----गंभीर बीमारी का इलाज करने के नाम पर किया जाता है धर्म परिवर्तन का खेल
30.6.23
ईसाई मशीनरी का प्रार्थना सभा बना मौत का अड्डा, इलाज कराने आए वृद्ध की मौत
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28.6.23
पब्लिक ऐप में रिपोर्टरो का जमकर शोषण
पब्लिक ऐप में रिपोर्टरो का जमकर शोषण किया जा रहा है और धमका कर काम कराया जा रहा है और इतना ही नही जुर्माना भी रोज लगाया जाता है जिसमे रिपोर्टर के काम की धनराशि से 50 से लेकर 200 रुपये तक काट लिए जाते है। इसके लिए बाकायदा धमकी भरा मैसेज भी ग्रुप में दिया जाता है । पब्लिक ऐप में काम करने वाले रिपोर्टरों को बेइज्जत भी किया जाता है और उत्तर प्रदेश भर में काम करने वाले पत्रकारों पर जुर्माना लगाने के बाद उनकी सूची भी ग्रुप में सार्वजनिक की जाती है कि कितना किस पर देर से खबर लगाने का जुर्माना लगाया गया, कितना खबर न लगाने पर लगाया गया ,कितना दूसरे तहसील की खबर पर लगाया गया है और जब चेतावनी दी जाती है तो भी स्पष्ट धमकी दी जाती है कि कारण स्पष्ट करो नही तो आई डी बन्द कर दी जाएगी या तो आप पर जुर्माना लगा दिया जाएगा।
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रिपब्लिक के एंकर पर 10 हजार रुपए का जुर्माना
अश्लील वीडियो बनाकर प्रसारित करने के मामले में 8 में से 7 पत्रकार न्यायालय में हुए पेश,आरोप तय पर बहस नहीं करने को लेकर कोर्ट ने लगाया रिपब्लिक के एंकर पर 10 हजार रुपए का जुर्माना
नाबालिका के वीडियो को अश्लील बनाकर प्रसारित करने के मामले में गत 31 मई को गुरुग्राम के पॉक्सो की अदालत में सुनवाई हुई,जिसमे 8 में से 7 आरोपी चित्रा त्रिपाठी,अजीत अंजुम, रिपब्लिक भारत के एंकर सैयद सोहेल,ललित सिंह, अभिनव राज,सुनील दत, राशिद सभी पेश हुए। न्यायालय की कार्यवाही में आरोप तय पर बहस जारी है। चित्रा त्रिपाठी, राशिद, अभिनव राज,अजीत अंजुम के वकीलों ने गत 18 अप्रैल को ही दलील पूरी कर ली है,बचे चार आरोपियों (दीपक चौरसिया, सैयद सोहेल,सुनील दत,ललित बडगुर्जर) के विरुद्ध आरोप तय पर बहस होनी थी। जानकारी के मुताबिक पिछली तीन तारीख से केस स्टडी नही करने का कारण बताकर बहस हेतु समय की मांग की जा चुकी है।
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लोकसभा चुनाव के लिये बिछने लगी बिसात, क्या खरगे बनेंगे विपक्ष की ट्रंप
केपी सिंह-
लोकसभा
चुनाव वैसे तो अगले वर्ष होने हैं लेकिन राजनैतिक माहौल अभी से गर्माने
लगा है। इसी बीच बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यू के नेता नीतिश कुमार
ने कहा है कि चुनाव के लिये अगले वर्ष के इंतजार में बैठना ठीक नहीं है
क्योंकि चुनाव का ऐलान कभी भी हो सकता है। कुछ और लोग भी लोकसभा चुनाव इसी
वर्ष संपन्न करा लिये जाने की अटकलें व्यक्त कर रहे हैं लेकिन अभी रामजन्म
भूमि मंदिर का उद्घाटन होना है जो अगले वर्ष जनवरी में प्रस्तावित है। इसके
पहले तो चुनाव होने से रहा। उधर भाजपा के एजेंडे में शामिल रहे समान
नागरिक संहिता को लागू करने के मसले पर एकाएक सरकार में तेजी आयी है और
उसका यह उतावलापन जाहिर करता है कि भले ही चुनाव इस वर्ष न हों लेकिन
रामजन्म भूमि मंदिर के लोकार्पण के बाद तत्काल निर्धारित समय से पहले चुनाव
करा लेने की तैयारी कहीं न कहीं सरकार की ओर से है। ऐसा मानने वाले
राजनैतिक प्रेक्षकों की धारणा यह है कि मोदी का करिश्मा फीका हो चला है
इसलिये केन्द्र सशंकित है इसलिये समान नागरिक संहिता लागू करने के साथ
रामजन्म भूमि मंदिर का उद्घाटन होते ही फिर उसके लिये मुफीद माहौल बनेगा
जिसमें देरी न करके समय से पहले फरवरी मार्च में ही चुनाव करा लेने का
फैंसला लिया जा सकता है। प्रतिपक्षी दल सरकार के इस संभावित पैतरे को लेकर
सतर्क रूख अपना रहे हैं इसलिये उन्होंने किसी भी समय चुनावी युद्ध में
कूंदने की मानसिकता बना ली है और इसके लिये अपनी रणनीति तय कर डाली है भले
ही इसका खुलासा न किया जा रहा हो।
भाजपा को शिकस्त देने के लिये
प्रतिपक्ष के सोचने की जो पहली बात है वह भाजपा विरोधी मतों को बंटने न
देने या एकजुट करने की है इसके लिये सारे प्रतिपक्षी दलों का एक बड़ा मोर्चा
बनाने की जो बात है वह बहुत आसान नहीं है। कांग्रेस ने जब से कर्नाटक
विधानसभा का चुनाव मैदान जीता है तब से विपक्षी कुनबे में उसकी स्थिति
मजबूत हुयी है। जदयू, राजद और द्रमुक जैसे दल तो पहले से ही नेतृत्व उसको
सौंपने के लिये सहमत थे लेकिन ममता बनर्जी जैसे नेता भी पहले के रूख को
बदलते नजर आने लगे हैं। अखिलेश यादव को अभी भी कांग्रेस से परहेज है और वे
नीतिश की अगुवाई में मोर्चा गठित करने की ओर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे।
केसीआर की मानसिकता क्या रहेगी। स्वयं कांग्रेस नेतृत्व के सवाल पर क्या
रूख अपनायेगी यह भी अभी स्पष्ट नहीं है। पश्चिम बंगाल में मोर्चा कैसे काम
करेगा यह भी एक बड़ा सिर दर्द है। कांग्रेस, वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस
तीनों का पश्चिम बंगाल में सीटों के बटवारे को लेकर तालमेल पर मंथन एक
म्यान में तीन तलवारें डालने जैसा है। केरल को लेकर कांग्रेस और वाम मोर्चा
के बीच भी टकराव रहेगा। मोदी द्वारा प्रतिपक्षी दलों के लिये अस्तित्व का
सवाल बना दिये जाने को देखते हुये पहले उन्हें हटाने की जरूरत बड़ी होने को
तो सभी दल स्वीकार कर रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि इस खातिर अन्य बातें
भुलाने को कोई तैयार हो। खास तौर से कांग्रेस इस बात को झेल चुकी है कि
गर्दिश के समय भाजपा के अलावा प्रतिपक्षी दलों ने भी उसे आप्रासंगिक करार
देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी इसलिये वह विपक्षी कुनबे को एहसास कराना
चाहती है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प के रूप में लोग उसी का वजूद
मानते हैं और इस हकीकत को नकारना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
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राज्य सूचना आयोग ने कुलसचिव,कुलपति महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से किया जवाब तलब।
वाराणसी: राज्य सूचना आयोग के आयुक्त अजय कुमार उत्प्रेति ने सुधांशु कुमार सिंह के द्वारा दायर द्वितीय अपील को स्वीकार करते हुए जनसूचना अधिकारी/कुलसचिव एवम् प्रथम अपीलीय अधिकारी कुलपति महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से अपना लिखित अभिकथन दिनांक:17.07.23 को प्रस्तुत करने हेतु निर्देशित किया है।
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सहारा मीडिया में महा छँटनी अभियान की गुप्त ब्लूप्रिंट तैयार
सहारा मीडिया में गुप्त तरीके से आधे से ज्यादा कर्मचारियों की छँटनी की योजना को अमली जामा पहनाया जा रहा है। सहारा मीडिया में छँटनी के इस अभियान की बागडोर परिवार सहित दुबई बसे सुब्रत रॉय के छोटे भाई जयब्रत रॉय ने संभाली है। जब सहारा के उच्चाधिकारियों पर ताबडतोड पुलिस केस और मुकदमे हो रहे थे, तब जयब्रत रॉय ने दुबई का रुख किया था । अब जयब्रत रॉय वापस भारत आ पहुंचे हैं और आजकल छँटनी के एजेंडे से नोएडा कैंपस में कैंप किए हुए हैं। जयब्रत रॉय पहले इसी प्रकार के अभियान को मुंबई में सफलता पूर्वक अन्जाम दे चुके हैं और जॉब (Job) रद्द रॉय के नाम से प्रसिद्ध हैं।
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जल्द होगा मुरादाबाद जर्नलिस्ट क्लब का पुनर्गठन
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2024 चुनाव की डगर ....विपक्ष के लिए कितनी आसान कितनी मुश्किल?
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बौद्धिक जागरण का उदगाता गीत प्रेस
डाॅ मयंक मुरारी-
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27.6.23
कर्नाटक के बाद तेलंगाना साधने की कांग्रेस की तैयारी
विजय सिंह, 27 जून
कांग्रेस के युवराज और भाजपा के पप्पू राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को अप्रत्याशित सफलता मिलने के बाद, कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की शानदार जीत अब तेलंगाना में के.चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ पार्टी भारत राष्ट्र समिति ( बीआरएस पूर्व नाम - तेलंगाना राष्ट्र समिति ,टी आर एस ) और भाजपा नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने की सुगबुगाहट के साथ ही 2023 में दक्षिण भारत के आसन्न चुनावी राज्य तेलंगाना में कांग्रेस को पुनर्जीवन के लिए ऑक्सीजन की नई खेप मिलने के संकेत शुरू हो गए हैं।
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टाइगर इन मेट्रो : ब्रशस्ट्रोक व जीवंत रंगों के माध्यम से बाघ को बचाने का संदेश
प्रदेश के वरिष्ठ कलाकार जय कृष्ण अग्रवाल समेत सैकड़ों लोगों ने किया टाइगर इन मेट्रो का अवलोकन ।
लखनऊ , 27 जून 2023, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के हजरतगंज मेट्रो स्टेशन पर इन दिनों दस दिवसीय टाइगर इन मेट्रो अखिल भारतीय पेंटिंग एवं छायाचित्रों की प्रदर्शनी चल रही है। यह प्रदर्शनी मेट्रो स्टेशन पर आने वाले सभी यात्रियों के लिए सबके आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। सेव टाइगर प्रोजेक्ट पर आधारित इस प्रदर्शनी में देश के 13 राज्यों के 42 फोटोग्राफर एवं चित्रकारों की 76 कलाकृतियों को शामिल किया गया है। पिछले चार दिनों में हजारों की संख्या में लोगों ने इस प्रदर्शनी का अवलोकन किया। कलाकारों के सृजनात्मकता और छायाचित्रकारों की कुशल फोटोग्राफी को लोग काफी पसंद कर रहे हैं साथ इसके पीछे कलाकारों के भाव की भी सराहना हो रही है। टाइगर इन मेट्रो प्रदर्शनी के क्यूरेटर भूपेंद्र अस्थाना ने बताया कि यह देश की पहली कला प्रदर्शनी है जिसमें देश के समकालीन कलाकार और छायाकार इतनी बड़ी संख्या में शामिल हुए हैं। यह टाइगर के जीवन के प्रति इनकी संवेदनशीलता और गहरी भावना का भी परिचय देता है।
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26.6.23
सुचेता कृपलानी की 115वीं जन्मतिथि पर संगोष्ठी
25 जून, नई दिल्ली। सुचेता कृपलानी भारतीय समाज, राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन और मानव सेवा का वह चमकता हुआ सितारा है जिसकी चमक कभी फीकी पड़ ही नहीं सकती। यह उद्गार वरिष्ठ पत्रकार नीलम गुप्ता ने स्वर्गीय सुचेता कृपलानी की 115वीं जन्म तिथि पर आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए। संगोष्ठी का आयोजन आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा किया गया था।
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18.6.23
फरमानो की नाफ़रमानी अफ़सरशाही का शग़ल रहा है !
सत्येंद्र कुमार
पहले के राजाओं महाराजाओं के राज्य और सल्तनतें भी काफी दूर दूर तक फैली होती थी । बड़े से बड़े और छोटे से छोटे सूरमाओं के सल्तनतों में हुक्म देने और हुक्म बजा लाने की फटाफट रवायत थी । हुक्म की नजरअंदाजी और नाफरमानी पर ऐसे कठोर दंड का प्रावधान था जिसे सोचकर रूह काँप जाती थी । शायद यही वजह थी कि हुक्म की नाफ़रमानी करने की मजाल किसी अफसरशाही में नही थी । आज के समय में भी देखा जाए तो अफसरशाही की मुश्कें कसने में पूर्व सी एम मायावती जितनी कामयाब रहीं शायद ही कोई और सी एम उतना कामयाब रहा हो ।
आज इस भीषण प्रचण्ड गर्मी में सूबे के मुखिया द्वारा बिजली विभाग को प्रदेश भर में निर्बाध तरीके से बिजली आपूर्ति का जो आदेश अभी कुछ दिन पहले ही दिया गया था, उस आदेश को भी बाकी आदेशों की तरह नाफ़रमान अफसरों के अहंकार और निकम्मेपन ने रद्दी में फेंक दिया है । जिलों में संचालित अवैध स्टैंड तथा अवैध शराब को लेकर जारी सी एम के आदेश का भी वैसा ही हश्र हुआ है, जैसा हश्र उन आदेशों का हुआ, जिसमे अधिकारियों को अपना सी यू जी नंबर खुद उठाने और 10 बजे सुबह कार्यालय पहुँच जाने के लिए आदेशित किया गया था।
आज यूपी में बिजली सप्लाई की बुरी हालत है । लखनऊ में भी चौदह चौदह घंटे की कटौती जोरों पर है । यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालत बदतर है । जिलों में भी चौदह से अट्ठारह घंटे की करामाती कटौती हो रही है । ग्रामीण क्षेत्रों में तो महज कुछ घंटे ही बमुश्किल बिजली मिल पा रही है । भीषण गर्मी में जनता गर्मी से चित्कार कर रही है और बिजली संकट का हाहाकार मचा हुआ है ।
स्थिति यह है कि हालात से उपजे बदहालियों औऱ मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद भी अफसर नहीं सुधर रहे हैं । आई. ए. एस. अफसरों ने बिजली विभाग का भट्ठा बैठा दिया है ।कहीं कोई कार्रवाई नहीं है और न ही किसी की कोई जबावदेही है । अफसरों के अहंकार और निकम्मेपन ने अन्य व्यवस्थाओं की तरह बिजली व्यवस्था को भी आज कितना पंगु बना दिया है इसका अहसास सबको हो चला है । बिजली विभाग में दर्जनभर से ज्यादा आई. ए. एस. तैनात हैं लेकिन फिर भी बिजली विभाग की मनमानी को नियंत्रित कर पाना टेढ़ी खीर बना हुआ है । बिजली व्यवस्था सुदृढ़ करने की बजाय काम में अड़ंगा लगाने और फाइलों से पैसा बनाने की अफ़सरशाही प्रवृत्ति और दिलचस्पी ने बिजली विभाग का बेड़ा गर्क कर दिया है। बिजली सप्लाई समान्य कैसे हो इसपर ध्यान नहीं है और मंत्री के एक्शन का भी अफसरों पर कोई असर नहीं है । भीषण गर्मी से पूर्व विभागीय तैयारियों का हाल ऐसा है कि गर्मी से पहले ट्रांसफार्मर्स के आयल तक नहीं बदले गए।
आदेशों को अनसुना करने की प्रवृत्ति यदि ऐसी ही बनी रही तो मूसलाधार बरसात से पूर्व बन्धों की मरम्मत की तैयारियों का भी बंटाधार होना तय है । हालात यह हैं कि ओवरलोडिंग और प्रॉपर मेंटेनेन्स के आभाव में रोजाना लगभग हजार से ज्यादा ट्रांसफार्मर दग जा रहे हैं और अफसरान हैं कि आपसी गुटबाजी और अहंकार में भ्रष्टाचार के नए नए कीर्तिमान गढ़ रहे हैँ । हुक्म की नाफ़रमानी वाली प्रवृति आज अफ़सरशाही में इतना भयंकर रूख अख़्तियार कर चुकी है कि नाफरमान अफ़सरशाही को जिल्ले इलाही , सुल्तान, महाराज जी या मुख्यमंत्री के फ़रमान की नाफ़रमानी का कोई खौफ़ बाकी नही रह गया है ।
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सत्येंद्र कुमार
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16.6.23
News18 Punjab/Haryana Presents Education Summit: Exploring the Future of Learning with Artificial Intelligence
News18 Punjab/Haryana Presents Education Summit: Exploring the Future of Learning with Artificial Intelligence
Chandigarh, 16th June, 2023 — News18 Punjab/Haryana, the No.1* news channel of the region, is thrilled to announce the Education Summit, a pioneering event aimed at fostering discussions on leveraging technology to revolutionize education. The summit will take place in Chandigarh on 17th June, serving as a platform for educators, experts, and thought leaders to delve into the transformative potential of Artificial Intelligence (AI) in the field of education.
The Education Summit will serve as a catalyst for exploring pioneering solutions and strategies that can revolutionize the quality of education. With a specific focus on the theme "Artificial Intelligence (AI) and the Future of Learning," the summit will delve into the potential of AI in reshaping the landscape of education, equipping students with the necessary skills for a rapidly evolving future.
With a strong focus on innovation and the enhancement of education quality, the Education Summit seeks to spark conversations and highlight the role of technology in shaping the future of learning. The event will showcase panel discussions featuring esteemed guests and representatives from renowned educational institutes in the region, including Dr. Ajay Batish, Deputy Director of Thapar Institute of Engineering & Technology; Dr. Lalit Awasthi, Director of NIT, Uttarakhand; Dr. Padmakumar Nair, Director of Thapar Institute of Engineering & Technology; Dr. Rajeev Ahuja, Director of IIT Ropar; Kanwardeep Kaur, Senior Superintendent of Police, Chandigarh; Group Captain (Retd.) Sangeeta Kathait; Kamal Wadhera, CEO of TCY Online; Dr. Manbir Singh, Pro Vice-Chancellor of C T University; Dr. VK Rattan, Vice-Chancellor of GNA University; and Lieutenant General (Retd.) Deependra Singh Hooda.
The Education Summit will delve into the myriad possibilities presented by AI and its impact on the future of education. Attendees can expect in-depth discussions on how AI can be harnessed to drive innovation, enhance teaching methodologies, and create a personalized learning experience for students. The summit will explore practical solutions and shed light on successful AI implementations in educational institutions.
Tune in to News18 Punjab/Haryana on 17th June at 5:30 PM to watch the Education Summit. This conclave is a testament to News18 Punjab/Haryana's commitment to promoting educational advancements and driving positive change in the region.
*Source: BARC, TG: 15+, Period: Wk 23'23, Market: Pun/Cha, AMA 000's, 5 Channels Considered
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जीवन रक्षक दवाओं के दाम 12%बढ़ाने का फैसला रद्द करो
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15.6.23
भास्कर को क्या हो गया
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नहीं करने का मैं तक़रीर, अदब से बाहर…
पंकज चतुर्वेदी-
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पिटे-खिसके हुए, फूके हुए कारतूसों व रंग-रंगीली होगी मोदी की चुनावी टीम
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14.6.23
प्रो शशिकला के खिलाफ शिकायत पर उप राष्ट्रपति सचिवालय ने लिया संज्ञान
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दैनिक जागरण आईनेक्स्ट प्रकाशन की मनमानी
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वर्दी की लालच और ठसक ने योगी सिटी में ले ली एक और जान
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Gautam Gambhir's Exclusive Interview Uncovers the Intersection of Cricket, Politics, and Controversies
During the interview, Gambhir expressed his unwavering dedication to the country, highlighting that he ventured into politics driven by a genuine desire to make a tangible difference, rather than seeking mere social media popularity. He emphasized the importance of action and ground-level work over empty tweets from air-conditioned rooms.
Shifting the focus to the Delhi government, Gambhir raised valid concerns about the promises made by the current administration and their lacklustre track record in fulfilling those promises. He questioned the lack of transparency surrounding the establishment of schools, colleges, and hospitals in the past eight years.
With a deep-rooted connection to Delhi, Gambhir highlighted his profound love for the city. He stressed the futility of engaging in self-praise, emphasizing that genuine achievements should be recognized by the public, not self-proclaimed.
Addressing the allegations against him, Gambhir dismissed them as baseless. He raised questions about the intentions behind the excise policy and the alleged diversion of funds for electoral purposes. Gambhir also voiced concerns about the government's failure to secure bail for its ministers, despite claims of innocence.
Reflecting on the transformative power of the Indian Premier League (IPL), Gambhir acknowledged its impact on shaping the future of cricket. He highlighted how the tournament has provided a platform for emerging talent and extended the careers of players.
Sharing his observations on Indian cricket, Gambhir expressed concern about the nation's individual-centric approach. He lamented the lack of team spirit and attributed India's failure to win an International Cricket Council (ICC) championship to this obsession with individual performances.
In an era dominated by social media, Gambhir cautioned against becoming consumed by virtual platforms and emphasized the need to maintain a healthy balance. He warned against relying on superficial validation from these platforms and highlighted the importance of avoiding addiction in any form.
Gambhir also revealed his principled stance on not succumbing to monetary incentives for creating biased narratives. He affirmed his commitment to utilizing funds for the betterment of the people, rather than indulging in self-serving storytelling.
Addressing the controversies surrounding the Ekana Stadium incident, Gambhir stood by his actions and expressed his support for Naveen ul Haq, emphasizing his unwavering commitment to righteousness and justice.
Setting aside personal differences, Gambhir expressed respect for his fellow cricketers, including Virat Kohli and MS Dhoni, emphasizing the importance of keeping on-field battles confined to the field and maintaining professionalism. He praised Yuvraj Singh as an underrated cricketer and voiced his opinion on the media's failure to adequately recognize Yuvraj's contributions to Indian cricket.
In conclusion, Gambhir highlighted how the media's obsession with individuals and marketing strategies has distorted the true essence of the game, overshadowing the accomplishments of deserving players.
*SOURCE: BARC | METRIC: AMA | TG: NCCS ALL 15+ | PERIOD: WK 22'23, 24 HOURS, ALL DAYS | MARKET: HSM
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सावधान: ऊपरवाला सब देख रहा है!
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13.6.23
उस बर्बरतम प्लान को दुनिया होलोकास्ट के नाम से जानती है!
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रामेश्वर पांडेय : मुह में ब्राम्हण और बगल में लाल झंडा
ब्राम्हणणवादी पत्रकारिता का बदबूदार उदाहरण थे रामेश्वर पांडेय
रामेश्वर पांडेय की अभी-अभी मृत्यु हुई है। मृत्यु एक सत्य है जो आया है वह जायेगा। भगवान का विधि विधान कहता है कि जो जिंदा में बुरा होता है वह मृत्यु के बाद भी बुरा ही होता है। इसीलिए पाप और पुण्य का विधि विधान भी है। लेकिन भडास नाम का एक मीडिया साइट और सोशल मीडिया पर जातिवादी ब्राम्हणों की टोली ने जिस प्रकार से रामेश्वर पांडेय की महिमा गायी है, झूठ का बीजारोपन किया है और जातिवाद तथा ब्राम्हणवाद का उदाहरण सामने लाया है उस पर चिंता करने की जरूरत है, व्याख्या करने की जरूरत है, मीडिया में आने वाली पीढी को यह बताने की जरूरत है कि कैसे मीडिया में ब्राम्हणवाद का खेल खेला जाता है, जाति के आधार पर किसी को कैसे महान पत्रकार बताया जाता है? रामेश्वर पांडेय का सच जानेंगे तो पायेंगे कि उनके मुंह में जाति बसी हुई है यानी कि ब्राम्हणवाद बसा हुआ है और हाथी की दांत की तरह कम्युनिस्ट बसा हुआ है।
रामेश्वर पांडेय का ब्राम्हणवाद मैंने सरेआम देखा है, उनके ब्राम्हणवाद का सरेआम स्रोता रहा हूं। घटना आज के कोई 20 साल पूर्व की है। मैं अपने एक परिचित पत्रकार के निमंत्रण पर उनके घर पर भोजन करने पहुंचा था। सत्य प्रकाश नाम का पत्रकार उस समय दैनिक जागरण में काम करता था। मैं जब सत्य प्रकाश के घर पर पहुंचा तो पता चला कि रामेश्वर पांडेय उनके घर पर विराजमान हैं। दैनिक जागरण में काम करने वाले एक अन्य ओझा ने अचानक यह प्रोग्राम रख दिया था। बेचारा सत्य प्रकाश को मजबूरी में अपने वरिष्ठ ओझा का कहना मानना पडा और उन्हें रामेश्वर पांडेय का स्वागत करना पड़़ा।
दारू और मांस का दौर चल रहा था। दारू जैसे-जैसे रामेश्वर पांडेय के कंठ से नीचे उतरती और मुर्गे की टांग और हड्डिया जैसे-जैसे उनके मुंह में जाती वैसे-वैसे उनका ब्राम्हणवाद जाग जाता, रामेश्वर पांडेय कहते कि मैंने जिंदगी भर ब्राम्हणों का कल्याण किया है, अमर उजाला ही नहीं बल्कि जिन-जिन अखबारों में काम किया उन-उन अखबारों में ब्राम्हणों को भरा, ब्राम्हणों की फौज खडी की, सिर्फ दिखावे के लिए एक-दो अन्य जातियों के लोगों को रखवाया और बाद में निकलवाया भी, अगर जगह नही ंतो फिर अन्य ब्राम्हणों की नियुक्ति भी कैसे कराता? जब दारू की नशा आसमान छूई और मुर्गे के मांस का स्वाद बढ़ा तो फिर उन्होंने अपने ब्राम्हणवाद की नयी-नयी जानकारियां देनी शुरू कर दी। उन्होंने कहना शुरू किया कि कैसे वे पत्रकारिता का उपयोग ब्राम्हणों को अच्छी जगह स्थानांतरण कराने, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के प्रकोप से बचाने के लिए काम किया। मैं तो हदप्रभ तब हुआ जब वे अखबारों के मालिकों के बारे में अपने ज्ञान का प्रसार करने लगे। रामेश्वर पांडेय ने ज्ञान दिया कि ये साले बनिया बहुत हरामी होते हैं, इन्हें ठीक तरह से हैंडिल करो, इन्हें भाई साहब बोलो फिर ये बनिये आपके गुलाम हो जायेंगे और पंडित जी कहकर आपकी चरणवंदना करेंगे। देश में प्रकाशित होने वाले 95 प्रतिशत बडे अखबार और बडे चैनल बनियों के, बनियों के पैसों पर रामेश्वर पांडेय जैसे ब्राम्हणों की जिंदगी चलती है, परिवार चलता है फिर भी बनियों के प्रति इस प्रकार की इनकी धृणित मानसिकता होती है, फिर आप समझ सकते हैं कि जातिवादी ब्राम्हण किस तरह के अनैतिक और मनुष्यता हीन होते हैं।
ब्राम्हणों की पत्रकारिता की टोली ने प्रचारित किया कि रामेश्वर पांडेय अपने त्रिमूर्ति की अंतिम कड़ी थे। उनकी तिकडी या फिर त्रिमूर्ति क्या थी? रामेश्वर पांडेय, प्रमोद झा और उपेन्द्र मिश्र को त्रिमूर्ति कहा जाता था, तिकडी कहा जाता है। ये तीनों ब्राम्हण हैं। रामेश्वर पांडेय के तिकड़ी में कोई गैर ब्राम्हण नहीं था। इस ब्राम्हणों की तिकड़ी में उपेन्द्र मिश्र थोड़ा अलग थे और क्रांतिकारी जरूर थे, इसीलिए उपेन्द्र मिश्र मेरे मित्र भी थे। उपेन्द्र मिश्र का भी मत रामेश्वर पांडेय के पक्ष में नहीं होता था।
मैंने पत्रकारिता में ब्राम्हणों की तिकड़ी, त्रिमूर्ति ही नहीं देखी है बल्कि पूरी गिरोहबंदी भी देखी है। राष्टीय सहारा में एक हस्तक्षेप डेस्क था, उस डेस्क पर कार्यरत सभी ब्राम्हण थे, जैसे अरूण पांडेय, दिलीप चौबे, विमल झा और कमलेश त्रिपाठी, इन सभी में गजब की कैमिस्टरी थी, अन्य किसी को फटकने का अवसर भी नहीं मिला। जबकि हस्तक्षेप डेस्क पर जातिवादी गिरोहबंदी बनाने वाले अरूण पांडेय, दिलीप चौबे, विमल झा और कमलेश त्रिपाठी इसके पहले किसी नामी अखबारों में काम भी नहीं किये थे।दैनिक जागरण का नेशनल चरित्र देखिये। विष्णु तिवारी के प्रिय टोली में ब्राम्हण है। प्रतीक मिश्र की टोली में ब्राम्हणों का भरमार है, सिर्फ हाथी के दांत की तरह एकाद अन्य हैं, बनिये तो इनके पास टीक ही नहीं सकते है, पिछडे और दलितों की क्या औकात। संघ के स्वयं सेवक माने जाने वाले अच्युतानंद मिश्र जब माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के चांसलर थे तो फिर ब्राम्हण होने के आधार पर कम्युनिस्टों की भी नियुक्ति करायी थी। फिर भी अच्युतानंद मिश्र संघ के विश्वास पात्र बने रहे थे और पत्रकारिता के पूज्यनीय बने रहे।
प्रभाष जोशी सरेआम कहते थे कि मैं ब्राम्हण हूं। प्रभाष जोशी ने सरेआम कहा था कि राहुल गांधी देश का युवराज है और वह भी एक टीवी चैनल बहस के दौरान। प्रभाष जोशी भी राहुल गांधी को ब्राम्हण मानते थे। फिर भी किसी ने प्रभाष जोशी को इसके लिए कोसा नहीं। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, राजतंत्र नहीं। प्रभाष जोशी ने लेकर अभयधर दूबे से लेकर ओम थानवी तक जितनी भी नौकरियां दिलवायी उनमें 90 प्रतिशत लोग ब्राम्हण थे। रामशरण जोशी छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों का यौन शोषण करते थे, गुंडे और दलाल छोटी-छोटी बच्चियों को उठा कर लाते थे और रामशरण जोशी उन छोटी-छोटी बच्चियों को अपने हवश का शिकार बना कर यौन इच्छा की पूर्ति करते थे। इस यौन विकृत मानसिकता के व्यक्ति को कांग्रेेस के राज में अर्जुन सिंह ने बाल संरक्षण आयोग का अध्यक्ष भी बना दिया था। ब्राम्हण होने के कारण रामशरण जोशी के इस अपराध पर कहीं कोई हलचल तक नहीं हुई। अगर रामशरण जोशी ब्राम्हण नहीं होते तो फिर वे आईकॉन नहीं बने रहते, न ही बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष बनते, अर्जुन सिंह की भी छबि धूमिल होती। पर आज कोई ब्राम्हणवादी पत्रकार आदिवासी बच्चियों की इज्जत लूटने वाले घृणित मानसिकता के रामशरण जोशी की आलोचना भी नहीं करता है।
रामेश्वर पांडेय की मृत्यु के बाद उन्हें महान कम्युनिस्ट बताने वाले, महान पत्रकार बताने वाले लोग कौन हैं, उनकी जाति देखेंगे तो खेल समझ में आ जायेगा। 99 प्रतिशत लोग ब्राम्हण है। जैसे निशीथ जोशी, अशोक मिश्र, प्रद्यूमन तिवारी, राजू मिश्र, विजय शंकर पांडेय,अमिताभ अग्निहोत्री आदि। अगर रामेश्वर पांडेय ब्राम्हण नहीं होते तो फिर ये सभी ब्राम्हण पत्रकार रामेश्वर पांडेय जैसे समूहबाज और जातिवाद के बदबूदार उदाहरण को महान बताने की कोशिश नहीं करते।
ब्राम्हणों की टोली कहती है कि रामेश्वर पांडेय अच्छे संपादक और अच्छे पत्रकार थे। पर ये ब्राम्हणों की टोली अपने कथन के प्रति आधार भी नहीं देती है,अच्छे पत्रकार का कोई उदाहरण भी नहीं देती हैं। उनकी कोई कालजयी लेखनी का उल्लेख किसी ने नहीं किया है, समाचार लेखन और संपादकीय लेखन का भी कोई अता-पता नहीं है। अगर वे सर्वश्रेष्ठ पत्रकार थे तो फिर उनकी सर्वश्रेष्ठ लेखनी और संपादकीय लेखन क्या-क्या थे?
मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि रामेश्वर पांडेय अगर ब्राम्हण नहीं होते, उन्होंने ब्राम्हणों को चुन-चुन कर नौकरियां नहीं दिलवायी होती तो फिर उन्हें ब्राम्हण की टोली भी याद नहीं करती। अगर रामेश्वर पांडेय दलित, पिछडे और बनिया होते तो फिर उनकी अंत्येष्टि में शामिल होने वाले भी सीमित होते, सोशल मीडिया पर महान बताने के लिए कोई आगे भी नहीं आता। रामेश्वर पांडेय कम्युनिस्ट भी नहीं थे, सिर्फ अवसरवादी थे। जैसे ही व्यक्ति जातिवाद के खोल में घूस जाता है, अनैतिकता का चादर ओढ़ लेता है वैसे ही वह कम्युनिस्ट होने या फिर मनुष्यता का सहचर होने का अधिकार खो देता है।
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आचार्य विष्णु हरि सरस्वती
नई दिल्ली
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