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27.8.08

बंद संस्कृति पर बुद्धदेव बाबू की बेबसी



प्रकाश चण्डालिया


बंगाल के मुख्यमंत्री पर किसी को भी तरस आ सकता है। वे यदि अपनी पार्टी में निचले स्तर के कार्यकर्ता होते, तो बात समझ में आती, पर मुख्यमंत्री के ओहदे पर बैठकर जिस तरह अपनी लाचारी व्यक्त कर रहे हैं, वह बुद्धदेव भटाचार्य जैसे विवेकशील प्राणी के लिए स्तरीय नहीं कही जा सकती। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा है कि वे बंद संस्कृति के खिलाफ हैं, लेकिन उनकी मुश्किल यह है कि वे जिस पार्टी से ताल्लुक रखते हैं, वह खुद बंद संस्कृति की पोषक है। यह बयान मुख्यमंत्री ने मंगलवार 26 अगस्त को उद्योगपतियों की बैठक में दिया।
दरअसल, सिंगुर में टाटा के प्रोजेक्ट पर ममता बनर्जी के आन्दोलन ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। मुख्यमंत्री के रूप में निसंदेह वे अपने प्रदेश को आगे ले जाना चाहते हैं, अधिक से अधिक निवेश बटोर कर राज्य को खुशहाल बनाना चाहते हैं, लेकिन करें कैसे? तीस सालों से उनकी पार्टी ने उद्योगपतियों को तो बैरी समझा। जब कभी विकास की बयार बहती दिखी,यूनियनबाजी के नाम पर विरोध शुरू कर दिया। अब किसानों को साथ लेकर ममता बनर्जी उनकी छाती पर मूंग दल रही हैं।
हालांकि विधानसभा में उनके पास जबर्दस्त बहुमत है, फिर भी विपक्षी नेत्री का आन्दोलन इतना तुल पकड़ लेगा, इसकी उम्मीद उन्हें नहीं रही होगी। अब जब ममता बनर्जी के आन्दोलन से दुखी होकर रतन टाटा ने बंगाल छोडऩे की धमकी दे डाली है, तो बुद्धदेव बाबू के पैरों तले जमीन खिसकती नकार आ रही है।
मुख्यमंत्री महोदय भलीभांति जानते हैं कि बंगाल में बन्द संस्कृति को उन्हीं की पार्टी ने खाद-पानी दिया है। बंगाल में हर साल 8-10 बार प्रदेश बंद कराया जाता है। सत्तारूढ़ वामपंथियों के झंडे का खौफ इतना है कि किसी दुकान पर यदि भूल से भी झंडा लगा दिया जाए तो उसकी हिम्मत नहीं होगी झंडे को हटाने की। लाल पार्टी की जमीनी सच्चाई तो यह है कि बंगाल का विकास न होने देने में खुद उसी का हाथ है। जिस मोर्चे को लगातार तीस सालों से राज करने का मौका मिल रहा हो, उसके मुख्यमंत्री बतौर कुर्सी पर बैठा नेता इतनी बेचारगी क्यों दिखाने लगा भला? भट्टाचार्य साहब की पार्टी को चाहिए कि बंगाल को विकास की पगडंडी पर ले जाने के लिए अहम का रास्ता छोड़े और उद्यमियों के साथ-साथ उस सर्वहारा वर्ग के विकास की बात भी सोचे, जिसका इस्तेमाल अब तक केवल भीड़ जुटाने के लिए किया जाता रहा है।
वैसे हर साल बंगाल में दुर्गापूजा के दिनों में किसी न किसी बहाने बन्द आहूत किया जाता है। यदि इस बार दुर्गापूजा का त्योहारी बन्द न हुआ तो बुद्धदेव बाबू निश्चय ही बधाई के पात्र होंगे।

2 comments:

Chandan Pratap Singh said...

this is story is excellent.hope we will able to read prakash chandalia ruglarly

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

प्रकाश जी,
बुद्धदेव बाबू तो बधाई के पात्र तब होंगे जब सफलतापूर्वक नानो बाजार में आ जायेगा. और बंगाल के नाम एक और इतिहास दर्ज हो जायेगा.
जय जय भड़ास