Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

19.4.20

तो कोरोना पर भी शुरू हो गया मैनेज का खेल


मीडिया को समाज का आईना इसलिए  माना जाता है क्योंकि समाज में घटित हो रही गतिविधियों को दिखाने की नैतिक जिम्मेदारी मीडिया की होती है। मीडिया के कंटेंट्स को लेकर गंभीरता बरतने का भी यही कारण रहा है क्योंकि मीडिया समाज को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा तंत्र माना जाता है। आज के मीडिया की बात करें तो कुछ जुनूनी पत्रकारों को छोड़ दें तो पूरे के पूरे मीडिया का काम बस सरकारों और पूंजीपतियों की गलती पर पर्दा डालना और उनका प्रवक्ता बनना रह गया है। मतलब आज की मीडिया का काम बस मैनेज करना और प्रभावशाली लोगों के लिए काम करना रह गया है। कहना गलत न होगा कि समाज के लिए सबसे उपयोगी साबित होने वाला मीडिया आज समाज का सबसे अधिक नुकसान कर रहा है।

दुनिया में कहर बरपा रहे कोरोना पर ही आ जाइये। जब कुछ जुनूनी लोगों ने  कोरोना को जैविक हथियार बनाने को लेकर चीन के चेहरे को बेनकाब कर दिया है तो इस मामले को मैनेज करने का भी खेल शुरू हो चुका है। इस खेल में भी मीडिया का ही इस्तेमाल किया जा रहा है।

कोरोना वायरस को लेकर एक न्यूज चैनल की रिपोर्ट की पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। इस रिपोर्ट में यह दिखाया गया है कि क्या वास्तव में ही चीन के वुहान में लैब से कोरोना वायरस फैला है?

फॉक्स न्यूज के लिए रिपोर्ट को तैयार करने वाले इस रिपोर्टर ने इसे अमेरिकी  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भी स्वीकार करने का दावा किया है।

इस रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि कोरोना वायरस चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में काम कर रही एक इंटर्न की गलती से लीक हो गया हो गया था। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह चमगादड़ के बीच स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाला कोई जैविक हथियार नहीं है, बल्कि वायरस है। इस रिपोर्ट में वुहान प्रयोगशाला में इसके अध्ययन की बात की जा रही है।

यदि इस रिपोर्ट से डोनाल्ड ट्रंप सहमत हैं तो यह माना जाए कि अमेरिका की कोई दुखती नब्ज चीन ने कब्जा रखी है।

चीन के कोरोना को जैविक हथियार बनाने की बात  खुद अमेरिका ने भी कही है और इसकी जांच में अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए को पूरी तरह से लगा रखा है ।

दरअसल जैविक हथियार बनाने और हथियारों के धंधे में सभी प्रभावशाली देश पूरी तरह से सक्रिय हैं। कमजोर देशों को हथियार बेचना और उन्हें इन्हीं हथियारों के बल पर डरा कर रखना देशों की नियति बन चुक है।

चीन के साथ ही चाहे अमेरिका हो, रूस हो, या फिर फ्रांस, ये देश सबसे बड़ा धंधा हथियारों का ही तो करते हैं। कमजोर देशों के प्रति यदि इनका रवैया कुछ लचीला होता है तो बस अपने धंधे के लिए। हथियारों का निर्यात इनकी पहली प्राथमिकता होती है। कुछ सालों में भारत ने भी इन देशों से हथियार खरीदे हैं। इनके व्यवहार से तो यही लगता है कि जनता तो  इन शासकों के लिए बस कीड़े मकोड़े हैं। क्योंकि कोरोना की चपेट में ये खुद भी आ रहे हैं तो इतनी चिंता दिखा रहे हैं।

यदि दुनिया पर कहर बरपा रहे कोरोना पर मैनेज का खेल नहीं चल रहा है तो फिर सब देश मिलकर चीन के खिलाफ मोर्चा क्यों नहीं खोलते ? क्यों अब भी चीन से सामान खरीद रहे हैं ? वह भी मेडिकल उपकरण। भारत ने भी हाल ही में बड़े स्तर पर टेस्ट के लिए पीपीई किट मंगाई। वह बात दूसरी है कि इनमें काफी खराब निकल रही हैं।

भारत तो कुछ नहीं स्पेन, इटली, ईरान और खुद अमेरिका मेडिकल उपकरणों के लिए चीन पर निर्भर देखे जा रहे हैं। ऐसे में भला ये देश चीन के खिलाफ कैसे मोर्चा खोल सकते हैं ? समझौता तो करना ही पड़ेगा। हमारा तो पूरे ही बाजार पर ही चीन का कब्जा है।

अब प्रश्न उठता है कि अपने अपने धंधों को चमकाने के लिए कुछ भी करने को बेताब रहने वाले दुनिया के बर्बर शासकों से मानवता और प्रकृति की रक्षा कैसे की जाए ?

कभी मंदी के नाम पर, कभी महंगाई के नाम पर, कभी आतंकवाद के नाम पर, कभी जनसंख्या के नाम पर  और कभी महामारियों के नाम पर जनता को डराकर रखो और इन पर राज करो। यही काम रह गया है अब दुनिया के इन शासको का। बातें भले ही कितनी बड़ी बड़ी हो रही हों पर दुनिया में धंधे के अलावा कुछ हो नहीं रहा है। इन शासकों की सनक ओर हनक का खामियाजा बेबस जनता भुगत रही है। यह सब शासकों के साथ ही जनता का भी जमीनी मुद्दों से दूर जाना रहा है।
 कोरोना से तो लोग अब मर रहे हैं । प्रकृति से खिलवाड़ के चलते तो जन समुदाय लंबे समय से गंभीर बीमारियों से नहीं जूझ रहा है। क्या हम मिलावटी खाद्यान्न सामग्री के साथ ही कीटनाशक दवा के बल पर तैयार किये गए फलों के नाम पर जहर नहीं खा रहे हैं ? यह सब सब कुछ ताक पर रखकर दुनिया के शासकों का धंधों को बढ़ावा देने  का ही दुष्परिणाम है। हम हैं कि समझौते पर समझौता करते चले जा रहे हैं। गलत को गलत और सही को सहो कहने का नैतिक साहस हममें नहीं रह गया है। बस हमारे निजी स्वार्थ सधते रहें। यदि प्रकृति और मानवता बचानी है तो जमीर को जगाकर सही को सही और गलत को गलत कहना हमें सीखना होगा। जिस दिन लोग यह काम कर ले गए तो समझो दुनिया में सब कुछ अच्छा होना शुरू हो जाएगा।

CHARAN SINGH RAJPUT
charansraj12@gmail.com

No comments: