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11.9.14
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Nitin Sabrangi
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Labels: आतंकवादी, घुसपैठ, जनरल विक्रम सिंह, जवाब, मुठभेड़, सेना, सैनिक
9.7.13
तबाही के निशां हमेशा रहेंगे अब सबक लें!
-नेताओं को बयानबाजी, हवाई दौरो व बाबाओं को चुप्पी के लिये याद रखा जायेगा।
-सेना को फर्ज अदायगी के लिये लोग कभी नहीं भुला पायेंगे।
समुंद्र तल से 3584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ में आयी मौत की तबाही को सदियों तक याद रखा जायेगा। अब की पीढ़ी न रहेगी तो काला इतिहास दर्ज रहेगा। खास बात यह भी कि नेताओं को बयानबाजी, सिर्फ हवाई दौरे क
रके हवा में ही दर्द समझने व अरबपति ब्रांडेड संतों-बाबाओं को चुप्पी के लिये हमेशा याद रखा जायेगा। दूसरी तरफ राहत का सबसे बड़ा आपरेशन चलाने वाली सेना ने जिस जज्बे के साथ अपने फर्ज को निभाया उसे भी कभी नहीं भुलाया जा सकता। महत्वपूर्ण सवाल यह भी कि क्या इससे कोई सबक भी लिया जायेगा? प्रकृति को गुस्सा क्यों आया?
आपदा को तो नहीं रोका जाता लेकिन लोगों को बचाया जा सकता था। जाहिर है लापरवाही सरकारी तंत्र की भी रही है। लोगों ने भी केदारनाथ को पिकनिक केंद्र बना दिया। धर्म के नाम पर कम घूमने के लिये लोग ज्यादा जाते थे। कड़वा सवाल ही सही लेकिन बताये कि तीन साल का बच्चा क्या धार्मिक यात्रा पर जा रहा था। लोग इंटरव्यू में बता रहे थे कि हम वहां घूमने गए थे। धर्म के गढ़ में अधर्म की लीला, रासलीला क्या-क्या नहीं हुआ। 50 साल पहले केदारनाथ की तस्वीर देखिए। कितना शांत था। बस चंद बाबाओं की झोपड़ियां। बाद में विकास के पंख लग गए। अनगिनत लोगों की मौत के साथ ही उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके का ढांचा ही गड़बड़ा गया। सभी स्तर बुरी तरह प्रभावित हैं। सैंकड़ों पुल, सड़कें सरकारी-गैर सरकारी इमारतें सबकुछ तबाह। तबाही के निशां अभी बाकी हैं। यह लोगों के दिल-ओ-दिमाग से कभी नहीं मिटेंगे। यूं भी कुछ जख्मों के मरहम ओर ऐसे दर्द की दवा नहीं हुआ करती।-----सेना को फर्ज, नेताओं को हवाई यात्रा व लड़ने ओर बाबाओं को चुप्पी के लिये हमेशा याद रखा जायेगा। ब्रांडेड अरबपति बाबाओं, उनके चेले-चपाटों, समाज-धर्म के ठेकेदारों की चुप्पी भी राज रही। दर्द के तूफान को लोगों ने झेला।
21.6.13
आपदा में जाबांज सैनिकों को सलाम!
उत्तराखंड में आयी विनाशकारी आपदा में जाबांज सैनिक जान पर खेलकर सैंकड़ों लोगों की जिंदगियां बचा रहे हैं। उन्होंने किसी का इंतजार नहीं किया ओर बचाव व राहत कार्य में जुट गए। असहाय सरकार भी उन्हीं की भरोसे है। शीर्ष नेता हवाई दौरा करके ही हवा में दर्द समझ रहे हैं उन्हें नहीं पता पीड़ा को समझने के लिये जमीन पर आना होता है। यह लोग भूल जाते हैं कि जनता की वोटों से ही उन्हांेने सत्ता का ताज पहना है। जनता के नेताओं को लेकर जबर्दस्त गुस्सा हैं। यह गुस्सा जायज भी है। हकीकत उन लोगों से पूछिए जिन्हें सैनिकों ने फरिश्तें बनकर बचाया है। यकीनन यदि सैनिक नहीं होते, तो बहुत से लोग जिंदा नहीं होते। वतन व लोगों की हिम्मत आर्मी है। जाबांज सैनिकों को सलाम! जय हिन्द!13.3.10
वक्त हमारा है
चमक उठी सन सत्तावन में, वो तलवार पुरानी थी,
बुंदेलों हर बोलो के मुख हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।
डलहौजी की राज्य हड़पने की नीति के तहत उस वक्त झांसी को ब्रिटीश राज्य में मिलाने की साजिस रची जा रही थी। अंग्रेजों ने राज्य का खजाना जब्त कर लक्ष्मी बाई को किले से निकाल दिया था। रानी ने भी हार नहीं मानी और स्वयंसेवक सेना का गठन किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। इस सेना ने अंग्रेजों के छक्के छुडा़ दिए थे।
त्रेता युग में भी महिलाओं की युद्ध में अहम भुमिका थी। रामायण में वर्णन है कि एक बार देवासुर संग्राम में इन्द्र की सहायता के लिए दशरथ और कैकेयी गये। वैजयंत नगर में संबर नाम से विख्यात, अनेक मायाओं का ज्ञाता तिमिध्वज रहता था, उसने इन्द्र को युद्ध के लिए चुनौती दी थी। भयंकर युद्ध करते हुए दशरथ भी घायल होकर अचेत हो गये। राजा के अचेत होने पर कैकेयी उन्हें रणक्षेत्र से बाहर ले आयी थी।
अब एक बार फिर महिलाओं की शक्ति को पहचाना जाने लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि महिला अधिकारियों को भारतीय सेना और वायु सेना में स्थायी कमीशन दिया जाए। इस फैसले के बाद सेना में महिलाओं के लेफ्टिनेंट जनरल और जनरल बनने का सपना पूरा हो सकेगा। इससे पहले महिलाओं को 5 से 14 साल के लिए अस्थाई कमीशन दिया जाता था और वे लेफ्टिनेंट कर्नल बन कर रिटार्यड हो जाती थी। बहरहाल तीनों सेनाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 11 फीसदी है। कोर्ट के इस फैसले के बाद इस क्षेत्र में महिलाओं का रुझान और बढ़ेगा और सेना में सम्मान भी।
Posted by
राजीव कुमार
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Labels: महिला, राजीव कुमार, सेना
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