिलाओं को भी हवस का शिकार बनाया जाता है। इसलिए खाप-पंचायतों या चौटाला का फरमान या सुझाव एकदम वाहियात और हास्यास्पद है।
             मित्रों,अब इस बात पर विचार करते हैं कि ऐसी घटनाओं को रोका कैसे जाए? ऐसी घटनाओं को या तो समाज रोक सकता है या फिर सरकार। हम जानते हैं कि भारत में सबसे कम स्त्री-पुरुष अनुपात हरियाणा में ही है और उसमें भी जाटों में है। परिणामस्वरूप बहुत-से जाट लड़कों की शादी नहीं हो पाती और वे यौन-कुंठा के शिकार हो जाते हैं। फिर मौका मिलते ही दलित लड़कियों पर टूट पड़ते हैं। सबसे पहले तो वहाँ की खापों को भ्रूण-हत्या को रोकना होगा। यह काम सिर्फ वे ही कर सकते हैं सरकार से यह नहीं होगा। सरकार इस संबंध में जागरूकता जरूर पैदा कर सकती है। दूसरी बात बलात्कारियों के लिए सीधे मृत्युदंड की व्यवस्था की जाए और यह काम कर सकती है हमारी संसद। तीसरी बात बलात्कार के मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो और पीड़ितों को प्रशासन पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराए। चौथी बात कि केंद्र-सरकार सरकार-विरोधी वेबसाईटों पर रोक लगाने के बदले पौर्न-साईटों को प्रतिबंधित करे। आज भी इंटरनेट पर हजारों पौर्न-साईट मौजूद हैं जिनको देखकर कोई भी बहक सकता है। पाँचवीं बात कि हमें अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डालने चाहिए। इसके लिए खुद हमें उदाहरण बनना पड़ेगा। इसके साथ ही विद्यालयी-पाठ्यक्रम में भी नैतिक शिक्षा को पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए।
                   मित्रों,इस प्रकार अंततः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कम उम्र में दलित या अन्य लड़कियों की शादी कर देने से बलात्कार तो रूकेगा या कम होगा नहीं उल्टे उनकी जान पर बन आएगी और उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा। बलात्कारी उम्र या वैवाहिक-स्थिति देखकर बलात्कार नहीं करते बल्कि कई बार तो वे अपनी हवश अपनी माँ की उम्र की अधेड़ महिलाओं का भी बलात्कार कर पूरी करते हैं। इसलिए खाप-पंचायतों और चौटाला सरीखे नेताओं को बेसिरपैर की बातें नहीं करते हुए इस आलेख में बताए गए उन सुझावों पर विचार और अमल करना चाहिए जो तार्किक तो हैं ही सार्थक और सर्वहितकारी भी हैं।

पत्नी हो चाहे छाप अंगूठा, सास मगर गुणवान मिले

पत्नी हो चाहे छाप अंगूठा, सास मगर गुणवान मिले
स्विस बैंकों में खाते वाली मदर इन ला धनवान मिले
किस्मत हो मेरी ऐसी कि हिस्सा पाऊं एमएनसी में
हे प्रभु तुम्हारे गुण गाऊं जो माल मुझे आसान मिले
बोल प्रभु कुछ बोल आज, तू चमत्कार कुछ कर ऐसा
बस और मांग एक छोटी सी, संसद में भी स्थान मिले
- कुंवर प्रीतम
11-10-2012

कांग्रेस से ज्यादा भाजपा भयभीत है केजरीवाल से


जल्द ही नया राजनीतिक दल बनाने जा रहे अरविंद केजरीवाल भले ही लगातार दिल्ली सरकार व सोनिया गांधी के जवांई राबर्ड वाड्रा के बहाने कांग्रेस पर हमले बोलते जा रहे हों, मगर भाजपा उनसे ज्यादा भयभीत है। उसे डर है कि वे न केवल कांग्रेस विरोधी वोटों में, जो कि इस बार भाजपा को मिलने की उम्मीद थी, में हिस्सा बांटेंगे, अपितु भाजपा से निराश मतदाताओं में भी सेंध डालेंगे।
हिंदूवादी भाजपा केजरीवाल से कितनी भयभीत है, इसका अनुमान इस विश्लेषण के साथ दिए गए चित्र से, जो कि किसी हिंदूवादी ने फेसबुक पर लगाया है, से लगाया जा सकता है। जैसे ही यह चित्र फेसबुक पर लगा, टिप्पणियों का तांता लग गया। हिंदूवादियों ने केजरीवाल को न केवल भद्दी-भद्दी गालियां बकीं, अपितु उन्हें कांग्रेस व सोनिया का एजेंट तक करार दे दिया। इस बहसबाजी में बेचारे केजरीवाल समर्थक बार-बार शालीन भाषा में सफाई देते रहे, मगर हिंदूवादियों ने उन पर ताबड़तोड़ हमले जारी रखे।
असल में प्रतीत ये होता है कि जो केजरीवाल पहले कांग्रेस पर हमले बोलने के कारण भाजपा को बड़े प्रिय लग रहे थे और इसी वजह से भाजपाइयों ने उनका साथ दिया, वे ही जब दोधारी तलवार की तरह भाजपा पर भी हमले करने लगे तो भाजपाइयों को सांप सूंघ गया है। संघ व भाजपा ने टीम अन्ना का पीछे से साथ दिया ही इस कारण था कि जो काम वह खुद नहीं कर पाई, वह टीम अन्ना कर रही थी। जो माहौल भाजपा के दिग्गज लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा से नहीं बन पाया, वह टीम अन्ना ने खड़ा करके दिखा दिया। जाहिर सी बात है कि खुद भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी भाजपा स्वयं तो कांग्रेस के विरोध में सशक्त आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई, मगर बिना स्वार्थ के केवल देशभक्ति के लिए आंदोलन करने वाली टीम अन्ना ने वह माहौल खड़ा कर दिया, जिसका सीधा-सीधा लाभ भाजपा को होना था। तब तक इस बात की आशंका नहीं थी कि केजरीवाल अलग से पार्टी बनाएंगे, इस कारण भाजपा यही सोच रही थी कि वह टीम अन्ना के आंदोलन से बना कांग्रेस विरोधी माहौल अपने पक्ष में वोटों के रूप में भुना लेगी। मगर जैसे ही केजरीवाल टीम अन्ना से अलग हो कर नई पार्टी बनाने का उतारु हुए, भाजपा का सोचा हुआ प्लान बिगड़ गया। इतना ही नहीं केजरीवाल ने भाजपा को भी निशाने पर ले लिया। कोयला घोटाले में तो उन्होंने कांग्रेस व भाजपा को एक ही तराजू में तोल दिया। इससे बड़ा नुकसान ये हुआ कि जो भाजपा कांग्रेस के विकल्प के रूप में लोगों को स्वीकार्य थी, उस पर भी कालिख पुत गई। कांग्रेस तो चलो पहले से बदनाम थी, इस कारण कोयला घोटाले की कालिख से जहां सत्यानाश, वहां सवा सत्यानाश वाली कहावत की चरितार्थ हो रही थी, मगर दूध की धुली कहलाने वाली भाजपा की सफेद कमीज पर लगी थोड़ी भी कालिख उभर कर मुंह चिढ़ा रही है। इतने पर भी भाजपा ने सबक नहीं लिया। बिजली बिल को लेकर दिल्ली में चल रहे आंदोलन में भाजपा नेता विजय गोयल ने सदाशयता में केजरीवाल को मंच पर बुला लिया और केजरीवाल ने सिला ये दिया कि पलट कर भाजपा पर ही हमला बोल दिया। गोयल पछताए तो बहुत, मगर रोने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं था। इस घटना के बाद अब भाजपा बेहद सतर्क हो गई है।
इसी कड़ी में किसी भाजपाई ने फेसबुक पर मुहिम के रूप में यह चित्र शाया किया, ताकि हिंदूवादी वोट खिसक कर केजरीवाल की ओर न चले जाएं। इस चित्र पर प्रतिक्रिया करते हुए भाजपाइयों ने अनेक उदाहरण देते हुए केजरीवाल को कांग्रेस जैसा ही सेक्युलर कुत्ता करार दिया। ये बहस इतनी घटिया स्तर पर हो रही है कि उसमें प्रयुक्त शब्दों का उल्लेख तक करना मर्यादा के खिलाफ प्रतीत होता है।
कुल मिला कर सच ये है कि कांग्रेस व भाजपा को एक जैसा बताने की कोशिश में केजरीवाल कांग्रेस से ज्यादा नुकसान भाजपा को पहुंचा रहे हैं। आगे आगे देखें होता क्या है?
-तेजवानी गिरधर

10.10.12







मुमकिन है नीलामी में घर अपना भी लग जाए
हमने दरवाजे पर अपना भारत नाम लिखा रक्खा है

भक्त कृष्ण का कैसा है जो मिलता नहीं सुदामा से
पहरेदारों को भी उसने सच औ झूठ सिखा रक्खा है

पूरा कुनबा लूट रहा है, पर वजीर मुंह कैसे खोले
मैडम ने उनको बापू का बंदर तीन दिखा रक्खा है

नब्ज देखकर रोग बताते आए अपने बैद मगर
उनने बाहर के बैदों को अपना रोग बता रक्खा है

बिना काम बिन धंधे दौलत बेहिसाब बढ़ती है उसकी
कुंवर सियासतदां ने अपना स्विस में माल छिपा रक्खा है

उन पर कौन उठाए उंगली, डाले उन पर कौन नकेल
मुंसिफ ने अपने दफ्तर में कौव्वा एक बिठा रक्खा है

-कुंवर प्रीतम
10-10-2012

राजनीतिक पार्टी संबंधी कानूनों में हो सुधार-ब्रज की दुनिया

मित्रों,अभी कुछ दिनों पहले ही भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की आमदनी के बारे में अखबारों में पढ़ने को मिला। देखकर मेरी आँखें फटी-की-फटी रह गईँ। हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होए। तेल भी नहीं लगता और पूड़ी भी पकती जाती है,पकती जाती है। कहना न होगा आज राजनीति भी एक व्यवसाय है जिसमें शुरू में जनता में विश्वास बनाना पड़ता है और कुछ पैसा अपने पास से भी लगाना पड़ता है। एक बार पार्टी जनता के बीच स्थापित हो गई फिर तो बीसों ऊंगलियाँ घी में और सिर चाशनी की कड़ाही में। पारिवारिक वर्चस्व के चलते आज सारे दल चापलूसी के बेहतरीन अड्डे बन गए हैं। कोई भी नेता अपने पार्टी-नेतृत्व के खिलाफ जुबान ही नहीं खोल पाता। विरोध करते ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। क्या इस तानाशाही को लोकतंत्र का नाम दिया जा सकता है? जब पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है तो वे क्या खाकर देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक-संस्कृति को मजबूत करेंगी?
मित्रों,बैठे-बिठाये इतनी आमदनी तो शायद भारत के सबसे बड़े धनकुबेरों को भी नहीं होती होगी जितनी आज हमारे राजनीतिक दलों को हो रही है। आमदनी भरपूर और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि 20000 रूपये से कम प्राप्त चंदे का विवरण देना भी आवश्यक नहीं और इस पर भी वे पूरा और सही विवरण नहीं देती हैं। कोई 10 प्रतिशत आमदनी का विवरण दे रहा है तो कोई 40 प्रतिशत का और कानून और न्यायालय फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं,क्यों? जब केजरीवाल अपने दल का आय-व्यय बताने को तैयार हैं तो अन्य पार्टियों को क्या परेशानी है और क्यों है? यह 20000 रूपये वाली सीमा भी सिर्फ जनता को धोखा देने के लिए है। अगर कोई 20000 रूपये की 20000 किस्तों में पैसा दे तो या फिर इस तरह ही चंदे की रकम दर्ज की जाए तो? इसलिए इन दलों के लिए एक-एक पैसे का हिसाब देना अनिवार्य किया जाए। पार्टियाँ बातें तो आम आदमी की करती हैं और काम पूंजीपतियों का करती हैं। उनको बताना ही चाहिए उनके खजाने में पैसा कहाँ से आता है। वे कौन-से लोग हैं जो उनकी पार्टी के फंड में करोड़ों-करोड़ रुपए देते हैं और क्यों देते हैं? इसके बदले में धनपतियों को क्या मिला,पार्टी ने क्या दिया तभी तो सामने आ पाएगा? दोनों मुद्दे एक-दूसरे से अंतर्गुंथित हैं। करोड़ों रुपए पार्टी फंड में देनेवाले पूंजीपति ऐसा कोई परोपकार की भावना से नहीं करते हैं बल्कि उनकी कुछ-न-कुछ बदले में पाने की उम्मीद लगी रहती है फिर चाहे लाभार्थी दल सत्ता में हो या विपक्ष में। सत्ता में हुआ तो वह धनपति को सीधे लाभ पहुँचाने की स्थिति में होता है जैसे बाड्रा और हरियाणा सरकार या फिर कोयला आबंटन में टाटा,अंबानी और जिंदल को प्राप्त लाभ का उदाहरण भी हम ले सकते हैं और अगर विपक्ष में हुआ तो फिर मंत्री को सिफारिशी पत्र तो लिख ही सकता है जैसा पिछले दिनों गडकरी ने संचेती के लिए लिखा। इतना ही नहीं कई बार तो धनपति राजनीतिक दलों को पैसा देकर सीधे लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य ही बन जाते हैं जैसे अनिल अंबानी या विजय माल्या। वैसे हमारे कई परंपरागत नेता भी अब उद्योगों और व्यापार में हाथ आजमाने में पीछे नहीं हैं। चाहे वे दिवंगत विलासराव देशमुख हों या शरद पवार हों या फिर कमलनाथ जी हों। जाहिर है ये लोग भी सरकार में रहते हुए सरकार की नीतियों को अपने व्यापार के हितार्थ प्रभावित करते ही होंगे और बदले में पार्टी फंड में अपना अमूल्य योगदान भी करते होंगे।
         मित्रों,राजनीतिक दलों के लिए आय के स्रोत के साथ-साथ उन्होंने चंदे से प्राप्त धन का व्यय कहाँ-कहाँ किया यह बताना भी कानूनन जरूरी बनाया जाए। हवाई-यात्रा पर खर्च कर दिया या 8000 रूपये प्रति प्लेट वाला खाना खाया गया या पार्टियों और चुनावों के समय दारू की नदी बहा दी गई या इनका दुरूपयोग वोट खरीदने में किया गया? 'माल महाराज के मिर्जा खेले होली' बहुत दिन चल गया अब नहीं चलने वाला है,किसी भी कीमत पर नहीं। वोट हमारा काम तु्म्हारा आखिर कहाँ का न्याय है?
          मित्रों,क्या विडंबना है कि लगभग पूरा देश,पूरा शासन-प्रशासन आरटीआई के दायरे में है और शासन-प्रशासन को चलानेवाले दल ही इसके दायरे में नहीं हैँ। जबकि उनके बारे में जानने का जनता का अधिकार तो और भी ज्यादा है? जनता के लिए य़ह जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है कि वे जिन राजनीतिक दलों को वोट दे रहे हैं वे कर क्या रहे हैं? कहीं वे लेन-देन की दुकान तो नहीं बन गए हैं?
           मित्रों, जैसा कि हम इस आलेख की शुरुआत में भी अर्ज कर चुके हैं कि आज लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपू्र्ण ईकाई राजनीतिक पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है। भाजपा और साम्यवादी दलों को छोड़कर सारे दल पारिवारिक कंपनियों की तरह हैं। पार्टियों का दुकानों में बदल जाना और वो भी खानदानी दुकानों में किसी भी तरह से भारतीय लोकतंत्र की प्रगति की दिशा में स्वस्थ गतिविधि नहीं है। जब जी चाहा पार्टी का संविधान बदल दिया। यह अधिकार उनको दिया ही क्यों गया है और कैसे दिया जा सकता है? इन दलों के हित सिर्फ इनके व्यक्तिगत हित नहीं हैं बल्कि इनसे हमारे देश और प्रदेशों के हित भी प्रभावित होते हैं,जुड़े हुए हैं। हमारे देश में एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जिससे सारे दलों के लिए एक समान नियम हों। जैसे कि पार्टी के पंजीकृत-कार्यकर्ता सीधे पार्टी-पदाधिकारियों का चुनाव करें। जैसे कि कोई व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार एक या दो बार से ज्यादा एक ही पद को धारण नहीं कर पाए। ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ प्राचीन काल में भी थी। संगम काल में या चोल-शासन में तमिलनाडु में स्थानीय-निकायों में एक ही व्यक्ति या उसका रक्त-संबंधी लगातार दो सालों तक एक ही पद के लिए चुना नहीं जा सकता था। ऐसा नहीं होता था कि खुद पद से हटना पड़े तो भाई,लड़के या पत्नी को बिठा दिया। जब ऐसा प्राचीन काल में हो सकता था तो अब ऐसा क्यों संभव नहीं है?
मित्रों,सिर्फ व्यवस्था बना देने से भी कुछ नहीं होगा यह भी देखना पड़ेगा कि नियमों-उपनियमों का अनुपालन हो भी रहा है कि नहीं। तो इसके लिए या तो चुनाव आयोग को ही अधिकृत कर दिया जाए या ज्यादा अच्छा हो कि किसी पूरी तरह से स्वायत्त-निकाय की स्थापना की जाए जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो और जिसकी चयन समिति में न तो सरकार का बहुमत हो और न तो अन्य राजनीतिक दलों का ही। इसके साथ ही नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने पर पार्टियों के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए और उनके प्रमुख नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
मित्रों,आर्थिक सुधारों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं ये प्रस्तावित और विलंबित सुधार क्योंकि इन सुधारों पर ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है न कि आर्थिक सुधारों पर। दलों के संचालन और नियंत्रण के मामले में पारदर्शिता लाना जरूरी ही नहीं महाजरूरी है क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही देश-प्रदेश में भ्रष्टाचार और धनिकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। इसके चलते ही राजनीति आज एक गंदी गाली बनकर रह गई है। इस तरह के ऐहतियाती उपायों के बावजूद अगर धनपति चाहें तो पार्टी फंड में पैसा नहीं देकर उसी तरह से पार्टी नेतृत्व को लाभ पहुँचा सकते हैं जैसा कि वाड्रा के मामले में डीएलएफ ने किया फिर भी इससे काफी हद तक राजनीति के क्षेत्र से गंदगी को साफ करने में मदद मिल सकेगी, इसमें सन्देह नहीं। इन उपायों को लागू करने के लिए अगर संविधान में हजारों संशोधन भी करना पड़े,यहाँ तक कि संविधान को ही फिर से लिखना पड़े तो वह भी किया जाए क्योंकि ऐसा किए बिना राह से भटके हुए भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाया ही नहीं जा सकता।

राष्ट्रीय दामाद से पंगा? (व्यंग गीत)





(Google Images)

In practice, a banana republic is a country operated as a commercial enterprise for private profit, effected by the collusion (मिलीभगत) between the State and favoured monopolies, whereby the profits derived from private exploitation of public lands is private property, and the debts incurred are public responsibility.




राष्ट्रीय  दामाद  से  पंगा? (व्यंग गीत) 

अरे    मूर्ख,   राष्ट्रीय   दामाद  से   क्यूँ   लिया   तुने   पंगा..!

लगता  है, `बनाना   रिपब्लिक` अनादि  से   है  भिखमंगा..!

(अनादि= अनंत )


१.


मंत्रीजी   उवाच,   `पुरानी   पत्नी   वो   मज़ा   नहीं   देती ?`

सच  होगा  शायद, साबित  हो गया  शौहर   घोर  लफंगा ?

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!


२.


मंत्रीजी  उवाच,`उनके   लिए  हमारी   जान भी   हाज़िर   है ?` 

सच    कहा,  सारा   देश   मरता  है  तो   मरे,  भूखा-नंगा..!

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!


३.


यहाँ   कौन   करेगा   जांच,  राष्ट्रीय    रद्दी   दामादों   की ?  

सुना  है, उनके  मन-मंदिर से  ज़्यादा  शौचालय  है  चंगा ?

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!

(रद्दी=  अनुपयोगी)


४.


देश  की   बरबादी   का   दूसरा  नाम  रख   दो `इतालिया` ?

फिर, बिना  शरम  कहो,  मेरे  अलावा  पूरा   देश   है  नंगा..! 

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!

(इतालिया= चारागाह= वह भूमि जो पशुओं के चरने के लिए खाली छोड़ दी गई हो । http://goo.gl/GkvaE )


नोट-  अ..रे.., बुरा  मत  मानना, आप  मज़ाक  भी  नहीं  समझते  क्या? 


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०९-०९-२०१२.


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MARKAND DAVE
http://mktvfilms.blogspot.com   (Hindi Articles)

"कोशिश  कीजिये  कि जिन्दगी में  वो शख्स आपको हमेशा मुस्कराता हुआ मिले .......... जिसे आप रोज आईनों में देखते  हो "........

सुप्रभात दोस्तो .................

9.10.12

जिज्ञासा(JIGYASA) : पॉल एलैन

जिज्ञासा(JIGYASA) : पॉल एलैन: माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक पॉल एलैन का कहना है वो अंतरिक्ष में जाने वाले मालवाहक रॉकेट और मशीनी रुप से नियंत्रित होने वाले रॉकेट बनाएंगे. य...

8.10.12

गूंगी जनता, बहरे हाकिम और अरविन्द केजरीवाल-ब्रज की दुनिया

मित्रों,ज्यादा दिन नहीं हुए जब अरविंद केजरीवाल ने टीम अन्ना की घोषित नीति के विपरीत एक नए राजनीतिक दल के गठन की घोषणा की थी और मैंने उन्हें बाँकी नेताओं जैसा धोखेबाज और सत्तालोलुप मानकर उनका सख्त विरोध और आलोचना की थी.बाद में जब मैंने खुद को अरविंद के स्थान पर रखकर उनके समक्ष उपस्थित विकल्पों पर विचार किया तो लगा कि अरविंद के सामने और कोई विकल्प था ही नहीं.आखिर वे कब तक यूँ ही अनशन पर अनशन किए जाते जबकि देश का कोई भी राजनीतिक दल उनकी मांगों पर कान तक देने को तैयार नहीं था। वैसे भी अगर किसी गंदे तालाब को साफ करना है तो हमें उसमें उतरना तो पड़ेगा ही। अब जबकि अरविन्द राजनीति के अखाड़े में उतर ही चुके हैं तो क्यों नहीं हमें उनका समर्थन करना चाहिए। हम सिर्फ देश की भलाई चाहते हैं और मुझे नहीं लगता है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में हमारे समक्ष उनसे अच्छा कोई विकल्प है भी। हमें उनका साथ देना चाहिए तो क्यों देना चाहिए? हमें अरविन्द केजरीवाद का साथ इसलिए देना चाहिए क्योंकि सिर्फ कोरे नारे नहीं हैं उसकी झोली में। उसके पास भारत के नवनिर्माण का पूरा खाका है जो अन्य दलों के पास नहीं है.उनके अलावा ऐसा कोई दल या नेता नहीं जो समग्रता में यथास्थिति को बदलने का वादा भी करता हो और माद्दा भी रखता हो। उनके अलावा ऐसा कोई दल या नेता नहीं जो जनता के दुःख को अपना दुःख समझे और उसके लिए आंदोलन करे,लड़े। आज का सत्ता पक्ष तो आर्थिक-सुधारों के नाम पर देश को देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हाथों बेच ही रहा है आज का विपक्ष भी मतिभ्रष्ट और पथभ्रष्ट है। आज का विपक्ष अनशन नहीं करता,धरने पर नहीं बैठता.एसी से बाहर आते ही उसके नेताओं को गर्मी लगती है इसलिए वह सिर्फ पूर्णवातानुकूलित संसद में हंगामा करता है और टीवी पर बयान देता है.भ्रष्टाचार और अर्थव्यवस्था पर उसकी नीतियाँ बिल्कुल वही हैं जो सत्ता पक्ष की हैं। आज देश के साम्यवादी चिथड़ा ओढ़कर घी पी रहे हैं। हर कंपनी में यूनियन लीडर प्रबंधन से मिले हुए हैं और इस तरह मजदूरों के हितों का सौदा किया जा रहा है। आम आदमी परेशान है कि वह किसे वोट दे. बाँकी सबके सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। हमें क्यों यकीन करना चाहिए अरविंद केजरीवाल पर क्योंकि हमारे सामने और कोई विकल्प ही नहीं है? क्योंकि अगर हम सचमुच देश का और आम आदमी का भला चाहते हैं तो हमारे सामने विकल्पहीनता की स्थिति है। क्योंकि बाँकी जो भी विकल्प हैं उनको हम पहले भी आजमा चुके हैं। हमें अरविन्द केजरीवाद का साथ क्यों देना चाहिए क्योंकि वह सिर्फ बातें नहीं बनाता उस पर अमल भी करता है,लड़ता भी है,वह जेल जाने से नहीं डरता,वह डॉइंग रूम राजनीति नहीं करता? क्योंकि बाँकी दल भ्रष्टाचार के दलदल हैं और अरविंद की पार्टी नए विचारों,नई सोंच और नई ताज़गी से ओतप्रोत है। अगर उसको उद्देश्य प्राप्ति में आधी सफलता भी मिल जाए तो वह अपने आपमें किसी क्रांति से कम नहीं होगी। हमें अरविन्द केजरीवाद का साथ क्यों देना चाहिए क्योंकि बाँकी दल देश को बेचने में लगे हैं और अरविंद ने अब तक ऐसा नहीं किया है। क्योंकि अरविन्द सिर्फ दिखावे के लिए दलित लीलावती या कलावती की झोपड़ी में नहीं जाते हैं बल्कि वे जाते हैं उसका दुःख बाँटने और उसकी लड़ाई लड़ने,उसके घर की कटी हुई बिजली को जोड़कर जेल जाने। क्योंकि अरविन्द न तो नेता लगते हैं और न ही अभिनेता की तरह व्यवहार करते हैं बल्कि वे हमें अपने बीच के लगते हैं,अपने बीच से लगते हैं.
                             मित्रों,हमें अरविन्द केजरीवाद का साथ क्यों देना चाहिए क्योंकि बाँकी दलों के पास आम आदमी और गरीबों के लिए योजनाएँ तो हैं लेकिन उस भ्रष्टाचाररूपी कालियानाग को नाथने का जज्बा नहीं है जो कि खजाने से निकले 1 रुपये का 90 पैसा गड़प कर जाता है.हमें अरविन्द केजरीवाद का साथ क्यों देना चाहिए क्योंकि जहीं बाँकी सारे दलों और नेताओं की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है और अरविंद का ध्यान आज भी इस देश की व्यवस्था को बदलने पर है.क्योंकि वह जाति-पाति और धर्म-मज़हब की नहीं बल्कि एक आम हिंदुस्तानी की बात कर रहा है.कब तक हम चुके हुए और आजमाए हुए,भ्रष्ट सिद्ध हो चुके प्यादों पर दाँव लगाते रहेंगे और क्यों?क्यों??? हम कब तक यथास्थितिवादी दलों और नेताओं को अपना मत-दान करते रहेंगे और क्यों? हो सकता है कि अरविन्द भी भविष्य में भ्रष्ट निकले लेकिन हो तो इसका उल्टा भी सकता है और तब अपने बिगड़े हुए भविष्य के लिए कौन दोषी होगा?  हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि हम जैसा होते हैं हमें सरकार और शासन भी वैसा ही मिलता है-यू गेट द गवर्नमेंट यू डिजर्व। इसलिए आइए और अरविंद का साथ दीजिए,उनका हौसला बढ़ाईए और हर तरह से उनका हाथ मजबूत करिए। जय हिंद।।।


आइए कुछ गुफ्तगू अब मुल्क पर करते चले
अपनी ताकत साथ लेकर दिल्ली को बढ़ते चलें

रहनुमाओं से नहीं उम्मीद कोई अब बची
खुद लड़ेंगे जंग अपनी, आइए कहते चलें

साठ-पैंसठ साल से सहते रहे, कितना सहें
जोर धक्का सल्तनत को आइए देते चलें

जख्म छोटा था, मगर नासूर सा अब बन गया
मरहम-पट्टी छोड़िए, इंजेक्शन लेते चलें

टूजी, थ्रीजी और जीजा जी के करतब वाह-वाह
धतकरम वालों का किस्सा खत्म अब करते चलें

-कुंवर प्रीतम
8-10-2012




आइए कुछ गुफ्तगू अब मुल्क पर करते चले
अपनी ताकत साथ लेकर दिल्ली को बढ़ते चलें

रहनुमाओं से नहीं उम्मीद कोई अब बची
खुद लड़ेंगे जंग अपनी, आइए कहते चलें

साठ-पैंसठ साल से सहते रहे, कितना सहें
जोर धक्का सल्तनत को आइए देते चलें

जख्म छोटा था, मगर नासूर सा अब बन गया
मरहम-पट्टी छोड़िए, इंजेक्शन लेते चलें

टूजी, थ्रीजी और जीजा जी के करतब वाह-वाह
धतकरम वालों का किस्सा खत्म अब करते चलें

-कुंवर प्रीतम
8-10-2012



7.10.12

जिज्ञासा(JIGYASA) : इलियाना डीक्रूज

जिज्ञासा(JIGYASA) : इलियाना डीक्रूज: इलियाना के मुताबिक उनकी पहचान तेलुगु सिनेमा के कारण है और वे तेलुगु सिनेमा भी करती रहेंगी, लेकिन अब बॉलीवुड पर भी उनकी नजर है. ‘बर्फी’ के ह...

हाथ की लकीरें । (गीत)



हाथ  की   लकीरें । (गीत)


http://mktvfilms.blogspot.in/2012/10/blog-post.html


सरगोशी   कर    रही    है,   हाथ   की   लकीरें, 

लगता   है,   तुम     यहीँ  कहीँ    आसपास   हो..!

मुस्कुरा     रही    है,  मेरे   दिल   की   धड़कन,

कहती   है,   तुम    मेरे   बहुत   खास-खास   हो..!

(सरगोशी = कानाफूसी )


अंतरा-१.


अटक  गया था   हलक़ में, जुदाई  का  वो  सबब,

आस  है  अब  कि  शाद,   दिल  का  आवास   हो..!

लगता    है,   तुम     यहीँ  कहीँ   आसपास   हो..!


( हलक़= कंठ; शाद =भरापूरा )


अंतरा-२.


इतने  क़रीब   कभी  न  थे, जब  हम  क़रीब  थे,

फिर  क्यूँ   लगा  ऐसा,  तुम  अब भी   उदास  हो..!

लगता   है,   तुम    यहीँ   कहीँ   आसपास   हो..! 


अंतरा-३.


मसल  दो,  चाहो  तो  दिल  की  मुराद  को, पर, 

चुभेगा    दग़ा    जैसे,   कोई   अगम   फाँस   हो..!

लगता   है,   तुम     यहीँ  कहीँ   आसपास   हो..!


(अगम= समझ से परे । )


अंतरा-४.


अपत   होता   है   दिल,  जब   मिलता   हूँ   तुम्हें,

सुकून  इतना  है  कि, तुम  दिल के  लिबास  हो..!

लगता   है,   तुम     यहीँ  कहीँ    आसपास   हो..!

(अपत =वस्त्रहीन; लिबास= पोशाक)


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०६-०९-२०१२.

-- 
MARKAND DAVE
http://mktvfilms.blogspot.com   (Hindi Articles)


कितनी आसानी से सबको टोपी पहना देता है
जालिम दिल्ली वाला दिल सबको बहला देता है

जेब से लेकर चूल्हे तक सब पर पहरेदारी है
जली रोटियां खाने बैठो, वह भी मंगवा लेता है

एक पहेली आज तलक समझ न पाया हिन्दोस्तां
सत्ता में आते ही नेता झोली भरवा लेता है

चिकना चाबुक पीठ के पीछे, और लबों पर मीठे बोल
भारत मां को गैर की खातिर गिरवी रखवा देता है

-कुंवर प्रीतम
7-10-2012



6.10.12

भारतीय लोकतंत्र को गाली जनवितरण प्रणाली-ब्रज की दुनिया

मित्रों,उस समय हम सिर्फ 8-9 साल के थे और अपने ननिहाल जगन्नाथपुर में रहते थे। यहाँ मैं यह भी बता दूँ कि भारत के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री श्री रघुवंश प्रसाद सिंह का गाँव शाहपुर इस गाँव की चौहद्दी में आता है और दोनों गाँव एक ही पंचायत गोरीगामा के अंतर्गत आते हैं। मैं तब अक्सर जनवितरण प्रणाली की दुकान जाया करता था। दुकानदार थे हरपुर फटिकवारा के अशोक कुमार सिंह। वे सिर्फ होली-दीवाली में ही तेल-चीनी बाँटते थे और कुछेक को छोड़कर किसी भी ग्राहक को पूरा सामान नहीं देते थे। विरोध करने पर कहते कि जहाँ भी आवेदन या शिकायत करनी हो शौक से करिए मैं तो इसी तरह से तेल-चीनी बाटूंगा। इतना ही नहीं वे कभी-कभी वे ग्राहकों के साथ गाली-गलौज भी कर डालते थे। बाद में जब मेरा परिवार महनार बाजार में रहने लगा तब मुझे यह देखकर और जानकर घोर आश्चर्य हुआ कि वहाँ के जनवितरण प्रणाली दुकानदार तो हर महीने किरासन तेल बाँटते हैं। तभी मैंने यह भी जाना कि कोटा का सामान हर महीने आता है न कि सिर्फ पर्व-त्योहारों में। तब तक एपीएल के लिए चीनी का वितरण भारत सरकार ने बंद कर दिया था।
              मित्रों,शहरों में तब की तरह आज भी जनवितरण प्रणाली के दुकानदार प्रत्येक महीने वस्तुओं का वितरण करते हैं और गाँवों में भी आज भी हालत बिल्कुल भी नहीं बदली है। पूरे बिहार में शायद ही किसी गाँव का कोई ऐसा जनवितरण प्रणाली का दुकानदार होगा जो प्रत्येक माह वस्तुओं का वितरण करता होगा। साल में छह महीने भी वितरण हो जाए तो ग्राहक डीलर को सद्बुद्धि देने के लिए भगवान को धन्यवाद कहना नहीं भूलता। क्या विडंबना है कि जहाँ हर माह वितरण की सख्त जरूरत है वहाँ पर वितरण नहीं किया जाता और जहाँ कम आवश्यकता है वहाँ प्रत्येक माह वितरण किया जाता है।
              मित्रों, इसी बीच एक समय वह भी आया जब शहरों के डीलरों की माली हालत काफी बिगड़ गई थी। महीनेभर का काम और कमीशन बहुत कम और वितरण ही प्रत्येक माह करना है। जॉब फुलटाईम का और आमदनी मामूली। उस समय सिवाय किरासन के और कुछ उनको वितरित करने के लिए दिया भी नहीं जाता था। महनार के डीलर जयकिशुन महतो गवाह हैं कि उस समय मैं अक्सर अपना तेल उनको ही दे दिया करता था। वैसे तब असर तो ग्रामीण डीलरों पर भी पड़ा था लेकिन अपेक्षाकृत काफी कम क्योंकि वे तब और भी ज्यादा महीने के किरासन की कालाबाजारी करने लगे थे। फिर आई केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार और अन्त्योदय योजना के द्वारा बीपीएल-एपीएल परिवारों तक अनाज पहुँचाने की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई जनवितरण प्रणाली के दुकानदारों को। फिर तो खासकर ग्रामीण डीलरों की पौ बारह ही हो गई। जब जी चाहा सामान बाँटा और जब जी चाहा बेच दिया। धीरे-धीरे भ्रष्टाचार की असीम अनुकंपा से बीपीएल परिवारों की संख्या भी बढ़ती गई और अंत में स्थिति यहाँ तक आ पहुँची कि गाँवों में गरीबों से ज्यादा अमीर बीपीएल हो गए यानि गरीब हो गए। कोई-कोई तो सारा गाँव ही बीपीएल हो गया चाहे किसी की आमदनी हर माह लाखों में ही क्यों न हो। परिणाम यह हुआ कि वितरण के लिए आबंटित अनाज और चीनी-किरासन मात्रा में भी विस्फोटक वृद्धि होती गई और वृद्धि होती गई तद् नुसार ग्रामीण डीलरों की आमदनी में भी।
                       मित्रों,इसी बीच वर्ष 2001 ई. में बिहार में पंचायती राज लागू हो गया और इसके चलते इस भ्रष्टाचार से प्राप्त मुनाफे के कई नए हिस्सेदार ही पैदा हो गए। पहले जहाँ सिर्फ आपूर्ति निरीक्षक या बीडीओ को ही चढ़ावा चढ़ाना पड़ता था अब मुखिया,पंचायत-सचिव, पंचायत समिति सदस्य भी हिस्सेदार बनने लगे। लेकिन तेल पिलावन,गेहूँ-चावल-चीनी बेचावन का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। हमारे पैतृक गाँव जुड़ावनपुर बरारी की वयोवृद्धा डीलर और मेरी पड़ोसन रामसखी कुँवर के पुत्र सुरेश मिश्र आज भी साल में बमुश्किल 4 महीने ही वस्तुओं का वितरण करते हैं जबकि पूरे बिहार में कोटा के सामान की कालाबाजारी रोकने के लिए कूपन प्रणाली लागू कर दी गई है। प्रावधान यह है कि ग्राहक जितने महीने की सामग्री प्राप्त करेगा उतने ही कूपन डीलर को देगा लेकिन होता यह है कि डीलर एक महीने का सामान देकर ग्राहक से कई महीने का कूपन ले लेता है। शिकायत भी की जाती है,जाँच भी होती है,कभी-कभी डीलर निलंबित भी किए जाते हैं। परन्तु ऐसा बहुत-ही कम मामलों में होता है। अधिकतर मामलों में तो आपूर्ति-निरीक्षक पैसे लेकर तत्काल डीलर के पक्ष में रिपोर्ट दे देता है। जहाँ तक मुझे पता है खुद मेरे पड़ोसी डीलर रामसखी कुँवर (सुरेश मिश्र) के खिलाफ भी पिछले दिनों 2 बार जाँच हो चुकी है और ग्रामीणों के मौके पर मुखर आरोप लगाने के बावजूद उसे निलंबित तक नहीं किया गया। निलंबित डीलरों से भी कुछ रिश्वत प्राप्त करने के बाद उनकी अनुज्ञप्ति पुनः बहाल कर दी जाती है और एक बार फिर से कालाबाजारी का खुल्लमखुल्ला खेल शु्रू हो जाता है। किरासन तेल या तो सीधे पेट्रोल पंप वाले मिलावट के लिए खरीद लेते हैं या फिर किसी बिचौलिये के हाथों बेच दिया जाता है। गेहूँ पहुँच जाता है आटा-कंपनियों या स्थानीय आटा-मिल मालिकों के पास और चावल अगर घटिया हुआ तो बाँट दिया जाता है और अगर उत्तम श्रेणी का हुआ तो डीलर खुद ही अपने खाने के लिए रख लेता है या फिर किराना दुकानदार के हाथों या आटा मिल-मालिकों के हाथों (वे इसे गेहूँ के साथ पीस डालते हैं और ग्राहक परेशान रहता है कि रोटी अच्छी बन क्यों नहीं रही) बाजार-मूल्य से काफी कम कीमत पर बेच देता है और फिर भी दोनों ही पक्ष सरकारी सब्सिडी की कृपा से भारी मुनाफे में रहते हैं।
                        मित्रों,इन दिनों बिहार के गाँवों में कूपन को लेकर भी काफी दाँव-पेंच लगाए जा रहे हैं। कूपन-वितरण के समय कई बार मुखिया-समर्थक गुंडा-तत्त्व दूसरे ग्राहकों के कूपन लूट लेते हैं या येन केन प्रकारेण प्राप्त कर लेते हैं और फिर सालभर उसके बल पर दारू-मछली उड़ाते हैं। वास्तविक उपभोक्ता अपना कूपन वापस पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाता है और अंततः मन मारकर बैठ जाता है। ऐसा खुद मेरे परिवार के साथ भी जुड़ावनपुर बरारी में पिछले सालों में कई बार हो चुका है। इस साल भी कूपन तो मिल गया है लेकिन यह पता नहीं चल पा रहा है कि वर्तमान में हमारा कोटा किस डीलर के पास है। हमारी जानकारी के बिना और बिना हमारी सम्मति के मेरा कोटा बदल कैसे गया और कैसे बदल दिया गया आश्चर्य का विषय है।
                             मित्रों,पिछले कई वर्षों से मैं सुन रहा हूँ और सिर्फ सुन रहा हूँ कि अब जनवितरण प्रणाली के माध्यम से दी जानेवाली सब्सिडी की राशि सीधे उपभोक्ताओं के खाते में जमा कर दी जाएगी। इस बीच मैंने कई डीलरों को करोड़पति बनते और कई गरीबों को भूख से तड़पते भी देखा है। बिहार और केंद्र की सरकार को चाहिए कि या तो वह जनवितरण प्रणाली की सब्सिडी की राशि को सीधे नागरिकों के खाते में जमा करने की योजना को युद्धस्तर पर अभियान चलाकर शीघ्रातिशीघ्र लागू करे या फिर गरीबों का सच्चा हमदर्द और भ्रष्टाचार का वास्तविक शत्रु बनने या दिखने का झूठा नाटक करना बंद कर दे। ऐसी भ्रष्ट वितरण प्रणाली को बनाकर-बचाकर रखने या इस तरह की दिखाऊ सब्सिडी देते रहने का कोई मतलब नहीं है जिसके लाभ का 12 आना प्रत्येक माह सीधे डीलरों और अन्य भ्रष्टाचारियों की जेब में पहुँच जाए। सरकार चाहे राशन-कार्ड पर सब्सिडी वाले सामानों का वितरण कराए या कूपन के माध्यम से उसके सामने हर बार एक ही चिर अनुत्तरित प्रश्न खड़ा होनेवाला है-हू विल गार्ड द गार्ड?

facts and opinion.....: The country is facing acute power shortage and its...

facts and opinion.....: The country is facing acute power shortage and its...: The country is facing acute power shortage and its per capita consumption is one of the lowest. 75 % of the electricity is generated by burn...


प्यार-मोहब्बत दुनिया वालो, बेमतलब बेमानी है
तू दीवाना जिसका है वो और किसी की दीवानी है
मीरा भी तो दीवानी थी, पागल थी कान्हा के पीछे
लेकिन कान्हा ने मीरा की व्यथा कहां पहचानी है
-कुंवर प्रीतम
6-10-2012


हर दस्तक पर कान टिकाए आखिर कब तक रहते हम
पूछ रहे थे लोग व्यथा, पर आखिर किससे कहते हम
इन्तजार की हदें तोड़कर जख्मी, पागल तक कहलाए
दुनिया भर के ताने-वाने आखिर कब तक सहते हम
-कुंवर प्रीतम
6-10-2012

5.10.12

रिक्सावाला जाएगा ....




ऐ रिक्सा.....
हां बाबू,
जाएगा..?
हां बाबू
जाएगा तो चल।
कितना लेगा
बीस टाका बाबू,
क्या..?
बीस...माथा खराब है
नहीं बाबू,
बाजार खराब है
सतुओ के जुगाड़ नइखे...
पंद्रह लेगा...?
नहीं मालिक...पोसाता नहीं है
भोरे से खटता है
दू मुठा भात का जोगाड़ नहीं है..
तउना पर बाल-बच्चा गांव में
किकियाता है।
बारिश-बूनी पड़ता है,
बजार एकदम्मे बइठ गईल बा बाबू..

हुम्म...
सामने पूजा है...बाजार हाट कुच्छो नहीं होगा
हम लोग्गो को तनखा-बोनस थोड़े कोई देता है
रोज कूआं खोदता है त पानी पीता है...
अच्छा अपना कहानी बंद करो...
माथा खाराब मात कोरो...
बोलो ठीक से, कितना लेगा...?
मालिक बीस ठो दीजिएगा त तुरंते चहुंपा देब...
बीस ठो से कम का लेगा...!
चल सतरह टाका देगा
ना बाबू...
जाओ...आर जेते होबे ना...
(जाओ...जाना नहीं है)

......अल्पविराम....

ऐ...टैक्सी...टैक्सी.....
हाथी बागान.........जाबे (जाएगा)
तिरीश टाका (तीस रुपया) एक्स्ट्रा लागबे...
(टैक्सी वाला भागने की फिराक में)
अरे बाबा...दांडा़ओ...दांड़ाओ.. (रोको..रोको)
गोली ते जाबो ना किन्तु, पोरिस्कार बोले दिलाम
(गली में नहीं जाऊंगा, साफ कह दिया)
मेन रास्ताए छाड़ते होबे...पोंचास टाका एक्स्ट्रा किन्तु..
(मुख्य रास्ते पर ही छोड़ना होगा, 50 रपए अतिरिक्त, मीटर से)
ठीक आछे भाई.....

पूजा की खरीदारी के थैले लेकर ग्राहक
दरवाजा खोलकर टैक्सी में बैठता है
टैक्सी चल पड़ती है...
रिक्सा वाला...
लूंगी की मरोड़ ढीला कर
राजा खैनी का पुड़िया निकालता है।
ग्राहक उसके रिक्सा पर जहां पैर रखता है,
वहीं बैठकर अपनी हथेली पर खैनी रगड़ता है
पास के रिक्सेवाले को भी आमंत्रण देता है
खइब...?
बनाव...?

कोलकाता की शाम ढलती है।।।।।।
कुछ देर बाद ग्राहक अपने गंतव्य पर पहुंचेगा
टैक्सी वाला मीटर से 50 रुपए अतिरिक्त लेगा
रिक्सावाला अपनी किस्मत कोसता रहेगा।।
वह जैसा कल था, उसका आज भी वैसा है
कोलकाता में उसके पास न घर है, न पैसा है.....

-कुंवर प्रीतम
5-10-2012

फिर एक चौराहा - डॉ नूतन गैरोला

 



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इम्तिहान, इम्तिहान, इम्तिहान,.. न जाने जिंदगी कितने इम्तिहान लेगी, हर बार एक नया चौराहा, हर बार खो जाने का भय , मंजिल किस डगर होगी कुछ भी तो उसे खबर नहीं ,……. ……..मंथन मंथन मंथन जाने कितना ही आत्ममंथन, हर बार पहुंची उसी जगह ज्यूँ शून्य की परिधि पर चलती हुई …………..चढ़ते, चढ़ते, चढ़ते,.. जब शीर्ष पर पहुचने लगे -थरथरा रहे थे कदम, फूलने लगे थे दम,  मंसूबों की कतरनों को थामें, ढलानों पर फिसलने लगी ….... ……मुस्कानें, मुस्कानें, मुस्कानें , ..देखो! गालों पर खिलती हुई कानों तक पहुंची मुस्काने, चमक रहे थे जो, दिखे नहीं किसी को, उसकी आँखों के धुंधलाते सितारे … शायद उसके भीतर बहुत कुछ टूट गया था, उसका विश्वास चरमरा गया था… फिर भी अभी एक आस है, क्यूंकि अभी कुछ सांस हैं………... उसने अंधेरों में एक चिराग जला लिया है और कम पड़ती रौशनी में चश्मा पौंछ कर पहन लिया है …... क्यूंकि आखिरी सांस भी जिंदगी दे जाती है और क्या पता जिंदगी थाम के हाथ, पहुंचा दे मंजिल के पास …. ..पर फिर मंजिल पर पहुँच कर एक नया मंसूबा एक नया चौराहा, सतत चलते रहने की चाह  .….  यही गति है, यही जिंदगी है, यही जीने का नाम है ..............................

                         नूतन डिमरी गैरोला - ४/१०/१२ .... १८ : २४

                                 ब्लॉग अमृतरस

2.10.12


शिवनगरी का आखिर किस मंुह से जनदर्शन करते या जनता को दर्शन देते शिवराज 
एक भी घोषणा नहीं हुयी थी पूरीः अन्य जिलों की तरह पूरे पेज के विज्ञापन में क्या छपता?
सिवनी। पूरे प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लगभग तीन सप्ताह तक जनदर्शन का कार्यक्रम रखा था। इसके तहत हर जिले में जब वो जाते  थे तो जन संपर्क विभाग द्वारा स्थानीय एवं क्षेंत्रीय अखबारों में पूरे पूरे पेज के विज्ञापन प्रकाशित कराये जाते थे जिसमें मुख्यमंत्री द्वारा जिले में की गयी घोषणाओं और उनके पूरे होने का जिक्र होता था। बताया जाता हैं कि इसके लिये जिला प्रशासन से घोषणाओं के बारे में पूरी जानकारी संकलित की जाती थी। 
शिवराज सिंह चौहाने ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जिले में सात बार यात्रायें की हैं। इस दौरान उन्होंने छोटी बड़ी  कई घोषणाये करके  ना केवल जनता की वरन मंच पर बैठे जनप्रतिनिधियों की भी खूब तालियां बटोरी थी। इनमें प्रमुख मेडिकल कालेज, इंजीनियरिंग एवं कृषि महाविद्यालय,फोर लेन,पेंच का पानी सिवनी लाने,सिवनी को प्रदेश का सबसे सुंदर शहर बनाने,दलसागर को ऐसा सजायेंगें कि मेहमान गर्व कर सकें,नरसिंग कॉलेज खोेलने,केवलारी और छपारा को नगर पंचायत का दर्जा देने,पलारी को उप तहसील बनाने, कान्हीवाड़ा को पूर्ण तहसील एवं विकास खंड़ बनाने और कांचना मंड़ी जलाशय के लिये 2008 में 36 करोड़ रु. स्वीकृत करने सहित अन्य कई छोटी घोषणाये भी शामिल हैं। 
उक्त घोषणाओं में सिर्फ दलसागर तालाब के मामले में जरूर कुछ काम हुआ हैं वह भी केन्द्र सरकार की बी.आर.जी.एफ. योजना के तहत हुआ हैं। शेष सभी घोषणायें सिर्फ घोषणायें ही बन कर रह गयीं हैं।
लेकिन इसके लिये सिर्फ मुख्यमंत्री ही नहीं वरन जिले के वे जन प्रतिनिधि भी दोषी हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र के लिये होने वाली घोषणाओं पर ताली तो खूब बजायी लेकिन मुख्यमंत्री के पीछे नहीं पड़े कि उन्हें पूरा किया जायें। ऐसे हालात में शिवराज शिव की नगरी सिवनी में जनदर्शन करने या जनता को दर्शन देने के लिये भला कैसे और किस मुंह से आ सकते थे?



जिसके खिलाफ आंदोलन उससे ही 
मदद की मांग? वाह क्या बात है .......
सिवनी। कभी आपने यह सुना है कि जिसके खिलाफ आंदोलन किया जाये उससे ही आंदोलन के खर्च की मांग की जाये? और कहीं कभी भी यह हुआ हो या नहीं लेकिन सिवनी में ऐसा एक वाकया होने की इन दिनो शहर में चर्चा गर्म हैं। बताया जा रहा है कि नगर के वी.आई.पी. जोन बारापत्थर में स्थित केन्द्र सरकार के एक कार्यालय प्रमुख से बुद्धिबल के नाम पर जनहित की आड़ में राजनीति करने वाले एक नेता ने कुछ ऐसी ही मांग कर डाली थी। उनका तर्क यह था कि जब वे आंदोलन करते हैं तभी तो केन्द्र सरकार आपके लिये पैसा स्वीकृत्त करता हैं। लेकिन जब कार्यालय प्रमुख ने यह मांग पूरी करने से मना कर दिया तो उससे बहुत हुज्जत भी की गयी। बताया तो यहां तक जा रहा हैं कि जब यह मांग पूरी नहीं हुयी तो कार्यालय प्रमुख के उच्चाधिकारियों से उसकी शिकायत भी कर दी गयी हैं। जनहित की आड़ में स्वहित की राजनीति करने वाले ये नेता ऐसा भी कारनामा कर दिखायेंगें इसकी लोगों को उम्मीद नहीं थी। लोग तो यह कहने से भी नहीं चूक रहें हैं कि ऐसा नायाब नुस्खा  तो कोई बुद्धिमान ही ढ़ूंढ़कर ला सकता हैं।


पुराने पाप धोने की भी मांग की जाये और फिर आभार भी व्यक्त करें तो भला नरेश को क्यों ना पसंद आयेगा? 
पाप धोने में भी आभार लेने की तकनीक जिले की राजनीति में ईजाद कर ली गयी हैं।भाजपा की तत्कालीन नपा अध्यक्ष पार्वती जंघेला के कार्यकाल में दुगनी कीमत पर तीन घटिया सड़कें तत्कालीन भाजपा विधायक नरेश दिवाकर के कार्यकाल में बनायीं गयीं थीं। इसकी शिकायत इंका नेता आशुतोष वर्मा ने राज्य सरकार से की थी। प्रदेश की भाजपा सराकर ने पार्वती जंघेला सहित दो सी.एम.ओ. पर 9 लाख से अधिक की रिकवरी निकाली गयी थी जो कि आज तक वसूल नहीं की जा सकी हैं। इन सड़कों को फिर से बनवाने में पुराने पाप धोने में भी आभार प्राप्त करने की उपरोक्त कला का बखूबी प्रर्दशन किया गया। जनता जनार्दन यदि किसी नेता या कुछ नेताओं को शूरवीर मान लें और वाकयी में वे वीर भी ना हों तो भला उन नेताओं का क्या दोष है? दोषी तो जनता जर्नादन ही कहलायेगी जो ऐसे नेताओं को अपना प्रतिनिधि बनाते रहती हैं। मुस्लिम समाज मे हज यात्रा सबसे पाक यात्रा मानी जाती हैं। आज से दो साल पहले अचानक ही सिवनी,छिंदवाड़ा,बालाघाट और मंड़ला जिले के हज यात्रियों को नागपुर के बजाय भोपाल से उड़ान भरने का आदेश जारी हो गया। सन 2010 में चारों जिलों की हज कमेटियों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। अब जब फिर नागपुर से ही जाने का निर्णय हुआ तो श्रेय लेने का सियासी खेल भी खूब चला और कांग्रेस और भाजपा ने भी इसमें पूरी कवायत की हैं। इसेस तमाम सवाल पैदा हो गयें हैं जिनका जवाब यदि हम खुद तलाश करें तो सारे खेल का खुलास हो जायेगा।  
पुराने पाप धोने में भी मिलने लगा आभार-पाप      धोने में भी आभार लेने की तकनीक जिले की राजनीति में ईजाद कर ली गयी हैं। इसके लिये पहले पाप धोने की जनप्रतिनिधयों से बाकायदा अखबारों के माध्यम से मांग करानी पड़ती हैं। फिर इसकी स्वीकृति देकर अपना पुराना पाप धोया जाता हैं और फिर मांग करने वालों से अखबार में ही आभार व्यक्त कराया जाता हैं और अपना नाम विनाश पुरूष से अलग कर विकास पुरूष के रूप मे दर्ज करा लिया जाता हैं। चौंकिये नही यह वाकया कहीं और का नहीं वरन अपने सिवनी शहर का ही हैं। पाठकों को याद होगा कि भाजपा की तत्कालीन नपा अध्यक्ष पार्वती जंघेला के कार्यकाल में दुगनी कीमत पर तीन घटिया सड़कें तत्कालीन भाजपा विधायक नरेश दिवाकर के कार्यकाल में बनायीं गयीं थीं। इसकी शिकायत इंका नेता आशुतोष वर्मा ने राज्य सरकार से की थी। तीन साल चली इस लड़ाई के बाद प्रदेश की भाजपा सराकर ने पार्वती जंघेला सहित दो सी.एम.ओ. पर 9 लाख से अधिक की रिकवरी निकाली गयी थी जो कि आज तक वसूल नहीं की जा सकी हैं। यह भी आरोप था कि ये घटिया सड़के तत्कालीन विधायक नरेश दिवाकर के ही विश्वस्त भाजपा ठेकेदारों ने बनायीं थी। जैसे ही नरेश दिवाकर को सरकार ने महाकौशल विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाकर लाल बत्तीधारी बनाया वैसे ही वे अपने पुराने पाप धोने में लग गये। पहले सर्किट हाउस से एस.पी. बंगले तक की घटिया सड़क को बनवाया गया और अब दूसरी सड़क अनिल सिंघानिया के मकान से मठ मंदिर चौराहे तक की सड़क की स्वीकृति दी गयी हैं। इसमें पुराने पाप धोने में भी आभार प्राप्त करने की उपरोक्त कला का बखूबी प्रर्दशन किया गया। यहां एक बात और विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि इन दोनों ही सड़कों को बनाने के लिये स्वीकृत की गयी राशि भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी वाली पालिका को ना देकर लोक निर्माण विभाग को देकर यह संदेश देने की कोशिश भी गयी हैं कि घटिया सड़क  बनाने में पालिका ही जवाबदार थी और इसमें किसी और का कोई रोल नहीं था। जबकि मांग और आभार दोनों ही पालिका के पदाधिकारी और पार्षदों ने ही की थी और नरेश दिवाकर को विकास पुरूष बनने का मौका दिलाया था। इसे ही तो राजनीति में कूटनीति कहा जाता हैं।
हज यात्रा जैसे पाक काम में भी खूब हुआ सियासी खेल-जनता जनार्दन यदि किसी नेता या कुछ नेताओं को शूरवीर मान लें और वाकयी में वे वीर भी ना हों तो भला उसमें उन नेताओं का क्या दोष है? दोषी तो जनता जर्नादन ही कहलायेगी जो ऐसे नेताओं को अपना प्रतिनिधि बनाते रहती हैं। मुस्लिम समाज मे हज यात्रा सबसे पाक यात्रा मानी जाती हैं। आज से दो साल पहले अचानक ही सिवनी,छिंदवाड़ा,बालाघाट और मंड़ला जिले के हज यात्रियों को नागपुर के बजाय भोपाल से उड़ान भरने का आदेश जारी हो गया। सन 2010 में चारों जिलों की हज कमेटियों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। इस संबंध में जानकार लोगों का कहना हैं कि प्रदेश हज कमेटी और प्रदेश सरकार की अनुशंसा पर सेन्ट्रल हज कमेटी और केन्द्र सरकार हज यात्रियों की उड़ान भरने के लिये एरोड्रम का निर्धारण करती हैं। पिछले साल भी इसका विरोध हुआ और इस साल भी जारी था। पहले तो यह खबर आयी कि चारों जिले के हज यात्रियों अब पहले की तरह नागपुर से हज यात्रा पर जायेंगें। इसके लिये आभार भी व्यक्त कर दिया गया। लेकिन जब आदेश आये तो केवल छिंदवाड़ा जिले के हज यात्रियों के लिये ही नागपुर   किया गया लेकिन बाकी तीनों जिलों को छोड़ दिया गया। यह हल्ला होते ही इन तीन जिलो में खलबली मच गयी। जब चारों जिलो का एक साथ नागपुर से भोपाल परिवर्तन किया गया था तो फिर केवल छिंदवाड़ा को ही यह       सुविधा फिर से क्यों दी गयी और बाकी तीन जिलों को क्यों छोड़ दिया गया? मुस्लिम समाज के नेताओं के अलावा और कांग्रेस तथा भाजपा ने भी परंपरानुसार एक दूसरे पर आरोप लगाते हुये इस मामले में पहल करना शुरू कर दिया। इसी बीच मुस्लिम सामाजिक संस्था अलफलाह तंजीम के दो नौजवानों तनवीर अहमद और रिजवान खॉन ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी थी। याचिका दायर होने के चंद दिनों बाद ही इन तीनों जिलों के हज यात्रियों को भी नागपुर से हज यात्रा प्रारंभ करने के आदेश जारी हो गये। इसकी खबर लगते ही हज जस्ी पाक यात्रा में सियासत का दौर शुरू हो गया। कांग्रेस की ओर से केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह का आभार व्यक्त किया गया तो जिला भाजपा अल्प सयंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष शफीक खॉन ने विज्ञप्ति जारी कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, छिंदवाड़ा जिले के विधायक प्रेम नारायण ठाकुर, विधायक नीता पटेरिया,मविप्रा के अध्यक्ष रनेश दिवाकर एवं जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन का आभार व्यक्त कर डाला। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समाज की ओंर से याचिका दर्ज करने वालों की प्रशंसा कर डाली। इन सब भारी भरकम लोगों का आभार व्यक्त करने से एक सवाल यह पैदा हो गया हैं कि क्या ये सब वास्तव में भारी भरकम हैं? यदि हैं तो इन सबको यह काम कराने में दो साल का समय क्यों लग गया? जिन कांग्रेस भाजपा नेताओं की नूरा कुश्ती के समाचार सियासी हल्कों में जब देखो तब तैरते दिखायी देते हैं उन्हें भी यह करने में क्यों इतना समय लग गया? इन सब भारी भरकम नेताओं के रहते हुये भी इन चार जिलों के हज यात्रियों को क्या दो साल तक बिना वजह परेशानी का भार नहीं छेलना पड़ा? और यदि भार झेलना पड़ा तो भला अब आभार किस बात का?क्या चार जिलों में से तीन जिलों को पहले छोड़ देना उचित था? प्रदेश  के इन वार जिलो को नागपुर के बदलेे भोपाल से भेजने का पहले लिया गया निर्णय अब गलत साबित नहीं हो गया है? यदि हां तो इस निर्णय को किसने और क्यों लिया था? क्या यह सब भोपाल में हज यात्रियों की खिदमत के लिये हज हाउस बनाने के लिये किया गया था? क्या यह सारी सियासी कवायत अगले साल होने वाले चुनावों को ध्यान में रख कर की गयी है? इन सारे ावालों का जवाब यदि बिना किसी सियासी भेदभाव के हम खुद तलाश करें तो सारा खेल का खुद ब खुद खुलासा हो जायेगा। अब यह तो हमें खुद ही सोचना पड़ेगा कि जिन्हें हम शूर वाीर मान कर अपना प्रतिनिधि चुनते आ रहें हैं वे कितने शूरवीर हैं?”मुसाफिर”          

1.10.12

पल पल क्यों बदल रहे हैं अन्ना ?


अगस्त के पहले सप्ताह में दिल्ली के जंतर मंतर पर जब अन्ना हजारे ने अपनी टीम के साथ चुनावी विकल्प देने के वादे के साथ अचानक अनशन समाप्त करने की घोषणा की थी...तो कहा जाने लगा था कि इस आंदोलन की भ्रूण हत्या हो गई है...एक लंबे सन्नाटे के बाद फिर से सुगबुगाहट शुरु होती है और बीते एक महीने के भीतर ही अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल में राजनीतिक दल गठन पर मतभेद की खबरें सुर्खियां बनती हैं...और इसी बीच अन्ना केजरीवाल से किनारा कर लेते हैं...और अपना नाम और फोटो तक के इस्तेमाल न करने हिदायत देते हैं...अन्ना यहीं नहीं रूकते इसके बाद लगातार कभी अपने बलॉग के जरिए तो कभी मीडिया के सवालों के जवाब में केजरीवाल पर निशाना साधने से नहीं चूकते...इस दौरान अन्ना राजनीति को गंदा कहते हुए इस रास्ते के चयन पर केजरीवाल को जमकर कोसते भी हैं...इस बीच लोगों तक भी ये संदेश जाता है कि अन्ना और केजरीवाल के रास्ते अलग अलग हैं...और अन्ना नई टीम के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नया जनांदोलन खड़ा करेंगे...लेकिन 01 अक्टूबर को सुबह अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया से मुलाकात के बाद अचानक अन्ना शाम को केजरीवाल के राजनीति के रास्ते को सही ठहराते हुए चुनाव लड़ने पर न सिर्फ केजरीवाल का समर्थन करने का ऐलान करते हैं बल्कि केजरीवाल से दिल्ली के चांदनी चौक से कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ने की सलाह देते हुए उनके पक्ष में चुनाव प्रचार करने पर भी हामी भरते दिखाई देते हैं। इस सब घटनाक्रम के बीच न सिर्फ अन्ना के समर्थक बल्कि आम जनता भी असमंजस में जरूर होगी कि आखिर बीते एक महीने में क्यों अन्ना अपनी बात पर कायम नहीं सके। क्यों पल पल अन्ना ने अपने बयान और फैसले बदले...आखिर सुबह केजरीवाल और सिसौदिया के बीच ऐसी क्या गुफ्तगु हुई कि एक दिन पहले तक केजरीवाल को कोसने वाले अन्ना अचानक उनके साथ खड़े होते दिखाई दिए। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि डेढ़ साल पहले शुरू हुई जनलोकपाल की इस लड़ाई में अन्ना के साथ केजरीवाल और उनके दूसरे सहयोगी कंधा से कंधा मिलाकर खड़े रहे और इस आंदोलन की सफलता का श्रेय इनको भी उतना ही जाता है जितना कि अन्ना हजारे को। लेकिन डेढ़ साल तक जो टीम एक साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ी थी...वो टीम बीते एक महीने में ताश के पत्तों की माफिक बिखर गई। अन्ना के केजरीवाल के समर्थन करने के बयान के बाद अब लगने लगा है कि शायद फिर से आने वाले वक्त पर ये सभी लोग एक मंच पर दिखाई दे सकते हैं। लेकिन सवाल बना हुआ है कि आखिर अन्ना के पल पल बदलते बयानों के पीछे कोई गुस्सा या नाराजगी थी...या फिर कुछ औऱ। अन्ना के केजरीवाल से किनारा करने के बाद जहां उनके समर्थक भी दो गुटों में बंट गए थे...तो वहीं आमजन का मिजाज भी सामने दो रास्ते देख बदलने लगा था...लेकिन अन्ना के बदलते बयानों के बाद अब फिर से संशय गहराने लगा है कि आखिर अन्ना की मंशा क्या है...क्यों अन्ना एक पल तो केजरीवाल के राजनीति के रास्ते को गलत ठहराते हैं और दूसरे ही पल केजरीवाल के रास्ते को सही ठहराते हुए उनके समर्थन की बात करते हैं। क्या इस तरह अन्ना हजारे अपनी इस लड़ाई में अपने समर्थकों के साथ ही लंबे समय तक आमजन का भरोसा बनाए रखने में कामयाब रह पाएंगे। बहरहाल अन्ना और केजरीवाल के बनते बिगड़ते रिश्तों के बीच उनके समर्थकों के साथ ही आमजन असमंजस में है कि आखिर वो करें तो क्या करें...अन्ना को चाहिए कि ऐसी संशय की स्थिति को पैदा होने से रोकें...ताकि उनके समर्थकों और आमजन का विश्वास उन पर बना रहे और एक अच्छे मकसद के लिए शुरु हुई लडाई अपने अंजाम तक पहुंच सके...और इस देश की जनता को भ्रष्टाचार से 100 प्रतिशत नहीं तो कम से कम कुछ हद तक तो राहत मिल सके।

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सुप्रीम कोर्ट के मत की गलत व्याख्या-ब्रज की दुनिया

मित्रों,जबसे सुप्रीम कोर्ट ने भारत के प्राकृतिक संसाधनों के आर्थिक उपयोग के संबंध में अपना मत दिया है भारत की केंद्र सरकार के मंत्रियों के कदम जमीन पर पड़ ही नहीं रहे हैं और वे लगातार इसकी गलत और दुर्भावनापूर्ण व्याख्या कर रहे हैं। कदाचित् कहीं-न-कहीं उनके मन में यह गलतफहमी घर कर गई है कि अब वे प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना और ईच्छित आबंटन करके जितनी चाहे उतनी रिश्वत खा सकते हैं और फिर उस रकम को ठिकाने लगाने के लिए विदेशी बैंकों में थोक के भाव में खाते खोल सकते हैं।
               मित्रों,सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में केंद्र सरकार को कतई घोटाले करने की छूट नहीं दी है। उसने तो राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत मांगे गए परामर्श के उत्तर में बस इतना कहा है कि देश के प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन के कई संभावित तरीके हो सकते हैं जिसमें से नीलामी भी एक है। सरकार चाहे तो जनहित में इनमें से कोई भी तरीका अपना सकती है। सरकार चाहे तो पहले आओ पहले पाओ की नीति (2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला) भी अपना सकती है और चाहे तो चयन समिति बनाकर (कोयला-खान आबंटन घोटाला) भी अपना सकती है। परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा बिल्कुल भी नहीं कहा है कि पहले आओ पहले पाओ की नीति के तहत अपने मित्रों और सगे-संबंधियों को पहले से ही अधिसूचना की सूचना दे दो और 10-15 मिनट में ही उनके बीच संसाधन आबंटित भी कर दो जैसा कि 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले में किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नहीं कहा है कि कोल-गेट की तरह एक ऐसी चयन समिति का गठन कर दो जो सिर्फ दिखावे के लिए हो और फिर अपनों और अपने लोगों के नाम पर जितना चाहे आबंटन करवा लो।
                  मित्रों,अगर सुप्रीम कोर्ट को ऐसा मानना होता तो वह 2-जी स्पेक्ट्रम मामले की सुनवाई को अपने इस मत से अलग नहीं कर देता और वह यह नहीं कहता कि उसके इस मत का इस महाघोटाले की सुनवाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मैं नहीं समझता कि सुप्रीम कोर्ट का ऐसा कहना कहीं से भी गलत है कि आबंटन के कई तरीके हो सकते हैं। निश्चित रूप से हो सकते हैं। तरीका चाहे नीलामी का हो या कोई और असल चीज है पारदर्शिता और निष्पक्षता। माना कि नीलामी ही की जाती है और बोली के मामले में गोपनीयता और निष्पक्षता नहीं बरती जाती है तो फिर ऐसी नीलामी का क्या मतलब रह जाएगा?
                    मित्रों,नीतियाँ बनाना और लागू करना निश्चित रूप से कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार या एकाधिकार में आता है और आना चाहिए। नीतियाँ चाहे जो भी हों उनका प्रभाव तभी देशहितकारी होगा जब उनको बनाने और लागू करनेवाले लोगों की नीयत साफ हो,उसमें कोई खोट नहीं हो। अपेक्षित सफलता के लिए हमेशा नीतियों के साथ-साथ नीयत का भी स्वच्छ होना आवश्यक होता है। हमारी केंद्र सरकार के मंत्रियों को हमेशा यह बात जेहन में ताजा करके रखनी चाहिए कि जब-जब वे नीतियों के क्रियान्वयन में चूक करेंगे और उन्हें टकसाल या पैसों का पेड़ समझेंगे तब-तब सीएजी उनको टोकेगा क्योंकि उसका काम ही क्रियान्वयन अर्थात् नीयत को देखना है। वे जब-जब धनार्जन के अनुचित तरीके अपनाएंगे और देश के खजाने को भारी नुकसान पहुँचाकर अपनी और अपनों की जेबें भरने का प्रयास करेंगे तब-तब उनको जनता और अदालत के सामने जवाब देना पड़ेगा और तफरी के लिए ही सही जेलयात्रा भी करनी पड़ेगी। इसलिए केंद्र सरकार के महान कुतर्कशास्त्री मंत्रियों को चाहिए कि वे शीघ्रातिशीघ्र अपनी नीयत को ठिकाने पर लाएँ और सुप्रीम कोर्ट के मत को देश के विकास की दिशा में एक अवसर के रूप में लें न कि इसे पैसे का पेड़ या कल्पवृक्ष समझ लें। अब वह समय नहीं रहा कि जब गदहा जलेबी खाता था और मालिक को पता भी नहीं चलता था। अगर नेता लोग 21वीं सदी के धूर्त और चालाक नेता हैं तो आज की जनता भी 21वीं सदी की होशियार जनता है जो न केवल सबकुछ जानती है बल्कि समझती भी है।

झूठा कौन – अन्ना हजारे या अरविंद केजरीवाल ?



जिस आंदोलन ने सरकार की चूलें हिला दी थी...उस आंदोलन को खड़ी करने वाली टीम एक झटके में बिखर गई...ऐसे में जाहिर है इसका दर्द इतने जल्दी दिल से नहीं जाएगा...गाहे बगाहे इसके पीछे की दास्तां और इसका दर्द जुबां पर आ ही जाता है...19 सितंबर 2012 को केजरीवाल से राजनीतिक दल के गठन पर मतभेद के बाद अपने सहयोगियों से किनारा कर जब अन्ना दिल्ली से रालेगण सिद्धी लौटे तो उसके बाद से कभी अन्ना ने अपने बलॉग के जरिए तो कभी पत्रकारों के सवाल देते हुए इस दर्द को जाहिर किया और अपरोक्ष रूप से इसके लिए केजरीवाल पर भी निशाना साधा। ब्लॉग के जरिए जहां अन्ना ने राजनीति को आंदोलन का बंटाधार करने के लिए जिम्मेदार ठहराया तो साथ ही ये भी कहा कि राजजीतिक दल गठन के फैसले के समर्थन में वे कभी रहे ही नहीं...अन्ना के इस बयान के बाद ये भी सवाल उठता है कि जब अगस्त में जंतर मंतर में अन्ना हजारे और उनकी टीम ने जनता को चुनावी विकल्प देने की जरूरत बताते हुए अपना अनशन समाप्त किया तो उस वक्त क्यों नहीं अन्ना ने इसका विरोध किया...आखिर क्यों अन्ना ने अनशन के समाप्त होने के कुछ दिनों बाद अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए किसी राजनीतिक दल के गठन और उसके साथ जुड़ने के खिलाफ होने की बात कही। अन्ना अगर राजनीति में आने के पक्षधर नहीं थे...जैसा वे कह रहे हैं तो इसका सीधा मतलब ये निकलता है कि अन्ना पर जंतर मंतर पर अनशन समाप्त करने के वक्त या उससे पहले अपने कुछ सहयोगियों का चुनावी विकल्प के फैसले का समर्थन करने का भारी दबाव था। हालांकि अरविंद का ताजा बयान इसको झुठलाते हुए नजर आता है...जिसमें अरविंद ने कहा है कि राजनीतिक दल गठन के इस फैसले के समर्थन में अन्ना भी थे, लेकिन अब न जाने क्यों वे इस बात से इंकार कर रहे हैं। कई ऐसे सवाल हैं जो लगातार जेहन में उठ रहे हैं कि आखिर कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ...लेकिन अन्ना जिस तरह से लगातार अब बड़े ही तल्ख लहजे में राजनीतिक दल गठन करने के फैसले का विरोध करते हुए अपने पूर्व सहयोगियों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उससे तो फिलहाल ये साफ होता दिख रहा है कि चुनावी विकल्प के फैसले पर अन्ना पर अपने कुछ सहयोगियों का भारी दबाव था...किरण बेदी के इस बयान के बाद भी इस पर मुहर लगती दिखती है...जिसमें वे ये कहती हैं कि जिन लोगों को राजनीति बेहतर विकल्प लगा वे अपने रास्ते चले गए हैं...और जो लोग आंदोलन के साथ थे...वो अन्ना हजारे के साथ खड़े हैं। बहरहाल देर सबेर इस पर से भी पर्दा उठ ही जाएगा...लेकिन फिलहाल अन्ना ने साफ कर दिया है कि जनलोकपाल के समर्थन में आंदोलन जारी रहेगा और आंदोलन ही एकमात्र रास्ता है जो भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जनलोकपाल की लड़ाई को उसके अंजाम तक पहुंचाएगा। इसके लिए दिल्ली में अन्ना अब नई टीम बनाने की कवायद में भी जुट गए हैं...जिसमें स्वयं सेवकों के साथ ही रिटायर आईएएस, आईएफएस और आईपीएस अधिकारियों के साथ ही कई बड़े नाम शामिल हो सकते हैं...लेकिन यहां पर भी सवाल ये खड़ा उठता है कि क्या नई टीम के साथ भी अन्ना का आंदोलन उस ऊर्जा...उस धार के साथ आगे बढ़ पाएगा...और अपने अंजाम तक पहुंच पाएगा।

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