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30.8.08

पहचान कौन?

सुनो भोपाली
यह पहेलियां मनोरंजन का एक सूत्र हैं। इनमें पत्रकारों का साहस भी नजर आएगा और उनका हुनर भी। इनसे दूसरे सबक भी ले सकते हैं और इन पहेलियों में छिपे अपने मित्रों को समझाइश भी दे सकते हैं। इनमें जीने का फलसफा भी है और ऊंचाइयां पाने का तरीका भी।

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

1
आलस ने मोटा किया, निकला बाहर पेट।
मन से तो वे साफ हैं, पर बोली इकदम ठेठ।
रसिक ’बिहारी‘, बदलो पारी, करो नई तैयारी।
खेल-खेल में बिगड़ न जाए सेहत कहीं तुम्हारी।
अब बदल भी दो संस्थान!

2
नाम जैसा कुछ न बचा, फंसे पड़े मझधार।
वक्त के आगे घुटने टेके, मान ली अपनी हार।
नई नौकरी गए ढूंढने, मालिक ने ऐंठे कान।
दिया वचन अब इसी राज में त्यागेंगे अपनी जान।।
इतने न बनो महान।।

3
कलम घसीटी छोड़कर अब करते बकर-बकर।
कठ-काठी से पहलवान, कहते हैं फकर-फकर।
परिवहन की बीट में करते नित नया कमाल।
नौकरी तो बस नाम की, आगे...नो सवाल?
सेठ हैं भैया, समझो न दलाल।

4
जर्नलिजम का भूत है, जिसके दिलो-दिमाग पर छाया।
अस्पताल में दिनभर भटके, फिर भी सूखी काया।
कम समय में नाम कमाया, गढ़ दी नई कहानी।
हाव-भाव सब ऐसे, जैसे हो झाँसी की रानी।
हर जगह ढूंढे ख़बर।

2 comments:

आशेन्द्र सिंह said...

yar kyon bhopaliyo ki dhoti utarne me lage ho ? badhai ho.

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

मित्र,
शानदार है आपको बधाई जारी रखिये इस गति को.