Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

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13.5.08

भाषा में सबसे पहले गाली आई, जो साफ़ तौर पर एक स्‍त्री को दी गई थी।






मातील्दा
...............................हमारा घर, जिसके दरो-दीवार हवा से बने हैं, जिसकी चाभी कहीं खो गई है...




एक घर, जो हवा में तैरता है
जब वो घर था, तब दुनिया में कुछ नहीं था। न सड़कें थीं, न कारख़ाने, न चौराहे थे, न लोग। दुनिया में कोई हिमालय नहीं था, कोई समंदर भी नहीं. कोई आग नहीं थी, कोई पानी नहीं. तब कोई भाषा भी नहीं थी. सिर्फ़ दो लोग थे। उन दोनों ने रहने के लिए एक घर बनाया था, जिसकी दीवार हवा की थी। छत हवा की थी। फ़र्श भी हवा की। हवा की दीवार में से थोड़ी-सी हवा निकाल कर उन दोनों ने हवा की एक खिड़की बना दी थी। इसी तरह हवा का एक दरवाज़ा। उन दोनों के पास कोई भाषा भी नहीं थी। गूं-गूं करती कोई आवाज़ थी। वह आवाज़ भी एक घर ही थी, जिसमें वे दोनों वैसे ही रहते थे, जैसे बेदरो-दीवार के उस हवाघर में. वहां कभी घुटन नहीं होती थी. हर वक़्त हवा आती थी. जाती भी थी.एक दिन भाषा बन गई। भाषा में सबसे पहले प्रार्थना ईजाद नहीं हुई थी। यह हमारी ग़लतफ़हमी है। भाषा में सबसे पहले नफ़रत और गाली ईजाद हुई। किसी विचारक ने कहा था कि भाषा में सबसे पहले प्रेम के लिए शब्‍द खोजा गया था. ग़लत था वह विचारक. प्रेम को भाषा की ज़रूरत थी ही नहीं.तो भाषा में सबसे पहले गाली आई, जो साफ़ तौर पर एक स्‍त्री को दी गई थी। फिर दुनिया फलने-फूलने लगी। फिर समंदर बना। फिर हिमालय. फिर दर्रे. घाटियां. झाडियां और फूल. कांटे भी साथ-साथ ही बने. सड़कें बनीं. इमारतें भी. उनसे पहले थोड़ी सी आग भी बन गई थी. वह दो पत्‍थरों के बीच रहती थी और तभी दिखती थी, जब पत्‍थर आपस में लड़ पड़ें. फिर बहुत सारे लोग भी बन गए। वे पत्‍थरों की तरह कई बार लड़ पड़ते थे और आग पैदा करते थे।वे दोनों चुप अपने हवाघर में रहते थे। किसी समय लोग आपस में पत्‍थरों की लड़ पड़े, जिससे आग पैदा हो गई। चिंगारियां उस हवाघर पर पड़ीं और वह जलने लगा। हवा की दीवार, हवा की खिड़की, हवा की छत, हवा की फ़र्श, सब जलने लगे। हवा का वह घर जल गया। हवा में ही बचा हुआ है अब। वे दोनों उसमें रहते थे, अब बेघर होकर भटकते हैं। न वह घर किसी को दिखता है, न उसमें रहने वाले वे दोनों। कहते हैं, हवा हो जाने का मतलब कभी दिखाई न पड़ना है।पर मुझे अब भी अपने आसपास ही दिखता है हवा का वह घर। हवा जैसे वो दोनों रहने वाले। आंखों पर पानी का परदा चढ़ाकर देखें, तो शायद आपको भी दिख जाएंगे वे दोनों. और हवा में तैरता उनका एक घर. दिख रहे हैं न?
Posted by शायदा at
6:42 PM
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2 comments:
आलोक said...
तो आ ही गईं आप चिट्ठों की दुनिया में! कोई समस्या हो तो लिखिएगा।शुक्रिया,आलोक
12 May, 2008 8:46 AM
सचिन लुधियानवी said...
बढिया. इस हवाघर का कोई मुहूर्त नहीं रहा होगा. ऐसा किसी विचारक ने कभी नहीं कहा. भारी सांस के साथ खींची गई इस हवादार पहली पोस्ट का इंतजार काफी समय से था. उम्मीद है जुबानदाराजी का वही अंदाज होगा जो वक्त वेवक्त आपके रंगीन दांतों से खिलखिलाहट की शक्ल में नुमायां होता है.. मेरी शुभकामनाएं ब्लॉगिंग में औपचारिक प्रवेश के लिए
12 May, 2008 7:41 PM



About Me



shayda
Who cares if I am sitting here alone/ No one and I don't give a damn/ Because I am what I am/ I am alone,I am no one/ Just an eccentric minority/ by himself on a bench/ Doing nothing with/ everything on my mind/ And still the world around/ me continues to go by/ While I linger in this meditation/ Feeling as though I would/ lose my mind at any moment/ Only my solitude is here by my side/ Only my solitude is helping me to cope with myself। Nasreen



shayda
लिंग: स्त्री
उद्योग: प्रकाशन
व्यवसाय: media
स्थान: chandigarh : UT : भारत

9.5.08

आएगी शर्म अपने होने पर!

राकेश रंजन की कविताएँ

तब भी तो

तुम मेरी हो भी जाओ
तब भी तो
होंगे ये दुख और ये जुल्मोसितम
ठह-ठह हँसेगा असत्य
नाचेगी नंगी दरिन्दगी
होगी ज़माने की भूख
दर्द से फटेगा कलेजा
रात भर न आएगी नींद
आएगी शर्म अपने सोने पर
तुम मेरी हो भी जाओ
तब भी तो
आएगी शर्म अपने होने पर!


कैटवाक

फ़ैशन शो के
जगमग मंच से उतरकर
दबे पाँव
इच्छाओं के अन्धेरों में
टहलती हुई
बिल्लियाँ
खरहे की खाल-सी मुलायम
बाघिन के पंजों-सी क्रूर
खंजर-सी नंगी
चमकीली
हर तरफ़ अन्धेरा
हर तरफ़ बिल्लियों की
नीली-भयानक
आँखों की चमक
प्रकाश-पथ के पथिक
ठमके हुए सरेराह
उनकी राहें
काटती हुई बिल्लियाँ
महान सिंहों की नस्लें
कुत्तों के झुंड में
तब्दील होती हुईं...

हल्लो राजा
हल्लो राजा!
कभी-कभी तो कठिन धूप में
चल्लो राजा!
कभी-कभी तो चिन्ता-भय से
गल्लो राजा!
कभी-कभी तो जठरागिन में
जल्लो राजा!
जब तिनके-भर सुख की ख़ातिर
स्याह जंगलों-जैसे दुक्खों से जुज्झोगे
तब बुज्झोगे
परजा होना खेल नहीं है
किसी जनम में
इसका सुख से मेल नहीं है!
मैंने पूछा :
राजा, कैसी है तुकबन्दी?
राजा बोले :
बेहद गन्दी!

कवि
निकलता है
पानी की चिन्ता में
लौटता है लेकर समुन्दर अछोर
ठौर की तलाश में
निकलता है
लौटता है हाथों पर धारे वसुन्धरा
सब्जियाँ खरीदने
निकलता है
लौटता है लेकर भरा-पूरा चांद
अंडे लाने को
निकलता है
लौटता है कंधों पर लादे ब्रह्मांड
हत्यारी नगरी में
निकलेगा इसी तरह किसी रोज़
तो लौट नहीं पाएगा!


राकेश रंजन, जन्म: 1973
जन्म स्थान: हाजीपुर,वैशाली,बिहार
कुछ प्रमुखकृतियाँ : अंधेरे में ध्वनियों के बुलबुले , अभी -अभी जन्मा है कवि

मोबाइल : 09934841876

15.2.08

भड़़ासियों को फेमिली डाक्टर मिला...जय आयुषवेद

जम के पियो, डाक्टर अपने घर में है

भड़ासियों के लिए एक अच्छी खबर। उन्हें अब अपने व अपने परिवार के सेहत की चिंता फिकिर नहीं करनी चाहिए क्योंकि उन्हें उनका फेमिली डाक्टर मिल गया है। जी, ये फेमिली डाक्टर कोई और नहीं, अपने डाग्डर साहब हैं। डा. रूपेश श्रीवास्तव। अपना डाक्टर अव्वल दर्जे का भड़ासी है, यकीन न हो तो उनकी कल की पोस्ट पढ़ लीजिए जिसमें अपना डाक्टर कहता है कि उन्हें पीने वाले बहुत पसंद है। जब डाक्टर यह कह रहा है तो फिर क्या, पिये जाओ, लीवर वीवर की टेंशन छोड़ के। क्योंकि डाक्टर साहब ने भड़ासियों के लिए शाही दवाखाना खोल दिया है।

मुनव्वर सुल्ताना, जो की मुंबई की हैं, भड़ासी भी हैं, को आप पढ़ ही चुके हैं कि किस तरह डाग्डर साहब ने बड़े से बड़े रोग बिना पैसा लिए और बिना कोई गोली खिलाए ठीक कर दिया, सिर्फ अपने भारतीय आयुर्वेद के बल पर। डाग्डर साहब अपनी इस खूबी का कतई प्रचार नहीं करते। वैसे इस क्या, किसी खूबी का वो प्रचार नहीं करते, और न चाहते। मैंने उनसे रिक्वेस्ट किया था, डाग्डर साहब, एक ऐसा ब्लाग बनाओ जो सिर्फ आपके आयुर्वेद पर हो और वो डाक्टरी का ब्लाग भड़ासियों के लिए नर्सिंग होम की तरह हो। और उन्होंने कई दिनों की मेहनत के बाद भड़ासियों के लिए दवाखाना खोल ही दिया।

अब किसी भी भड़ासी को जुकाम हो जाए, दारू पीने से लीवर खराब हो रहा हो, पेट ज्यादा निकल रहा हो, बीपी हाई रहता हो, लिंग में किसी तरह की कोई दिक्कत हो, सांस उपर नीचे हो रही हो, कमर में दर्द रहता हो....तो वो शाही दवाखाने पे आएं। अपने भड़ास के डाक्टर की इस शाही क्लिनिक पर पहुंच जाएं। वहां अपना मर्ज विस्तार से बताए। नाम गुप्त रखना चाहे तो नाम गुप्त रखा जाएगा। और देखिए, ब्लाग पर डाक्टर साहब प्रिसक्रिप्शन लिख देंगे। बताएंग कि कौन सा फूल किस पत्ती के साथ मिलाकर बूक व पीस दें और उसे बकरी के दूध के साथ घोलकर पी जाएं। इसी तरह वो विस्तार से बतायेंगे कि आप किस रोग के लिए किस तरह की घास चरें, किस बीमारी के लिए गो मूत्र का सेवन करें.....मेरी बातें मजाक लग रही होंगी लेकिन का करें, ससुरी सीरियस बात भी मजाक में कहने की आदत है, या मजाक को भी सीरियसली पेश करने की आदत है, और इसी का नाम ज़िंदगी है, हंसते हुए जियो, मस्ती में जियो....देखो, पहले तो किसी डाक्टर की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, दूसरे खुदा न खास्ता पड़ ही जाये तो अपने डाक्टर साहब का दवाखाना ज़िंदाबाद।

तो इतना लंबा भाषण पेलने के बाद आपको बता ही देते हैं, डाक्टर साहब की क्लीनिक, दवाखाना, नर्सिंग होम का पता, जहां वो दिन में दो बार बैठते हैं, सुबह और शाम। हालांकि मर्ज आप वहां पहुंच कर कभी भी बता सकते हैं, उनकी मेल आईडी पर।

तो नोट कीजिए, डाग्डर साहब के दवाखाने का नाम
आयुषवेद
अब आप कहेंगे कि नाम तो बता दिया, पता भी बताओ तो भइया आप नाम को उंगली करो, चूहे से कटवाओ, वो खुद ब खुद भागा भागा डाक्टर साहब के दवाखाने पे ले जायेगा, बिना किराया लिये.....।

डाक्टर साहब ने एक गलती कर दी है, अपने दवाखाने में यह कहीं नहीं लिखा है कि मरीज उनसे संपर्क कैसे कर सकते हैं? वो अपना मेल आईडी देना भूल गए हैं। उनसे उम्मीद करूंगा कि वो इसे जल्द ठीक कर लेंगे, लेकिन उनके ठीक करने के पहले ही मैं सभी बीमारों, सभी होशियारों, सभी बेचारों, सभी बेकरारों, सभी भड़ासियों को डाग्डर साहब की मेल आईडी बता देना चाहूंगा ताकि डाक्टर साहब इससे खुश होकर मेरा लीवर खराब होने पर मेरा इलाज करने मुंबई से खुद ब खुद दिल्ली चले आवे.....हा हा हा हा
डाक्टर साहब की मेल आईडी है....
rudrakshanathshrivastava7@gmail.com
(इसमें इतने लेटर माने अक्षर हैं कि लिखते लिखते कलम हांफने लगेगी)

तो साथियों, डाक्टर साहब का ब्लाग देखें, अपनी टिप्पणी वहां लिखें और आप या आपके परिजनों को कोई समस्या हो तो डाक्टर साहब को मेल करें। फ्री में बढ़िया वाला, बिना साइड इफेक्ट वाला इलाज करेंगे....।
जय भड़ास
यशवंत