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13.11.07

भड़ासात्मकता को जीवित रखने का प्रयास

पहले लिख ही दिया है, कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ, पर फिर से दोहरा रहा हूँ, कि मेरा किसी समाचार-संगठन से दूर दूर तक का कोई वास्ता नहीं है, इसलिए मैं बस बतौर उपभोक्ता खबर लूँगा, दूँगा नहीं। और मेरी दिलचस्पी हिंदी अखबारनवीसी और टीवीनवीसी में होने वाले तकनीकी बदलावों में ज़्यादा है, तो उन्हीं के बारे में लिखूँगा और सवाल पूछूँगा। अब हो सकता है सवाल पूछते पूछते जवाब मिलें, या न मिलें, या सवाल ही बदल जाएँ, या सवाल किससे पूछ रहा हूँ, वह ही बदल जाए। जो भी हो।

तो बस यूँ कहिए कि अपने आपको एक जागरूक समझने वाला और सनकी उपभोक्ता हूँ। इस बात में भी दिलचस्पी है कि १०,००० प्रयोक्ताओं वाला चिट्ठा कैसे सँभलेगा, चाहता भी हूँ कि यह प्रयोग सफल हो। तो यदि कोई तकनीकी मदद चाहिए हो तो निस्संकोच पूछें, हाँ, मदद मैं अपने समयानुसार ही दे पाऊँगा, मगर इसका मतलब यह नहीं कि आपको मदद माँगने में संकोच करना होगा।

हाँ, तो १०,००० लेखकों वाला चिट्ठा, जो एक व्यक्ति - या बाद में कुछ अधिक व्यक्ति - संचालित कर रहे हों, कैसा लगेगा? इस समय कल्पना कर पाना मुश्किल है। अक्षरग्राम पर जब मिर्ची सेठ के सादर आमंत्रण पर पहला लेख लिखा था, तो उसमें काफ़ी भड़ासात्मकता थी।

उसी भड़ासात्मकता को जीवित रखने का प्रयास करते हुए यहाँ शामिल होने का न्यौता स्वीकारा है। कोई भी सामूहिक काम आपसी सहयोग और सूझ बूझ के बिना नहीं चल सकता है, तो योगदान यदि किसी और प्रकार का चाहिए हो तो मुझे बताएँ। और कुछ बातें स्पष्ट होनी भी ज़रूरी हैं, जैसे कि, ये जो गूगल के विज्ञापन यहाँ लगे हैं, उसका पैसा कहाँ जाता है? सवाल यह नहीं है कि पैसा आ रहा है या नहीं, यह भी नहीं है कि कहाँ जाता है। बस, स्पष्ट होना चाहिए - क्योंकि कई लोग यहाँ लिख रहे हैं।

दूसरी बात यह कि जो भी लेख यहाँ छपते हैं, उनके पुनर्प्रकाशन का और अन्य अधिकार - यानी सर्वाधिकार - किसका है - भड़ास का या मूल लेखक का? वही सवाल, भड़ास पर होने वाली टिप्पणियों के बारे में भी।

यह दो सवाल मैं अलग से यशवंत जी को भी पूछ सकता था लेकिन क्योंकि यह सार्वजनिक महत्व के हैं तो मैंने सार्वजनिक रूप से पूछ लिया है। जवाब जो भी हों, मुझे तो स्वीकार्य ही हैं, पर शुरुआत में ही स्पष्ट हो जाना चाहिए कि जवाब हैं क्या। बस इसीलिए पूछा है।

तो जाते जाते यशवंत जी की ही थोड़ी खबर ले लूँ - आप जब किसी और लेख या टिप्पणी का हवाला देना चाहें, तो उसकी कड़ी प्रदान कर सकते हैं - जो लोग आपका लेख पढ़ रहे हैं वह कड़ियों पर चटके बाज़ी जम कर करते ही हैं, साथ ही वहाँ छपी नई टिप्पणियाँ या संशोधित लेख तक भी लोग अपने आप चले जाएँगे। पर शायद टीवी वालों को बार बार वही विज़ुअल दोहराते दोहराते आदत बुरी पड़ गई हो!

खैर अब तक पिछले अनुच्छेद से आप समझ ही गए होंगे कि मैं यहाँ किस तरह की सामग्री परोसूँगा, तो मिलते रहेंगे।

2 comments:

आशीष said...

most wellcome to Alok ji at Bhadas...


ashish

Sanjeet Tripathi said...

वाह, आलोक जी भी भड़ास पर, इसका अर्थ है कि बहुत कुछ "खरी-खरी" पढ़ने मिलेगा!!

शुभकामनाएं