13.8.13
सिसकते भारत की तस्वीर
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9.8.13
http://blog.amarujala.com/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97-%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%95/%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0/
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vinodkmusan
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चंद्रमुखी की ना-नुकुर
2 प्रतिक्रियाएँ
रामलाल जब भी अपनी पत्नी चंद्रमुखी से कोई काम कहता, चंद्रमुखी उस काम का उल्टा ही करती। रामलाल कहता, आज मैं खीर खाऊंगा तो चंद्रमुखी खिचड़ी बना देती।
रामलाल कहता आज मुझे भूख नहीं है, मैं दो ही रोटी खाऊंगा तो चंद्रमुखी उसे ठूंस-ठूंसकर चार रोटी खिला देती।
रामलाल कहता आज हम बच्चों के साथ घूमने जाएंगे, चंद्रमुखी कहती आज नहीं कल।
चंद्रमुखी की ना-नुकुर से जब रामलाल आजिज आ जाता तो कहता- चंद्रमुखी तुम इस बार मायके नहीं जाओगी। ..और चंद्रमुखी झट से उसी दिन तैयार होकर मायके चली जाती।
आखिर चंद्रमुखी की यही नकारात्मक सोच उसे एक दिन ले डूबी।
दोनो यात्रा पर थे। रास्ते में बहती एक नदी में नहाने के लिए रुके।
चंद्रमुखी- न मैं तो आगे जाकर ही नहाऊंगी।
रामलाल- अच्छा ज्यादा आगे मत जाना…।
चंद्रमुखी- न मैं तो और आगे जाकर ही नहाऊंगी।
रामलाल- अरे भई…आगे पानी का बहाव तेज है, तुम फिसल जाओगी…।
चंद्रमुखी- न मैं तो बीच नदी में जाकर ही नहाऊंगी…।
..और ना-ना करते-करते चंद्रमुखी नदी के तेज बहाव में बह गई।
अपनी पत्नी की ना-नुकुर पर एक-दो बार मैंने उसे भी यह कहानी सुनाई। पहली प्रतिक्रिया तो यही थी, तुम मर्द होते ही एक जैसे हो…हमारी कही हर बात तुम्हें बुरी लगती है। तुम भी यही चाहते हो न, मैं भी किसी नदी में डूब जाऊं।
लेकिन, कई बार लंबे चलने वाले झगड़े को इस कहानी ने वक्त से पहले ही सुलझा दिया। पत्नी मुस्कुरा देती है… और कहती, तुम नहीं सुधरोगे।
चिंटू के पापा की सुनाई कहानी सुन ली। हम पति-पत्नी के बीच कैसे सुलह हुई, यह भी जान लिया…अब क्या? मुद्दे की बात तो हुई ही नहीं। आखिर मुद्दा क्या है। अगर, आप कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं तो चलो आपको मुद्दे की बात भी बताते चलें- मुद्दा है ‘ना-नुकुर’।
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vinodkmusan
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मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है…
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
तीन साल पहले ‘अमर उजाला’ मुरादाबाद में था। बच्चों से दूर अकेला रहता था। खूब समय था मेरे पास। आफिस के सीनियर साथी आशीष शर्मा जी केसाथ एक योगा सेंटर ज्वाइन कर लिया। रात को डेस्क पर काम करते हुए 2 बजे के आसपास छूटते थे। सुबह 10 बजे जब हम सेंटर पहुंचते, तब तक सभी लोग जा चुके होते थे। विशेष अनुरोध पर सेंटर संचालक इस समय पर हमें योग सिखाने को तैयार हुआ था।
केदारनाथ आपदा के बाद मन में प्रभावित क्षेत्रों में जाकर रिपोर्टिंग करने की इच्छा थी। डेस्क पर साथियों की कमी के चलते पहले तो संपादक जी से बात करने की हिम्मत ही नहीं हुई। फिर सोचा भेजें न भेजें, बात करने में क्या बुराई है, कल जरूर बात करूंगा। ऐसे करते-करते दो-तीन दिन निकल गए। जिस दिन मन पक्का करके आया, उसी दिन पता चला, संपादक जी दो साथियों को भेज चुके हैं। फिर मेरा वह कल दोबारा नहीं आया।
जो फावड़ा मुख्यमंत्री जी ने दो दिन पहले उठाया है, यही काम 15 दिन पहले कर लिया होता तो ज्यादा अच्छा होता। खैर, देर आए दुरुस्त आए… उनकी इस पहल को सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए।
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vinodkmusan
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न जाने यों होता है यूं जिंदगी के साथ
अचानक ये मन किसी के जाने के बाद
करे फिर उसकी याद
उसकी छोटी-छोटी सी बात
लम्हें गुजर जाते हैं, यादें रह जाती हैं
मासूम से चेहरे की दबी सी हंसी
आती है याद
उनके जाने के बाद
उनकी छोटी-छोटी सी बात
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vinodkmusan
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यूं ही अंतर्मन में डूबा था एक दिन ये मन
यूं ही अंतर्मन में डूबा था एक दिन ये मन
तभी पीछे से किसी ने आवाज दी
लगा जैसे कोई अपना ही है
मुड़कर देखा
तो कोई न था
अपनी ही परछाई खड़ी थी
वही विशालकाय रूप लिए
सम्मोहन जैसा कुछ न था
फिर भी साथ थी वह मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
और मेरे साथ जुड़े होने का अहसास
अंतर्मन की उलझन
मैं और मेरी परछाई
तीनो साथ होकर भी
मानो अकेले थे
फिर करवां भी गुजर गया
सामने से मेरे
और मैं तनहा रहा खड़ा
जब तक परछाई थी साथ मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
सन्नाटा बढ़ता चला गया
और वह अंर्तध्यान हो गई
फिर वही संकोच लिए
मैं, मेरी परछाई…और वह संन्नाटा
कुछ अजीब सी उलझन लिए
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vinodkmusan
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बाजार में बिकती ‘भीड़’
सेल-सेल-सेल….
आलू-प्याज समझा है क्या?
कहां?
क्या कहा! बाजार में!
इनकी मंडी कहां लगती है?
लेकिन इसे इतनी भी ‘आम ’ मत समझना।
जनम-मरण, खुशी-गम में यूं ही शामिल हो जाती थी ये भीड़।
बड़े-बड़े किलों को फतह कर जाती थी यह भीड़।
एकजुट होकर किसी को गद्दी पर बैठा और किसी को गद्दी से उतार देती थी ये भीड़।
एकता की ऐसी मशाल जलाई की देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद करा गई ये भीड़।
आलम यह है कि आज बिना दाम किसी को घास ही नहीं डालती यह भीड़।
क्या नजारा था, रेलम-पैल था, एक के पीछे एक, दूर तलक बस दिखाई दे रही थी भीड़।
मुरझाई हुई सी नजर आ रही थी यह भीड़।
हाथों में झंडे-डंडे लिए सुस्ताई हुई सी थी यह भीड़।
थोड़ा करीब जाकर देखा तो पता चला ‘बिकी ’ हुई थी यह भीड़।
आज कुछ ऐसी हो गई है यह भीड़।
‘वक्तिया प्रारूप ’ में ढलकर अपना ‘स्व-स्वरूप ’ खो गई है यह भीड़।
अपनी ताकत का अहसास होने के बाद भी असहाय सी हो गई है यह भीड़।
नजरों का फेर नहीं हकीकत में कहीं अपने में ही खो गई यह भीड़।
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vinodkmusan
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सियार के बारे में ..............
मुझे खेद है कि मैं सियारों पर अपूर्ण जानकारी दे रहा हूँ ,पाठक वर्ग इसमें एक
नया खंड टिपण्णी के रूप में जोड़ कर अन्य पाठकों की ज्ञान वृद्धि कर सकते हैं।
सियार भी एक अजीब बला है जंगल में. इनके कारनामे और करतूतें थूकने के योग्य
है। सियार की एक खासियत यह होती है कि जब जंगल की व्यवस्था उसके हाथ में
आ जाती है तब वह सबसे पहले शेरों की जान को खतरा पैदा करता है,यह सियारों
का पारिवारिक रिवाज है जो इनके जन्म से जुड़ा है।
सियार जंगल में सर्वत्र पाए जाते हैं अक्सर ये राज नगर में निवास करना ज्यादा
पसंद करते हैं .इनका कोई उसूल नहीं होता है.ये खुदगर्जी के उसूल पर पलते हैं.
ये अपनी खाल बचाने के लिए शेरों का शिकार पडोसी भेड़ियों से करवा देते हैं।
सियार रंग बिरंगे होते हैं.इनकी पहचान बिरला ही कर पाता है क्योंकि ये अपनी
खाल को मनचाहे रंग में रंगने में माहिर होते हैं.इनका कोई धर्म या सिद्धांत नहीं होता
है इनके पाप अक्सर पुण्य में बदल जाया करते हैं।
सियारों की आपसी लड़ाई के किस्से जंगल में हर वक्त उछलते रहते हैं मगर
जब इनकी अस्मिता पर खतरा मंडराता है तो यह सारी जमात न्यात जात भूल
कर एक हो जाती है इसी विशिष्ठता के कारण गायें और कबूतर इनको जंगल का
राजा बनाते हैं।
सियार दहाड़ नहीं सकते ये इनकी मज़बूरी है इसलिए इनसे दहाड़ मारने की
अपेक्षा ना करे,ये जाती मुँह उठाकर रो सकती है ,इनको आप दुसरो के जंगलों
में भी रोते देख सकते हैं.सियार आक्रमण भी करते हैं पर अपने ही जँगल में
दुश्मनों से ये भयभीत रहते हैं.
कुछ चतुर सियार गूंगे सियार भी पालते हैं ताकि सही वक्त पर गूंगे बने रहे
और कुछ सियार बहरे सियार पालते हैं ताकि सत्य की आवाज ना सुन सके।
चतुर सियार दूर से मूढ़ सियार के कंधे पर शस्त्र रख खुद प्रहार करते हैं।
सियार वैसे तो अपना पेट भरने की जुगत में सालों लगे रहते हैं परन्तु कभी
कभी बेतरनी पार करने के अवसर पर गायों और कबूतरों को विशेष दाना
डालते हैं।
सियार कूटनीति में माहिर होते हैं। जंगल के प्राणियों में फसाद कराने में इनको
महारत हासिल होती है। ये जब भी रोते हैं पुरे जंगल में आपदा प्रबन्धन हो जाता
है। अपने जँगल को बेच खाने में ये माहिर होते हैं। ये विपदाओं से अपनी रक्षा का
प्रबन्धन करने में निपुण होते हैं इसलिए अपनी पीढ़ियों तक का भोजन दुसरे
जंगलों में सुरक्षित रखते हैं।
सियार अपने जँगल के हितेषी नहीं होते हैं मगर बहरूपिया बन सबको झांसा देते
रहते हैं। इनकी खाल मोटी होने के कारण इनको पाप के प्रभाव से बचाती है। इनका
शिकार करने का मौका सालों में कभी कभार मिलता है पर देखा यह गया है कि ये
शिकारी को धोखा देकर सकुशल अपने मुकाम लौट आते है।
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7.8.13
आम आदमी सरकारी चंगुल में......: हर चश्म ए दीदार खुदा तेरे नूर से है
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Barun Sakhajee Shrivastav
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अयोग्य राजा राष्ट्र के लिए अकल्याणकारी
आचार्य चाणक्य की नीति में लिखा है -अयोग्य को राजा बनाने के स्थान पर किसी
को राजा न बनाने में राष्ट्र का कल्याण है,लेकिन हम भारतीय गलती करते ही
नहीं दोहराते भी हैं.
नन्द वंश केवल चाणक्य के समय में ही नहीं था हर काल में रहता है और
उसका हर काल में विनाश हुआ है. देश पूछता है -क्या चन्द्रगुप्त बनोगे ?
केवल बातें, लच्छेदार बातें,खुद की गलतियों को ढकने की बातें,खुद की अक्षमता
को छिपाने की बातें,प्रजा को भ्रमित करने की बातें ……क्या इसे ही अतुल्य
भारत कहा जाएगा ?
बातों से देश का शासन चलाओ,संसद में लच्छेदार शब्दों का भाषण पिलाओ,
दुश्मन राष्ट्र पर बातों से वार करो,बातों से वतन की रक्षा का दिखावा …… क्या
इसी लिए चुनाव होता है …?
कड़े शब्दों में निंदा करके हम देश के बहादुर सैनिकों का अग्नि संस्कार करते
रहेंगे …क्या इसी को प्रजातंत्र कहते है ?
मौत दुश्मन की घात से हुई या दुश्मन के लुख्खो से ……. मगर मरे तो इस देश
के जवान हैं …जवानो की मौत का बदला दुश्मन से लेने की जगह खबर का
विश्लेषण करने वाले मंत्री को पद पर बने रहने का हक़ होना चाहिए ?
जवान मर गये ……. तुरंत अभिनय शुरू …. संवेदना के स्वर ,चेहरे पर उदासी
की लकीरे ,हाथ में दस लाख की सहायता राशी … और इतिश्री शहीद श्री …की कथा.
…क्या ऐसे कर्तव्यों के निर्वाह को स्वतंत्रता कहते हैं ?
अरे दुश्मन की जाती पूछ कर बताओ …फिर फैसला करेंगे कि उससे मार खाना है
या जबाब देना है. अगर वोट बैंक का दुश्मन है जुते खा कर उसे बिरयानी खिलाओ,
उसकी सूजे गालों से आवभगत करो …. क्या महान देश की यही कूटनीति है ?
जवान शहीद हो गया … अमर जवान ज्योति पर माथा टेक लो और दुश्मन या
उसके गुर्गे मर गए तो सब मिल कर मातम मनाओ , इस दुर्नीति से देश की दुर्दशा
को क्या यह नाम दें कि हो रहा भारत निर्माण …. !!
कल्पना करो की एक नेता का बेटा लुख्खो के हाथों मारा गया है …. नेता और उसका
परिवार दहाड़े मार रहा है और हर देश प्रेमी भारतीय संवेदना और शोक दिखाने के
लिए कतार में उस लाश पर नोटों से श्रद्धांजली दे रहा है …नोटों का ढेर देख कर भी
नेता रोता जा रहा है ,प्रजा को कुछ समझ नहीं आ रहा है …अब भी नेता क्यों रोये जा
रहा है …।
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ASHUTOSH VERMA
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6.8.13
वीरेन डंगवाल के बहाने वरिष्ठ साहित्यकार केदारनाथ सिंह जी का सानिध्य
खैर, इन सबके बीच मुझे 'विशेष' तौर पर प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह जी का सानिध्य मिला। उन्हें उनके आवास से कार्यक्रम स्थल और फिर उन्हें आवास तक छोड़ने की बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मुझ जैसे युवा को मिली थी, जो मेरा सौभाग्य है। इस दौरान मैं 4-5 घंटे तक केदारनाथ जी के सानिध्य में रहा और उनके 'अतीत' में जीने के साथ इस समय के घटनाक्रम(राजनीतिक-साहित्यिक) पर लम्बी(थोड़ी-बहुत, जो मेरे लिए विशेष रही) चर्चा हुई। इस 4-5 घंटे के दौरान एक बेहद महत्वपूर्ण बात जो मैंने महसूस की, वह यह है कि इस उम्र में भी वह बेहद तरो-ताजा और जोश से भरे हुए थे। दरअसल, इस बात को पूरी तरह से मैं तभी समझ पाया, जब 'हिंदी भवन' की मंजिल पर हो रहे कार्यक्रम में जाने के दौरान 'सीढ़ियों' पर चढ़ते समय मैंने उन्हें सहारा देने की कोशिश की तो उन्होंने कहा, 'अरे यार, मैं इतना भी बूढा नहीं हुआ हूं, कि सीढ़ियां भी न चढ़ सकूं'।
![]() |
| Shravan Shukla with Kedarnath Singh |
इस फ़ोटो में एक मैं हूं, जिसे आप सब पहचानते हैं। दूसरे श्री केदारनाथ सिंह जी हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य की दुनिया में शायद ही कोई न पहचानता हो। केदारनाथ सिंह जी के बारे में आज की पीढ़ी को बताने के लिए इतना ही काफी है कि उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने पूरे जीवन हिंदी साहित्य की सेवा की। आपकी अनेक कृतियां हैं, जिनमें से कुछ एक का उल्लेख करना उनकी अन्य कृतियों का अपमान होगा, फिर भी उनकी कुछ बेहद चर्चित रचनाओं के रूप में अभी बिल्कुल अभी, ज़मीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, बाघ, तालस्ताय और साइकिल प्रमुख हैं। इनकी कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं।
इस कार्यक्रम को आयोजित कराने के लिए bhadas4media.com के संस्थापक-संचालक श्री यशवंत सिंह और वरिष्ठ पत्रकार श्री मुकेश कुमार जी को हार्दिक धन्यवाद। जिनकी वजह से हम जैसे युवाओं को श्री केदारनाथ सिंह, श्री वीरेन डंगवाल, श्री नीलाभ अश्क जैसे हिंदी की विभूतियों से मिलने और उन्हें बेहद करीब से जानने का सौभाग्य मिला।
इस मौके पर केदारनाथ जी की लिखी दो कविताएं विशेषरूप से शेयर करना चाहता हूं, जो मुझे बेहद पसंद हैं। तो पेश है उनकी लिखी 'नदी' कविता.. जो उन्होंने 82-83 के समय में में गंगा नदी को देखते हुए लिखी थी।
अगर धीरे चलो
वह तुम्हे छू लेगी
दौड़ो तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जाएगी कहीं भी
यहाँ तक- कि कबाड़ी की दुकान तक भी
छोड़ दो
तो वही अंधेरे में
करोड़ों तारों की आँख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
एक छोटे से घोंघे में
सच्चाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो
तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी
नदी जो इस समय नहीं है इस घर में
पर होगी ज़रूर कहीं न कहीं
किसी चटाई
या फूलदान के नीचे
चुपचाप बहती हुई
कभी सुनना
जब सारा शहर सो जाए
तो किवाड़ों पर कान लगा
धीरे-धीरे सुनना
कहीं आसपास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी!
केदार नाथ जी की दूसरी कविता देश के विभाजन बाद की त्रासदी के बाद 'सन् ४७ को याद करते हुए' है, जिसे मैं बेहद पसंद करता हूं। केदारनाथ जी ने यह कविता 1982 में लिखी थी।
तुम्हें नूर मियां की याद है केदारनाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियां
ठिगने नूर मियां
रामगढ़ बाजार से सुरमा बेच कर
सबसे आखिर मे लौटने वाले नूर मियां
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?
तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हे याद है शुरु से अखिर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर
जोड़ घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियां?
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहां हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो?
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?
तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?
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Unknown
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लोकतंत्र का मंदिर नहीं कैदखाना है संसद-ब्रज की दुनिया
मित्रों,यह बहुत-ही बिडंबनापूर्ण है कि आज भारतीय जनता और जनाकांक्षा की सर्वोच्च प्रतिनिधि संसद ही भारतीय लोकतंत्र के स्वस्थ विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बन गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकतंत्र के मंदिर संसद को दागमुक्त करने की जो पहल संसद को खुद करनी चाहिए थी वो उच्चतम न्यायालय को करनी पड़ रही है। और यह नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब संसद उच्चतम न्यायालय के संसद के दामन को पाक-साफ करने के प्रयासवाले क्रांतिकारी और ऐतिहासिक फैसले को ही पलटने की तैयारी में है। अगर वह ऐसा करती है तो उसका यह कदम निश्चित रूप से पश्चगामी और यथास्थितिवादी कदम होगा। अगरचे संसद को अपने दामन पर लगे कलंक को धोने के प्रयास खुद करने चाहिए थे तो वह बेहद शर्मनाक तरीके से उन्हें बनाए और बचाए रखने की यथासंभव कोशिश कर रही है। ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि संसद की गरिमा को बढ़ाने या बनाए रखने की महती जिम्मेदारी किसकी है और किस पर है? अगर सांसद खुद ही संसद की गरिमा को गिराएंगे तो जनता के मन में उसके प्रति सम्मान कैसे,कहाँ से और क्यों पैदा होगा?
मित्रों,इसी प्रकार यह बेहद अफसोसनाक है कि भारतीय लोकतंत्र में जनमत का निर्माण और शासन का संचालन करने की महान जिम्मेदारी जिन राजनैतिक दलों के कंधों पर है वे अपनी अकूत आमदनी का हिसाब-किताब देने से भाग रहे हैं। जबकि कुछ अपवादों के साथ पूरे भारत के पूरे सरकारी-तंत्र को सूचना का अधिकार (बिहार सहित कहीं-कहीं कागजी ही सही) के दायरे में ला दिया गया है तो फिर खुद के 'जनरंजन-चरण-कमल' (पढ़ें और समझें महाप्राण निराला की प्रसिद्ध कविता 'राम की शक्ति पूजा') होने का दावा करनेवाले राजनैतिक दलों को भी सूचना के अधिकार की सीमा में होना ही चाहिए। हमारे तंत्र में पारदर्शिता का होना जितना जरूरी है कहीं उससे ज्यादा आवश्यक है तंत्र के वास्तविक संचालनकर्त्ता राजनैतिक दलों का पारदर्शी होना क्योंकि वे वर्तमान काल में भ्रष्टाचार की गंगोत्री बन गए हैं। राजनैतिक दल किसी भी दृष्टि से निजी कंपनी या संपत्ति नहीं हो सकते क्योंकि वे सिर्फ और सिर्फ जनता के विश्वास और चंदे से संचालित होते हैं। अब जबकि भारत के मुख्य सूचना आयुक्त ने सभी राजनैतिक दलों को जनता को वांछित सूचना देने के लिए सूचना अधिकारियों की नियुक्ति करने और प्रार्थियों को वांछित सूचना उपलब्ध करवाने का आदेश दिया है तब सारे-के-सारे राजनैतिक दल (तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर) सूचना देने से बचने की फिराक में सारे मतभेदों और मनभेदों को भुलाकर एकजुट हो गए हैं। वे लोग संसद से ऐसा विधेयक पारित करनेवाले हैं जिससे देश के सारे राजनैतिक दल सूचना का अधिकार के अधिकार-क्षेत्र से ही बाहर हो जाएंगे और उनको अपने लाखों करोड़ के आय-व्यय का ब्योरा नहीं देना पड़ेगा। इतना ही नहीं संसद में एम्स सहित विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में आरक्षण-संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को भी पलटने की तैयारी भी चल रही है।
मित्रों,आप ही बताईए कि अगर संसद इस तरह के पश्चगामी कानून बनाती है तो फिर कैसे जनता के मन में उसके प्रति सम्मान बढ़ेगा और कैसे उसकी गरिमा बढ़ेगी? अगर संसद के ऐसे क्रियाकलापों को ही लोकतंत्र और उसका विकास कहते हैं तो फिर क्या जरुरत है देश में ऐसे लोकतंत्र की? क्यों नहीं ऐसे लोकतंत्र का सर्वनाश हो जाना चाहिए?क्या करेंगे हम ऐसे लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाकर जिनके संचालकों के मन में देशहित की भावना है ही नहीं, जिनके हृदय में किसी देशभक्त का दिल नहीं धड़कता बल्कि जिनके जिस्म में सिर्फ महास्वार्थी व दरिन्दे भेड़िये का दिमाग है?
मित्रों,अभी हमारा प्यारा देश चहुमुखी-बहुमुखी संकट के मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ विकट आर्थिक संकट डरा रहा है तो दूसरी तरफ चीन-पाक की सीमा पर गुस्ताखी है तो वहीं तीसरी तरफ है बढ़ती बेरोजगारी और चौथी तरफ है अमीरी-गरीबी के मध्य लगातार बढ़ती खाई और पाँचवी,छठी,सातवीं तरफ है भुक्खड़ों की बढ़ती संख्या,नक्सलवाद,जनसंख्या-विस्फोट,आतंकवाद और जानलेवा महँगाई।
मित्रों,मैं नहीं समझता कि हमारी संसद या हमारा लोकतंत्र इन हिमालय सरीखी चुनौतियों से निबटने में सक्षम है। क्या करेंगे हम ऐसे लोकतंत्र को लेकर? क्या अँचार डालेंगे उसका या गले में ताबीज बनाकर पहनेंगे उसको? हमारी संसद और हमारा लोकतंत्र इस कदर पंगु और बेकार हो चुका है वो छोटे-से-छोटे संकट का भी सामना नहीं कर सकता इन बड़े संकटों का सामना करना तो उसके लिए दूर की कौड़ी ठहरी। लोकतंत्र वही सफल और दीर्घजीवी हो सकता है जो जनता की ईच्छाओं का सम्मान करे और बदलते वक्त के अनुसार खुद को बदलता रहे। जो लोकतंत्र बदलती जनाकांक्षाओं के अनुरूप खुद को नहीं बदलता है इतिहास गवाह है कि वह निश्चित रूप से अकाल-मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वास्तव में असलियत यह है कि हमारी संसद अब लोकतंत्र का मंदिर नहीं रह गई है बल्कि उसने हमारे लोकतंत्र को कैद कर लिया है और वह लोकतंत्र का कैदखाना बन गई है और लोकतंत्र को उसके जेलखाने से मुक्त करवाने की महती जिम्मेदारी अब हम जनता को ही निभानी पड़ेगी। दोस्तों,जो लोकतंत्र देश को फिर से गुलामी की अंधेरी सुरंग में धकेल दे क्यों नहीं उसको समाप्त हो जाना चाहिए और उसके अवशेषों पर किसी नई शासन-प्रणाली को स्थापित किया जाना चाहिए जैसे कि अध्यक्षीय शासन-प्रणाली।
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ब्रजकिशोर सिंह
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4.8.13
jindagee ke udaas lamhon mein
तेरा याराना याद करता हूँ।
तू मुझे फिर से मिल सके न सके
मैं तेरे दम से आह भरता हूँ।
मेरी गजलों से गिला
तो नहीं किसी को कोई ,
सोचता हूँ तो
बहुत डरता हूँ।
कौन कहता है कि
घायल है निगाहों से तेरे ,
मैं तो बस
देखते ही मरता हूँ।
ठीक उस वक्त ही
दरिया को सूझता है शबाब ,
जब गमे इश्क
में उतरता हूँ।
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Dr Om Prakash Pandey
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2.8.13
पगथिया: चुटकी
पगथिया: चुटकी: चुटकी
अध्यापक :- मुगलकाल के बारे में एक पंक्ति बोलो
छात्र :- दुर्गाशक्ति का निलंबन सही
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Anonymous
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31.7.13
reenakari: एकता में भिन्ताजिंदगी गुजरते जा रही है पर वक़्...
reenakari: एकता में भिन्ता
जिंदगी गुजरते जा रही है पर वक़्...: एकता में भिन्ता जिंदगी गुजरते जा रही है पर वक़्त ठहर गया सिमटा सा एक पल भवर बन गया जीवन की कश्ती डूबती जा रही ...
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malik
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ASHUTOSH VERMA
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ASHUTOSH VERMA
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30.7.13
reenakari: साथी चेहरा जो कोई ओझल हो गया ओड़ कर ओड...
reenakari:
साथी
चेहरा जो कोई ओझल हो गया ओड़ कर ओड...: साथी चेहरा जो कोई ओझल हो गया ओड़ कर ओडनी उसका साथी भी सो गया निर्जीव सा रहा वो जीवधारियों में एक के बाद...
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malik
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मुहब्बत मिट नहीं सकती …………।
मुहब्बत अमर कहानी है, मुहब्बत मिट नहीं सकती।।
मेरे दिल में - बसी हो तुम, तेरे दिल में - बसा हूँ मैं
तडफता मैं - अकेले में, तड़फती तुम - अकेले में
तेरी मंजिल - है मुझ से, मेरा मुकाम-है तुम पर
जमाने के - हटकने से, मुहब्बत टल नही सकती ……
मेरा हर ख़्वाब तेरा है, तेरा हर ख़्वाब - है मुझ से
ना खुद को रोक पाती तुम, ना खुद को रोक पाया मैं
तेरी हर साँस मुझ से है: मेरी हर आस है तुम पर
जमाने से - डर कर के, मुहब्बत रुक नहीं सकती …….
तुम्हारा साथ है पथ में, तो मंजिल दूर नहीं लगती
तुम्हारा प्यार है दिल में, तो साँसे थम नहीं सकती
मुझे विश्वास तुम पर है, तुझे विश्वास है मुझ पर
जमाने के - बवन्डर से, मुहब्बत हिल नहीं सकती ……
सफर पर चल पड़ा था मैं, निभाया साथ तुमने भी
कसम खायी थी मेने भी, किया वादा है तुमने भी
मेरी तक़दीर तुम पर है, तेरी तजबीज है मुझ पर
ज़माने के बदलने से, मुहब्बत बदल नहीं सकती ……
मेरे रँग में - रँगी हो तुम, तेरे रँग में - रँगा हूँ मैं
मेरे बिन- तुम अधूरी हो, तेरे बिन- मैं अधुरा हूँ
तेरी धडकन -है मुझ से ,मेरी धडकन- है तुझ पर
जमाने के- कड़कने से, मुहब्बत मिट नहीं सकती ……
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29.7.13
लाइलाज और जानलेवा लीवर कैंसर में बुडविग उपचार का चमत्कारी प्रभाव
A mail from Liver Cancer Patient from Bangalore -
Respected Dr. Verma,
Many many thanks for consulting my mother and showing us great healing path.
Mummy was feeling much better today. I think the coffee enema is the biggest contributor in her feeling well.
Q1. Should we give coffee enema, 1 morning and 1 evening, to reduce itching?
Q2. Sauerkraut Juice is ready. I put the solution in a mixie, and then strained it through a thin loin cloth. I have got 2 ltrs (picture is attached). We all tasted a few drops and it is wonderful. It has a rejuvenating taste. How much should mummy take at a time?
Thanks and regards,
xxx
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Shri Sitaram Rasoi
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28.7.13
27.7.13
जागो हिन्दुओं जागो-ब्रज की दुनिया
मित्रों,क्या आपने कभी विचार किया है कि देश के इन हालातों के लिए कौन जिम्मेदार है? कहते हैं कि लोकतंत्र में यथा प्रजा तथा राजा का नियम काम करता है। हमारे लुटेरे छद्म धर्मनिरपेक्ष सियासतदानों ने पहले आरक्षण के नाम पर बहुसंख्यक हिन्दुओं को आपस में लड़वाया फिर पूरे भारत को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में बाँट दिया। आज हम हिन्दुओं की स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि हमारे देश का प्रधानमंत्री लाल-किले से खुलेआम ऐलान करता है कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। पारसी,इसाई,बौद्ध,जैन और सिक्खों की स्थिति तो पहले से ही हिन्दुओं से अच्छी है। तो फिर इसका तो यही मतलब हुआ कि ऐसा कहके और करके केंद्र सरकार सिर्फ मुसलमानों को खुश करना चाहती है। आज हम अपनी मातृभूमि-आदिभूमि हिन्दुस्थान में मंदिरों में लाऊडस्पीकर और घंटे-घड़ियाल तक नहीं बजा सकते (उदाहरण के लिए हैदराबाद का भाग्यलक्ष्मी मंदिर)। आज ही उत्तर प्रदेश के मेरठ में मंदिर में लाऊडस्पीकर बजाने पर मुसलमानों ने मंदिर पर हमला कर दिया जिसमें दो लोग मारे भी गए। ऐसा कब तक चलेगा? हमने तो कभी नहीं रोका उनको नमाज पढ़ने या अजान देने से फिर वो क्यों हम पर गोलियाँ चलाते हैं? इतिहास गवाह है कि दंगे चाहे भागलपुर में हुए हों या गुजरात में,शुरू हमेशा मुसलमान ही करते हैं।
मित्रों, लाल किले से ऐसा कहकर और मुसलमानों के लिए अलग से विशेष योजनाएँ चलाकर हमारे ही वोटों से चुनी गई हमारी केंद्र सरकार ने हमें हमारे ही देश हिन्दुस्थान में द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना दिया है। अंग्रेजों के जमाने से ही भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए आपराधिक कानून या संहिता तो एक है लेकिन दीवानी कानून या नागरिक संहिता अलग-अलग हैं। यह घोर दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के बाद भी जो भी संशोधन और बदलाव हमारी सरकारों ने किए सिर्फ और सिर्फ हिन्दू उत्तराधिकार कानून और विवाह कानून में किए मुगलकाल से चले आ रहे तत्संबंधी इस्लामिक कानूनों को कभी छुआ तक नहीं गया। हिन्दू पुरूष एक विवाह करे और मुसलमान पुरूष चार फिर क्यों नहीं मुसलमानों की जनसंख्या ज्यादा तेजी से बढ़ेगी? बीच में स्व. संजय गांधी ने 1974-77 में जबरन नसबंदी के प्रयास भी किए लेकिन उनको भी दूसरी बार सत्ता में आने के बाद अपने कदम पीछे खींचने पड़े। मैं सर्वधर्मसमभाव पर अमल का दावा करनेवाली केंद्र सरकार से जानना चाहता हूँ कि क्यों सारे सुधार और संशोधन हिन्दुओं के विवाह और सम्पत्ति कानून में ही किए जाते हैं,मुसलमानों के कानूनों को क्यों नहीं बदला जाता है? ٍक्यों बार-बार सारे-के-सारे प्रतिबंध हिन्दुओं पर ही लादे जाते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्तमान और पूर्व की केंद्र सरकारों की इस प्रवृत्ति पर कई बार सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सरकारों को समान नागरिक संहिता लागू करने परामर्श दिया है लेकिन सब बेकार।
मित्रों,इसी तरह अंग्रेजों के जमाने से ही हिन्दू मंदिरों पर तो सरकार का कब्जा और नियंत्रण है मगर मस्जिदों,दरगाहों और कब्रगाहों पर शिया या सुन्नी वक्फ बोर्ड का। जब सरकार या दूसरों के पैसों से हज करना शरियत के अनुकूल नहीं है तो फिर क्यों केंद्र सरकार मुसलमानों को हज-सब्सिडी दे रही है और क्यों भारतीय मुसलमान इसका लाभ उठा रहे हैं? अमरनाथ या कैलाश-मानसरोवर-यात्रा पर हिन्दुओं को क्यों सब्सिडी नहीं दी जा रही है? क्यों हिन्दू मंदिरों के खजाने पर कोर्ट-कानून का डंडा चलता है और क्यों मुस्लिम दरगाहों की कमाई को सरकार के अधिकार-क्षेत्र से बाहर रखा गया है?
मित्रों,हम यह भी जानना चाहते हैं कि कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार राहुल गांधी किस धर्म को मानते हैं? क्या वे हिन्दू-धर्म को मानते हैं? अगर वे किसी दूसरे धर्म को मानते हैं तो फिर क्या गारंटी है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वे हिन्दुओं का खास ख्याल रखेंगे और अल्पसंख्यक-फर्स्ट की कुत्सित नीति पर नहीं चलेंगे? हम यह भी जानना चाहेंगे कि राहुल गांधी के गोहत्या के बारे में क्या विचार हैं? वे इसका समर्थन करते हैं या विरोध? क्या उन्होंने कभी गोमांस-भक्षण किया है या वे अब भी गोमांस खाते हैं? क्या सोनिया गांधी ने कभी गोमांस खाया है या अब भी वे उतने ही चाव से इसका सेवन करती हैं?
मित्रों,हमारे गाँवों में एक कहावत बड़ी ही मकबूल है कि जो खाए गाय का गोश्त,वो हो नहीं सकता हिन्दुओं का दोस्त। अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि कौन हम हिन्दुओं का शुभचिंतक है और कौन नहीं? चाहे वो गोहत्या पर से कर्नाटक में पाबंदी हटानेवाला सिद्धरमैया हो या उत्तर प्रदेश में नए बूचड़खानों के लिए टेंडर मंगवानेवाला अखिलेश यादव,ये लोग कभी हिन्दुओं के दोस्त या हितचिंतक हो ही नहीं सकते। इतना ही नहीं हम प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ काफी तेज कदमों से बढ़ रहे श्रीमान् नरेंद्र मोदी जी से भी स्पष्ट शब्दों में यह जानना चाहते हैं,बल्कि हम उनके मुखारविन्द से यह सुनना चाहते हैं कि वे प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बनने के बाद संसद से गोहत्या पर रोक लगाने का कानून बनवाएंगे।
मित्रों,जबकि 85 प्रतिशत मुसलमान पहले से ही आरक्षण के दायरे में हैं फिर भी मात्र 15 प्रतिशत अगड़े मुसलमानों को आरक्षण देने की जी-तोड़ कोशिश की जा रही है। क्या अगड़े मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए पिछड़ी जाति के हिन्दू जिम्मेदार हैं? फिर क्यों उनका कोटा कम करके अगड़े मुसलमानों को संविधान की खुलेआम अनदेखी करते हुए धर्म के आधार पर आरक्षण देने की नापाक कोशिश की जा रही है?
मित्रों,हमारे छद्म धर्मनिरपेक्ष नेता आज देश पर मरनेवालों पर आँसू नहीं बहाते,उत्तराखंड में उनकी लापरवाही के चलते मारे गए हजारों बेगुनाह हिन्दुओं की लाशों पर भी आँसू बर्बाद नहीं करते बल्कि वे आँसू बहाते हैं मुस्लिम आतंकियों की मौत और गिरफ्तारी पर। क्या इसको सर्वधर्मसमभाव का नाम दिया जा सकता है? क्या इस तरह की आत्मघाती रणनीति अपनाकर देश से आतंकवाद का खात्मा किया जाएगा?
मित्रों,कुल मिलाकर इस सारी मगजमारी का लब्बोलुआब यह है कि देश की दुर्दशा इसलिए हो रही है क्योंकि इस देश के बहुसंख्यक अर्थात् हिन्दू एक नहीं हैं। कम-से-कम हिन्दुओं को तो इस संकट-काल में देशहित में एक हो ही जाना चाहिए और अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर वो दिन दूर नहीं जब इस देश का एक नाम हिन्दुस्थान या हिन्दुस्तान न होकर चीन या पाकिस्तान हो जाएगा। आज नेफा से लेकर राजस्थान तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे हिन्दुस्थान को कांग्रेस की लुटेरी और देशबेचवा सरकार ने अपनी शत्रुतापूर्ण नीतियों के चलते खतरे में डाल दिया है। चूँकि हमारा धर्म इस देश और पृथ्वी पर सबसे पुराना धर्म है इसलिए इस देश की अस्तित्व-रक्षा के प्रति अगर किसी की पहली जिम्मेदारी बनती है तो वो हम हिन्दुओं की। वैसे अगर दूसरे धर्मवाले देशभक्त भी इस परमपुनीत कार्य में अपना महती योगदान देना चाहें तो हम तहेदिल से उनका स्वागत करेंगे। और हिन्दुओं को भी एक कुछ इस तरह से होना चाहिए कि हमारे देश की एकमात्र बहुसंख्यकवादी राष्ट्रीय पार्टी भाजपा को अकेले ही दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हो जाए और अल्पसंख्यकवादी देशबेचवा नेताओं की दाल चुनावों के बाद किसी भी सूरत में गलने नहीं पाए।
मित्रों,हम हिन्दू एक होंगे तो न केवल अपने देश में ही हमारे धर्माम्बलंबियों की स्थिति सुधरेगी बल्कि हमारे पड़ोसी देशों में भी हिन्दुओं की स्थिति में सुधार आएगा। तब पाकिस्तान में हिन्दुओं की बहु-बेटियों का दिन-दहाड़े अपहरण नहीं होगा और उनको अपनी मातृभूमि छोड़कर प्राण-प्रतिष्ठा बचाकर भारत नहीं भागना पड़ेगा। हमें हमेशा यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि दुनिया में भारत के अलावा ऐसा कोई दूसरा देश नहीं है जहाँ कि बहुसंख्यकों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनकर रहना पड़ता हो।
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ब्रजकिशोर सिंह
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26.7.13
जानता हूँ क्या उचित है पर करने की इच्छा नहीं है !
भारत आज जिस समस्या से पीड़ित है उसमे गरीबी मुख्य समस्या बन गई है। नीति
और शास्त्र कहते हैं कि भूखा व्यक्ति पुन्य और पाप के पचड़े में नहीं पड़ता है वह तो
पेट भरने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है कैसा भी पाप हो वह उसे करने
के लिए तैयार रहता है और इस महामारी का ईलाज आज तक कोई भी राजनीतिज्ञ
खोजने में असक्षम रहा है ,इसके कुछ कारण है -पद का लोभ, इच्छाशक्ति का
अभाव, निजी स्वार्थ, देश प्रेम की भावना में गिरावट।
कोई भी सरकार इस पीड़ा को ढकना चाहती है और ढकने मात्र से फोड़ा ठीक
नहीं होता है उलटे उसमे मवाद पड जाती है। वर्तमान सरकार तो इस पीड़ा को ढकने
के लिए विरोधाभासी योजनायें और आंकड़े रचने में व्यस्त है ,सरकार एक बार यह
स्वीकार कर ले कि इस देश में वर्तमान में गरीबी विकराल रूप ले चुकी है और यह
घटने की जगह बढ़ रही है तो इसको ठीक करने के उपाय भी मिल जायेंगे लेकिन
सरकार में इच्छाशक्ति और सत्य को स्वीकार करने का साहस नहीं रहा है इसलिए
वह आंकड़ो का जाल बिछाती है और प्रजा के रोष को बढाती है।
क्या जिसका पेट भरा है वह अपराध करेगा ?किसी भी कोम का गरीब व्यक्ति
जब पेट भरने के,रोजी रोटी कमाने के सभी रास्ते खुद के लिए बंद देखता है तो वह
अनैतिक और गेरकानुनी काम करने के रास्ते को सुगम समझ उस ओर मज़बूरी से
चलने को बाध्य हो जाता है।
हम पढ़े लिखे और अपने को निपुण समझने वाले लोग गरीबी और उसकी मज़बूरी
को समझने में जब तक असफल रहेंगे तब तक विघटनकारी तत्वों को रोक पाने में
असफल रहेंगे। गरीब चाहे किसी भी धर्म का हो उसे योग्य राह नहीं मिलने पर भटक
जायेगा यह वास्तविकता है।
गरीब लोग पेट भरने के लिए अपना मत भी बेचने में नही झिझकता और उसकी
कमजोरी का तुच्छ स्वार्थी नेता फायदा उठाते हैं। चुनावों के समय लालच देकर वोट
पा लेना उनको भी सुगम रास्ता लगता है।
दूसरी बात बेरोजगारी की है। हमारी सरकार करोडो युवाओं को रोजगार देने में
फिस्सडी साबित हो रही है और गुणवत्ता युक्त शिक्षा देने में नाकारा साबित हो रही है
आज पढ़े लिखे लोग बेरोजगारी का दंश भोगते हैं और समाज के ताने सुनते हैं। उनके
हाथ में थमाई गई डिग्रियां उनका और उनके परिवार का पेट भरने में नाकामयाब हो
रही है और इसका परिणाम यह आता है कि युवा हताशा और निराशा से गैरकानूनी
काम करने को मजबूर हो जाता है।
कानुन अपराध को रोकने के लिए दण्डका विधान करता है पर यह चिंतन कोई
नहीं करता है कि आपराधिक प्रवृति का उन्मूलन कैसे हो? क्या दण्ड से सुपरिणाम
पाए जा सकते हैं ? अगर यही सर्वश्रेष्ठ उपाय होता तो चरित्र और सदाचार का निर्माण
करना कहाँ जरूरी था ,सब चीजें दण्डसे व्यवस्थित हो जाती।
स्वामी बुधानन्द ने अपनी पुस्तक में समस्या का मूल कारण लिखा है -
जानामि धर्मं न च मे प्रवृति:
जानाम्यधर्मं न च मे निवृति: (पाण्डवगीता )
--मैं जानता हूँ की धर्म क्या है ,उचित क्या है ,अच्छा क्या है परन्तु उसे करने में मेरी
प्रवृति नही है और मैं यह भी जानता हूँ की क्या अनुचित है ,अधर्म है,बुरा है,पाप है ,
परन्तु उसे किये बिना रह नहीं पाता।
आज देश के कर्णधार,शासक,पढ़े लिखे सभी यही तो कर रहे हैं। राजनीती वाला
कानून सिखाता है ,अर्थशास्त्री नीतिदिखाता है, समाज सुधारक राजनीती के गुर
पढाता है………………. फिर भी हम कल्याण की चाह रखते हैं यह बड़ा आश्चर्य है !
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Labels: chintan
25.7.13
किसानों को 2-3 रूपये का मुआवजा चेक
‘जय जवान, जय किसान’ वाले देश में बाढ़ पीढ़ित गरीब किसानों को मुआवजे के तौर पर 2 व 3 रूपये के चेक भी मिल रहे हैं। चौंकना लाजमी है। इतने रूपये में किसानों की तकदीर संवरेगी या वह अपनी बर्बाद फसल की भरपाई कर लेंगे यह मुमकिन तो नहीं है, लेकिन सरकार के हिसाब से है तभी वह कर भी रही है। यह मुआवजा उन किसानों को है जिनकी फसल प्राकृतिक आपदा के चलते खराब हो गई थी। मुआवजे के लिये किसानों ने 1 साल का लम्बा इंतजार भी किया। प्रकरण23.7.13
सच बोलना है पर घेरे के अन्दर
जब एक बच्चे को अध्यापक बनाया तो बच्चा अध्यापक का स्वांग रच कर क्लास में
आया और बोला-अब मैं मास्टर बन चूका हूँ इसलिए मैं जो कहूँ उसे ध्यान से सुनो -
आज तक मेरे से पीछे वालों ने एक काम नहीं किया ,क्या आपको मालुम है ?
बच्चे बोले -नहीं मालुम।
मास्टर बोला-आज तक देश के सामने किसी ने सच नहीं बोला ………………
बच्चों ने जम कर तालियाँ बजाई तो मास्टरजी बोले -..............लेकिन अब सच बोलना
है।
बच्चे मायूस हो गए। उनमे से एक बोला- सर ,किसी ने हेराफेरी पर बात की तो सही
नाम उगल दूँ ?
दूसरा बच्चा बोला-कोई पिछली चोरी पर बात करे तो क्या सही सही बयान कर दूँ ?
तीसरा बोला- कोई घोटाले की रकम किसके पास है पूछे तो बता दूँ ?
चौथा बोला- आज तक के फर्जीवाड़े का ढोल पीट दूँ ?
पाँचवा बोला - क्या रिश्ते नाते के झूठ भी उघाड़ कर रख दूँ ?
मास्टरजी बोले -……चुप ! सच बोलना है पर घेरे के अन्दर रहकर।
बच्चे बोले -मतलब ?
मास्टरजी ने समझाया - तुम्हारे से कोई अपराध हो गया तो घेरे में आकर सच
बता देना ताकि उसका तोड़ ढूंढ़ लिया जाए अगर घेरे में झूठ बोला तो झूठा
कहलाओगे। समझ गए
बच्चे बोले -हाँ जी।
मास्टर जी ने आज की क्लास शांतिपूर्वक खत्म कर दी।
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सावन में डाक से घर बैठे पायें काशी विश्वनाथ और महाकाल का प्रसाद - कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ
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Labels: KK Yadav, Post Offices, कृष्ण कुमार यादव
22.7.13
सफलता और इच्छाशक्ति
इस विश्व में अरबों लोग निवास करते हैं उनमें कुछ सफल कुछ संघर्षरत और बड़ी संख्या
में असफल लोग जीवन जीते हैं,प्रश्न यह उठता है कि बड़ी संख्या में लोग असफल जीवन
क्यों जीते हैं ?क्या उनका जन्म असफल बनकर व्यतीत करने हेतु हुआ है या फिर वे लोग
सफल होना नहीं चाहते ? कौन ऐसा व्यक्ति है जो सफल जीवन जीना नहीं चाहता,कोई भी
नहीं।तो फिर असफल होने का कारण क्या ?हमारे अन्दर द्रढ़ इच्छा का अभाव।
सफलता की इच्छा और सफलता के लिए दृढ इच्छाशक्ति में गहरा अंतर है।
एक मशीन को चलाने के लिए मोटर उचित हॉर्स पावर की होनी आवश्यक है यदि मशीन
की आवश्यकता से कम HP की मोटर है तो मशीन काम नहीं कर पाएगी।ठीक इसी तरह
हर काम को सफलता से पूरा करने के लिए उचित इच्छा शक्ति का होना बहुत जरुरी है।
सामान्य इच्छा और दृढ इच्छाशक्ति
यदि कोई परीक्षार्थी इस आशय से परीक्षा की तैयारी करता है कि मुझे तो उत्तीर्ण होना है
तो उसके साथ अनुत्तीर्ण होने की सम्भावना भी जुड़ जाती है क्योंकि उत्तीर्ण होने के लियॆ
मानक अंक 36 % ही है और इस कारण उसकी तैयारी भी बहुत सीमित है।कम तैयारी
अपूर्णता का परिचायक है इसलिए असफलता की सम्भावना भी प्रबल हो जाती है।दृढ
इच्छा शक्ति वाला परीक्षार्थी परीक्षा की तैयारी अधिक से अधिक अंक अर्जित करने के
दृष्टिकोण से करता है इसलिए उसमे असफल होने की गुंजाइश नहीं रहती है।
हारा हुआ मन ,अधुरा मन और आत्मविश्वास से लबालब मन ये तीन स्थितियाँ
हम सबके पास हर समय विद्यमान होती है,यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किसी
काम की शरुआत किस मन के साथ करते हैं।हारा हुआ मन यह दिखाता है कि हम जिस काम
को करने जा रहे हैं उस काम के प्रति हम निषेधात्मक विचार रखते हैं और उस काम को करने
की तत्परता और तैयारी भी नहीं कर रखी है।किसी काम को करने से पहले ही हम सोच ले कि
इसमें सफलता नहीं मिलेगी तो उस काम के प्रति हमारी रूचि और श्रद्धा खत्म हो जाती है और
परिणाम भी हमने जो सोचा है वह तुरंत मिल जाता है
अधुरे मन की स्थिति हमे संशय में डाले रहती है।काम को करने से पहले यदि हम
अनिश्चय में रहते हैं और सफलता के बारे में शंकित रहते हैं तो परिणाम भी कभी संतोष
जनक नहीं मिलते।इस स्थिति में मन नाना प्रकार के विकल्पों में उलझा रहता है इससे
एकाग्रता प्रभावित होती है ,परिणाम स्वरूप हम जीवन में संघर्षरत जीवन जीते हैं।
आत्मविश्वास से भरा मन यह दर्शाता है कि हम हर काम को चुनौती के रूप में स्वीकार
करते हैं और उसे हर हाल में पूरा करना ही है इसी लक्ष्य को ध्यान में लेकर उस काम को
कैसे पूरा करना है ,के सूक्ष्म विश्लेष्ण में लग जाते हैं।किसी भी काम को करने से पहले
हम पूरी तैयारी कर लेते हैं तो हमारे मन में उत्साह और विश्वास का संचार लगातार होता
रहता है और हम बड़ी बाधाओं को भी पार कर जाते हैं
इच्छाशक्ति की उत्पत्ति कैसे होती है
स्वामी विवेकानंद कहते हैं "मनुष्य की यह इच्छा शक्ति चरित्र से उत्पन्न होती है और
वह चरित्र कर्मों से गठित होता है।अतएव,जैसा कर्म होता है इच्छाशक्ति की अभिव्यक्ति
भी वैसी ही होती है"
अगर हमारे कर्म दिव्य है तो हमारा चरित्र भी दिव्य होगा और चरित्र दिव्य है तो इच्छाशक्ति
भी दृढ होगी।अगर हमारी महत्वाकांक्षा बड़ी है तो उसे पूरा करने के लिए दृढ इच्छा शक्ति की
जरुरत पड़ेगी क्योंकि बड़े लक्ष्य को पाने के लिए जो रास्ता है उसमे बहुत सी बाधाएं और
विपदाएं निश्चित रूप से होती हैं इन बाधाओं और विपदाओं से लम्बे समय तक मुकाबला
करना है इसलिए दृढ इच्छाशक्ति जरुरी है।हर असफलता हमे अपने लक्ष्य के करीब ले जाती
है।बार -बार आने वाली विपदा यह इंगित करती है की इस रस्ते पर आगे बढ़ते रहे यही वो
रास्ता है जो लक्ष्य तक ले जाएगा। विपदाओं के बाद भी हमारा होसला ,उत्साह और जीवट
बना रहे इसलिए दिव्य इच्छाशक्ति का होना जरुरी है।
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21.7.13
संचार के सिद्धांत: संचार प्रक्रिया (Communication Process)
संचार के सिद्धांत: संचार प्रक्रिया (Communication Process): ¥æçη¤æÜ ×ð´ ¥æÁ ·¤è ÌÚUãU â´¿æÚU ×æŠØ× ÙãUè´ ÍðÐ §â·ð¤ ÕæßÁêÎ ×æÙß â´¿æÚU ·¤ÚUÌæ ÍæÐ ßÌü×æÙ Øé» ×ð´ â´¿æÚU ×æŠØ×æð´ ·¤è çßçߊæÌæ ·...
Posted by
Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)
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