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13.8.13

सिसकते भारत की तस्वीर



सिसकते भारत की तस्वीर 

संसद का पावन मन्दिर झूठे ,धूर्त ,मक्कार ,दागी ,अपवित्र ,चरित्रहीन बोझ को झेल कर थकता 
जा रहा है 
  देश गरीबी और भुखमरी से त्रस्त है और नेता इस आपदा से अपना मनोरंजन खोजते हैं,किसी को 
गरीब सत्ता का साधन लगता है,किसी को मानसिक स्थिति लगता है,किसी को बाजार की वस्तु 
लगता है.…. 
इस देश के धन को काले चोर लूट रहे हैं  कोई संविधान की सौगंध खा कर लूट रहा है,कोई 
कानून की आँखों पर पट्टी बाँध के लूट रहा है,कोई सांठ गाँठ करके लूट रहा है,कोई जनसेवक 
बन कर लूट रहा है,कोई समाज सेवा के नाम पर लूट रहा है।
यहाँ सपने दिखाये जाते हैं पर देखने नहीं दिये जाते कोई गरीबी हटाने का सपना दिखाता है,
कोई विकास का सपना दिखाता है कोई भरपेट भोजन का सपना दिखाता है तो कोई एकता 
का सपना दिखाता है।
यहाँ पढ़ लिख कर भी लोग बेरोजगार हो जाते हैं,पढ़ लिख कर आरक्षण का गरल पीते हैं,पढ़ 
लिख कर भी संस्कार विहीन हो जाते हैं।
यहाँ धर्म के मर्म पर निशाना लगाते हैं कोई तुष्टिकरण को सही राह मानता है कोई मजहब 
को सुलगाता है कोई धर्म से सत्ता खोजता है तो कोई धर्म से खून बरसाता है।
यहाँ गाँव रोता है ,किसान भूख से मरता है ,मजदुर खून के आँसू रोता है,कभी मनरेगा में भविष्य 
देखता है,कभी खदानों में मरता है ,कभी रेल की पटरियों के करीब बस कर लंगड़ाता है ,कभी 
झुग्गियों में सिसकता है।
यहाँ नारी के सम्मान की बाते सजती है और अधिकार का दिखावा होता है मगर उसकी 
हालत हर बार खरबूज सी रह जाती है ,नारी सहती है ,भोगती है,खिलौने सी टूटती है।
यहाँ बच्चे बचपन बेचते हैं,किशोर बदकाम करते हैं युवा तेज़ाब फेंकते हैं क्यों ,इस प्रश्न तक 
कोई नहीं पहुँचते। 
यहाँ हर कोई महान है,हर कोई मार्गदर्शक है,हर कोई नेता है,हर किसी के पास में समाधान 
है इसलिए किसी को किसी की पड़ी नहीं है।

9.8.13

http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0/

चंद्रमुखी की ना-नुकुर

2 प्रतिक्रियाएँ

चिंटू के मम्मी-पापा के बीच अकसर झगड़ा होता। झगड़ों के बाद दोनों अपने को सही ठहराते। लेकिन बात किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती। ऐसे ही एक झगड़े के बाद चिंटू के पापा ने खुद को सही और पत्नी को गलत साबित करने के लिए एक दिन एक दंपति की कहानी सुनाई।
कहानी कुछ ऐसी थी…
रामलाल जब भी अपनी पत्नी चंद्रमुखी से कोई काम कहता, चंद्रमुखी उस काम का उल्टा ही करती। रामलाल कहता, आज मैं खीर खाऊंगा तो चंद्रमुखी खिचड़ी बना देती।
रामलाल कहता आज मुझे भूख नहीं है, मैं दो ही रोटी खाऊंगा तो चंद्रमुखी उसे ठूंस-ठूंसकर चार रोटी खिला देती।
रामलाल कहता आज हम बच्चों के साथ घूमने जाएंगे, चंद्रमुखी कहती आज नहीं कल।
चंद्रमुखी की ना-नुकुर से जब रामलाल आजिज आ जाता तो कहता- चंद्रमुखी तुम इस बार मायके नहीं जाओगी। ..और चंद्रमुखी झट से उसी दिन तैयार होकर मायके चली जाती।
आखिर चंद्रमुखी की यही नकारात्मक सोच उसे एक दिन ले डूबी।
दोनो यात्रा पर थे। रास्ते में बहती एक नदी में नहाने के लिए रुके।
रामलाल- चंद्रमुखी घाट की सीढ़ियों पर ही नहाना…।
चंद्रमुखी- न मैं तो आगे जाकर ही नहाऊंगी।
रामलाल- अच्छा ज्यादा आगे मत जाना…।
चंद्रमुखी- न मैं तो और आगे जाकर ही नहाऊंगी।
रामलाल- अरे भई…आगे पानी का बहाव तेज है, तुम फिसल जाओगी…।
चंद्रमुखी- न मैं तो बीच नदी में जाकर ही नहाऊंगी…।
..और ना-ना करते-करते चंद्रमुखी नदी के तेज बहाव में बह गई।
तुम सारे मर्द होते ही एक जैसे हो…
अपनी पत्नी की ना-नुकुर पर एक-दो बार मैंने उसे भी यह कहानी सुनाई। पहली प्रतिक्रिया तो यही थी, तुम मर्द होते ही एक जैसे हो…हमारी कही हर बात तुम्हें बुरी लगती है। तुम भी यही चाहते हो न, मैं भी किसी नदी में डूब जाऊं।
लेकिन, कई बार लंबे चलने वाले झगड़े को इस कहानी ने वक्त से पहले ही सुलझा दिया। पत्नी मुस्कुरा देती है… और कहती, तुम नहीं सुधरोगे।
बात मुद्दे की
चिंटू के पापा की सुनाई कहानी सुन ली। हम पति-पत्नी के बीच कैसे सुलह हुई, यह भी जान लिया…अब क्या? मुद्दे की बात तो हुई ही नहीं। आखिर मुद्दा क्या है। अगर, आप कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं तो चलो आपको मुद्दे की बात भी बताते चलें- मुद्दा है ‘ना-नुकुर’।

मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है…

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब

पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब
मेरे पिताजी भी अकसर इस बात को दोहराते थे। लेकिन, उनकी इस बात को हम भाई-बहन अकसर उल्टे चश्मे से देखते। अब अपने बच्चों को यही सीख देते हैं, तो वे भी भूतकाल को दोहराते नजर आते हैं। वक्त का फेर है, जिसकी पाठशाला में बात कभी जल्दी तो कभी देर में समझ आती है। कई बार इतनी देर हो जाती है, वक्त ही हाथ से निकल जाता है।
पहला वाकया मुरादाबाद का
तीन साल पहले ‘अमर उजाला’ मुरादाबाद में था। बच्चों से दूर अकेला रहता था। खूब समय था मेरे पास। आफिस के सीनियर साथी आशीष शर्मा जी केसाथ एक योगा सेंटर ज्वाइन कर लिया। रात को डेस्क पर काम करते हुए 2 बजे के आसपास छूटते थे। सुबह 10 बजे जब हम सेंटर पहुंचते, तब तक सभी लोग जा चुके होते थे। विशेष अनुरोध पर सेंटर संचालक इस समय पर हमें योग सिखाने को तैयार हुआ था।
खैर, चार महीने दोनों ने गिरते-पड़ते कोर्स कर लिया। काफी मशक्कत के बाद दोनों ने कुछ इंच पेट कम कर लिया। वजन में भी कमी आई। मैंने दो और आशीष जी ने अप्रत्याशित चार किलो वजन कम कर लिया। उस वक्त योगाचार्य ने कहा था, जितना मैंने तुम्हें सिखाया है, उसका आधा भी रोज कर लोगे, जिंदगी में कभी डाक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मन ने भी ठान लिया था, आगे योग जारी रहेगा। किराए के कमरे में नियमित योगाभ्यास किया जाने लगा। सुस्ती के कारण धीरे-धीरे इस समय में कटौती होने लगी। इसके बाद देहरादून ट्रांसफर हो गया। घर-गृहस्थी के पचड़ों में ऐसा फंसा, अब तक फिर शुरू नहीं कर सका। रोज सोचता हूं, कल से शुरू करूंगा…। लेकिन उत्साह का संचार फिर अगले दिन के झंझावतों के फेर में आकर ठंडा हो जाता है।
दूसरा वाकया ताजा-ताज है
केदारनाथ आपदा के बाद मन में प्रभावित क्षेत्रों में जाकर रिपोर्टिंग करने की इच्छा थी। डेस्क पर साथियों की कमी के चलते पहले तो संपादक जी से बात करने की हिम्मत ही नहीं हुई। फिर सोचा भेजें न भेजें, बात करने में क्या बुराई है, कल जरूर बात करूंगा। ऐसे करते-करते दो-तीन दिन निकल गए। जिस दिन मन पक्का करके आया, उसी दिन पता चला, संपादक जी दो साथियों को भेज चुके हैं। फिर मेरा वह कल दोबारा नहीं आया।
बहुगुणा जी ने भी देर कर दी
जो फावड़ा मुख्यमंत्री जी ने दो दिन पहले उठाया है, यही काम 15 दिन पहले कर लिया होता तो ज्यादा अच्छा होता। खैर, देर आए दुरुस्त आए… उनकी इस पहल को सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए।

न जाने यों होता है यूं जिंदगी के साथ

न जाने यों होता है यूं जिंदगी के साथ
अचानक ये मन किसी के जाने के बाद
करे फिर उसकी याद
उसकी छोटी-छोटी सी बात
लम्हें गुजर जाते हैं, यादें रह जाती हैं
मासूम से चेहरे की दबी सी हंसी
आती है याद 
उनके जाने के बाद
उनकी छोटी-छोटी सी बात

यूं ही अंतर्मन में डूबा था एक दिन ये मन

यूं ही अंतर्मन में डूबा था एक दिन ये मन

कुछ अजीब सी उलझन लिए
तभी पीछे से किसी ने आवाज दी
लगा जैसे कोई अपना ही है
मुड़कर देखा
तो कोई न था
अपनी ही परछाई खड़ी थी
वही विशालकाय रूप लिए
सम्मोहन जैसा कुछ न था
फिर भी साथ थी वह मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
और मेरे साथ जुड़े होने का अहसास
अंतर्मन की उलझन
मैं और मेरी परछाई
तीनो साथ होकर भी
मानो अकेले थे
फिर करवां भी गुजर गया
सामने से मेरे
और मैं तनहा रहा खड़ा
जब तक परछाई थी साथ मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
सन्नाटा बढ़ता चला गया
और वह अंर्तध्यान हो गई
फिर वही संकोच लिए
मैं, मेरी परछाई…और वह संन्नाटा
कुछ अजीब सी उलझन लिए

बाजार में बिकती ‘भीड़’

सेल-सेल-सेल….

बाजार में बिकने लगी भीड़!
क्या बात कर रहे हो भाई?
आलू-प्याज समझा है क्या?
माना कि बाजार में बहुतायत मिलती है यह भीड़, लेकिन बिकती भी है भीड़!
कहां?
क्या कहा!  बाजार में!
इनकी मंडी कहां लगती है?
सरेआम, सरेराह, यहां-वहां, जहां-तहां, हर जगह, गली-मुहल्लों में, गांवों में, शहरों में जहां चाहोगे उपलब्ध हो जाएगी।
लेकिन इसे इतनी भी ‘आम ’ मत समझना।
‘आम ’ को ‘खास ’ बनाने वाली ये नाचीज सी ‘चीज ’, है बहुत ही खास। जिस तरफ ढल जाए, उसका बेड़ापार कर देती है। बस दाम चुकाने के साथ मौका भुनाने वाला चाहिए। हर मौके पर उपलब्ध हो जाएगी यह भीड़।
कहते हैं, पहले ऐसी नहीं थी ये भीड़।
जनम-मरण, खुशी-गम में यूं ही शामिल हो जाती थी ये भीड़।
बड़े-बड़े किलों को फतह कर जाती थी यह भीड़।
एकजुट होकर किसी को गद्दी पर बैठा और किसी को गद्दी से उतार देती थी ये भीड़।
एकता की ऐसी मशाल जलाई की देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद करा गई ये भीड़।
वक्त बदला, जरूरतें बदली और बदल गई सोच। इसके बाद धीरे-धीरे बहुत नकचढ़ी सी हो गई ये भीड़।
आलम यह है कि आज बिना दाम किसी को घास ही नहीं डालती यह भीड़।
अब तो कुछ लोगों ने इसके अच्छे-खासे दफ्तर भी खोल लिए हैं। इसके बिजनेस में सेल्समैन ही नहीं कांट्रेक्टर से लेकर सप्लायर तक की पोस्ट ईजाद हो गई हैं। आज किसी के परिणय सूत्र में बंधने से लेकर देश की संसद तक को प्रभावित करती है यह भीड़।
राज्य की राजधानी में बैठा ‘मैं ’, उस दिन देखता ही रह गया भीड़।
क्या नजारा था, रेलम-पैल था, एक के पीछे एक, दूर तलक बस दिखाई दे रही थी भीड़।
पूछा, तो पता चला एक ‘असामी ’ पार्टी ने जुटाई है आज यह भीड़। विस में सत्र शुरू हो चुका है। विपक्षी पार्टी ने परंपरा का निर्वाहन पूरा करने के लिए घिराव की तैयारी के लिए जुटाई है यह भीड़।
दूर से बहुत खुबसूरत सी नजर आ रही थी यह भीड़।
मुहाने पर चमकते चेहरे थे, चटक सफेद कुर्ते-पहजामे और सिर पर बेदाग सी दिखाई दे रही वही सफेद टोपी थी। गिले-शिकवे से भरे नारे भी थे। इसी भीड़ को पीछे छोड़ आगे जाने का जोश था। लेकिन पीछे और पीछे… दूर तलक
मुरझाई हुई सी नजर आ रही थी यह भीड़।
हाथों में झंडे-डंडे लिए सुस्ताई हुई सी थी यह भीड़।
थोड़ा करीब जाकर देखा तो पता चला ‘बिकी ’ हुई थी यह भीड़।
‘पैसा फेंकों-तमाशा देखो ’
आज कुछ ऐसी हो गई है यह भीड़।
‘वक्तिया प्रारूप ’ में ढलकर अपना ‘स्व-स्वरूप ’ खो गई है यह भीड़।
अपनी ताकत का अहसास होने के बाद भी असहाय सी हो गई है यह भीड़।
नजरों का फेर नहीं हकीकत में कहीं अपने में ही खो गई यह भीड़।

सियार के बारे में ..............

सियार के बारे में ..............

मुझे खेद है कि मैं सियारों पर अपूर्ण जानकारी दे रहा हूँ ,पाठक वर्ग इसमें एक
नया खंड टिपण्णी के रूप में जोड़ कर अन्य पाठकों की ज्ञान वृद्धि कर सकते हैं।

सियार भी एक अजीब बला है जंगल में. इनके कारनामे और करतूतें थूकने के योग्य
है। सियार की एक खासियत यह होती है कि जब जंगल की व्यवस्था उसके हाथ में
आ जाती है तब वह सबसे पहले शेरों की जान को खतरा पैदा करता है,यह सियारों
का पारिवारिक रिवाज है जो इनके जन्म से जुड़ा है।  

       सियार जंगल में सर्वत्र पाए जाते हैं अक्सर ये राज नगर में निवास करना ज्यादा
पसंद करते हैं .इनका कोई उसूल नहीं होता है.ये खुदगर्जी के उसूल पर पलते हैं.
ये अपनी खाल बचाने के लिए शेरों का शिकार पडोसी भेड़ियों से करवा देते हैं।

सियार रंग बिरंगे होते हैं.इनकी पहचान बिरला ही  कर पाता है क्योंकि ये अपनी
खाल को मनचाहे रंग में रंगने में माहिर होते हैं.इनका कोई धर्म या सिद्धांत नहीं होता
है इनके पाप अक्सर पुण्य में बदल जाया करते हैं।

        सियारों की आपसी लड़ाई के किस्से जंगल में हर वक्त उछलते रहते हैं मगर
जब इनकी अस्मिता पर खतरा मंडराता है तो यह सारी जमात न्यात जात भूल
कर एक हो जाती है इसी विशिष्ठता के कारण गायें और कबूतर इनको जंगल का
राजा बनाते हैं। 

    सियार दहाड़ नहीं सकते ये इनकी मज़बूरी है इसलिए इनसे दहाड़ मारने की
अपेक्षा ना करे,ये जाती मुँह उठाकर रो सकती है ,इनको आप दुसरो के जंगलों
में भी रोते देख सकते हैं.सियार आक्रमण भी करते हैं पर अपने ही जँगल में
दुश्मनों से ये भयभीत रहते हैं.

 कुछ चतुर सियार गूंगे सियार भी पालते हैं ताकि सही वक्त पर गूंगे बने रहे
और कुछ सियार बहरे सियार पालते हैं ताकि सत्य की आवाज ना सुन सके।
चतुर सियार दूर से मूढ़ सियार के कंधे पर शस्त्र रख खुद प्रहार करते हैं। 

सियार वैसे तो अपना पेट भरने की जुगत में सालों लगे रहते हैं परन्तु कभी
कभी बेतरनी पार करने के अवसर पर गायों और कबूतरों को विशेष दाना
डालते हैं।

सियार कूटनीति में माहिर होते हैं। जंगल के प्राणियों में फसाद कराने में इनको
महारत हासिल होती है। ये जब भी रोते हैं पुरे जंगल में आपदा प्रबन्धन हो जाता
है। अपने जँगल को बेच खाने में ये माहिर होते हैं। ये विपदाओं से अपनी रक्षा का
प्रबन्धन करने में निपुण होते हैं इसलिए अपनी पीढ़ियों तक का भोजन दुसरे
जंगलों में सुरक्षित रखते हैं।

सियार अपने जँगल के हितेषी नहीं होते हैं मगर बहरूपिया बन सबको झांसा देते
रहते हैं। इनकी खाल मोटी होने के कारण इनको पाप के प्रभाव से बचाती है। इनका
शिकार करने का मौका सालों में कभी कभार मिलता है पर देखा यह गया है कि ये
शिकारी को धोखा देकर सकुशल अपने मुकाम लौट आते है। 
 
         

7.8.13

आम आदमी सरकारी चंगुल में......: हर चश्म ए दीदार खुदा तेरे नूर से है

आम आदमी सरकारी चंगुल में......: हर चश्म ए दीदार खुदा तेरे नूर से है

अयोग्य राजा राष्ट्र के लिए अकल्याणकारी

अयोग्य राजा राष्ट्र के लिए अकल्याणकारी 

आचार्य चाणक्य की नीति में लिखा है -अयोग्य को राजा बनाने के स्थान पर किसी
को राजा न बनाने में राष्ट्र का कल्याण है,लेकिन हम भारतीय गलती करते ही
नहीं दोहराते भी हैं.

        नन्द वंश  केवल चाणक्य के समय में ही नहीं था हर काल में रहता है और
उसका हर काल में विनाश हुआ है. देश पूछता है -क्या चन्द्रगुप्त बनोगे ?

     केवल बातें, लच्छेदार बातें,खुद की गलतियों को ढकने की बातें,खुद की अक्षमता
को छिपाने की बातें,प्रजा को भ्रमित करने की बातें ……क्या इसे ही अतुल्य
भारत कहा जाएगा ?

    बातों से देश का शासन चलाओ,संसद में लच्छेदार शब्दों का भाषण पिलाओ,
दुश्मन राष्ट्र पर बातों से वार करो,बातों से वतन की रक्षा का दिखावा  …… क्या
इसी लिए चुनाव होता है    …?

   कड़े शब्दों में निंदा करके हम देश के बहादुर सैनिकों का अग्नि संस्कार करते
रहेंगे  …क्या इसी को प्रजातंत्र कहते है ?

   मौत दुश्मन की घात से हुई या दुश्मन के लुख्खो से  ……. मगर मरे तो इस देश
के जवान हैं  …जवानो की मौत का बदला दुश्मन से लेने की जगह खबर का
विश्लेषण करने वाले मंत्री को पद पर बने रहने का हक़ होना चाहिए ?

  जवान मर गये  …….  तुरंत अभिनय शुरू  …. संवेदना के स्वर ,चेहरे पर उदासी
की लकीरे ,हाथ में दस लाख की सहायता राशी … और इतिश्री शहीद श्री  …की कथा.
…क्या ऐसे कर्तव्यों के निर्वाह को स्वतंत्रता कहते हैं ?

 अरे दुश्मन की जाती पूछ कर बताओ  …फिर फैसला करेंगे कि उससे मार खाना है
या जबाब देना है. अगर वोट बैंक का दुश्मन है जुते  खा कर उसे बिरयानी खिलाओ,
उसकी सूजे गालों से आवभगत करो  …. क्या महान देश की यही कूटनीति है ?

   जवान शहीद हो गया  … अमर जवान ज्योति पर माथा टेक लो और दुश्मन या
उसके गुर्गे मर गए तो सब मिल कर मातम मनाओ ,  इस दुर्नीति से देश की दुर्दशा
को क्या यह नाम दें कि हो रहा भारत निर्माण  …. !!

  कल्पना करो की एक नेता का बेटा लुख्खो के हाथों मारा गया है  …. नेता और उसका
परिवार दहाड़े मार रहा है और हर देश प्रेमी भारतीय संवेदना और शोक दिखाने के
लिए कतार में उस लाश पर नोटों से श्रद्धांजली दे रहा है   …नोटों का ढेर देख कर भी
नेता रोता जा रहा है ,प्रजा को कुछ समझ नहीं आ रहा है  …अब भी नेता क्यों रोये जा
रहा है   …।
              

विस चुनाव के इस दौर में जिले में अभी से टिकिट के बजाय के बजाय मंत्री बनने का ताना बाना बुन रहे हैं भाजपा के शीर्ष नेता
 इन दिनों नगरपालिका की लीज को लेकर समाचार पत्रों में तरह तरह के समाचार प्रकाशित हो रहें हैं। बताया जा रहा है कि गंज क्षेत्र के कुछ व्यापारियों की लीज का नवीनीकरण होना हैं। इसमें अधिकांश व्यापारी संघ एवं भाजपा के कट्टर समर्थक हैं। पालिका अध्यक्ष एवं भाजपा नेता राजेश त्रिवेदी का सहयोग ना मिलने पर इन व्यापारियों ने युवा इंका नेता राजा बघेल एवं जिला इंका के महामंत्री चीकू सक्सेना से संपंर्क साधा । कांग्रेस पार्षदों के सहयोग से परिषद में प्रस्ताव भी पारित कर दिया और नियमानुसार कार्यवाही करने के लिये मुनपा अधिकारी को अधिकृत कर दिया गया। कांग्रेस में पर्यवेक्षकों के दौरों के बाद टिकिट मांगने वाले नेताओं ने प्रादेशिक नेताओं से मेल मुलाकात का दौर चालू कर दिया है। मोहन समर्थकों में चल रही चर्चा के अनुसार जिला पंचायत अध्यक्ष होने के नाते मोहन चंदेल अपने आप को महिमा मंड़ित कर स्वयमेव नेता दिखने के राजनैतिक संदेश देने में सफल रहें हैं। जिला भाजपा में चल रही नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के तार विधानसभा चुनाव से जुड़े बताये जा रहें है। दरअसल में इस स्थानीय समीकरण के पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि सरकार बनने पर मंत्री बनने की जुगाड़ हैं। यह तो समय आने पर ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठता है?
संघ और भाजपा में सेंध लगायी इंकाइयो ने?-इन दिनों नगरपालिका की लीज को लेकर समाचार पत्रों में तरह तरह के समाचार प्रकाशित हो रहें हैं। बताया जा रहा है कि गंज क्षेत्र के कुछ व्यापारियों की लीज का नवीनीकरण होना हैं। इसमें अधिकांश व्यापारी संघ एवं भाजपा के कट्टर समर्थक हैं। इन समाचारों में यह भी उल्लेख किया गया है कि पालिका अध्यक्ष एवं भाजपा नेता राजेश त्रिवेदी का सहयोग ना मिलने पर इन व्यापारियों ने युवा इंका नेता राजा बघेल एवं जिला इंका के महामंत्री चीकू सक्सेना से संपंर्क साधा और कांग्रेस पार्षदों के सहयोग से परिषद में प्रस्ताव भी पारित कर दिया और नियमानुसार कार्यवाही करने के लिये मुनपा अधिकारी को अधिकृत कर दिया गया। प्रकाशित समाचारों में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारी लेन देन के बाद भी मामला अटकाया जा रहा हैं जिससे व्यापारियों में आक्रोश है। राजनैतिक हल्कों में चर्चा है कि चुनावी समय में इस तरीके से इंकाइयों द्वारा संघ और भाजपा में सेंध लगाने का काम किया गया है जो कि चुनाव में लाभ दायक होगा। भाजपा के पालिका अध्यक्ष होने के बाद भी संघ समर्थक व्यापारी इंका नेताओं के संपंर्क में आये और उनकी मदद से परिषद में प्रस्ताव होने और लीज का नवीनीकरण ना होने से भाजपा के प्रति आक्रोश पैदा हो गया है।बताया जा रहा है कि मुनपा अधिकारी का कहना है कि नियमानुसार परिषद तीन साल से अधिक की लीज नहीं दे सकती जबकि व्यापारियों का कहना है कि भाजपा की पिछली परिषद की तरह इस बार भी 30 साल के लिये नवीनीकरण किया जाय। लेकिन मुनपा अधिकारी अपने अभिमत पर अड़े हुये है कि तीन साल से अधिक की लीज के लिये प्रकरण राज्य शासन को भेजने होंगें। सियासी हल्कों में दूसरी तरफ यह भी चर्चा है कि मामला लेन देन के इर्द गिर्द ही घूम रहा है कि लेन देन कहां हुआ, किसके साथ हुआ और यदि नियम नहीं था तो भाजपा की पिछली परिषद ने तीस साल के लिये लीज कैसे दी? इन सारे सवालों के जवाब तो नगर पालिका परिषद के कर्त्ता धर्त्ता या पालिका के मामलों में विशेष योग्यता हासिल कर चुके नेता ही बता सकते हैं लेकिन इतना तो तय है कि या तो पिछली भाजपा की परिषद ने नियम के विपरीत जाकर तीस साल की लीज दी थी या भाजपा की ही वर्तमान परिषद नियम होने के बाद भी तीस साल की लीज नहीं दे रही है। पालिका परिषद और प्रशासन से इस बात की अपेक्षा करना कोई बेमानी नहीं होगी कि वें इस बात का खुलासा करें कि भाजपा की पिछली परिषद ने नियम विपरीत काम किया है या वर्तमान परिषद नियम विपरीत काम कर रही है? 
प्रदेश के नेताओं के यहां दस्तक दी इंका टिकटार्थियों ने-कांग्रेस में पर्यवेक्षकों के दौरों के बाद टिकिट मांगने वाले नेताओं ने प्रादेशिक नेताओं से मेल मुलाकात का दौर चालू कर दिया है। जिले में पांच बार से हारने वाले सिवनी से 38 और आदिवासी क्षेत्र बरघाट से 19 नेताओं ने टिकिट के लिये आवेदन लगाये है। दोनों ही क्षत्रों क्रमशः 22 और 18 नेता लामबंद हो गये हैं। इन नेताओं ने बीते दिनों छिंदवाड़ा में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ से भेंट कर अपना पक्ष रखा था। पिछले दिनों सिवनी के 22 नेताओं के समूह ने भोपाल जाकर कांग्रेस नेताओं के यहां दस्तक दी है। इन नेताओं ने प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह,प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष से भेंट कर अपना पक्ष रखा और मांग की है कि इस बार प्रत्याशी ग्रामीण क्षेत्र से ही बनाया जाना चाहिये क्योंकि शहरी क्षत्र के नेता पिछले पांच बार से चुनाव हार रहें हैं। भोपाल गये लगभग 16 टिकटार्थियों में जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन चंदेल और सिवनी के पूर्व विधायक रमेश जैन भी शामिल थे। मोहन समर्थकों में चल रही चर्चा के अनुसार जिला पंचायत अध्यक्ष होने के नाते मोहन चंदेल अपने आप को महिमा मंड़ित कर स्वयमेव नेता दिखने के राजनैतिक संदेश देने में सफल रहें हैं।इस प्रतिनिधिमंड़ल द्वारा यह बताये जाने पर कि इस क्षेत्र से 38 नेताओं ने टिकिट के लिये आवेदन लगाया हैं तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आश्चर्य व्यक्त किया कि पांच बार से हारने वाले क्षेत्र से इतने आवेदक? कांग्रेसी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सिवनी और बरघाट से आवेदकों की संख्या बढ़ने का कारण यह बताया जा रहा है कि इस चुनाव में कांग्रेस में बिलोरन होने की संभावना कम है और कांग्रेस जीत भी सकती हैं। हालांकि इस तर्क के आधार अलग अलग लोग अलग ही बता रहें हैं लेकिन इससे इस बात से भी इंकार नहीं सकता कि हो रहे इस बिखराव को रोकना आसान नहीं होगा। 
भाजपा में मंत्री पद को लेकर बुने जा रहें हैं ताने बाने-जिला भाजपा में चल रही नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के तार विधानसभा चुनाव से जुड़े बताये जा रहें है। नेरश नीता गुट इस मामले में आमने सामने हैं। नरेश समर्थकों का मानना है कि सिवनी विस से नीता पटेरिया का जीतना संभव नहीं है। इसीलिये भाजपा को प्रत्याशी बदल कर नरेश को टिकिट देना चाहिये। केवलारी के इंका विधायक हरवंश सिंह के निधन के कारण आसान हो चुकी सीट को भाजपा को जीतने के लिये नीता पटेरिया को केवलारी से चुनाव लड़ाना चाहिये।वहीं केवलारी क्षेत्र के प्रबल दावेदार डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को बालाघाट संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ाना चाहिये। दरअसल में इस स्थानीय समीकरण के पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि सरकार बनने पर मंत्री बनने की जुगाड़ हैं। यदि नरेश चुनाव जीतते है तो वे तीसरी बार के विधायक होगें,नीता केवलारी से जीततीं है तो वे दूसरी बार की विधायक होंगी जबकि यदि केवलारी से चुनाव लड़कर डॉ. बिसेन चुनाव जीतते है तो वे जिले के पांचवी बार के विधायक होंगें और भाजपा की उमा और गौर सरकार में वे मंत्री भी रह चुके है। इस तरह यदि डॉ. बिसेन को लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिये कहा जाता है तो नरेश और नीता के मंत्री बनने की होड़ में नरेश बाजी मार सकते है। वैसे वर्तग्मान में डॉ. बिसेन और नरेश दोनों ही केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त नेता हैं। मंत्री पद को लेकर बुने जा रहे इस ताने बाने के लिये ही भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की बात चल रही है और नरेश अपने ही किसी समर्थक को जिला भाजपा का अध्यक्ष बनाकर बाजी अपने हाथ में रखना चाह रहें हैं। यह तो समय आने पर ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठता है? “ मुसाफिर “    
सा. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
06 अगस्त 2013  

6.8.13

वीरेन डंगवाल के बहाने वरिष्ठ साहित्यकार केदारनाथ सिंह जी का सानिध्य

सोमवार 5 अगस्त 2013 को वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल जी के जन्मदिवस के बहाने 'हिंदी भवन' में हिंदी साहित्य पर आधारित कार्यक्रम का आयोजन हुआ। मेरे लिए यह कार्यक्रम अभूतपूर्व रहा। अबतक जिस हिंदी साहित्य में हमेशा जीने का सपना देखा, उसे बेहद करीब से जानने समझने का मौका मिला। इस कार्यक्रम के दौरान बहुत सारे वरिष्ठ कवियों और कवियों(पत्रकार-कवियों) के अनुभवों को जानने समझने के दौरान काफी हद तक उस अतीत को समझा, जिसके बारे में अबतक सिर्फ पढ़ा था।
खैर, इन सबके बीच मुझे 'विशेष' तौर पर प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह जी का सानिध्य मिला। उन्हें उनके आवास से कार्यक्रम स्थल और फिर उन्हें आवास तक छोड़ने की बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मुझ जैसे युवा को मिली थी, जो मेरा सौभाग्य है। इस दौरान मैं 4-5 घंटे तक केदारनाथ जी के सानिध्य में रहा और उनके 'अतीत' में जीने के साथ इस समय के घटनाक्रम(राजनीतिक-साहित्यिक) पर लम्बी(थोड़ी-बहुत, जो मेरे लिए विशेष रही) चर्चा हुई। इस 4-5 घंटे के दौरान एक बेहद महत्वपूर्ण बात जो मैंने महसूस की, वह यह है कि इस उम्र में भी वह बेहद तरो-ताजा और जोश से भरे हुए थे। दरअसल, इस बात को पूरी तरह से मैं तभी समझ पाया, जब 'हिंदी भवन' की मंजिल पर हो रहे कार्यक्रम में जाने के दौरान 'सीढ़ियों' पर चढ़ते समय मैंने उन्हें सहारा देने की कोशिश की तो उन्होंने कहा, 'अरे यार, मैं इतना भी बूढा नहीं हुआ हूं, कि सीढ़ियां भी न चढ़ सकूं'।
Shravan Shukla with Kedarnath Singh 
कुल मिलाकर कल का दिन मेरे मिले विशेष रहा। इस दौरान मैंने 'हिन्दयुग्म प्रकाशन' के संपादक शैलेश भारतवासी जी से निवेदन किया कि वो मेरी एक फ़ोटो केदारनाथ जी के साथ खींचे, ताकि मैं उसे अपने जीवन की अमूल्य निधि के तौर पर संजोह कर रख सकूं। शैलेश जी ने मेरे निवेदन को स्वीकार करते हुए श्री केदारनाथ सिंह जी के साथ मेरी दो फ़ोटो खींची, जिसे मैं यहां पर शेयर कर रहा हूं।
इस फ़ोटो में एक मैं हूं, जिसे आप सब पहचानते हैं। दूसरे श्री केदारनाथ सिंह जी हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य की दुनिया में शायद ही कोई न पहचानता हो। केदारनाथ सिंह जी के बारे में आज की पीढ़ी को बताने के लिए इतना ही काफी है कि उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने पूरे जीवन हिंदी साहित्य की सेवा की। आपकी अनेक कृतियां हैं, जिनमें से कुछ एक का उल्लेख करना उनकी अन्य कृतियों का अपमान होगा, फिर भी उनकी कुछ बेहद चर्चित रचनाओं के रूप में अभी बिल्कुल अभी, ज़मीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, बाघ, तालस्ताय और साइकिल प्रमुख हैं। इनकी कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं।
इस कार्यक्रम को आयोजित कराने के लिए bhadas4media.com के संस्थापक-संचालक श्री यशवंत सिंह और वरिष्ठ पत्रकार श्री मुकेश कुमार जी को हार्दिक धन्यवाद। जिनकी वजह से हम जैसे युवाओं को श्री केदारनाथ सिंह, श्री वीरेन डंगवाल, श्री नीलाभ अश्क जैसे हिंदी की विभूतियों से मिलने और उन्हें बेहद करीब से जानने का सौभाग्य मिला।

इस मौके पर केदारनाथ जी की लिखी दो कविताएं विशेषरूप से शेयर करना चाहता हूं, जो मुझे बेहद पसंद हैं। तो पेश है उनकी लिखी 'नदी' कविता.. जो उन्होंने 82-83 के समय में में गंगा नदी को देखते हुए लिखी थी।

अगर धीरे चलो
वह तुम्हे छू लेगी
दौड़ो तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जाएगी कहीं भी
यहाँ तक- कि कबाड़ी की दुकान तक भी
छोड़ दो
तो वही अंधेरे में
करोड़ों तारों की आँख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
एक छोटे से घोंघे में

सच्चाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो
तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी
नदी जो इस समय नहीं है इस घर में
पर होगी ज़रूर कहीं न कहीं
किसी चटाई
या फूलदान के नीचे
चुपचाप बहती हुई

कभी सुनना
जब सारा शहर सो जाए
तो किवाड़ों पर कान लगा
धीरे-धीरे सुनना
कहीं आसपास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी!

केदार नाथ जी की दूसरी कविता देश के विभाजन बाद की त्रासदी के बाद 'सन् ४७ को याद करते हुए' है, जिसे मैं बेहद पसंद करता हूं। केदारनाथ जी ने यह कविता 1982 में लिखी थी।

तुम्हें नूर मियां की याद है केदारनाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियां
ठिगने नूर मियां
रामगढ़ बाजार से सुरमा बेच कर
सबसे आखिर मे लौटने वाले नूर मियां
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हे याद है शुरु से अखिर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर
जोड़ घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियां?
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहां हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो?
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?
तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?

लोकतंत्र का मंदिर नहीं कैदखाना है संसद-ब्रज की दुनिया

मित्रों,मुझे जबसे होश हुआ है तभी से मैं पढ़ता और सुनता आ रहा हूँ कि भारत में न केवल लोकतंत्र है बल्कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भी है। अन्ना के अनशन के समय यह जुमला हमारे सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के मुखारविंदों से अनगिनत बार दोहराया गया कि चूँकि भारतीय संविधान ने संसद को सर्वोच्चता प्रदान की है अतः उसकी गरिमा को मटियामेट करने का कुत्सित प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। मैं भी यह मानता हूँ और हमारे देश की 90 प्रतिशत मूर्ख और 10 प्रतिशत बुद्धिमान जनता (बतौर काटजू साहब) भी मानती है कि भारत के वर्तमान संविधान के अनुसार संसद सर्वोच्च है लेकिन हमारे राजनेता यह भूल रहे हैं कि संविधान के अनुसार संसद सर्वोच्च जरूर है सबकुछ तो कतई नहीं है। संसद के अलावे कार्यपालिका (आजकल सपा नेता खुद के बिना नौकरशाही के ही उसी तरह का सुशासन दे सकने में सक्षम होने के दावे कर रहे हैं जैसा कि वे इन दिनों उत्तर प्रदेश में दे रहे हैं),न्यायपालिका (हमारे महानिकम्मे प्रधानमंत्री तक इसको अपनी सीमा में रहने की हिदायत अक्सर देते देखे जा सकते हैं) और मीडिया सहित ऐसा बहुत-कुछ है जिनका महत्त्व लोकतंत्र में जनविश्वास को बनाए रखने की दृष्टि से संसद से किंचित भी कम नहीं है। वैसे भी संविधान जनता द्वारा जनता को समर्पित है इसलिए सर्वोच्च तो जनता ही है। साथ ही यह भी गौरतलब है कि हमारी संविधान-सभा के सदस्यों ने जिस संसद को सर्वोच्चता सौंपी थी वो आदर्श संसद थी। उन्होंने तो सपने में भी एक-तिहाई शातिर अपराधियों और दो-तिहाई घोटालेबाजों से लबालब भरे पाप के घड़े समान संसद की कल्पना तक नहीं की थी।
                    मित्रों,यह बहुत-ही बिडंबनापूर्ण है कि आज भारतीय जनता और जनाकांक्षा की सर्वोच्च प्रतिनिधि संसद ही भारतीय लोकतंत्र के स्वस्थ विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बन गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकतंत्र के मंदिर संसद को दागमुक्त करने की जो पहल संसद को खुद करनी चाहिए थी वो उच्चतम न्यायालय को करनी पड़ रही है। और यह नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब संसद उच्चतम न्यायालय के संसद के दामन को पाक-साफ करने के प्रयासवाले क्रांतिकारी और ऐतिहासिक फैसले को ही पलटने की तैयारी में है। अगर वह ऐसा करती है तो उसका यह कदम निश्चित रूप से पश्चगामी और यथास्थितिवादी कदम होगा। अगरचे संसद को अपने दामन पर लगे कलंक को धोने के प्रयास खुद करने चाहिए थे तो वह बेहद शर्मनाक तरीके से उन्हें बनाए और बचाए रखने की यथासंभव कोशिश कर रही है। ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि संसद की गरिमा को बढ़ाने या बनाए रखने की महती जिम्मेदारी किसकी है और किस पर है? अगर सांसद खुद ही संसद की गरिमा को गिराएंगे तो जनता के मन में उसके प्रति सम्मान कैसे,कहाँ से और क्यों पैदा होगा?
                       मित्रों,इसी प्रकार यह बेहद अफसोसनाक है कि भारतीय लोकतंत्र में जनमत का निर्माण और शासन का संचालन करने की महान जिम्मेदारी जिन राजनैतिक दलों के कंधों पर है वे अपनी अकूत आमदनी का हिसाब-किताब देने से भाग रहे हैं। जबकि कुछ अपवादों के साथ पूरे भारत के पूरे सरकारी-तंत्र को सूचना का अधिकार (बिहार सहित कहीं-कहीं कागजी ही सही) के दायरे में ला दिया गया है तो फिर खुद के 'जनरंजन-चरण-कमल' (पढ़ें और समझें महाप्राण निराला की प्रसिद्ध कविता 'राम की शक्ति पूजा') होने का दावा करनेवाले राजनैतिक दलों को भी सूचना के अधिकार की सीमा में होना ही चाहिए। हमारे तंत्र में पारदर्शिता का होना जितना जरूरी है कहीं उससे ज्यादा आवश्यक है तंत्र के वास्तविक संचालनकर्त्ता राजनैतिक दलों का पारदर्शी होना क्योंकि वे वर्तमान काल में भ्रष्टाचार की गंगोत्री बन गए हैं। राजनैतिक दल किसी भी दृष्टि से निजी कंपनी या संपत्ति नहीं हो सकते क्योंकि वे सिर्फ और सिर्फ जनता के विश्वास और चंदे से संचालित होते हैं। अब जबकि भारत के मुख्य सूचना आयुक्त ने सभी राजनैतिक दलों को जनता को वांछित सूचना देने के लिए सूचना अधिकारियों की नियुक्ति करने और प्रार्थियों को वांछित सूचना उपलब्ध करवाने का आदेश दिया है तब सारे-के-सारे राजनैतिक दल (तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर) सूचना देने से बचने की फिराक में सारे मतभेदों और मनभेदों को भुलाकर एकजुट हो गए हैं। वे लोग संसद से ऐसा विधेयक पारित करनेवाले हैं जिससे देश के सारे राजनैतिक दल सूचना का अधिकार के अधिकार-क्षेत्र से ही बाहर हो जाएंगे और उनको अपने लाखों करोड़ के आय-व्यय का ब्योरा नहीं देना पड़ेगा। इतना ही नहीं संसद में एम्स सहित विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में आरक्षण-संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को भी पलटने की तैयारी भी चल रही है।
                     मित्रों,आप ही बताईए कि अगर संसद इस तरह के पश्चगामी कानून बनाती है तो फिर कैसे जनता के मन में उसके प्रति सम्मान बढ़ेगा और कैसे उसकी गरिमा बढ़ेगी? अगर संसद के ऐसे क्रियाकलापों को ही लोकतंत्र और उसका विकास कहते हैं तो फिर क्या जरुरत है देश में ऐसे लोकतंत्र की? क्यों नहीं ऐसे लोकतंत्र का सर्वनाश हो जाना चाहिए?क्या करेंगे हम ऐसे लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाकर जिनके संचालकों के मन में देशहित की भावना है ही नहीं, जिनके हृदय में किसी देशभक्त का दिल नहीं धड़कता बल्कि जिनके जिस्म में सिर्फ महास्वार्थी व दरिन्दे भेड़िये का दिमाग है?
                     मित्रों,अभी हमारा प्यारा देश चहुमुखी-बहुमुखी संकट के मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ विकट आर्थिक संकट डरा रहा है तो दूसरी तरफ चीन-पाक की सीमा पर गुस्ताखी है तो वहीं तीसरी तरफ है बढ़ती बेरोजगारी और चौथी तरफ है अमीरी-गरीबी के मध्य लगातार बढ़ती खाई और पाँचवी,छठी,सातवीं तरफ है भुक्खड़ों की बढ़ती संख्या,नक्सलवाद,जनसंख्या-विस्फोट,आतंकवाद और जानलेवा महँगाई।
                       मित्रों,मैं नहीं समझता कि हमारी संसद या हमारा लोकतंत्र इन हिमालय सरीखी चुनौतियों से निबटने में सक्षम है। क्या करेंगे हम ऐसे लोकतंत्र को लेकर? क्या अँचार डालेंगे उसका या गले में ताबीज बनाकर पहनेंगे उसको? हमारी संसद और हमारा लोकतंत्र इस कदर पंगु और बेकार हो चुका है वो छोटे-से-छोटे संकट का भी सामना नहीं कर सकता इन बड़े संकटों का सामना करना तो उसके लिए दूर की कौड़ी ठहरी। लोकतंत्र वही सफल और दीर्घजीवी हो सकता है जो जनता की ईच्छाओं का सम्मान करे और बदलते वक्त के अनुसार खुद को बदलता रहे। जो लोकतंत्र बदलती जनाकांक्षाओं के अनुरूप खुद को नहीं बदलता है इतिहास गवाह है कि वह निश्चित रूप से अकाल-मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वास्तव में असलियत यह है कि हमारी संसद अब लोकतंत्र का मंदिर नहीं रह गई है बल्कि उसने हमारे लोकतंत्र को कैद कर लिया है और वह लोकतंत्र का कैदखाना बन गई है और लोकतंत्र को उसके जेलखाने से मुक्त करवाने की महती जिम्मेदारी अब हम जनता को ही निभानी पड़ेगी। दोस्तों,जो लोकतंत्र देश को फिर से गुलामी की अंधेरी सुरंग में धकेल दे क्यों नहीं उसको समाप्त हो जाना चाहिए और उसके अवशेषों पर किसी नई शासन-प्रणाली को स्थापित किया जाना चाहिए जैसे कि अध्यक्षीय शासन-प्रणाली।

4.8.13

jindagee ke udaas lamhon mein

जिन्दगी के उदास लम्हों में
तेरा याराना याद करता हूँ।
तू मुझे फिर से मिल सके न सके
मैं तेरे दम से आह भरता हूँ।

 मेरी गजलों से गिला
तो नहीं किसी को कोई ,
सोचता हूँ तो
बहुत डरता हूँ।


कौन कहता है कि
घायल है निगाहों से तेरे ,
मैं तो बस
देखते ही मरता हूँ।


ठीक उस वक्त ही
दरिया को सूझता है शबाब ,
जब गमे  इश्क
में उतरता हूँ।  

2.8.13

पगथिया: चुटकी

पगथिया: चुटकी: चुटकी
 अध्यापक :- मुगलकाल के बारे में एक पंक्ति बोलो
 छात्र  :-   दुर्गाशक्ति का निलंबन सही

31.7.13

reenakari:  एकता में भिन्ताजिंदगी गुजरते जा रही है पर वक़्...

reenakari:  एकता में भिन्ता



जिंदगी गुजरते जा रही है पर वक़्...
:   एकता में भिन्ता जिंदगी गुजरते जा रही है  पर वक़्त ठहर  गया  सिमटा  सा एक पल  भवर बन गया  जीवन की कश्ती डूबती जा रही  ...

क्या जिला भाजपा में होगा नेतृत्व परिवर्तन?
क्या सुजीत या वेदसिंह ठाकुर होगें जिला भाजपा के नये अध्यक्ष
सिवनी। क्या जिला भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन होने वाला है? यदि ऐसा हुआ तो किसके हाथ में आयेगी कमान?ये सवाल इन दिनों जिले के राजनैतिक क्षेत्रों में चर्चित है।
विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर जहां एक ओर सभी राजनैतिक दल अपने अपने प्रत्याशी चयन और चुनावी बिसात बिछाने में लगे हुये हैं वहीं दूसरी ओर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा में जिले में नेतृत्व परिर्वतन की खबरें चल रहीं हैं। नेतृत्व परिर्वतन की बात करने वाले नेता इस आधार पर यह बात कर रहें हैं कि इसीलिये भाजपा जिले में अभी तक प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया प्रारंभ नहीं कर रही है। जबकि कांग्रेस के एक राष्ट्रीय और एक प्रादेशिक पर्यवेक्षक जिले की चारों विधानसभा सीटों का दौरा कर प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया को चालू कर चुके हैं। 
वर्तमान में जिला भाजपा की कमान सिवनी के पूर्व विधायक एवं महाकौशल विकास प्राधिकरण के कबीना मंत्री का दर्जा प्राप्त कद्दावर भाजपा नेता के हाथों में हैं। फिर आखिर ऐसे क्या कारण है कि चुनाव के चंद महीनों पहले प्रदेश का भाजपा नेतृत्व जिले में नेतृत्व परिवर्तन की सोच रहा है।
यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भाजपा के संगठन चुनाव के दौरान तत्कालीन अध्यक्ष सुजीत जैन की दोबारा ताजपोशी लगभग तय मानी जा रही थी। लेकिन उस वक्त नरेश दिवाकर ने अपने ही समर्थक सुजीत जैन के बजाय वरिष्ठ महिला नेत्री एवं लगातार चार बार जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीतने वाली गोमती ठाकुर का नाम आगे कर दिया था। लेकिन काल चक्र कुछ ऐसा घूमा कि नरेश भले ही सुजीत को रोकने में तो सफल हो गये पर गोमती ठाकुर के बजाय उन्हें खुद ही जिला भाजपा अध्यक्ष बनना पड़ा।
यह बात भी एक ओपन सीक्रेट है कि सिवनी से दो बार विधायक रहे नरेश दिवाकर अपनी टिकिट कटने का दंश भूल नहीं पाये थे और मविप्रा का अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने ताबड़ तोड़ सिवनी विस क्षेत्र के दौरे भी चालू कर दिये थे। भाजपा विधायक श्रीमती नीता पटेरिया और नरेश दिवाकर के इसी कारण मनमुटाव समय समय पर जगजाहिर होते रहें हैं। अभी नरेश दिवाकर इस बात के लिये जी तोड़ मेहनत कर रहें कि आगामी चुनाव में भाजपा से उन्हें ही विस की टिकिट मिले।
राजनैतिक विश्लेषकों का दावा है कि इसी कारण प्रदेश भाजपा का नेतृत्व जिले में परिवर्तन के बारे में विचार कर रहा हैं। प्रदेश के नेताओं का ऐसा मानना है कि प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया ऐसे हालात में चालू करना उचित नहीं हैं जब जिले का अध्यक्ष स्वयं ही टिकिट का दावेदार हो।
भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार नरेश दिवाकर ने अध्यक्ष पद के लिये उन्हीं सुजीत जैन का नाम आगे बढ़ा दिया है जिसे उन्होंने ही दूसरी पारी नहीं खेलने दी थी। जिला भाजपा अध्यक्ष पद के लिये दूसरे सबसे ताकतवर दावेदार के रूप में दो बार जिलाध्यक्ष रह चुके वरिष्ठ नेता वेदसिंह ठाकुर का नाम सामने आया हैं। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इन दिनों भाजपा में कार्यकर्त्ताओं का एक खेमा लगातार बैठकें करके ब्राम्हण और जैन ेनताओं को भाजपा में मिल रहे अत्यधिक महत्व को लेकर उनके विरोध में लामबंद हो रहा है और प्रदेश नेतृत्व से यह मांग कर रहा है अन्य वर्ग के नेताओं को भी महत्व मिलना आवयक है अन्यथा उनमें उभर रहा असंतोष भाजपा के लिये नुकसानदायक होगा।
ऐसे हालात में प्रदेश भाजपा नेतृत्व जिले में नेतृत्व परिवर्तन करेगा या नही? और करेगा तो कमान किसे देगा? और नरेश दिवाकर सिवनी विस क्षेत्र से टिकिट ला पायेंगें या नहीं? यह सब कुछ तो फिलहाल भविष्य के गर्त में छिपा हुआ है?
सा. दर्पण झूठ बोले, सिवनी से साभार   

चुनावी साल में  वृक्षारोपण के शासकीय कार्यक्रम में  किसी शाही पर्यावरण मित्र  का अतिथि बनना सियासी हल्कों में  हुआ चर्चित
जिला मुख्यालय के पांच बार से जीतने वाले सिवनी विस क्षेत्र में इस बार एक नयी पहल प्रारंभ हुयी है। अपने आप को भाजपा का निष्ठावान कार्यकर्त्ता बताने वाले कई नेता बैठकों का दौर कर रहें हैं कि इस बार पार्टी का उम्मीदवार किसी भी ब्राम्हण या बनिये को नहीं बनाना चाहिये। कांग्रेस में भी नजारा  कुछ अलग नहीं है। सिवनी विस क्षेत्र के 38 में से 22 और बरघाट विस क्षेत्र से 19 में से 18 टिकटार्थी लामबंद हो गये हैं।  सिवनी में ये सभी टिकटार्थी स्वयं को ग्रामीण परिवेश का बता रहें हैं और उनका कहना है कि पार्टी पांच बार से यहां से चुनाव हार रही है और पांचों बार शहरी क्षेत्र के उम्मीदवारों को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया था।  लेकिन कोई भी चुनाव जीत नहीं पाया।बरघाट के टिकटाथियों का कहना है कि पार्टी के खिलाफ दो बार चुनाव लड़ चुके अर्जुन काकोड़िया को प्रत्याशी नहीं बनाया जाना चाहिये। चुनावी साल में वृक्षारोपण के किसी शासकीय कार्यक्रम में कोई शाही पर्यावरण मित्र अतिथि बने और सियासी हल्कों में कोई चर्चा ना हो ये भला कैसे हो सकता है? ऐसा ही कुछ बीते दिनों इस जिले में हुआ है। अब देखना यह है कि ये सूबे के शहंशाह के नजदीकी शाही पर्यावरण मित्र चुनावी साल में अपनी आमद से कांग्रेस या भाजपा में से किस पार्टी का राजनैतिक प्रदूषण समाप्त करेंगें।
भाजपा में खुला ब्राम्हण बनिया विरोधी मोर्चा-आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा में भी गतिविधियां तेज हो गयीं है। जिला मुख्यालय के पांच बार से जीतने वाले सिवनी विस क्षेत्र में इस बार एक नयी पहल प्रारंभ हुयी है। अपने आप को भाजपा का निष्ठावान कार्यकर्त्ता बताने वाले कई नेता बैठकों का दौर कर रहें हैं कि इस बार पार्टी का उम्मीदवार किसी भी ब्राम्हण या बनिये को नहीं बनाना चाहिये। इन नेताओं का यह कहना है कि भाजपा में पार्टी के जिला अध्यक्ष एवं सिवनी विस क्षेत्र के अधिकांश उम्मीदवार अभी तक इन दो वर्गों से ही रहे है। भाजपा के इस धड़े का यह भी कहना है कि स्व. पं. महेश शुक्ला,प्रमोद कुमार जैन कंवर साहब,स्व. चक्रेश जैन,सुदर्शन बाझल,सुजीत जैन और अब नरेश दिवाकर पार्टी के जिलाध्यक्ष है। पार्टी में अब तक सिर्फ दो बार वेदसिंह ठाकुर,कीरत सिंह बघेल और डॉ. ढ.ालसिंह बिसेन ही अन्य ऐसे नेता है जिन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया है। इसी तरह सिवनी विस क्षेत्र से 85 में प्रमोद कुमार जैन,90 और 93 में स्व0 महेश शुक्ला, 98 और 2003 में नरेश दिवाकर और 2008 में नीता पटेरिया को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया और जनता ने पांच बार यह सीट भाजपा की झोली में डाली है। भाजपा के इन नेताओं का यह कहना है कि इन कारणों से जनता में यह संदेश जा रहा है कि भाजपा ब्राम्हणों और बनियों की पार्टी बन कर रह गयी है। इससे पार्टी के अन्य कार्यकर्त्ताओं में अब उपेक्षा की भावना घर करने लगी है। इसलिये इस बार पार्टी को सिवनी से किसी अन्य वर्ग के नेता को पार्टी का उम्मीदवार बनाया जाना चाहिये। चुनाव के पहले भाजपा में उठ रही यह असंतोष की लपटें कितना नुकसान पहुंचाने वाली साबित होंगी? यह कहा जाना अभी संभव नहीं हैं। 
सिवनी और बरघाट में भी कांग्रेस के टिकटार्थी हुये लामबंद-कांग्रेस में भी नजारा कुछ अलग नहीं है। सिवनी विस क्षेत्र के 38 में से 22 और बरघाट विस क्षेत्र से 19 में से 18 टिकटार्थी लामबंद हो गये हैं। सिवनी में ये सभी टिकटार्थी स्वयं को ग्रामीण परिवेश का बता रहें हैं और उनका कहना है कि पार्टी पांच बार से यहां से चुनाव हार रही है और पांचों बार शहरी क्षेत्र के उम्मीदवारों को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया था। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने 90 में स्व. ठा. हरवंश सिंह, 93 और 98 में आशुतोष वर्मा, 2003 में राजकुमार पप्पू खुराना और 2008 में प्रसन्न मालू को उम्मीदवार बनाया था और कोई भी जीत नहीं पाया था इसलिये इस बार ग्रामीण क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया जाये। इसी तरह बरघाट विस क्षेत्र में भी कांग्रस पांच बार से चुनाव हार रहीं है। लेकिन परिसीमन के बाद पिछले चुनाव से जिले की यह सीट आदिवासी वर्ग के लिये आरक्षित हो गयी है। लेकिन इस सीट से भी कांग्रेस की टिकिट के लिये 19 नेताओं ने आवेदन दिया है। इनमें से अर्जुन काकोड़िया को छोड़कर शेष 18  टिकटार्थी लामबंद हो गये हैं कि उनके अलावा 19 में से किसी को भी पार्टी टिकिट दे क्योंकि वे पार्टी के खिलाफ दो बार इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं। 
केवलारी क्षेत्र में शाही पर्यावरण मित्र की आमद हुयी चर्चित-हर साल बारिश आती है। बारिश में हर साल वृक्षारोपण होता है। हर शासकीय या अशासकीय वृक्षारोपण के कार्यक्रम में कोई ना कोई अतिथि पर्यावरण मित्र भी होता है। लेकिन जब चुनावी साल में वृक्षारोपण के किसी शासकीय कार्यक्रम में कोई शाही पर्यावरण मित्र अतिथि बने और सियासी हल्कों में कोई चर्चा ना हो ये भला कैसे हो सकता है? ऐसा ही कुछ बीते दिनों इस जिले में हुआ है। जी हां हम बात कर रहें है छपारा के एक शासकीय कार्यक्रम में उपस्थित हुये एक शाही पर्यावरण मित्र की उपस्थिति की जो कि अखबारों की सुर्खी बना था। केवलारी विस क्षेत्र के छपारा कस्बे में आयोजित एक शासकीय वृक्षारोपण कार्यक्रम में  चुनावी मौसम में अचानक ही प्रगट हुये एक शाही पर्यावरण मित्र अपने आप को सूबे के शहंशाह के किचिन केबिनेट के खास मेम्बर का रिश्तेदार बता रहें हैं। केवलारी विधानसभा क्षेत्र में सूबे के शहंशाह से नजदीकी बता कर आमद देने वाले पर्यावरण मित्र किस पार्टी का राजनैतिक प्रदूषण दूर करेंगें और किसमें प्रदूषण फैलायेंगें? इसे लेकर क्षेत्र के सियासी हल्कों में तरह तरह की चर्चायें होने लगीं हैं। वैसे भी जिले का केवलारी विस क्षेत्र कांग्रेस का एक ऐसा मजबूत गढ़ है जहां से कांग्रेस सिर्फ दो चुनाव,1962 और 1990 में,ही हारी है। अन्यथा 1967 से 1985 तक के पांच विस चुनाव कांग्रेस की कु. विमला वर्मा और 1993 से 2008 तक के चार विस चुनाव कांग्रेस के स्व. हरवंश सिंह चुनाव जीते है। आगामी विस चुनाव में स्व. हरवंश सिंह के ज्येष्ठ पुत्र रजनीश सिंह कांग्रेस के प्रबल दावेदार है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सूबे के शहंशाह स्व. हरवंश सिंह को एक शासकीय समारोह के सार्वजनिक मंच से स्व. हरवंश सिंह को एक शानदार और जानदार राजनेता बता चुके हैं। अब देखना यह है कि ये सूबे के शहंशाह के नजदीकी शाही पर्यावरण मित्र चुनावी साल में अपनी आमद से कांग्रेस या भाजपा में से किस पार्टी का राजनैतिक प्रदूषण समाप्त करेंगें।
और अंत में -जिले के राजनैतिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा केवलारी विस क्षेत्र इस बार भी महत्वपूर्ण ही रहेगा। यहां से इस बार कांग्रेस के विधायक रहे स्व0 हरवंश सिंह के ज्येष्ठ पुत्र रजनीश सिंह टिकटि के प्रबल दावेदार हैं। इनके अलावा क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व जनपद अध्यक्ष डॉ. वसंत तिवारी,जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष शक्ति सिंह,ब्लाक इंका के पूर्व अध्यक्ष दिलीप दुबे, जिला इंका के उपाध्यक्ष जकी अनवर और क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं प्रदेश प्रतिनिधि मो. शफीक पटेल के पुत्र अतीक पटेल ने भी टिकिट की दावेदारी की हैं। हालांकि कांग्रेस में किसी भी विस क्षेत्र टिकिट मांगने वालों की यह संख्या सबसे कम हैं लेकिन सियासी हल्कों में यह इसलिये चर्चित हैं कि 20 साल में पहली बार इस क्षेत्र से टिकिट की मांग अन्य नेताओं ने भी की हैं। क्षेत्री विधायक रहे स्व. हरवंश सिंह के निधन के चंद महीनों बाद ही उनके गृह क्षेत्र में नेताओं की आवाज मुखर होना महत्वपूर्ण माना जा रहा हैंमु।”साफिर”
सा. दर्पण झूठ ना बोले
30 जुलाई 13

30.7.13

reenakari:  साथी चेहरा    जो कोई   ओझल हो गया ओड़  कर ओड...

reenakari:




 साथी
चेहरा    जो कोई   ओझल हो गया ओड़  कर ओड...
:   साथी चेहरा    जो कोई   ओझल हो गया  ओड़  कर ओडनी  उसका साथी भी सो गया  निर्जीव  सा रहा वो जीवधारियों में  एक के बाद...

मुहब्बत मिट नहीं सकती …………।

मुहब्बत मिट नहीं सकती …………। 

मुहब्बत अमर कहानी है, मुहब्बत मिट नहीं सकती।। 

मेरे दिल में - बसी हो तुम, तेरे दिल में - बसा हूँ मैं
तडफता मैं - अकेले में, तड़फती तुम - अकेले में  
तेरी मंजिल - है  मुझ से, मेरा मुकाम-है  तुम पर
जमाने के - हटकने से, मुहब्बत टल नही सकती ……

मेरा हर ख़्वाब तेरा है, तेरा हर ख़्वाब - है  मुझ से 
ना खुद को रोक पाती तुम, ना खुद को रोक पाया मैं  
तेरी हर साँस  मुझ से है: मेरी हर आस है तुम पर 
जमाने से - डर कर के, मुहब्बत रुक नहीं सकती ……. 

तुम्हारा साथ है पथ में, तो मंजिल दूर नहीं लगती
तुम्हारा प्यार है दिल में, तो साँसे थम नहीं सकती 
मुझे विश्वास तुम पर है, तुझे विश्वास है मुझ पर
जमाने के - बवन्डर से, मुहब्बत हिल नहीं सकती ……

सफर पर चल पड़ा था मैं, निभाया साथ तुमने भी  
कसम खायी थी  मेने भी, किया वादा है तुमने भी
मेरी तक़दीर तुम पर है, तेरी तजबीज है मुझ पर
ज़माने के बदलने से, मुहब्बत बदल नहीं सकती ……

मेरे रँग में - रँगी हो  तुम, तेरे रँग में - रँगा हूँ  मैं
मेरे बिन- तुम अधूरी हो, तेरे बिन- मैं अधुरा हूँ
तेरी धडकन -है मुझ से ,मेरी धडकन- है तुझ पर 
जमाने के- कड़कने से, मुहब्बत मिट नहीं सकती …… 

29.7.13

लाइलाज और जानलेवा लीवर कैंसर में बुडविग उपचार का चमत्कारी प्रभाव

Budwig Protocol Testimonial 

A mail from Liver Cancer Patient from Bangalore - 

Respected Dr. Verma,

Many many thanks for consulting my mother and showing us great healing path.

Mummy was feeling much better today. I think the coffee enema is the biggest contributor in her feeling well.
Q1. Should we give coffee enema, 1 morning and 1 evening, to reduce itching?


Q2. Sauerkraut Juice is ready. I put the solution in a mixie, and then strained it through a thin loin cloth. I have got 2 ltrs (picture is attached). We all tasted a few drops and it is wonderful. It has a rejuvenating taste. How much should mummy take at a time?

Thanks and regards,

xxx


28.7.13

21 जुलाई, 2013 को राजस्थान पत्रिका में

      21 जुलाई, 2013 को राजस्थान पत्रिका पूरे भारत में प्रकाशित    एक्सपर्ट एडवाइस

27.7.13

जागो हिन्दुओं जागो-ब्रज की दुनिया

मित्रों,आप सभी देश के मौजूदा हालात से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। चाहे देश की उत्तरी,दक्षिणी,पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा का सवाल हो या फिर देश की आंतरिक सुरक्षा का। चाहे देश की अर्थव्यवस्था का प्रश्न हो या विदेशी व्यापार का हर मोर्चे पर आज की तारीख में देश की हालत खस्ता है। चीन बार-बार हमारी सीमाओं में दाखिल होकर हमारी संप्रभुता को खुली चुनौती दे रहा है। कोई नहीं जानता कि वह गद्दार कब हमारे देश पर हमला कर दे और सच्चाई तो यही है कि अगर ऐसा हुआ तो इस बार हमें एक साथ चीन और पाकिस्तान दोनों से लोहा लेना पड़ेगा। इधर भारत-चीन सीमा पर हमारी तैयारी की हालत कदाचित 1962 से भी ज्यादा खराब है। जहाँ चीन ने भारत-चीन सीमा के समानान्तर रेल-लाइनों और सड़कों का जाल बिछा दिया है हमारी सड़कें सीमा से 40-50 किलोमीटर पहले ही समाप्त हो जाती हैं,रेल-लाइनों को बिछाने का प्रश्न ही नहीं उठता। पाकिस्तान तो हमेशा हमें नुकसान पहुँचाने की ताक में लगा रहता ही है,नेपाल,मालदीव,भूटान और श्रीलंका भी वर्तमान केंद्र सरकार की आत्मविनाशक विदेश नीति के कारण हमारे विश्वस्त मित्र नहीं रह गए हैं। बांग्लादेश की हमारे प्रति नीति भी दो राजनैतिक दलों के बीच पेंडुलम की भाँति झूलती रहती है।
                     मित्रों,क्या आपने कभी विचार किया है कि देश के इन हालातों के लिए कौन जिम्मेदार है? कहते हैं कि लोकतंत्र में यथा प्रजा तथा राजा का नियम काम करता है। हमारे लुटेरे छद्म धर्मनिरपेक्ष सियासतदानों ने पहले आरक्षण के नाम पर बहुसंख्यक हिन्दुओं को आपस में लड़वाया फिर पूरे भारत को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में बाँट दिया। आज हम हिन्दुओं की स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि हमारे देश का प्रधानमंत्री लाल-किले से खुलेआम ऐलान करता है कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। पारसी,इसाई,बौद्ध,जैन और सिक्खों की स्थिति तो पहले से ही हिन्दुओं से अच्छी है। तो फिर इसका तो यही मतलब हुआ कि ऐसा कहके और करके केंद्र सरकार सिर्फ मुसलमानों को खुश करना चाहती है। आज हम अपनी मातृभूमि-आदिभूमि हिन्दुस्थान में मंदिरों में लाऊडस्पीकर और घंटे-घड़ियाल तक नहीं बजा सकते (उदाहरण के लिए हैदराबाद का भाग्यलक्ष्मी मंदिर)। आज ही उत्तर प्रदेश के मेरठ में मंदिर में लाऊडस्पीकर बजाने पर मुसलमानों ने मंदिर पर हमला कर दिया जिसमें दो लोग मारे भी गए। ऐसा कब तक चलेगा? हमने तो कभी नहीं रोका उनको नमाज पढ़ने या अजान देने से फिर वो क्यों हम पर गोलियाँ चलाते हैं? इतिहास गवाह है कि दंगे चाहे भागलपुर में हुए हों या गुजरात में,शुरू हमेशा मुसलमान ही करते हैं।
                                      मित्रों, लाल किले से ऐसा कहकर और मुसलमानों के लिए अलग से विशेष योजनाएँ चलाकर हमारे ही वोटों से चुनी गई हमारी केंद्र सरकार ने हमें हमारे ही देश हिन्दुस्थान में द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना दिया है। अंग्रेजों के जमाने से ही भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए आपराधिक कानून या संहिता तो एक है लेकिन दीवानी कानून या नागरिक संहिता अलग-अलग हैं। यह घोर दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के बाद भी जो भी संशोधन और बदलाव हमारी सरकारों ने किए सिर्फ और सिर्फ हिन्दू उत्तराधिकार कानून और विवाह कानून में किए मुगलकाल से चले आ रहे तत्संबंधी इस्लामिक कानूनों को कभी छुआ तक नहीं गया। हिन्दू पुरूष एक विवाह करे और मुसलमान पुरूष चार फिर क्यों नहीं मुसलमानों की जनसंख्या ज्यादा तेजी से बढ़ेगी? बीच में स्व. संजय गांधी ने 1974-77 में जबरन नसबंदी के प्रयास भी किए लेकिन उनको भी दूसरी बार सत्ता में आने के बाद अपने कदम पीछे खींचने पड़े। मैं सर्वधर्मसमभाव पर अमल का दावा करनेवाली केंद्र सरकार से जानना चाहता हूँ कि क्यों सारे सुधार और संशोधन हिन्दुओं के विवाह और सम्पत्ति कानून में ही किए जाते हैं,मुसलमानों के कानूनों को क्यों नहीं बदला जाता है? ٍक्यों बार-बार सारे-के-सारे प्रतिबंध हिन्दुओं पर ही लादे जाते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्तमान और पूर्व की केंद्र सरकारों की इस प्रवृत्ति पर कई बार सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सरकारों  को समान नागरिक संहिता लागू करने परामर्श दिया है लेकिन सब बेकार।
                               मित्रों,इसी तरह अंग्रेजों के जमाने से ही हिन्दू मंदिरों पर तो सरकार का कब्जा और नियंत्रण है मगर मस्जिदों,दरगाहों और कब्रगाहों पर शिया या सुन्नी वक्फ बोर्ड का। जब सरकार या दूसरों के पैसों से हज करना शरियत के अनुकूल नहीं है तो फिर क्यों केंद्र सरकार मुसलमानों को हज-सब्सिडी दे रही है और क्यों भारतीय मुसलमान इसका लाभ उठा रहे हैं? अमरनाथ या कैलाश-मानसरोवर-यात्रा पर हिन्दुओं को क्यों सब्सिडी नहीं दी जा रही है? क्यों हिन्दू मंदिरों के खजाने पर कोर्ट-कानून का डंडा चलता है और क्यों मुस्लिम दरगाहों की कमाई को सरकार के अधिकार-क्षेत्र से बाहर रखा गया है?
                                    मित्रों,हम यह भी जानना चाहते हैं कि कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार राहुल गांधी किस धर्म को मानते हैं? क्या वे हिन्दू-धर्म को मानते हैं? अगर वे किसी दूसरे धर्म को मानते हैं तो फिर क्या गारंटी है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वे हिन्दुओं का खास ख्याल रखेंगे और अल्पसंख्यक-फर्स्ट की कुत्सित नीति पर नहीं चलेंगे? हम यह भी जानना चाहेंगे कि राहुल गांधी के गोहत्या के बारे में क्या विचार हैं? वे इसका समर्थन करते हैं या विरोध? क्या उन्होंने कभी गोमांस-भक्षण किया है या वे अब भी गोमांस खाते हैं? क्या सोनिया गांधी ने कभी गोमांस खाया है या अब भी वे उतने ही चाव से इसका सेवन करती हैं?
                                              मित्रों,हमारे गाँवों में एक कहावत बड़ी ही मकबूल है कि जो खाए गाय का गोश्त,वो हो नहीं सकता हिन्दुओं का दोस्त। अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि कौन हम हिन्दुओं का शुभचिंतक है और कौन नहीं? चाहे वो गोहत्या पर से कर्नाटक में पाबंदी हटानेवाला सिद्धरमैया हो या उत्तर प्रदेश में नए बूचड़खानों के लिए टेंडर मंगवानेवाला अखिलेश यादव,ये लोग कभी हिन्दुओं के दोस्त या हितचिंतक हो ही नहीं सकते। इतना ही नहीं हम प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ काफी तेज कदमों से बढ़ रहे श्रीमान् नरेंद्र मोदी जी से भी स्पष्ट शब्दों में यह जानना चाहते हैं,बल्कि हम उनके मुखारविन्द से यह सुनना चाहते हैं कि वे प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बनने के बाद संसद से गोहत्या पर रोक लगाने का कानून बनवाएंगे।
                        मित्रों,जबकि 85 प्रतिशत मुसलमान पहले से ही आरक्षण के दायरे में हैं फिर भी मात्र 15 प्रतिशत अगड़े मुसलमानों को आरक्षण देने की जी-तोड़ कोशिश की जा रही है। क्या अगड़े मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए पिछड़ी जाति के हिन्दू जिम्मेदार हैं? फिर क्यों उनका कोटा कम करके अगड़े मुसलमानों को संविधान की खुलेआम अनदेखी करते हुए धर्म के आधार पर आरक्षण देने की नापाक कोशिश की जा रही है?
                                    मित्रों,हमारे छद्म धर्मनिरपेक्ष नेता आज देश पर मरनेवालों पर आँसू नहीं बहाते,उत्तराखंड में उनकी लापरवाही के चलते मारे गए हजारों बेगुनाह हिन्दुओं की लाशों पर भी आँसू बर्बाद नहीं करते बल्कि वे आँसू बहाते हैं मुस्लिम आतंकियों की मौत और गिरफ्तारी पर। क्या इसको सर्वधर्मसमभाव का नाम दिया जा सकता है? क्या इस तरह की आत्मघाती रणनीति अपनाकर देश से आतंकवाद का खात्मा किया जाएगा?
                                         मित्रों,कुल मिलाकर इस सारी मगजमारी का लब्बोलुआब यह है कि देश की दुर्दशा इसलिए हो रही है क्योंकि इस देश के बहुसंख्यक अर्थात् हिन्दू एक नहीं हैं। कम-से-कम हिन्दुओं को तो इस संकट-काल में देशहित में एक हो ही जाना चाहिए और अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर वो दिन दूर नहीं जब इस देश का एक नाम हिन्दुस्थान या हिन्दुस्तान न होकर चीन या पाकिस्तान हो जाएगा। आज नेफा से लेकर राजस्थान तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे हिन्दुस्थान को कांग्रेस की लुटेरी और देशबेचवा सरकार ने अपनी शत्रुतापूर्ण नीतियों के चलते खतरे में डाल दिया है। चूँकि हमारा धर्म इस देश और पृथ्वी पर सबसे पुराना धर्म है इसलिए इस देश की अस्तित्व-रक्षा के प्रति अगर किसी की पहली जिम्मेदारी बनती है तो वो हम हिन्दुओं की। वैसे अगर दूसरे धर्मवाले देशभक्त भी इस परमपुनीत कार्य में अपना महती योगदान देना चाहें तो हम तहेदिल से उनका स्वागत करेंगे। और हिन्दुओं को भी एक कुछ इस तरह से होना चाहिए कि हमारे देश की एकमात्र बहुसंख्यकवादी राष्ट्रीय पार्टी भाजपा को अकेले ही दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हो जाए और अल्पसंख्यकवादी देशबेचवा नेताओं की दाल चुनावों के बाद किसी भी सूरत में गलने नहीं पाए।
                       मित्रों,हम हिन्दू एक होंगे तो न केवल अपने देश में ही हमारे धर्माम्बलंबियों की स्थिति सुधरेगी बल्कि हमारे पड़ोसी देशों में भी हिन्दुओं की स्थिति में सुधार आएगा। तब पाकिस्तान में हिन्दुओं की बहु-बेटियों का दिन-दहाड़े अपहरण नहीं होगा और उनको अपनी मातृभूमि छोड़कर प्राण-प्रतिष्ठा बचाकर भारत नहीं भागना पड़ेगा। हमें हमेशा यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि दुनिया में भारत के अलावा ऐसा कोई दूसरा देश नहीं है जहाँ कि बहुसंख्यकों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनकर रहना पड़ता हो। 

26.7.13

जानता हूँ क्या उचित है पर करने की इच्छा नहीं है !

जानता हूँ क्या उचित है पर करने की इच्छा नहीं है !

भारत आज जिस समस्या से पीड़ित है उसमे गरीबी मुख्य समस्या बन गई है। नीति
और शास्त्र कहते हैं कि भूखा व्यक्ति पुन्य और पाप के पचड़े में नहीं पड़ता है वह तो
पेट भरने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है कैसा भी पाप हो वह उसे करने
के लिए तैयार रहता है और इस महामारी का ईलाज आज तक कोई भी राजनीतिज्ञ
खोजने में असक्षम रहा है ,इसके कुछ कारण है -पद का लोभ, इच्छाशक्ति का
अभाव, निजी स्वार्थ, देश प्रेम की भावना में गिरावट।

           कोई भी सरकार इस पीड़ा को ढकना चाहती है और ढकने मात्र से फोड़ा ठीक
नहीं होता है उलटे उसमे मवाद पड जाती है। वर्तमान सरकार तो इस पीड़ा को ढकने
के लिए विरोधाभासी योजनायें और आंकड़े रचने में व्यस्त है ,सरकार एक बार यह
स्वीकार कर ले कि इस देश में वर्तमान में गरीबी विकराल रूप ले चुकी है और यह
घटने की जगह बढ़ रही है तो इसको ठीक करने के उपाय भी मिल जायेंगे लेकिन
सरकार में इच्छाशक्ति और सत्य को स्वीकार करने का साहस नहीं रहा है इसलिए
वह आंकड़ो का जाल बिछाती है और प्रजा के रोष को बढाती है।

          क्या जिसका पेट भरा है वह अपराध करेगा ?किसी भी कोम का गरीब व्यक्ति
जब पेट भरने के,रोजी रोटी कमाने के सभी रास्ते खुद के लिए बंद देखता है तो वह
अनैतिक और गेरकानुनी काम करने के रास्ते को सुगम समझ उस ओर मज़बूरी से
चलने को बाध्य हो जाता है।

    हम पढ़े लिखे और अपने को निपुण समझने वाले लोग गरीबी और उसकी मज़बूरी
को समझने में जब तक असफल रहेंगे तब तक विघटनकारी तत्वों को रोक पाने में
असफल रहेंगे। गरीब चाहे किसी भी धर्म का हो उसे योग्य राह नहीं मिलने पर भटक
जायेगा यह वास्तविकता है।

     गरीब लोग पेट भरने के लिए अपना मत भी बेचने में नही झिझकता और उसकी
कमजोरी का तुच्छ स्वार्थी नेता फायदा उठाते हैं। चुनावों के समय लालच देकर वोट
पा लेना उनको भी सुगम रास्ता लगता है।

        दूसरी बात बेरोजगारी की है। हमारी सरकार करोडो युवाओं को रोजगार देने में
फिस्सडी साबित हो रही है और गुणवत्ता युक्त शिक्षा देने में नाकारा साबित हो रही है
आज पढ़े लिखे लोग बेरोजगारी का दंश भोगते हैं और समाज के ताने सुनते हैं। उनके
हाथ में थमाई गई डिग्रियां उनका और उनके परिवार का पेट भरने में नाकामयाब हो
रही है और इसका परिणाम यह आता है कि युवा हताशा और निराशा से गैरकानूनी
काम करने को मजबूर हो जाता है।

        कानुन अपराध को रोकने के लिए दण्डका विधान करता है पर यह चिंतन कोई
नहीं करता है कि आपराधिक प्रवृति का उन्मूलन कैसे हो? क्या दण्ड से सुपरिणाम
पाए जा सकते हैं ? अगर यही सर्वश्रेष्ठ उपाय होता तो चरित्र और सदाचार का निर्माण
करना कहाँ जरूरी था ,सब चीजें दण्डसे व्यवस्थित हो जाती।

     स्वामी बुधानन्द ने अपनी पुस्तक में  समस्या का मूल कारण लिखा है -

      जानामि धर्मं न च मे प्रवृति:
      जानाम्यधर्मं न च मे निवृति:  (पाण्डवगीता )  

--मैं जानता हूँ की धर्म क्या है ,उचित क्या है ,अच्छा क्या है  परन्तु उसे करने में मेरी 
प्रवृति नही है और मैं यह भी जानता हूँ की क्या अनुचित है ,अधर्म है,बुरा है,पाप है ,
परन्तु उसे किये बिना रह नहीं पाता।

    आज देश के कर्णधार,शासक,पढ़े लिखे सभी यही तो कर रहे हैं। राजनीती वाला 
कानून सिखाता है ,अर्थशास्त्री नीतिदिखाता है, समाज सुधारक राजनीती के गुर 
पढाता है………………. फिर भी हम कल्याण की चाह रखते हैं यह बड़ा आश्चर्य है !            

25.7.13

किसानों को 2-3 रूपये का मुआवजा चेक

-2 रूपये में कैसे संवरेगी किसानों की तकदीर?
-ऐसी मदद पर कैसे गर्व किया जाये?
 ‘जय जवान, जय किसान’ वाले देश में बाढ़ पीढ़ित गरीब किसानों को मुआवजे के तौर पर 2 व 3 रूपये के चेक भी मिल रहे हैं। चौंकना लाजमी है। इतने रूपये में किसानों की तकदीर संवरेगी या वह अपनी बर्बाद फसल की भरपाई कर लेंगे यह मुमकिन तो नहीं है, लेकिन सरकार के हिसाब से है तभी वह कर भी रही है। यह मुआवजा उन किसानों को है जिनकी फसल प्राकृतिक आपदा के चलते खराब हो गई थी। मुआवजे के लिये किसानों ने 1 साल का लम्बा इंतजार भी किया। प्रकरण
हरियाणा प्रान्त के झज्जर जिले का है। कृषि प्रधान देश में किसानों की ऐसी मदद पर कैसे गर्व किया जा सकता है? शर्म भी आती है इस व्यवस्था पर। किसान हाथ में चेक लेकर हक्के-बक्के हैं क्योंकि वह समझ ही नहीं पा रहे कि चेक का क्या करें। चेक सरकारी बैंक के होते तो भी ठीक था। यह चेक प्राईवेट एक्सिस बैंक के हैं। अब जिन किसान का खाता नहीं है वह यदि इस बैंक में खाता खुलवाने पहुंच जाये तो उसे पांच हजार खाता खुलवाने के लिये चाहिए। 2 रूपये का चेक किसान तक पहुंचते हुए कितने खर्च हो गए
होंगे? क्या फायदा ऐसी राहत का? हां कागजी तौर पर एक कारनामा जुड़ गया कि हमने मदद की। यह घिनौने मजाक से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। शुक्र कीजिए देश के बाशिंदे आज भी जय जवान-जय किसान बोलते हैं ओर बोलते रहेंगे। हमें अपने किसानों पर गर्व है।

23.7.13

सच बोलना है पर घेरे के अन्दर

सच बोलना है पर घेरे के अन्दर 

जब एक बच्चे को अध्यापक बनाया तो बच्चा अध्यापक का स्वांग रच कर क्लास में
आया और बोला-अब मैं मास्टर बन चूका हूँ इसलिए मैं जो कहूँ उसे ध्यान से सुनो -
आज तक मेरे से पीछे वालों ने एक काम नहीं किया ,क्या आपको मालुम है ?

बच्चे बोले -नहीं मालुम।

मास्टर बोला-आज तक देश के सामने किसी ने सच नहीं बोला  ………………

बच्चों ने जम कर तालियाँ बजाई तो मास्टरजी बोले -..............लेकिन अब सच बोलना
है।

बच्चे मायूस हो गए। उनमे से एक बोला- सर ,किसी ने हेराफेरी पर बात की तो सही
नाम उगल दूँ ?

दूसरा बच्चा बोला-कोई पिछली चोरी पर बात करे तो क्या सही सही बयान कर दूँ ?

तीसरा बोला- कोई घोटाले की रकम किसके पास है पूछे तो बता दूँ ?

चौथा बोला- आज तक के फर्जीवाड़े का ढोल पीट दूँ ?

पाँचवा बोला - क्या रिश्ते नाते के झूठ भी उघाड़ कर रख दूँ ?

मास्टरजी बोले -……चुप ! सच बोलना है पर घेरे के अन्दर रहकर।

बच्चे बोले -मतलब ?

मास्टरजी ने समझाया - तुम्हारे से कोई अपराध हो गया तो घेरे में आकर सच
बता देना ताकि उसका तोड़ ढूंढ़ लिया जाए अगर घेरे में झूठ बोला तो झूठा
कहलाओगे। समझ गए

बच्चे बोले -हाँ जी।

मास्टर जी ने आज की क्लास शांतिपूर्वक खत्म कर दी।     

सावन में डाक से घर बैठे पायें काशी विश्वनाथ और महाकाल का प्रसाद - कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ


सावन के मौसम में शिव की आराधना के लिए तमाम तैयारियां हो रही हैं. कहीं उनका दरबार सज रहा है तो कहीं आनलाइन आरती का प्रबंध किया जा रहा है. पर अब देश के किसी भी कोने में बैठे शिवभक्त काशी विश्वनाथ मंदिर, बनारस और महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन का प्रसाद भी घर बैठे ग्रहण कर सकेंगें. डाक विभाग यह सौगात लेकर आया है.

यह जानकारी देते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डाक विभाग और काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के बीच हुए एक एग्रीमेण्ट के तहत काशी विश्वनाथ मंदिर का प्रसाद डाक द्वारा भी लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके तहत साठ रूपये का मनीआर्डर प्रवर डाक अधीक्षक, बनारस (पूर्वी) के नाम भेजना होता है और बदले में वहाँ से काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के सौजन्य से मंदिर की भभूति, रूद्राक्ष, भगवान शिव की लेमिनेटेड फोटो और शिव चालीसा प्रेषक के पास प्रसाद रूप में भेज दिया जाता है।

निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा उज्जैन के प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का प्रसाद भी डाक द्वारा मंगाया जा सकता है। इसके लिए प्रशासक, श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबन्धन कमेटी, उज्जैन को 151 रूपये का मनीआर्डर करना पड़ेगा और इसके बदले में वहाँ से स्पीड पोस्ट द्वारा प्रसाद भेज दिया जाता है। इस प्रसाद में 200 ग्राम ड्राई फ्रूट, 200 ग्राम लड्डू, भभूति और भगवान श्री महाकालेश्वर जी का चित्र शामिल है। निदेशक श्री यादव ने बताया कि इस प्रसाद को प्रेषक के पास एक वाटर प्रूफ लिफाफे में स्पीड पोस्ट द्वारा भेजा जाता है, ताकि पारगमन में यह सुरक्षित और शुद्ध बना रहे। 


22.7.13

सफलता और इच्छाशक्ति

सफलता और इच्छाशक्ति 

इस विश्व में अरबों लोग निवास करते हैं उनमें कुछ सफल कुछ संघर्षरत और बड़ी संख्या
में असफल लोग जीवन जीते हैं,प्रश्न यह उठता है कि बड़ी संख्या में लोग असफल जीवन
क्यों जीते हैं ?क्या उनका जन्म असफल बनकर व्यतीत करने हेतु हुआ है या फिर वे लोग
सफल होना नहीं चाहते ? कौन ऐसा व्यक्ति है जो सफल जीवन जीना नहीं चाहता,कोई भी
नहीं।तो फिर असफल होने का कारण क्या ?हमारे अन्दर द्रढ़ इच्छा का अभाव।

               सफलता की इच्छा और सफलता के लिए दृढ इच्छाशक्ति में गहरा अंतर है।
एक मशीन को चलाने के लिए मोटर उचित हॉर्स पावर की होनी आवश्यक है यदि मशीन
की आवश्यकता से कम HP की मोटर है तो मशीन काम नहीं कर पाएगी।ठीक इसी तरह
हर काम को सफलता से पूरा करने के लिए उचित इच्छा शक्ति का होना बहुत जरुरी है।

           सामान्य इच्छा और दृढ इच्छाशक्ति  

यदि कोई परीक्षार्थी इस आशय से परीक्षा की तैयारी करता है कि मुझे तो उत्तीर्ण होना है
तो उसके साथ अनुत्तीर्ण होने की सम्भावना भी जुड़ जाती है क्योंकि उत्तीर्ण होने के लियॆ
मानक अंक 36 % ही है और इस कारण उसकी तैयारी भी बहुत सीमित है।कम तैयारी
अपूर्णता का परिचायक है इसलिए असफलता की सम्भावना भी प्रबल हो जाती है।दृढ
इच्छा शक्ति वाला परीक्षार्थी परीक्षा की तैयारी अधिक से अधिक अंक अर्जित करने के
दृष्टिकोण से करता है इसलिए उसमे असफल होने की गुंजाइश नहीं रहती है।

             हारा हुआ मन ,अधुरा मन और आत्मविश्वास से लबालब मन ये तीन स्थितियाँ
हम सबके पास हर समय विद्यमान होती है,यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किसी
काम की शरुआत किस मन के साथ करते हैं।हारा हुआ मन यह दिखाता है कि हम जिस काम
को करने जा रहे हैं उस काम के प्रति हम निषेधात्मक विचार रखते हैं और उस काम को करने
की तत्परता और तैयारी भी नहीं कर रखी है।किसी काम को करने से पहले ही हम सोच ले कि
इसमें सफलता नहीं मिलेगी तो उस काम के प्रति हमारी रूचि और श्रद्धा खत्म हो जाती है और
परिणाम भी हमने जो सोचा है वह तुरंत मिल जाता है
       
       अधुरे मन की स्थिति हमे संशय में डाले रहती है।काम को करने से पहले यदि हम
अनिश्चय में रहते हैं और सफलता के बारे में शंकित रहते हैं तो परिणाम भी कभी संतोष
जनक नहीं मिलते।इस स्थिति में मन नाना प्रकार के विकल्पों में उलझा रहता है इससे
एकाग्रता प्रभावित होती है ,परिणाम स्वरूप हम जीवन में संघर्षरत जीवन जीते हैं।

        आत्मविश्वास से भरा मन यह दर्शाता है कि हम हर काम को चुनौती के रूप में स्वीकार
करते हैं और उसे हर हाल में पूरा करना ही है इसी लक्ष्य को ध्यान में लेकर उस काम को
कैसे पूरा करना है ,के सूक्ष्म विश्लेष्ण में लग जाते हैं।किसी भी काम को करने से पहले
हम पूरी तैयारी कर लेते हैं तो हमारे मन में उत्साह और विश्वास का संचार लगातार होता
रहता है और हम बड़ी बाधाओं को भी पार कर जाते हैं

इच्छाशक्ति की उत्पत्ति कैसे होती है        

   स्वामी विवेकानंद कहते हैं "मनुष्य की यह इच्छा शक्ति चरित्र से उत्पन्न होती है और
वह चरित्र कर्मों से गठित होता है।अतएव,जैसा कर्म होता है इच्छाशक्ति की अभिव्यक्ति
भी वैसी ही होती है"

अगर हमारे कर्म दिव्य है तो हमारा चरित्र भी दिव्य होगा और चरित्र दिव्य है तो इच्छाशक्ति
भी दृढ होगी।अगर हमारी महत्वाकांक्षा बड़ी है तो उसे पूरा करने के लिए दृढ इच्छा शक्ति की
जरुरत पड़ेगी क्योंकि बड़े लक्ष्य को पाने के लिए जो रास्ता है उसमे बहुत सी बाधाएं और
विपदाएं निश्चित रूप से होती हैं इन बाधाओं और विपदाओं से लम्बे समय तक मुकाबला
करना है इसलिए दृढ इच्छाशक्ति जरुरी है।हर असफलता हमे अपने लक्ष्य के करीब ले जाती
है।बार -बार आने वाली विपदा यह इंगित करती है की इस रस्ते पर आगे बढ़ते रहे यही वो
रास्ता है जो लक्ष्य तक ले जाएगा। विपदाओं के बाद भी हमारा होसला ,उत्साह और जीवट
बना रहे इसलिए दिव्य इच्छाशक्ति का होना जरुरी है।  
                

वो आँखें !!

 वो आँखें !!


21.7.13

संचार के सिद्धांत: संचार प्रक्रिया (Communication Process)

संचार के सिद्धांत: संचार प्रक्रिया (Communication Process):      ¥æçη¤æÜ ×ð´ ¥æÁ ·¤è ÌÚUãU â´¿æÚU ×æŠØ× ÙãUè´ ÍðÐ §â·ð¤ ÕæßÁêΠ ׿Ùß â´¿æÚU ·¤ÚUÌæ ÍæÐ ßÌü×æÙ Øé» ×ð´ â´¿æÚU ×æŠØ×æð´ ·¤è çßçߊæÌæ ·...