श्रीराम ताम्रकर
एम.ए., बी.एड., विद्यावाचस्पति,
विशारद, एफ.ए. (FTII) इन्दौर, म.प्र.
सुरैया का अर्थ होता है कृतिका, ज्योतिष में प्रयुक्त अट्ठाईस नक्षत्र समूहों में तीसरा। सुरैया 1940 और 50 के दशक में हिन्दी फिल्म जगत का एक चमचमाता नक्षत्र थी । इन दो दशकों में कुछ बरस तो वह अपनी समकालीन नायिकाओं – नरगिस / मधुबाला / मीनाकुमारी / गीताबाली / नलिनी जयवंत / निम्मी और बीना राय से ज्यादा लोकप्रिय रही । अभिनय का उसका अंदाज निराला था और साथ ही वह एक सुंकठ गायिका भी थी, जो लता मंगेशकर के अवतरण के बावजूद अपनी जगह पर कायम रही। इस कालखंड में उसने पाकिस्तान चली गई नूरजहाँ और खुर्शीद की अदाकारी का अंदाज कायम रखा। वह पुरानी और नई पीढ़ी के गायक-अभिनेताओं के. एल. सहगल, सुरेन्द्र, मुकेश और तलत महमूद के साथ तो पर्दे पर आई बल्कि पृथ्वीराज, जयराज और मोतीलाल जैसे वरिष्ठ नायकों की नायिका भी बनी। सुरैया की व्यावसायिक सफलता का आलम यह था कि निर्माता-निर्देशक द्वितीय श्रेणी के अभिनेताओं को लेकर भी सुरैया के सहारे अपनी फिल्म को सफलता की वैतरणी पार करा दिया करते थे। सुरैया की लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि फिल्म-उद्योग में और उद्योग से बाहर उसे चाहने वाले और अपना बनाने के इच्छुक लोगों की संख्या बेशुमार थी। लेकिन भाग्य की विडम्बना देखिए कि उसे एक सिण्ड्रेला (चिर प्रतीक्षारत कुमारिका) का जीवन जीना पड़ा। देवआंनद और ग्रेगरी पेक सारी सहानुभूति के बावजूद भी उसे साथ न दे सके।
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जन्म - 15 जून 1929
निधन - 31 जनवरी 2004
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सुरैया, लता मंगेशकर की हम-उम्र है। सुरैया को सहगल के साथ तीन फिल्मों में अभिनय और गायन का अवसर मिला, लेकिन लता इससे वंचित रही, जबकि वहसहगल के साथ गाने और उनसे बहुत सारी बातें करने के लिए लालायित थी। लता की इस वंचना का कारण सहगल का आकस्मिक अवसान रहा। सुरैया को सहगल का साथ इसलिए हासिल हो सका, क्योंकि उसे बहुत छोटी उम्र में गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद के पद-चिन्हों पर चलने के लिए फिल्मों में उतार दिया गया। सुरैया 1929 में 15 जून को जन्मी थी और लता 28 सितंबर को। लोगों को इन दोनों गायिकाओं के बीच टकराव और प्रतिस्पर्धा की कपोल-कल्पित बातें करने का बड़ा शौक था। लेकिन दर हकीकत ऐसी कोई बात नहीं थी। दोनों अपनी-अपनी जगह ठोस आधार पर टिकी गायिकाएँ थीं। भारतीय स्वतंत्रता का वर्ष 1947 लता मंगेशकर का उदय-काल है, पर सुरैया का पदार्पण पार्श्र्व गायिका और बाल कलाकार के रूप में 1941 में ही हो गया था। हिन्दी-फिल्मों में गायिका-अभिनेत्री नस्ल की वह अंतिम प्रतिनिधि थी, जिस तरह पुरुषों में किशोर कुमार थे।
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सोहराब मोदी की फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ (1954), में तलत ने सुरैया के साथ जो गाना
गाया – “दिले नादा तुझे हुआ क्या है”, यह सदैव श्रवणीय बना रहेगा। लेकिन इस गीत पर होंठ हिलाने का सौभाग्य भारतभूषण को मिला था, जिन्होंने फिल्म में गालिब की भूमिका की थी। फिल्म में सुरैया ने गालिब की प्रेमिका के रूप में उनकी गज़ल भी एक खास अंदाज में गाई थीं। “ये न थी हमारी किस्मत के बिसाले यार होता” और “नुक्ताचीं है गमे दिन” गजलें सुरैया की आवाज में जैसी चमत्कारिक लगती हैं, वैसी किसी अन्य स्वर में नहीं। वह सुरैया की प्रतिष्ठा का चरम क्षण था, जब गायन और अभिनय के लिए पुरस्कृत हुई सुरैया से पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था – लड़की तुमने तो गालिब की रूह को जिंदा कर दिया। सुरैया इससे पहले सन् 1950 में भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का स्वर्ण पदक प्राप्त कर चुकी थी ।
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बाल कलाकार के रूप में–
‘ताजमहल’ (1941),‘स्टेशन मास्टर’, ‘तमन्ना’ (1942) और ‘हमारी बात’ (1943)।
नायिका के रूप में –
‘इशारा’ (1943),‘मैं क्या करूँ’,‘फूल’, ‘सम्राट चंद्रगुप्त’, ‘तदबीर’, ‘यतीम’ (1945), ‘अनमोल घड़ी’ (1957),‘हसरत’, ‘जगबीती’, ‘उमर खय्याम’, ‘उर्वशी’ (1946), ‘आकाशदीप’, ‘डाक बंगला’, ‘दर्द’, ‘दो दिल’, ‘नाटक’, ‘परवाना’ (1947), ‘आज की रात’, ‘गज़रे’, ‘काजल’, ‘रगंमहल’, ‘प्यार की जीत’, ‘शक्ति,‘विद्या’ (1948),‘अमर कहानी’,‘बड़ी बहन’, ‘बालम’, ‘चार दिन’,‘दिल्लगी’,‘दुनिया’, ‘जीत’,‘लेख’, ‘नाच’, ‘शायर’ (1949), ‘अफसर’,‘दास्तान’,‘कमल के फूल’, ‘खिलाड़ी’, ‘नीली’, ‘शान’, (1950),‘दो सितारे’, ‘राजपूत’, ‘शोखियाँ,‘सनम’ (1951),‘खूबसुरत’,‘गूँज’,‘दीवाना’,‘मोती महल’,‘लाल कुँवर’(1952), ‘माशूका’ (1953),‘बिल्व’,‘मंगल’, ‘मिर्जा गालिब’, ‘वारिस,‘शमा परवाना’ (1954), ‘इनाम’, ‘कंचन (1955), ‘मिस्टर लम्बू’ (1956),‘मालिक’,‘ट्रोली’,‘ड्राइवर’,‘मिस’ 1958 (1958), ‘शमा’ (1961) और ‘रूस्तम सोहराब’ (1963)
सुरैया ने कपूर खानदान के तीन पुरुषों के साथ नायिका का रोल अदा किया। यह संयोग ही है कि नायिका के रूप में सुरैया की पहली फिल्म ‘इशारा’ (1943) और अंतिम फिल्म ‘रूस्तम-सोहराब’ (1963) के नायक पापा पृथ्वीराज कपूर ही थे, जबकि फिल्म ‘दास्तान’ (1950), और ‘शमा-परवाना’ (1954 ) में उसके नायक क्रमशः राजकपूर और शम्मी कपूर थे। वास्तविक जीवन में सुरैया राजकपूर की बाल मित्र थी। सुरैया आर्थिक सफलता और लोकप्रियता की सीढ़ियाँ लड़की होने के कारण जल्दी-जल्दी चढ़ गई, परन्तु राजकपूर को अपनी राह खोजने में थोड़ा वक्त लगा।
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सुरैया, मधुबाला और मीनाकुमारी के फिल्मों में आने की पृष्ठभूमि एक सी है। तीनों के परिवार को बेटी की कमाई की दरकार थी। इतनी अधिक की बचपन में ही इन्हें सेट पर धकेल दिया गया । 1941 में नानाभाई भट्ट को अपनी फिल्म ताजमहल में मुमताज के बचपन के रोल के लिए एक बालिका की जरूरत थी। तब बेबी सुरैया अपने मामा जहूर के साथ स्टूडियो जाया करती थी। नानाभाई ने सुरैया को देखा तो वह उन्हें अपनी फिल्म के लिए उपयुक्त जान पड़ी। मामा ने भी कमाई का एक नया रास्ता खुलने की खुशी में हाँ कर दी। इससे पहले उनकी बहन मुमताज (यानी सुरैया की माता) को भी मेहबूब ने अपनी फिल्म में हीरोइन बनाना चाहा था, मगर सुरैया के पिता ने इंकार कर दिया था। मुमताज बेगम एक सलोने व्यक्तित्व की स्वाभिमानी थी, जिसकी झलक बाद में लोगों ने युवा सुरैया के रूप में देखी। यहीं नहीं, मुमताज गायिका-अभिमेत्री खुर्शीद की अच्छी दोस्त थी। इसी दोस्ती की वजह से सुरैया ने खुर्शीद को अपना आदर्श मान लिया। लता मेगेशकर की आदर्श नूरजहाँ थी।
हिन्दी फिल्मों में 40 से 50 का दशक सुरैया के नाम कहा जा सकता है। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी एक झलक पाने के लिए उनके प्रशंसक मुंबई में उनके घर के सामने घंटों खड़े रहते थे और यातायात जाम हो जाता था।
मिर्जा गालिब में सुरैया का रोल देखकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था - लड़की तुमने कमाल कर दिया।
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| With old and strict Nani |
कहा जाता है कि हिन्दी फिल्मों में नायिका के करने के लिए कुछ नहीं रहता, इसलिए स्टारडम भी उनसे दूर ही रहती है। यह बात बीते दौर की कलाकार सुरैया के मामले में गलत साबित हो जाती है, क्योंकि 1948 से 1951 तक केवल तीन वर्ष के दौरान सुरैया ही ऐसी महिला कलाकार थीं, जिन्हें बॉलीवुड में सर्वाधिक पारिश्रमिक दिया जाता था।
आजादी के आस पास के दौर में सुरैया के पोस्टर साइज फोटो काँच की फ्रेंम में देश के 5 स्टार होटलों में शान से लगाए जाते थे। ग्रामोफोन पर उसके रिकॉर्ड दिनभर बजते थे। |








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