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14.6.13

हिन्दी सिनेमा की सिण्ड्रेला - सुरैया

हिन्दी सिनेमा की सिण्ड्रेला - सुरैया 

लेखक 
श्रीराम ताम्रकर 
एम.ए., बी.एड., विद्यावाचस्पति, 
विशारद, एफ.ए. (FTII) इन्दौर, म.प्र. 

सुरैया का अर्थ होता है कृतिका, ज्योतिष में प्रयुक्त अट्ठाईस नक्षत्र समूहों में तीसरा। सुरैया 1940 और 50 के दशक में हिन्दी फिल्म जगत का एक चमचमाता नक्षत्र थी । इन दो दशकों में कुछ बरस तो वह अपनी समकालीन नायिकाओं – नरगिस / मधुबाला / मीनाकुमारी / गीताबाली / नलिनी जयवंत / निम्मी और बीना राय से ज्यादा लोकप्रिय रही । अभिनय का उसका अंदाज निराला था और साथ ही वह एक सुंकठ गायिका भी थी, जो लता मंगेशकर के अवतरण के बावजूद अपनी जगह पर कायम रही। इस कालखंड में उसने पाकिस्तान चली गई नूरजहाँ और खुर्शीद की अदाकारी का अंदाज कायम रखा। वह पुरानी और नई पीढ़ी के गायक-अभिनेताओं के. एल. सहगल, सुरेन्द्र, मुकेश और तलत महमूद के साथ तो पर्दे पर आई बल्कि पृथ्वीराज, जयराज और मोतीलाल जैसे वरिष्ठ नायकों की नायिका भी बनी। सुरैया की व्यावसायिक सफलता का आलम यह था कि निर्माता-निर्देशक द्वितीय श्रेणी के अभिनेताओं को लेकर भी सुरैया के सहारे अपनी फिल्म को सफलता की वैतरणी पार करा दिया करते थे। सुरैया की लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि फिल्म-उद्योग में और उद्योग से बाहर उसे चाहने वाले और अपना बनाने के इच्छुक लोगों की संख्या बेशुमार थी। लेकिन भाग्य की विडम्बना देखिए कि उसे एक सिण्ड्रेला (चिर प्रतीक्षारत कुमारिका) का जीवन जीना पड़ा। देवआंनद और ग्रेगरी पेक सारी सहानुभूति के बावजूद भी उसे साथ न दे सके। 

सुरैया चिरकुमारी रहने के लिए अभिशप्त थी, जबकि उसके कई आशिक बारात लेकर उसके दरवाजे पर आ गए थे।

                 जन्म - 15 जून 1929 

निधन - 31 जनवरी 2004
सुरैया के नाज-ओ-अंदाज में उत्तर भारतीय मुस्लिम आभिजात्य वैसी ही झलक थी, जैसी उनकी पूर्ववर्ती गायिका-अभिनेत्रियों नूरजहाँ और खुर्शीद में थी। अनेक ऐतिहासिक (पीरियड) फिल्मों में काम कर उसने इस अदाकारी का भरपूर प्रदर्शन किया और अपने तौर-तरीकों से दर्शकों को लुभाया। देवआंनद की ‘अफसर’, ‘जीत’, ‘शायर’ जैसी फिल्मों में उसने प्रगतिशील स्त्री की भूमिकाएँ कर स्त्री-पुरूष दोनों को प्रभावित किया। उसकी अंग-भंगिमाओं और सुरीली आवाज में मानों सिंक्रोनाइजेशन था। उसका एक गीत है “तेरी आँखों ने चोरी किया, मेरा छोटा सा जिया” (प्यार की जीत)। वास्तव में यह शरारत स्वंय ने अपने चाहने वालें के साथ की थी। सुरैया का एक प्रेमी शहजादा इफ्तिखार सुरैया से शादी की मांग को लेकर उसके घर के सामने धरने पर बैठ गया। सुरैया ने उसे समझाया कि अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है, तो मेरे लिए अनशन समाप्त कर दो। वह समझ गया। वह अभिनेत्री वीणा का भाई था। पाकिस्तान से सुरैया का एक प्रेमी बाकायदा बारात लेकर उसके घर पर आ धमका था, जो पुलिस द्वारा धमकाये जाने के बाद लौटा। एक अन्य आशिक सुरैया की झलक पाने के लिए वर्षों मेरीन ड्राइव की रेत पर तपता रहा। सुरैया एक मशहूर दीवाने का नाम धर्मेन्द्र है, जो उसकी फिल्म ‘दिल्लगी’ (1949) देखने के लिए चालीस बार अपने गाँव से शहर तक गया था। 

सुरैया, लता मंगेशकर की हम-उम्र है। सुरैया को सहगल के साथ तीन फिल्मों में अभिनय और गायन का अवसर मिला, लेकिन लता इससे वंचित रही, जबकि वहसहगल के साथ गाने और उनसे बहुत सारी बातें करने के लिए लालायित थी। लता की इस वंचना का कारण सहगल का आकस्मिक अवसान रहा। सुरैया को सहगल का साथ इसलिए हासिल हो सका, क्योंकि उसे बहुत छोटी उम्र में गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद के पद-चिन्हों पर चलने के लिए फिल्मों में उतार दिया गया। सुरैया 1929 में 15 जून को जन्मी थी और लता 28 सितंबर को। लोगों को इन दोनों गायिकाओं के बीच टकराव और प्रतिस्पर्धा की कपोल-कल्पित बातें करने का बड़ा शौक था। लेकिन दर हकीकत ऐसी कोई बात नहीं थी। दोनों अपनी-अपनी जगह ठोस आधार पर टिकी गायिकाएँ थीं। भारतीय स्वतंत्रता का वर्ष 1947 लता मंगेशकर का उदय-काल है, पर सुरैया का पदार्पण पार्श्र्व गायिका और बाल कलाकार के रूप में 1941 में ही हो गया था। हिन्दी-फिल्मों में गायिका-अभिनेत्री नस्ल की वह अंतिम प्रतिनिधि थी, जिस तरह पुरुषों में किशोर कुमार थे। 

गायक अभिनेता सहगल के साथ सुरैया ‘तदबीर’ (1945), ‘उमर खय्याम’ (1946), और ‘परवाना’ (1947), में आई। सुरेन्द्र के साथ मेहबूब की ‘अनमोल घड़ी’ (1946), में सुरैया के अलावा गायिका नूरजहाँ भी थी और रतन के बाद यह नौशाद के संगीत से सजी दूसरी हिट फिल्म थी, जिसके गाने सदाबहार की सूची में आते हैं। मुकेश के साथ सुरैया ने फिल्म ‘माशूक’ (1954)में आई और तलत महमूद के साथ भी उसने दो फिल्मे की – ‘वारिस’ (1954), और ‘मालिक’ (1958)। 

बाल कलाकारों के रूप में प्रवेश लेकर सुरैया ने बाइस साल के फिल्मी जीवन में सड़सठ फिल्मों में नायिका-गायिकाके रोल निभाए।




राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सोहराब मोदी की फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ (1954), में तलत ने सुरैया के साथ जो गाना
गाया – “दिले नादा तुझे हुआ क्या है”, यह सदैव श्रवणीय बना रहेगा। लेकिन इस गीत पर होंठ हिलाने का सौभाग्य भारतभूषण को मिला था, जिन्होंने फिल्म में गालिब की भूमिका की थी। फिल्म में सुरैया ने गालिब की प्रेमिका के रूप में उनकी गज़ल भी एक खास अंदाज में गाई थीं। “ये न थी हमारी किस्मत के बिसाले यार होता” और “नुक्ताचीं है गमे दिन” गजलें सुरैया की आवाज में जैसी चमत्कारिक लगती हैं, वैसी किसी अन्य स्वर में नहीं। वह सुरैया की प्रतिष्ठा का चरम क्षण था, जब गायन और अभिनय के लिए पुरस्कृत हुई सुरैया से पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था – लड़की तुमने तो गालिब की रूह को जिंदा कर दिया। सुरैया इससे पहले सन् 1950 में भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का स्वर्ण पदक प्राप्त कर चुकी थी । 


सुरैया की प्रमुख फिल्में 
बाल कलाकार के रूप में– 
‘ताजमहल’ (1941),‘स्टेशन मास्टर’, ‘तमन्ना’ (1942) और ‘हमारी बात’ (1943)। 
नायिका के रूप में – 
‘इशारा’ (1943),‘मैं क्या करूँ’,‘फूल’, ‘सम्राट चंद्रगुप्त’, ‘तदबीर’, ‘यतीम’ (1945), ‘अनमोल घड़ी’ (1957),‘हसरत’, ‘जगबीती’, ‘उमर खय्याम’, ‘उर्वशी’ (1946), ‘आकाशदीप’, ‘डाक बंगला’, ‘दर्द’, ‘दो दिल’, ‘नाटक’, ‘परवाना’ (1947), ‘आज की रात’, ‘गज़रे’, ‘काजल’, ‘रगंमहल’, ‘प्यार की जीत’, ‘शक्ति,‘विद्या’ (1948),‘अमर कहानी’,‘बड़ी बहन’, ‘बालम’, ‘चार दिन’,‘दिल्लगी’,‘दुनिया’, ‘जीत’,‘लेख’, ‘नाच’, ‘शायर’ (1949), ‘अफसर’,‘दास्तान’,‘कमल के फूल’, ‘खिलाड़ी’, ‘नीली’, ‘शान’, (1950),‘दो सितारे’, ‘राजपूत’, ‘शोखियाँ,‘सनम’ (1951),‘खूबसुरत’,‘गूँज’,‘दीवाना’,‘मोती महल’,‘लाल कुँवर’(1952), ‘माशूका’ (1953),‘बिल्व’,‘मंगल’, ‘मिर्जा गालिब’, ‘वारिस,‘शमा परवाना’ (1954), ‘इनाम’, ‘कंचन (1955), ‘मिस्टर लम्बू’ (1956),‘मालिक’,‘ट्रोली’,‘ड्राइवर’,‘मिस’ 1958 (1958), ‘शमा’ (1961) और ‘रूस्तम सोहराब’ (1963) 



सुरैया ने   कपूर  खानदान  के   तीन   पुरुषों  के  साथ नायिका का रोल अदा किया।  यह   संयोग  ही है  कि  नायिका के रूप में सुरैया की  पहली   फिल्म  ‘इशारा’ (1943)    और   अंतिम    फिल्म    ‘रूस्तम-सोहराब’ (1963) के नायक पापा पृथ्वीराज कपूर ही थे,  जबकि फिल्म    ‘दास्तान’   (1950),    और   ‘शमा-परवाना’    (1954 )     में    उसके    नायक    क्रमशः   राजकपूर      और        शम्मी कपूर     थे।   वास्तविक    जीवन   में   सुरैया राजकपूर की बाल मित्र   थी।   सुरैया    आर्थिक    सफलता     और लोकप्रियता की  सीढ़ियाँ  लड़की होने के कारण जल्दी-जल्दी चढ़ गई, परन्तु राजकपूर को अपनी राह खोजने में थोड़ा वक्त लगा। 

राजकपूर ने आजादी के वर्ष में फिल्में बनाने के लिए कमर कसी और वह अपनी पहली फिल्म ‘आग’ (1946) की नायिका सुरैया को ही बनाना चाहते थे, जिसे बचपन में वे काली कलूटी कहकर चिढ़ाया करते थे। सुरैया की नानी को जो सुरैया के व्यवसायिक कार्यों के बारे में सारे निर्णय करती थी, युवा राजकपूर के प्रोजेक्ट के प्रति संदेह था और उसने बड़ा आया फिल्लम बनाने वाला कहकर राजकपूर को दफा दिया था। राजकपूर की ‘आग’ और ‘बरसात’ फिल्म की सफलता के बाद ‘दास्तान’ के सेट पर राजकपूर ने सुरैया से पूछा था, अब क्या राय है मेरे बारे में। ऐसे वक्त पर सुरैया अपना होठ दाँत से काटने के सिवाय क्या कर सकती थी। अभिनेत्री नरगिस का उदय अवश्यंभावी था, इसलिए नियति ने सुरैया को राजकपूर के प्रोजेक्ट से दूर रखा। 

सुरैया, मधुबाला और मीनाकुमारी के फिल्मों में आने की पृष्ठभूमि एक सी है। तीनों के परिवार को बेटी की कमाई की दरकार थी। इतनी अधिक की बचपन में ही इन्हें सेट पर धकेल दिया गया । 1941 में नानाभाई भट्ट को अपनी फिल्म ताजमहल में मुमताज के बचपन के रोल के लिए एक बालिका की जरूरत थी। तब बेबी सुरैया अपने मामा जहूर के साथ स्टूडियो जाया करती थी। नानाभाई ने सुरैया को देखा तो वह उन्हें अपनी फिल्म के लिए उपयुक्त जान पड़ी। मामा ने भी कमाई का एक नया रास्ता खुलने की खुशी में हाँ कर दी। इससे पहले उनकी बहन मुमताज (यानी सुरैया की माता) को भी मेहबूब ने अपनी फिल्म में हीरोइन बनाना चाहा था, मगर सुरैया के पिता ने इंकार कर दिया था। मुमताज बेगम एक सलोने व्यक्तित्व की स्वाभिमानी थी, जिसकी झलक बाद में लोगों ने युवा सुरैया के रूप में देखी। यहीं नहीं, मुमताज गायिका-अभिमेत्री खुर्शीद की अच्छी दोस्त थी। इसी दोस्ती की वजह से सुरैया ने खुर्शीद को अपना आदर्श मान लिया। लता मेगेशकर की आदर्श नूरजहाँ थी। 



हिन्दी फिल्मों में  40 से 50 का दशक सुरैया के   नाम कहा जा सकता है।  उनकी लोकप्रियता का आलम  यह था  कि  उनकी  एक  झलक पाने के   लिए उनके प्रशंसक मुंबई में उनके घर के  सामने घंटों खड़े रहते थे और यातायात जाम हो जाता था।

मिर्जा गालिब में सुरैया का रोल देखकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था  - लड़की तुमने कमाल कर दिया। 





सुरैया का जन्म लाहौर में हुआ था, लेकिन डेढ़ साल की उम्र में वह अपने माता-पिता के साथ मुम्बई में आ गई थी। उनके मामा जहूर स्टूडियो में स्टंट खलनायक थे। सुरैया के पिता जमाल शेख आर्किटेक्ट थे, लेकिन अपने खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें समय से पहले घर बैठना पड़ा। इसलिए सुरैया को पैसा कमाने के लिए फिल्मों में काम करना पड़ा। उसके लिए किस्मत के दरवाजे एक के बाद एक खुलते चले गये। इधर ‘ताजमहल’ में काम मिला, उधर नौशाद ने अपनी कुछ फिल्मों में पाश्वगायन कराने के लिए बुलाना शुरू किया। सुरैया ने सबसे पहले ‘नईदुनिया’ (1942) में नौशाद के लिए गाया और फिर ‘शारदा’, ‘कानून’ , ‘संजोग’, ‘जीवन’, ‘शमा’ आदि फिल्मों के लिए। इन फिल्मों की नायिका सोहराब मोदी की पत्नी मेहताब थी। शुरू में तो वह नौशाद साहब से चिढ़ गई कि इतनी छोटी बच्ची से मेरे लिए गाना गवा रहे हो, पर बाद में जब गाने सफल रहे तो वे सुरैया को बहुत चाहने लगी। कहते हैं कि मेहताब, सुरैया को अपने लिए गाने के लिए दुगने पैसे देने को तैयार थी, बशर्ते सुरैया गाने की रिकार्डों पर अपना नाम न दे, ताकि लोगों का यह भ्रम बना पहे कि इन गानों की गायिका मेहताब ही है। 

देवआनंद ने सुरैया को सगाई की अँगूठी दी, तो नानी ने उसे समुद्र में फेंक दिया।


With  old and strict Nani 
मोहन पिक्चर्स की ताजमहल के बाद सुरैया ने ‘स्टेशन मास्टर’, ‘तमन्ना’ औरबॉम्बे टॉकीजकी‘हमारी बात’ फिल्म में भी बाल-कलाकार की भूमिकाएँ निभाई। ‘हमारी बात’ (1943) के नायक-नायिका जयराज-देविकारानी थे। इसमें सुरैया ने मुमताज अली (मेहमूद के पिता) के साथ दो नृत्य-गीतों में भाग लिया था। इस फिल्म के समय सुरैया पाँछ वर्षों के लिए बॉम्बे टॉकीज से अनुबंधित थी। पर के. आसिफ ने फिल्म ‘फूल’ में काम करने के लिए सुरैया को चालीस हजार रुपए देने की पेशकश की, तो बादशाह बेगम ने देविकारानी पर दबाव बनाकर सुरैया को अनुबंध से मुक्त कर दिया और सुरैया स्वतंत्र कलाकार रूप में विभिन्न फिल्मों के लिए काम करने लगी और गायिका-नायिका के रूप में उसकी फिल्मों का मीटर तेजी से चलने लगा। नायिका के रूप में उसकी पहली फिल्म ‘इशारा’ 1943, में आई थी। 1945 में उसकी पाँच फिल्में प्रदर्शित हुई। 1946-47 में उसकी छः फिल्में आई, जबकि 1948 में सात और 1949 में दस। 1950 में भी उसकी आधा दर्जन फिल्में रिलीज हुई। इसके बाद साल-दर-साल उसके फिल्मों की संख्या घटती गई। इसका कारण था 
देवआनंद के साथ उसके प्रेम का चक्कर। काम का अधिक बोझ और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभाव। नानी और मामा के दबाव के बादजूद उसने स्वास्थ्य के आधार पर फिल्मों के प्रस्ताव अस्वीकार करने शुरू कर दिए थे। देवआंनद के साथ सुरैया ने 1948 से 51 के बीच कुल सात फिल्में की। फिल्में आर्थिक दृष्टि से बहुत सफल नहीं हुई, लेकिन राज नरगिस के साथ समानांतर देव आंनद-सुरैया के प्रेम की अनेक कहानियों ने जन्म लिया । सुरैया ‘विद्या’ (1948) के बाद ‘जीत’, ‘शायर’, ‘अफसर’, ‘नीली’, ‘दो सितारे’ और ‘सनम’ फिल्मों में देव आनंद के साथ आई। देव ने सुरैया को सगाई की अँगूठी भी दी थी, जिसे उसकी नानी ने गुरूदत्त के सामने देखते-देखते समुद्र में फेंक दिया था। एस. डी. बर्मन, दुर्गा खोटे, चेतन आनंद कोई भी बादशाह बेगम को सुरैया-देव की शादी के लिए राजी न कर सके। दूसरी तरफ उनके साथकाम करने पर भी पाबंदी लग गई। देव आनंद ने 1954 में कल्पना कार्तिक को अपनी जीवन संगिनी बना कर इस प्रकरण का पटाक्षेप कर दिया। 

कहा जाता है कि हिन्दी फिल्मों में नायिका के करने के लिए कुछ नहीं रहता, इसलिए स्टारडम भी उनसे दूर ही रहती है। यह बात बीते दौर की कलाकार सुरैया के मामले में गलत साबित हो जाती है, क्योंकि 1948 से 1951 तक केवल तीन वर्ष के दौरान सुरैया ही ऐसी महिला कलाकार थीं, जिन्हें बॉलीवुड में सर्वाधिक पारिश्रमिक दिया जाता था।

आजादी के आस पास के दौर में सुरैया के पोस्टर साइज फोटो काँच की फ्रेंम में देश के 5 स्टार होटलों में शान से लगाए जाते थे। ग्रामोफोन पर उसके रिकॉर्ड दिनभर बजते थे।

फिल्म इंडस्ट्री में ही सुरैया के कुछ और आशिक थे, रहमान, सुरेश और एम. सादिक। 1948-49 में रहमान-सुरैया की दो फिल्में (‘प्यार की जीत’ और ‘बड़ी बहन’) हिट रही थी। रहमान की तरह सुरेश ने भी सुरैया के साथ चार फिल्में की थी और वह भी मानते थे कि सुरैया से शादी करने के वास्तविक दावेदार वे ही हैं। एम. सादिक ने भी सुरैया को चार फिल्मों में निर्देशित किया था। दिलीप कुमार ने भी सुरैया को के आसिफ की ‘जानवर’ फिल्म के माध्यम से अपने फंदे में उलझाने की कौशिश की। जब सुरैया को उसकी नीयत पर संदेह हुआ तो उसने फिल्म ही छोड़ दी। के. आसिफ इस फिल्म को फिर कभी पूरी नहीं कर पाये। इसलिए हम पाते हैं कि सुरैया की 67 फिल्में की सूची में एक भी फिल्म में दिलीप कुमार नहीं है। (उनके भाई नासिर खान के साथ अवश्य सुरैया ने तीन फिल्में की)। सुरैया वास्तविक जीवन में अपनी नानी के विरूद्ध नहीं जा सकी और उसके माता-पिता भी सीधे स्वभाव के थे, इसलिए सुरैया के लिए सिण्ड्रेला (कुमारिका) बने रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। उसके 1963 में फिल्मों से संन्यास लिया था और चरित्र अभिनेत्री या पाश्रगायिका के रूप में इस मायावी दुनिया में लौटना कबूल नहीं किया। उसकी इस तरह की जिंदगी को देखकर लोग इसे ग्रेटा गार्बो कहने लगे थे। 

हॉलीवुड की अभिनेत्री ग्रेटा गार्बो (1905-90) भी युवावस्था में फिल्मों से संन्यास लेने के बाद शेष जीवन रहस्यमय एकांत में गुजारा। लेकिन जैसा कि सुरैया का एक गाना है “ये कैसी अजब दास्तां हो गई, छुपाते-छुपाते बयां हो गई है”, सुरैया ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में रहस्य को अनावृत करना शुरू कर दिया था। कुछ वर्षों से वह सभा-समारोहों में भाग लेने लगी थी और कभी-कभार पत्रकारों से भी बातचीत कर लेती थी। उसके जीवन का सत्य यह है कि उसकी नानी मामा जहूर के कहने से चलती थी और जहूर का एकमात्र लक्ष्य सुरैया को सोने का अंडा देनेवाली मुर्गी के रूप में कायम रखना थ। सुरैया न तो मनमाफिक खा पी सकती थी, न सो सकती थी। फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ के प्रर्दशन के बाद उसे लो-ब्लडप्रेशर हो गया था और वह काम करते-करते फिल्मों के सेट पर बेहोश हो जाया करती थी। वह फिल्मों में सिर्फ 22 वर्ष सक्रिय रही। 34 वर्ष की उम्र में वह स्वेच्छा से मायवी दुनिया से हट गई थी। सन् 2004 में सुरैया का निधन हुआ। 

सुरैया बॉलीवुड की सबसे सुंदर और पसंदीदा अभिनेत्री 

बॉलीवुड के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष में इंटरनेशनल इंडियन फिल्म एकेडमी और "सेवन ईस्ट" द्वारा पहले छः महीने से कर रहे एक सर्वेक्षण में बॉलीवुड सुंदरी की श्रेणी में सबसे ज्यादा वोट दिवंगत गायिका और अभिनेत्री "सुरैया" को मिली है । 

यह सर्वेक्षण सेवन ईस्ट ने अपने ग्राहकों से स्टोर में लगाई गई 100 अभिनेत्रियों की तस्वीरों के संग्रह में से सबसे पसंदीदा अभिनेत्री को चुनने को कहा। उन्हें इनमें से शीर्ष सात का चुनाव करने को कहा गया इसमे 6,000 ग्राहकों ने हिस्सा लिया। 

सुरैया और ग्रेगरी पैक की मुलाकात 

लोग सुबह-शाम सुरैया की एक झलक देखने की खातिर उसके घर के बाहर भीड़ लगाए खड़े रहते थे। कभी-कभी तो भीड़ इतनी बढ़ जाती थी कि पुलिस को बुलाना पड़ता था और जिस सुरैया के चाहने वालों का यह आलम रहा हो, वही खुद हॉलीवुड के ग्रेगरी पैक की दीवानी हो जाएं, तो यह किस्सा कितना दिलचस्प होगा। 

वही ग्रेगरी पैक एक दिन अचानक सुरैया के ड्राइंग रूम में बैठे उनके आने का इंतजार कर रहे थे। खबर सुनी, तो पहले सुरैया को यकीन ही नहीं हुआ। जब तस्दीक हो गई कि उनके सपनों के हीरो ड्राइंग रूम में उनकी आमद में पलकें बिछाए बैठे हैं, तो खुशी के मारे पूरा घर घूमने लगा। ऐसा महसूस हुआ सुरैया को।  रात साढ़े बारह बजे उनका दरवाजा खटखटाया गया। सुरैया की मम्मी ने दरवाजा खोला, तो सामने अभिनेता अल नासिर खड़े थे। उनके साथ दो लोग और भी थे। अल नासिर ने मम्मी को बताया, "ग्रेगरी पैक को लेकर आया हूं। सुरैया को फौरन बुलाओ।" सुनकर मम्मी भी बदहवास हो गईं, लेकिन यह समय ज्यादा आश्चर्य में डूबकर गंवाने का नहीं था। भागकर मम्मी सुरैया के कमरे में पहुंचीं, जो उस वक्त गहरी नींद के आगोश में समा चुकी थीं। 





मम्मी ने झकझोरते हुए कहा "जल्दी उठो बेटी। देखो ग्रेगरी तुमसे मिलने घर आए हैं। तुझे यकीन नहीं हो रहा है मेरी बात का। अल नासिर लेकर आए हैं। जल्दी से तैयार होकर आ जाओ।" सुरैया के तो मानो हाथ-पांव ही फूल गए। किसी बात का उन्हें होश ही न रहा। जल्दी-जल्दी उन्होंने कपड़े बदले और धड़कते हुए दिल के साथ ड्राइंग रूम में दाखिल हुई, तो अपनी आंखों पर पलभर के लिए विश्वास ही नहीं कर पाई। 

विश्वास तो उनको यह सोचकर अपनी किस्मत पर भी नहीं हुआ कि जिस ग्रेगरी पैक को देखने के लिए वह न जाने कब से तरस रही थी, वह खुद चलकर उनके घर आए हुए हैं। दरअसल हुआ यह था कि ग्रेगरी पैक के लिए कोई पार्टी सुरैया के घर के बिल्कुल पास होटल एम्बेसेडर में हो रही थी। उस पार्टी में अभिनेता अल नासिर भी आमंत्रित थे। 

वह बहुत आकर्षक नाक-नक्शे के थे। शराब पीने के शौकीन अल नासिर पूरी महफिल में सबसे बेखबर एक कोने में खड़े अकेले शराब पी रहे थे कि ग्रेगरी की नजर उन पर पड़ी, तो वह उनकी तरफ बस देखते ही रह गए। उन्होंने किसी से फुसफुसा कर पूछा, "यह आकर्षक मेहमान कौन है?" तो पता चला, यह मूक फिल्मों के हीरो अल नासिर हैं। यह सुनकर ग्रेगरी खुद को रोक नहीं पाए। वह अल नासिर के पास पहुंचे और अपना परिचय दिया। 

 परिचय पाते ही अल नासिर को सुरैया का ध्यान आया कि किस तरह वह उनके नाम की दीवानी हैं। उन्होंने ग्रेगरी से बिना झिझक कहा, "सुरैया के तुम मनपसंद हीरो हो अगर चल सको, तो उसे तुमसे मिलकर बड़ी खुशी होगी।" ग्रेगरी ने फौरन अल नासिर की बात मान ली और पार्टी छोड़कर वहीं से सुरैया के घर के लिए चल पड़े।

देव आनंद और सुरैया की रूमानी प्रेम कहानी

देव आनंद और सुरैया की रूमानी  प्रेम कहानी

पहली मुलाकात में ही हो गया था प्यार 


देवानंद की सुरैया से पहली मुलाकात फिल्म विद्या के सेट पर हुई थी। देवानंद बहुत खुश हो रहे थे कि लाखों लोग जिस हंसीन सुरैया के दीवाने हैं वो आज उन्हें बाहों में लेने वाली है। वे चाहते थे कि बाहों में लेते समय कोई उनकी तस्वीर खींच ले। देव ने अपना परिचय देते हुए सुरैया से कहा था, ‘सब लोग मुझे देव कहते हैं। आप मुझे किस नाम से पुकारना पसंद करेंगी?’ सुरैया ने हँसते हुए जवाब दिया था, ‘देव।’ 

इसके बाद उन्होंने सुरैया की आँखों में देखते हुए अपनी चार्मिंग मुस्कान बिखेरी। सुरैया ने सवाल किया, ‘आप देख क्या रहे हैं ?’’ आप के अंदर कुछ’ देव ने जवाब दिया। सुरैया की जिज्ञासा बढ़ निकली, ‘मेरे अंदर क्या?’’ यह मैं आपको बाद में बताउँगा।’ 

इस बीच, निर्देशक ने कहा था,’सुरैया जी शॉट रेडी है। आपको गाते हुए देवानंद की कमर में अपनी बाहें डालनी हैं और उनके बालों में उंगलियाँ फेरनी हैं।’ देव ने सुरैया से कहा, ‘उंगलियाँ फेरते हुए मेरे बाल मत बिगाड़िएगा।’ ’हाँ मुझे पता है। मैं आपकी ज़ुल्फ़ों के पफ्स को बिल्कुल नहीं छेड़ूँगी। ’ सुरैया ने कहा। गाना चला, कैमरा रोल हुआ। सुरैया ने देवानंद को पीछे से आलिंगन में लिया। उसने देव की साँसों की गर्माहट महसूस की। 

देवानंद ने उनके हाथों का चुम्बन लेकर छोड़ दिया और फिर उनकी तरफ एक फ़्लाइंग किस उछाला। सुरैया ने उनके हाथ के पीछे का हिस्सा चूम कर उसका जवाब दिया। 

निर्देशक ने चिल्ला कर कहा, ‘ग्रेट शॉट’। वहाँ पर मौजूद फ़ोटोग्राफर चिल्लाए, ‘एक बार फिर उन्हें चूमिए।’ देवानंद ने सुरैया से पूछा। उन्होंने हां में सिर हिलाया। इस बार देवानंद ने उन्हें गालों पर चूमा। फ़ोटोग्राफ़र पागल हो गए। जब सुरैया को एकांत मिला जो उन्होंने कहा, ‘तो आप कुछ कह रहे थे... मेरे बारे में !’ 

देवानंद ने फ़्लर्ट किया, ‘मैं आपके भाव नहीं बढ़ाना चाहता।’ ’लेकिन मैं अपने भाव बढ़ाना चाह रही हूँ।’ सुरैया को इस छेड़छाड़ में मज़ा आने लगा था।’ अगर मैं आपको बताऊँ कि मैं आपके बारे में क्या सोच रहा था तो क्या आप उस पर यकीन करेंगी?’ सुरैया ने कहा, ‘बिलकुल।’ ‘आपकी आँखें एक रानी के चेहरे पर चमकते हुए हीरे की तरह हैं। लेकिन...’ ‘लेकिन क्या?’ सुरैया ने ज़ोर दिया। देवानंद ने कहा, ‘आपकी नाक सुँदर तो है लेकिन थोड़ी लंबी है।’ सुरैया ने अपनी नाक छुई और कहा आप सही कहते हैं। देवानंद ने बात आगे बढ़ाई, ‘लेकिन यह आपके चेहरे पर सुँदर लगती है। मेरा जी चाह रहा है कि मैं आपका कोई नाम रखूँ।’ ‘क्या?’ सुरैया ने पूछा। देवानंद ने कहा, ‘मैं अपने साथ काम करने वाली हर लड़की का नाम रखता हूँ।’ ‘तुम ने बहुत सी लड़कियों के साथ काम किया है?’ सुरैया ने सवाल किया। देवानंद ने कहा बहुत तो नहीं... हाँ थोड़ी बहुत ज़रूर... लेकिन चुनिंदा। सुरैया की ख़ूबसूरत आँखें मुस्कराईं, ‘तो आप मेरा क्या नाम रखना चाह रहे थे?’ देवानंद ने शब्द को लंबा करते हुए जवाब दिया, ‘नोओओ...ज़ीईई ...।’ सुरैया ने देवानंद की आँखों में देखते हुए उन्हीं के अंदाज़ में शब्द को लंबा करते हुए कहा, ‘ स्वीईई......ट’। 



अगले दिन, एक आउटडोर शूटिंग के दौरान उन्होंने देवानंद से पूछा, ‘आपको पता है आपकी शकल किससे मिलती है ?’ किससे? सुरैया ने शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा,’ किसी ने आपको बताया नहीं?’ ‘मुझे पता नहीं।’ ‘ग्रेगरी पेक।’ सुरैया ने कहा और देवानंद के चेहरे पर आने वाले भावों को पढ़ने लगीं। देवानंद ने कहा मुझे यह तुलना पसंद नहीं। बहुत दिनों से लोग ऐसा कह रहे हैं। ‘लेकिन क्यों नहीं? देखने में वह इतना अच्छा लगता है।’ सुरैया ने देवानंद की तारीफ़ की। 

देवानंद ने मज़ाक किया, ‘देखने में मैं उससे ज़्यादा अच्छा हूँ।’ सुरैया ने कहा मैं तुम्हारे आत्मविश्वास की दाद देती हूँ। देवानंद को यह अहसास हो गया कि सुरैया उन्हें पसंद करने लगी है। उन्होंने बात आगे बढ़ाई, ‘क्यों नहीं तुम मुझे ग्रेगरी पेक से बेहतर नाम देतीं?’ सुरैया सोचने लगीं। 

 तभी शॉट लेने का बुलावा आ गया। जैसे ही कैमरा घूमा, देवानंद ने एक फूल को तोड़ा और हवा मे उछाल दिया। जब वह नीचे गिरने लगा तो उन्होंने उसे अपने होठों से कैच कर लिया। सुरैया ने उस फूल को देवानंद के होठों से निकाला और चूम लिया। कैमरे ने इस दृश्य को कैद किया और सेट पर मौजूद लोगों ने तालियाँ बजाईं। सुरैया ने देवानंद को अपने पीछे आने का इशारा किया। जब देवानंद उनके पास पहुँचे तो वह पलटीं और उनसे कहा,’ मैं तुम्हे स्टीव कह कर बुलाउँगी।’ स्टीव क्यों ?’ बस यूँ ही। क्योंकि मुझे यह नाम पसंद है।’ 

देवानंद ने कहा अगर तुम्हें पसंद है तो मुझे भी पसंद है। दोनों ने हाथ मिलाए.... कुछ ज़्यादा ही देर तक... देवानंद ने उनके हाथ को दबाया। सुरैया ने उनका हाथ दबा कर उसका जवाब दिया। अच्छे दोस्त से नज़दीकी दोस्त और फिर आशिक बनने की यह शुरुआत थी। 

“जीवन की नैया को खोते हुए ... चले जायेगे” पर नहीं मिल सका किनारा 


1948 में फिल्म विद्या में इसी गाने की शूटिंग के दौरान सुरैया की नाव पानी में पलट गई और देव आनंद ने हीरो की तरह झील में कूद कर उनकी जान बचाई। वे कहने लगी अगर तुमने मुझे नहीं बचाया होता तो आज मैं खत्म हो जाती, तो देव ने जवाब दिया अगर आपकी जान चली जाती तो मैं भी खत्म हो जाता। सुरैया ने बाद में माना कि शायद वही पल था जब हमें एक दूसरे से बेइंतहा मुहब्बत हो गई थी। सुरैया-देवआनंद ने एक साथ सात फिल्मों में काम किया, ये सातों फिल्में बॉक्स ऑफिस बहुत हिट नहीं रही। देव और सुरैया ने बहुत ख्वाब देखे कि वे “जीवन की नैया को खोते हुए ... चलते जायेगे ... “ लेकिन नहीं मिल सका उनकी मुहब्बत को किनारा... 

आगे की कहानी, देव की जुबानी 

वह सुरैया का स्वर्णिम युग था। मैं नया-नया फिल्म उद्योग में आया था और अपने पाँव जमाने की कोशिश कर रहा था। मैं ट्रेन से स्टूडियो आता था और वो मंहगी गाड़ियों में आती थी। लेकिन हम दोनों चुंबक की तरह नजदीक आते चले गए। हम एक-दूसरे को पसंद करते थे और फिर प्रेम करने लगे। मुझे याद है, मैं अपने दोस्तों के साथ चर्च गेट स्टेशन पर उतरकर पैदल मैरिन ड्राइव में “कृष्ण महल” जाया करता था, जहाँ सुरैया रहती थीं। मेरे दोस्त उसकी नानी को घेर कर बातों में उलझा कर रखते और हम छत जा कर पर घंटों बतियाते रहते। 

उन दिनों सेट के अलावा अन्यत्र कहीं मिलना संभव नहीं था। बाद में नानी के कारण सेट पर भी हमें आपस में बात नहीं करने दिया जाता था, इसलिए हमारे बीच खतो-किताबत चलती रहती थी। खत पहुँचाने का काम करते थे मेरे दोस्त केमरामेन देवेजा, ओम प्रकाश और कामिनी कौशल। हम शादी करना चाहते थे। सुरैया की माँ ने तो हमारी आशनाई को स्वीकार कर लिया था लेकिन सुरैया की नानी इस शादी के लिए तैयार नहीं हुईं। उनके घर कई लोग आने-जाने लगे थे, जिससे वे भ्रमित रहने लगीं। निहित स्वार्थी तत्वों ने हिन्दू-मुसलमान की बात उठाकर हमारे लिए मुश्किलें पैदा कर दीं। उन दिनों की पत्रिकाओं ने भी गुलगपाड़ा मचाया। हमारा अफेयर रोजाना सुर्खियों में छपता था। मूवी-टाइम्स के बी.के. करंजिया हमारे रोमांस की हर खबर खुल कर लिखते थे। 

बॉलीवुड की चर्चित प्रेम कहानी, जिसमें वैम्प बनी नानी.... 

सुरैया और देव आनंद का रोमांस पूरे शबाब पर था। उनका प्यार परवान चढ़ रहा था। दोनों ने तो अपने बच्चों के नाम भी सोच लिए थे। सुरैया कहा करती थी कि उसे लड़की चाहिये, ताकि वो उसे अच्छी-अच्छी ड्रेस पहना सके। देव कहते थे कि तुम्हारे पास तो इतनी ढेर सारी गुड़ियां हैं फिर तुम्हें लड़की क्यों चाहिये। वो जिद पर अड़ी रहती और कहती कि लड़की होगी तो उसका नाम देवीना रखेगी। 

शुरुआत की तीन फिल्मों में काम करने के दौरान तो किसी को इनके रिश्ते की खबर नहीं लगी मगर 1951 में रूढीवादी परिवार से संबंध रखने वाली सुरैय्या का परिवार उन पर नजर रखने लगा। फिल्म अफसर की शूटिंग के दौरान दोनों के अफेयर की खबर सबको लग गई और इसका जमकर विरोध हुआ। दोनों शादी करना चाहते थे मगर इनका रिश्ता धार्मिक कट्टरता के की भेंट चढ़ गया। देव साहब हिंदू थे जबकि सुरैय्या मुस्लिम और इसी वजह से इनका रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया। 

देव आनंद ने अपने और सुरैया के रिश्ते के बारे में बताते हुए यह लिखा है कि अगर सुरैया उनकी जिंदगी में होती तो कुछ और ही बात होती। 

सुरैय्या की नानी इन दोनों के रिश्ते की सबसे बड़ी दुश्मन थीं, बाद में उनकी दादी भी रिश्ते के सख्त खिलाफ हो गयीं। सुरैय्या को देव साहब से मिलने नहीं दिया जाता था। देव जब भी उनसे मिलने के लिए उनके घर जाते वहां पहरेदार मौजूद रहते जिनसे वह तंग आ गए। 

जीत फिल्म के सेट पर होने वाली थी असली शादी 

तभी जीत फिल्म के लिए देव और सुरैया की शादी का सीन शूट होना था। सुरैया के घर वालों से परेशान देव और सुरैया ने इस शूटिंग में अपनी असली शादी करने का प्लान बना लिया। पंडित भी असली बुलाया गया, सब कुछ असली था और मंत्र भी असली पढ़े जाने वाले थे। लेकिन ऐन वक्त पर एक असिसटेंट डायरेक्टर ने सुरैया की नानी को फोन कर दिया, बस फिर क्या था नानी ने सेट पर आकर हंगामा कर दिया और सुरैया को पकड़ कर घर ले गई। इसके बाद नानी ने उसकी शादी मशहूर डायरेक्टर एम. सादिक से करनी चाही पर देव की यादों में तड़पती सुरैया किसी और से शादी करने को कहाँ तैयार होने वाली थी। फिर हर रोज उसे समझाने के लिए फिल्म इंडस्ट्री के करीबी लोगों को बुलाया जाता, जो उसे समझाते कि देव के साथ शादी उसकी सबसे बड़ी भूल होगी । अभिनेत्री नादिरा के पति तो कुरान ले आए और बोले, “इस पर हाथ रख कर कसम खाओ कि तुम देव से शादी नहीं करोगी। अगर तुम देव से शादी करोगी तो देश में दंगे भी हो सकते हैं।” सुरैया के मामा और मानी ने देव को जान से मारने की धमकी तक दे डाली थी। सुरैया डर गई थी। वह हिम्मत नहीं जुटा पाई। वह देव से बोली, मैं तुम्हारी मौत का कारण नहीं बनना चाहती। देव ने उसे बहुत समझाया, पर वह नहीं मानी। इसके बाद देव इतने जजबाती हो गए कि उसे तमाचा मार दिया, सुरैया फूट फूट कर रोने लगी। उस समय तो देव चले गये लेकिन बाद में वे सुरैया को बाहों में लेकर रोए और बहुत पछताए। 

सुरैया से मिलने रात को, मम्मी ने बुलाया देव को 

उसके बाद उन्होंने सुरैय्या से फोन पर बात करने की कोशिश की मगर हर बार उनकी नानी फ़ोन उठाती और उन्हें सुरैय्या से दूर रहने की हिदायत देतीं। एक बार उन्होंने देव को धमकाया था कि अगर वह बाज नहीं आए तो वह उनकी शिकायत पुलिस में कर देंगी। मुहब्हत पर सख्त पहरे लग गये थे। एक बार सुरैय्या की मां ने फोन उठा लिया और देव को कहा कि सुरैया भी तुमसे मिलना चाहती है और वह अगले दिन रात को 11.30 बजे छत पर सुरैया से मिलने आ जाये। देव डर को डर था कि कहीं उन्हें फंसाने की प्लानिंग तो नहीं है, फिर उन्होंने सोचा कि एक सुरैया की मम्मी ही तो है जिस पर वो भरोसा कर सकते हैं। फिर भी वो अपने दोस्त तारा को लेकर गये जो पुलिस इंस्पेक्टर था। तारा अपनी पिस्टल और टॉर्च अदि लेकर पूरी तैयारी के साथ देव के साथ गये। इस तरह दूसरी रात “कृष्ण महल” की छत पर रात 11.30 बजे देव सुरैया से मिलने पहुँचे, जहाँ सुरैया पहले से ही देव का इंतजार कर रही थी। जाते ही उन्होंने सुरैया को गले लगा लिया और काफी देर तक एक दूसरे को बाहों में भर कर चुपचाप खड़े रहे। इसके बाद देव ने सुरैया का चुम्बन लिया और फिर सुरैया फूट फूट कर रोने लगी। देव उसे समझाते रहे और शादी करने की इच्छा जाहिर की। सुरैया कुछ नहीं बोली बस बार बार देव को बाहों में भर कर आई लव यू आई लव यू कहती रही। देव ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैं उस चुम्बन को कभी नहीं भूल पाया। 

सगाई की अंगूठी ने मचाया बवाल 

अगले दिन देव ने झवेरी बाजार से हीरे की एक मंहगी अंगूठी खरीदी। उसमें तीन पेशकीमती हीरे जड़े हुए थे। पैसे दोस्तों से उधार लिये गए, क्योंकि तब देव के पास इतने पैसे नहीं होते थे। सुरैया के दरवाजे उनके लिए बंद हो चुके थे, इसलिए उन्होंने सुरैया तक इस सगाई की अंगूठी और खत भेजने का जिम्मा दिया देवेजा को। सुरैया ने अंगूठी को छुपा लिया और देवेजा को कहा कि वो देव से कह दे कि सुरैया उन्हें बहुत प्यार करती है। एक दिन शूटिंग के दौरान सुरैया ने देव की दी हुई अंगूठी पहन ली। लेकिन नानी की एक्सरे जैसी नजर से अंगूठी छुप नहीं पाई। नानी बहुत गुस्सा हुई हाथ पकड़ कर सुरैया को घर ले आई। उसकी घर से बाहर निकलने पर भी रोक लगा दी गई। सुरैया के घर का माहौल बहुत खराब हो चुका था। अगर वो घर वालों की मर्जी के खिलाफ देव से शादी करती तो उसे रास्ते से हटा दिया जाता या नानी अपनी जान दे देती। 

उसके बाद देव की सुरैया से मुलाकात नहीं हो पा रही थी। उनकी फिल्म की शूटिंग भी पूरी हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने फिर से केमरामेन देवेजा को सुरैया के घर भेजा। लेकिन नानी को माजरा समझ में आ चुका था इसलिए उन्होंने उससे साफ कह डाला कि उसे अब इस घर में आने की इजाजत नहीं हैं और वह बाहर से ही लौट आया। 

मजहब बना दीवार, असफल हुआ प्यार 

आखिर घर वालों के डर से सुरैया ने देव से शादी नहीं करने का फैसला कर ही लिया। वो डर गई थी या शायद ईश्वर को यही मंजूर था। फिर एक दिन सुरैया ने अपनी मुहब्बत को याद करते हुए देव की दी हुई सगाई की अंगूठी को समुंदर में फैंक कर अपने प्रेम की आहुति दे डाली। इस तरह बॉलीवुड की सबसे मशहूर प्रेम कहानी कभी पूरी न हो सकी।

उस रात देव घर जाकर चेतन के कंधे पर सिर रखकर खूब रोए और उन्हें अपनी सारी दास्तान सुना दी। चेतन ने देव को बहुत समझाया और कहा कि जीवन के इस दौर में हरेक के साथ ऐसा कुछ घटता है। आज मैं समझता हूँ, जो हुआ अच्छे के लिए हुआ। 

मगर सुरैय्या इस रिश्ते के टूटने से बहुत टूट गयीं और उन्होंने कभी शादी ना करने का फैसला किया। उन्होंने इसके बाद फिल्मों में गाना और एक्टिंग करना भी छोड़ दिया। काश नानी उनके बीच न आती तो शायद कई दशकों तक हमें हुस्न की मल्लिका सुरैया की फिल्में और गीत और सुनने को मिलते। 

 बरसों बाद जब एक दिन किसी पार्टी में देव और सुरैया मिले तो बहुत सारी बातें हुई और देव ने बताया कि उनके एक बेटा व एक बेटी भी है तो सुरैया ने पूछा कि आपकी बेटी का क्या नाम है? तो देव ने कहा कि तुम्हें तो उसका नाम मालूम होना चाहिये... जी मैंने उसका नाम देवीना ही रखा है। 

देव साहब के बारे में कहा जाता था कि उन्हें काले कपड़ों में देखकर लड़कियां बेहोश हो जाया करती थीं। उनकी एक मुस्कान पर हसीनाओं के दिलों की धड़कनें रुक जाती थीं, जिनकी एक अदा पर बॉलीवुड की हीरोइनें कुर्बान हो जाया करती थीं। बॉलीवुड के सबसे हैंडसम हीरो देवानंद अपने जमाने की सबसे हसीन और नजाकत वाली हीरोइन सुरैया की अदाओं पर अपना दिल हार बैठे लेकिन अफसोस अंजाम में सामने आई एक अधूरी प्रेम कहानी।

12.6.13

साबरमती का संत

इस युग के युगपुरुष महात्मा मोहनदास करमचंद गाँधी वास्तव में केवल युगपुरुष ही नहीं बल्कि युग अवतार भी थे, यह बात हाल ही में एक विवादित प्रकाशन से साबित हो गयी, बीती सदी में बापू ही थे जिनके जीवन में सोलहों कलाएं थी, जीवन संघर्ष था, विश्व विजयी विलेन था, लोगों की श्रद्धा थी, अनुगमन था, समकालीन सारी महान विभूतियों का निर्विरोध समर्थन था,  और सबकुछ असामान्य होने के बाद भी दिखने में जन-समान और स्वीकार्य  था। 
जनता लाठी वाले संत को अपने जैसा मानती थी। उनके एक इशारे पर लाखो लोग निर्विकार भाव से अपने प्राणों की आहुति दे देते थे। ऐसे ही हजारों अन्य लक्षण महात्मा के अवतारी होने की पुष्टि करते हैं। 
जहाँ तक मेरी संसारी दृष्टि देख पाती है, उससे तो लगता है कि, बापू श्रीकृष्ण के आधुनिक संस्करण थे, एक कालजयी  फ़िल्मी गीत के अनुसार उन्होंने लीलाएं भी की थीं। भगवान् श्रीकृष्ण के परिवार और शुभचिंतकों  की तरह बापू के परिवार का जीवन भी कष्टप्रद रहा हाँ सुदामा की तरह छुपकर खाने वालों को उन्होने अपना सारा  राजपाट दे दिया। अपुष्ट इतिहास के अनुसार बापू की बा के बाद कई समर्पित  गॊप और गोपियाँ  थी जिन्हें चरखे की मधुर ध्वनी सम्मोहित किये रहती थी, बापू कृष्ण की तरह ही जितेन्द्रिय थे यह बात उनके स्वयं के  ही कई प्रयोगों से प्रमाडित हो चुकी है।
भगवान श्री गाँधी जी के  संपूर्ण जीवन का हर छन मेरी इस बात को बल  देता  है। वासुदेव की ही तरह उनके भी अनेकों नाम भक्तजनों में प्रचलित है। जहाँ उन्होने इस बार गीता के 'संघे शक्ति' को चरित्रार्थ करते हुए अँगरेज़ कंसों से छुटकारा दिलाया वहीँ अफ्रीकी आन्दोलन और बोवर युद्ध में  निर्णायक भूमिका निबाही और भारतीय प्रतिभा को कृष्ण की तरह विश्वपटल पर स्थापित किया। 
कालांतर में भी उनके द्वारा अनुग्रहित किये गए सुदामागण समस्त सुखों को प्राप्त करेंगे ऐसा वर देकर महात्मा गाँधी ने अपने पूर्व अवतार की भांति एक बहेलिये के बहाने अपनी लीला को विराम दे दिया, बोलो भगवान् श्री महात्मा गाँधी की जय.

भाजपा में टिकिट को लेकर मची भारी धमासान विस की चुनावी जंग में पड़ सकती है भारी
कांग्रेस के कद्दावर नेता और केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का 13 जून को आगमन को हो रहा हैं। उनके इस कार्यक्रम के साथ ही प्रदेश कांग्रेस  से यह भी जानकारी दी गयी है कि प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रति पक्ष अजय सिंह भी आ रहे हैं। जिले के सभी कांग्रेसियों के बीच समन्वय बनाते हुये कार्यक्रम को सफल बनाने के प्रयास किये जा रहें है। जिले के बदले हुय राजनैतिक हालात में कमलनाथ, कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह का यह दौरा कांग्रेसियों में कितनी ऊर्जा का सुचार करता है? इस पर ही कांग्रेस की भावी राजनीति निर्भर करेगी। मिशन 2013 को लेकर जिले में सपा,बसपा और गौगपा की रानजैतिक गतिविधयां भी जोर पकड़ रहीं है। हालांकि इन पार्टियों का जिले में ऐसा वर्चस्व नही है कि वे कोई भी सीट जीत सकें लेकिन चुनावी गणित बिगाड़ने में इनकी अहम भूमिका हो सकती है। राजनैतिक रूप से देखा जाये भाजपा के लिये मिशन 2013 की जंग कोई कठिन नहीं है। चार में से तीन विधायक भाजपा के है और दो नेताओं के पास लाल बत्ती है। नपा अध्यक्ष भी भाजपा का है। लेकिन टिकिट को लेकर भाजपा में मची भारी घमासान ही उसके लिये घातक साबित हो सकती हैं।
कमलनाथ,भूरिया और अजय सिंह का दौरा निर्णायक होगा- इन दिनों कांग्रेस की राजनीति में काफी हल चल मची हुयी हैं। जिले के इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के निधन के बाद यह पहला मौका है कि कांग्रेस में एक राजनैतिक उत्सुकता पैदा हुयी हैं। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के कद्दावर नेता और केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का 13 जून को आगमन को हो रहा हैं। उनके इस कार्यक्रम के साथ ही प्रदेश कांग्रेस  से यह भी जानकारी दी गयी है कि प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रति पक्ष अजय सिंह भी आ रहे हैं। इसलिये यह कार्यकर्त्ता सम्मेलन के साथ ही परिवर्तन यात्रा के रूप में भी मानी जा रही हैं। पड़ोसी सांसद कमलनाथ ने अपने विश्वस्त अबरार अहमद और पं. राममूर्ति मिश्रा को पर्यवेक्षक बना कर भेजा हैं। छिंदवाड़ा जिला इंका के उपाध्यक्ष रिजवी भी यहां दौरे कर रहें हैं। जिले के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में कमलनाथ के विश्वस्त ये नेता स्वयं मीटिंग लेकर तैयारियों का जायजा ले रहें हैं और सभी उन नेताओं से मिल रहें हैं जो पिछले दस पंद्रह सालों से उपेक्षा के चलते घर बैठ गये थे। हालांकि मीडिया में सिवनी लोस क्षेत्र के विलापन,फोर लेन,बड़ी रेल लाइन और संभाग को लेकर नाथ की भूमिका पर सवालिया निशान लगाने वाले समाचार भी प्रकाशित हुये हैं। अब देखना यह है कि इन मुद्दों पर कमलनाथ क्या कार्यवाही करते हैं?
यह अभी भविष्य की गर्त में हैं। इंकाइयों में व्याप्त चर्चा के अनुसार मिशन 2013 और 2014 के लिये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा जो प्रभार तय किये गये हैं उनमें महाकौशल का प्रभार केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ को दिया गया हैं। प्रदेश कांग्रेस ने नव गठित कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के बीच विधानसभा वार जो प्रभार सौंपा है उसमे महाकौशल क्षेत्र की विधानसभाओं का प्रभार नाथ समर्थकों को ही दिया गया है। इसी के तहत प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष मो. अबरार अहमद को सिवनी जिले के चारों विस क्षेत्रों का प्रभारी बनाया गया है। इसे दृष्टिगत रखते हुये जिले के सभी कांग्रेसियों के बीच समन्वय बनाते हुये कार्यक्रम को सफल बनाने के प्रयास किये जा रहें है। जिले के बदले हुये राजनैतिक हालात में कमलनाथ, कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह का यह दौरा कांग्रेसियों में कितनी ऊर्जा का सुचार करता है? इस पर ही कांग्रेस की भावी राजनीति निर्भर करेगी।  
सपा,बसपा और गौगपा की गतिविधियंा बढ़ीं- मिशन 2013 को लेकर जिले में सपा,बसपा और गौगपा की रानजैतिक गतिविधयां भी जोर पकड़ रहीं है। हालांकि इन पार्टियों का जिले में ऐसा वर्चस्व नही है कि वे कोई भी सीट जीत सकें लेकिन चुनावी गणित बिगाड़ने में इनकी अहम भूमिका हो सकती है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सपा और बसपा मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पैठ बनाने के प्रयास में है तो वहीं  गौगपा भी आदिवसियों के साथ ही मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित  करने का प्रयास कर रही हैं। वैसे एक बात यह भी सच है कि बहुसंख्यक मुस्लिम और आदिवासी नेता यह नहीं चाहते हैं कि भाजपा चुनाव जीते। लेकिेन चुनाव के दौरान इनके ऐसे रहनुमा पैदा हो जाते है जो कि उनमें से कुछ नेताओं को चुनावी जादूगर यह सब्जबाग दिखा देते हैं कि जीत के समीकरण शत प्रतिशत तुम्हारे ही पक्ष में हैं। इस बहकावे में मुस्लिम और आदिवासी वर्ग के नेता इन पार्टियों से या निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में  के रूप में चुनाव लड़ जाते हैं। लेकिन ये उम्मीदवार चुनाव तो नहीं जीतते लेकिन इतने वोट जरूर ले लेते है कि जिससे भाजपा की जीत हो जाती है जो कि इन वर्गों का बहुसंख्यक मतदाता नहीं चाहता है। एक तरह से यह भाजपा की जीत की अघोषित रणनीति बन चुकी है और चुनावी जंग में इसमें रसद भी झोंकी जाती हैं। कांग्रेस के असंतुष्ट इस आग में घी झोंकने के काम से कोई परहेज नहीं करते रहें हैं। इसीलिये कभी कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाला यह जिला आज भाजपा का मजबूत किला बन चुका हैं। 
जिला भाजपा में मची है टिकिट की घमासानं- भाजपा में भी मिशन 2013 को लेकर तैयारियां प्रारंभ हो चुकी हैं। जिले के चार विधानसभा क्षेत्रों में से तीन विस क्षेत्रों में भाजपा का कब्जा हैं। जिले के दोनों आदिवासी क्षेत्रों से भाजपा के विधायक के रूप में शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले चुने गये हैं। सिवनी विस सीट से भाजपा की ही नीता पटेरिया विधायक हैं। भाजपा के दो पूर्व विधायकों डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन और नरेश दिवचाकर को शिवराज सरकार ने लाल बत्ती दे रखी हैं। सिवनी नगर पालिका के अध्यक्ष के रूप में भाजपा के ही राजेश त्रिवेदी बैठे हैं। इस लिहाज से देखा जाये भाजपा के लिये मिशन 2013 की जंग कोई कठिन नहीं है। लेकिन भाजपा में मची भारी घमासान ही उसके लिये घातक साबित हो सकती हैं। जहां तक दोनों आदिवासी विधायकों शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले की बात है तो कमल के लिये भी टिकिट में अशोक टेकाम आड़े आ सकते हैं। वरना दोनो की टिकिट पक्की समझी जा रही हैं। लेकिन सिवनी को लेकर घमासान मची हुयी हैं। सिवनी के पूर्व विधायक ,मविप्रा एवं जिला भाजपा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर खुद सिवनी से टिकिट के प्रबल दावेदार हैं। नरेश समर्थकों के गणित के अनुसार नीता पटेरिया को केवलारी से लड़ाने का सुझाव है और रहा सवाल डॉ. बिसेन का तो उन्हें बालाघाट संसदीय क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारने की बात कही जा रही हैं। लेकिन प्रदेश भाजपा के सूत्रों का कहना है कि केवलारी से डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को ही लड़ाया जायेगा। यदि ऐसा होता है तो सिवनी से किसी अन्य नेता को टिकिट तभी मिल सकती है जब कि नीता पटेरिया की टिकिट कटे। इस स्थिति में नरेश के अलावा नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी भी टिकिट के दावेदार बन सकते है। राजेश समर्थकों का तर्क है कि नीता की टिकिट काट कर यदि भाजपा ब्राम्हण को टिकिट नहीं देगी तो जिले भर के ब्राम्हण मतदाता नाराज हो जायेंगें जो कि भाजपा के लिये नुकसान दायक होगा। इन हालातों में यदि ज्यादा घमासान मचा तो भाजपा वर्तमान विधायक नीता पटेरिया को ही मैदान में फिर से उतार सकती है। इन परिस्थितियों में भाजपा के चारो प्रत्याशी ही एक बार फिर अपनी किस्मत आजमायेंगें। “मुसाफिर”
 दर्पण झूठ ना बोले
11 जून 2013 से साभार

कमलनाथ,भूरिया और अजय सिंह परिवर्तन यात्रा में होंगें शामिल
सिवनी। कांग्रेस के कार्यकर्त्ता सम्मेलन और परिवर्तन यात्रा में शामिल होने केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ,प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का आगमन 13 जून को हो रहा है। 
जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक एवं विस उपाध्यक्ष ठा. हरवंश सिंह के आकस्मिक दुखद निधन के बाद यह पहला बड़ा कार्यक्रम हैं जो सिवनी जिले में हो रहा है। ठा. हरवंश सिंह के जीवन काल में जिले की सारी राजनति उनके इर्द गिर्द की घूमती थी।
जिले के कांग्रेसजनों में इस दौरे को लेकर काफी उत्साह दिखायी दे रहा हैं। जिला कांग्रेस द्वारा आयोजित 5 जून की बैठक के बाद सभी ब्लाक कांग्रेस कमेटियों ने अपनी अपनी बैठकें करके कार्यक्रम को सफल बनाने के प्रयास किये है।
इस कार्यक्रम के लिये प्रदेश कांग्रेस ने भी अपने पर्यवेक्षक के रूप में उपाध्यक्ष एवं जिले के प्रभारी मो. अबरार अहमद एवं जबलपुर के वरिष्ठ इंका नेता राममूर्ति मिश्रा को नियुक्त किया हैं। इसके साथ ही छिंदवाड़ा के जिला कांग्रेस के उपाध्यक्ष जनाब रिजवी भी जिले का सघन दौरा कर रहें हैं।
जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी,नगर कांग्रेस अध्यक्ष इमरान पटेल एवं प्रदेश प्रतिनिधि राजकुमार पप्पू खुराना सहित सभी कांग्रेस के पदाधिकारी इसे सफल बनाने में जुटे हुये हैं।
इस परिवर्तन यात्रा और कार्यकर्त्ता सम्मेलन से जिले की विकास यात्रा और कांग्रेस की राजनीति में भी परिवर्तन की राजनैतिक विश्लेषकों को अपेक्षा हैं। जानकारों का मानना है कि जिले की बदली हुयी राजनैतिक परिस्थितियों में बदलाव अवश्यंभावी हैं और बदलाव जिले के विकास में सहायक होगा।
अब देखना यह है कि इस सब कवायद से जिले की विकास यात्रा और कांग्रेस की राजनीति में कोई बदलाव आता हैं या नतीजा वही ढाक के तीन पात निकलता है? यह तो अभी भविष्य की गर्त में छिपा हुआ हैं।
फिर टला अटल अभियान
सिवनी। पूरे प्रदेश में चौबीस घंटें बिजली देने के लिये चलाये जा रहा अटल ज्योति अभियान जिले में तीसरी बार फिर टल गया हैं। यह कार्यक्रम बार बार क्यों टल रहा है? इसका जवाब देने को तैयार नहीं हैं। 
ृजानकारों का मानना है कि इसका एक प्रमुख कारण जिला भाजपा की गुटबंदी हैं। लेकिन राजनैतिक विश्लेषकों का यह दावा है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिले में आने से इसलिये कतरा रहें है कि उनके द्वारा की गयी 35 घोषणायें अभी तक पूरी नहीं हुयी है। जिसमें फोरलेन और सतपुड़ा संभाग का मामला प्रमुख है। चुनावी साल में मुख्यमंत्री का इस तरह मुह चुराना सियासी हल्कों में चर्चित है। 
दर्पण झूठ ना बोले
11 जून 2013 से साभार

अधखुले ओंठों में बंद अरमान - निम्मी

अधखुले ओंठों में बंद अरमान - निम्मी 

जन्म - 18 फरवरी, 1933 

कमनीय काया, ठिगना कद, गोल चेहरा, घुँघराले बाल, उनींदी-स्वप्निल आँखें, कमान की तरह तराशी गई भौंहें, पल-पल झलकती पलकें – ये सब सौंदर्य विशेषण गुजरे जमाने की अभिनेत्री निम्मी के लिए व्यक्त किया जा रहे हैं। इन विशेषताओं को देखकर हर दर्शक मासूम निम्मी को मुग्ध-भाव देखता था। नाम भी निम्मी जो निमेष (पलकों) से ध्वनि-साम्य रखने वाला। उनका वास्तविक नाम तो नवाब बानो था, लेकिन युवा राजकपूर ने उन्हें अपनी फिल्म ‘बरसात’ (1949) में पेश करते हुए निम्मी बना दिया था। निम्मी का जन्म 1933 में आगरा के निकट फतेहाबाद गाँव में क रईस खानदान में हुआ था। उनके पिता अब्दुल हाकिम रावलपिण्ड़ी में सेना के ठेकेदार थे। निम्मी को बचपन में बहुत लाड़ प्यार मिला। उनकी माँ वहीदन बाई गायिका थीं और बड़े शौक से फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किया करती थीं। चाची ज्योति भी फिल्म में गायन और अभिनय करती थीं। सन् 47 के आसपास निम्मी चौदह साल की उम्र में अपनी चाची ज्योति के घर पहुँची। छुट्टियों के दिन थे। समय बिताने के लिए निम्मी मेहबूब स्टूडियो में जाकर शूटिंग देखा करती। उन दिनों मेहबूब दिलीपकुमार, राजकपूर और नरगिस को लेकर अपनी प्रसिद्ध फिल्म ‘अंदाज’ बना रहे थे। यहीं राजकपूर ने, जो स्वयं भी ‘बरसात’ बनाने की तैयारियों में लगे थे, निम्मी को नजदीक से देखा। 

राजकपूर को बरसात के ट्रैजिक राल के लिए निम्मी जँच गई, इसलिए निम्मी को बड़ी आसानी से फिल्मों में प्रवेश मिल गया। ‘बरसात’ में निम्मी पर शीर्षक-गीत ‘बरसात में हम से मिले तुम रे सजन’ फिल्माया गया था, जो लता मंगेशवर के जादू का शुरुआती गाना था, इसलिए भी निम्मी अपनी पहली ही फिल्म से एकदम लाइम-लाइट में आ गई। बरसात के बाद निम्मी को पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी। उनकी अभिनय यात्रा निरापद रही। उस जमाने की भावनाप्रधान फिल्मों के लिए निम्मी एकदम उपयुक्त थीं, क्योंकि उनका सलोना मुखड़ा भावाभिव्यक्ति का खज़ाना था। कैमरे का सामने वे नैसर्गिक रूप से पात्र की काया में उतर जातीं और फटाफट काम पूरा कर देतीं । 

अपने सोलह साल के करियर में निम्मी ने 45 फिल्में कीं, जिनमें से आधी कामयाब रहीं। निम्मी ने अभिनय का कहीं कोई प्रशिक्षण नहीं लिया था, लेकिन उर्दू पर उनकी अच्छी पकड़ होने से संवाद अदायगी साफ और लयात्मक थी। उसमें सेकस-अपील भी थी, जबकि उस समय फिल्मी-आलोचना में इस तरह का शब्दों का इस्तेमाल नहीं होता था। ‘आन’ फिल्म के लंदन में प्रीमियर के अवसर पर वहाँ के अखबारों ने उसे ‘अनकिस्ड-गर्ल ऑफ इंडियन स्क्रीन’ लिखा था। निम्मी ने अपने दौर में सभी बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया। वह सीन को अपनी दिशा में मोड़ने में माहिर थी, इसलिए कुछ कलाकार उनके साथ काम करने से घबराते भी थे। 


अधखुले ओंठों में बंद अरमान - निम्मी 


दिलीपकुमार के साथ उन्होंने ‘दीदार’ (51), ‘आन’ एवं ‘दाग’ (52) ‘अमर’ (54) और ‘उड़न-खटोला’ (55) में काम किया। ‘बुजदिल’, ‘सजा’ और ‘आँधियां’ में वे देवआनंद की नायिका रही। आँधियाँ फिल्म कॉन फेल्टिवल में दिखाई गई थी । चेतन आनंद द्वारा बुद्ध के जीवन पर बनाई गई फिल्म ‘अंजलि’ में भी वे थीं। अशोककुमार और किशोरकुमार के साथ ‘भाई-भाई’ (56) में आई। उन्हें सोहराब मोदी, जयराज, भारतभूषण, राजकुमार, राजेन्द्रकुमार, संजीवकुमार और धर्मेद्र के साथ फिल्में करने के अवसर भी हाथ लगे। ‘बसंत-बहार’ और ‘चार दिल चार राहें’ भी उनकी उल्लेखनीय फिल्में हैं। ‘मेरे महबूब’ (1963) उनकी अंतिम फिल्म थी। उसके बाद उन्होंने फिल्मों से संन्यास की घोषणा कर दी। संवाद लेखन अली रजा से विवाह के बाद वे माँ बनना चाहती थी, लेकिन यह मुराद पूरी नहीं हुई। 

सन् 1987 में के.आसिफ की फिल्म ‘लव एंड गॉड’ में दर्शकों ने उन्हें अंतिम बार परदे पर देखा। यह फिल्म आसिफ अधूरी छोड़ गए थे, जो उनके निधन के पश्चात प्रदर्शित की गई।

रूठना और मनाना या खुद ब खुद मन जाना

रूठना और मनाना या खुद ब खुद मन जाना 

एक बच्चा गुब्बारे वाले को देखकर माँ से बोला -माँ मुझे गुब्बारा चाहिए।

माँ ने कहा - तूने इस सप्ताह खूब गुब्बारे फोड़ लिये ,आज गुब्बारा नहीं मिलेगा।

    बच्चे ने मन ही मन सोचा कि गुब्बारा तो आज ले कर ही रहना है ,बच्चे ने जिद की मगर माँ
ने एक भी नहीं सुनी।बच्चा बात बनती नहीं देख कर रूठता हुआ बोला -माँ ,आपने गुब्बारा नहीं
दिलाया तो मैं शाम का दुध भी नहीं पीऊँगा।

माँ बोली- जीद मत कर ,ज्यादा जिद करेगा तो शाम को पापा से पीटेगा।

बच्चा अपनी बाजी पलटते देख रोने लग गया।उसको रोते देख माँ ने एक बार समझाया।बच्चे
को लगा शायद यह हथियार कारगर रहेगा ,यह सोच वह जोर-जोर से रोने लगा।बच्चे को बेबात
पर गल्ला फाड़ते देख माँ ने गुस्से में बच्चे का कान मरोड़ दिया।अब तो बच्चा जोर -जोर से
रोने लगा।

बच्चे का बड़ा भाई उसे रोते देख बोला -चुप हो जा ,आज माँ तेरी सुनने वाली नहीं है।

यह सुनकर बच्चा और जोर से रोने लगा।थोड़ी देर में बच्चे की बहन भी आ गयी।बहन को
देख बच्चा और जोर से रोने लगा।बहन ने रोने का कारण पूछा और समझाते हुए बोली -भैया,
तुम गुब्बारे के लिए मत रोओ ,गुब्बारे तो जल्दी फूट जाते हैं।

बच्चा जिद पूरी ना होते देख रोता रहा।थोड़ी देर बाद बच्चे के पापा भी घर आ गये।बच्चे को रोते
देख रोने का कारण पूछा।बच्चे ने गुब्बारा ना दिलाने की बात बतायी।

बच्चे के पापा ने कहा -तेरी माँ ने जो किया वह ठीक ही किया।हर दिन जिद करना और जिद
से बात मनवाना ठीक बात नहीं है।यह कह कर उसके पापा भी अपने काम में लग गए।बच्चे
ने सोचा -गुब्बारा तो मिलने वाला नहीं है ,और रोते-रोते गला भी दर्द करने लगा है ,भलाई
इसी में है कि चुप हो जाऊं मगर चुप होने के लिए भी कोई वाजिब बहाना चाहिए।बच्चा सोचता
रहा और रोता रहा।थोड़ी देर में बच्चे ने देखा कि दादा आ रहे हैं।दादा को देख कर बच्चा फिर
से रोने लगा।बच्चे को रोते देख दादा ने रोने का कारण पूछा-

बच्चा बोला-दादा,मम्मी ने गुब्बारा नहीं दिलाया।

दादा ने कहा-कोई बात नहीं ,मैं तेरे को जब मेला लगेगा तब दिला दूंगा।

बच्चे ने सोचा -यह आखिरी मौका है कि मुझे रोना छोड़ देना चाहिए।बच्चे ने दादा से पूछा -
दादा ,मेला लगेगा तो आप गुब्बारा दिला देंगे।

दादा के हाँ भरते ही बच्चा रोना छोड़ नाचने लगा।

सवाल यही है कि बड़े -बड़े मँच पर यह खेल होता रहता है और सयाने लोग भी रोना छोड़
कर नाचने लग जाते हैं।बेचारे ..................... 


10.6.13

जैसे आत्मा जीर्ण शीर्ण शरीर को त्यागकर नए शरीर को धारण कर लेती है वैसे ही  दल भी अपने पुराने जीर्ण शीर्ण हो चुके नेताओं को त्यागकर नए नेता को चुन लेता है ।

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा । अर्थात तृष्णा जीर्ण नहीं होती हम ही जीर्ण हो जाते हैं । ईश्वर  आडवाणी जी को उनकी तृष्णा की तरह ही जवान रखे ।

शीर्षक और कुछ विचार एक प्रसिद्ध कविता से प्रेरित हैं -
आडवाणी जी के प्रति - एक भाव -

द्रुत झरो जगत के शीर्ण पत्र
कुछ नव कोंपल अब आने दो
हो चुका  तुम्हारा समय धैर्य
अब नया जोश भर जाने दो ।
है सही यही तुम आये थे
जब तम  था तमहर बनकरके
था चला काफिला साथ , किया दल
का उद्धार तारणहार बनके
पर समय मांगता अब कुछ है
उसकी  पूरी हो जाने दो
हैं नयी राह और नया खून
उसको  रग रग भर जाने दो
जो लिखता काल कपाल पे था
वह शांत दांत अब बैठा है
दे गया प्रकाश जो पहले वह
उजियारा अब तक फैला है
तुम भी थे सतत अक्षर नभ में
थी अभिलाषा और आशाएं
हो सकी न पूरी वो अब तक
उनको  पूरी हो जाने दो ।
यह समय चक्र है चलता है
सूर्यास्त से सूर्य निकलता है
एक नए जोश और नयी आस में
फिर दिन नया एक खिलता है
अस्ताचल की गरिमा रख लो
नूतन  संध्या आने दो
हो चुका  समय , है  देर हुई
अब नया सवेरा आने दो ।\



फाइल ........!!

मीलों चले ........!!

नेताजी बोले - हम मीलों चले और चलेंगे ........!!
जनता -मगर हम पहुंचे कहाँ ?
नेताजी - रुको ,मैं सामने घाणी चला रहे तेली से पता करके आता हूँ ...
जनता -तेली को कैसे पता ...?
नेताजी -वो दिन भर बैल चलाता है ना भाई  ....हमारा भी बता देगा ...!!
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नेता का नजरिया  ................!!

नेताजी - आप लोग दिल और विचार उच्च रखें .....
जनता -मगर महंगाई ...?
नेताजी-अरे,सबको चीज के दाम ज्यादा चाहिए और कुछ नहीं ...
जनता -घोटाले ....?
नेताजी -किसी न किसी का भला करने को घोटाला मत कहो ..
जनता-बेरोजगारी .......?
नेताजी -कोई घर आराम कर रहा है तो दुखी क्यों हो भाई ...!!
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विकास ......!!

नेताजी -मुझे ही वोट करें ,क्योंकि असल में विकास हम ही करते हैं
जनता - वो तो सही है मगर हमारा कब होगा?
नेताजी -छोटे विचार मत रखो,मेरा विकास देश का विकास और देश
              का विकास ही तेरा विकास ....
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फाइल ........!!

नेताजी -देश विकास कर रहा है ,सड़के बनी .....
जनता -कहाँ .....?
नेताजी - फाइल में दिखा देंगे !...और कुए भी खुदवाये .....
जनता -....पर कहाँ ...
नेताजी-फाइल में देखना ...और गारंटी से मजदूरी भी दी ...
जनता -किसे ....
नेताजी -फाइल में ...और रेल भी चली ...
जनता - ....कहाँ से कहाँ को ....
नेताजी - तेरे गाँव से शहर तक ...
जनता -मगर गाँव में तो पटरी ही कहाँ है ?
नेताजी- पटरी है,सबुत चाहिए तो देख लेना फाइल में ..!!
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9.6.13

इंसानियत

इंसानियत 

एक व्यक्ति समाज में बढ़ रहे पाप और अनाचार से दुखी होकर भगवान् के मंदिर गया और
भगवान से प्रार्थना करके बोला -प्रभु ,इस धरती पर पाप और अनाचार बहुत बढ़ गये हैं कृपा
करके संसार से पाप और अनाचार को हटाने के लिए देवता भेज दो।

भगवान् ने कहा -पुत्र ,इस पृथ्वी पर मैं जन्म तो देवताओं को ही देता हूँ परन्तु स्वार्थ और
मोह के वशीभूत मानव के संग में आकर वो देवपन भूल जाते हैं और पाप और अनाचार में
लिप्त हो जाते हैं।

भगवान का उत्तर सुन वह व्यक्ति वहां से चला गया।रास्ते में थोडा ही चल पाया था कि उसे
एक दूसरा मंदिर दिखाई दिया।वह व्यक्ति उस मंदिर में गया वहां दुर्गा की मूर्ति थी।वह
व्यक्ति माँ दुर्गा से प्रार्थना करते हुए बोला -माँ ,इस पृथ्वी पर पाप और अनाचार बढ़ गए हैं
आप करुणा करके इस पृथ्वी पर शक्ति की स्थापना करो ताकि पाप का नाश किया जा सके।

दुर्गा बोली -वत्स, तुम ठीक कह रहे हो परन्तु जब -जब भी मेने शक्ति को भेजने की कोशिश
कि तब तुम मनुष्यों ने उसे या तो कोख में मार दिया या वासना की पुतली समझ कर कुचल
दिया।

दुर्गा का उत्तर सुन वह व्यक्ति पुन:रास्ते की ओर बढ़ गया।कुछ दूर जाकर उसने देखा कि
एक सन्यासी घायल सूअर के घावों पर मरहम लगा रहा है।कुछ देर तक वह संत के क्रिया-
कलाप को देखता रहा और फिर समीप जाकर बोला -पूज्यवर,आप यहाँ इस निकृष्ट प्राणी
के घाव पर मरहम कर रहे हैं जबकि आप जानते हैं कि पृथ्वी पर घोर अनाचार फैल रहा है
आपको गाँव -गाँव जाकर पाप और अनाचार के खिलाप जागरूकता फैलानी चाहिए।

सन्यासी ने सूअर के मरहम लगाते हुए पूछा -क्या तुम गधे हो?

वह व्यक्ति बोला -आप क्या कह रहे हैं ,क्या मैं आपको इंसान नहीं दिख रहा हूँ ?

सन्यासी बोला-......तो फिर इंसानियत सीख ,पाप और अनाचार खुद ब खुद ख़त्म हो जाएगा।           

7.6.13

भाजपा के अर्जुन,भीष्म और शिखंडी-ब्रज की दुनिया

मित्रों,मुझे पूरा यकीन है कि आपने महाभारत पढ़ा या देखा जरूर होगा। घर में नहीं तो टीवी पर ही सही। यकीनन आपको यह भी पता होगा कि महाभारत का युद्ध जब 9 दिनों तक हो चुका था तब पांडवों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या अजेय योद्धा और कौरव दल के सेनापति भीष्म पितामह को मार्ग से हटाने की थी। अंत में नौवें दिन की रात में खुद भीष्म ने ही पांडवों द्वारा पूछने पर अपनी पराजय का रहस्य प्रकट कर दिया था। तत्पश्चात् जब 10वें दिन की लड़ाई शुरू हुई तो अर्जुन भीष्म के सामने सीधे-सीधे नहीं आए और अपने आगे नपुंसक शिखंडी को खड़ा कर लिया। प्रतिज्ञाबद्ध होने के चलते भीष्म ने शिखंडी पर प्रहार नहीं किया और उसके पीछे से वाण चलाकर अर्जुन ने इस दुर्जेय योद्धा को शरशायी कर दिया।
           मित्रों,इन दिनों भारत की दूसरी सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी भाजपा में भी महाभारत का जीवंत मंचन चल रहा है। इस महाभारत के भीष्म हैं वयोवृद्ध और जनता द्वारा 2009 में प्रधानमंत्री पद के लिए नकारे जा चुके लालकृष्ण आडवाणी,अर्जुन हैं जोश से लबरेज विजय रथ पर सवार गुजरात के बब्बर शेर नरेंद्र मोदी। जहाँ मूल महाभारत में अर्जुन को शिखंडी चाहिए था वहीं इस महाभारत में पराजित और हताश भीष्म शिखंडी की तलाश में हैं। कभी उनको अपना शिखंडी भाषणवीरांगना सुष्मा स्वराज में नजर आता है तो कभी किसी और में। अभी उन्होंने मध्य प्रदेश के अपने प्रदेश में दिन-प्रतिदिन अलोकप्रिय होते जा रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को शिखंडी बनाना चाहा था लेकिन सिरे से असफल रहे। फिर नेता कम व्यापारी ज्यादा भ्रष्टाचारपुरूष नितिन गडकरी के सिर पर शिखंडी का ताज रखना चाहा लेकिन उन्होंने भी उसे जमीन पर दे मारा। तब श्रीमान् ने अर्जुन अर्थात् नरेंद्र मोदी के सेनापतित्व को तो स्वीकार कर लिया लेकिन इस शर्त पर कि कमान का एक हिस्सा गडकरी को दिया जाए। दुर्भाग्यवश श्रीमान् एक बार फिर से असफल होते दिख रहे हैं क्योंकि गडकरी फिलहाल विवादों में उलझना ही नहीं चाहते।
             मित्रों,आडवाणी जी की मानसिक अवस्था को हम आसानी से समझ सकते हैं और चाहें तो सहानुभूति भी प्रकट कर सकते हैं। हम सभी यह जानते हैं कि हर किसी के भाग्य में हरेक चीज नहीं होती। आडवाणी के भाग्य में भी हर तरह से योग्य होते हुए भी पीएम की कुर्सी नहीं लिखी हुई थी। अच्छा होता कि आडवाणी अपनी तकदीर को 2009 में ही स्वीकार कर लेते और भाजपा के नेतृत्व को काम करने की खुली छूट दे देते। मगर क्या करें बेचारे का दिल है कि मानता ही नहीं और अब भी प्रधानमंत्री बनने को मचल उठता है वो कहते हैं न कि दिल तो बच्चा है जी। वर्तमान दशा में आडवाणी जी को जहाँ अपने हठी दिल को समझाना चाहिए और वक्त की पुकार को तहेदिल से मान लेना चाहिए वहाँ वे हर बात में अड़ जाते हैं किसी जिद्दी बच्चे की तरह।
                  मित्रों,अगर हम प्रदेशवार विचार करें तो भाजपा में चार ऐसे नेता हैं जो मुख्यमंत्री हैं और जनाधारवाले कहे जा सकते हैं-मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान,छत्तीसगढ़ में रमन सिंह,गुजरात में नरेंद्र मोदी और गोवा में मनोहर पार्रीकर। इनमें से गोवा चूँकि काफी छोटा है इसलिए उसको सूची से हटा दें तो नरेंद्र मोदी को छोड़कर ऐसा कोई भाजपाई नेता या मुख्यमंत्री नहीं है जिसकी लोकप्रियता 2009 के बाद बढ़ी हो या पूर्ववत् हो। पता नहीं फिर आडवाणी क्यों जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं को गुमराह करने में लगे हैं?
                       मित्रों,अगर ऐसा है तो फिर आडवाणी न सिर्फ मूर्ख हैं बल्कि देशद्रोही भी हैं। उनका अवसरवादी चेहरा और चरित्र तो तभी जनता के समक्ष अनावृत्त हो चुका है जब उन्होंने महान साम्प्रदायिक नेता,40 करोड़ मजलूमों के हत्यारे और भारत विभाजक जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कह दिया था। आडवाणी मूर्ख इसलिए हैं क्योंकि अब नरेंद्र मोदी को विकल्पहीन हो चुकी भाजपा का सेनापति बनने से रोक पाना संभव ही नहीं रह गया है फिर भी वो इस दिशा में निरर्थक हाथ-पैर मार रहे हैं और वे देशद्रोही इसलिए हैं क्योंकि उनके द्वारा मोदी का मार्ग बाधित करने से अगर किसी को फायदा हो सकता है तो देश को दोनों हाथों से लुटने में लगी लुटेरी और देशद्रोही कांग्रेस पार्टी को। मैं जहाँ तक समझता हूँ कि देशद्रोहियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मददगार होना भी देशद्रोह ही है। वैसे अभी तक इस हारे मगर ईच्छामृत्यु का वरण नहीं कर रहे भीष्म पितामह को शिखंडी मिला नहीं है और उम्मीद करनी चाहिए कि मिलेगा भी नहीं। ऐसे में आडवाणी क्या करेंगे? क्या उनमें वह साहस और नैतिक बल है,वो जनाधार उनके पास है कि शिखंडी के नहीं मिल पाने की स्थिति में वो सीधे-सीधे दिव्यास्त्रों से लैश अर्जुन नरेंद्र मोदी का सामना कर सकें? मुझे तो इसकी संभावना नहीं लग रही और आपको?

4.6.13

बातों-बातों में...

मिशन के महाशय खिलाड़ी
जहां पैसे के मिशन का खेल चल रहा हो, भला वहां कैसे ‘शिक्षा का मिशन’ फलीभूत हो सकता है। यहां भी यही हाल है। जिस ध्येय से मिशन शुरू हुआ, वह किसी और ‘मिशन’ में नजर आ रहा है। इस तरह जिन नौनिहालों की फिक्र सरकार ने की थी, उनके भविष्य का बंटाधार होना तय ही है। जब खुद की जेब भरने का मिशन ही याद हो और ‘शिक्षा के मिशन’ को ‘पठेरे’ पर टांग दिया गया हो, वहां शिक्षा और छात्रों का, गर्त में जाना तो तय ही है। नौनिहालों को देश का भविष्य कहा जाता है, फिलहाल वे, उन महाशय जुगाड़ के खिलाड़ियों के भविष्य बनाने का जरिया साबित हो रहे हैं, जिनके कंधों पर नौनिहालों का बेड़ापार लगाने की जवाबदेही है। लेकिन वे समझे, तब ना।

कंकड़ के ‘लखपतिदेव’
कहा जाता है जुगाड़ू, अपना जुगाड़ बना ही लेता है। हाल में धान की व्यापक पैमाने पर खरीदी हुई। इस दौरान जैसे-तैसे कर जो कमाए, वो चटकन-बुटकन के रहे। अब असली कमाई का दौर शुरू हुआ है, खरीदे गए धान में ‘कंकड़’ मिलाने का। जाहिर है, कंकड़ मिलाएंगे तो धान भी अलग से पैसे उगलेगा। निश्चित ही बड़े साहब के मन में ‘कंकड़’ से लगाव नजर आ होगा। तभी तो कंकड़बाजों पर उनकी नजर नहीं जाती और जाती भी है तो, नजरें टेढ़ी नहीं होती। ऐसे में जब कंकड़ से ‘लखपति’ बनने का दौर चल रहा हो तो वे क्यों नहीं चाहेंगे, बहती गंगा में हाथ धोना...।

मिसफिट होने का गम...
‘खाओ-खिलाओ’ वाले विभाग के बड़े साहब की सोच व नजरिया लाजवाब है। उन्हें विभाग के घपले व गड़बड़ी नजर नहीं आती। यही वजह है कि बरसों से जमे होने के बाद भी एक बड़ी कार्रवाई नहीं कर सके। इसे अब हम उनकी सुस्ती मानें कि बरसों न खत्म होने वाली ‘मन-भूख’। दरअसल, साहब को अपने विभाग से काफी शिकवे-शिकायतें हैं। उनके पास जो गया, समझो वे ‘दुहाई’ खाकर ही बाहर आता है। साथ ही वे खुद को विभाग में ‘मिसफिट’ मानते हैं, उन्हें ये दर्द हमेशा सालते रहता है, जबकि पैसे वे चौरतफा कमा रहे हैं, एक इस तरीके से, बाकी न जाने...। विभाग में साख इतनी कमजोर कि शरीर से दबंग होने के बाद भी उन्हें कोई घास नहीं डालता। बेचारे... हमेशा रोते रहते हैं, उन्हें बनना क्या था और बन क्या गए ?

...जेब में बढ़ती हरियाली
देखिए, जिले में हरियाली लाने के लिए करोड़ों फूंक दिए गए। नतीजा, हरे-भरे पौधे, पेड़ तो नहीं बने, किन्तु साहब और बाबूओं की जेबों की हरियाली सौ फीसदी जरूर बढ़ गई। पहले जो जेबें फटी होती थीं या कहें ‘अठन्नी’ भी चाय के नाम पर नहीं निकलती थी। आज उन जेबों से ‘करारे’ निकलते हैं। जाहिर है, हरियाली की बयार अभी जेबों में ही बह रही है, अन्यत्र तो कहीं दिखाई नहीं देती। लाखों पौधों के आज जितनी पत्ती होती, मानो उतने ही ‘करारे’ के जलवे हैं। पहले के हिसाब हरियाली का आनंद हजारों लोग उठाते, इनके रहमो-करम के बाद, अब जेबों तक ही ‘हरियाली’ लहालहा रही है।

जिले में भाजपा में ब्राम्हणों और जैनियों को मिल रही प्राथमिकता अन्य लोगों में नाराजगी का करण बन रही है
 विगत 14 मई को जिले के केवलारी क्षेत्र के विधायक और विस उपाध्यक्ष ठा. हरवंश सिंह का आकस्मिक दुखद निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार और त्रयोदशी संस्कार में कांग्रेस और भाजपा के कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं ने शोक संवेदना व्यक्त कर परिवार को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की। पक्ष एवं विपक्ष के नेताओं की उपस्थिति उनके राजनैतिक कद की परिचायक हैं। चुनावी साल में भाजपा की गुटबंदी जिले थमने के बजाय और बढ़ती जा रही हैं। जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर,विधायक नीता पटेरिया और पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी का त्रिकोण इन दिनों सियासी हल्कों में चर्चित हैं। हाल ही में हुये प्रदेश कांगेस के फेर बदल में सिवनी जिले के किसी भी नेता कों शामिल नहीं किया गया। और तो और प्रदेश कांग्रेस की महामंत्री गीता सिंह को भी निकाल दिया गया। भाजपा में पंड़ितों और जैनियों को जिले में सालों से मिल रही प्राथमिता के कारण पिछड़ा वर्ग,मुस्लिमों, आदिवासी और हरिजनो के मन में यह भावना घर करते जा रही है कि भाजपा में उनका अपना कोई भविष्य नहीं है। अगले चुनाव के लिये यह शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र तोमर के लिये एक चिंता का विषय बन सकता है।

स्व. हरवंश सिंह को मुसाफिर की श्रृद्धांजलीे- विगत 14 मई को जिले के केवलारी क्षेत्र के विधायक और विस उपाध्यक्ष ठा. हरवंश सिंह का आकस्मिक दुखद निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार और त्रयोदशी संस्कार में कांग्रेस और भाजपा के कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं ने शोक संवेदना व्यक्त कर परिवार को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की। पक्ष एवं विपक्ष के नेताओं की उपस्थिति उनके राजनैतिक कद की परिचायक हैं। जिले की राजनीति में वे लंबे समय से एक मात्र केन्द्र बिन्दु बने हुये थे। चौपाल से भोपाल तक का उनका सफर कई उतार चढ़ाव से भरा हुआ था। ऐसे कद्दावर इंका नेता के चुनावी साल में एका एक निधन से एक रिक्तता आ गयी है जो कैसे भरी जायेगी? इसे लेकर राजनैतिक क्षेत्रों में उत्सुकता बनी हुयी हैं। मुसाफिर स्व. ठा. हरवंश सिंह को अपनी विनम्र श्रृद्धांजली अर्पित करता है तथा परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वो उन्हें विर शांति प्रदान करे और उनके परिजनो तथा शुभचिंतकों को यह गहन दुख वहन करने की शक्ति प्रदान करें।  
अविश्वास प्रस्ताव बनाम भाजपायी गुटबंदीे-चुनावी साल में भाजपा की गुटबंदी जिले थमने के बजाय और बढ़ती जा रही हैं। जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर,विधायक नीता पटेरिया और पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी का त्रिकोण इन दिनों सियासी हल्कों में चर्चित हैं। नीता पटेरिया सिवनी की विधायक हैं। नरेश सिवनी के पूर्व विधायक है और फिर टिकिट की जुगत में हैं। राजेश पालिका अध्यक्ष है और सिवनी से युवा और नये चेहरे के रूप में टिकिट पाना चाह रहें हैं। फिलहाल तो सिवनी सीट भाजपा में खाली नहीं है लेकिन ना जाने क्यों इसे खाली मानकर ही टिकिट की जुगाड़ और इसके लिये राजनैतिक दांव पेंच चालू हो चुके हैं। पिछले दिनों जिला भाजपा कार्यालय में पालिका के भाजपा पार्षदों की बैठक हुयी जिसमें पालिका के कांग्रेस के उपाध्यक्ष राजिक अकील के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का निर्णय लेकर कलेक्टर के यहां पेश कर दिया गया। भाजपायी हल्कों में चर्चा है कि इस निर्णय में भाजपा के ही पालिका अध्यक्ष को विश्वास में नहीं लिया गया। इसमें रणनीति यह बतायी जा रही है कि यदि अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया तो यश जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर को मिलेगा और यदि प्रस्ताव गिर गया तो ठीकरा पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के सिर पर फोड़ दिया जायेगा। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि परिषद में कांग्रेस के 13 और भाजपा के अध्यक्ष और 11 पार्षद हैं जबकि अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के लिये कुल संख्या के दो तिहायी वोट प्रस्ताव के पक्ष में पड़ना चाहिये। एक तरह से यह निश्चित माना जा रहा है कि इस खेल में भाजपा को मुंह की खानी पड़ सकती हैं। यह सब जानते हुये भी अविश्वास प्रस्ताव लाना भाजपा की गुटबंदी का ही परिणाम हैं। जिला भाजपा में एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में वो नगर विकास अवरुद्ध हो रहा है जिसका वायदा चुनाव के समय रोड़ शो करके प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया था।
गीता की छुट्टी प्रदेश कांग्रेस में प्रतिनिधित्व समाप्त-हाल ही में हुये प्रदेश कांगेस के फेर बदल में सिवनी जिले के किसी भी नेता कों शामिल नहीं किया गया। और तो और प्रदेश कांग्रेस की महामंत्री गीता सिंह को भी निकाल दिया गया। उल्लेखनीय है कि गीता सिंह कांग्रेस के विधायक स्व. रणधीर सिंह की पत्नी हैं। आपके आजा ससुर दीप सिंह और ससुर सत्येन्द्र सिंह भी विधायक थे। युवा रणधीर की अकाल मृत्यु के बाद हुये उप चुनाव में गीता को कांग्रेस की टिकिट नहीं मिली थी। उसके बाद से वे कांग्रेस की राजनीति में हासिये थीं। लेकिन जब दिग्गी समर्थक कांतिलाल भूरिया प्रदेश अध्यक्ष बने तो उन्हें एकदम से प्रदेश में महामंत्री जैसे पद की जवाबदारी मिल गयी। लेकिन ना जाने क्यों इसके बाद भी वे अपने पद के अनुसार सक्रिय नहीं हो पायीं और अपने प्रभार के जिले में भी एक बार भी नहीं गयीं। इन्हीं सब कारणों से शायद उनकी छुट्टी हो गयी। इसके साथ ही प्रदेश कांग्रेस में जिले का प्रतिनिधित्व ही समाप्त हो गया। एक समय था जब 1977 की जनता लहर में जिले की पांचों सीटें कांग्रेस ने जीत कर समूचे उत्तर भारत में एक रिकार्ड बनाया था। लेकिन आज जिले की चार में से तीन सीटें भाजपा के पास है जिसमें से दो बरघाट और सिवनी में भाजपा पांच बार से चुनाव जीत रही हैं।ऐसे हालात में जिले में कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिये नेतृत्व को ध्यान देना होगा अन्यथा मिशन 2013 और 2014 को फतह करना एक कठिन काम होगा।
भाजपा में पंड़ितों और जैनियों के वर्चस्व से अन्य निराश- भाजपा में पंड़ितों और जैनियों को जिले में सालों से मिल रही प्राथमिता के कारण पिछड़ा वर्ग,मुस्लिमों, आदिवासी और हरिजनो के मन में यह भावना घर करते जा रही है कि भाजपा में उनका अपना कोई भविष्य नहीं है। ऐसा मानने वाले यह तर्क देते है कि चाहे जिला भाजपा अध्यक्ष पा पद हो या सिवनी विस की टिकिट सालों से इन पर ब्राम्हणों और जैनियों का ही कब्जा रहा है। स्व. महेश शुक्ल,प्रमोद कुमार जैन कंवर साहब, चक्रेश जैन, सुदर्शन बाझल, सुजीत जैन और अभी नरेश दिवाकर भाजपा के जिलाध्यक्ष हैं। बीच में वेद सिंह ठाकुर,डॉ ढ़ालसिंह बिसेन और कीरत सिंह बघेल जरूर अध्यक्ष रहें हैं। इसी तरह सिवनी विस की टिकिट भी 1985 से इन्हीं के कोटे में जा रही हैं। 85 में प्रमोद कुमार जैन,90 और 93 में स्व. पं. महेश शुक्ला,09 और 2003 में नरेश दिवाकर और 2008 में नीता पटेरिया को भाजपा ने टिकिट दी थी। सन 1990 से यहां से भाजपा का विधाय ही जीत रहा है इसीलिये इस रणनीति को बदलने के बारें में भाजपा में कभी विचार भी नहीं हुआ। अगले विस चुनाव में भी टिकिट इन्हीं के बीच मिलना तय माना जा रहा है। इसी कारण पिछड़ा वर्ग,अल्प संख्यक,आदिवासी और हरजिन वर्ग के कार्यकर्त्ताओं में धीरे धीरे यह भावना बैठती जा रही है कि भाजपा में हमारा कोई भविष्य नहीं है? भाजपा नेतृत्व यान शिवराज सिंह और नरेन्द्र तोमर के लिये यह मिशन 2013 और 2014 के लिये यह एक चिंता का विषय होे सकता है।“मुसाफिर”  

सा. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
04 जून 2013 से साभार

31.5.13

भाजपा ने उगला जेठमलानी को, अब वे आग उगलेंगे

भारतीय जनता पार्टी के लिए गले की हड्डी बने राज्यसभा सदस्य व वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी को आखिर उगल दिया, मगर अब खतरा ये है कि वे भाजपा के खिलाफ आग उगलेंगे। इसका इशारा वे कर भी चुके हैं।
असल में भाजपा जेठमलानी को एक लंबे अरसे से झेल रही थी। संभवत: मात्र इसलिए कि उनके पास एक तो पार्टी के बहुतेरे राज हैं और दूसरा ये कि अपनी स्वच्छंद प्रवृति के कारण कभी भी बड़ा संकट पैदा कर सकते थे। संकट पैदा कर ही रहे थे। नितिन गडकरी की अध्यक्ष पद की कुर्सी जाने में उनकी भी अहम भूमिका थी, जो उनके विरुद्ध अभियान सा छेड़े हुए थे। इतना ही वे चोरी और सीनाजोरी की तर्ज पर आए दिन धमकी भी देते रहे कि है दम तो उन्हें पार्टी से निकाल कर तो दिखाओ। आखिरी नौटंकी उन्होंने पिछले दिनों तब की, जब वे निलंबित होने के बावजूद कार्यसमिति की बैठक में पहुंच गए। उन्होंने जम कर हंगामा भी किया, जिससे एकबारगी मारपीट की नौबत आ गई। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को सही तरीके से नहीं उठाया। यहां तक कि पार्टी की कांग्रेस से मिलीभगत का गंभीर आरोप भी जड़ दिया। पार्टी अनुशासन को ताक पर रख कर उन्होंने नेतृत्व को चेतावनी भी दे दी कि उनका निलंबन वापस लिया जाए या उन्हें पार्टी से निकाल दिया जाए। अपने आप को केडर बेस पार्टी बताने वाले राजनीतिक दल में कोई इस हद तक चला जाए और फिर भी उसके खिलाफ कार्यवाही करने पर विचार करना पड़े या संकोच हो रहा हो तो ये सवाल उठाए जाने लगे कि आखिर जेठमलानी में ऐसी क्या खास बात है कि पार्टी हाईकमान की घिग्घी बंधी हुई है? ऐसे में आखिरकार पार्टी के पास कोई चारा ही नहीं रहा। हालांकि पार्टी जिस कदम से लगातार बचना चाहती थी, वही से उठा कर उन्हें पार्टी से बाहर करना पड़ा। पार्टी अच्छी तरह से समझती है कि बाहर होने के बाद वे काफी दुखदायी होंगे, मगर उससे ज्यादा कष्टप्रद तो वे पार्टी के अंदर रह कर बने हुए थे। अपने आपको सर्वाधिक अनुशासित पार्टी बताने वाली भाजपा का अनुशासन तार-तार किए दे रहे थे। उन्हीं की आड़ ले कर और नेता भी अनुशासन की सीमा रेखा पार करने लगे थे। ऐसे में पार्टी हाईकमान ने यह सोच कर एक मछली सारे तालाब को गंदा कर रही है, बेहतर यही है कि उसे ही बाहर निकाल दिया जाए।
ज्ञातव्य है कि वे लंबे अरसे से पार्टी नेताओं का मुंह नोंच रहे थे। उन्होंने न केवल पूर्व पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से इस्तीफा देने की मांग की, अपितु सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति पर पार्टी के रुख की खुली आलोचना की। तब भी यही धमकी दी थी कि है किसी में हिम्मत कि उनके खिलाफ कार्यवाही कर सके। उनकी इस प्रकार की हिमाकत पर उन्हें निलंबित किया गया। इसके बाद उनका रुख कुछ नरम पडऩे पर निलंबन समाप्त करने का भी विचार बना, मगर जब पानी सिर से ही गुजरने लगा तो पार्टी को उनसे पिंड छुड़वाना ही पड़ा।
आपको याद होगा कि ये वही जेठमलानी हैं, जिनको भारी अंतर्विरोध के बावजूद राज्यसभा चुनाव के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे  न केवल पार्टी प्रत्याशी बनवा कर आईं, बल्कि विधायकों पर अपनी पकड़ के दम पर वे उन्हें जितवाने में भी कामयाब हो गईं। तभी इस बात की पुष्टि हो गई थी कि जेठमलानी के हाथ में जरूर भाजपा के बड़े नेताओं की कमजोर नस है। भाजपा के कुछ नेता उनके हाथ की कठपुतली हैं। उनके पास पार्टी का कोई ऐसा राज है, जिसे यदि उन्होंने उजागर कर दिया तो भारी उथल-पुथल हो सकती है।
यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि ये वही जेठमलानी हैं, जिन्होंने भाजपाइयों के आदर्श वीर सावरकर की तुलना पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना से की थी। इतना ही नहीं उन्होंने जिन्ना को इंच-इंच धर्मनिरपेक्ष तक करार दे दिया था। पार्टी के अनुशासन में वे कभी नहीं बंधे। पार्टी की मनाही के बाद भी उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस लड़ा। इतना ही नहीं उन्होंने संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी नहीं देने की वकालत की, जबकि भाजपा अफजल को फांसी देने के लिए आंदोलन चला रही है। वे भाजपा के खिलाफ किस सीमा तक चले गए, इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये रहा कि वे पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ ही चुनाव मैदान में उतर गए।
बहरहाल, अब जब कि पार्टी ने मन कड़ा करते हुए सख्त कदम उठा लिया है, ये खतरा लगातार बना ही हुआ है कि वे कोई न कोई षड्यंत्र रचेंगे, मगर समझा जाता है कि पार्टी उसके लिए तैयार है।
-तेजवानी गिरधर

29.5.13

शिंदे तो नीरो का बाप निकला-ब्रज की दुनिया

मित्रों,आपने भी किताबों में पढ़ा होगा कि भारत में इस समय लोकतंत्र है और इस समय सुशील कुमार शिंदे भारत के गृह मंत्री हैं। आपको क्या लगता है कि किताबों में लिखी गई ये बातें सही हैं? मुझे तो लगता है कि भारत में इस समय भी राजतंत्र है और श्री शिंदे किसी लोकतांत्रिक सरकार के नहीं बल्कि किसी राजा या रानी के मंत्री हैं। देश के प्रति कोई जिम्मेदारी या वफादारी नहीं। अगर ऐसा नहीं है तो फिर शिंदे किससे पूछकर इस संकट काल में अमेरिका में रूक गए? क्या गृह मंत्री होने के नाते यह उनका कर्त्तव्य नहीं था कि वे 25 मई को ही अमेरिका से भारत वापस आ जाते? कोई मामूली घटना नहीं घटी है देश पर हमला हुआ है बकौल सोनिया गांधी भारतीय लोकतंत्र पर हमला हुआ है और भारत का गृह मंत्री जिसके कंधों पर देश की आंतरिक सुरक्षा की महती जिम्मेदारी होती है विदेश में रंगरलियाँ मना रहा है?
                                     मित्रों,श्री शिंदे पहले भारत के गृह मंत्री हैं या किसी के भाई या बाप? प्रश्न यह भी उठता है कि क्या उनको सोनिया-राहुल ने वहाँ रूकने की अनुमति दी? मैं नहीं समझता कि बिना सोनिया-राहुल की रजामंदी के शिंदे संडास भी जा सकते हैं। तो क्या यह समझा जाना चाहिए कि शिंदे को खुद सोनिया-राहुल ने ही विदेश में रोक दिया? अगर हाँ तो इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? पहला कारण तो यह हो सकता है कि इन दोनों को शिंदे जी की योग्यता पर भरोसा नहीं है,उनको लगता है कि शिंदे स्थिति को संभाल नहीं पाएंगे और इसलिए उनको लगता हो कि ऐसे नाजुक समय में शिंदे देश से बाहर ही रहें तो अच्छा है वरना यहाँ आकर वे उटपटांग,पागलपन भरा बयान देकर रायता ही फैलाएंगे। दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि ये माँ-बेटे समझते हों कि अंधा चाहे सोया रहे या जगा क्या फर्क पड़ता है। फिर प्रश्न यह भी उठता है कि तो फिर ऐसे काम के न काज के वाले व्यक्ति को क्यों केन्द्रीय सरकार में दूसरा सर्वोच्च पद दे रखा है?
                                                मित्रों,मैं न तो कभी केंद्रीय मंत्री रहा हूँ और न ही कभी अमेरिका तो क्या नेपाल भी गया हूँ जो बता सकूँ कि शिंदे जी ने अमेरिका में किस प्रकार छुट्टियाँ मनाई होंगी। गोरी-गोरी मेमों से मसाज करवाकर बुढ़ापे को मुँह चिढ़ाया होगा या डिस्को में बालाओं के साथ डांस किया होगा या फिर किसी बीच पर मुँह औंधे घंटों पड़े रहे होंगे। जो जी चाहे वे करें उनकी जिन्दगी है लेकिन उन्होंने इसके लिए समय जरूर गलत चुना। वे चाहते तो बाद में दोबारा-तिबारा भी अमेरिका जा सकते थे। अब उनसे गलती तो हो ही चुकी है सो लोग चुप तो रहेंगे नहीं और कहनेवाले तो चाहें तो उनकी तुलना मजे में रोम के नीरो से कर सकते हैं और कह सकते हैं कि भाइयों एवं उनकी बहनों निराश मत होईए कि आप रोम के नीरो को नहीं देख सके। आप उसको आज भी देख सकते हैं। मिलिए इनसे ये हैं 21वीं सदी के जीवित नीरो,दुनिया के कथित रूप से सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के गृह मंत्री श्री श्री अनंत सुशील कुमार शिंदे। भूल जाईए नीरो को और उस कहावत को भी आज से एक नई कहावत ने उसका स्थान ले लिया है और वो कहावत अब इस तरह से जाना जाएगा कि जब भारत नक्सली हिंसा की आग में जल रहा था तब भारत का गृह मंत्री शिंदे अमेरिका में छुट्टियाँ मना रहा था,ठंडी हवा खा रहा था।

बातों-बातों में...

‘मनभेद’ न पड़ जाए भारी
विधानसभा चुनाव के नजदीक है, लेकिन नेताओं में ‘मनभेद’ कायम है। नतीजा, सियासी गर्मी का पारा भी बढ़ने लगा है। दो विरोधी पार्टी के नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप राजनीति में स्वाभाविक नजर आती है, लेकिन अपने ही ‘अपने’ की कब्र खोदने लगे तो फिर ‘पार्टी’ का बंटाधार होना लाजिमी है। ऐसे नजारे, चुनाव के पहले ही नजर आने लगे हैं। एक-दूसरे को निपटाने, अभी से ही सियासी गणित बिठाए जा रहे हैं। समझा जा सकता है कि ये ‘मनभेद’ कितनी भारी पड़ सकती है ? हालांकि, कहने वाले कहते हैं कि ये तब होता है, जब एक-दूसरे से कोई भी ‘खुद’ को छोटा समझना ही नहीं चाहता।

साहब की ‘पड़ोसी’ मेहरबानी...
इतना सब जानते ही हैं कि एक पड़ोसी की कितनी अहमियत होती है। सुख-दुख में वे साथ होते हैं। इस मामले में हमारे साहब, कुछ हटके हैं। उन्हें पड़ोसी से क्या और कितना लाभ मिलता है, ये तो वे ही जानें, किन्तु पड़ोसियों के जरूर बल्ले-बल्ले हैं। जब से साहब ‘वहां’ से आए हैं, तब से पड़ोसियों की आवभगत जमकर हो रही है और उन पर साहब की मेहरबानी भी जगजाहिर हो गई है। यही वजह है कि साहब के ईर्द-गिर्द ‘पड़ोसी’ मंडराते रहते हैं। कभी यही पड़ोसी, ‘यहां’ झांकने तक नहीं आते थे। लगता है, लगाव का कारण कुछ खास है। आखिर यह तो सच है कि जहां ‘गुड़’ होगा, वहां ‘मक्खी’ तो भिनभिनाएंगे ही...।

...आपका ये दिलवालापन
शिक्षा ‘सर्व’ पहुंचाने की जिस साहब पर जिम्मेदारी है, उनका दिलवालापन का क्या कहें...। उनकी समझ में तो शासन की सारी योजनाएं ही बंदरबाट के लिए बनी है। उनके ‘दिलवालेपन’ का शुरूर चढ़े तो वे शासन का ही ‘दिवाला’ निकाल दे। तभी तो चंद रूपये की नहीं, लाखों के बाद, अब वे करोड़ों के ‘खिलाड़ी’ साबित हो रहे हैं। बंदरबाट में निश्चित ही उनकी कोई सानी नहीं है, जितना कर दे, कम है। लगता है कि शासन के पैसे को वे खुद का समझते हैं, न कोई नियम, न कायदे। जहां चाहो, जैसे चाहो, अपने तरीके से खर्च कर डालो। कोई पूछने तो आएगा नहीं, जो आएगा, उन्हें भी ‘दो-चार’ देकर चलता कर दो। साहब के ‘खाओ-खिलाओ’ का पाठ खूब पढ़ा जा रहा है, यह कब तक पढ़ा जाएगा, इसकी भी खूब चर्चा जरूर हो रही है।

उनकी ‘लाइन’ का दर्द
सुरक्षा वाले एक साहब, कहा करते थे, वे कभी ‘लाइन’ में नहीं रहे। उनकी ‘चाहत’ अब पूरी हो गई है। ऐसा लगता है, जैसे अंतिम छोर में होने की वजह से कुछ ज्यादा ही बे-लगाम हो गए थे, जिसके बाद बड़े साहब ने उन पर ‘लाइन’ की लगाम डाल दी। अब उन्हें ‘लाइन’ का दर्द सालने लगा है। जहां थे, वहां के रौब के सामने लाइन का काम उन्हें रास नहीं आ रहा है। वे बड़े चिंतित हैं। अब करे तो क्या करें, बड़े साहब से मनमुटाव का नतीजा भोगना पड़ता है। खैर, वे ‘लाइन’ को काफी याद किया करते थे, इसलिए कुछ उन्हें ‘लाइन’ का मजा भी ले लेना चाहिए। फिर पता चलेगा कि लाइन में ‘मलाई’ का आनंद है या फिर वहां, जहां रहते आए हैं।