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10.2.12

मेरे लिये


प्रिय,
बस एक बार सुलझा दो,
पहेली मेरे जीवन की।
मेरे दिल की जमीं पर,
बो दो तुम कोई बीज।
उसका प्रस्फुटन होने से,
नहीं रोकूंगा कभी,
वह चाहे मुहब्बत हो या नफरत?
बस इन दोनों में से,
कुछ भी चुनों,
तुम मेरे लिये।

  •  रवि कुमार बाबुल

3 comments:

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

bahut sundar bhavabhivyakti..

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

bahut sundar bhavabhivyakti..

Shanti Garg said...

कुछ अनुभूतियाँ इतनी गहन होती है कि उनके लिए शब्द कम ही होते हैं !