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24.12.09

शोषणकारी ताकतों से टकराता जनकवि महेन्द्र 'नेह' .

शोषणकारी ताकतों से टकराता जनकवि

.रमेश प्रजापति

किसानों और मजदूरों की आत्महत्याओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भारतीय समाज में आज हताशाओं का दौर चल रहा है। प्राचीन काल से ही यह समुदाय अपने ऊपर हुए अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए छटपटाता रहा है। इतिहास गवाह है कि समय-समय पर उनकी इस बेचैनी ने क्रान्ति का रूप धारण करके शोषणकारी ताकतों का प्रतिरोध किया है ताकि शोषण मुक्त नए समाज का निर्माण हो सके। इस संबंध में मैक्सिम गोर्की ने पूँजीवादी ताकतों के शोषण तंत्र से इस निम्नवर्ग के समाज की मुक्ति का सपना देखते हुए कहा था- ''मुझे मालूम है एक ऐसा समय आएगा, जब लोग सौन्दर्य पर चकित होंगे, जब हर व्यक्ति एक सितारे की तरह होगा...सभी सितारे की तरह होंगे। तब दुनिया स्वतंत्र मनुष्यों की बस्ती होगी, वे अपनी आजादी में महान होंगे, सबके दिल खुले होंगे,र् ईष्या और जलन से हर कोई अपरिचित होगा। जीवन मनुष्य की सेवा में बदल जाएगा। मनुष्य आकर्षक और महान बन जाएगा, क्योंकि जो स्वतंत्र है, उसे सब कुछ सुलभ है। तब वे लोग सत्य और स्वतंत्रता में साँस लेंगे, वे सुन्दर के लिए जिएंगे और सबसे अच्छे लोग कहलाएंगे, जिनके हृदय में संसार समा सकेगा, जो सारी दुनिया को प्यार कर सकेंगे, वे लोग महान होंगे-वे लोग जिन्हें नया जीवन मिल चुका होगा।''परन्तु क्या उनका यह सपना अभी तक पूर्ण हुआ?

स्वप्न पूर्ण होना तो दूर की बात आज इस उत्तार आधुनिक काल में नया उपनिवेशवाद अपनी पूँजीवादी ताकतों के साथ भयावह रूप में किसानों और मजदूरों के सामने आकर खड़ा हो गये हैं। उन्होंने किसानों की जमीनों को नई खाद के द्वारा बंजर बनाना आरम्भ कर दिया और फिर 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' के नाम पर उनसे उनकी जमीन हथियाने में लग गए हैं। मजदूरों के औजार छीनकर उत्पादन के नए तरीके प्रयोग में लाने शुरू कर दिए हैं। किसान-मजदूर जैसे निम्न वर्ग के अंदर घोर अवसाद और निराशा ने घर कर लिया जिस कारण ये आज आत्महत्या कर रहे हैं। पूँजीवाद ने समाज में वर्ग-भेद की स्थिति पैदा कर दी है तो मानव के अंदर अस्मिता का लोप होता जा रहा है। माक्र्स के अनुसार, ''पूँजीवादी व्यवस्था में इस अलगाव के शिकार सब वर्गों के लोग होते हैं किन्तु उसका सबसे घातक प्रभाव मज़दूर वर्ग पर पड़ता है।' ऐसे में सामाजिक चेतना और व्यवस्थाओं का विकास होना बड़ा ही संघर्षमय और जटिल होता जा रहा है।

इस मनुष्य विरोधी समय में जनवादी साहित्यकार का दायित्व और बढ़ जाता है। जनवादी रचनाकार का एक निहित उद्देश्य, व्यावहारिकता और द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दृष्टिकोण होता है। वह संसार की प्रत्येक घटनाओं और गतिविधियों पर उसकी पैनी नजर रखता है। उसका निम्नवर्ग के प्रति झुका होने के कारण वह किसानों और मजदूरों की ऑंखों से संसार को देखकर उसे विश्लेषित करता है और इन मेहनतकश जनों के संघर्षों को अपना समझकर उसे कलात्मक अभिव्यक्ति देता है। इन्हीं किसानों और मजदूरों को आधार बनाकर रचना करने वाले कवि महेन्द्र नेह का दृष्टिकोण भी जनधर्मी रहा है। इस कवि ने निम्नवर्ग के संघर्ष को अपनी रचनाओं में विविध रूपों में बाँधा है। 'इस ऍंधेरे वक्त में' कविता में जहाँ शोषणकारी ताकतों का वर्चस्व है जिसके बल पर उन्होंने मजदूर वर्ग का सबकुछ छीनकर उनका जीना दूभर कर दिया है। मरने के बाद भी यह वर्ग सपनों को आग के सुनहरी लावे की तरह जिन्दा रखने की बात करता है। परन्तु कवि स्पष्ट कहता है-''तुम छीन सकते हो/ मुझसे मेरे पसीने से/उगाए फल/ मेरे खेत, घर-परिवार/छीन सकते हो तुम/ मेरे कमाने-खाने के औजार।''

वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के इस विकट समय में महेन्द्र नेह की कविताओं में सामाजिक सरोकार भाव प्रवणता, जनसामान्य का जीवन-संघर्र्ष, आत्म-संघर्ष तथा आशा-निराशा भरा स्वर मुखरित हुआ है। आज पूँजीवाद के वर्चस्व ने अपने विभिन्न रूपों में आकर निम्नवर्ग का जीवन संत्रासों से भर दिया है। सामान्य जन की अदम्य शक्ति में गहरा विश्वास रखने वाले कवि महेन्द्र नेह शोषितों की तबाह जिन्दगी और उनके संघर्षों को आत्मसात करके अपनी गहन अनुभूतियों और विचारों को कविताओं के माध्यम से चित्रित करते हैं। उनकी कविताएँ किसान-मजदूर के अंदर फैले उदासी के घेरे को तोड़कर उनमें चेतना और जिजीविषा भरने में सक्षम हैं। पूँजीवादी शक्तियों की प्रवत्तिायों के संदर्भ में गहरे आत्म विश्लेषण से गुजरते हुए महेन्द्र नेह ने इन शक्तियों का विरोध, सामान्यजन की समस्याओं और जरूरतों को महत्तव दिया है। साथ ही वे उस विकास प्रक्रिया के प्रति अपनी असहमति प्रकट करते दिखाई देते हैं जिसने निम्नवर्ग को पतन की ओर धकेल दिया है। इसी का परिणाम है कि इन्होंने पुलिस और माफिया की बर्बरता, मुकदमों को ही नहीं झेला बल्कि मेहनतकशों की आवाज़ को बुलन्द करने के संबंध में वे जेल भी गए। मनुष्य विरोधी समय में आम आदमी की चिंताओं, आवश्यक सरोकारों एवं सूक्ष्म संवेदनाओं को इनके गीतों, ग़ज़लों और कविताओं में सुना जा सकता है।

जनवादी सौन्दर्य दृष्टि रखने वाले महेन्द्र नेह जीवन की विद्रूपताओं और जटिलताओं से रूबरू होकर सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए मजदूर वर्ग की पीड़ाओं,विड़म्बनाओं, कराहों, अन्तर्द्वन्द्वों एवं विसंगतियों को कविता में चित्रित करने वाले कवि हैं। गौरतलब है कि इनकी कविताओं में निम्नवर्गीय समाज का टूटा हुआ स्वर परिलक्षित हुआ है यह कवि की इस दिशा में समूची रचनात्मकता और पहचान को और अधिक पुख्ता करता है। आधुनिक कविता के नाम पर बौध्दिक वैचारिकता से दूर इनकी रचनाएँ मजदूर वर्ग के जीवन संघर्षों के प्रति अधिक जवाबदेह है। और यही उनकी जवाबदेही मजदूरों और वंचितों की पक्षधरता को सामाजिक पृष्ठभूमि से उठाती हुई आगे बढ़ती है। वे मजदूर जिनके पास श्रमशक्ति के अलावा कुछ नहीं होता और आधुनिक पूँजीवाद बड़ी निर्ममता से उनके उन औजारों को छीन रहा है जिनके दम पर यह वर्ग अपने परिवार का पालन-पोषण करता है। कवि की कलम उन बेगुनाहों के कष्टों को उकेरने के लिए उठती है जिन्होंने सच्चाई और न्याय के रास्ते पर चलते हुए हमेशा जुल्मों का सामना किया है। यही कारण है कि इस कवि की कविताओं का स्वर बड़ा ही मार्मिक एवं संवेदना युक्त बन पड़ा है-''अब उन्हीं के लिए यह कविता/जिनके हाथों से छीन लिए गए औजार/यह जिन्दगी/अब उन्हीं के लिए/जिनके मुँहों से/झपट लिए गए निवाले।'' -( उन्हीं के लिए, पृष्ठ-11)

महेन्द्र नेह की कविताएँ अत्यन्त सरल एवं सहज होते हुए भी आत्मीयता और संवेदना का ऐसा प्रकाश-पुँज प्रदीप्त करती हैं, जिससे अन्तरतम का प्रत्येक कोना आलोकित हो जगमगाने लगे। कवि ने जीवन को नजदीक से देखा है, यही कारण है उनकी कविता में आम आदमी की जिजीविषा, संघर्ष, विडम्बना और वैचारिकता एवं संस्कृति का स्वर स्फुटित हुआ है। उनकी कविताएँ जीवन की सच्चाइयों को बेझिझक उद्धाटित करती हैं। यदि सामाजिक यथार्थ के परिप्रेक्ष्य से देखें तो आपका जीवन और लेखन उन मेहनतकशों मजदूरों और किसानों के हक के लिए सदैव तत्पर रहा है जो आजीविका के लिए जीवनपर्यन्त संघर्ष करते रहे हैं, और कर रहे हैं। इनके गीत और ग़ज़लों का स्वर भी मुख्यत: जनधर्मी है। वास्तव में पूँजीवादी ताकतों का विरोध वही साहित्यकार कर सकता है जिसने इनकी सच्चाई को पहचान लिया हो और अपने समय की विषमताओं और विसंगतियों को नजदीक से देखा हो। इस हिंसात्मक समय में सदैव कोमल संवेदनाएँ ही लहू-लुहान होती हैं। आज उत्तार आधुनिक काल में जब चारों तरफ विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य अपने मूल्यों से दूर होता जा रहा है, उसकी संवेदनाओं का संसार सिकुड़ता जा रहा है, उसके समस्त कृत्य आत्म-केन्द्रित होकर रह गये हैं आम आदमी के सपने लहू-लुहान होकर छटपटा रहे है। गाँधी का अंहिंसा वाला यह देश आज हिंसक खौफ़ के साये में खड़ा सिसकियाँ भर रहा है- ''अहिंसक मुल्क में/बहती है अनवरत/खून की धार/कभी सड़क पर कभी रेल की पटरियों पर लहू-लुहान/कभी खेत में अचेत, कभी उजड़ी हुई/बस्तियों के बीच हलकान/कभी बंद कमरों में/कभी सल्फास की गोलियाँ खाकर/चिर-निद्रा में निमग्न।''-( अहिंसक मुल्क में, पृष्ठ-65)

आज कविता अस्वीकार और निषेध तक ही सीमित न रहकर अपनी रचनात्मकता में आक्रामक तेवर के साथ समाज की जड़ हो रही आत्मा को स्पन्दित करने में अहम् भूमिका निभाती हुई आगे बढ़ रही है। मानव जीवन अनेक अंतर्द्वन्द्वों, विसंगतियों और दुखों से भरा होने के कारण उसमें कोमल संवेदनाएँ ऐसे निहित रहती हैं जैसे फूलों के पराग से दुर्गम घाटियाँ महमहाती रहती है। जहाँ समाज में त्याग, सेवा, आस्था, प्रेम, आदर्श, विश्वास आदि का औचित्य समाप्त होता जा रहा है वहीं आज कविता में जीवन के उलझावों का चित्रण और जड़ों के प्रति मोह की उधेड़बुन ध्वनित होती रहती है। विचार और संवेदना के स्तर पर सामाजिक यथार्थ से बड़ी गहराई तक जुड़ी होने के कारण कविता समाज के विभिन्न स्तरों पर समकालीन संवेदनाओं के प्रति गहरा लगाव रखती है। इसलिए कवि अपनी कविताओं में पूँजीवादी भूमडंलीकरण और औद्योगीकरण के विकट समय में मज़दूरों, किसानों, औद्योगिक मज़दूरों के जीवन-संघर्ष और त्रासदी भरे सुने जा सकते हैं। बाज़ार अपने विकराल रूप में समाज को अपनी विनाशकारी मुट्ठी में ले रहा है। मँहगाई की सबसे ज्यादा मार मज़दूरों और गाँव में बेराज़गारी की मार झेलते लोगों पर पड़ती है। आज भी जीवन-संघर्षों से जूझते दिहाड़ी मजदूरों के जीवन में उत्सव कोई मायने नहीं रखते हैं। ये कविताएँ जीवन के प्रति निराशा के वातावरण में मनुष्य के अन्दर जिजीविषा का संचार करती हैं-''उन सबके चेहरे/ तमतमाए हुए हैं/उन्होंने इस धरती पर/ सबसे अधिक कष्ट सहे हैं/और कष्टों ने उन्हें/अजेय बना दिया है।'' साथी, पृष्ठ-24)

महेन्द्र नेह के यहाँ संवेदनाओं की मार्मिकता है और उन्हें बचाने का संकल्प भी। इसलिए ये कविताएँ प्रतिदिन की छोटी-बड़ी घटनाओं, जीवन-मूल्यों, विसंगतियों, विद्रूपताओं का प्रतिबिम्ब तो दिखाती है साथ ही संभावनाओं और स्मृतियों के द्वारा भविष्य के सपनों को भी रेखांकित करती हैं। रामविलास शर्मा पूँजीवाद के विद्रूप चेहरे को कुछ इस प्रकार उद्धाटित करते हुए कहते हैं- पूँजीवादी व्यवस्था श्रमिक जनता का आर्थिक रूप से ही शोषण नहीं करती है, वह उसके सौन्दर्यबोध को कुण्ठित करती, उसके जीवन को घृणित और कुरूप भी बनाती है। फूलों-फव्वारों से सजे बाग-बगीचे पूँजीपतियों और उनकी रखैलों के लिए हैं, मज़दूरों के लिए गंदी बस्तियों की तंग कोठरियाँ हैं।'' यह वर्ग यथार्थ की कठोर भूमि पर खड़े होकर भविष्य की कोख से उठने वाले तूफान की गति को पहचान रहा है और इन्सान का एक नया भविष्य गढ़ने में जुटा है। महेन्द्र नेह की कविताओं में भी श्रमिक वर्ग के जीवन-संघर्ष, संत्रास, विवशता, निराशा, आदि मुख्य रूप से दिखाई देते हैं-^^उन्होंने/हमारे हाथों से छीने/हमारे औजार/ हम खाली हाथ रह गए/उन्होंने हमें/भूख और जलालत बख्शी/हम उन्हें भी सह गए/उन्होंने हमें/धागे खींचने को कहा/ हम उनके धागों में उलझते चले गए।'' - (इस बार भी असफल रहे वे,पृष्ठ-43) मजदूरों की ऐसी विवशता भरी उलझनों को इस कवि की कविताओं में बखूबी देख सकते हैं।

कविता की रचनात्मक अर्थवत्ता को बनाए रखने के लिए जिस जटिल यथार्थ, ऊबड़-खाबड़ जमीन ,जीवन की बारीकियों की पकड़ तथा संवेदनात्मक-साक्षात्कार की आवश्यकता होती है उसे महेन्द्र नेह की कविताओं में देखा जा सकता है। मानवता की पक्षधर ये कविताएँ वर्चस्ववादी शक्तियों के बीच शोषित वर्ग के जीवन की उन घुटन भरी जिन्दगी को सामने रखती हैं जिनसे उनका जीवन शोषक वर्ग की इच्छाओं पर निर्भर है, वे अपनी मर्जी से साँसें भी नहीं ले सकते हैं-''उनकी आत्मा की भूख/ हमारी रोटियों से नहीं बुझती/ उन्हें हमारी रोटियाँ चाहिए और झुग्गियाँ भी.../ उन्हें हमारी बस्तियाँ भी चाहिए/उनकी जब इच्छा होती है/हमें मार दिया जाता है।'' - (उनकी जब इच्छा होती है...,पृष्ठ-70)

शोषक वर्ग के वास्तविक चेहरे को उजागर करती इस कविता का स्वर बड़ा ही मार्मिक है और मजदूर वर्ग की वस्तु स्थिति को बेबाकी से सामने रखता है। वर्तमान विद्रूपताओं और समाज के लिए की गयी झूठी घोषणाओं पर कुठाराघात करते हुए इस पुस्तक की भूमिका में कवि स्वयं कहता हैं-''वर्तमान दौर में देशी-विदेशी शासक वर्ग द्वारा मध्यवर्ग के लिए प्रलोभन का 'कारू का खजाना' खोल दिया गया है। सपनों का ऐसा जादुई संसार रच दिया गया है, जिसमें मात्र युवा पढ़ी ही नहीं समाज के सभी हिस्से धन की मृग-मरीचिकाओं में फँसे दिखते है.........पूँजीवादी बाजार अपने हितों को पूरा करने के लिए पूरी नंगई पर उतरकर हिंसक,बर्बर और सर्वभक्षी हो गया है। शासक वर्ग की इस हिंसा का मुख्य निशाना श्रमजीवी जन-गण-मजदूर और गरीब किसान है।''

जनवादी चेतना की ये कविताएँ समाज के सर्वहारा एवं निम्न मध्यवर्ग के वास्तविक जीवन से साक्षात्त्कार कराती हैं। यथार्थ की ठोस भावभूमि पर खड़ी ये कविताएँ अपनी मार्मिकता के कारण व्यक्ति के अन्तर्मन को उद्वेलित करती हैं। कवि इस समाज के बदले स्वरूप के बीच जीवन की कुछ सच्चाइयों से रूबरू कराता है। कवि की जनपक्षीयता बड़ी ही प्रबल है। बेहतर समाज के निर्माण में जनवादी कवि का अटूट विश्वास होता है। 'वे समझते हैं बहुत कुछ','साथी', 'आग का रंग', 'रोक दो अपना यह नीलवर्णी जादू', 'ठीक इसी वक्त','विजय जुलूस' आदि कविताओं में कवि ने मेहनतकशों में चेतना का स्वर फूंका है। वह वर्तमान के धरातल पर आर्थिक उत्पीड़न और शोषणमूलक पूँजीवादी व्यवस्था की जनविरोधी प्रवृत्तिायों, तिड़कमों और बुनियादी अंतर्विरोधों की पहचान करके उत्पादन और वितरण में हिस्सेदारी की बात करता है। जनकवि महेन्द्र नेह की कविताओं में सर्वहारा वर्ग के अंदर चेतना उत्पन्न करने की क्षमता है। वे बुर्जुआ वर्ग के खिलाफ़ एकजुट होकर जनक्रान्ति की बात करते हैं-''क्रांति/हाँ, क्रांति निश्चय ही उन्हें खा जाएगी/ जो जनता के दुश्मन हैं/जो अपना भविष्य 'सिंहासन बत्ताीसी' में ढूँढ रहे हैं/और जिनके दाँत हमारी पीठ में गहरे गड़े हैं।'' - (गोश्त का आखिरी टुकड़ा, पृष्ठ-87)

आज मानव के सामने स्वप्न एवं जीवन की सच्चाई के बीच की मरूभूमि हमारे सम्मुख आकर खड़ी हो जाती है। हर तरफ अन्तर्विरोध एवं द्वन्द्व के बीच कवि बड़ी तेजी से समाज में नैतिक-मूल्यों के टूटने-बिखरने की ध्वनियाँ सुन रहा है। गहन संवेदना से लबालब इन कविताओं में गाँव की सोंधी माटी की महक और लोक ध्वनि बार-बार गूँजती है। उपभोक्तावाद ने हमारे नैतिक-मूल्यों का ह्रास बड़े पैमाने पर किया है। यदि समाज की मूल्यहीन वर्तमान गतिविधियों को देखे तो पाएंगे कि बाजारवाद के बढ़ते वर्चस्व ने हमारे सम्पूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल कर रख दिया है। आपसी संबंधों का कोई महत्तव नहीं रह गया है। व्यक्ति अवसरवादी होता जा रहा है। वह वक्त आने पर अपनों का खून भी करने से नहीं चूकता है-''निश्चित ही/ इस बीच जुड़ रहे है/ कुछ नए रिश्ते/ अभी-अभी जवान जिस्म से/ टपके गाढ़े खून के उजास में।'' - (गाढ़े खून के उजास में, पृष्ठ-92)

आर्थिक उदारीकरण ने सामाजिक जीवन की सभी अवधारणाओं को विघटित कर दिया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत में अन्तर्कलह, वर्ग-संघर्ष, क्षेत्रीयवाद, वर्चस्ववाद, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आदि का मानव जीवन में हस्तक्षेप बढ़ा है। मानवीय अस्मिता और मानवता पर खतरा बढ़ रहा है, वहीं मनुष्य मानसिक पीड़ा, कुंठा, भय, टूटन और निराशा में डूबता जा रहा है। आज का मनुष्य आर्थिक दबाव में पिस रहा है। मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंक,, हिंसा और आत्महत्या में वृध्दि हुई है। 'ग्लोबल समय,जुलूस और शांता चाची' कविता में कवि उत्तार आधुनिक काल की चमचमाती वस्तुओं के लदे-फँदे बाजार में नए साम्राज्यवाद के खिलाफ़ मेहनतकशों द्वारा विरोध करते देखकर अनुभवों से भरे शांता चाची के चेहरे पर खुशी का उभरना इस बात की ओर संकेत करता है कि पूँजीवादी ताकतों का सामना करके ही अपने हक के लिए लड़ा जा सकता है और एक नए युग का निर्माण किया जा सकता है। भूमंडलीकरण की पदचाप भारत की सभ्यता और साँस्कृतिक विरासत पर स्पष्ट सुनाई पड़ने लगी है। समसामयिक युग-चेतना से जुड़ी होने के कारण कविता की व्यक्ति से निकटता बढ़ रही है। अनुभूति, विचार और संवेदना की दृष्टि से महेन्द्र नेह की इन कविताओं का वैचारिक फलक विस्तृत है। किसानों और मजदूरों के संघर्ष भरे जीवन और उनकी विडम्बनाओं को बड़े ही सहज अन्दाज में चित्रित करती उनकी कविताओं में समाज से उठती अमानवीयता की दुर्गन्ध के बीच शोषितों, दलितों, पीड़ितों आदि मजदूर वर्ग की कराहें स्पष्ट सुन सकते हैं-''वे हमारी ऑंखें निकालते हैं/और हमारे हाथों में/जुम्बिश नहीं होती/वे हमारे हाथ उतारते है/और हमारे पाँव में/हरकत नहीं होती/ वे हमारे पाँव काट देते हैं/ और हमारी ऑंखों में खून नहीं उतरता।'' (कुतुबनुमा, पृष्ठ-79)

वर्तमान सामाजिक व्यवस्था और शोषणकारी ताकतों के विरूध्द सबसे अधिक शोषित या उत्पीड़ित वर्ग ही अपनी पूरी शक्ति के साथ परिवर्तनकारी संघर्ष करके अपनी मुक्ति के रास्ते तलाशता है। महेन्द्र नेह की कविताएँ एक निश्चित उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ती हैं और वह उद्देश्य है आत्ममुक्ति से मानव मुक्ति के मार्ग की खोज। इसी कारण महेन्द्र नेह की इन कविताओं में समाज और व्यवस्था के प्रति विद्रोह, आक्रोश और जनवादी तेवर साफ-साफ दिखाई देता है। एक बड़े परिवर्तन की आहट इन कविताओं में सुनाई देती है,जिसके संदर्भ में मुंशी प्रेमचंद उचित ही कहते हैं-''......अब एक सभ्यता का सूर्य सुदूर पश्चिम में उदय हो रहा है, जिसने इस नारकीय महाजनवाद या पूँजीवाद की जड़ खोदकर फेंक दी है....सारे अंधकार को चीरकर दुनिया में अपनी ज्याति का उजाला फैला रही है।'' इस नई सभ्यता की मशाल को लेकर चलने वाला अगला दस्ता किसानों और मजदूरों का है। तभी तो कवि को मेहनतकशों की चुप्पी में प्रतिशोध की ध्वनि सुनाई दे रही है जिससे धरती पर एक बार फिर परिवर्तन अवश्य होगा। कवि का यह आशावादी स्वर इन पंक्तियों में देखा जा सकता है-''इंसानी फसलों को तबाह करते/खूनखोर जानवरों ने/रख दिए हैं अपने/भारी-भरकम बूट/पाँवों सहित तोड़ दिए जाएँगे बूट/तब हिंसा नहीं/प्रतिहिंसा होगी मुखर/धरती/अपनी धुरी पर/तनिक और झुकेगी/और तेजी से थिरक उठेगी तब।''- (फिल वक्त, पृष्ठ-22)

किसानों और मज़दूरों के जीवन के प्रति गहरी संवेदना रखने वाले जनकवि महेन्द्र नेह की ये कविताएँ वर्तमान के विध्वंसकारी समय का आईना हैं जिसमें मजदूर वर्ग की छटपटाहट स्पष्ट देखी जा सकती है। कवि को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास भी है तभी तो कहते है-''आज समय फिर से मांग कर रहा है कि शासक-वर्ग की जन विरोधी कुसंस्कृति के विरूध्द जन-पक्षधर संस्कृति अपने श्रेष्ठ सृजनात्मक, मुखर और प्रतिरोधी रूप में एक नव-अभ्युदय, नव-जागरण और नव-प्रबोधन का वातावरण तैयार करे।'' यही कारण है कि उनकी कविता का अधिकतर भाग इस मज़दूर वर्ग की जिन्दगी और उस जिन्दगी के बीच से ग्रहण की गई अनुभूतियों, विचारों और घटनाओं से निर्मित है जिसमें उसे घुट-घुटकर जीना पड़ रहा है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखे तो इन कविताओं में शोषणकारी ताकतों का पुरजोर विरोध करने की चेतना बड़े ही आक्रामक स्वर में मुखरित हुई हैं। अत: शोषणकारी ताकतों से टकराने वाले इस जनधर्मी कवि की ये कविताएँ आम आदमी में गहरा विश्वास तो रखती ही है साथ ही उनके संघर्षों से भी गहरी संवेदना रखती हैं।

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