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2.4.09

भारत के संविधान की प्रस्तावना......और हम.....!!

Thursday, April 2, 2009

भारत के संविधान की प्रस्तावना.....और हम....!!

भारत के संविधान की प्रस्तावना
"हम भारतवासी,गंभीरतापूर्वक यह निश्चय करके कि भारत को सार्वभौमिक,लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाना है तथा अपने नागरिकों के लिए-------
न्याय--सामाजिक,आर्थिक,तथा राजनैतिक ;
स्वतन्त्रता--विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,आस्था,पूजा पद्दति अपनाने की;
समानता--स्थिति व अवसर की व इसको सबमें बढ़ाने की;
बंधुत्व--व्यक्ति की गरिमा एवं देश की एकता का आश्वासन देने वाला ;
सुरक्षित करने के उद्देश्य से
आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान-सभा में,इस संविधान को अंगीकृत ,पारित तथा स्वयम को प्रदत्त करते हैं ।"
देश के सारे बंधू-बांधवों..........!! हमारे सर के एन ऊपर चुनाव है.....और हमारे चारों और इसी की सरगर्मियां भी.....क्या हमारे अतीत के प्रतिनिधि ,वर्तमान प्रतिनिधि तथा हमारे समक्ष खड़े हुए तमाम उम्मीदवारों में ऊपर उल्लिखित संविधान के किसी भी गुणों का भाव पाते हैं...??
देश के सारे बंधू-बांधवों...........!!संविधान का कोई मतलब ,कोई पवित्रता ,उससे अपनी कोई अभिन्नता ,अपने इस देश में रहने का कोई अर्थ क्या सचमुच हम समझते हैं....??
देश के सारे बंधू-बांधवों...........!!क्या आप यह जानते हो कि हमारे देश के संविधान को बनाने वाले लोग कोई ऐसे-वैसे लोग नहीं बल्कि अत्यन्त ही पढ़े-लिखे ,अत्यन्त ही विषय-मर्मग्य ,अत्यन्त ही प्रखर और स्वाधीनता के संघर्ष की आंच में तपे-तपाये लोग थे ,जिन्होंने अत्यन्त ही श्रमसाध्य कार्य कर हमारे देश के संविधान को जन्म दिया.....लेकिन साथ ही बाबा साहब आंबेडकर ने इस देश की राजनीति का मन भांपकर आने वाले दिनों में संभावित खतरों के बारे में इस देश की संसद को तथा प्राकारांतर से इस देश की जनता को आगाह भी किया था....आसन्न संकट को भांपते हुए जो भय ,जो डर उन्होंने आज से साठ साल पहले व्यक्त किया था...आज वही हम सब के सर चढ़कर बोल रहा है..........!!
देश के सारे बंधू-बांधवों...........!!जैसा कि आप सब जानते हो कि आप सबने अब तक किसी भय....किसी लालच....किसी तत्कालीन भावना....किसी नशे के लती होकर किसी ना किसी उम्मीदवार को अपना मत देकर संसद को सुशोभित किया है....अब उसने संसद में क्या किया है....और आप सबके बीच क्या....यह आपको भलीभांति मालूम है.....!!यह जो हाल हमारे देश का और संसद में बैठे अपराधियों के कारण हारे संविधान का दिखायी पड़ता है.....वह दरअसल हमारे ही कर्मों का प्रतिफलन है.....जिन्होंने उपरिउल्लिखित कारणों से गैर वाजिब व्यक्ति को वोट दिया....और सबसे बढ़कर उनलोगों ने ,जिन्होंने वोट ही नहीं दिया यानि जिन्होंने संसदीय-व्यवस्था में या कि संविधान में अपनी आस्था ही नहीं जताई.....!!.......और वही सबसे बढ़कर देश के हालात का रोना रोते और कल्पते-कूटते हैं.....!!
देश के सारे बंधू-बांधवों...........!!...........सबसे पहले तो यही तय करो कि कम से कम इस चुनाव का भी आप वही हाल ना बना डालो....प्रकारांतर से देश की संसद को कुडाघर.........अजायबघर.....अपराधियों की पनाहगाह.....देश-द्रोहियों की शरणगाह.....लम्पट लोगों का अड्डा....या ऐसी ही कोई चीज़ ना बना डालो.....अपनी माँ की इज्जत के लिए जो भी तुम करते हो.....वही सब इस देश की आत्मा की रक्षा के भी करो....जैसे अपने बच्चों पर दया करते हो वैसे ही देश की जनता पर भी दया करो.....जैसे अपने किसी परिचित के लिए दुआ करते हो....वैसे ही इस देश की कुशल मंगल के लिए भी दुआ करो.....!!
देश के सारे बंधू-बांधवों...........!!जो कुछ भी तुम सब अपने हक़ के लिए करते हो....वही सब जो भी तुमसे मुमकिन हो सके....इस देश के हक़ के लिए भी करो....कभी भी उनलोगों के माथे पर तिलक मत करो....जो अंततः तुम्हारे हक़ को खा जाने वाले हैं.....और देश की आत्मा का गला ही घोंट देने वाले हैं....जो भारत माता का बलात्कार ही कर डालने वाले हैं....याद रखो यह बलात्कार वो तो बाद में करते हैं.....उससे पहले तो तुम ही करते हो उन्हें संसद में भेजकर.....उन्हें अपना नुमाइंदा बनाकर.....भारत की दुर्दशा की पूर्व पीठिका तुम्हीं हो.....ओ मेरे देश के मासूम और भोले-भाले लोगों.....मगर अपने इस भोलेपन के चोले को अब उतार भी फेंको.....एक सुंदर भविष्य तुम्हारी राह तक रहा है.....एक मानवता तुम्हे बड़ी हसरत से देख रही है.....एक बहुत बड़ा स्वप्न अब पूरा होने को है......अगर तुम आँखे खोल कर देख सको.....!!सच.....!!!!

हिन्दी भाषा के संरक्षण व विकास से ही राष्ट्रोत्थान संभव

हिन्दी भाषा के संरक्षण व विकास से ही राष्ट्रोत्थान संभव
भाषा अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है.यह अभिव्यक्ति आमजन की अस्मिता से लेकर राष्ट्र के आगत भविष्य निर्माण के लिए भी हो सकती है।इसलिए भाषा का प्रश्न केवल भाषा तक ही सीमित नहीं है.यह अपनी पहचान का प्रश्न है.क्या जो हम सोचते हैं , उसे अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्त करते हैं और यह अभिव्यक्ति हमारी पहचान बनाने में कितनी समर्थ हो रही है ? हमने अपनी आजादी की लड़ाई हिन्दी माध्यम से जीती है.हिन्दी की ऊर्जा का एकमात्र स्त्रोत आमजन है. आमजन ही भाषा की राष्ट्रीय गरिमा को प्रतिष्ठित करता एवं इसे कायम रखता है.भाषा का निर्माण टकसाल में न होकर सड़क पर होता है , चौपाल में होता है , गावं के गलियारों में होता है और उसका शिल्पी देश का आमजन है.भाषा की समृद्धि जन-जन की भाषा के प्रति सजगता , सक्रियता एवं जागरूकता पर निर्भर करती है.भाषा के विनाश एवं विकास में वही एकमात्र ज़िम्मेदार होता है.आज यह ज़िम्मेदारी खतरे में पड़ी नजर आती है.सबसे पहले मुगलों ने हिन्दी के साथ अन्य भाषाओं का संयोग-समन्वय किया.इससे हिन्दी भाषा का विभाजन नहीं हुआ,बल्कि उसकी विविधता में विकास हुआ.हिन्दी में उर्दू और फारसी आदि भाषाओं का सुंदर गठजोड़ हुआ. भाषा कई आयामों में विकसित हुई.विकास के इन मूल कारणों को अंग्रेजों की अंग्रेजी ने चोट मारी और इसे कमजोर कर हिन्दी के स्थान पर अंग्रेजी को प्रतिष्ठित बनाने का कुचक्र रचा गया. बहुत हद तक यह कुचक्र सफल हुआ , जिसका परिणाम हमारे सामने है कि हम हिन्दी से अधिक अंग्रेजी बोलने में गर्व अनुभव करते हैं.
हिन्दी के मूल में अंग्रेजी के कुठाराघात के बाद फिर से एक और प्रहार हो रहा है - भूमण्डलीकरण का . भूमण्डलीकरण के इस दौर में किसी स्वाधीन , संपन्न और आत्मनिर्भर राष्ट्र में दूसरे देश की भाषा विकास का पैमाना बने , यह कैसे स्वीकार्य होगा.यह भी सच है कि विश्व के किसी देश में भाषा की स्वाधीनता और उसकी निजता को इतने व्यापक विस्तार और बारीकी से नहीं लिया गया , जितना हमारे देश में और यह घटना आज भी जारी है. बाज़ारवादी व्यवस्था में हिन्दी की अस्मिता,अस्तित्व और निजता के लिए उत्तरदायी लोगों की अभिरूचि एसे गंभीर और बुनियादी सवालों पर नहीं है. वे इस भाषा को विश्वव्यापी बनाने, वर्तमान समय में अन्य भाषाओं के समान विकसित एवं समृद्ध करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. उन्हें भाषागत स्वाभिमान की बात बेकार और ग़ैरज़रूरी लगती है. बाज़ारवाद तत्कालिक आवश्यकता को सर्वाधिक अहमियत देता है. वह एसी संकर भाषा निर्मित करता है , जिससे केवल उसका हित सध सके. वह अपने लाभ के लिए आज हिन्दी भाषा का , जितना सर्वनाश कर सकता है , कर रहा है और इसके प्रति हमारी घोर उदासीनता ने हमारी पहचान को प्रश्न के घेरे में खड़ा कर दिया है. चांदी के चन्द सिक्कों में हम अपनी पहचान खोने लगे हैं. अगर एसा नहीं है तो क्या कारण है कि हमें अपनी हिन्दी एवं अन्य मातृभाषा बोलने में संकोच होता है.एसा संकोच तो चीनी , रूसी , जर्मन एवं फ्रांस के लोग नहीं करते, वे तो अपनी ही भाषा को प्राथमिकता देते हैं.
आज हिन्दी की नियति एवं परिस्थिति अत्यंत चिंताजनक है. आंकड़ों के आईने में देखें तो हिंदीभाषी देश में अंग्रेजी जानने वालों की संख्या कुल आबादी का तीन प्रतिशत है. लगभग दो सौ वर्ष के अंग्रेज आधिपत्य और 58 साल के चहुंमुखी विकास के बावजूद अंग्रेजी का विकास संभव नहीं हुआ , फिर भी अंग्रेजी मोह नहीं जाता. विचारणीय यह भी है की शेष सतानवे प्रतिशत जनता क्या चाहती है,उसकी अपेक्षाएं क्या है ? निरक्षरता आज की सबसे बड़ी चुनौती है , इसके निराकरण में केवल भारतीय भाषाएं ही सहायता कर सकती हैं.भाषा का निर्माण जनसामान्य करते हैं , अंततः इसकी रक्षा वही करेगें, क्योंकि सरकार,आयोग और आयोजन न भाषा का निर्माण करते हैं और न परिष्कार-परिमार्जन. हिन्दी भाषा का उत्थान भी इन्हीं जनसामान्य के हाथों में है. अतः जनसामान्य की जागरूकता आवश्यक है।
बाज़ारवाद के घोर समर्थक एवं पक्षधर अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार एवं विस्तार में अधिक रूचि दिखाते हैं, क्योंकि इसी में उनका लाभ है. तीन प्रतिशत भारतीयजनों के लिए इतनी सजगता और सतानवे प्रतिशत जनता के लिए इतनी उपेक्षा क्यो ?विदेशी भाषाओं को सीखने , समझने एवं व्यवहार करने में कोई समस्या नहीं है,परंतु इन्हें अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में वरीयता प्रदान करना अत्यंत घातक एवं चिंताजनक है।अंग्रेजी अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान में संवाद की भूमिका निभाए तो स्वीकार है .
हिन्दी साहित्य के शिरोमणि मुंशी प्रेमचंद के शब्द हैं- 'राष्ट्र की बुनियाद राष्ट्र की भाषा है.भाषा ही वह बन्धन है, जो चिरकाल तक राष्ट्र को एक सूत्र में बांधे रहती है और इसे बिखरने,विखंडित एवं विभाजित होने से रोकती है.' राष्ट्रनिर्माण के पुरोधा श्री अरविंद कहते हैं कि किसी राष्ट्र अथवा मानवीय समुदाय की आत्मा के लिए यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि वह अपनी भाषा की रक्षा करे और उसे एक सशक्त और सजीव सांस्कृतिक बना ले.जो राष्ट्र , जाति और जनसमुदाय अपनी भाषा खो देता है, वह अपना संपूर्ण एवं सच्चा जीवन व्यतीत नहीं कर सकता.

खबरें न प्रकाशित करने देने की अर्जी कोर्ट में खारिज

एचटी मीडिया बनाम भड़ास4मीडिया : सुनवाई की अगली तारीख 24 जुलाई

शैलबाला-प्रमोद जोशी प्रकरण से संबंधित खबरें भारत के नंबर वन मीडिया न्यूज पोर्टल भड़ास4मीडिया पर पब्लिश किए जाने के खिलाफ एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में दायर केस की पहली सुनवाई आज हुई। वादी एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी की तरफ से दायर केस में भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह और तीन अन्य को प्रतिवादी बनाया गया है। हाईकोर्ट में दर्ज इस केस संख्या सीएस (ओएस) 332/2009 की सुनवाई हाईकोर्ट के कोर्ट नंबर 24 में विद्वान न्यायाधीश अनिल कुमार ने की।

इस दौरान एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी की तरफ से हाजिर हुए वकील ने केस निपटारे तक भड़ास4मीडिया पर एचटी मीडिया और इससे जुड़े लोगों से संबंधित खबरें प्रकाशित न करने देने का आदेश पारित करने का अनुरोध कोर्ट से किया। इस बाबत एचटी मीडिया और अन्य की तरफ से कोर्ट में अर्जी भी दी गई थी। कोर्ट ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया। प्रतिवादियों की तरफ से दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील निलॉय दासगुप्ता ने कोर्ट को जानकारी दी कि कुछ प्रतिवादियों ने नोटिस 29 मार्च को रिसीव किया है और एक प्रतिवादी के पास अभी तक नोटिस सर्व नहीं हुआ है। इस पर कोर्ट ने वादी एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी के वकील को सभी प्रतिवादियों को नोटिस समेत सभी जरूरी दस्तावेज मुहैया कराने के आदेश दिए। प्रतिवादियों को अगले चार हफ्तों में जवाब दाखिल करने को कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई की तारीख 24 जुलाई तय की गई है। प्रतिवादियों के वकील निलॉय दासगुप्ता ने बाद में बताया कि एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी की तरफ से जो केस दायर किया गया है, उससे संबंधित जो नोटिस प्रतिवादियों के पास भेजा गया है, उसमें कई चीजें मिसिंग हैं। उदाहरण के तौर पर नोटिस के पेज नंबर 117 पर जिस कांपैक्ट डिस्क के होने का उल्लेख किया गया है, वो नदारद है। साथ ही सभी प्रतिवादियों को अभी तक नोटिस सर्व नहीं हुआ है। ऐसे में कोर्ट ने वादियों के वकील को सभी दस्तावेज व कागजात प्रतिवादियों को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। वेबसाइट पर वादियों से संबंधित कंटेंट पब्लिश न करने को लेकर जो अनुरोध कोर्ट से किया गया, उसे नामंजूर कर दिया गया।

इस खबर से संबंधित तस्वीर और वीडियो देखने के लिए क्लिक करें-- भड़ास बनाम एचटी

देखिये...ये चुनाव है.....

.चुनावी..बिगुल बज चुका है......चारों तरफ़ युध्घोश हो रहे है ..इसी के साथ ही कुछ नेता गिरगिट की भाँती रंग बदलने लगे है तो कुछ ने अपना चोगा .उतार फेंका है..!कुछ हिन्दुओं को तो कुछ मुसलमानों को गालियाँ निकाल रहे है....!कुछ जातिवाद को भुनाने में लगे है तो कुछ हमेशा की तरह गरीबों का वोट हथियाना चाहते है....!सब नेताओं ने तरह तरह के मुखोटे पहन लिए है....!वे मेंढक की तरह एक से दूसरी पार्टी में फुदक रहे है....अचानक ही वे हमारे .हमदर्द बन गए है....उन्हें हर हाल में हमारा वोट चाहिए...!इस चुनावी .नदी...को पार करने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते है...!हम सब ये देख कर भले ही हैरान हो लेकिन वे इस खेल के पुराने खिलाडी है....ये उनका पेशा है..!अब हमे चाहिए की हम उनकी बातों में ना आए...!चुनाव आते ही ये जहर उगलने वाले नेता बाद में फ़िर एक हो जायेंगे...इसलिए इनकी बातों में ना आना दोस्तों ...ये तो गरजने वाले बादल है जो बिन बरसे ही गुज़र जायेंगे.....

1.4.09

कनाट प्लेस और कबूतर

इस रविवार कनाट प्लेस पर दोपहर से दर रात तक घूमता रहा। कई लोगों से मिलना-जुलना था और थोड़ी मस्ती भी करनी थी। साथ में था कैमरा। वोल्गा बार में एक बीयर गटकने के बाद जब बाहर निकला तो कबूतरों को दाना चुगते देखा। तुरंत कैमरा आन किया। दिल्ली-6 में मटकअली मसककली के दर्शन के बाद इन्हें जरा यहां भी देख लीजिए.....:)


आईआईएमसी एंट्रेस के लिए ‘सपोर्ट’

अमूमन माना जाता है कि कहीं से पढ़कर निकलने के बाद लोग उस संस्थान से एक तरह से कट जाते हैं। लेकिन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन (नई दिल्ली) से पासआउट कुछ युवाओं ने एक ऐसी पहल की है जिसे जड़ों से जुड़ना कह सकते हैं। आईआईएमसी के इन पूर्व छात्रों ने एक ग्रुप बनाया है जिसका नाम रखा गया है सपोर्ट। सपोर्ट वैसे लड़के-लड़कियों को गाइडेन्स देने का काम कर रहा है जो 19 मई 2009 को होने वाले आईआईएमसी की प्रवेश परीक्षा में शामिल हो रहे हैं। ऐसे भी इन दिनों आईआईएमसी कैम्पस में फॉर्म खरीदने और जमा करने वाले लड़के-लड़कियों की भीड़ पहुंच रही है लेकिन इन लोगों में एंट्रेस एक्जाम को लेकर कई शंकाएं भी हैं। इसीलिए सपोर्ट द्वारा आईआईएमसी कैम्पस में ही ऑन-स्पॉट काउंसिलिंग भी की जा रही है। सपोर्ट से जुड़े आईआईएमसी के पूर्व छात्र दीपक का कहना है कि आईआईएमसी में आने के इच्छुक युवाओं में प्रवेश परीक्षा को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं जिन्हें दूर करने की एक कोशिश है सपोर्ट। उन्होंने बताया कि सपोर्ट अपने नाम के मुताबिक ही
आईआईएमसी में आने के इच्छुक युवाओं को सपोर्ट करने का एक फोरम है। आईआईएमसी कैम्पस के पास ही मुनिरका इलाके में सपोर्ट का सेंटर खोला गया है। इस सेंटर में हर रोज काउंसिलिंग और गाइडेन्स का काम जोर-शोर से किया जा रहा है। सपोर्ट के साथ अच्छी बात ये है कि काउंसिलिंग और गाइडेन्स का काम आईआईएमसी के पूर्व छात्र ही कर रहे हैं जो आज किसी ना किसी मीडिया संस्थान से जुड़े हुए भी हैं। दरअसल सपोर्ट का टैगलाइन ही है
Be IIMCian By IIMCians। सपोर्ट ग्रुप आईआईएमसी प्रवेश परीक्षा की तर्ज पर मॉडल टेस्ट भी शुरू करने जा रहा है। सपोर्ट ग्रुप के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए 9968774665 और 9718121467 नंबर पर संपर्क किया जा सकता है या फिर
support4iimc@gmail.com पर मेल किया जा सकता है।

(मेल से भेजी गई सूचना)

शिक्षा में सुधार के प्रयास

यु जी सी ने सुझाव दिया है की यूनिवर्सिटियां कुछ ऐसा उपाय भी करें जिसमें कोई छात्र अपने कॉलिज में पढ़ाई करे, मगर उसी पाठ्यक्रम का कोई खास पर्चा यदि वह किसी विशेष संस्थान से करना चाहे और उसकी व्यवस्था कर ले, तो उसे ऐसा करने की छूट हो। सैद्धांतिक रूप से यूजीसी के ये प्रस्ताव अच्छे हैं, पर फिलहाल इनका विरोध भी हो रहा है। अध्यापकों को यह शिकायत है कि यूजीसी बिना इन पर पर्याप्त चर्चा कराए और बगैर ब्लू प्रिंट बनाए ही इसे थोपने की कोशिश कर रही है। सभी यूनिवर्सिटियों में इसके लिए ऐसा ढांचा नहीं है कि वहां साल में दो बार परीक्षाएं हो सकें। इसी तरह जिस आंतरिक मूल्यांकन का प्रतिशत बढ़ाने की सिफारिश यूजीसी कर रही है, पर वह छात्रों पर उलटी भी पड़ सकती है। टीचर किसी छात्र से अपनी कोई नाराजगी इसके जरिए निकाल सकते हैं। इसलिए टीचरों द्वारा किए जाने वाले आंतरिक मूल्यांकन की निगरानी का भी तो उपाय करना होगा। लीक से हटने की यूजीसी की इच्छा का स्वागत है, पर यह खयाल रखना होगा कि जल्दबाजी से काम बिगड़ नहीं जाए। यूनिवर्सिटियों को तैयारी के लिए पर्याप्त वक्त मिलना चाहिए।
वैसे भी आतंरिक मूल्यांकन में यह बात सामने आई है की टीचर अपने पसंदीदा छात्रों को ज्यादा नंबर देते है और कुछ तो इतने लोभी किस्म के होते है की पैसा भी खाते है । इसी तरह से कुछ छात्रों से अपने घर का काम भी कराते है । आतंरिक मूल्यांकन से ऐसे प्रोफेसरों की चांदी हो जायेगी ।
कुछ अन्य सुझाव है ...यूजीसी ने शैक्षिक व प्रशासनिक सुधारों के लिए गठित ए. गणनम समिति की सिफारिशों के आधार पर सभी यूनिवर्सिटियों में ग्रेडिंग और सेमिस्टर सिस्टम लागू कराने की पहल की है। उच्च शिक्षा के ग्लोबल मानकों के मद्देनजर हमारी यूनिवर्सिटियों को अंकों और डिविजन की पारंपरिक प्रणाली से बाहर निकलना चाहिए।यह सुझाव काफी अच्छा है चर्चा और व्यापक व्यवस्था कर इसे लागू किया जा सकता है ।
आज बहुत बड़ी तादाद में हमारे छात्र उच्च और प्रफेशनल डिग्रियों व कोर्सों के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं। जब उनकी डिग्रियां और अंक वहां के सेमिस्टर या ग्रेडिंग सिस्टम से मेल नहीं खाते, तो दाखिले में दिक्कत होती है। अगर हमारा सिस्टम उनकी तरह होगा तो हमारे छात्रों को ऐसी परेशानी नहीं होगी। हमारी भी संभावना बढेगी विदेशों से और ज्यादा छात्र भारतीय यूनिवर्सिटियों में दाखिला लेगें क्योंकि यहां ऐसी शिक्षा उन्हें बहुत सस्ती पड़ेगी। ग्रेडिंग प्रणाली अंक प्रदान करने के सिस्टम से ज्यादा उपयोगी है, इसीलिए यहां सीबीएसई की परीक्षाओं में भी उसे अपनाया जा रहा है। पढ़ाई के लिहाज से साल में सिर्फ एक बार परीक्षा लेने से स्टूडंट पर सारे कोर्स की तैयारी एक साथ करने का दबाव बनता है। इसकी जगह सेमिस्टर और निरंतर मूल्यांकन करने वाला पैटर्न उन्हें ज्यादा सीखने के अवसर देता है और तनाव मुक्त रखता है।इस प्रकार यह प्रणाली व्यक्तित्व के विकास में भी मददगार साबित हो सकती है ।

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आईसीयू से जनरल वाडॆ में आने की तैयारी
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--------------------------------------------अब चाहे जो कहे,वरुण गांधी को िजतना गाली दे, भाजपा के नेता खुश है। आईसीयू से जनरल वाडॆ में भाजपा को िशफट करने की तैयारी हो रही है। यह सब कुछ वरुण जैसे डाकटरों के इलाज के बाद संभव हो सका है। खुश मायावती भी है और खुश भाजपा भी है। वरुण तो नेता बन ही गए,भाजपा की डूबती नैया के सहारा भी बन गए। कहां यूपी मे ७ से ८ सीटों के लाले थे,अब १५ से २० सीटों की उममीद बांधे बैठे है। अब कई तरह के िवचार भी शुरू हो गए है। अखबारों में खबर यह भी छप रही है िक छोटा शकील ने वरुण की सुपारी दे दी। उधर अखबारों में यह भी छपा है िक वरुण गांधी गांधी पिरवार के िवरासत के िलए संघषॆ कर रहे थे। उनके एक बयान ने अब इस िवरासत को ही िहला िदया है। राहुल गांधी भी परेशान है औऱ सोिनया गांधी भी। िपछले कई सालों से रोड शो राहुल कर रहे है। पर नेता नहीं बन पाए। लड़िकयों के आटोगराफ से ज्यादा वो कुछ नहीं कर पाए। पर वरुण की िगरफतारी को देख उनका िदल जला। इतना बड़ा हीरो बनने में उनहें कुछ िदन ही लगे।िचंता में कांगरेस के नेता ही नहीं भाजपा के नेता भी है। भाजपा के सेकेंड लाइन लीडरशीप घबरा गई है। सांढ़ की तरह आपस में लड़ रहे सेकेंड लाइन लीडरशीप की घबराहट जाएज है। ये कागजी है। अगर इनकी िगरफतारी होती तो सौ लोग भी नहीं पहुंचते। िफर इन नेताओं के पास कोई बरांिडंग नहीं है। नेहरू गांधी पिरवार की बरांिडंग में काम आ रही है। संजय गांधी का रुप वरुण मे नजर आता है। िजस तरह से संजय गांधी अपने हावभाव पेश करते थे वैसे ही वरुण गांधी अपने हाव-भाव िदखा रहे है। अंतर यही है िक यह रुप भगवा साफे के तले नजर आ रहा है। वो राहुल गांधी की तरह कलावती की और रामदुलारी की बात नहीं करते है। रामदुलारी और कलावती की बात करने का कोई फायदा नहीं है। वाकई में यह ढोंग ही तो है। पचास साल तक राज िकया और अभी तक झोपड़ी िदया। जब अखबारों में फोटो छपवाना होता है तो कलावती और रामदुलारी की झोपड़ी में रात गुजारते है। कम से कम वरुण गांधी इन थोथी बातों में नहीं पड़ते है। िपता संजय की तरह ही कारवाई में िवशवास करते है। बेशक यह कारवाई िकसी को नागवार गुजरे।उनके िपता संजय के बारे में कहा जाता था िक तानाशाह थे। इँिदरा गांधी उनसे डरती थी। यह भी कहा जाता है िक १९७७ में जब इंिदरा की हाथ से सता गई तो राजीव गांधी खुद और इंिदरा जी को इटली जाने की सलाह दे रहे थे। लेिकन संजय गांधी नहीं माने। उनहोंने संघषॆ िकया। दुबारा अपनी मां को सता में लाया। इंिदरा जी का संबल संजय गांधी ही थे। पयाॆवरण को लेकर जो उनके िवचार थे वो आज ही भी याद ही नहीं िकए जाते बिलक उनहें लागू िकया जा रहा है। मारुित जैसी कार संजय गांधी की देन थी। लोग कहते है िक अगर वो िजंदा रहते तो शायद जनसंखया िवसफोट की समसया से भी वो िनजात िदलाते। अब वरुण के दो बयानों ने संजय गांधी के उन सारी कारगुजािरयों को िफर से याद िदलाया जो संजय गांधी ने िकया। कनाट पलेस का पािलका बाजार हो या नई िदलली में रोड बेकरों को तुड़वाने संबंधी आदेश हो।राहुल गांधी इस बात की परेशानी तो होगी ही िक अगर वरुण लोकसभा में आए तो मुिश्कल होगी। एक तरफ चाची सोिनया और चचेरे भाई राहुल होंगे तो दूसरी तरफ वरुण। जहां एक और धमॆिनरपेछता की बात होगी तो दूसरी तरफ वरुण आरएएस और योगी आिदतयनाथ की भाषा बोलेंगे। िदलचसप बात होगी िक दोनों इंिदरा गांधी के पोते है और उनकी िवरासत के दावेदार है। िसथित यह भी आ सकीत है िक देश की दो बड़ी पारटी की राजनीित गांधी पिरवार के दो सदसयों के टकराव की राजनीित बन जाएगी। राहुल के मुकाबले के िलए वरुण को उतारा जाएगा और उस समय राहुल गांधी की िसथित सबसे अजीब होगी।इस पूरे खेल में मायावती और भाजपा की िमलीभगत भी नजर आती है। मायावती ने िजस तरह से वरुण पर रासुका लगाया है उसका सीधा फायदा भाजपा को होता िदख रहा है। लाभ मायावती को िमल रहा है। कयोंिक मुसिलम मायावती की तरफ पोलराइज हो सकता है। मुसिलम को पोलराइज होते देख िहंदू भाजपा की तरफ पोलराइझ हो सकता है। कुछ िजलों में पोलराइजेशन शुरू हो गई है। िजस तरह से वरुण गांधी के सरेंडर डरामा को होने िदया गया है उससे पता चलता है िक बसपा पूरे खेल में शािमल थी। वरुण को िदलली में बी िगरफतार िकया जा सकता था? लेिकन उसे पीलीभीत आने की पूरी अनुमित िमली। उनके समरथकों को वहां इकटठा होने देने की अनुमित िमली। इसके बाद सारा डरामा हुआ। िफऱ २४ घंटे के बाद रासुका लगा िदया गया। इससे भारी िहंदू सहानुभूित को वरुण को िमलेगी, इसकी संभावना जतायी जा रही है।वरुण भाजपा के सेकेंड लाइन सांढ़ों को काबू करने के िलए अचछा हिथयार है। आरएएस खुश है। यह तो नरेंदर मोदी से भी जयादा िवसफोटक है। यूपी के बसती िजले के रहने वाले एक मुसिलम युवक मोहममद यािहया ने कहा िक सबसे पहले कलयाण िसंह के उगर िहंदुतव को देखा। इस िहंदुतव को सबसे खतरनाक िहंदुतव वो मानते थे। इसके बाद उनसे भी खतरनाक नरेंदर मोदी के िहंदुतव को देखा। यह सबसे खतरनाक िहंदुतव उनहें नजर आया था। पर अब वरुण गांधी को देखने के बाद नरेंदर मोदी फीके नजर आते है। डर तो इश वरुण से नरेंदर मोदी को भी हो गया है। िफलहाल नेशनल सीन से उनका चेहरा गायब होता नजर आ रहा है और िहंदुतव के पैरोकार के रुप में वरुण सथािपत हो रहे है।

तू भूल रहा है किसको ?


वो जमाना भूल नहीं पाते हमजब वो हमारे साथ हंसा करती थी।

वो आंसू भूल नहीं पाते है हमजब वो हमारे साथ रोया करती थी।

वो वक्त नहीं भूल पाते है हमजो हमारे साथ बिताया करती थी।

मगर मैं भूलना चाहता हूं हर उस लम्हें को जो उसके साथ बिताया था मैंने।

लोगों से पूछता हूं मैं, इस मर्ज की दवा,लोग हंसकर कहते है इसका है ही नहीं दवा।

जब मैंने ठाना भूल जाऊंगा मैं उसको,वो फिर याद आती है।

दिल कहता है तू भूल रहा है किसको ?

31.3.09

हमारे नेता

तन पर सफ़ेद कुरता मन पर ढेर सा मैला
ऐसे है हमारे नेता
कहते है जनसभा में चिल्लाकर वोट दो हमें
वोट दो हमें
हम दिख्लायेगे रास्ता तरक्की का विकास का
( अपनी )
वोट दो हमें हम दिलाएंगे आरक्षण
( और लड़ायेंगे तुम्हें )
वोट दो हमें और संसद भेजो हमको
(हम भूल जायेंगे तुमको) ॥

ज्ञानेंद्र कुमार
हिंदुस्तान, आगरा

हमारे नेता

तन पर सफ़ेद कुरता मन पर ढेर सा मैला
ऐसे है हमारे नेता
कहते है जनसभा में चिल्लाकर वोट दो हमें
वोट दो हमें
हम दिख्लायेगे रास्ता तरक्की का विकास का
( अपनी )
वोट दो हमें हम दिलाएंगे आरक्षण
( और लड़ायेंगे तुम्हें )
वोट दो हमें और संसद भेजो हमको
(हम भूल जायेंगे तुमको) ॥

ज्ञानेंद्र कुमार
हिंदुस्तान, आगरा

चुनाव की बातें

हर आदमी चुनाव की ही चर्चा कर रहा है कोन जीतेगा कोन हारेगा पर वरुण गाँधी ने तो सभी हद ही तोड़ डाली वोह तो एक ही झटके मोदी बनना चाहते है समझ में नही आता लोग इतना क्यों बोलते है अगर आप सही तरीके से काम करते हो तो आपको वोट मागने ही नही जाना पड़ेगा हर आदमी चाहता है वोह आदमी चुनाव जीते जो कम कर सकता भले ही वरुण जी ऐसे भासन बोल कर चुनाव जीत ले पर काठ की हंडी एक ही बार चद्ती जनता समझदार है वोह उसी को जीतती जो कम कर सके नाकि ऐसे बयानवाजी ठीक वरुण जी इसलिए काम कीजिये फालतू बातो में धयान मत लगाइए आप युवा हे आप ही ऐसी बात करेंगे तो लगता है आपको चुनाव की नही आराम की जरूअत है जो लोग देश को तोड़ते वो भी देशद्रोही होते हे

ये वही शमशाद बेगम हैं


तेरी महफिल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे...., सइयां दिल में आना रे..., बूझ मेरा क्या नाम रे...., मेरे पिया गए रंगून किया है वहां टेलीफून...., एक दो तीन आज मौसम है रंगीन...., बूझ मेरा क्या नाम रे..., कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना....। इन गीतों केये अमर बोल पढ़कर आपने यह अंदाजा लगा लिया होगा कि मैं किसकी बात कर रहा हूं। हां आप एकदम सही सोच रहे हैं मैं बात कर रहा हूं महान गायिका शमशाद बेगम की। जैसे ही इन गीतों को मैं सुनता हूं मुझे उनके बारे में याल आने लगता है। अचानक आज(31 मार्च 2009) जब मैंने अपने आफिस में न्यूज प्रो आन करकेतस्वीरें चेक करनी शुरू की तो मुझे शमशाद बेगम की व्हील चेयर पर बैठे पुरस्कार लेते हुए एक तस्वीर दिखाई दी। इस तस्वीर को देखकर मैं खुश हो गया क्योंकि मैं इस गायिका के बारे मे न जाने कितने लोगों से सवाल कर चुका हूं पर किसी ने भी मुझे उनकेबारे में कोई जानकारी नहीं दी। मैं कई बार मुंबई गया और इस महान गायिका का साक्षात्कार करना चाहा पर मुझे कोई क्लू नहीं मिला। पर आज इस गायिका को रास्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल के हाथों समानित होते देखना काफी अच्छा लगा। शमशाद बेगम को 2009 का पद्म भूषण समान दिया गया है। मैं ऐसे बहुत से पुराने कलाकारों के बारे में जानने की वाहिश रखता हूं जो अभी इस दुनिया मे हैं पर मुझे लगता है कि बहुत से कलाकार धीरे-धीरे गुमनामी केअंधेरे में खो गए हैं। पर ये जानकर अच्छा लगा कि चलो सरकार अभी इस महान गायिका को भूली नहीं है। मुझे सबसे अधिक उस समय लगा जब 2007 में महान भजन गायक श्री हरिओम शरण जी का निधन हो गया उनकी इस खबर का पता भी नहींं चला। अखबारों ने उनकी सिंगल कालम खबर तक नहीं छापी न ही टेलीवीजन चैनलों ने उसे कवर किया। पर हां किसी भलेमानुष ने उनका 5 सेकंड का वीडियो अंतिम यात्रा का यू ट्यूब पर जरूर पोस्ट कर दिया जिससे बहुत से लोगों को धीरे-धीरे यह पता चल रहा है कि एक हरिओम जी अब हमारे बीच नहीं रहे। आखिर कलाकारों के प्रति ऐसी उदासीनता क्यों?

मेडिटेशन यानी ध्यान


विनय बिहारी सिंह

इसे आप सभी लोग जानते हैं कि हमारे ऋषि मुनियों ने जिसे ध्यान कहा उसे आज मेडिटेशन कहते हैं। नई पीढ़ी का कहना है कि ध्यान शब्द उतना आकर्षक नहीं है जितना अंग्रेजी का मेडिटेशन। ठीक है, कोई बात नहीं। यह बहस का मुद्दा नहीं है। पुराने जमाने में ध्यान मुफ्त में सिखाया जाता था। आज भी कुछ गिनी- चुनी संस्थाएं मुफ्त में सिखाती हैं लेकिन ध्यान का भी व्यवसायीकरण हो गया है। ध्यान सिखाने की माहवारी फीस १००० रुपए है। हफ्ते में एक दिन यहां ध्यान सिखाया जाता है। सबसे सस्ता रेट है ५०० रुपए। लेकिन यहां भी हफ्ते में सिर्फ एक दिन क्लास होता है। ध्यान होता क्या है? आप अपना ध्यान ईश्वर पर केंद्रित करते हैं। ईश्वर ही आनंद और शांति का केंद्र है। दयालु है। हमारा माता- पिता है। यह सोचते हुए आपको ध्यान करना है। अपने मनपसंद देवता की छवि बंद आंखों में रखिए। ध्यान कहां करें? रामकृष्ण परमहंस ने कहा है- सबसे प्रसिद्ध स्थल है हृदय। दूसरा स्थल है दोनों भृकुटियों के बीच में। जहां हम लोग टीका लगाते हैं या स्त्रियां जहां बिंदी लगाती हैं- वहां ध्यान किया जाता है। अब यह आपके ऊपर है कि आप कहां ध्यान करना पसंद करते हैं। ध्यान से क्या लाभ होता है? कई लाभ हैं। पहले तो आपका मन शांत होने लगता है। परेशानियों में आप बहुत तनावग्रस्त नहीं रहते। सबसे बड़ी बात आपका जीवन सुखमय होता है।

लाठी के सहारे नहीं लाठी को सहारा देते हैं सच बुजुर्ग सच तो बोल देतें हैं ।

दिल ,जेहन,लब सब की जुदा जुबाँ
एक बार मिल के उसका पता बोल देतें हैं
एलॉट कीजिये आस्तीन उन को अय बवाल
जो दिल में ज़हर की दुकां खोल देते हैं ।
साँपों के लिए तय शुदा दस्तूर यही है
चीलों की छोडिए वो तो बोल लेते हैं ।
लाठी के सहारे नहीं लाठी को सहारा
देते हैं सच बुजुर्ग सच तो बोल देतें हैं ।
कुछ भी कहो सियार ज़रूरी भी हैं बहुत
क्या हुआ हुआ की नहीं बोल लेतें हैं ।

पी ७ न्यूज़ द्वारा कैट वाक करवाया जाना शोषण है.

पी ७ न्यूज़ चैनल द्वारा एंकर से कैट वाल्क करवाए जाने का अर्थ यह लेना चाहिए की भारत के लोग अब बैठ कर ख़बरों को ना तो सुनेगे और ना ही बैठ कर खबरें पड़ने वाले एंकर को पसंद करेंगे। शायद
पी ७ न्यूज़ न्यूज़ चैनल और फैशन टी वी का मिश्रण होगा यहाँ पर एंकर कैट वाल्क करते हुए ही न्यूज़ रीडिंग करेंगे और यह हमारे देश को और पतन की और ले जाने वाला कदम होगा। एक बहुत ही सार्थक बहस का मुद्दा है। इस पर हर पत्रकार
को टिप्णी देनी चाहिए के क्या यह हमारे देश की संस्कृति से मैच करता है। या फिर अब न्यूज़ चैनल भी वेस्टर्न संस्कृति के रंग मैं रेंज जायेंगे। कभी कभी हम मजाक में कहते थे की एक ऐसा चैनल हो जिसमे सिर्फ़ मॉडल हों और कम से कम
कपडों में न्यूज़ रीडिंग करेंगे तो चैनल की टी आर पी बाद जायेगी लेकिन यह मजाक तो सच में बदल रहा है। यह एक तरह से मॉस कम्युनिकेशन की एजूकेशन पुरी कर इस फील्ड में आने वालों का शोषण है।