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26.12.12

अराजकता फैलाना चाहता है इलैक्ट्रॉनिक मीडिया?

दिल्ली गैंग रेप की जघन्य घटना के बाद दिल्ली सहित पूरे देश में जगह-जगह जो आक्रोश फूटा, वह स्वाभाविक और वाजिब है। इतना तो हमें संवेदनशील होना ही चाहिए। संयोग से यह मामला देश की राजधानी का था, इस कारण हाई प्रोफाइल हो गया, वरना ऐसे सामूहिक बलात्कार तो न जाने कितने हो चुके हैं। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे मुद्दा बनाया, वहां तक तो ठीक था, मगर जब यह अराजकता की ओर बढऩे लगा और बेकाबू हो गया, तब भी मात्र और मात्र सनसनी फैलाने की खातिर उसे हवा देने का जो काम किया गया, वह पूरा देश देख रहा था। सबके जेहन में एक ही सवाल था कि क्या इलैक्ट्रॉनिक मीडिया देश में अराजकता फैलाना चाहता है? मगर... मगर चूंकि इस आंदोलन में युवा वर्ग का गुस्सा फूट रहा था, इस कारण किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि वह इस पर प्रतिक्रिया दे सके। सब जानते थे कि कुछ बोले नहीं कि मीडिया तो उसके पीछे हाथ धो कर पड़ ही ही जाएगा, युवा वर्ग का गुस्सा भी उसकी ओर डाइवर्ट हो जाएगा।
अव्वल तो इस मामले में पुलिस ने अधिसंख्य आरोपियों को पकड़ लिया और पीडि़त युवती को भी बेहतरीन चिकित्सा मिलने लगी। इसके बाद आरोपियों को जो सजा होनी है, वह तो कानून के मुताबिक न्यायालय को ही देनी है। चाहे सरकारी तंत्र कहे या विपक्ष या फिर आंदोलनकारी, कि कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, मगर सजा देने का काम तो केवल कोर्ट का ही है। उसकी मांग के लिए इतना बवाल करना और कड़ी से कड़ी सजा देने का आश्वासन देना ही बेमानी है। अलबत्ता, बलात्कार के मामले में फांसी की सजा का प्रावधान करने का मांग अपनी जगह ठीक है, मगर उसकी एक प्रक्रिया है। यह बात मीडिया भी अच्छी तरह से जानता है, मगर बावजूद इसके उसने आंदोलन को और हवा दे कर उसने खूब मजा लिया।
जैसा कि मीडिया इस बात पर बार-बार जोर दे रहा था कि आंदोलन स्वत:स्फूर्त है, वह कुछ कम ही समझ में आया। साफ दिख रहा था कि इसके लिए पूरा मीडिया उकसा रहा था। मीडिया लगातार पूरे-पूरे दिन एक ही घटना दिखा-दिखा कर, पुलिस को दोषी व निकम्मा ठहरा-ठहरा कर, सरकार को पूरी तरह से नकारा बता-बता कर उकसा रहा था। भले ही इसके लिए यह तर्क दिया जाए कि हमारी सरकार आंदोलन के उग्र होने की हद पर जा कर सुनती है, इस कारण मुद्दे को इतना जोर-शोर से उठाना जरूरी था, मगर एक सीमा के बाद यह साफ लगने लगा कि मीडिया की वजह से ही हिंसा की नौबत आई। सब जानते हैं कि केमरा सामने होता है तो कोई भी आंदोलनकारी कैसा बर्ताव करने लग जाता है?
एक सामान्य बुद्धि भी समझ सकता है कि कोई भी आंदोलन बिना किसी सूत्रधार के नहीं हो सकता। ऐसा कत्तई संभव नहीं है कि गैंगरेप से छात्रों में इतना गुस्सा था कि वे खुद ब खुद घरों से निकल कर सड़क पर आ गए। एक दिन नहीं, पूरे पांच दिन तक। जानकारी तो ये है कि शुरू में कैमरा टीमों द्वारा प्रदर्शन की जगह और समय छात्रों एवं अन्य संगठनों से तय करके जमावड़ा किया गया। हर वक्त सनसनी की तलाश में रहने वाले इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपनी टीआरपी बढ़ाने की खातिर का जो ये खेल खेला, उसमें वाकई समस्याओं से तनाव में आये बुद्धिजीवी वर्ग और छात्रों को समाधान नजर आया। आंदोलन को कितना भी पवित्र और सच्चा मानें, मगर जिस तरह से मीडिया पुलिस व सरकार को कोसते हुए आंदोलनकारियों को हवा दे रहा था, उससे यकायक लगने लगा कि क्या हमारा मीडिया अराजकता को बढ़ाने की ओर बढ़ रहा है? यह सवाल इसलिए भी उठता है कि एक-दो चैनलों ने तो इंडिया गेट को तहरीर चौक तक की संज्ञा दे दी। यानि कि यह आंदोलन ठीक वैसा ही था, जैसा कि मिश्र में हुआ और तख्ता पलट दिया गया।
मीडिया की बदमाशी तब साफ नजर आई, जब एक वरिष्ठतम पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक ओछी हरकत की। उन्होंने आंदोलनकारियों में अपनी ओर से जबरन शब्द ठूंसे। रेप कांड के विरोध में प्रदर्शन के दौरान आंदोलनकारियों से मिलने को कोई भी जिम्मेदार मंत्री मिलने को नहीं आ रहा था तो उन्होंने खुद चला कर एक आंदोलनकारी से सवाल किया कि आपको नहीं लगता कि युवा सम्राट कहलाने वाले राहुल गांधी को आपसे मिलने को आना चाहिए। स्वाभाविक सी बात है कि इसका उत्तर हां में आना था। इसके बाद उसने पलट कर एंकर की ओर मुखातिब हो कर दर्शकों से कहा कि लोगों में बहुत गुस्सा है और वे कह रहे हैं कि राहुल गांधी को उनसे मिलने को आना चाहिए। उनकी इस हरकत ने यह प्रमाणित कर दिया कि मीडिया आंदोलन को जायज, जो कि जायज ही था, मानते हुए एकपक्षीय रिपोर्टिंग करना शुरू कर दिया। एक और उदाहरण देखिए। एक चैनल की एंकर ने आंदोलन के पांचवें दिन आंदोलन स्थल को दिखाते हुए कहा कि बड़ी तादात में आंदोलनकारी इकत्रित हो रहे हैं और उनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और फिर जैसे ही उसने रिपोर्टर से बात की तो उसने कहा कि फिलहाल बीस-पच्चीस लोग जमा हुए हैं और यह संख्या बढऩे की संभावना है। कैसा विरोधाभास है। स्पष्ट है कि एंकरिंग पर ऐसे अनुभवहीन युवक-युवतियां लगी हुई हैं, जिन्हें न तो पत्रकारिता का पूरा ज्ञान है और न ही उसकी गरिमा-गंभीरता-जिम्मेदारी व नैतिकता का ख्याल है। उन्हें बस बेहतर से बेहतर डायलॉग बनाना और बोलना आता है, फिर चाहे उससे अर्थ का अनर्थ होता रहे।
सवाल ये उठता है कि जायज मांग की खातिर आंदोलन का साथ देने वाला ये वही मीडिया वही नहीं है, जो कि धंधे की खातिर जापानी तेल और लिंगवर्धक यंत्र का विज्ञापन दिखाता है? क्या ये वही नहीं है जो कमाई की खातिर विज्ञापनों में महिलाओं के फूहड़ चित्र दिखाता है? क्या ये वही नहीं है जो कतिपय लड़कियों के अश्लील पहनावे पर रोक लगाने वाली संस्थाओं को तालीबानी करार देता है? तब उसे इस संस्कारित देश में आ रही पाश्चात्य संस्कृति पर जरा भी ऐतराज नहीं होता। स्पष्ट है कि जितना यह महान बनने का ढ़ोंग करता है, उसके विपरीत इसका एक मात्र मकसद है कि सनसनी फैलाओ, टीआपी बढ़ाओ, फिर चाहे भारत के मिश्र जैसी क्रांति की नौबत आ जाए।
-तेजवानी गिरधर

एक कुली ईमानदार है लेकिन प्रधानमंत्री नहीं !


ये उस देश की कहानी है...जो बताती है कि उस देश में रेलवे स्टेशन में यात्रियों का सामान उठाकर दो वक्त की रोजी का जुगाड़ करने वाला एक कुली तो ईमानदार है लेकिन देश का प्रधानमंत्री ईमानदार नहीं है..! सुनने में ये अजीब जरूर लग रहा होगा लेकिन ये सौ फीसदी सच है और दुर्भाग्य से ये कहानी हमारे हिंदुस्तान की है। इस बात को कहने के पीछे एक बड़ा वाक्या है जो मेरे साथ घटित हुआ। बात ज्यादा पुरानी नहीं है- दिल्ली के पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से मुझे काठगोदाम के लिए रवाना होना था। आमतौर पर स्टेशन पर मैं कुली की सेवाएं नहीं लेता हूं...लेकिन भाई की शादी के लिए घर लौट रहा था...ऐसे में मेरे पास कुछ ज्यादा ही सामान था। ऐसे में मैंने एक कुली को आवाज दी। कुली मेरा सामान लेकर आगे आगे चल रहा था। कुछ ही आगे बढ़ा था कि मुझे प्लेटफार्म पर इत्तेफाक से मेरा एक मित्र टकरा गया...मैंने कुछ देर रुककर उससे बातचीत करने लगा। लेकिन इस बीच कुली जो मेरा सामान लेकर आगे आगे चल रहा था उसे शायद मेरे रुकने का आभास नहीं हुआ और वह आगे निकल गया। करीब 5 मिनट के बाद मुझे ध्यान आया कि कुली के पास मेरा सामान है। मैंने चारों तरफ देखा मुझे कुली नहीं दिखाई दिया। मुझे लगा कि मेरी लापरवाही का फायदा कुली ने उठा लिया और वो मेरा सामान लेकर चंपत हो गया। मैंने कुली का बिल्ला नंबर भी नहीं देखा था...ऐसे में कुली को ढूंढ़ना मुझे मुश्किल लगने लगा। करीब 15 मनट हो गए लेकिन काफी तलाश करने के बाद भी मुझे कुली नहीं मिला। ट्रेन छूटने में अभी वक्त था ऐसे में मैं कुली को तलाश करते-करते जीआरपी थाने में कुली की शिकायत दर्ज कराने पहुंचा। वहां का नजारा न सिर्फ हैरान करने वाला था बल्कि मेरी चेहरे की सारी शिकन वहां पहुंचकर गायब हो गई। थाने के बाहर वो कुली मेरे सामान के साथ पहले ही मौजूद था। मुझे वहां देखते ही वो मुझ से बोला- साहब मैं सामान लेकर ट्रेन के पास पहुंच गया था...लेकिन पीछे देखा तो आप दिखाई नहीं दिए। फिर मैंने कुछ देर तक तलाशा और फिर में ये सोचकर यहां पर सामान लेकर आ गया कि आप यहां जरूर आएंगे। जिस कुली के लिए मैं पलभर पहले ही पता नहीं क्या क्या सोच रहा था। मन ही मन उस कुली के साथ सभी कुलियों को गालियां दे रहा था...उस कुली को अपने सामान के साथ सामने देखकर कुली के लिए मेरा नजरिया बदल गया। खैर कुली फिर मेरे साथ चल दिया और उसने मेरा सामान ट्रेन में रखा। मैंने कुली को शुक्रिया बोलते हुए उसे तय रूपए के अलावा कुछ पैसे अलग से देने चाहे लेकिन कुली ने तय पैसे से अधिक पैसे मेरे कई बार आग्रह करने के बाद भी नहीं लिए। मैंने एक बार फिर से कुली का शुक्रिया बोला और वो कुली अपने रास्ते चल दिया और कुछ ही मिनटों में ट्रेन भी चल दी। ये सिर्फ एक घटना थी जो हो सकता है कई और लोगों के साथ भी घटित हुई हो लेकिन ये एक घटना अपने आप में कई बातें कह गई। कुली चाहता तो वो सामान लेकर चंपत भी हो सकता था...हालांकि उसमें बहुत कीमती सामान कुछ नहीं था...लेकिन कुली को तो ये बात नहीं पता था कि सामान क्या है..? लेकिन कुली ने ऐसा कुछ नहीं किया। हमारे देश में जहां आज चारों तरफ सिर्फ भ्रष्टाचार की ही गूंज है और पैसे के लिए व्यक्ति कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। भाई – भाई का दुश्मन है...बेटा-बाप का दुश्मन है। ऐसे में एक कुली जो दूसरों का बोझा ढो कर अपना और अपने परिवार का पेट पालता है उसकी ये ईमानदारी ऐसे लोगों के मुंह में एक करारा तमाचा है। मैं ये इसलिए भी कह रहा हैं क्योंकि जिस देश का प्रधानमंत्री ईमानदार न हो तो प्रधानमंत्री के सहयोगी मंत्रियों के साथ ही सरकार में शामिल दूसरे लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। सरकार के मुखिया और सरकार में शामिल तमाम लोगों पर भ्रष्टाचार और घोटाले के आरोप इस बात को सही भी साबित करते हैं कि भारत का प्रधानमंत्री ईमानदार नहीं है लेकिन स्टेशन में सामान उठाने वाला कुली ईमानदार है। एक तरफ ये कुली और उसके जैसे तमाम लोग हैं...जिनका ईमान अभावों में जीवन बसर करने के बाद भी पैसों के आगे कभी नहीं डोलता और दूसरी तरफ हैं हमारे देश के नेता जो सरकारी दामाद की तरह सारी सुख सुविधाओं का उपभोग तो करते ही हैं साथ ही जनता के खून पसीने की कमाई को घोटालों और भ्रष्टाचार के रूप में उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सलाम है ऐसे कुली की तरह ईमानदारी की मिसाल पेश करने वाले उन सभी लोगों को।  

deepaktiwari555@gmail.com

नीतीश के छोड़ पूरा एनडीए मोदी के साथ?


गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद विभिन्न पार्टियों के दिग्गज नेताओं को देख कर मीडिया को लग रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू को छोड का पूरा एनडीए मोदी के साथ है और उसे मोदी के भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी किए जाने पर ऐतराज नहीं करेगा। हालांकि इस प्रकार के कार्यक्रमों में आने को औपचारिकता ही माना जाता है, मगर समारोह में मौजूद नेताओं की लिस्ट पर नजर डालने के बाद मीडिया को उसमें 2014 के एनडीए की तस्वीर नजर आ रही है। नीतीश कुमार की गैर मौजूदगी का यह अर्थ निकाला गया है कि एनडीए की ओर से मोदी को प्रधानमंत्री के संभावित उम्मीदवार के रूप में प्रॉजेक्ट करने को लेकर उनके रुख में कोई बदलाव नहीं आया है।
उल्लेखनीय है कि समारोह में लालकृष्ण आडवाणी समेत बीजेपी के सभी दिग्गज नेता नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली, बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और वैंकेया नायडू, पार्टी शासित सभी राज्यों के मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह, गोवा के सीएम मनोहर पार्रिकर, कर्नाटक के मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के अलावा पंजाब के सीएम प्रकाश सिंह बादल तो मौजूद थे ही, आईएनएलडी के सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाल, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके की नेता जे. जयललिता और एमएनएस नेता राज ठाकरे ने भी पहुंचकर भविष्य की राजनीति के संकेत दे दिए। सबसे चौंकाने वाली रही शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे, आरपीआई नेता रामदास अठावले और एमएनएस के मुखिया राज ठाकरे की एक साथ मौजूदगी। बुलाए गए लोगों में उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटानयक नहीं पहुंचे, पर जानकारी ये है कि वे मोदी के विरोध में नहीं हैं क्योंकि उन्होंने गुजरात की जीत के बाद मोदी को सबसे पहले बधाई दी थी। अलबत्ता मोदी के साथ खड़े होने से पहले नफा-नुकसान आकलन कर लेना चाहते हैं।
जहां पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सवाल है, माना ये जा रहा है कि अपने मुस्लिम वोटों के जनाधार को ध्यान में रखते हुए उन्होंने आना मुनासिब नहीं समझा। वैसे अभी ये भी पता नहीं लग पाया है कि मोदी ने उन्हें निमंत्रण दिया भी था कि नहीं। हां, नीतीश के बारे में यही कहा जा रहा है कि उनके पूर्व के रवैये और जीत पर बधाई न देने के रुख को देखते हुए उन्हें शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने का आमंत्रण ही नहीं भेजा था।
कुल मिला कर मीडिया का आकलन है कि मोदी के इस शपथग्रहण समारोह ने उन्हें प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करने की दिशा में कदम रखने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। अब भाजपा पर निर्भर है कि वह मोदी पर एकमत होती या नहीं।
-तेजवानी गिरधर

25.12.12

क्या भगवान भी रिश्वतखोर हो गया है?-ब्रज की दुनिया

मित्रों,कुछ ही दिन पहले 19 दिसंबर को उद्योगपति विजय माल्या का जन्मदिन था। विजय माल्या ठहरे धनाभिमानी और उन्होंने इसे साबित किया भी। उन्होंने अपना 58वाँ जन्मदिन मनाया भगवान वेंकटेश्वर तिरूपति को तीन किलो सोना दान करके। ऐसा उन भगवद्भक्त ने तब किया जबकि उनकी किंगफिशर एयरलाइन्स के कर्मचारियों व अधिकारियों को पिछले कई महीनों से वे वेतन नहीं दे सके हैं और इसके चलते वे बेचारे भूखे-प्यासे हड़ताल पर भी हैं। यह कैसी भक्ति-भावना है विजय माल्या जी की जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ट अनुकृति को तो उन्होंने महीनों से भूखा-सूखा रखा है और भगवान वेंकटेश्वर की प्रस्तर-प्रतिमा पर चढ़ा रहे हैं तीन किलो सोना! प्रश्न उठता है कि क्या इन मंदिरों में या मूर्तियों में सचमुच भगवान रहते हैं? मैं समझता हूँ कि भगवान मंदिरों में या मूर्तियों में नहीं बल्कि विश्वास में निवास करते हैं,वे विश्वास की पवित्रता में रहते हैं। यह सोंचने की बात है कि जो भगवान सबका पालनहार है उसको क्या जरूरत है सोने,हीरे और पैसे की? वह तो ब्रह्मांड के कण-कण में निवास करता है। पूरी दुनिया उसका ही ऐश्वर्य़ है फिर धनी लोग क्यों चढ़ाते हैं उसकी मूर्ति पर सोना-हीरा? क्या ऐसा करते समय उनके मन में श्रद्धा या भक्ति होती भी है या वे ऐसा अभिमानवश अपने धन-प्रदर्शन के लिए करते हैं? या वे समझते हैं कि भगवान भी रिश्वतखोर हो गया है और धन देने से खुश हो जाएगा? क्या वह सोना-चांदी भगवान तक पहुँचता भी है या फिर वह पुजारियों के काम आता है या यूँ ही अनुपयोगी पड़ा रहता है? शास्त्र कहते हैं कि समस्त जड़-चेतन ईश्वर से,ईश्वर द्वारा और ईश्वर में निर्मित है। ईश्वर जड़ से ज्यादा प्रकट रूप में चेतन में और उससे भी ज्यादा प्रकट रूप में इन्सानों में दृष्टिगोचर होता है। इन्सान ही ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि या प्रतिकृति है। मूर्तियों में भगवान है लेकिन जड़ रूप में। जैसे हमारी तस्वीरों में हम होते हैं फिर भी हम तस्वीर नहीं हो जाते वैसे ही मूर्तियाँ ईश्वर का प्रतीक मात्र हैं वे भगवान नहीं हैं। फिर इन्सानों को भूखा रखकर जड़ मूर्तियों पर धन न्योछावर करने की मूर्खता क्यों? क्या वह धन ईश्वर तक पहुँचेगा या कहीं किसी तिजोरी की शोभा बनकर अनुपयोगी रह जाएगा? अगर अनुपयोगी धन कालाधन होता है तो ये प्रस्तर-मूर्तियों को दान में दिए गए हीरे-मोती कैसे कालाधन नहीं हुए? जो धन चेतन-ईश्वर की जरुरतों को पूरा करने में खर्च होना चाहिए उसको जड़-प्रतिमा या मंदिर के खजाने में कैद करने से क्या लाभ? मैं नहीं समझता कि ऐसे धन से वह दयासागर/सर्वकारण थोड़ा भी खुश होता होगा क्योंकि वह तो अपने बंदों के दुःख से दुःखी और अपने बंदों के सुख से ही सुखी होता है।
                मित्रों,इसलिए सरकार को चाहिए कि चाहे भारत का कोई भी मंदिर हो उसमें जमा धन-संपत्ति को जब्त कर ले और इसको गरीब हिन्दुओं के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने पर खर्च करे लेकिन खर्च पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। इसमें बिल्कुल भी घोटाला नहीं होना चाहिए।
                  मित्रों,ये तो हुई मंदिरों के खजाने की बात अब कुछ बात कर लेते हैं मंदिरों में रहनेवाले बिचौलियों यानि पुजारियों की। हम गरीब भक्त जो भी छोटा-मोटा चढ़ावा चढ़ाते हैं या दान करते हैं उनका ज्यादा बड़ा हिस्सा इनकी ही भेंट चढ़ते हैं। मैंने ऐसे कई महंतों को देखा है जिन्होंने अपने घरवालों को करोड़पति तक बना दिया। ये श्री-श्री 1008 से युक्त या रहित कथित भगवद्भक्तों का जीवन काफी ऐश्वर्यपूर्ण होता है। इनमें से कुछ तो हमारे दान के बल पर सोने की पालकियों तक की सवारी गाँठते हैं। हम दान करते हैं कथित भगवान को और उससे गुलछर्रे उड़ाते हैं ये पाखंडी भूदेव या तथाकथित संन्यासी। संन्यास तो सर्वस्व-त्याग सिखाता है फिर ये कैसे संन्यासी या भक्त हैं जिनको हम गृहस्थों से भी कहीं ज्यादा शारीरिक सुख चाहिए?  कई मंदिरों में तो विधिवत देवदासियाँ रखने की भी प्रथा है। ये देवदासियाँ पुजारियों की यौन-जरुरतों को पूरा करती हैं,एकसाथ उनको कई-कई पुजारियों की हवस को शांत करना पड़ता है और वो भी धर्म और ईश्वर के नाम पर। छिः,क्या इसी को भगवद्भक्ति कहते हैं? इससे तो अच्छा रहता कि ये लोग संन्यासी के बदले गृहस्थ ही बने रहते। तब दोनों आश्रमों की प्रतिष्ठा बनी और बची रहती। जब ये बिचौलिये हम गृहस्थों से भी ज्यादा माया “कामिनी और कंचन” के प्रति आसक्त हैं तो फिर इनकी विलासिता की पूर्ति में या पाप में समाज क्यों भागीदार बने? क्या आवश्यकता है इनकी हिन्दू समाज को? मैं यह नहीं कहता कि इनमें से सारे-के-सारे इसी तरह के हैं लेकिन कम-से-कम 80-90%  तो ऐसे हैं ही।
              मित्रों,कुल मिलाकर हमारे हिन्दू धर्म का संस्थागत हिस्सा लगभग पूरी तरह से भ्रष्ट और बर्बाद हो चुका है और इसमें तत्काल बृहत् सुधार की आवश्यकता है। परन्तु लाख टके का प्रश्न तो यह उठता है कि ऐसा होगा कैसे? इसके लिए भगवान तो अवतार लेने से रहे इसलिए जो कुछ भी करना है हमें ही करना है,हम हिन्दुओं को ही करना है। हमें करना बस इतना ही है कि हम दान देते समय सावधानी बरतें और यथासंभव अपने विवेकानुसार केवल सत्पात्र को ही दान करें। चाहे वह राशि 5 रूपए की हो या 5000 रूपए की। इसके साथ ही अगर हमारे इलाके में कहीं देवदासी प्रथा किसी भी रूप में चलन में हो तो उसका विरोध करें और उस संन्यासी को बिल्कुल भी दान न करें। दान करना बहुत अच्छी बात है इसलिए दान देना बंद न करें लेकिन दान करें तो भगवान के साक्षात चेतन स्वरूप जरुरतमंद मानवों की मदद करके करें। इसमें न तो संकोच ही करें और न ही लज्जा। इति शुभम्। 

Instrumental Bhajan - Vaishnav jan to tene kahie.




Instrumental Bhajan - Vaishnav jan to tene kahie.

DEAR FRIENDS,

I PLAYED ELE.HAWAIIAN GUITAR INSTRUMENTAL

"Vaishnav jan to tene kahie." 

WITH HELP OF SONUUS G2M, ROLAND XP 30 AND MY ELE.GUITAR.

MY YOUNG LOVELY DAUGHTER NAME -
KHUSHBU DAVE   HAD  SANG ALAP IN THIS BHAJAN.

KARAOKE  DOWNLOAD  LINK -Ele.Guitar


DOWNLOAD FULL LENGTH MP3 AUDIO. 


FULL LENGTH VIDEO(YOU TUBE)


WITH GREAT HUMBLE, THIS IS MY ONE MAN SHOW. 
ENJOY & PUT YOUR PRECIOUS COMMENTS PLEASE.


MARKAND DAVE.
M.K.AUDIO-VIDEO RECORDING STUDIO.
AHMEDABAD-GUJARAT.INDIA.












24.12.12

दिल्ली गैंगरेप- “ठीक है” लोग इसे भी भूल जाएंगे !


दिल्ली गैंगरेप में मनमोहन सिंह की चुप्पी टूटती है...लेकिन जिस अंदाज में मनमोहन सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ी और उसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पता नही किससे पूछते हैं “ठीक है” इससे लगता है कि वे मौन ही बने रहते तो ज्यादा अच्छा था। क्या मनमोहन सिंह के सामने कैमरामैन के बाजू में खड़ी सोनिया गांधी से पूछते हैं..?  या फिर जिस किसी ने भी ये स्क्रिप्ट लिखी थी उससे..? जो भी हो लेकिन एक बार फिर इतने संवोदनशील मुद्दे पर प्रधानमंत्री का ऐसा रवैया अपने आप में कई सवाल खड़े करता है..!  एक तरफ मनमोहन सिंह गैंगरेप पर दुख जताते हुए खुद की भी तीन बेटियां होनी की दुहाई देते हैं और आखिर में कहते हैं “ठीक है”। प्रधानमंत्री जी आपने तो खुद को दी जाने वाले तमाम उपाधियों को आज की घटना के बाद सही ठहरा दिया। यूं ही लोग मनमोहन सिंह को रोबोट नहीं कहते..! यूं ही मनमोहन सिंह को लोग सोनिया के ईशारे पर फैसले लेना वाला नहीं कहते..! यूं ही सोनिया ने पीएम की कुर्सी छोड़कर कई दिग्गज कांग्रेस नेताओं को दरकिनार कर मनमोहन सिंह को दो-दो बार पीएम पद की कुर्सी नहीं सौंपी..! यूं ही बाबा रामदेव आपको मौनी बाबा नहीं कहते..!  यूं ही टाईम मैगजीन के कवर पेज पर “दि अंडर अचीवर” के टैग के साथ मनमोहन सिंह का फोटो नहीं छपता..! खैर इनके जवाब या तो मनमोहन सिंह खुद दे सकते हैं या फिर सोनिया गांधी। लेकिन दिल्ली गैंगरेप जैसे संवेदनशील मुद्दे पर देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की असंवेदनहीनता ने देशवासियों को एक बार फिर से निराश ही किया है। देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे इस मुद्दे को लेकर कितने संवेदनहीन है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे इंडिया गेट पर गैंगरेप के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों की तुलना माओवादियों से कर देते हैं...वे कहते हैं कल माओवादी प्रदर्शन करें तो वे क्या माओवादियों से भी मिलने जाएं..?  आपको याद दिला दूं कि ये वही शिंदे हैं जो कोयला घोटाले पर कहते हैं कि लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है और लोग बफोर्स घोटाले की तरह कोयला घोटाले को भी जल्द भूल जाएंगे। इसका मतलब क्या शिंदे फिर से ये सोच रहे हैं कि दिल्ली गैंगरेप को भी लोग जल्द भूल जाएंगे..? गजब करते हैं शिंदे साहब एक तरफ आप कहते हैं कि आप की भी तीन-तीन बेटियां हैं और आप इस घटना का दर्द समझते हैं और महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंतित हैं...लेकिन एक तरफ आपका ये असंवेदनहीन बयान..! बढ़िया है शिंदे साहब आप भी अपने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के नक्शेकदम पर चल रहे हैं..! वैसे बात चारों तरफ गैंगरेप के आरोपियों को मौत की सजा देने की हो रही है लेकिन हम इस बात को नहीं नकार सकते कि मौत की सजा पाने वाले लोगों के पास इस सजा से बचने की काट भी मौजूद है...और वो काट है राष्ट्रपति भवन। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की ही बात कर लें तो उन्होंने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में 35 कैदियों की मौत की सजा माफ कर दरियादिली दिखाई थी...और खास बात ये है कि इनमें से 5 बलात्कार के बाद पीड़ित की नृशंस हत्या के जुर्म में मौत की सजा पाए हुए थे। मजे की बात तो ये है कि राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने यूपीए सरकार की सलाह पर ही मौत की सजा माफ करने के फैसले लिए थे। अब हम ये कैसे उम्मीद कर लें कि दिल्ली गैंगरेप या ऐसी हैवानियत करने वालों को अगर कानून में संशोधन के बाद मौत की सजा मिल भी जाती है तो वे लोग इसके अंजाम तक भी पहुंचाए जाएंगे। साथ ही ये मत भूलिए कि ये भारत है और इस देश की संसद पर हमला करने वाले आरोपी अफजल गुरु को घटना के 12 साल बाद भी फांसी नहीं दी जाती जबकि सर्वोच्च न्यायालय अफजल को फांसी की सजा सुना चुका है जबकि इसके विपरीत अमेरिका को देखिए चाहे आप अमेरिका की कितनी आलोचना कर लो लेकिन उसने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला करने वाले को उसके घर में घुसकर मारा और भारत में संसद के हमले के आरोपी की सरकार जेल में खातिरदारी कर रही है। 

deepaktiwari555@gmail.com

Emotion's: बाहर कोई मां नही जो तूझे बचा लेगी.......

Emotion's: बाहर कोई मां नही जो तूझे बचा लेगी.......

दिल्ली गैंगरेप- जय हो मौनी बाबा की...


दिल्ली गैंगरेप पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के देश के नाम संबोधन की खबर आई तो लगा कि अपने पेटेंट दो दिन 15 अगस्त और 26 जनवरी को बोलने वाले मनमोहन सिंह गैंगरेप के विरोध में गुस्से में उबल रहे देश के सामने कोई ऐसी बात करेंगे जिससे शायद लोगो को गुस्सा कम हो...लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ। जैसी की उम्मीद थी मनमोहन सिंह हिंदी की बजाए अंग्रेजी में ही बोले- मनमोहन सिंह की अंग्रेजी इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने वाले और महानगरों में रहने वाले तो शायद समझ गए होंगे...लेकिन मनमोहन सिंह उन करोड़ो लोगों तक अपनी बात नहीं पहुंचा पाए जिनके लिए अंग्रेजी बोलने वाले आज भी किसी अंग्रेज से कम नहीं है और कौतहुल का विषय बने रहते हैं। जाहिर है ऐसे लोगों का तादाद लाखों में हैं जो देश में हर रोज बलात्कार के शिकार तो होते हैं लेकिन जब वे अपनी शिकायत लेकर पुलिस थाने में जाते हैं तो उन्हें दुत्कार दिया जाता है। वैसे अच्छा हुआ मनमोहन सिंह देश की भाषा हिंदी की बजाए अंग्रेजी में ही बोले क्योंकि जो कुछ भी मनमोहन सिंह बोले उससे ज्यादा कि उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती। मनमोहन सिंह को शायद इस घटना के बाद से देश में आया गुस्से का उबाल नहीं दिखाई दिया वर्ना मनमोहन सिंह अपने संबोधन में जिस इंसाफ की मांग देश कर रहा है उस इंसाफ की ओर कुछ कदम बढ़ाते जरूर दिखाते लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ और मनमोहन सिंह गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की तरह खुद भी बेटियों का बाप होने का हवाला देते हुए घटना पर सिर्फ दुख ही जताते दिखे। इसमें मनमोहन सिंह साहब का भी दोष नहीं है क्योंकि उनके बारे में कहा जाता है कि वे उतना ही बोलते हैं जितना बोलने का उन्हें कहा जाता है...आप सोच रहे होंगे कि आखिर देश के प्रधानमंत्री भी क्या किसी के कहने पर ही बोलते या चुप रहते हैं ! लेकिन चौंकिए मत यहां ऐसा भी होता है...सोचिए अगर ऐसा नहीं होता तो क्या मनमोहन सिंह अपने पेटेंट दो दिनों 15 अगस्त औऱ 26 जनवरी के अलावा किसी और मौके पर आपको बोलते हुए नहीं दिखाई देते। प्रधानमंत्री जी आपको नहीं बोलना है मत बोलिए...लेकिन बिना बोले ही कुछ ऐसा कर जाईये...एक ऐसी नजीर पेश कर दीजिए पीएम साहब कि दिल्ली में क्या देश में दिल्ली जैसी घटना की पुनरावृत्ति फिर न हो...हाथ जोड़कर निवेदन है आपसे।

deepaktiwari555@gmail.com

23.12.12

मोदी को डर व लालच में दिया मुसलमानों ने वोट


गुजरात विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को रिझाने का प्रहसन करने के बावजूद एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिए पर सभी राजनीति जानकार चक्कर में पड़ गए। और मजे की बात ये रही कि मोदी को मुस्लिम बहुल सीटों पर वोट भी भरपूर मिले। इससे विश्लेषकों की माथापच्ची और बढ़ गई। वे यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आखिर इसकी वजह क्या है। इस बीच खुद भाजपा के ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने यह कह कर सभी को चौंका दिया है कि गुजरात में मुसलमानों ने भी नरेंद्र मोदी को वोट दिया, क्योंकि इसके पीछे उनका डर व लालच था। डर इस बात का कि वे मोदी के खिलाफ जाकर उनकी आंखों की किरकिरी नहीं बनना चाहते थे और लालच था विकास का।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने मोदी को ही वोट दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि मोदी की ही सरकार बननी है तो फिर काहे को उनसे दुश्मनी मोल ली जाए। उनकी इस बात में काफ दम नजर आता है। इसके पीछे एक तर्क भी समझ में आता है। वो यह कि मोदी के राज में गिनती के कट्टरपंथी मुसलमानों को उन्होंने कुचल दिया, इस कारण टकराव मोल लेने वाला कोई रहा ही नहीं। रहा सवाल शांतिप्रिय व व्यापार करने वाले अधिकतर मुसलमान का तो उसे तो अमन की जिंदगी चाहिए, फिर भले ही सरकार मोदी ही क्यों न हो। वह यह भी जानता है कि मोदी रहे तो कट्टरपंथी कभी उठ ही नहीं पाएगा, ऐसे में टकराव कौन मोल लेगा। यही सोच कर उन्होंने मोदी को वोट दिया। कदाचित वे यह समझते थे कि अगर कांग्रेस आई तो एक बार फिर तुष्टिकरण के चलते कट्टरपंथी ताकतवर होगा कि उनकी शांतिप्रिय जिंदगी के लिए परेशानी का सबब ही बनेगा। ऐसे में बेहतर यही है कि मोद को वोट दे दिया जाए, ताकि मोदी खुश भी हो जाएं ओर तंग नहीं करें।
मुसलमानों के दमन का आरोप झेल रहे मोदी के लिए यह राहत की बात रही कि एक भी मुसलमान को टिकट नहीं देने के बाद भी मुसलमानों ने उनका समर्थन किया। शायद इसी वजह से उन्होंने अपनी जीत के बाद आयोजित सबसे पहली सभा में इशारों ही इशारों में मुसलमानों से उन्हें हुई किसी भी प्रकार की तकलीफ के लिए माफी मांग ली।
-तेजवानी गिरधर

दिल्ली गैंगरेप- ओबामा रोते हैं...हम क्यों सोते हैं !


दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ शनिवार और रविवार तो इंडिया गेट से लेकर रायसीना हिल्स तक जो हुआ वो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। सरकार और पुलिस के खिलाफ गुस्से का ऐसा ज्वार शायद ही इससे पहले कभी फूटा होगा। गैंगरेप की शिकार पीड़ित के लिए इंसाफ की मांग कर रहे युवा मानो किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। लेकिन एक बार फिर से एक जनांदोलन का दमन करने की कोशिश दिल्ली पुलिस और सरकार ने की...लेकिन दमन की कोशिश ने गुस्से की आग को और ज्यादा भड़का दिया है। अमेरिका में एक स्कूल में एक सिरफिरे की अंधाधुंध फायरिंग 20 बच्चों समेत 28 लोगों की दुखद मौत हो जाती है तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा घटना पर दुख जताते हैं...लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राजा भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी साहब को न तो राष्ट्रपति भवन के बाहर गैंगरेप के खिलाफ हजारों लोगों का जनाक्रोश दिखा और न ही राष्ट्रपति ने इस जघन्य कृत्य की निंदा में दो शब्द ही कहे। मौनी बाबा की उपाधि पा चुके हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एफडीआई के मुद्दे पर तो देश को संबोधित करते हैं लेकिन एक जघन्य अपराध के बाद उसकी निंदा करने का वक्त उनके पास नहीं है। अमेरिका को ऐसे ही दुनिया का सरताज नहीं कहा जाता...9/11 के आरोपियों को अमेरिका उसके घर में घुसकर मारता है तो 26/11 के आरोपी कसाब की सुरक्षा पर भारत करोड़ों रुपए खर्च करता है (फांसी को काफी दवाब के बाद और काफी देर से दी गई) और 26/11 के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को हमारे देश के गृहमंत्री “श्री” अफजल गुरु कहकर संबोधित करते हैं...शायद यही फर्क है भारत और अमेरिका में। दिल्ली गैंगरेप पीड़ित का ईलाज कर रहे डॉक्टरों का बयान साफ बयां करता है कि चलती बस में लड़की के साथ जो दरिंदगी हुई है वो कम से कम कोई इंसान तो नहीं कर सकते...ये काम सिर्फ शैतान ही कर सकते हैं और ऐसे शैतान कानून के मुताबिक सजा होने के बाद भी समाज के लिए खतरा ही बने रहेंगे...जाहिर है ऐसे हैवानियत करने वालों के लिए मौत की सजा भी कम है। लेकिन अफसोस है कि हमारे देश की सरकार देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर एक मासूम के साथ दरिंदगी का खेल खेलने वाले अपराधियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने की बात करने से घबराती हुई नजर आ रही है और दुर्भाग्य देखिए देश का...पहले तो इंसाफ की मांग करने वालों को इंडिया गेट तक पहुंचने से रोकने के लिए मेट्रो स्टेशन के साथ ही इंडिया गेट को जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए जाते हैं...और इसके बाद भी प्रदर्शनकारी इंडिया गेट पर पहुंच जाते हैं तो उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं और लाठियां बरसाई जाती हैं। एक लड़की के साथ हैवानियत का खेल खेला जाता है और उसके लिए इंसाफ की मांग करने वाली लड़कियों पर लोगों की रक्षा करने का बीड़ा उठाने वाली हमारी बहादुर पुलिस लाठियां बरसाती हैं...हालांकि ये बात सभी जानते हैं कि पुलिसवाले भी सरकार के इशारे पर ही ये काम कर रहे थे। इसके बाद भी विडंबना देखिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे और कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित जब इंडिया गेट पर पुलिसिया कार्रवाई के लिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें हटाने की मांग करते हैं तो उनकी माता जी उनके सुर में सुर मिलाती हैं...और कमिश्नर के सिर सारा ठीकरा फोड़ देती हैं...और कमिश्नर को हटाने की बात कहती हैं...क्या ऐसा संभव है कि दिल्ली के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले और कड़ी सुरक्षा वाले इलाके में जहां एक तरफ राष्ट्रपति भवन है तो दूसरी तरफ संसद वहां पर हजारों लोग प्रदर्शन करते हैं और उन पर लाठियां बरसती हैं और ये बिना दिल्ली की मुख्यमंत्री की जानकारी के हुआ हो ? लेकिन इसके खिलाफ जब जनाक्रोश भड़कता है तो माननीय मुख्यमंत्री साहिबा इसके लिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर को दोषी ठहराती हैं। जाहिर है शीला दीक्षित जानती हैं कि ये जनाक्रोश कहीं 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनकी कुर्सी न हिला दे शायद इसलिए पहले शीला दीक्षित के कांग्रेस सांसद बेटे संदीप दीक्षित दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हटाने की बात कहते हैं और इसके बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित उनके सुर में सुर मिलाती हैं...लेकिन षीला जी ये भूल गई कि ये पब्लिक है...ये सब जानती है। उम्मीद करते हैं ये आंदोलन अपने अंजाम तक पहुंचे...पीड़ित को इंसाफ मिले और दोषियों को मौत की सजा।

deepaktiwari555@gmail.com


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माँगने गये न्याय और मिला क्रूर अत्याचार


माँगने गये न्याय और मिला क्रूर अत्याचार 

जलियाँवाला  काण्ड फिरंगियों ने गुलाम भारतीयों  पर किया उसे भूलना मुश्किल है
क्योंकि इस देश में आजादी के बाद भी आजाद भारतीयों पर इस तरह के क्रूर काण्ड
होते रहते हैं।

कानून जनता के लिए, जनता के द्वारा, होता है मगर इस देश के अहंकारी नेता इस तथ्य
को भूल जाते हैं। जब-जब भी इस देश में कोई अनाचार, अत्याचार होता है इस देश की
सरकार या तो खोटे  लुभावने वायदे करती है या कोरे आश्वासन देती है मगर पीड़ा का
माकूल ईलाज नहीं करती है , यह प्रश्न युवा भारतीयों से सहा नहीं जाता है और इसका
ठोस उत्तर पाने के लिये जब भी देश की संसद की ओर कूच करता है उसे मार-ठोक कर
भगा दिया जाता है।

जब -जब भी देश में कानून व्यवस्था पंगु और जर्जर हुयी है उसका खामियाजा आम
जनता को ही भुगतना पड़ा है क्योंकि विशिष्ट लोगों की सुरक्षा हो जाती है। संसद में
अच्छी लच्छेदार भाषा में बहस हो जाती है और स्वार्थी पक्ष देश हित को गौण करके
बहुमत के जोर पर कुछ भी करा लेने में सक्षम हो जाते हैं।क्या इसे ही सच्ची और सही
आजादी कहा जाएगा?

एक बेटी की इज्जत सरे आम देश की राजधानी में तार-तार हो जाती है परन्तु इस देश
की सरकार उस बेटी से अपनी जर्जर व्यवस्था के कारण हुए क्रूर अत्याचार के लिए उस
बेटी से माफी के दौ शब्द तक नहीं कह पाती है,यह सरकार देश को यह भी आश्वासन नहीं
दे पाती है कि आगे से हमारी व्यवस्था में ठोस परिवर्तन किये जायेंगे और किसी भी बेटी
को बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का सामना नहीं करना पडेगा।

   यदि यह बेटी किसी बड़े नेता की होती तो क्या संसद चुप बैठ जाती ?क्या जो बेटे न्याय
की गुहार लगाने सडकों पर उतरे वो यदि किसी नेता के होते और उस पर पुलिस अमानवीय
तरीके से लाठियाँ बरसाती तो नेता चुपचाप सहन कर लेते? आम जनता को कह देते हैं कि
सब्र रखिये कानून अपना काम कर  रहा है मगर यह वाकया किसी विशिष्ट के घर पर घटता
तो न्याय की परिभाषा तुरंत नहीं बदल जाती? मगर आम जनता की किसे पड़ी है? वह  तो
वोट दे दे और पाँच साल के लिए सहती रहे।

     मुझे गर्व होता है उन युवाओं पर जो अपरिचित बेटी,बहन के लिए सरकार से टकरा रहे हैं
मुझे गर्व है उन बहनों पर जो लाठियां खाकर भी इस संग्राम में खड़ी है।मुझे गर्व है उन वृद्ध
पुज्यनीयों पर जो भयंकर सर्दी में भी कड़े कानून के लिए ठिठुर रहे हैं ,मगर हमारे सिस्टम
का जर्जरित ढाँचा देश का सिर झुक देता है।

    जो नेता देश की अस्मिता की कसम खाते हैं वे देश की बेटियों को त्वरित कानून देने में भी
ढील कर रहे हैं,यह देश का पहला बलात्कार नहीं है ,जनता सहन करती आई है इसलिए और
सहन करती रहे क्या यही व्यवस्था बची रह जायेगी?

  जब भी कोई जन आन्दोलन देश करता है चाहे वह भ्रष्टाचार के खिलाफ हो या लच्चर व्यवस्था
के खिलाफ ,सरकार अपनी कमी को सुधारने की जगह जनता पर ही दमन कर देती है। इस
नजरिये को बदलना पड़ेगा क्योंकि आज का युवा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बन रहा है।             

22.12.12

अनुवांशिकी


[ अनुवांशिकी ]
* मैं सोचता हूँ , यदि कोई वैज्ञानिक सचमुच पूरी निष्पक्षता से , निरपेक्ष ढंग से खोज करके यह पाए कि अनुवांशिकी का प्रभाव व्यक्ति के गुण और व्यवहार पर होता है , तो क्या जातिवादी लेखक - विचारक उसे हिन्दुस्तान में जीने देंगे ? लेकिन मैं यह अनुभव करता हूँ कि व्यक्ति अपने कमरों / घर को किस रंग से पुतवाता है , या बाथरूम के टाइल्स की क्या डिज़ाइन और कलर चुनता है , यह तय करने में उसकी अनुवांशिकी का पर्याप्त हाथ होता है |

[ सवर्ण कथा ]
१ - - पापा फेस बुक पर एक किताब की बड़ी चर्चा होती है | मनुस्मृति नाम है उसका | आप ब्राह्मण हैं तो आप के पास वह ज़रूर होनी चाहिए | मुझे भी पढ़ने को दीजिये न !
= नहीं बेटा, मेरे पास तो गीता रामायण भर है | महाभारत भी घर में नहीं रखता | हाँ पड़ोस के अंकल जी से माँग लो | उनके पास ज़रूर होगी | वे आरक्षण समर्थक हैं | आजकल वही लोग मनुस्मृति ज्यादा पढ़ते हैं |

* पचास वर्षों तक प्रेम में आकंठ मुब्तिला रहने  के बाद अब मुझे अनुभव हो रहा है कि प्रेम सचमुच एक रोग ही है | इसमें आनंद बहुत आता है , मीठा मीठा दर्द होता है और महसूस होता है कि हम हवा में उड़ रहे हैं | लेकिन है यह  एक  बीमारी ही |

* दर्शन का काम है तो 'जानना' | लेकिन जानकर वह क्या करेगा ? क्या करता वह जानकारियाँ इकठ्ठा करके ? इसलिए उसका काम हो गया है - आदमी का जीवन कैसे सुखी हो , इसके बारे में सोचना और उसका मार्ग बताना | मनुष्य कैसे प्रसन्न रहे , यह ज़िम्मेदारी है अब दर्शन शास्त्र की | मेरी परिभाषा के अनुसार मानव मात्र को खुश और प्रसन्न देखना ही " दर्शन " है |

* आप चाहें , न चाहें सर्वदलीय , सर्व धर्मी  , सर्व देशीय , सर्व समावेशी सरकार | लेकिन सड़क समाज तो ऐसा होता जा रहा है | अस्पताल डफरिन भी है , झलकारी बाई , श्यामा प्रसाद मुखर्जी , और राम मनोहर लोहिया के भी हैं | इसी प्रकार सड़कें , गलियाँ और पार्क - मोहल्ले भी हैं | कुछ नाम ज़रूर आने शेष हैं पर वे घरों - जलसों में तो प्रतिष्ठा पा ही गए हैं , देर सवेर बाहर भी आ ही जायेंगे | आश्चर्य नहीं कि घरों से निकल कर कब मार्क्स , लेनिन , माओ , हिटलर , नाथू राम गोडसे भी सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित हो जायँ !

शायद धूप


* बलात्कारों के विषय में मेरी अक्ल कुछ काम नहीं कर रही है |

* बलात्कारी को फाँसी , और हत्यारे को प्रधान मंत्री की गद्दी ?

* अप्रामाणिक विचार =
मेरा ख्याल या विचार था कि लडकियाँ पुरुष मित्र बनाने से सुरक्षित होती हैं , उसी प्रकार जैसे पति करने से | दोनों ही बातें गलत साबित हुयीं | पति और पुरुष मित्र के समक्ष भी बलात्कार हो जाते हैं |

* सोचता हूँ , शिव सेना या माओ सेना का आतंक क्या दिल्ली में नहीं होना चाहिए ?

* नैतिकता जिद से आती है | पुरुषों को यह गाँठ बाँधना होगा कि उन्हें औरतों का आदर करना है , माँ समझकर - बहन समझकर या देवी समझकर | या यही समझकर कि वे हमारी रक्षिता हैं | इसमें कोई बुराई नहीं है , भले असमानता का कुछ अंश है | मानना पड़ेगा कि व्यवहारों में विसंगति के कारणों में एक छोटा सा हिस्सा बराबरी और समतावाद का भी है | बराबर हो तो भुगतो | लो करो बराबरी | इसमें तो ताक़तवरों की चाँदी होती है | औरत यदि थोड़ी कमज़ोर दिख जायगी तो उसका कुछ नुक्सान नहीं हो जायगा | लेकिन नहीं , वे न बाप की मानेंगी , न बूढ़ों की सुनेगी | तो जवान भी उनकी नहीं सुनने वाले |

* तथापि , दिन दूर नहीं जब लडकियाँ बलात्कार से बचने में सक्षम और समर्थ हो जायेंगी |

* नवाब लोग पान खाते थे तो उनके बगल में पीक दान भी रहता था | अब के नवाब तो पूरी सड़क को पीकदान बनाये हुए हैं |

* शायद धूप
कुछ निकल आये
कविता लिखूँ |
[ 'शायद धूप' नाम से मेरी कविता / हाइकू की कोई किताब हो सकती है ]

* थोडा ओंकार
ज्यादा सा अहंकार
मेरी ज़िन्दगी |

* लाभकारी है
निरुद्देश्य घूमना भी
यह जानिए |

* शांत चित्त हो
बैठो हमारे पास
उपासन में |

* शून्य में जाओ
जब भी मौक़ा मिले
ध्यान प्रणाली |

* अच्छा होता है
शून्य में विचरण
शांति समग्र |

* मिलेगा उसे
जो उसका देय है
निश्चित मानो |

* समतावादी
अपने बराबर
किसी को नहीं |

* पड़ता ही है
चाहना को रोकना
कुछ न कुछ |

* चाहें न चाहें
कोई लड़कियों को
मारता नहीं |

* यही तो हुआ
कि तुम बूढ़ी हुई
मैं बूढ़ा हुआ !

* बहुत आये
तुम्हारे जैसे बली
बहुत गए |

* कहा तो मैंने
मुझे प्यार चाहिए
सुनो तब न !

* कोई इंतज़ार
बढ़ा देता है उम्र
अनेक बार |

* नो प्राबलम
बहुत बड़ा मन्त्र
जीवनाधार |

* एक उम्मीद
हज़ार नेमत है
जीवन दायी |

* अन्याय होता
अन्याय लगता भी
कुछ ज्यादा है |

* लिखता जाऊँ
ख़त्म ही नहीं होतीं
बातें , क्या करूँ ?

* Do you know God ? If you know God , send him a friend request .:-)

* देखिये , अन्याय होता तो है | लेकिन इसके साथ यह भी है कि कौन किस बात को और कहाँ  तक किसी बात को अन्याय समझता है, इससे भी फर्क पड़ता है | वह उदाहरण लिख दूँ, जिससे यह विचार आया | मान लीजिये आप के किसी अवैध कब्ज़े को पालिका कर्मियों ने उजाड़ दिया , या ट्रैफिक वाले ने आपका चालान कर दिया | ज़ाहिर है , आप ने उन्हें देख -पहचान लिया | आप इज्ज़तदार -रसूखदार हैं | आपने इसे अपनी बेईज्ज़ती समझी और अवसर पाकर उन्हें पीट दिया बिना यह सोचे कि वे तो अपना  कर्तव्य निभा रहे थे | [ यही आजकल अधिकाँश हो ही रहा है ] | इसलिए मेरी स्थापना यह है कि इस तरह का अपमान हो या सचमुच का , अन्याय हो या अन्याय होता लगे , किसी भी दशा में बल अथवा शस्त्र का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए |

* [ उवाच ]
# आत्मसंयम का नाम है संस्कृति - संस्कार | बलात संयम को कहते हैं राजनीति- सरकार |
# हास्य आदमी के अहंकार को मिटाने में मदद करता है | वह किसी के मजाक का बुरा जो नहीं मानता  !
# यदि मैं जानता और मानता हूँ कि ' भय बिनु होय न प्रीत ' , तो मुझे इस्लाम की कथित कड़ाई का समर्थन करना चाहिए |
# आप ने किसी से उसकी जात पूछ ली , तो यकीन मानिए आपने तो अपनी जात बता दी |
# मुझे कुछ शब्दों से आपत्ति है , जिसे मैं शब्दों के द्वारा व्यक्त करता हूँ |  OR =
मेरे कुछ शब्दों का , शब्दों के लिए , शब्दों के द्वारा विरोध है | [अस्पष्ट?]
# कनेक्टिकट विद्यालय में हुए संहार की घटना को सन्दर्भ में लें | अब समय आ गया है कि अस्त्रों का सम्पूर्ण समापन करें और " किसी का भी किसी भी दशा में वध नहीं का मन्त्र अपनाएँ " |

* [ अमानव वाद ]
# मत बंद कीजिये /
अपने जानवर का दरबा /
वरना जानवर अन्दर /
बंद हो जायगा /
तुम्हे ज्यादा जानवर बना देगा | $

# [ अमानव वादी ]
आप होंगे मनुष्य /
यह नाम तो आपने दिया /
मुझको गलत , जैसे /
किसी का नाम आपने /
ईश्वर दे दिया /
वरना मै तो जानवर हैं /
यह नाम मैं अपने लिए /
स्वीकार करता /
धारण करता हूँ /
अपने पशु बंधुओं के साथ /
भाईचारे में | $

# मनुष्य बनने , या कहें , महज़ कहलाने के चक्कर में हम कई असहज -अस्वाभाविक -अप्राकृतिक और  गैर ज़रूरी किंवा , आप की भाषा में अमानवीय हरकतें कर जाते हैं कि हम जानवरों को शर्म आती है | क्योंकि वे साधारण जैविक आचरण के विरुद्ध होती हैं |

* बीड़ी पिया था उसने
उसने मुझे चूमा
सर अभी तक
चकरा रहा है |
$
* ऐसा करेंगे
वह मिलें तो हम
वैसा करेंगे
सोचता रह गया
क्या क्या करेंगे ?
$
[ BADMESH ]
* उर्दू और हिंदी में वही फर्क है जो मुशायरे / कवि सम्मलेन के दौरान नीरज और बशीर बद्र में है |
[सुना है जहाँ नीरज जाते हैं वहां बशीर बद्र नहीं जाते, और जहाँ बशीर बद्र होते हैं वहां नीरज नहीं होते]

* वेश्या वृत्ति कानूनी होनी चाहिए या नहीं , यह उसी तरह का प्रश्न है जैसे F D I आनी चाहिए या नहीं ?

[बदमाश चिंतन]
* यदि किसी को सपने बहुत आते हैं , तो उसे स्वप्न दोष का रोगी नहीं माना जा सकता |
* मुझे बूढ़ों का व्यक्तित्व बहुत जमता है | इरफ़ान हबीब , हबीब तनवीर , रजनी कोठारी को मैंने देखा और सराहा है | अब मुझे बूढ़ा होना अच्छा लगने लगा है |
* मुझसे कोई व्यापार करा ले , और मेरा दिवाला निकलने से बच जाए तो मैं अपनी जाति और पूरी जाति प्रथा के खिलाफ हो जाऊँगा |

[ शेरो शायरी ]
* जेहि विधि मिले खूब विज्ञापन ,
समझो पत्रकारिता आपन |

* खुद के घर तो बहुत हैं , उनमें वह रहता नहीं है ,
कभी वह घर पर हो, तो सोचता हूँ मिल आऊँ |

* हर आदमी चालाक बहुत है , अपनी अपनी पारी में ,
हर मनई बुरबक है भारी , अपनी अपनी पारी में |
मुँह बाये हर लोग यहाँ पर अमृत घट पी जाने को ,
हर मनाई गू खोद रहा है अपनी अपनी पारी में ||

* न हिंदी से मेरा नाता , न उर्दू से मेरा मतलब ,
जसमे बातें मेरी आ जायँ, वही भाषा मकतब |

* एक शायर का यह मिसरा बहुत प्रभाव शाली है =
" तुम्हारे क़दमों को रोक पाए , किसी में इतनी मजाल क्या है "

दिल्ली गैंगरेप- यार ये लड़की ऐसी ही होगी !


बात आज सुबह की ही है...एक तरफ दिल्ली में राजपथ पर गैंगरेप के विरोध में हजारों युवाओं का आक्रोश अपने चरम पर था और पीड़ित को इंसाफ दिलाने के लिए युवा किसी भी हद को पार करने के लिए तैयार थे...दूसरी तरफ एक वाक्या जो मेरे सामने घटित हुआ वो वाकई में सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या इंसाफ की मांग को लेकर...आरोपियों की फांसी की मांग को लेकर जो हजारों युवा किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं...उनका आक्रोश क्या दोबारा ऐसी ही घटनाओं को होने से रोकने के लिए काफी है ? क्या वाकई में ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी ? एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर राजपाथ पर युवाओं का आक्रोश देखने के बाद कुछ देर के लिए घर के पास ही एक बार्बर की शॉप पर मैं सेविंग करवाने पहुंचा। अपनी बारी का इंतजार कर रहा था इसी बीच वहीं पहुंचे दो युवाओं की बातों ने अंदर तक झकझोर के रख दिया था। दोनों की जुबान पर भी दिल्ली गैंगरेप की चर्चा थी...लेकिन सोच का फर्क साफ दिखाई दिया। घटना को याद करते हुए उनमें से एक युवा दिल्ली गैंगरेप पीड़ित के बारे में अभद्र टिप्पणी करता है। वो अपने साथी से कहता है कि यार वो लड़की ऐसी ही रही होगी...ऐसी लड़कियों के साथ ऐसा ही होना चाहिए। मैंने इस पर आपत्ति जताई और उनसे कहा कि कैसे आप किसी के लिए ऐसा सोच सकते हो वे उल्टा इस पर बहस करने लगे और अपनी बात को सही ठहराने लगे। इस वाक्ये से कई सवाल जेहन में उठते हैं जिनका जवाब ढ़ूंढा जाना बेहद जरूरी है...मसलन क्या सिर्फ कड़े कानून बनाए जाने से और आरोपियों को फांसी देने से देशभर में सड़कों पर आक्रोश जताना इस बात की गारंटी होगी कि आगे कोई और लड़की इस तरह के वहशीपन का शिकार नहीं होगी...या कोई और बलात्कार किसी लड़की के साथ नहीं होगा ? क्या इस सब से इंसानों के बीच में समाज में रह रहे भेड़िए जो मौका मिलते ही इस वहशीपन को अंजाम देते हैं उनकी सोच में उनकी मानसिकता में बदलाव आ पाएगा ? जाहिर है सिर्फ कानून कड़े करने से...आरोपियों को सख्त से सख्त सजा देने से ऐसे अपराध नहीं रूकेंगे और समय समय पर ऐसी घटनाएं जो कि दुर्भाग्यपूर्ण हैं आगे भी घटित होती रहेंगी। जब तक लोगों की सोच में बदलाव नहीं आएगा...उनकी मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा ऐसे अपराधों को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। ये घटिया सोच नहीं तो और क्या है कि जहां एक तरफ दिल्ली में लड़की के साथ हुए वहशीपन के खिलाफ देश सड़कों पर उतरकर अपना आक्रोश जता रहा था तो दूसरी तरफ कुछ ऐसी सोच वाले लोग भी थे जो इस वहशीपन के लिए भी पीड़ित को ही जिम्मेदार ठहरा रहे थे। जब तक ये सोच नहीं बदलेगी हालात नहीं सुधरेंगे और आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर अंदर तक झकझोर देने वाले दिल्ली गैंगरेप जैसे जघन्य कृत्य आगे हमें सुनने को मिलें...क्योंकि हमारे समाज में ऐसे लोग मौजूद हैं जो लड़कियों/महिलाओं को सिर्फ और सिर्फ सेक्स की नजरों से देखते हैं और मनोरंजन का सामान समझते हैं और ये वही लोग हैं जो कभी गुवाहाटी में तो कभी दिल्ली में न सिर्फ महिलाओं की ईज्जत को तार – तार करते हैं बल्कि उनका जीवन नर्क बना देते हैं। ये लोग इतना तक नहीं सोचते कि जिसने इनको जन्म दिया है वो भी एक महिला है औऱ इनके घर में भी मां-बहनें हैं...काश ये चीजें इनको समझ में आती। आखिर मैं कहना चाहूंगा कि दिल्ली गैंगरेप पीड़ित को जल्द से जल्द इंसाफ मिले और इस जघन्य कृत्य को अंजाम देने वाले आरोपियों के लिए फांसी की सजा भी कम होगी क्योंकि फांसी से उन्हें तो एक बार में मौत मिल जाएगी...लेकिन इन आरोपियों ने पीड़ित को जो जख्म दिए हैं वो शायद ही कभी भर पाएंगे।

deepaktiwari555@gmail.com

पगथिया: विकृत सोच से बढ़ते हैं अपराध

पगथिया: विकृत सोच से बढ़ते हैं अपराध: विकृत सोच से बढ़ते हैं अपराध  बुरी चीज शीघ्र फैल जाती है क्योंकि उसमें शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं पडती है। किसी चीज के निर्माण में काफ...

21.12.12

बलात्कारी संस्कृति के लिए दोषी कौन?-ब्रज की दुनिया


मित्रों,जब मैं बच्चा था तब अक्सर देखा करता था कि बकरी का नर बच्चा अक्सर अपनी सहोदर बहनों और जन्मदात्री माँ के साथ सेक्स संबंध बनाने को उतावला हो उठता था। तब मैं सोंचता था कि क्या भविष्य में हम भारतीयों की भी यही स्थिति होनेवाली है? भारतीयों की इसलिए क्योंकि तब तक पश्चिम के समाज के बारे में मैं सुन-पढ़कर जान चुका था वहाँ इहलोकवाद का तूफान काफी समय से चल रहा है और वहाँ का समाज जानवरों के समाज की तरह काफी हद तक सेक्स-फ्री हो चुका है। मैं सोंचता था कि क्या भविष्य में विश्वगुरू भारत में भी शरीर और सेक्स-संतुष्टि का महत्त्व इतना ज्यादा हो जाएगा कि सारे रिश्तों की गरिमा तार-तार कर दी जाएंगी? दुर्भाग्यवश वह समय बहुत जल्दी और मेरे अनुमान के विपरीत मेरी जिन्दगी में ही आ गया है। आज जब भी मैं समाचार-पत्रों में पढ़ता हूँ कि गुरू ने शिष्या का यौन-शोषण या बलात्कार किया,आज जब भी किसी पिता की खुद अपनी ही बेटी के प्रति हैवानियत की खबरें देखता या पढ़ता हूँ तो मुझे वह बचपनवाला बकरी का बच्चा याद आ जाता है। आखिर क्यों हुआ ऐसा और हुआ भी तो इतनी तेजी से क्यों हुआ? क्यों इतनी जल्दी हम भारतीयों की ईन्सानियत मर गई? ज्यादा नहीं पचास साल पहले का भारत तो बिल्कुल भी ऐसा नहीं था।
              मित्रों,दरअसल पिछले पचास सालों में हमारा समाज काफी कुछ बदला है। हमारे समाज ने इन पचास सालों में पहले थियेटरों/सिनेमाघरों में फिल्मों को देखा,फिर रेडियो पर मादक फिल्मी गीतों को सुना,फिर टेलीवीजन ने हमारे घरों को ही सिनेमाघर बना दिया और उल्टे-सीधे धारावाहिक दिखाए और अंत में आया इन्टरनेट जिसने अश्लील वीडियो-फिल्मों को पहले घर-घर और फिर मोबाईल-मोबाईल तक पहुँचा दिया। पिछले पचास सालों में वैज्ञानिकता के नाम पर सरकारी प्रचार-माध्यमों और सरकारी पाठ्यक्रमों ने हमारी धार्मिक मान्यताओं पर मरणान्तक प्रहार किया और लोगों की धार्मिक-आस्थाओं की ऐसी की तैसी कर दी। हम भूल गए आईन्सटीन की चेतावनी को कि बिना धर्म के विज्ञान अंधा होता है। हम भूल गए कि विज्ञान हमारे जीवन को आसान बना सकता है लेकिन नैतिक-मूल्यों के प्रति हमारे मन में आस्था उत्पन्न नहीं कर सकता। आज का औसत भारतीय परलोक की बिल्कुल भी चिन्ता नहीं करता और उसके लिए अगर पैसा ही भगवान हो गया है,तो क्यों? क्यों आज का भारतीय न तो ईश्वर को मानता है और न ही उससे डरता है? क्योंकि पहले तो हमने भारतीय-विश्वास और अध्यात्म की धज्जियाँ उसको विज्ञान की कसौटी पर कसकर उड़ा दीं (जबकि आस्था विश्वास करने की चीज है न कि तर्क या विज्ञान की कसौटी पर कसने की) और जब हमारे देशवासियों के दिमाग से परलोकवाद और ईश्वर निकल गया या उसका प्रभाव कमजोर पड़ गया तब हमने उसमें अश्लीलता भर दी। इतना ही नहीं हमारी सरकारों ने कथित रूप से खाली खजानों को भरने के लिए जनता के हाथों में शैतान का पर्याय शराब की बोतलें भी पकड़ा दीं। पीयो और खुद को भी भूल जाओ। भूल जाओ सारे रिश्तों की अहमियत को,भूल जाओ कि तुम एक ईन्सान हो।
             मित्रों,आज जबकि रह-रहकर बलात्कार की दिलो-दिमाग को हिला देनेवाली घटनाएँ सामने आने लगी हैं तो हम अपने दिमाग के कार्बुरेटर में आ गए कचरे को साफ करने की बात नहीं कर रहे और सतही या बाहरी उपाय करने में लगे हैं। हम बसों के शीशों का रंग बदलने की बात कर रहे हैं और बसों से पर्दा हटाने का आदेश दे रहे हैं। हम अति हास्यास्पद तरीके से कभी बलात्कारियों को फाँसी देने की मांग कर रहे हैं तो कभी रात में चलनेवाले बसों में बल्ब जलाए रखने का निर्देश दे रहे हैं। मैं पूछता हूँ कि ऐसे तुगलकी आदेशों का अक्षरशः पालन करवाएगा कौन? मैं पूछता हूँ कि क्या वर्तमान भारत में सिर्फ बसों में ही बलात्कार किए जा रहे हैं? अगर कोई बाप अपनी बेटी या कोई भाई अपने बहन की अस्मत पर खुद ही हाथ डालता है तो क्या उसे हमारी कोई भी सरकार या कानून रोक सकता है? क्यों आज हमारी बहनों को सबसे ज्यादा खतरा खुद के घर में ही है? क्यों जनता की जान-माल और अस्मत की रक्षा के लिए बनाए गए थानों में ही सबसे ज्यादा बलात्कार की घटनाएँ होती हैं? क्या इन सवाल पर कभी हमारे सिरफिरे राजनेताओं और नीति-नियंताओं ने विचार किया है? क्या उन्होंने कभी गंभीरतापूर्वक विचार किया है कि क्यों आज का औसत भारतीय ईन्सान से जानवर बनता जा रहा है और इस नैतिक गिरावट को कैसे रोका जा सकता है? क्या उनके दिमाग ने कभी इस बात पर चिन्तन किया है कि ऐसे क्या उपाय किए जाने चाहिए जिससे ईन्सान के बच्चे और बकरी के बच्चे के बीच का अंतर पुनर्स्थापित हो सके?
              मित्रों,यदि वे लोग ऐसा नहीं सोंच रहे हैं तो फिर मुझे बड़े दुःख के साथ स्वीकार करना पड़ेगा कि निकट-भविष्य में बलात्कार की घटनाएँ रूकना तो दूर कम भी नहीं होनेवाली हैं। अगर हम शिक्षा-प्रणाली सहित हर बात में पश्चिम का अंधानुकरण करेंगे तो हम भारत को ऐसा विचित्र भारत बनाकर रख देंगे जिसे भारत का कोमल हृदय कभी भी स्वीकार नहीं करेगा। कहना न होगा कि अगर हम एक आम भारतीय को फिर से जानवर से ईन्सान बनाना चाहते हैं तो हमें अपने बच्चों को एक बार फिर से वेदों और उपनिषदों की शिक्षा देनी पड़ेगी। एक बार फिर से यम,नियम,योग और ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ाना पड़ेगा। उनको शंकर के मायावाद,अद्वैतवाद और रामानुज के विशिष्टाद्वैतवाद की शिक्षा देना होगी। हमें उनके दिलो-दिमाग में फिर से अपनी महान संस्कृति और ईश्वर के प्रति अटूट आस्था पैदा करनी पड़ेगी। अगर सरकारी स्कूलों में ऐसा पाठ्यक्रम लागू करने में हमारे नेताओं की कथित धर्मनिरपेक्षता बाधा बनती है तो उतार फेंकना होगा ऐसी भारतीयता व मानवता-विनाशक कथित धर्मनिरपेक्षता को तभी हम फिर से एक आम भारतीय को पशु से मानव और मानव से देवता बना पाएंगे और कविवर आरसी प्रसाद सिंह की तरह सिर उठाकर गा सकेंगे कि-हमारा देश भारत है नदी गोदावरी गंगा,लिखा भूगोल ने जिस पर हमारा चित्र बहुरंगा। जहाँ हर बाग है नंदन,जहाँ हर पेड़ है चंदन;जहाँ देवत्त्व भी करता मनुज के पुत्र का वंदन,मनुज के पुत्र का वंदन,मनुज के पुत्र का वंदन।।।

धर्म आराधना के साथ राष्ट्र सेवा: देश के रँगे हुए सियार

धर्म आराधना के साथ राष्ट्र सेवा: देश के रँगे हुए सियार: दोस्तों पुरे देश में एक ज्वाला भड़का हुआ है और ये हमारे देश और खुद हमारा बोया हुआ आग है जो आजसबको जला रहा है । आज जो धरना प्रदर्शन हो रहा है और युवा साथी और बहने भाग ले रही है देख के तोदिल में उम्मीद आती है लेकिन बस कैमरे पर अपनी छवि के अलावा इनमे सच का कोई भी गुस्सा याप्रतिशोध नहीं है इस घटिया समाज पर और ये खुद जो आज प्रदर्शन कर रहे है वो ही इसको बढ़ावा देने काकाम करते है इनको देशी शब्द और राष्ट्रीयता से उतना ही चिढ है जितना की एक सांड लाल कपड़ो सेचिढ़ता है । इस से पहले की आप मुझे गाली दे या फिर कुछ बोले मैं आपको कुछ दिखाना चाहूँगा 

1) अमेरिका में हर साल तकरीबन 96000 बलात्कार होते है और प्रति 100000 तकरीबन 33 बलात्कार होतेहै 
2) ब्रिटेन में हर साल तकरीबन 16000 बलात्कार होते है और प्रति 100000 उनका आंकड़ा तकरीबन 29 है 
3) आस्ट्रेलिया में हर साल तकरीबन 19000 बलात्कार होते है और प्रति 100000 उनका आंकड़ा तकरीबन92 के करीब आता है 
4) बेल्जियम में हर साल तकरीबन 3000 बलात्कार होते है और उनका प्रति 100000 आंकड़ा 29 आता है 
वैसे ही हर एक पश्चिमी और यूरोपीय देशो में बलात्कार बड़े पैमानों पर होती है और वो इसके लिए गंभीरभी नहीं है क्यूंकि उनके समाज में खुलापन है और वो इस से इतना चिंतित भी नहीं है ।
अब जरा आइये अपने देश की स्थिति समझते है 
80 के दशक में हमारे देश में प्रति साल बलात्कार 700 और प्रति 100000 ये आंकड़ा करीब 0.17 आता था 
90 के दशक में हमारे देश में प्रति साल बलात्कार 1800 और और प्रति 100000 ये आंकड़ा करीब 0.70 आताथा 
2000 के दशक में यही बलात्कार का आंकड़ा बस दस सालो में ही बढ़कर अचानक ही 6000 और प्रति100000 ये आंकड़ा करीब 1.6 आ गया 
और 2008 में यही आंकड़ा 6000 से बढ़कर करीब 9000 हो गया और प्रति 100000 ये आंकड़ा करीब  1.9करीब आ गया और अभी वर्तमान में हमारे देश में एक साल में कम से कम 19000 बहनों के साथ ऐसाकुकर्म होता है और प्रति 100000 ये आंकड़ा करीब करीब 2.5 के पर जा चूका है फिर भी ये पश्चिमी देशो केमुकाबले बहुत ही कम है और आज के हमारे यही युवा जो फेसबुक और रोड पर और इंडिया गेट पर हाथ मेंमोमबतिया लेके खड़े रहते है और लगता है की हमारे देश में कितने सुसंस्कृत युवा रहते है, लेकिन इन रँगेहुए सियारों को कोई जनता नहीं है की जब जिस्म और मर्डर फिल्म आती है और कोई भी फिल्म जो कीसमाज में अपने परिवार वालो के साथ नहीं देख सकते है तब आप देखेंगे की ये ही रँगे हुए सियार वह भीड़बनाये हुए है चाहे वो गूगल पर सन्नी लिओनि का सर्च हो या पूनम पाण्डेय और शर्लिन चोपड़ा केफोल्लोवेर्स हो सब यही है नहीं तो इन दो टेक की लडकियों की क्या औकात थी की ये पुरे भारत मेंलडकियो के प्रति सोच ही बदल के रख देती लेकिन ये हमारे रँगे हुए सियार ही है जो इन्हें आँखों औरपलको पर बैठाते है अगर ये फिल्मे न देखते तो इन फिल्मो के जो भांड निर्माता फिर से हिम्मत नहीं करतेलेकिन वो जब देखते है की हमारे देश के युवा को बस सेक्स चाहिए तो वो वही बनाते है क्यों सामाजिकमुद्दे पर फिल्मे फ्लॉप हो जाती है और बस उन्हें समाज का एक छोटा सा वर्ग ही पसंद करता है और क्योंएक छिछोरे से इन्सान को सुपर स्टार बना दिया जाता है वो इमरान जिसे एक सीधा संवाद बोलने नहींआता वो आज का सुपर स्टार है क्यों बस इन्ही सियारों के वजह से कई ऐसी गन्दी लड़किया जिन्हें सभ्यसमाज में देखना भी एक शर्म है वो आज टीवी और फिल्मो में आती है और तमाम विज्ञापनों में आती हैक्यूंकि विज्ञापन बनाने वाला जनता है की इसका उपयोग युवा ही करता है और आज तो चाहे वो साबुन होया खाने का कोई सामान या फिर पूजा या फिर कपडे का कोई विज्ञापन उसमे इतनी अश्लीलता परोसीजाती है क्यों क्यूंकि हम वही देखना पसंद करते है और इसी लिए वो बनते है हमें याद रखना चाहिए कीकिसी भी समाज को वही माहौल मिलता है जैसा की वो खुद चाहता है क्या हमने आज तक किसी अश्लीलफिल्म को फ्लॉप करवाया है नहीं ? हम क्या गन्दी औरतो को अपना स्टार क्यों बनाते है ? हम बिग बॉसऔर रोडीज जैसे प्रोग्राम देखते है क्यू ? 
क्यूंकि हम पर पश्चिमी सभ्यता एक दम जादू कर रखा है हम हर एक लाइन में cool, chill, fun  और enjoy बोलते ही है हमें सीधापन पसंद नहीं है सीधा सा देहाती बोल के आपको बगल कर दिया जाता है। तोजब हम पश्चिमी सभ्यता को सर पर चढ़ाएंगे तो उसी ने अनुसार बलात्कार, और हमारी मानसिकनैतिकता का तो गिरना ही है तो फिर ये झूठा प्रदर्शन क्यों ? ये दोगलापन क्यों जब आप खुद ही आधुनिकबन ने का भुत है तो फिर आप खुद समाज में ये गंदगी फैला रहे हो और अब प्रदर्शन तो मत करो 
अगर थोडा सा भी बदलाव महसूस किया हो ये पढ़ के तो कसम ले लो की आज के बाद न ही कोई c ग्रेडस्टार की d ग्रेड फिल्म देखेंगे न ही पश्चिमी सभ्यता के पीछे भागेंगे अपनी संस्कृति ऐसे ही पूरी दुनिया मेंबेजोड़ है कहा गया वो दौर जब पूर्व और पश्चिम टाइप की फिल्मे बनती थी हम ही इस देश का भविष्य हैऔर हमें ही तय करना है की कैसे समाज में हमें रहना है 
~~ अक्षय