का कह रह हो गुरु। हम भी दारूबाजी के किस्से बताएं. अब इसे आज्ञा मानें या विनती? विनती तो आजकल प्रेमिकाओं की भी नहीं सुन रहे इसलिए क्यों लिखें आपकी मानकर. लेकिन डर लग रहा है कहीं यह आज्ञा होगी तो दिल्ली विजिट पर एक अड्डा कम हो जाएगा. सत्या नौकरी छोडे बैठा है. और साले जेएनयू वाले बडे काईयां होते जा रहे हैं यानी सूखले सूखले रहने का खतरा है. गुरु आज्ञा मानकर लिख ही देता हूं.
तो अपने साथ तो ऐसा हुआ कि दुष्यंत कुमार बोले पहली बार चखी तो हमें भी बुरी लगी, कडवी तुम्हे लगेगी मगर जरा सी तो लीजिए। का करते बडे कवि का बडबोला आदेश. मामा के सानिध्य में रहते थे. देखते महसूसते थे कि मामा एक लाल पेय ठंडे पानी के साथ गटकते हैं, छककर खाते हैं और लंबी तान कर सो जाते हैं (कुंवारे थे उन दिनों). कभी कभी महकते हुए रात 11 बजे कुंडी खटखटाते तो हम दरवाजा खोलते मामू खुद सातवें आसमान में होते अंगूर की बेटी से सोहबत करने के बाद और हमें थमा देते वनीला का एक लार्ज पैक. दिन में हम घर में अकेले होते थे उन दिन लडके और लडकी में सही फर्क करने की तमीज नहीं थी नहीं तो यहां कोई और ही किस्सा सुना रहे होते. तो हुआ यूं कि कई दिनों फ्रिज में रखी उस बोतल को देखने के बाद एक दिन दोपहर में हम, बंटी, सुनील, श्याम, मोना, रूबी और शायद सपना या प्रतीक था, लूडो और आइस बाइस खेल कर जी बहला रहे थे. हम श्याम और बंटी को लाल पेय की जादूगरी बता चुके थे और साथ ही यह भी बता चुके थे कि अभी हम लोगों की पहुंच में है. श्याम स्वाद पहले ही चख चुका था सो उसने और गुणगान किये. गुरु बोतल से जिन्न को आजाद करने को हम तीनों उत्सुक थे, लेकिन अन्य चपडगंजुओं की मौजूदगी में यह संभव नहीं लगता था. सुनील को तो क्रिकेट टीम में जगह देने के नाम पर बहलाया जा सकता था, लेकिन असली खतरा रूबी से था, श्याम ने मोना की गारंटी ले ली कि वो किसी से नहीं कहेगी. पर हम खतरा नही लेना चाहते थे. सो श्याम को कहा कि उसे बाहर करे. श्याम बोला समझाकर आता हूं और वह मोना को लेकर दूसरे कमरे में चला गया तब तक हमने बाकी कमजोर कडियां ठीक कर लीं. तकरीबन एक घंटे बाद श्याम और मोना कमरे में आए तब श्याम बोला मामला ठीक हो गया है (अब समझ में आता है कि उसका मामला कैसे ठीक हुआ था).
फिर हमने वह जिन्न आजाद किया सबने थोडी शराब और ज्यादा पानी मिलाकर पैग तैयार किये और एक ही सांस में खींच गये। गले से पेट तक एक सन्नाटा खिंच गया. बाकी सब तो ठीक थे लेकिन बंटी को दर्द होने लगा और कहने लगा तुमने तेजाब पिला दिया है अब मैं मर जाउंगा. हम लोगों को भी लगा कि पेट में इतना दर्द क्यों हो रहा है. सब इसी पसोपेश में थे तब तक श्याम ने बोतल से जितनी शराब निकाली थी उतना पानी मिला दिया. सबको अपने अपने घर भेजकर मैंने बिस्तर पकड लिया. पहले सिर घूमा फिर नींद आई और जब जागा तो रात के आठ बज चुके थे. यह था मेरा पहला शराब से मिलाप.
आगे कैसे बना पेट ड्रम और अखिलेश ने मुझे कैसे बनाया दारूबाज यह फिर कभी।
जय भडास
सचिन
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बेटे का नाम स्कूल से कटवा दिया....
पांच साल का हो जाएगा, अगले महीने। 25 को उसकी बर्थडे है और 26 को मेरा जन्मदिन। ये बात अभी से तय कर रखी है मैंने और आयुष ने (वो क्या तय करेगा, मैं ही उसे सुनाता रहता हूं)कि जब आयुष बीयर-दारू पीने की वैधानिक उम्र हासिल कर लेगा तो मैं और वो 25 अगस्त की शाम को साथ बैठकर चीयर्स करेंगे और 26 की सुबह तक खाना-पीना-गाना करेंगे। मतलब बाप-बेटा दोनों अपने बर्थडे-जन्मदिन को एक रात में मना लेंगे। हालांकि जब वो पैदा होने को था तो मैंने बनारस में डाक्टर ऊषा गुप्ता से अनुरोध किया था कि जब सिजेरियन ही होना है तो प्लीज एक दिन और रुक जाओ, 26 को आपरेट करना, लड़का-लड़की जो भी होगा-होगी, बर्थडे तो एक साथ मनाएंगे और थोड़ा मामला रोचक भी रहेगा। लेकिन अपनी पत्नी को क्या कहूं, मारे दर्द के खामखा चिल्लाने लगीं और मुझे गरियाने लगीं...तोहार मुंह झऊंस जाए, तोहरे पेट पे होत तब ना..., चले आए भाषण देने....जइबा कि ना इहां से....। फिर डाक्टर की तरफ मुखातिब होकर उन्होंने कहा---डक्टराइन साहिब, प्लीज...आपरेशन अब कर दीजिए...। और मेरी रणनीति फेल रही। आयुष जी एक रोज पहले आ गए। जब पहले आ गए तो फिर नया प्लान बना दिया। 25-26 अगस्त की रात को पूरी रात हंगामा करने वाला। वैसे नहीं तो ऐसे, अपनी वाली कर ही ली। लो, बात कुछ और कहना चाह रहा था और कह कुछ और रहा हूं....।
हां, तो कह रहा था कि पिछले तीन महीने से आयुष जी स्कूल से जुड़े नहीं थे और जाने कहां-कहां की यात्रा की। ननिहाल और अपने गांव के अलावा तीन-चार और जगहों पर घूमने गए। खांटी देहात में रह के आए हैं। कानपुर से स्कूल छूटने के बाद से और मेरे नौकरी छोड़ने के बाद से सभी लोग गांव में ही रहे। जब नोएडा में नौकरी शुरू की तो सभी आए। इस महीने की शुरुआत में एडमीशन भी करा दिया। लेकिन आयुष नई ड्रेस और नई किताबों और नए स्कूल के लालच में कुछ दिन तो स्कूल गए लेकिन पांचवें दिन ही ऐलान कर दिया...नाम कटवा दो। नहीं पढ़ना मुझसे। गांव भेज दो, बाबा के साथ रहूंगा। या म्यूजिक में नाम लिखवा दो। या स्केटिंग करवाना सिखवा दो। लेकिन पढ़ना नहीं है मुझे। उनसे भांति-भांति तरीकों से पूछा गया...भइया, गलती क्या हो गई, कमी क्य रह गई?? जब पूछो तो वो एक नया बहाना मारते थे...स्कूल में मैडम अंग्रेजी बोलती है, नहीं पढ़ना। वहां लाइट जाने पर गरमी लगती है, नहीं पढ़ना। वहां बच्चे मुझसे दोस्ती नहीं कर रहे, नहीं पढ़ना। वहां मैडम गुस्से में रहती है, नहीं पढ़ना। वहां सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई होती रहती है, खेलने-कूदने के लिए टाइम नहीं दिया जाता, नहीं पढ़ना...। पहले तो मजाक माना। लेकिन सुबह स्कूल जाने के समय दंगा शुरू करता और जबरन भेजने के बाद स्कूल से लौटने पर जो हिचक-हिचक कर रोना शुरू करता तो हम लोगों का भी कलेजा पिघल गया। लगा, बच्चा स्कूल में कुछ संकठ में है। गए स्कूल और मैडम से मिले। मैडम काफी सुंदर थीं। नाक में नथुनी वगैरह पहने और धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते वो मुझे तो अच्छी लगीं। हालांकि बच्चे की शिकायत भी यही थी कि अंग्रेजी ज्यादा बोलती हैं और वो गांव से भोजपुरी सीखकर और पहले पढ़ी गई अंग्रेजी भूलकर लौटा है। मैडम ने मुझे आश्वस्त किया, उसे किसी तरह की परेशानी नहीं होने दी जाएगी। अगले दिन फिर पंगा। उसके रोने पर स्कूल नहीं भेजा। लेकिन स्कूल की किसी तरह की चर्चा छिड़ते ही वह बुरी तरह रोने लगता। बाद में उसे बुखार भी हो गया। खाना-पीना छोड़ दिया। मुंह ऐसा हो गया जैसा कभी खाना न मिला हो। अंत में मैंने पत्नी को विश्वास में लेकर उसके सामने ऐलान कर दिया कि बेटा, फोन से बात कर ली है, तुम्हारा नाम कटवा दिया है। अब तुम घर पर मौज करो। उसके बाद से वो इतना खुश है कि क्या बताऊं। बिटिया सुबह स्कूल चली जाती है तो वो घर पर ही अपना बैग लेकर पढ़ने बैठ जाता है और थोड़ी बहुत देर मुझे बेवकूफ बनाने के बाद कार्टून चैनल खोल लेता है। लेकिन है बिलकुल मस्त। मैने उससे कहा-- बेटा नहीं पढ़ोगे तो तुम्हें गोबर फेंकना होगा, गरीब बच्चों की तरह कूड़ा बीनना होगा...जाने कितने तरीकों से उसे डराता हूं लेकिन वह सबका जवाब एक-एक कर देता रहता है। जैसे वह कहता है कि गोबर क्यों फेंकूंगा..गांव में नौकर होते हैं न, वो काम करते हैं, मैं तो ठाकुर हूं। बाबा ने सब बता दिया है। मुझे कहना पड़ा-- भाई साहब, मैं तो चमार हूं। लेकिन पढ़ना तो शुरू करो। फिर वो कहता है....गरीब बच्चों की तरह कूड़ा नहीं बीनूंगा..तुम मुझे एक सर जी को घर पर लगा लो, वो रोज पढ़ाने घर पर ही आएँगे। लेकिन मैं स्कूल नहीं जाऊंगा.....।।
फिलहाल चार दिन हो गए। वो स्कूल नहीं जा रहा। उसे पता है कि उसका नाम कटवा दिया है लेकिन दरअसल कटवाया नहीं है। 30 तारीख की सुबह उसे जबरन स्कूल भेजने की तैयारी है। देखता हूं, क्या होता है। लेकिन उसकी दशा देखकर मेरी तो इच्छा उसे पढ़ाने की नहीं हो रही। सोच रहा हूं, म्यूजिक वाली क्लास में ही एडमीशन करा दूं। लेकिन पत्नी हैं कि दुर्गा बनी हुई हैं। आफिस से घर लौटने पर बताती हैं कि इसने घर में कितने बवाल काटे और कितने सामान तोड़े-फोड़े।
और अंत में....
एक दिन वीकली आफ के दिन कार पर आयुष आगे बैठ मेरे साथ निकले। बिटिया और उनकी मम्मी को घुमा-खिला कर घर छोड़ने के बाद निकले थे। आयुष और मैं ऐसा मानते हैं कि जब औरतें घर चली आएं तो पुरुषों को एक बार फिर निकलना चाहिए बाहर। यह तर्क अपने स्वार्थ में इजाद किया था। उनके सामने तो पीने से रहा। बाद में अकेले निकलता हूं तो कहीं क्वाटर या बच्चा लेकर गाड़ी में बैठे-बैठे ही मार लेता हूं। तो उस दिन जब देर तक घूमते रहे तो आयुष ने मन की बात तड़ ली। बोला--बहुत देर से इधर-उधर गाड़ी घुमा रहे हो। चलो मुझे पेप्सी दिलवा दो और अपने लिए दारू ले लो। फिर घूमेंगे। मैं भौचक....उसने मेरे दिल की बात कैसे जान ली?? फिर मुझे लगा...भई, ये नई पीढ़ी तो बहुत चतुर-सुजान है। हम लोग खामखा अपने को तुर्रम खां समझते हैं। ये सब तो अपन के सिर के सारे बाल बीन ले जाएंगे.....।
फिलहाल मुझे टेंशन उसकी कल की क्लास को लेकर है...। भगवान मुझे ताकत दे और भड़ासी अपनी सलाह दें....।
जय भड़ास...
यशवंत
19.10.07
पहली बार चखी तो बुरी लगी
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यशवंत सिंह yashwant singh
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आखिर मैं किस दिन डूबूँगा, फिकरें करते हैं....
कल मोबाइल का इनबाक्स खाली कर रहा था। अमूमन मैं सभी नसीहत टाइप, या कोरी भावुकता वाले या फिर फालतू की शेरो शायरी के मैसेज पढते ही डिलिटिया देता हूं, बस अच्छे वाले कपडों के अंदर झांकते थोडे हिलोरें जगाते और फाडू टाइप के मैसेज ही रखता हूं. लेकिन साल की शुरुआत का एक मैसेज अभी तक मरा नहीं था ससुरा कोना पकडे मेरा मुंह चिढा रहा था. ओपन किया तो देखा मैसेज था--
तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो/
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो.
हम हैरत में कि ऐसी सलाह कौन दे रहा है और क्या खाकर दे रहा है. ये कानपुर वाले दिनों का मैसेज था. यानी सचिन भाई बुंदेलखंडी को कोई उंगल कर रहा था. दिमाग पर जोर डाले तो पता चला यह नंबर अपने यंशवंत गुरु इस्तेमाल करते थे कानपुर में. बात समझ गये. शेर तो उन्होंने छांटकर मारा था. हां याद आया कि उस समय हम भी जवाब भेजे थे कि--- हमने तमाम उम्र अकेले सफर किया हम पर किसी खुदा की इनायत नहीं रही.
लेकिन भडासियों यंशवंत भाई वाला शेर था दमदार। सोचा यशवंत भाई ने लिख मारा क्या? फिर अपनी ही सोच पर हंसी आई कि भाई ऐसे कामों में दिमाग उन दिनों नहीं लगाते थे. तब तो बस आई नेक्स्ट आई नेक्स्ट ही भजते रहते थे. कमाल का डेडीकेशन था. खैर फिर सोचा कहीं रियाज भाई ने तो माल मुहैया नहीं कराया. उनका यह शगल है जब जिसे जरूरत हो रियाज भाई मौका देखकर चौका मारने वाला शेर पटक देते हैं. बिल्कुल चैलेंज के अंदाज में कि लो अब इससे बेहतर हो तो सुनाओ नहीं तो निकल लो.
काफी जद्दोजहद के बाद मुझे अगली लाइन याद आई ॥ तो मामला कुछ यूं बना कि --
तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो।
फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो
इश्क खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो।
लगे हाथ शायर का नाम भी याद आ गया। राहत इंदौरी। और जिज्ञासा बढी तो किताबें खंगाली.
इनमें राहत भाई अर्ज करते हैं---
आज हम दोनों को फुरसत है, चलो इश्क करें/ इश्क दोनों की जरूरत है, चलो इश्क करें
इसमें नुकसान का खतरा ही नहीं रहता है/ ये मुनाफ़े की तिजारत है, चलो इश्क करें
आप हिन्दू, मैं मुसलमाँ, ये ईसाई, वो सिख/ यार छोड़ो ये सियासत है, चलो इश्क करें
और भी है जरा गौर फरमाइये. मुझे लगता है यह शायरी में एक अलग किस्म का प्रयोग है. हिंदी में यही भारतेंदू के बाद इधर विनोद कुमार शुक्ल ने किया हुआ है
उसकी कत्थई आँखों में है, जन्तर-मन्तर सब/ चाकू-वाकू, छुरियाँ-वुरियाँ, खंजर-वंजर सब
जिस दिन से तुम रूठी, मुझसे रूठे-रूठे हैं/ चादर-वादर, तकिया-वकिया, बिस्तर-विस्तर सब
मुझसे बिछड़ कर वो कहाँ पहले जैसी है /ढीले पड़ गए कपड़े-वपड़े, जेवर-वेवर सब
आखिर मैं किस दिन डूबूँगा, फिकरें करते हैं/ दरिया-वरिया, कश्ती-वश्ती, लंगर-वंगर सब
जय भडास
सचिन
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यशवंत सिंह yashwant singh
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कोई दोस्त है ना रक़ीब है.......
((जगजीत सिंह की गायी और राना सहरी की लिखी एक गजल और पेश कर रहा हूं))
कोई दोस्त है ना रक़ीब है,
तेरा शहर कितना अजीब है.
वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है.
यहां किसका चेहरा पढा करूं,
यहां कौन इतना क़रीब है.
मैं किसे कहूं मेरे साथ चल,
यहां सब के सर पे सलीब है.
तुझे देख कर मैं हूं सोचता
तू हबीब है या रकीब
तेरा शहर कितना अजीब है.
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ऐ ग़म ए दिल क्या करूं
((कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा है पर वो नज़्म जो मजाज़ की लिखी है,
मैं यहां लिख देता हूं.))
शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती सडकों पे आवारा फिरूं
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-बदर मारा फिरूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर दहकी हुई शमशीर सी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
ये रुपहली छांव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर जैसे आशिक़ का ख़्याल
आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
फिर वो टूटा इक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में आई ये मोती की लड़ी
हूक-सी सीने में उट्ठी, चोट-सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
रात हंस हंसके ये कहती है कि मैख़ाने में चल
फिर किसी शाहनाज़े-लाला-रुख़ के काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
हर तरफ़ है बिखरी हुई रंगीनियां रानाइयां
हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगडाइयां
बढ रही है गोद फैलाए हुए रुसवाइयां
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
रास्ते में रुक के दम ले लूं मेरी आदत नहीं
लौटकर वापस चला जाउं मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवां मिल जाए ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
मुन्तज़िर है एक तूफ़ाने-बला मेरे लिए
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए
पर मुसीबत है मेरा अहदे-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
जी में आता है अब अहदे-वफ़ा भी तोड़ दूं
उनको पा सकता हूं मैं, ये आसरा भी छोड़ दूं
हां मुनासिब है, ये ज़ंजीरे-हवा भी तोड़ दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
इक महल की आड से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
जैसे मुफ़लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
दिल में इक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूं
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूं
ज़ख्म सीने में महक उठा है, आख़िर क्या करूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
जी में आता है ये मुर्दा चांद तारे नोच लूं
इस किनारे नोच लूं और उस किनारे नोच लूं
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकडों चंगेज़ो नादिर हैं नज़र के सामने
सैकडों सुलतानो जाबिर हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
बढ के इस इन्द्रसभा का साज़ ओ सामां फूंक दूं
इस का गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं
तखते सुलतान क्या मैं सारा क़स्र ए सुलतान फूंक दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
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मायने - नाशादो-नाकारा-उदास और बेकार, क़ुमक़ुम- बिजली की बत्ती, शमशीर- तलवार, तसव्वुर- अनुध्यान, मैखाना- मधुशाला, शहनाज़े लाला रुख़- लाल फूल जैसे मुखड़े वाली, काशाने- मकान, इशरत- सुखभोग, फ़ितरत- स्वभाव या प्रकृति, हमनवा- साथी, तूफ़ाने-बला- विपत्तियों का तूफ़ान, वा- खुले हुए, अहदे-वफ़ा- प्रेम निभाने की प्रतिज्ञा, माहताब-चांद, अमामा- पगड़ी, मुफ़लिस- ग़रीब, शबाब- यौवन, मज़ाहिर- दृश्य, सुल्ताने जाबिर- अत्याचारी बादशाह, शबिस्तां- शयनागार, क़स्रे सुल्तान- शाही महल
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अनिल सिन्हा
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यशवंत सिंह yashwant singh
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बाजार में सब नंगे हैं...
कई विषय हैं जिन पर भडा़स मन में भरी पड़ी है। आज सोच रहा हूं एकृ-एक कर सभी को निकाल ही दूं। सबसे पहले अशोक मलहोत्रा के बारे में।
हर्षद मेहता, तेलगी और अब अशोक मलहोत्रा... बाजार में सब नंगे हैं...
दिल्ली विधानसभा की कैंटीन का ठेकेदार जो कभी तिपहिया चलाता था, आज अरबपति बना बैठा है। उसके पास पचासों गाड़ियां मिला हैं जिसके नंबर वीवीआईपी मतलब एक या दो या तीन टाइप के नंबर हैं जो सीधे दिल्ली का परिवहन मंत्री हारून जारी करता है। यह तो साफ है कि हारून का यार है अशोक मलहोत्रा। दूसरे, भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेताओं के अलावा अफसरों का भी दामाद है अशोक मलहोत्रा। भाई, क्या जमाना आ गया है। अगर तीन-पांच में आपकी रुचि है तो आप भी कभी भी बड़े आदमी बन सकते हो। कुछ मेरे पत्रकार मित्र मुझे फोन कर बताते हैं कि वो देखो, फलां पत्रकार ने ये गाड़ी ले ली, फलां पत्रकार ने वो वाला बंगला खरीद लिया, फलां पत्रकार ने बर्थडे पर क्या शानदार पार्टी दी है.....तो मैं यही कह सकता हूं भाई कि, अगर आप तीन-पांच नहीं कर रहे हो तो तीन-पांच करने वालों से जल क्यों रहे हो। अगर वो अफसरों और नेताओं को पटा कर खुद कमा रहा है और उनको लाभ दिला रहा है तो हम लोगों को जलने की जरूरत क्या है। लेकिन, सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि ऐसे हर्षद मेहता, तेलगी और अशोक मलहोत्रा अब इस देश में बिखरे पड़े हैं। ये सब बाजारवाद की देन हैं। बाजारवाद कहीं किसी को नैतिक नहीं रहने देता। अब ढिबरी लेकर खोजने पर लोग मिलेंगे जो कहेंगे कि मैं नैतिक हूं। जो जहां हैं वहां कमाने की फिराक में है। और, मजेदार तो ये है कि संस्थान, सत्ताएं और संगठन अब कमाई करने को कतई गलत नहीं मानते। बस, इनका ये मानना है कि अकेले ना कमाओ, हमें लाभ पहुंचाओं, अपने लिए भी माल बनाओ। पत्रकारिता में ही देखिए.....जिनके पास मिशन चलाने का काम था अब वो रेवेन्यू का काम देखने लगे हैं। जो इस काम को गलत कहेगा उसे पागल घोषित कर दिया जाएगा। मैं भी थोड़े खुले दिमाग का हो गया हूं। कम बोलता हूं इन विषयों पर वरना हाशिए पर जाने का खतरा पैदा हो जाएगा। हालांकि हाशिए पर जाने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन बात वही है ना, जब क्रांति करने गए थे और न कर पाए तो अब जब नौकरी करने आए हैं तो कम से कम यही काम ठीक से कर लें। लेकिन बावजूद इसके.....इन तेलगियों, हर्षद मेहातओ और अशोक मलहोत्राओं के कारनामों के सुनकर झांटें सुलगती रहेंगी।
मैं तो कोदे के खिलाफ और संजय के साथ हूं
राहुल भाई बजार वाले ने संजय को सजा मिलने वाले दिन ही धांय से लिख मारा.....ठीक हुआ कुत्ते को सजा मिल गई....कुछ इसी टाइप में अपनी भड़ास निकाल ली लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हूं। मुझे लगता है कि यह रेयरेस्ट मामला है। आरोपी अब पूरी तरह सुधर चुका है, जब उसने गलती की थी वो एक बेहद दहशत के दौर में की थी जब मुंबई में दंगे हो रहे थे और उसके सेकुलर पिता को मारने और घर को उड़ाने की धमकियां दी जा रही थीं। उसे लगा, जब मर ही जाएंगे तो उससे अच्छा है जीते जी न मरने का इंतजाम कर लिया जाए। भाई ने जहां से हो सका हथियार बटोरा और घर पर रखा। भई, ये तो हम लोग भी करते हैं। मैं तो अपनी गाड़ी में एक लंबा वाला छुरा लेकर हमेशा चलता हूं। पता नहीं, रात-बिरात कभी किसी शैतान से भिड़ंत हो जाए तो केवल हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता ही ना रहूं बल्कि मौका देखकर उसकी गांड़ में घुसेड़ दूं। तो यह आत्मरक्षा का अधिकार है। बाकी रही बड़े अपराधियों के साथ रिश्ते रखने की तो भई कौन नहीं रखता। चैनल वालों ने न जाने कितने वीडियो दिखाए हैं जिसमें विदेश में भाई लोगों की पार्टीज में बालीवुड वाले किस तरह नाचते गाते रहते हैं। लेकिन इनमें से किसी का कुछ नहीं हुआ। वैसे भी, संजय दत्त ने जो कुछ किया वो सहजता में किया और उसके पीछे मंशा देश और समाज को नुकसान पहुंचाने की कतई नहीं थी। दरअसल ये जो जज कोदे है ना, उसने जानबूझकर ऐसा फैसला दिया ताकि न्यायिक इतिहास में वो अमर हो जाए और उसे कहा जाए कि वह सेलेब्रिटी के आगे झुका नहीं। बात यहां झुकने की नहीं, बात यहां जेनुइन जस्टिस की है। जैसे जेसिका मर्डर केस में गवाह और साक्ष्य न होते हुए भी और फाइल बंद करने के फैसले के बावजूद लोगों के विरोध के बाद कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर मामले को फिर से खोला और लोगों को उकसाकर गवाही कराई और फिर दोषियों को सजा सुना दी। इसी तरह इस मामले में भी मुन्नाभाई के मन की मंशा को समझते हुए उसके व्यवहार को देखते हुए और उसके द्वारा किए गए कारनामे को एक आत्मरक्षार्थ कार्रवाई बताते हुए उसे दो वर्ष की काटी गई जेल के आधार पर रिहा कर दिया जाना चाहिए। मतलब दो साल की सजा होनी चाहिए थी और ये सजा काट चुके होने के कारण उसे रिहा कर दिया जाना चाहिए। भई, मैं तो दिल से कोदे के खिलाफ हूं और संजय के साथ हूं।
फिलहाल इतना ही
जय भड़ास
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इस दौड धूप में क्या रक्खा....
यहां मैं दुष्यंत कुमार के कुछ कम परिचित शब्दों का गुच्छा प्रस्तुत कर रहा हूं....
इस दौड धूप में क्या रख्खा आराम करो आराम करो
आराम जिंदगी की कुंजी इससे न तपेदिक होती है
आराम सुधा की एक बूंद तन का दुबलापन खोती है
आराम शब्द में राम छुपा जो भव बंधन को खेता है
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है
इसलिए तुम्हें समझाता हूं मेरे अनुभव से काम करो
इस दौड धूप में क्या रख्खा आराम करो आराम करो.....
जय भडास
सचिन
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यशवंत सिंह yashwant singh
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सावन के बहाने दारू पीना छोड़ दो.....
एक मित्र हैं। वे आजकल ड्राई मंथ के दौर से गुजर रहे हैं। बिलकुल मुंह बंद कर लिया है। मसाला बंद। दारू बंद। गंदी बातें बंद। सिर्फ सच कहूंगा और सुनूंगा। इसके सिवा न कुछ लूंगा न दूंगा। वजह जाननी चाही तो बोले....पूरे साल नंगई करते हैं। जब जी चाहा मसाला और पान खाते हैं, शाम होते ही जब जी चाहा दारू, बीयर और व्हिस्की पीते हैं। शरीर के अंदर जो सिस्टम है न, यह सब झेलते झेलते पक चुका है। उसकी ओवरहालिंग जरूरी है। इसीलिए हिंदुओं में सावन का महीना आता है और मुस्लिमों में रोजे का महीना। इन महीनों में अगर हम दारू और मसाला नहीं छोड़ते हैं तो मुंह और पेट का कैंसर पक्का है। उनकी बात सुनकर लगा, सही कह रहे हैं। थोड़ा डरा मैं। मुझे सामने मौत नाचती नजर आई। यमराज दिखने लगे। जैसे उन्होंने आदेश दे दिया हो कि हे कैंसर भाइयों, यशवंत के पास पहुंचो। पीछे से मैं लाश के वास्ते लिखी बस लेकर आता हूं। मित्र की आवाज से मेरा दुःस्वप्न टूटा। उन्होंने मुझे डराना जारी रखते हुए बात को थोड़ा और विस्तार दिया और मेरे परेशान चेहरे की तरफ एकटम घूरते हुए आत्मविश्वास पूर्वक बोले....देखो, हर हफ्ते में एक दिन उपवास रखने का चलन क्यों है?? इसके पीछे धार्मिक रीजन इसलिए है क्योंकि साइंटिफिक बेस है। इसलिए ताकि इनर सिस्टम ठीक रहे। विषैली गैसें निकल जाएं। कोने-अंतरे में पड़े हुए पुराने टाइप के मल बाहर निकल आएं। साथ ही, हमारी उमर बढ़ जाए। यह साइंस में सिद्ध हो चुका है कि हफ्ते में एक दिन उपवास रखने वालों के मुकाबले रोज खाने वाले जल्दी मरते हैं। तो बंधु, यह सब चूतियापा एक महीने के लिए कैंसिल कर लो और बाकी ग्यारह महीने मन लगाकर हंगामा करो और मस्ती करो। उनकी बात सुनकर मैं अंदर से प्रभावित हुआ। मैंने अपने नास्तिक होने को मन ही मन गरियाना शुरु कर दिया...ये आस्तिक लोग तो मंगलवार और सावन आदि के नाम पर ड्राइ डे और ड्राइ मंथ मना लेते हैं जिससे उनका शरीर और अंदर का हाजमा फिट रहता है। अपुन लोग तो नास्तिक होने के बाद कउनो हनुमान जी और मंगल बेफे सावन रोजा को नहीं मानते। दिन चाहे दुर्गा जी का हो या हनुमान जी का, बकरा और दारू मिल जाए तो फिर क्या....हो जाता है यम-यम-चप-चप। लेकिन सही बात है, रोज-रोज एक ही काम करने से अंदर वाली मशीन तो कभी गड़बड़ा ही सकती है। देखो, कार की भी सर्विसिंग करानी पड़ती है। तो शरीर की सर्विसिंग भी जरूरी है। खैर, मुझे लगा कि मामला आस्तिक या नास्तिक का नहीं है, यह मामला विल पावर का है। कई ऐसे आस्तिक देखे हैं जो रोज हनुमान चलीसा पढ़ते हैं और शाम को लौंडियों को लाइन मारते हैं। चुपके से पैग लगाकर घर जाते हैं और पूछने पर बताते हैं कि होमियोपैथी की दवा खाई है। तो, बात आस्तिक नास्तिक की नहीं, विल पावर की है। खैर, सावन के कई दिन गुजर चुके हैं और मुझे देर से ही यह बात पता चली है (हालांकि मेरी पत्नी हर साल सावन में मुझे सुधारने की कोशिश करती है लेकिन बजाय मैं सुधरने के, उन्हें भी सावन में नानवेज खाने की आदत डाल दी है..... ऐसी पत्नियां सबको मिले) तो भी सावन के नाम पर नहीं बल्कि बढ़ती उम्र और खराब होते लीवर (अभी तक तो सलामत है, लेकिन अंदर का हाल कौन जाने?) के नाम एक महीने तक किसी भी तरह के मसाले और मदिरा और मांस से छुट्टी ले लेनी चाहिए। हालांकि कल रात तक व्हिस्की पी। छुट्टी का दिन था। बच्चों को लेकर घुमाने निकला। सबने कोल्ड ड्रिंक की फरमाइश की तो फौरन लाया। सबको कोल्ड ड्रिंक गिलास में उड़ेलकर दिया, अपनी वाली गिलास में ड्राइविंग सीट के नीचे रखे पव्वे का ढक्कन खोलकर मिला लिया। बच्चों ने पीने के बाद कहा, पापा मजा नहीं आया, अबकी माजा ले आओ। पहले तो मन हुआ कि मना कर दूं लेकिन देखा कि पव्वे में एक पैग पड़ा है तो फौरन माजा ले अया और सबको पिलाया। अपने वाली गिलास में माजा में व्हिस्की का अंतिम पैग भी मिला लिया। मेरे लाख छिपाने के बावजूद आयुष बीच-बीच में मेरे हरामीपने को कनखियों से देख ले रहा था--- वो आखिर में बड़े प्यार से पूछ ही बैठा...पापा, तुम दारू कोल्डड्रिंक में भी पिला के पी लेते हो और माजा में भी?? पानी के साथ भी पी लेते हो और सोडा में भी?? क्या दारू को सब्जी और दाल में भी मिला के पी सकते हो?? उसका सवाल सुन के मैं सन्न। मैंने कोई जवाब नहीं दिया...थोड़ा डपट दिया...चुप्प रहो,,,जब देखो तब टांय-टांय बोलते रहते हो। मौका हाथ लगा देख सिम्मी दीदी (आयुष की बड़ी बहन) बोल पड़ीं--ठीक कहते हो पापा, जब देखो टांय-टांय बोलता रहता है। पढ़ने का नाम नहीं लेता, बोलने को कह दो तो बोलता ही रहेगा। मैंने उसे भी कहा--अच्छा तुम भी चुप रहो। लेकिन मन में ही अपने मन से मैंने पूछा--क्या सब्जी और दाल में भी मिला के पी सकते हो यशवंत?? अंदर से जवाब आया..हालात और परिस्थिति पर डिपेंड करता है। अगर पानी बिलकुल न हो, और इफरात में दाल ही दाल उपलब्ध हो तो जाहिर सी बात है दाल में डालकर दाल का जूस पीने का आनंद उठाते हुए ह्विस्की को सिप किया जा सकता है.....खैर, मैने सिर झटक दिया।
तो, भई, सोच रहा हूं २ अगस्त से लेकर २ सितंबर तक के दौर को ड्राई मंथ घोषित कर दूं। अगर बीच में विल पावर डोल जाता है तो इसके बारे में भड़ास पर जरूर लिखूंगा। हां, अगर किसी भडा़सी के पास हाऊ टू डेवलप आवर विल पावर जैसे विषय पर कोई शोध हो तो वो मुझे जरूर बताए या पढ़ाए, मैं उसका आभारी रहूंगा।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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शराब कड़वी नही होती
सावन आ गया है । दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों मे कभी तेज़ तो कभी धीमी बरसात हो रही है । बगल के घर मे बजते रेडियो पर अक्सर 'रिमझिम गिरे सावन - सुलग सुलग जाये मन ' भी बजता रहता है । अब मुझे ये नही पता कि वहाँ किसका मन सुलगता है और किसका नही। अपन का भी सुलगता है अगर इस रिमझिम बरसात मे घूँट ना लगे। आह्हा.... बरसात हो रही हो , हम घर की बालकनी मे मूढे पर बैठे हों , एक हाथ मे जाम हो और एक मे सिगरेट । ज्यादा बड़ा घूँट नही , छोटा छोटा सिप मारते हुए सामने पानी से सरोबार हो रही गली को देखना और शून्य मे खो जाना कितना रोमांटिक है (लेकिन हाँ , तब तक एक पैग ख़त्म हो जाना चाहिऐ , ये दूसरे पैग की बात है, ताकि सुरूर तो आया ही रहे )। यशवंत भाई ने कहा था चीयर्स करने को यहाँ भी सो अपन भी आ गए मैदान मे। भला दारू की बात हो , बरसात भी साथ मे हो तो अपन कहॉ पीछे रहने वाले ! सो हमसे रहा नही गया। कल गए और खरीद लाए एक पव्वा । रात मे बरसात हुई तो वैसे ही पी जैसे अभी ऊपर बताया था।जब पीते पीते टुन्न हो गए तो लिखना शुरू किया । (ज्यादा पीने वालो के लिए : बहुत दिन से अगर न पियें तो एक पव्वे मे ही टुन्न हो सकते हैं) एक गाना लिखा , हालांकि लिखा तो बहुत कुछ लेकिन वो यहाँ अभी नही दूंगा। भविष्य मे मौक़े आने पर उसे पोस्ट करुंगा ।ये है एक शराबी का गाना। जो आपकी पेशे खिदमत है .....
शराबी का गाना
शराब कड़वी नही होती
शराब मे नशा नही होता।
शराब दुःख नही देती ,
शराब सुख नही देती।
शराब पनीली होती है,
शराब नशीली होती है ।
शराब के लिए जीवन ख़त्म किया जा सकता है ,
शराब के लिए जिया जा सकता है।
शराब से अपराध का रिश्ता नही होता ,
शराब से निरपराध रिश्ता नही होता।
शराब महकती है ,
शराब गमकती है।
शराब से कुछ होश नही रहता ,
शराब के बाद कोई बेहोश नही रहता।
शराब कोई पीता ही नही ,
शराब से कोई जीता ही नही ।
शराब बेहिसाब होती है ,
शराब लाजवाब होती है ।
गाने शराब से बनते हैं ,
रुदाली भी शराब पीती है ।
लेकिन रुदाली तो जीती है।
रोती है , पीती है , जीती है।
बाक़ी तो शराब के इतने यादगार पल हैं जिन्हे सबको बताना है लेकिन वो आज नही , फिर कभी। तब तक साथियों ....
राहुल की तरफ से
जय भड़ास !!
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यशवंत सिंह yashwant singh
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....तो रामनामी बेचने या रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं है....
अखबार में काम करते हुए ढेर सारी खबरें निगाह से गुजरती हैं पर वह हमारे मानस पर असर नहीं करतीं क्योंकि हम उन हलवाइयों की तरह हो चुके होते हैं जो भांति-भांति की मिठाइयां तो पकाते हैं और लेकिन उन्हें खाए बिना ही उनका पेट भरा रहता है क्योंकि उनकी खुशबू उनके जेहन में इस कदर उतर चुकी होती हैं कि उनकी खाने की इच्छा ही मर चुकी होती है। लेकिन कुछ खबरें होती है जिन्हें पढ़कर अपना गांव, जहान, दोस्त, अतीत....याद आने लगते हैं। हिंदू के पत्रकार साईंनाथ के हवाले से एक खबर आई...खेती अब मौत का रास्ता है....पूरी खबर पढ़ने के बाद लगा वाकई, यही हाल है। उन्होंने कहा कि अगर मर्सीडीज बेंज खरीदनी हो तो आपको लोन साढ़े आठ परसेंट में मिल जाएगा लेकिन अगर ट्रैक्टर खरीदने की इच्छा है तो लोन तेरह परसेंट में मिलेगा। इसी तरह उन्होंने बताया कि पहले लोग गांव से शहर मजदूरी के लिए भागते थे क्योंकि खेती से कुछ मिलता नहीं था, अब लोग शहर में जाकर गुलाम बन जा रहे हैं। झारखंड की लाखों लड़कियां और औरतें दिल्ली में गुलामों सी जिंदगी जी रही हैं। वे यहां के साहब-सुब्बा लोगों के यहां घरेलू नौकरानी के रूप में रखी गई हैं। आए दिन इनसे बलात्कार और इनके उत्पीड़न की खबरें आती हैं।
अपने गांव की तरफ झांकता हूं जहां अभी दो महीने गुजार के आया हूं, तो यहां यही हालत है। जिस घर में कोई कमाने वाला नहीं है और सिर्फ खेती सहारा है तो वहां इस कदर पैसे के लिए झगड़ा है कि रसोई बंट चुकी है। बंटवारे के बाद लोगों के पास ईट खरीदने के लिए भी पैसा न होने से इंटों को एक के ऊपर एक करके अलग-अलग गृहस्थी बनाई गई है। बेहद दयनीय हाल है। उन दलितो और पिछड़ों की तो बात ही न करिए जिनके पास खेत नहीं है। उनके लड़के कतई गांव में नहीं रहना चाहते। वे मुंबई और सूरत भाग जाते हैं। मेरे घर पर जो काम करने आती है उससे एक बार पूछा कि दिल्ली क्यों आई। तो उसका कहना था कि गांव में लोग काम भी कराते हैं और मजदूरी भी नहीं देते। वह महोबा की रहने वाली है। उसका पति रंगाई-पुताई का काम करता है और महीने में पंद्रह सौ रूपये कमा लेता है। उसकी पत्नी झाड़ू पोंछा से हजार बारह सौ कमा लेत है। दोनों की बेहद तल्ख जिंदगी किसी तरह खींचतान कर चल रही है। उनके बच्चे इस कदर बेचारे और मारे-मारे घूमते हैं कि देखकर दिल में हाहाकार सा उठता है।
दुनिया में आर्थिक तरक्की के लिए मशहूर हो रहा भारत अपने देश में ही अपनी जड़ों से किस कदर दूर होता जा रहा है, इसकी पड़ताल करने वाला कोई नहीं है। साइनाथ का कहना है कि ये खबरें अखबारों और टीवी पर नहीं आतीं क्योंकि इनमें पठनीयता नहीं होती। मेरा मानना है कि इन खबरों पर बेहद गहराई से काम करने की जरूरत है। असली पत्रकार वही है, साईनाथ की तरह जो समस्याओं की तह तक जाए, शोध करे और अपना एक विजन दे। बाकी तो पेट पालने का धंधा है, यहां से कमा लो या वहां से। धूमिल ने वो कहा है ना....
अगर जीने के पीछे कोई तर्क नहीं है तो रामनामी बेचने या रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं है....
मुझे हूबहू लाइनें तो याद नहीं है लेकिन संभवतः उसका भाव यही है। मुझे ये लाइनें इसलिए अच्छी लगती हैं क्योंकि पत्रकारिता में जिस मकसद से लोगों को आना चाहिए, वो अब खत्म है, लोग कमाने के चक्कर में आ रहे हैं। जहां तर्क नहीं होगा वहां असली मुद्दों पर कैसे बहस हो सकती है।
फिलहाल इतना ही..
जय भड़ास
यशवंत सिंह
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यशवंत सिंह yashwant singh
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कहीं इक मासूम नाज़ुक सी लड़की.....
कहीं इक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खूबसूरत बहुत भोली भाली
मुझे अपने ख्वाबों की बाहों में पाकर
कभी नींद में मुस्कुराती तो होगी
उसी नींद में करवटें बदलकर
सरहाने से तकिया गिराती तो होगी
वही ख्वाब दिन की खामोशी में आकर
उसे मन ही मन में लुभाते तो होंगे
कई साज़ सीने की खामोशियों में
मेरी याद से झनझनाते तो होंगे
वो बेसाख्ता धीमे-धीमे सुरों में
मेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी
मुझे कुछ लिखने वो बैठी तो होगी
मगर उंगलियां कंपकंपाती तो होंगी
क़लम हाथ से छूट जाता तो होगा
क़लम फिर से वो उठाती तो होगी
मेरा नाम अपनी निगाहों में लिखकर
वो दांतों में उंगली दबाती तो होगी
जुबां से कभी उफ्फ निकलती तो होगी
बदन धीमे-धीमे सुलगता तो होगा
कहीं के कहीं पांव पड़ते तो होंगे
ज़मीं पर दुपट्टा लटकता तो होगा
कभी सुबह को शाम कहती तो होगी
कभी रात को दिन बनाती तो होगी
कहीं एक मासूम, नाज़ुक सी लड़की
बहुत खूबसूरत मगर भोली भाली
.....................................रियाज़
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यशवंत सिंह yashwant singh
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अजब पागल सी लड़की है........
अजब पागल सी लड़की है
मुझे हर ख़त में लिखती है
मुझे तुम याद आते हो
तुम्हें मैं याद आती हूं
मेरी बातें सताती हैं
मेरी नींदें जगाती हैं
मेरी आंखें रुलाती हैं
सावन की सुनहरी धूप में
तुम अब भी टहलते हो
किसी खामोश रस्ते से कोई आवाज़ आती है
ठहरती सर्द रातों में
तुम अब भी छत पे जाते हो
फलक के सब सितारों को मेरी बातें सुनाते हो
किताबों से तुम्हारे इश्क में कोई कमी आई?
या मेरी याद की शिद्दत से आंखों में नमी आई?
अजब पागल सी लड़की है............
मुझे हर ख़त में लिखती है
जवाब मैं भी लिखता हूं-
...मेरी मसरूफियत देखो
सुबह से शाम आफिस में
चराग़े उम्र जलता है
फिर उसके बाद दुनिया की
कई मजबूरियां पांवों में
बेड़िया डाले रखती हैं
मुझे बेफिक्र चाहत से भरे सपने नहीं दिखते
टहलने, जागने, रोने की मोहलत ही नहीं मिलती
सितारों से मिले अब अर्सा हुआ....... नाराज़ हों शायद
किताबों से ताल्लुक़ मेरा.... अभी वैसे ही क़ायम है
फर्क इतना पड़ा है अब उन्हें अर्से में पढ़ता हूं
तुम्हें किसने कहा पगली....
तुम्हें मैं याद करता हूं
कि मैं खुद को भुलाने की
मुसलसल जुस्तजू में हूं
तुम्हें ना याद आने की
मुसलसल जुस्तजू में हूं
मगर ये जुस्तजू मेरी
बहुत नाकाम रहती है
मेरे दिन रात में अब भी
तुम्हारी शाम रहती है
मेरे लफ्जों की हर माला
तुम्हारे नाम रहती है
तुम्हें किसने कहा पगली......
तुम्हें मैं याद करता हूं
पुरानी बात है जो लोग
अक्सर गुनगुनाते हैं
’उन्हें हम याद करते हैं
जिन्हें हम भूल जाते हैं’
अजब पागल सी लड़की है....
मेरी मसरूफियत देखो
तुम्हें दिल से भुलाऊं तो
तुम्हारी याद आती है
तुम्हें दिल से भुलाने की
मुझे फुर्सत नहीं मिलती
और इस मसरूफ जीवन में
तुम्हारे ख़त का इक जुमला
’तुम्हें मैं याद आती हूं?’
मेरी चाहत की शिद्दत में
कमी होने नहीं देता
बहुत रातें जगाता है
मुझे सोने नहीं देता
सो अगली बार खत में
ये जुमला ही नहीं लिखना
अजब पागल सी लड़की है....
मुझे फिर भी ये लिखती है
मुझे तुम याद करते हो?
तुम्हें मैं याद आती हूं?
..................... रियाज़
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यशवंत सिंह yashwant singh
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वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता, दुनिया के सबसे ख़तरनाक खाऊ लोग हैं!
इलाहाबाद और बीएचयू में जब हम लोग कविता पोस्टर लगाते थे तो उन पोस्टरों पर जो कविताएं होती थीं, उनमें वीरेन डंगवाल की कविताएं भी थीं। शुरुआत में वीरेन दा से परिचय इन्हीं कविताओं के जरिए हुआ। लखनऊ में जब एक अखबार की नौकरी से निकाला गया तो बेरोजगारी के उन दिनों में कहीं से पता चला कि वीरेन दा कानपुर में अमर उजाला के संपादक हैं। उन्हें फोन मिलाया, कविता पोस्टरों का हवाला दिया, अपनी हाल में प्रकाशित रचनाओं का जिक्र किया और नौकरी मांग ली। उन्होंने प्रेम से बात की, मिलने के लिए बुलाया। मुलाकात हुई और बात हुई। उसी पद व पैसे में (ट्रेनी, २००० रुपये) नौकरी का आफर दिया जो लखनऊ में करता था। बावजूद इसके, मैं बेहद प्रसन्न था। मुझे खुशी इसलिए हुई क्योंकि लखनऊ में उद्दंडता इतनी कर चुका था कि वहां नौकरी मिलने के चांस खत्म हो चुके थे, और कानपुर में नौकरी मिल गई। इससे ज्यादा खुशी इस बात से थी कि एक ऐसे संपादक के साथ काम करने का मौका मिला जो अपने लिखे के जरिए मेरे प्रिय रहे हैं। वीरेन दा के साथ लगभग तीन साल काम करने का मौका मिला। मैं कह सकता हूं कि वहां जितना सीखा, उतना बाद में कहीं नहीं। संभवतः उन्हीं दिनों की सिखाई से आज तक रोजी-रोटी की कमाई चल रही है। रिपोर्टिंग, डेस्क, संस्मरण, रिपोर्ताज, आत्मकथ्य के फंडे सीखने-समझने के साथ पेजीनेशन के गुण और गुर भी उसी कार्यकाल में सीखा। वीरेन दा से एक उत्कृष्ट मनुष्य के कई गुणों को आत्मसात करने की कोशिश की। उनकी सहजता, सरलता, कविताई, न्यूज सेंस, समाज व मनुष्य की समझ, आम आदमी से हमेशा जुड़ाव, मानवीयता...जाने कितने शब्द हो सकते हैं जिन्हें लिखूं तो भी अच्छाइयों को बयां नहीं कर सकता। खैर, यहां मकसद उनकी तारीफ के पुल बांधना नहीं, अपने पत्रकारिता के गुरु को याद करना व प्रणाम करना है। साथ में उनकी कुछ कविताएं फिर से पढ़ना और भड़ासियों को पढ़ाना है। साथ में यह संदेश देना भी कि बुरा बनकर आगे बढ़ने की कोई मजबूरी नहीं है। आप अच्छे मनुष्य बनकर भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं।
वीरेन दा से पिछली मुलाकात पिछले वर्ष बरेली में तब हुई जब मैं कानपुर में आईनेक्स्ट की नौकरी ज्वाइन करने मेरठ से जा रहा था। बरेली उनके यहां रुका, चाय-पकौड़ी खाई गई। वहीं पर मेरे ड्राइवर ने रोजा खोला। देर तक बतियाने के बाद रात में निकले, वीरेन दा की बातों और अदाओं को गुनते-बुनते, सोचते-मुस्कराते...।
रवि रतलामी जी और उनके रचनाकार का आभार, जहां से पूरी की पूरी रचना चोरी की है मैंने। उम्मीद है चोरी के एवज में वे कोई दंड नहीं देंगे क्योंकि उन्हें वैसे ही मैं बड़ा भाई और ब्लाग का गुरु मान चुका हूं। शिरीष कुमार मौर्य का भी आभार व्यक्त करना नहीं भूलूंगा जिन्होंने कविताओं का चयन किया और एक शानदार इंट्रो लिखा।
तो आज संडे को वीरेन दा की कुछ कविताओं का मजा लीजिए, साथ में दुआ करिए- हमारा प्यारा कवि और एक शानदार मनुष्य सदा भला चंगा रहे और जीवन में उम्र की सेंचुरी फिर डबल सेंचुरी मारे.....
यशवंत सिंह
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भारत की आज़ादी से ठीक 10 दिन पहले जन्मे वीरेन डंगवाल समकालीन हिन्दी कविता में लोकप्रियता और समर्पण, दोनों ही लिहाज से अपना अलग स्थान रखते हैं। उन्होंने मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल और अन्त में चलकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। वे 1971 से बरेली कालेज में अध्यापन कर रहे हैं। इसके अलावा पत्रकारिता से उनका गहरा रिश्ता है और वर्तमान में वे दैनिक 'अमर उजाला' के सम्पादकीय सलाहकार है। विश्व-कविता से उन्होंने पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊश रोजेविच और नाज़िम हिकमत के अपनी विशिष्ट शैली में कुछ दुर्लभ अनुवाद भी किए हैं। उनकी ख़ुद की कविताएँ बाँग्ला, मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, मलयालम और उड़िया में छपी है। वीरेन डंगवाल का पहला कविता संग्रह 43 वर्ष की उम्र में आया। 'इसी दुनिया में' नामक इस संकलन को रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (1992) तथा श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार (1993) से नवाज़ा गया। दूसरा संकलन 'दुष्चक्र में सृश्टा' 2002 में आया और इसी वर्ष उन्हें 'शमशेर सम्मान' भी दिया गया। दूसरे ही संकलन के लिए उन्हें 2004 का साहित्य अकादमी सम्मान भी दिया गया। समकालीन कविता के पाठकों को वीरेन डंगवाल की कविताओं का बेसब्री से इन्तज़ार रहता है। वे हिन्दी कविता की नई पीढ़ी के सबसे चहेते और आदर्श कवि हैं। उनमें नागार्जुन और त्रिलोचन का-सा विरल लोकतत्व, निराला का सजग फक्कड़पन और मुक्तिबोध की बेचैनी और बौध्दिकता एक साथ मौजूद है
प्रस्तुत हैं उनके पहले संकलन 'इसी दुनिया में' से छह चर्चित कविताएँ.........
हम औरतें
रक्त से भरा तसला है
रिसता हुआ घर के कोने-अंतरों में
हम हैं सूजे हुए पपोटे
प्यार किए जाने की अभिलाषा
सब्जी काटते हुए भी
पार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुई
प्रेतात्माएँ
हम नींद में भी दरवाज़े पर लगा हुआ कान हैं
दरवाज़ा खोलते ही
अपने उड़े-उड़े बालों और फीकी शक्ल पर
पैदा होने वाला बेधक अपमान हैं
हम हैं इच्छा-मृग
वंचित स्वप्नों की चरागाह में तो
चौकड़ियाँ
मार लेने दो हमें कमबख्तो !
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तोप
कम्पनी बाग़ के मुहाने पर
धर रखी गई है यह 1857 की तोप
इसकी होती है बड़ी सम्हाल
विरासत में मिले
कम्पनी बाग की तरह
साल में चमकायी जाती है दो बार
सुबह-शाम कम्पनी बाग में आते हैं बहुत से सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिये थे मैंने
अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जे
अपने ज़माने में
अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियाँ ही अकसर करती हैं गपशप
कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
ख़ासकर गौरैयें
वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उनका मुँह बन्द !
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पी.टी.ऊषा
काली तरुण हिरनी
अपनी लम्बी चपल टाँगों पर
उड़ती है
मेरे गरीब देश की बेटी
ऑंखों की चमक में जीवित है अभी
भूख को पहचानने वाली विनम्रता
इसीलिए चेहरे पर नहीं है
सुनील गावस्कर की छटा
मत बैठना पी.टी.ऊषा
इनाम में मिली उस मारुति कार पर मन में भी इतराते हुए
बल्कि हवाई जहाज में जाओ
तो पैर भी रख लेना गद्दी पर
खाते हुए मुँह से चपचप की आवाज़ होती है?
कोई ग़म नहीं
वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता
दुनिया के
सबसे ख़तरनाक खाऊ लोग हैं !
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इन्द्र
इन्द्र के हाथ लम्बे हैं
उसकी उँगलियों में हैं मोटी-मोटी
पन्ने की अंगूठियाँ और मिज़राब
बादलों-सा हल्का उसका परिधान है
वह समुद्रों को उठाकर बजाता है सितार की तरह
मन्द गर्जन से भरा वह दिगन्त-व्यापी स्वर
उफ़!
वहाँ पानी है
सातों समुद्रों और निखिल नदियों का पानी है वहाँ
और यहाँ हमारे कंठ स्वरहीन और सूखे हैं।
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कवि - 1
मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ
और गुठली जैसा
छिपा शरद का ऊष्म ताप
मैं हूँ वसन्त का सुखद अकेलापन
जेब में गहरी पड़ी मूँगफली को छाँटकर
चबाता फुरसत से
मैं चेकदार कपड़े की कमीज़ हूँ
उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं
तब मैं उनका मुखर गुस्सा हूँ
इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे
उनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज़ है
एक फेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरी
उन्हें यह तक मालूम है
कि कब मैं चुप होकर गरदन लटका लूँगा
मगर फिर भी मैं जाता ही रहूँगा
हर बार
भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर
एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा
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कवि - 2
मैं हूँ रेत की अस्फुट फुसफुसाहट
बनती हुई इमारत से आती ईंटों की खरी आवाज़
मैं पपीते का बीज हूँ
अपने से भी कई गुना मोटे पपीतों को
अपने भीतर छुपाए
नाजुक ख़याल की तरह
हज़ार जुल्मों से सताए मेरे लोगो !
मैं तुम्हारी बद्दुआ हूँ
सघन अंधेरे में तनिक दूर पर झिलमिलाती
तुम्हारी लालसा
गूदड़ कपड़ों का ढेर हूँ मैं
मुझे छाँटो
तुम्हें भी प्यारा लगने लगूँगा मैं एक दिन
उस लालटेन की तरह
जिसकी रोशनी में
मन लगाकर पढ़ रहा है
तुम्हारा बेटा।
चयन एवं प्रस्तुति - शिरीष कुमार मौर्य)
साभारः रचनाकार
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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नारको टेस्ट से बाहर आएंगे तेरे पाप, अपन की भड़ास निकल गई....
हरामजदगी के दिन हैं...
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मूड आफ होने के ढेर सारे कारण होते हैं और कभी कभी कोई कारण नहीं होता। दस-पंद्रह दिन में एक बार ऐसा मूड आफ होता है कि खुद पर गुस्सा आने लगता है और घृणा होने लगती है---क्या साला, यह लाइफ है। खाना-कमाना-हगना-मूतना-नहाना-पहनना-नौकरी-चाकरी-ज्ञान-अज्ञान-ग्लैमर-हकीकत-बतकुच्चन....। वैसे, इससे अलग हो भी क्या सकता है। हर कोई चीज थोड़े दिनों में रूटीन लग सकती है बशर्ते उसमें कोई कनविक्शन न हो। कनविक्शन अब किस चीज में है? पता नहीं किस चीज में है। लेकिन आदमियों की भीड़ मुझे परेशान करती है। भीड़ खुश हो, प्रसन्न हो तो कोई बात नहीं, सबके सब साले बौराए हुए से जाने कहां गांड़ मराने भागते रहते हैं। उनमें से मैं भी हूं। जब कोई गलत तरीके से गाड़ी ओवटेक करता है या दाएं-बाएं से गुजरता है तो कुत्ते की तरह भौंकने का मन करता है, जी में आता है काट लूं लेकिन तब तक अंदर का इंसान जगता है....अबे साला तू भी, दिल्ली में तो पगलाए हुए लोग रहते ही हैं, तू भी गांड़ मराने लगा यहां आकर। रोज खबरें छपती हैं---बाइक वालों ने देर तक हार्न दिया, पास न मिला तो कार वाले भाईसाहब को गिराकर इतना लतियाया की उनके परान निकल गए। ऐसे गुस्से दिल्ली वालों के नाके पर होते हैं। तो बात कर रहा था मूड आफ का, सुबह इंडिया टीवी देख रहा था, चंडीगढ़ में दो लड़के एक पुलिस वाले को पीट रहे हैं और भाग रहे हैं। पुलिस ने दोनों का पता लगा लिया है। यह सीन बार-बार रिपीट कर रहे थे- पुलिस वाले की उसी के डंडे से पिटाई और फिर भागना। अब सोचिए, पुलिस वाले उनको पकड़ेंगे तो कितना पेलेंगे। सालों के गांड़ में डंडा घुसेडकर उलटा लटका देंगे थाने में फिर नाक से इतना पानी पिलाएंगे कि फेफड़ में जाकर फंस जाए और छटपटाते हुए आपको जीने से ज्यादा मौत में आनंद दिखने लगे। मेरठ में ऐसे कई टार्चर देखे थे। कइयों की तो मौत भी हो गई। रात में पीकर सीओ बताते थे, अगर न मारें तो साले कुछ उगलें न और उन्हें पुलिस से डर भी न लगे। लेकिन जो भी, जिस तरह पुलिस इलाहाबाद में सरेआम एक अपराधी के सरेंडर करने के अनुरोध के बावजूद गोली मारती है वह दिल दहला देने वाला था। बात यह नहीं है कि अपराधियों को मारा जाना चाहिए या नहीं बात यह है कि लोकतंत्र में इसी तरह से हर संस्थाएं अपने-अपने अधिकार के परे कुछ तानाशाही भरे अधिकार लेने लगें तो लोकतंत्र का मां चुद जाएंगी। फिर पाकिस्तान और इराक बनने में देर नहीं लगेगी। अभी तक हम जो आराम से बोल-गा-खा लेते हैं, वह सब खत्म हो जाएगा।
मूड आफ होने के कारणों की तलाश में फिर पीछे चलता हूं। अविनाश जी के साथ कुरतुलएन हैदर के आवास पर गया था। उनके इंतकाल की सूचना अविनाश जी से ही मिली। वह वहां एनडीटीवी के लिए लाइव रिपोर्ट कर रहे थे। उनको फोन आया तो साथ मैं भी हो लिया। काफी देर तक रहा। हम लोग जहां रहते हैं वहां से बस थोड़ी ही दूर सेक्टर २१ में उनका घर था लेकिन हममें से इससे पहले किसी को पता न था कि इतनी महान लेखिका यहीं रहती हैं। यही है अपने देश में साहित्यकारों की कद्र। जाने कितने बड़े पुरस्कार पाने वाली इस लेखिका का अंत कितना गुमनामी में गुजरा, इसके लिए मीडिया व सिस्टम दोनों को कोसा जाना चाहिए। मुन्ना भाई जमानत पर कब छूटेंगे, इसके लिए चार-चार रिपोर्टर लाइव करते हैं, संजू की गाड़ी के साथ उसकी प्रेमिका को फोकस में लेकर स्पीडी लाइव रिपोर्टिंग होती है, इस प्रोग्राम पर घंटों खेलते हैं लेकिन देश और समाज को अपने योगदान से समृद्ध बनाने वाले साहित्यकारों को कौन पूछता है।
मूड आफ होने के तीसरे कारण पर जाता हूं....लाख चाहने के बावजूद लड़कियां और औरतें मेरे सपने में आना बंद नहीं हो रहीं। अब कल की ही लीजिए, रात में एक उम्रदराज महिला सपने में आई। सपना बढ़ता गया तो पता चला कि वे भी एक ब्लागर हैं, सपना थोड़ा और परवान चढ़ा तो उन्होंने खुद का परिचय बताते हुए कहा कि मैं तो भड़ास की भौजी हूं। मैं हक्का-बक्का। नींद टूटने पर लगा कि ये भड़ास की भौजी कौन हैं? खैर, नाम बताऊंगा लेकिन होली से ठीक पहले। अभी जरा मैं तड़ लूं, भौजी इस लायक भी हैं कि नहीं उन्हें भड़ास की भौजी बनाया जाए। परेशानी इस बात की है कि मैं चाहता हूं कि सपने में अच्छी चीजें आएं लेकिन आती हमेशा गंदी चीजें हैं। ये जो फीमेल हैं न, इनके बारे में मेरी धारणा बहुत साफ है, दूर से देखो, पास जाओगे तो फंसोगे। लेकिन पास जाए बिना रहा नहीं जाता, दूर से देखने पर मजा नहीं आता। अजीब द्वंद्व है, संभवतः आज से नहीं जमाने से है। उम्मीद है कि आदम और हव्वा के इस द्वंद्व पर अविनाश जी जरूर प्रकाश डालेंगे। साला, उन दोनों को मना किया गया था कि फल न खा लेना। इस फल को कभी सेव की शक्ल में तो कभी दिल की शक्ल में दिखाया जाता है लेकिन उन दोनों ने माना नहीं और उसका पाप हर नौजवान भोगता है। जाने कितने लोग प्रेम में पागल होकर भागते हैं, मारे जाते हैं, तबाह होते हैं, तबाह करते हैं.....। बावजूद, मीठा फल को खाना बंद नहीं होता। एक नौजवान मित्र ने मुझे भी उकसाया। आरकुट पर फोटो लगाकर सिद्ध और गिद्ध गुरु की तरह बैठे रहोगे तो कुछ नहीं होगा। लड़कियां पटाने के लिए फर्जी नाम से कुछ साइट बनाओ। उसके चक्कर फंसकर कइ एक फर्जी साइट बनाकर सर्च के बाद पचासों लड़कियों को मैसेज और फ्रेंडशिप आफर कर आया लेकिन ससुरी किसा का जवाब भी नहीं आया। दरअसल, कुछ लोगों की किस्मत ही खराब होता है। वे भगवान के घर से जब चले थे तो उनकी किस्मत गदहा के लंड से लिखी गई थी। संभवतः उन्हीं में से मैं भी हूं। तो, फिर कसम खाता हूं (और इसे भी टूटना है)कि इन लड़कियों के चक्कर में नहीं पड़ूंगा और किसी कीमत पर इन्हें सपने में नहीं आने दूंगा। मोबाइल में जितने भी लड़कियों के नंबर फीड हैं सबको उड़ा दूंगा ताकि दो पैग लगाने के बाद उन्हें फोन न करने लगूं। इसी तरह अपने हाईस्कूल-इंटर के दिनों किए गए उस प्रतिज्ञा पर फिर पूरी तरह अमल करूंगा कि अगर सामने स्त्री दिख जाए तो फौरन निगाह झुका लो वरना पाप का मन में प्रवेश हो जाएगा और चंचल पानी मन उस पाप को दिल तक पहुंचाएंगा और हरामजादा दिल उस पाप संदेश को दिमाग तक पहुंचाएंगा और कंठित दिमाग उस पाप संदेश पर अमल करने की साजिशें शुरू करेगा और माधड़चोद साजिशें ऐसी कि अमल करो तो फंसो, न करो तो परेशान रहो।
खैर, इतना सब भड़ास निकालने के बाद में मेरा मूड अब कुछ हलका हो गया है लेकिन फटने इस बात से लगी है कि यह सब जो लिख दिया है उसे लोग पढ़ेंगे तो मेरे बारे में क्या धारणा बनाएंगे? इतना सीनियर पत्रकार और इतनी ओछी हरकतें? लेकिन मुझे मालूम है पढ़ने वालों, तुम लोगों ने भी कम पाप नहीं किए हैं, पूरे वाले पापी रहे हो, भेद न खोलो तो वो अलग बात वरना तुम्हारे काले दिल में जो राज दफ्न हैं, अगर उसको नारको टेस्ट के जरिए बाहर ला दिया जाए तो उपर लिखा हुआ मेरा लेख रामचरित मानस की पंक्तियां लगने लगेंगी और तुम्हारा बका-लिखा हुआ राज अब तक का सबसे सनसनीखेज खुलासा....औरतें मुंह पर हाथ रखकरे कहेंगी---हाय दइया,,,इ मुंहफुकवना, देखने में तो बड़ा शरीफ लगता है लेकिन ये ये धतकरम किए है, भगवान इसको कोढ़ी बनावे।
तो भाइयों, पढ़ो और मजा लो, अपने भेद मत खोलना वरना कोढ़ी बन जाओगे।..... हा .....हा ....हा ....हा ....हा ...हा ....हा
जय भड़ास
यशवंत सिंह
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यशवंत सिंह yashwant singh
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झुग्गीवाला देख रहा है, साठ लाख का गेट....

((कैलाश गौतम का फैन हूं मैं. अब वे तो नहीं रहे लेकिन उनके लिखे को कोई कैसे भूल पाएगा, खासकर मेरे जैसा खांटी देहाती आदमी। हर पल मन उसी गांव में रहता है जहां इंटर तक पढ़ाई की। कैलाश जी को पढ़ते हुए लगता है जैसे वे गांव में चौपाल पर बैठकर लाइव लिख रहे हों और उसे प्रस्तुत भी कर रहे हों। तब मैं अमर उजाला बनारस में था। मेरे मित्र गीतेश्वर का पुराना जान-पहचान था कैलाश जी से। या यों समझिए कि कैलाश जी ने गीतेश्वर को पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में काफी सहारा दिया था। गीतेश्वर उसे कैसे भूल सकते थे। जब उनसे कैलाश जी का जिक्र छेड़ो तो वह बर्राट की हुई जाने कितनी कविताएं तुरंत सुना देते थे। तो मैं और गीतेश्वर, नौकरी वाली रात की पाली निपटा कर एक साथ चल पड़े, कैलाश जी से मिलने। डीएलडब्लू पहुंचे, जहां कवि सम्मेलन था। कैलाश जी से देर तक बतियाए। बस वही मुलाकात रही मेरी लेकिन उनके लिखे से बहुत पहले से मेरी मुलाकात है। उनके बारे में जब थोड़ा डिटेल में जाना तो लगा, वाकई मर्द आदमी था। बेलाग जीता था, लिखता था और बोलता था। परोपकार और प्रेम तो जैसे उनके पोर-पोर में बसा हो। तो लीजिए...कैलाश भाई की कुछ कविताओं का मजा लीजिए.....यशवंत))
सौ में दस की भरी तिजोरी
नब्बे खाली पेट
झुग्गीवाला देख रहा है
साठ लाख का गेट।
बहुत बुरा है आज देश में
प्रजातंत्र का हाल
कुत्ते खींच रहे हैं देखो
कामधेनु की खाल
हत्या-रेप-डकैती-दंगा
हर धंधे का रेट।
बिकती है नौकरी यहां पर
बिकता है सम्मान
आंख मूंद कर उसी घाट पर
भाग रहे यजमान
जाली वीजा पासपोर्ट है
जाली सर्टिफिकेट।
लोग देश में खेल रहे हैं
कैसे कैसे खेल
एक हाथ में खुला लाइटर
एक हाथ में तेल
चाहें तो मिनटों में कर दें
सब कुछ मटियामेट।
अंधी है सरकार - व्यवस्था
अंधा है कानून
कुर्सीवाला देश बेचता
रिक्शेवाला खून
जिसकी उंगली है रिमोट पर
वो है सबसे ग्रेट।
जैसी नेतागीरी है जी वैसी अफसरशाही है
सिर्फ झूठ की पैठ सदन में सच के लिए मनाही है
चारों ओर तबाही भइया
चारों ओर तबाही है।
संविधान की ऐसी-तैसी करनेवाला नायक है
बलात्कार अपहरण डकैती सबमें दक्ष विधायक है
चोर वहां का राजा है
सहयोगी जहां सिपाही है।
जो कपास की खेती करता उसके पास लंगोटी है
उतना महंगा जहर नहीं है जितनी महंगी रोटी है
लाखों टन सड़ता अनाज है
किसकी लापरवाही है।
पैरों की जूती है जनता, जनता की परवाह नहीं
जनता भी क्या करे बिचारी, उसके आगे राह नहीं
बेटा है बेकार पड़ा है
बिटिया है अनब्याही है।
जैसी होती है तैय्यारी वैसी ही तैय्यारी है
तैय्यारी से लगता है जल्दी चुनाव की बारी है
संतो में मुल्लाओं में
भक्तों की आवाजाही है।
देख करके बौर वाली
आम की टहनी
तन गये घुटने कि जैसे
खुल गयी कुहनी।
धूप बतियाती हवा से
रंग बतियाते
फूल-पत्तों के ठहाके
दूर तक जाते
छू गयी चुटकी
हंसी की
हो गई बोहनी।
पीठ पर बस्ता लिये
विद्या कसम खाते
जा रहे स्कूल बच्चे
शब्द खनकाते
इस तरह
सब रम गये हैं
सुध नहीं अपनी।
राग में डूबीं दिशायें
रंग में डूबीं
हाथ आयी ज़िन्दगी के
संग में डूबीं
कल
उतरने जा रही है
खेत में कटनी
कुछ भी बदला नहीं फलाने!
सब जैसा का तैसा है
सब कुछ पूछो, यह मत पूछो
आम आदमी कैसा है।
क्या सचिवालय क्या न्यायालय
सबका वही रवैया है
बाबू बड़ा न भैय्या प्यारे
सबसे बड़ा रुपैया है
पब्लिक जैसे हरी फसल है
शासन भूखा भैंसा है।
मंत्री के पी. ए. का नक्शा
मंत्री से भी हाई है
बिना कमीशन काम न होता
उसकी यही कमाई है
रुक जाता है, कहकर फौरन
`देखो भाई ऐसा है'।
मन माफिक सुविधायें पाते
हैं अपराधी जेलों में
कागज पर जेलों में रहते
खेल दिखाते मेलों में
जैसे रोज चढ़ावा चढ़ता
इन पर चढ़ता पैसा है।
गुपतेसरा ने खोली है दुकान गाँव में
काट रहा चाँदी वह बेईमान गाँव में।
गाँजा है, भाँग है, अफीम, चरस दारू है
ठेंगे पर देश और संविधान गाँव में।
चाय पान बीड़ी सिगरेट तो बहाना है
असली है चकलाघर बेज़ुबान गाँव में।
बम चाकू बंदूकों पिस्तौलों का धंधा
हथियारों की जैसे एक खान गाँव में।
बिमली का पिट गिरा कमली का फूला है
सोते हैं थाने के दो दीवान गाँव में।
खिसकी है पाँव की ज़मीन अभी थोड़ी सी
बाकी है गिरने को आसमान गाँव में।
सूखा है पाला है बाढ़ है वसूली है
किसको दे कंधे का हल किसान गाँव में।
गुपतेसरा गुंडा है और पहुँच वाला है
कैसे हो लोगों को इत्मीनान गाँव में।
((साभारः जिस भी साइट से चोरी हुआ हो, एक का होता तो नाम लिख देता लेकिन दो के घरों से चोरी की हो तो किस किस का नाम लिखूं, साथ में दूसरे वाले घर ने खुद ही कहीं से चोरी से उठा रखा है....))
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यशवंत सिंह yashwant singh
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कुछ भी असर नहीं करता
कुछ असर नहीं करता
भीख मांगते बच्चे,
रंडी होती पीढ़ी,
मंडी होता मुल्क
मुझ पर कुछ भी असर नहीं करता
कुछ भी खबर नहीं करता
खुदकुशी करते किसान
खलिहान तक फैलता मसान
कोख और दूध में प्रदूषण का जहर
राखी सावंत के क्लीवेज में घुसा मीडिया
कुछ भी खबर नहीं करता
कोई गदर नहीं करता
चूतियापे की संसद
बकचोदी करते पत्रकार
तिल तिल मरती हिंदुस्तानियत
दम तोड़ती इंसानियत
फिर भी
कोई गदर नहीं करता।
लेकिन
कोई
कुछ क्यों करे
जब खुद मैं
पेट से शुरू करता हूं
और
कमर से जरा नीचे
जाकर रुक जाता हूं।
तो कोई कुछ क्यों करे।
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यशवंत सिंह yashwant singh
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जब लचके तोर कमरिया तो सारा...
कल देर में घर पहुंचा। नई बात यह है कि बहुत दिनों बाद रात में टीवी खोला। १० साल पहले जब कानपुर में रंगीन टीवी लाया था तो घर में घुसते ही टीवी शुरू और घर से बाहर निकलते हुए बुझे मन से टीवी बंद। इन दिनों टीवी पर चूतियापा बढ़ जाने से या कहिए टीवी से मन ऊबने से सामने बैठने की इच्छा नहीं होती। एक तो आफिस में कंप्यूटर पर आंख फोड़ने के बाद टीवी के सामने आंखों की ऐसी-तैसी कराने की बिलकुल इच्छा नहीं होती। दूसरे, अगर कोई बहुत अच्छा पोरगराम आ जाए तो देखने का मन भी करता है। जब से समाचार चैनलों पर सांप, बिच्छू और भूत-प्रेत नुमा प्रोग्राम शुरू हुए हैं तबसे तो और भी टीवी से चिढ़ हो गई। रही फिलिम-सिलिम की बात तो अब उन्हें देखने का मन नहीं करता। नई फिल्में देखने की इच्छा होती है तो उसके लिए सिनेमाहाल जाने का टैम नहीं मिल पाता। तो कह रहा था कि कल टीवी खोला तो जी पर सारेगामापा में लालू मंचासीन थे।
वाह लालू, बहुत खूब लालू, कीप इट अप लालू....
इसके पहले एक खबर जागरण में ही छपी थी कि लालू आजकल परमाणु करार के बवाल से दूर कल्चरल प्रोग्रामों में लगे हैं और खुद की टीआरपी बढ़ाने में जुटे हैं। मसलन उन्होंने अपने गाजीपुर वाले वीर अब्दुल हमीद के प्रपौत्र को एक समारोह में नौकरी दिया। उसी तरह तात्या टोपे के खानदान वालों पर करम दिखाया। टीवी के गीत-गाने वाले प्रोग्रामों में शरीक हो रहे हैं। टीवी पर लालू को देखकर अच्छा लगा। वैसे, टीवी पर जिस भी चैनल पर लालू को मैं देखता हूं, वो मुझे अच्छा लगता है। लालू कभी हेलीकाप्टर बाढ़ग्रस्त इलाके की सड़क पर उतार देते हैं और देहातियों से बातें करते हैं तो कभी मुंबई में लचके मोर कमरिया जैसे गीत-संगीत के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।
मजेदार शो था। ज्यादातर प्रतिभागियों ने पूरब की लैंग्वेज से जुड़े फिल्मी गानों को गाया। पाकिस्तान से आए बालक ने जब ....आरा हिले छपरा हिले ....लचके जब कमरिया तो सारा.....सुनाया तो लालू के चेहरे पर सहज मुस्कान तैर गई। मुझे भी मजा आया। बहुत दिनों बाद सुने भाई। जब बचपन में गांव में था तो उन दिनों शाम ढलते ही पसियाने की तरफ से एक आवाज आया करती थी जिसे मैं बड़े गौर से सुनता था.....भंवरवा के तोहरा संग जाई.....। बाद में पता चला कि भोजपुरी में यह मृत्युगीत जमाने से गाया जाता रहा है। आजकल रात में कभी दोस्तों-मित्रों की जुटान हुआ करती है तो मैं भी यही सब गाया करता हूं जो बचपन में सुना था। वाकई, गाना-बजाना बिलकुल सहज बना देता है आदमी बशर्ते वह अव्वल दर्जे का हरामजादा न हो। तो लालू जी के शो में सेट पर बकरी, खटिया, पेड़ जैसे चीजें दिख रही थीं जिससे पूरा सेट देसज दिख रहा था। हरेक प्रतिभागियों ने लालू से सवाल किए...एक लड़की ने पूछा, आपको शंकर जी ने दर्शन दिया था? लालू ने कहा- हां दिया था लेकिन सपने में, भोर में चार बजे के लगभग। कहा था कि मास-मछरी छोड़ दो। तो छोड़ दिया। लेकिन जीभ पर कंटरोल करना बड़ा मुश्किल होता है। एक दिन खाने का मन करने लगा तो रबड़ी से कहा कि अरे, शंकर जी ने तो मास-मछरी छोड़ने के लिए कहा था, अंडा छोड़ने के लिए थोड़े न कहा था। आज अंडा बनाओ। बाद में अंडा खाने से मन भी उचट गया और उसे खाते समय मवाद जैसा लगने लगा तो उसे भी छोड़ दिया। पाकिस्तान से आए बालक ने लालू से पूछा कि मैंने आपकी स्टाइल में बाल संवारने की कोशिश की तो बाल खड़े हो गए, कैसे सेट करते हैं आप? लालू ने कहा- दिल्ली आना, अपने बारबर से सेट करा दूंगा।
पूरा प्रोग्राम मैं देखता रहा। मजा आ गया। कई गाने चले...पान खाए सैंया हमार, सांवरी सूरतिया होठ लाल लाल..., चलत मुसाफिर के मोह लियो रे पिजड़े वाली मुनिया....बहुत दिनों बाद टीवी को थैंक्यू बोला। मन हलका हो चुका था। लालू में लाख बुराइयां हैं लेकिन वो आदमी जहां होता है वहां लोग बिना सहज हुए नहीं रह सकते। हालांकि वो गरियाते भी जोरदार तरीके से हैं। प्रिंट व इलेक्ट्रानिक के कई पत्रकारों की वो फाड़ चुके हैं लेकिन बावजूद इसके, मुझे लालू अच्छे लगते हैं। उस आदमी की भड़ास हमेशा निकलती रहती है। वह गंभीर से गंभीर काम करके दिखा देता है और खुशी के छोटे से छोटे मौके को इंज्वाय करने में नहीं चूकता। एक प्रतिभागी ने उसी प्रोग्राम में सवाल किया कि आपने रेलवे को न जाने कितने हजार करोड़ रुपये का फायदा दिला दिया, यह कैसे किया? इस सवाल का जवाब देते समय लालू ने खुद की मार्केटिंग करने का मौका नहीं गंवाया। उन्होंने बताया कि किस तरह दुनिया भर के सारे बड़े संस्थान यह सवाल पूछते हैं और किस तरह उन्होंने यह सब कर दिखाया। हालांकि उनका जवाब हम सभी लोगों ने कई दफे पढ़ा और सुना है इसलिए उसको यहां देने से कोई फायदा नहीं है। तो भई...मैं तो कल रात के टीवी शो से इस कदर प्रभावित हुआ कि आज सुबह से ही मेरी जुबान पर जो गाना चढ़ा है वो यही है....आरा हिले छपरा हिले बलिया हिले ला, जब लचके तोर कमरिया तो सारा जिला हिले ला.....।
यहां यह कहना चाहूंगा कि अगर भोजपुरी गानों को साथी लोग भड़ास पर डालें तो मजा आएगा। कई गानें मुझे पूरा याद नहीं हैं और कई गानों के तो सिर्फ धुन पता हैं। उम्मीद है इस काम में हमारे इलाहाबादी हरिशंकर मिश्रा पूरा योगदान देंगे। अगर जरूरत पड़ी तो बनारस के पत्रकारों से मदद लेने में भी नहीं चूकेंगे। इसी तरह दिनेश श्रीनेत्र, अनिल सिन्हा, सचिन, विकास मिश्र...आदि साथी भोजपुरी गानों को भड़ास पर लाने में मदद करें ताकि उन्हें पढ़-पढ़ कर याद किया जाए और फिर जहां महफिल जमे वहां जोर से गाया जाए.....आरा हिले छपरा हिले....
जय भड़ास..
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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आहि रे बालम चिरई....
कउने खोतवा में लुकइलू, आहि रे बालम चिरई
कउने खोतवा में लुकइलू, आहि रे बालम चिरई
बन बन ढूढलीं, दर दर ढूंढलीं, ढूंढलीं नदी के तीरे
सांझ के ढूंढलीं, रात के ढूंढलीं, ढूंढलीं होत फजीरे
जन में ढूंढलीं, मन में ढूंढलीं, ढूंढलीं बीच बजारे
हिया हिया में पइस के ढूंढलीं, ढूंढली बिरह के मारे
कउने अतरे में समइलू, आहि रे बालम चिरई
गीत के हर घड़ी से पूछलीं, पूछलीं राग मिलने से
चांद चांद लय ताल से पूछलीं, पूछलीं सूर के मन से
किरन किरन से जाके पूछलीं, पूछलीं नील गगन से
धरती अउर पाताल से पूछलीं, पूछलीं मस्त पवन से
कउना सूगना पर लोभइलू, आहि रे बालम चिरई
मंदिर से मसजिद तक देखलीं, गिरजा से गुरद्वारा
गीता अउर कूरान में देखलीं, देखलीं तीरथ सारा
पंडित से मुल्ला तक देखलीं, देखलीं घरे कसाई
सगरी उमरिया छछनत जियरा, कइसे तोहके पाईं
कउने बतिया पर कोहंइलू, आहि रे बालम चिरई Sep 3
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हंस अकेला उड़ जाई
भंवरवा के तोहरा संग जाई
के तोहरा संग जाई
भंवरवा के तोहरा संग जाई
आवे के बेरिया सब केहु जाने
दुवरा पर बाजे ला बधाई
जाये के बेरिया केहु ना जाने
हंस अकेला उड़ जाई
भंवरवा के तोहरा.....
देहरी पकड़ के मेहरी रोवें
बांह पकड़ के भाई
बीच अंगनवां माता जी रोवें
बबुवा के होखे ला विदाई
भंवरवा के तोहरा.....
कहत कबीर सुनो भाई साधो
सतगुरु सरन में जाई
जो यह पद के अरथ बतइहें
जगत पार होई जाई
भंवरवा......
(निरगुन)
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माई
बबुआ भइल अब सेयान कि गोदिये नू छोट हो गइल
माई के अंचरा पुरान, अंचरवे में खोट हो गइल
गुटु- गुटु गोदिया में दूध-भात खाइल
मउनी बनल अउरी भुइयाँ लोटाइल ।
नेहिया - दुलरवा के बतिया बेकारे----
टूटल पिरितिया के डोर कि मन में कचोट हो गइल ।
'चुलबुल चिरइया' में बबुआ हेराइल
बोले कि बुढ़िया के मतिये मराइल ।
बाबा के नन्हकी पलनिया उजारे ----
उठल रुपइया के जोर जिनिगिये नू नोट हो गइल ।
भरल-पूरल घरवा में मन खाली-खाली
दियरी जरे पर मने ना दीवाली ।
रतिया त रतिया ई दिनवो अन्हारे ----
डूबल सुरूज भोरे- भोर करेजवे में चोट हो गइल ।
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बदरी के छतिया के चीरत जहजवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया.
लन्दन से लिखऽतानी पतिया पँहुचला के,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया.
बदरी के छतिया के चीरत जहजवा से
दिल्ली से जहाज छूटल फुर्र देना उड़ के,
बीबी बेटा संगे हम देखीं मुड़ मुड़ के.
पर्वत के चोटी लाँघत, बदरी के बीचे,
नीला आसमान ऊपर, महासागर नीचे.
लन्दन पँहुच गइल लड़ते पवनवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया.
हीथ्रो एयरपोर्टवा से बहरी निकलते,
लागल कि गल गइनी थोड़ी दूर चलते.
बिजुरी के चकमक में देखनी जे कई जोड़ा,
बतियावें छतियावें जहाँ तहाँ रस्ते.
हाल चाल पूछनी हम अपना करेजवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया.
हर्टफोर्डसर पँहुचली सँझिया के बेरवा,
जहाँ बाटे कारखाना, जहाँ बाटे डेरवा.
डेरवा के भीतर एसी, सब सुख बा विदेशी,
चट देना फोन कइली बीबी नईहरवा.
ठकचल बा बंगला विलायती समनवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया.
भारत से अफ्रीका, फेरु युके चली अइनी,
रुपया, सिलिंग, डालर, पाउन्ड हम कमइनी.
माईबाप चहलें से हम बनि गइनी,
अपना सपनवा के धूरि में मिलइनी.
बेमन के नाता जुड़ल हमरो मशीनवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया.
केहू नाहीं टोवे रामा भावुक के मनवा,
तड़पे मशीन बीचे उनकर परनवा.
गीतकार खातिर कलम, कलाकार खातिर कला,
एकरा समान दोसर कौन सुख होई भला ?
अँसुवन में बहे रोज सपना नयनवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया.
हमरा भीतर के कलाकार के मुआवऽताटे,
हमरा भीतर के गीतकार के सुतावऽताटे.
जाने कौना कीमत पे पइसा बनावऽताटे,
पापी पेट हमरा से हाय का करावऽताटे.
तड़पिला रात दिन कवना रे जमनवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया.
तोहरा से कहतानी साँचो ए इयरवा,
काहे दूना लागत नईखे इचिको जियरवा.
हमरा के काटे दउड़े सोना के पिंजरवा,
मनवा के खींचऽताटे माई के अँचरवा.
लौट चलीं देश अपना कवनो रे बहनवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया.
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रतिया भर अँखिया ई देखे चनरमा.
रतिया भर अँखिया ई देखे चनरमा.
हँसेला हमपे आकाश हो.
दूधवा के जइसन तोहरी सुरतिया,
भरेला मन में उजास हो.
आवेला जब कबो धीरे से नींदिया,
हमके पुकारेला माथे के बिंदिया,
खुल जाला अँखिया त, तोहरी सुरतिया,
लेबे ना देबे सवाँस हो.
अइसे त अँखिया ई का का ना देखलस,
बाकिर कबो तोहरा लेखा ना देखलस.
साँचो बसन्त होला, एह बतिया के अब
करेला मन विश्वास हो.
चनवा के पीछे पीछे मनवो चलेला.
दियवा के संगे संगे तनवो जरेला.
रूपवा के रानी तोहके जतने निहारीं,
बढ़ेला ओतने पियास हो.
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यशवंत सिंह yashwant singh
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वे संबंध अब तक बहस में टँगे हैं, जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ...

दुष्यंत कुमार
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धर्म
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तेज़ी से एक दर्द
मन में जागा
मैंने पी लिया,
छोटी सी एक ख़ुशी
अधरों में आई
मैंने उसको फैला दिया,
मुझको सन्तोष हुआ
और लगा –
हर छोटे को
बड़ा करना धर्म है।
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अपाहिज व्यथा
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अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,
तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ।
ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है,
इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ ।
अँधेरे में कुछ ज़िंदगी होम कर दी,
उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ ।
वे संबंध अब तक बहस में टँगे हैं,
जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ ।
तुम्हारी थकन ने मुझे तोड़ डाला,
तुम्हें क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ ।
मैं अहसास तक भर गया हूँ लबालब,
तेरे आँसुओं को नमन कर रहा हूँ ।
समाआलोचको की दुआ है कि मैं फिर,
सही शाम से आचमन कर रहा हूँ ।
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आग जलती रहे
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एक तीखी आँच ने
इस जन्म का हर पल छुआ,
आता हुआ दिन छुआ
हाथों से गुजरता कल छुआ
हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा,
फूल-पत्ती, फल छुआ
जो मुझे छुने चली
हर उस हवा का आँचल छुआ
... प्रहर कोई भी नहीं बीता अछुता
आग के संपर्क से
दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में
मैं उबलता रहा पानी-सा
परे हर तर्क से
एक चौथाई उमर
यों खौलते बीती बिना अवकाश
सुख कहाँ
यों भाप बन-बन कर चुका,
रीता, भटकता
छानता आकाश
आह! कैसा कठिन
... कैसा पोच मेरा भाग!
आग चारों और मेरे
आग केवल भाग!
सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई,
पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई,
वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप
ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप!
अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे
जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।
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एक आशीर्वाद
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जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।
चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें।
हँसें
मुस्कुराऐं
गाऐं।
हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलायें।
अपने पाँव पर खड़े हों।
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
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पीर पर्वत-सी
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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
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ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
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ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आप को धोखा हुआ
यहाँ तक आते आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परेशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा
तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है कि
इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ
कई फ़ाके बिताकर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा
यहाँ पर सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा
चलो अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें
कम से कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा
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मत कहो, आकाश में कुहरा घना
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मत कहो आकाश में कुहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से
क्या करोगे सूर्य को क्या देखना है
इस सडक पर इस कदर कीचड बिछी है
हर किसी का पांव घुटने तक सना है
पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर है
बात इतनी है कि कोई पुल बना है
रक्त वर्षों से खून में खौलता है
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है
हो गई है घाट पर पूरी व्यवस्था
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है
दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं
आजकल नेपथ्य में संभावना है.
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विदा के बाद प्रतीक्षा
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परदे हटाकर करीने से
रोशनदान खोलकर
कमरे का फर्नीचर सजाकर
और स्वागत के शब्दों को तोलकर
टक टकी बाँधकर बाहर देखता हूँ
और देखता रहता हूँ मैं।
सड़कों पर धूप चिलचिलाती है
चिड़िया तक दिखायी नही देती
पिघले तारकोल में
हवा तक चिपक जाती है बहती बहती,
किन्तु इस गर्मी के विषय में किसी से
एक शब्द नही कहता हूँ मैं।
सिर्फ़ कल्पनाओं से
सूखी और बंजर ज़मीन को खरोंचता हूँ
जन्म लिया करता है जो ऐसे हालात में
उनके बारे में सोचता हूँ
कितनी अजीब बात है कि आज भी
प्रतीक्षा सहता हूँ।
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--दुष्यंत कुमार
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यशवंत सिंह yashwant singh
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सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना!!
मैं जा रहा हूं लौट आने के इरादे से मगर, सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना!!
बैंगलोर से दिल्ली जाने की खुशी आज गम में तब्दील हुई नज़र आ रही है। एक साल। जी हां पूरा एक साल बैंगलोर में बिताने के बात आज दिल्ली जाने की सिर्फ़ सोच से एक अजीब सा एहसास हो रहा है।
एक साल कोई कम समय नही होता है, इस बात को अभी तक सिर्फ़ सुनता आया था। आज बंगलोर छोडते समय इस बात का मुकम्मल एह्सास हो रहा है।कभी भी किसी के भी साथ दारू पीने का प्लान, जब मर्ज़ी किसी को भी खडा कर देनाकि भाई चल सिगरेट पीने चल रहे हैं, कभी भी किसी वीकेण्ड पर टीम डिनर पर जाना।कभी चिकन काउन्टी , कभी फ़ोरम माल का पिज़्ज़ा हट, मैकडोनल्ड्स, साहिब सिंह सुल्तान, फ़िरंगी पानी, पैरामाऊन्ट रेस्टौरेण्ट आदि जगहों पर चले जाना।कभी किसी को कहना कि भाई आओ आज पूल खेलने चल रहे हैं, आज टेबल टेनिस खेलने का मन है।रोहित अक्केवार, रिषी भाई, ईश ठुकराल, दर्शन बिडप्पा, जाय दीप, अर्शद, सय्यद अफ़्फ़ान अली, आदि ना जाने कितने ही दोस्तो से बिछडने का आज गम सा मालूम दे रहा है।अमरीका से आने के बाद जब औरेकल ज्वाईन करा तो पहली बार महसूस हुआ था कि भाई हमारा भारत देश भी किसी से कम नही है।औटोमैटिक दरवाज़े, लिफ़्ट, सेंसर टेक्नोलोजी और भी ना जाने क्या क्या। हमारा आफ़िस सभी आधुनिक सुख सुविधाओं से सम्पूर्ण है।मुझे आज भी अच्छी तरह याद है २८ जुलाई का वो दिन, जब मैं पहली बार औरेकल में अपने फ़ाईनल इन्टर्व्यू के लिये आया था। मेरी बात अपने मैनेजर के साथ हुई औरउसने मेरी सैलरी के बारे में बताया और बोला कि हम जल्दी ही आपका आफ़र लेटर रिलीज़ कर देंगे, आप अपने इंतज़ामात कर लें।कुछ ही दिन बाद मेरा आफ़र लेटर आ गया जिसमे कि 31 अगस्त 2006 को औरेकल ज्वाईन करने को कहा गया था। मैने भी चट्पट पिछली कम्पनी से इस्तीफ़ा दिया और चल पडा बैंगलोर की ओर। हालांकि मेरे लिये ये एक बेहद मुश्किल फ़ैसला था, चूंकि मेरे माता पिता की सेहत कुछ अच्छी नही रहती।रहने का भी कोई इंतज़ाम नही था, लेकिन फ़िर भी मैने हिम्मत की और आ गया बैंगलोर। आने के बाद एक महीना अपने भाई के साथ रहा।
यहां आकर महसूस किया कि सम्पूर्ण भारत वर्ष में हम चाहे जहां भी चले जायें लेकिन भारतीयता और मानवीय सहिष्णुता का वर्चस्व आज भी कायम है।मेरे यहां के साथियों ने मेरी ज़बरद्स्त मदद की, मुझे ये एह्सास ही नही होने दिया कि मै एक अजनबी प्रदेश में आ गया हूं। टीना कुरियन, संगीता स्वामी, प्रीथम पूवानी, नागराज शर्मा, ईश ठुकराल आदि सभी मित्रो ने काफ़ी मदद की। कहना ना होगा कि सभी लोग टीम स्पिरिट से पूर्ण रूप से भरे हुए थे।एक के बाद एक क्वार्टर बीत गये, टार्गेट कभी अचीव हुए कभी नही हुए, लेकिन कभी भी नकारात्मक रवैये का सामना नही करना पडा।
सबसे उपर हमारे ग्रुप के जनरल मैनेजर राम शर्मा वाराणसी थे। उन्होने सभी का यथोचित मार्गदर्शन किया और सभी को एक सकारात्मक विचारधारा को ग्रहण करने का अवसर प्रदान किया।हर महीने एक बार मै दिल्ली आता था, जहां से सहारनपुर का रास्ता सिर्फ़ चार घण्टे का है।
पिछले साल रमज़ान के मुकद्दस महीने में मेरे सभी मुस्लिम दोस्त मुझे अपने साथ इफ़्तार और सहरी के लिये जबरन ले जाया करते थे। उनके प्यार और खुलूस ने मुझे जैसे बांध दिया था उन सभी के साथ। यहां मै अगर जकी भाई का ज़िक्र ना करू तो बात अधूरी सी रह जायेगी, ज़की भाई हैदराबाद से ताल्लुक रखते हैं और कदम ब कदम हम लोगो ने साथ साथ काम किया है।एक ज़की भाई ही थे जिन्होने मुझे पूल खेलना सिखाया था।अनुपम श्रीवास्तव एक और एसी शख्सियत थे जिनके बिना औरेकल मे एक साल पूरा करना काफी दुष्कर कार्य था। हालांकि ईश ठुकराल अब मैनेजर बन चुके हैं लेकिन फ़िर भी आपसी खुलूस और मोहब्बत का वो जज़्बा आज भी कायम है।
उन्होने काम की बारीकियों से मुझे अवगत कराया और समझाया कि कैसे मै अपने कार्य को कुशलता पूर्वक पूर्ण कर सकता हूं। कुल मिलाकर इतना ही कह सकता हूं कि ये सिर्फ़ भारत वर्ष ही है,
जहां आपसी मेल जोल और सहिष्णुता का वर्चस्व आज भी कायम है।
--अंकित माथुर
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इस दुनिया को जितनी जल्द हो सके, बदल देना चाहिए....
मुझे तुमसे प्यार है, क्या तुम मुझे अपनी किडनी और लीवर का एक टुकड़ा नहीं दोगी?
खबर एक ब्लाग पर ही दिखी थी। साथ देखी एक टिप्पणी- सही में बहुत अच्छी खबर है । मनुष्य एक गुर्दे से भी काफी आराम से जी सकता है । बहन को ये बात समझ आ गई । आपसे अनुरोध है कि अगली राखी तक किसी ऐसे भाई को खोज लाएँ जिसने ऐसा ही उपहार अपनी बहन को दिया हो । प्रतीक्षा में घुघूती बासूती.....
ऐसी खबर अच्छी हैं क्योंकि इसमें किसी को जिंदगी मिलने की सूचना होती है। लेकिन ऐसी खबर बुरी भी है क्योंकि इससे पता चलता है कि हम जैसे हैं, वैसे बहुत अच्छे नहीं हैं। इस दुनिया को जितनी जल्द हो सके, बदल देना चाहिए।
एक बार फिर एक बहन ने भाई को अपने शरीर का एक हिस्सा दे दिया, ताकि भाई जिंदा रहे। राखी के मौके पर ये घटना रायपुर में हुई। भाई की दोनों किडनी काम नहीं कर रही थी, और उसकी जिंदगी दांव पर थी। 36 वर्षीय भाई को उसकी चार बहनों में से एक ने राखी के उपहार के तौर पर जिंदगी दे दी। वो बहन अपने भाई से बेहद प्यार करती है। उसके मुताबिक -"अपने इकलौते भाई के लिए हम बहनें कुछ भी कर सकती हैं। "
ऎसी बहन प्रशंसा की पात्र है जिसने अपने भाई के लिए त्याग किया है। मेडिकल साइंस जानने वाले जानते हैं कि एक किडनी के साथ भी बहन जिंदा रहेगी। दो गुर्दे हमारे शरीर में इसलिए होते हैं कि एक फेल हो जाए तो दूसरा काम करता रहे। या फिर बुढ़ापे-किसी बीमारी या किसी और कारण के कारण खून साफ करने की किडनी की क्षमता कम हो जाए तो दो किडनी मिलकर जीने भर का खून साफ कर दें।
किडनी, लीवर जैसे ट्रांसप्लांट हो सकने वाले अंगों के दान की खबरें आप सबकी नजर से गुजरती होंगी। आपके अपने मोहल्ले, नाते-रिश्तेदारों से लेकर मित्रों तक में ऐसा होता होगा। लेकिन आपने ऐसी कितनी घटनाएं सुनी हैं जब किसी भाई ने बहन के लिए, बेटे ने मां के लिए, पति ने पत्नी के लिए किडनी या लीवर का हिस्सा दिया हो। किडनी और लीवर देने का पुण्य हमेशा किसी पत्नी, किसी बहन, किसी मां के हिस्से में ही क्यों आता है ? ये त्याग करने के लिए परिवार के पुरुष आगे क्यों नहीं आते? क्या पुरुषों को ये बात समझ में नहीं आती कि एक किडनी से भी वो जी सकते हैं या कि लीवर का एक हिस्सा देने से उनका कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि लीवर थोड़े समय बाद पुराने आकार में आ जाता है।
डॉक्टर सजल सेन ने एम्स में मास्टर ऑफ हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन का कोर्स करने के दौरान पिछले दशक की शुरुआत में एक शोध किया था। इसमें ये जानने की कोशिश की गई थी कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट के कौन से सामाजिक पहलू हैं। शोध के सिलसिले में उन्होंने एम्स में किडनी ट्रांसप्लांट के कई साल के आंकड़े निकाले। उनके शोध से ये चौंकाने वाली बात सामने आई कि अस्सी फीसदी से ज्यादा मामलों में औरतों ने किडनी डोनेट किया है। इसमें भी सबसे ज्यादा किडनी पत्नी देती है। इसके अलावा विधवा बहन और मां भी किडनी देने में आगे रहती है। उनके सामने तो ऐसे केस भी आए जब किडनी के मरीज ने पूरी योजना के साथ ब्लड ग्रुप की जानकारी लेकर किसी लड़की से शादी की और शादी के बाद किडनी डोनेट करा ली। और इस साल एक पत्रकार ने जब सूचना के अधिकार के तहत एम्स से ये जानकारी मांगी तो उन्हें ये तो बताया कि किडनी ट्रांसप्लांट के ज्यादातर ऑपरेशन पुरुषों के हुए हैं, लेकिन गोपनीयता के नाम पर एम्स ने ये जानकारी नहीं दी कि किडनी डोनेट करने वालों से उनके रिश्ते क्या हैं।
दरअसल जब देश में ऑर्गन ट्रांसप्लांट एक्ट नहीं था, तब किडनी खरीदना आसान था। इसलिए ट्रांसप्लांट का खर्चा उठाने में सक्षम लोग गरीब लोगों से किडनी खरीद लेते थे। उस दौरान अक्सर ऐसी खबरें आती थीं कि किसी गरीब को झांसा देकर उसकी किडनी किसी डॉक्टर ने निकाल ली। ऐसी छिटपुट खबरें अब भी आती हैं। लेकिन कानून के डर से इसमें कमी आई है। ऐसे में लोगों की नजर आस पास के ऐसे रिश्तेदारों पर होती है, जिनसे किडनी या लीवर लिया जा सके। ट्रांसप्लांट के लिए इजाजत लेने का ये सबसे आसान और पक्का तरीका है। ऐसे मामले में अक्सर परिवार की औरतों पर देह का एक हिस्सा दान करने की जिम्मेदारी आती है।
ऐसा किसी मेडिकल कारण से नहीं होता। एम्स में अगर औरतों का ऑर्गन ट्रांसप्लांट का ऑपरेशन नहीं हो रहा है तो इसकी वजह ये नहीं है कि औरतों की किडनी खराब नहीं होती या कि उनका लीवर ज्यादा दमदार होता है। ना ही उनकी किडनी ट्रांसप्लांट के लिए इसलिए ली जाती है कि औरतों की किडनी बेहतर होती है। दरअसल ये भारतीय समाज के ढांचे से जुड़ा मामला है और ये टिप्पणी है हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति पर। ऐसा होना ये बताता है कि परिवार में महिलाएं कमजोर हैं और पुरुष उनपर अपनी मर्जी आसान से थोप सकते हैं।
ऐसे में ये कहना कोरा मजाक है कि औरतों की इस देश में पूजा होती है। ये तो वैसी ही पूजा है जिस तरह बलि से पहले बकरे के सिर पर अक्षत डाले जाते हैं। इस समाज के खाता-पीता एलीट हिस्सा लड़कियों को पैदा होने से पहले मारने में जुटा है, लड़कियों के हर तरह के शोषण में जुटा है, महिलाओं को समान काम के लिए कम पैसे देता है, उनसे उनके अंगों का दान करा रहा है। बंगाल के भद्रलोक समाज का एक हिस्सा अब भी विधवा माताओं को मरने के लिए बनारस और मथुरा-वृंदावन के विधवा आश्रमों में छोड़ आता है। हरियाणा और पंजाब के कई पुरुष अपना वारिस पैदा करने के लिए देश के गरीब हिस्सों की लड़कियों से शादी जैसा कुछ रचाते हैं और बेटा पैदा होने पर अक्सर खरीदकर लाई गई उस लड़की को बेच देते हैं। त्याग का नाटक ऐसा कि महिलाएं इस बात में गर्व महसूस करती हैं कि वो परिवार में सबके खाने के बाद बचा खुचा और कई बार बासी खाना खाती हैं।
आप अगर इस अन्याय के समर्थक नहीं हैं तो आपके लिए खुशी की बात यही है कि आरतों की आर्थिक आजादी के साथ ये कहानी नया मोड़ ले सकती है। परिवार में जो सदस्य कमाता है, उसकी हैसियत ज्यादा होती है, फिर चाहे वो औरत ही क्यों ना हो। कमाने वाली पत्नी के लिए आगे चलकर शायद कोई पति भी अपनी किडनी देगा। पत्नी के प्यार में तो वो ऐसा नहीं कर रहे हैं। आप उस दिन की कामना कर सकते हैं जब महिलाओं की पूजा इसलिए नहीं होगी कि उन्होंने परिवार के किसी पुरुष सदस्य के लिए अपने शरीर का एक हिस्सा दे दिया है। ऐसा ना होने तक महिलाएं अपने अंग का दान करने को मजबूर होती रहेंगी, और परिवार के पुरुष उनसे त्याग आदि के नाम पर ऐसा कराते रहेंगे। ठीक उसी तरह जैसे, देवताओं ने ऋषि दधीचि से उनकी हड्डियां का दान करा लिया था ताकि वज्र बनाकर राक्षसों का विनाश किया जा सके। जिस दिन ये खबर आएगी कि अंग दान करने वालों में पुरुष और महिलाओं की संख्या बराबर है, उस दिन ही हम आपने समाज पर गर्व करने के हकदार होंगे।
---दिलीप मंडल
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मैं चीखता रहा, मैं ज़िंदा हूं दोस्तों.....
लखनऊ की अदालत ने कुछ पत्रकारों और पत्रों के संपादकों को सजा सुनाई। यह खबर भड़ास पर ही पढ़ने को मिली। पूरी खबर पढ़ी तो मुझे दस बरस पुराना वाकया याद आ गया। तब हम लोगों के पास सूचना तकनीक के इतने संसाधन नहीं होते थे। एकाध कंप्यूटर और फैक्स ही हुआ करते थे।
02 अक्टूबर की इस घटना के बाद तात्कालिक जिला मजिस्ट्रेट अनंत कुमार की तरह पूरे प्रशासन का विश्वास तब मीडिया से उठ गया था। सहारनपुर के पत्रकारों के एक दल को तब प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत मुजफ्फरनगर ले जाया गया। यह एक तरह से पत्रकारों की फैक्ट्स फाइंडिंग कमेटी थी। यानी पत्रकारिता के खिलाफ तब शासन और प्रशासन ने पत्रकारों का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अगले दिन हम लोग भी जिज्ञासावश रामपुर तिराहा स्थित घटनास्थल पर पहुंचे थे। पता चला था कि दोनों तरफ से खेल हुआ है। कथित पत्रकारों की कमेटी ने तब प्रशासन के पक्ष में कितने फैक्ट्स एकत्र किये थे, यह आज तक रहस्य है। मगर, वे पत्रकार आज भी वही कर रहे हैं जो दस बरस पहले उन्होंने किया था। यानी खबर से सरोकार नहीं और अफसरबाजी में पीछे नहीं हैं आज भी। मुझे आज भी याद है कि जो गैर जिम्मेदाराना हरकत तब रामपुर तिराहे पर पुलिस और प्रशासन ने की थी, वही हरकत पत्रकार भी कर रहे थे।
रामपुर तिराहा के आसपास के खेतों में कुछ सुबूत प्लांट किये गये साफ प्रतीत हो रहे थे। जैसे- महिलाओं के फटे हुए अंग वस्त्र, खून से सने कुछ कपड़े, दोनों पक्षों की बात करने वाले कुछ ग्रामीण। कुल मिलाकर हालात- मुंह खाये और आंख रिझाये वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे थे। प्रशासन की खामियां प्रशासन वाले जानें, लेकिन पत्रकारों की खामियों पर मुझे दस बरस पहले रोना ज़रूर आया था। मैं रामपुर तिराहे पर कोई फैक्ट ढूंढने नहीं गया था, बल्कि सीखने गया था। मैंने तब जो सीखा था, उस पर आज तक अमल कर रहा हूं। सीख यह थी कि अगर कलम से पत्रकार बनते हैं, तो तकनीक और ज़रूरी संयंत्रों से पत्रकार बचते हैं। तबसे खुद को वक्त और जरूरत के हिसाब से अपडेट रखने की कोशिश करता हूं।
मुझे कई बार प्रख्यात शायर डा. बशीर बदर से साक्षात्कार का मौका मिला। उनका एक शेर मेरे ज़हन में कौंधता था-
मैं आसमां की शाख पर ज़िंदा हूं दोस्तों
पुचकार कर बुलाओ परिंदा हूं दोस्तों
अखबार में ख़बर मेरे मरने की छप गई
मैं चीखता रहा, मैं ज़िंदा हूं दोस्तों
मैंने बशीर साहब से इस शेर का दर्द जानना चाहा, तो उन्होंने बताया कि मेरठ में दंगों के दौरान उनके घर को आग लगा दी गई। वह तब मेरठ में नहीं थे और अखबारों ने खबर छाप दी कि डा. बशीर बदर भी दंगाईयों की भेंट चढ़ गये, मारे गये, नहीं रहे आदि...। तब उन्होंने ये शेर कहा था और इस हादसे के बाद वह मेरठ छोड़ गये, भोपाल में जा बसे थे। मैंने डा. बशीर बदर से पूछा था कि फिर नफरतों से घबराकर उन्होंने मेरठ क्यों छोड़ दिया था?
उनका जवाब था- नफरत ने नहीं, मोहब्बत ने छुड़वाया था मेरठ। पुराने साथियों को शायद याद हो कि हमने दैनिक जागरण के प्रथम पृष्ठ पर इसी हेडिंग से डा. बशीर बदर का इंटरव्यू प्रकाशित किया था। दरअसल, डा. बशीर बदर की प्रेमिका (अब पत्नी) भोपाल में रहती थी।
खबरों की लापरवाही के शिकार अनंत कुमार और डा. बशीर बदर तो महज दो उदाहरण हैं। ऐसे अनगिनत मामले हैं जिन्हें एकत्र किया जाए तो एक ग्रंथ बन सकता है। मगर, इन पर कभी भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया। पत्रकारिता में ये वही अधकिचरापन है जो हर फील्ड में है। कम से कम मीडिया जगत के भीतर तो इस पर गंभीर बहस होनी ही चाहिए। मैं आईएएस अनंत कुमार से न तो हमदर्दी रखता हूं और न ही तब प्रशासनिक व्यवस्था के अधीन पत्रकारों में शामिल था। मगर, नई पीढ़ी के पत्रकारों से इतना जरूर कहना चाहूंगा कि कुछ भी रिपोर्ट फाइल करने से पहले उसके तथ्यों और साक्ष्यों का रिकार्ड आवश्यक रूप से सुरक्षित करना सीखें। किसी का ब्यान सिर्फ कागज़ पर नोट कर लेने भर से अब काम चलने वाला नहीं है। अनंत कुमार ने बयान दिया था या नहीं? यदि उनके बयान की तब रिकार्डिंग की गई होती तो साफ हो जाता कि उन्होंने क्या कहा था? आप पत्रकार हैं तो किसी के अधीन मत रहिये, सिर्फ पत्रकारिता के मापदंडों और जरूरतों के अधीन हो जाइये। फिर देखिये
आपका कोई बाल भी नहीं उखाड़ सकता।
और अंत में.....
‘चाहत’ को ठेंगे पर धरो, पूरी होगी
चाहत (इच्छा) इक ऐसा शब्द है जिसकी जितनी व्याख्या कर लो, उतनी थोड़ी है। यह किसी भी रूप में हो सकती है। चाहत का पूर्ति से जन्मों का बैर है। यह अनुभव भी है और लोगों से भी सुना है कि जो चाहा, वो मिला नहीं। लोग तर्क देते हैं कि चाहत कभी पूरी नहीं होती। जो इच्छा नहीं होती, उसकी पूर्ति हो जाती है। तो भाई सभी भड़ासियों के लिए यह सुझाव है कि अपनी चाहत को ठेंगे पर रखो, पूरी हो जायेगी। यानी जो हासिल करना चाहते हो, उसकी चाहत मत रखो। इच्छा पूरी कराने का यही शार्टकट हुआ ना।
जय भड़ास
रियाज़
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यशवंत सिंह yashwant singh
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एक अधूरी पोस्ट
कल जब मैं इस पोस्ट को लिख रहा था तो अचानक एक काम पड़ा और मुझे निकलना पड़ा। आज अब इस पोस्ट को पूरा करने का मन नहीं कर रहा। वैसे भी डाक्टर ने थोड़े ही कहा है कि अधूरी पोस्ट नहीं पढ़ाई जा सकती। भई, भड़ासियों के लिए मन का गुबार निकालना मुख्य है इसलिए जितना उगल पाया है, उसे सबके सामने प्रकट कर देता हूं....
जय भड़ास
यशवंत
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उफ्फ...पूरे दिन किसिम-किसिम की खबरों से परेशान रहा...
अखबार की दुनिया में और निजी जीवन में, दोनों ही क्षेत्रों में कई बार कोई-कोई दिन खबरों से भरा होता है। एक खबर आई नहीं की दूसरे के आने की सूचना आ गई.....। इसी तरह जीवन में भी होता है। जैसे आज मेरे साथ हुआ। सुबह से फोन आ रहे हैं और फोन पर एक नई खबर। सोचा, चलो सबसे शेयर कर लूं, कुछ खट्टी तो कुछ मीठी खबरें..
पहली खबर- गांव से मां का फोन आया, अलसुबह। जाहिर सी बात है, मैं मुंह बाये सोया पड़ा था और पत्नी ने फोन रिसीव किया। सूचना मिली के मेरे नवजात भतीजे का नाम रख दिया गया है। क्या? पत्नी ने मुस्कराते हुए बताया- अलियार। कुछ देर बाद समझ में आया- अरे हां, वो जो झाड़ू से बुहारने के बाद डस्टबीन की तरफ कर दिया जाता है। एकदम से फ्लैशबैक में चला गया। रामा पांडे हुए करते थे। ठाकुर लोगों के गैंग के एकलौते होलटाइमर बाभन। यह गैंग रोजाना मुर्गा दारू सेवन करता और गोली मार भेजे के अंदाज में मस्त रहता। हर दूसरे दिन किसी को पीट देता, किसी पर गोली चला देता। इसके सदस्य या तो जेल में होते या फिर जेल के बाहर नशे में। इनमें मेरे परिजन भी थे। तो, रामा पांडे गरीब थे, खाने-पीने की दिक्कत के कारण ठाकुरों के गैंग में हो लिए। उनके चार बेटे थे। बताते हैं कि दो बेटे पैदा होने व कई महीनों तक जिंदा रहने के बाद मर गए। सो उन्होंने बाद में हुए बच्चों के नाम को बिगाड़ने का पुराना टोटका आजमाया। उन्होंने नाम रखा- अन्हरा, बहिरा, लंगड़ा और करियवा। वाकई, चारों बच्चों जिए और अब तक जी रहे हैं। उनमें से दो-तीन के साथ तो बचपन में मेरी भी गाढ़ी दोस्ती थी। एक ने तो मुझे सेक्स के गुप्त ज्ञानों के बारों में जो कुछ अवगत कराया था उसे सोचकर अब हंसता हूं। जैसे बताया था कि जब सेक्स के समय औरत आदमी के ऊपर होती है तो लड़की पैदा होती है और आदमी औरत के ऊपर होता है तो लड़का पैदा होता है। मैंने उसके बात को तब सच माना था और वर्षों तक इसे सच मानता रहा। जिस भी दंपति के साथ बेटी या बेटा देखता तो मन ही मन विजुवलाइज करने लगता कि यह औरत इस आदमी के ऊपर रही होगी तभी लड़की पैदा हो गई। दिक्कत तब होती जब कोई बेहद मोटी महिला दिखती और उसका सूख कर कांटा हुआ पति। तब मुझे यह सोच कर बड़ी परेशानी होती कि जब यह मोटी इस पर चढ़ी होगी तो यह चिल्लाया होगा---अरे बाप रे, नहीं करना सेक्स, नीचे उतरो, बहुत भारी हो....। उस समय मेरी बुद्धि में यह बात नहीं आई कि अगर ऐसे ही लड़का-लड़की पैदा होते तो सारे पुरुष उपर ही क्यों न रहते ताकि लड़का ही पैदा हों जैसा कि लड़के को लेकर समाज में जो चाहते है, उसे देखते हुए यह सभी लोग करते। मैंने यह सवाल उस पंडीजी से भी किया था तब उनका कहना था कि दरअसल सेक्स के समय में लास्ट में जब सब कुछ हो चुकने को होता है तब किसी की मर्जी नहीं चलती। अपने आप लोग उपर नीचे होते रहते हैं, इसी क्रम में जो कुछ होना होता होगा हो जाता होगा......अरे बाप रे,,,,काफी कुछ लिख मारा,,,,भाई लोगों ने सुभाष जी का ब्लाग बंद कराया है, इस पर भी नजर है......लेकिन इस खबर पर बाद में आते हैं, पहले पहली वाली खबर पूरी कर लूं....
तो...अलियार मेरे छोटे भाई के बेटे का नाम रखा गया है जो अभी एक महीने पहले ही इस दुनिय में आया है। अलियार की बड़ी बहन खुशी हैं जो चार साल की होने वाली हैं। खुशी को भाई मिल गया, साथ खेलने के लिए....। मां ने अलियार नाम इसलिए रखा होगा ताकि इस पर किसी की नजर ना लगे और पुराना टोटका एक बार फिर चल निकले।
अलियार की लंबी उम्र की दुआ के साथ मैंने आज दिन भर अपने बेटे को कूड़ा नाम रखकर पुकारा जिससे वह काफी विचलित हुआ लेकिन इस नाम की पृष्ठभूमि के बारे में बताया तो उसे कूड़ा कहलाने में कोई खास दिक्कत नहीं होई।
अब अगली खबर...
खबर नंबर दो - लखनऊ आई-नेक्स्ट के एक साथी से चैट के दौरान पता चला कि दिनेश श्रीनेत्र बंगलूर जाकर किसी कंपनी में ज्वाइन कर चुके हैं। उसने तारीफ करते हुए बताया कि जितना पाते थे उससे डबल पैकेज मे गए हैं और कंपनी ने एयर टिकट फ्री में अलग से भेजा था। मुझे सुनकर इसलिए कष्ट हुआ कि भड़ास के सचित्र साथियों में से एक हैं दिनेश और उन्होंने जाने के बाद भी अभी तक कोई खबर नहीं दी कि वे यहां आ गए हैं। कम से कम हम लोग एक सूचना ही छाप देते कि अपने भड़ासी भाई बेंगलूर चले गए हैं। यहां कहां मैं प्रिंट मीडिया के साथियों के लिए एक कामन प्लेटफार्म डेवलप करने के लिए गांड़ मरा रहा हूं और कहां अपने भाई लोग चुपचाप चले जा रहे हैं और जाने के बाद भी खबर नहीं दे रहे हैं। अगर ऐसे ही रहा तो मैं भड़ास से दे दूंगा इस्तीफा। वैसे ही इस ब्लागिंग ने इतना समय ले लिया है कि जिंदगी जीना मुहाल हो गया है।
खबर नंबर तीन - सुभाष भदौरिया का ब्लाग ब्लाक कर दिया गया है, ऐसी सूचना मिली। इससे दुख तो हुआ लेकिन फरक क्या पड़ता है, बहुत जल्द सुभाष जी ब्लागस्पाट पर अपना ब्लाग लेकर आ जाएंगे। वरना, भड़ास उनका अपना ब्लाग है ही, यहां लिखें या वहां, बात तो यह है कि कहीं लिखना चाहिए.....। ब्लाग बंद करने से आवाज नहीं बंद हो जाती। आज की ही तो खबर है कि सुप्रीम कोर्ट ने ए गनपत गाने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। जब इस देश में लोकतांत्रिक संस्थाएं इतनी मजबूती पाती जा रही हैं तो उसमें चंद हरामी टुच्चे टाइप के लोगों के भों भों करने से क्या होता है। मुझे चिंता
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यशवंत सिंह yashwant singh
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करता था सफ़ल जवानी को....
हय रुण्ड गिरे, गज मुण्ड गिरे, कट कट अवनी पर शुण्ड गिरे,
लडते लडते अरि झुण्ड गिरे, भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे।
निर्बल बकरों से बाघ लडे, भिड गये सिंह मृग छौनो से।
घोडे गिर पडे, गिरे हाथी, पैदल बिछ गये बिछौनो से।
चढ़ चेतक पर तलवार उठा, रखता था भूतल पानी को
राणा प्रताप सर काट काट, करता था सफ़ल जवानी को।
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अंकित माथुर
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यशवंत सिंह yashwant singh
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चाहता हूं गालियां अपने लिए भी
चाहता हूं गालियां अपने लिए भी
मैं भी जनरल बोगी की दुर्गंध में बैठ,
दुर्घटना का शिकार होना चाहता हूं,
चाहता हूं मैं भी भूख से बेहाल होकर-
कंकर पत्थर फांकना।
पहनकर घूमना चाहता हूं-
कपड़े के नाम पर-
एक चिथड़ी कमीज और निकर।
लेना चाहता हूं एक निशंक नींद-
चौराहे के फुटपाथ पर,
चाहता हूं मैं भी गरियाया जाऊं-
छुट्टी मांगने या,
चम्मच ठीक से साफ न कर पाने पर।
...और भी बहुत कुछ है जो-
मैं चाहता हूं खुद के लिए-
ताकि ठीक सकूं एक कविता-
इंसान की मजबूरी पर।
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यशवंत सिंह yashwant singh
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एहसास...छटपटाते हुए
जिन्दगी के कैनवास पर-
हम कभी- कभी-यूं ही लगने लगते हैं,
किसी ऐसे 'इलेक्ट्रोनिक डिवाइस' की तरह-
जिसे म्यूट कर दिया गया हो।
फंक्शन तो सारे के सारे-
ज्यों के त्यों चलते रहते हैं,
आवाज़ नहीं निकलती-
ना जागने की, ना सोने की,
ना कराहने की, ना मुस्कुराने की-
ना गुदगुदी करने से-
आने वाली हंसी की।
ना ही किसी ख़ुशी से -
बदन में होने वाली सनसनाहट की
.....यहाँ तक कि-जिंदा रहने की भी नहीं।
फिर भी हम -चलते रहते हैं,
लुढ़कते रहते हैं......
इस आस में कि -
कोई तो मिलेगा रास्ते में
जो समझेगा हमारे -
कुम्हले - छटपटाते हुए एहसासों को -
और.....
भंग कर सकेगा हमारी चुप्पी-
अपने अच्छे से " रिमोट कण्ट्रोल" से।
लुढ़कते रहते हैं......
इस आस में कि -
कोई तो मिलेगा रास्ते में
जो समझेगा हमारे -
कुम्हले - छटपटाते हुए एहसासों को -
और.....
भंग कर सकेगा हमारी चुप्पी-
अपने अच्छे से " रिमोट कण्ट्रोल" से।
----अभिषेक सत्य व्रतम्
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यशवंत सिंह yashwant singh
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नंदन जी, ये 'नालायक' बच्चे बहुत नाम करेंगे
नेहरू प्लेस पर ब्लागरों की छोटी सी जुटान। जान-पहचान करने-कराने के बाद चाय-लड्डू फिर बतकही। बाद में पधारे सुप्रसिद्ध कन्हैयालाल नंदन जी। बोलना शुरू किया तो पूरी भड़ास निकाली। अच्छी बातें बताईं। एक पल को लगा, जैसे घर का मुखिया खानदान के रास्ता भटकते दिख रहे नए खून वालों को समझा-बुझा रहा है। नसीहतें दे रहा है। बिगड़ने न देने के लिए सावधानियां सिखा रहा है। अपने अनुभवों का निचोड़ रख रहा है। अपनी तो बीत गई, तुम सब सही रखना....के लिए मंत्र दे रहा है। पर जैसा कि ऐसे मौकों पर होता है, नए खून वाले गुरु गंभीर मुद्रा में सारी बातें सुनते रहे और आदरणीय-श्रद्धेय कन्हैयालाल जी सुनाते रहे। बड़े हैं--सुन लो, बातें सिर-माथे पर लगा लो। ये अनुभवों की अमृत है, परंपराओं की बूटी है--सहेजकर रखो, इस्तेमाल करो, हमेशा भला होगा। नंदन जी ने बातों-बातों में नेताओं को गरियाया, पत्रकारों को समझाया, नवयुवकों को अनुशासनहीन बताया....। सबका सार था कि चीजें बिगड़ रही हैं। पुरानी चीजें सब 'बिसूर' रही हैं। इन्हें संभालो, इन्हें बचाओ। जैसे कि ये जो ट्रैफिक है, कोई रुकना नहीं चाहता। लालबत्ती है भी तो मौका मिलते ही गाड़ी निकाल लेते हैं। ऐसे कैसे चलेगा सब। भाषा के प्रति कोई राग नहीं है। जैसे, देसज शब्दों और लोकधुनों से आज के लड़कों का वास्ता नहीं दिखता। इनकी मिठास-गहराई को कोई महसूस नहीं करता। कोई जानता नहीं। राजनीति ज्यादा हो रही है। देशहित की चिंता कम दिख रही है। बदले माहौल में बदले विजन के साथ काम नहीं हो रहा है। उनकी बातें सुनते हुए लगा, जैसे प्राइमरी और मिडिल स्कूल में गद्द की किताब का एक और पाठ पढ़ रहा हूं और पाठ की भूमिका में महान लेखक के बारे में लंबा-चौड़ा इतिहास लिखा गया है। नंदन जी साक्षात सामने थे। बोलते हुए सुनना मुझ जैसे देहाती के लिए एक ऐसा पल था जिसे बार-बार याद करना चाहूंगा। कभी नंदन जी का जिक्र आएगा तो मैं तुरंत उनके साथ अपने को जोड़ूंगा-कहूंगा....हां, मैं उनसे मिला था एक बार, ब्लागर मीटिंग में, मैथिली जी के यहां। लेकिन पूरी श्रद्धा और आदर देने के बावजूद उनकी बातों से मैं बिलकुल नहीं सहमत हुआ। ऐसा क्यों है कि एक खास उम्र तक पहुंचते-पहुंचते हमारे देश के साहित्यकारों, पत्रकारों, नेताओं और कलाकारों आदि को सब कुछ खराब, सड़ता हुआ, बिगड़ता हुआ, दिशाहीन होता हुआ, भटकता हुआ, हाथ से फिसलता हुआ, भयावह होता हुआ....दिखने लगता है। अरे भाई, जब आप भी नौजवान थे तो आपके समय के बुजुर्गों को ऐसा ही लगता रहा होगा, लेकिन आपने तो साबित किया कि आप उनकी उम्मीदों से कहीं ज्यादा आगे अच्छा कर सकते हैं और किया भी। इसी तरह, आदरणीय-श्रद्धेय नंदन जी, इस देश के लड़के उतने बेकार नहीं है जितना आपको लगता है। मैं आपको आज की पीढ़ी की ओर से आश्वस्त करना चाहूंगा कि देश बहुत सही दिशा में जा रह है, जो हो रहा है वो अच्छे के लिए हो रहा है। जो होगा, वो भी अच्छे के लिए। ये बातें सुभाषतानि नहीं, मौजू हैं। जैसे, आज की कुछ प्रमुख खबरें ले लीजिए....इनके आधार पर मैं कह सकता हूं कि अपन का इंडिया या अपन का भारत फुल स्पीड से या पूरी गति से अपनी महानता की वापसी जोर-शोर के साथ करने जा रहा है। ये खबरें है---हाकी मैच के फाइनल में दक्षिण कोरिया को बुरी तरह पीटकर भारत का एशिया कप जीतना। भारत के वैज्ञानिकों द्वारा ८२ वर्ष पहले दी गई अवधारणा के आधार पर पहली बार बोस-आइंस्टीन कंडेंसेसन (संघनन) निर्मित कर देना। एशिया की सबसे जोरदार रिजल्ट देने वाली कंपनियों में से १२ कंपनियों का भारतीय होना। ये सिर्फ आज की खबरें हैं। कोई कह सकता है, पार्टनर----इनसे क्या भुखमरी खत्म हो जाएगी, किसानों की आत्महत्याएं रुक जाएंगी, महिलाओं की दशा सुधर जाएगी, दलितों-पिछड़ों का हक मिल जाएगा, बेरोजगारों को नौकरी मिल जाएगी.......। ऐसे हजार सवाल लिख सकता हूं, खड़ा कर सकता हूं। पर एक बात विश्वास के साथ कह सकता हूं कि इस लोकतंत्र में जिसने भी कुछ नया करने की ठानी, उसने कर दिखाया। इसी देश के नौजवान हैं जो पूरी दुनिया में अलग-अलग क्षेत्रों में झंडा गाड़े हुए हैं। इसी देश के नौजवान हैं जो गरीब-गुरबों की दशा सुधारने के लिए गांवों में जाकर कुछ नया कर रहे हैं। इसी देश की लड़कियां हैं जो पूरे दम-खम से मर्दों से टक्कर लेते हुए, उन्हें झेलते-सहते और उन्हें सिखाते-सुधारते हुए आगे बढ़ रही हैं। इसी देश के दलित-पिछड़े हैं जो हक न मिलने पर कभी आंदोलनों के जरिए तो कभी बंदूकों के जरिए अपनी आवाज गुजाते हैं। अब ये तो हमारा आपका काम है ना कि समाज में चल रहे अंडरकरेंट को समझें और उन्हें ठीक तरीके से सत्ता प्रतिष्ठानों तक पहुंचाएं। दिल्ली में रहने का मतलब केवल हम लोगों को हगना-मूतना या जीवन-चलाना ही नहीं होता, हम लोगों को दायित्व हैं कि देश की समस्याओं को बजाय सरलीकृत कर उन पर बात करने के उनकी माइक्रो स्टडी कर उनके हल के लिए प्रेशर ग्रुप बनाने चाहिए। पी साईंनाथ जो काम आजकल कर रहे हैं, संभवतः ऐसा कोई संपादक-पत्रकार नहीं होगा जो उनकी तारीफ न करता होगा। देसज शब्दों और सोहरों से बाहर निकल वह देसज दुनिया के नंगे सच को खाए-अघाए शहरियों तक पहुंचा रहे हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि भयानक तरीके से व्यावसायिक हो चुकी मीडिया के चौबीसों घंटों और दर्जनों पन्नों में इन आवाजों-कराहों के लिए जगह कहां हैं। लेकिन रास्ते बंद नहीं हो जाते। जिन जगहों पर सवाल हैं तो उन्हीं जगहों पर उन्हीं हालात में जवाब तलाशने और उसे तैयार करने वाले जवान भी हैं। अगर हमें सिर्फ शहर के अराजक नौजवान ही दिखते हैं तो जाहिर सी बात है कि दिक्कत हमारी नजर में है। नंदन जी को मैं आश्वस्त करना चाहूंगा, आप निश्चिंत रहें, ये जो नालायक बच्चे हैं ना, सुबह मम्मी-पापा के सामने घर के मंदिर में हनुमान जी के सामने हाथ जोड़कर व टीका लगाकर घर से आफिस या कालेज के लिए निकलने वाले और देर रात डिस्कोथे से दारू पीकर टुन्न होकर लौटने वाले.......ये नालायक नहीं हैं। बहुत समझदार हैं। दरअसल ये नए जमाने के हिसाब से एक नहीं, कई व्यक्तित्तव जीते हैं और इनमें संतुलन भी बनाए रखने की कोशिश करते हैं तो ये इनका दोष नहीं, गुण हैं। गाय की तरह सीधा बच्चा किसी परिजन को पसंद नहीं है। वो हर जगह पिटेगा, हर जगह मात खाएगा। बाजार ने जो दुनिया बनाया है, उसी हिसाब से हम सब अपने लौंडों को गढ़ने-ढालने में लगे हैं। तो, फिर इन लौंडों को काहें दोष दें?? अपवाद हर जगह होते हैं, ब्लैक शीप हर जगह होती हैं......लेकिन आज के नौजवानों का बहुमत बहुत काशस है, बहुत सचेत है। वह बहुत जिम्मेदार है। वह हर क्षण जीता है। वह हर क्षण को चुनौती के रूप में लेता है। वह हर जगह एक्सपेरीमेंट करता है। जब वो एक्सपेरीमेंट करेगा तो बुरा भी करेगा, अच्छा भी करेगा। बुरा होने पर हल्ला होगा....क्या कर डाला लेकिन विज्ञान भी यही कहता है.....अविष्कार एक दिन ही नहीं हो जाता। उसके लिए बहुत सहना-झेलना पड़ता है और बहुत पक्की नींव बनानी पड़ती है। नींव के जो पत्थर हो गए उन्हें कौन याद रखता है। इसी तरह बुरा करने वाले नौजवान बाकी नौजवानों को सबक दे देते हैं--ऐसा नहीं करना है, इस तरह नहीं मरना है।
मैं सहमत हूं। बदले दौर में नई तरह की कई समस्याएं हैं। ये समस्याएं बहुत गंभीर हैं। बहुत भयावह हैं। लेकिन उन पर रोते रहने से, उन्हीं के चलते अवसादग्रस्त होकर बैठ जाने से क्या हो सकता है। किसी भी चीज की हर वक्त दशा-दिशा खराब और सही होती है। देखना यह है कि क्या चीजें इतनी ज्यादा खराब हैं कि अच्छाई अल्पमत में दिखता जा नजर आ रहा है। अगर इस सरलीकृत सवाल का कोई मुझसे जवाब पूछे तो मैं कहूंगा.....नहीं, अच्छाई बहुत ज्यादा है। मुझे भरोसा है अपनी पीढ़ी पर, अपने बाद वाली पीढ़ी पर और तैयार हो रही पीढ़ी पर। हम पहले से ज्यादा खुले दिमाग के हुए हैं। संस्कार के नाम पर कूपमंडूकता को बिलकुल नहीं ओढ़े हैं। आधुनिकता के नाम पर पुरखों-बुजुर्गों की अनदेखी नहीं किए पड़े हैं। घर-परिवार में आस्था रखने वाले ये नौजवान आज भी अपने समाज और अपने देश को उसी तरह चाहते हैं जिस तरह नंदन जी या फिर नेहरू-गांधी की पीढ़ी चाहती थी।
दादा, ये भड़ासी और ये सारे ब्लागर आपको आश्वस्त करते हैं कि जो नया भारत तैयार हो रहा है, उसकी शक्ल पहले से बिलकुल बदशक्ल नहीं दिखेगी। इसकी शक्ल में एक अल्हड़ की-सी ताजगी दिखेगी जिसमें विवेक और धैर्य के साथ आगे बढ़ते जाने का विजन और जुनून धैर्यवान जुनून होगा। नंदन जी, आप शतायु हों, आप फिर हम सबको मिलने का मौका दें....यह प्रार्थना मैं करता हूं। आपसे मिलकर अपार खुशी हुई और यह खुशी नकली या दिखावटी नहीं बल्कि दिल से है क्योंकि भड़ासी मन में कुछ नहीं रखते। कुछ ब्लागर मीट में उगला, कुछ इस पोस्ट में उगल दे रहा हूं, ताकि मन हलका हो जाए। इसके बाद जो दिल में बचा है वह सिर्फ प्रेम, प्रसन्नता और अपार ऊर्जा। उम्मीद है, आपका आर्शीवाद हम सभी ब्लागरों पर बना रहेगा।
ब्लागर मीट के लिए अरुण जी, अनूप जी और मैथिली जी को खासकर धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन सभी ने भड़ासियों की तरफ से मुझे और सचिन मेरठी को आप सबसे रू-ब-रू होने का मौका दिया। ठग्गू के लड्डू और समोसे के मटर का स्वाद अब तक जेहन में है। इसे बनाए रखूंगा ताकि वो मिटे तभी जब मैथिली जी अपनी मेहमाननवाजी में कुछ और नए स्वाद हम लोगों की जबान पर चढ़ाएं।
आलोक पुराणिक जी तो भड़ास के लिए सेलेब्रिटी हैं क्योंकि उनके द्वारा लिखकर दिए गए मंत्रों से भड़ासियों ने काफी कुछ सीखा है। उम्मीद है, कभी भड़ासियों की गली में भी पधारेंगे। मैंने तो आलोक पुराणिक को गाजीपुर के अपने गांव में दुआर पर शाम ढलते हुए और सुबह सूरज चढ़ते हुए बार-बार पढ़ा है।
अविनाश जी के दर्शन होने से मेरे लिए अधूरी सी लग रही ब्लागर मीटिंग पूर्ण हो गई।
राजेश रोशन को आने-जाने के दौरान बतियाने व सही तरीके से रास्ता बतलाने के लिए धन्यवाद।
ब्लागर मीटिंग के बारे में और कुछ पढ़ने-जानने या तस्वीरें देखने के लिए यहां भी क्लिक करें....
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मेरी नजर से
चिट्ठाकार भी इंसान होता है
दिल्ली में ब्लागरों की बैठक
भड़ासी हैं बड़े प्यारे
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बाकी फिर कभी लिखेंगे..........
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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भड़ास मुर्दाबाद
भई....बहुते बुरा हुआ है। भड़ास शुरू करके फंस गया लगता हूं। जिस ब्लाग को अपने गले में फंसी आवाज उगलने के लिए बनाया था, वही गले की फांस बन गया है। इतना गड़बड़ हो जाएगा, अपन को बिलकुल उम्मीद न थी। आप पूछेंगे- हुआ क्या? मैं कहूंगा- बच्चा रो रहा है। आप कहेंगे- वुडवर्स दे दे। लेकिन मैं कहूंगा- इससे काम नहीं चलने वाला। तो फिर?
देखते देखते 90 लोगों से उपर की टीम, और उसमें भी कई घुसपैठिए फर्जी नाम से विराजे हैं। रोज बीस-पच्चीस मेल तो सिर्फ भड़ास की पोस्टों, कमेंटों व कनबतियां से जुड़ी होती है। अपना फोन नंबर देकर और आफत मोल ली। एसएमएस, फोन काल, मेल...सबमें कनबतियां और भड़ास.....। आज से पहले कभी जरूरत महसूस न हुई कि घर पर कंप्यूटर रखें। देहाती आदमी। जितने कम साजो-सामान में ज़िंदगी खिंच जाए, उतने भला। आफिस में आठ-दस घंटे आंख फोड़ने के बाद घर में कंप्यूटर पर आंख का आपरेशन करने की मेरी बिलकुल तमन्ना नहीं। लेकन मुआ भड़ास, ये तो अब वीकली आफ में परान लिए है। आफिस में वैसे ही बास डांट पिला देते हैं--जब देखो भड़ास खोले मिलता है, इसी में टुक टुक करता रहता है....। मैं भी अपराध बोध से भर जाता हूं। भई, आफिस में तो आफिस ही होना चाहिए। अगर मेरे अंडर में कोई बालक इस तरह का कृत्य करेगा तो मैं तो तनिक न माफ करता। तो एकदम से ठान लेना पड़ा...नहीं, अब नहीं। आफिस में भड़ास अब नहीं। पर हरामजादी ये कसमें हैं न, कभी तो ठीक से ठिल्ले चढ़ जाएं। साली टूट जाती हैं। ये भी टूट गई। भाई लोग इंडिया का मैच देखने में लगे हैं तो मुझे लगा, चलो लगे हाथ अपनी भड़ास की भड़ास ही निकाल दूं जो गले में अंटकी हुई है और गाहे-बगाहे अपने अविनाश भाई से रोकर मन हलका कर लेता हूं। मैं अविनाश जी से कहता हूं कि प्रभु, इससे मुक्ति दिलाओ। जान फंस गई लगती है। तो अपने अविनाश भाई जान बचाने की बजाय जान और उलझाने वाली बातें समझा देते हैं और बुरी बात ये कि मैं इसे समझ भी जाता हूं। वे भड़ास के बेहतर भविष्ट के जो सब्जबाग दिखाते हैं और हिंदी ब्लागिंग में इस अभिनव प्रयोग को जो तमगे देते हैं, उसे सुनकर चुप्पी साध लेता हूं और एक आज्ञाकारी की तरह फिर भड़ास की ड्यूटी बजाने लगता हूं। लेकिन बात ड्यूटी बजाने की हो तो कउनो बात नहीं। दरअसल पेंच तो दूसरी है। अब पाकेट का खर्चा भी इसी में जा रहा है। मुंह को लगी दारू तो अभी छूटी नहीं, एक भड़ास और पाल लिया। दोनों पर डबल खर्चा। अरे हां, इसी प्रसंग में याद आया। कल शशि जी मुंबई से लोकमंच वाले फोन किए रहैं। बोले- यशवंत भाई, बधाई, भड़ास के लिए। बात देर तक होती रही। दशा-दिशा पर। मैं भी दूसरे पत्रकारों की तरह अपनी शेखी बघारने और हांकने में पीछे नहीं रहा। भड़ास का जो भविष्य उन्हें बताया तो वे भी वाह वाह कर उठे। बाद में वे बताए कि दरअसल जो वो लोकमंच डाटकाम चलाते हैं उसमें सिर्फ वो पैसा खर्च करते हैं जो दूसरे उनके साथी प्रेस क्लब में जाकर खर्च कर देते हैं। प्रेस क्लब का मतलब दारू ही होता है, बिलकुल सही समझा आपने। तो मैंने तुरंत कहा- भाई, मेरा तो डबल खर्चा है। प्रेस क्लब वाला भी और भड़ास वाला भी। अब रोज एक से लेकर चार घंटे तक साइबर कैफे में बैठना पड़ता है। पंद्रह रुपये प्रति घंटे के हिसाब से पेमेंट देकर जब आता हूं तो दिल में हूक उठती है--साले, चूतियापे में आज के पव्वे का पैसा तो तुमने इस चूतिये साइबर कैफे वाले को दे दिए। शाम को क्या करेगा...घंटा। तो मन रोने लगता है। घर पहुंचकर पत्नी और बच्चों की शक्ल देखता हूं तो लगता है कि यशवंत तुझसे ज्यादा पागल पत्रकार कोई न होगा। तूने आज तक कोई बैंक बैलेंस को कौन कहे, एक रुपया तक नहीं बचाया। जो मिलता है सब फूंक ताप कर बराबर। पी-पाकर बराबर। फूंक-उड़ाकर बराबर। गा-बजाकर बराबर। खिला-पिलाकर बराबर। इन नन्हे मु्न्नों की तो सोचो। इन छौनों की तो सोचो। इन अपने क्लोनों की तो सोचो। इस सीता रूपी पत्नी की तो सोचो। ये कहां जाएंगे। टुकुर टुकुर करके तुमको ही तो निहारते हैं। लेकिन तू है कि कमीने...........मानता नहीं।
अब आप ही बताइए। कैसे चले भड़ास। सब साथी सलाह देते हैं। घरवा पर कंपूटरवा लगवा ला ना। त हमार जवाब होला...झोली में झांट नहीं, चला जगन्नाथ जी। एक साथी ने कहा - भड़ास के साथियों से चंदा मांग कर ले लो। तो मैंने कहा- उससे अच्छा होगा कि मैं भड़ास बंद कर दूं। भड़ास तो देने का मंच है। मुक्ति देने का, सहजता देने का, सरसता देना का, एकजुटता देने का....। .यहां लेने से क्या मतलब? तो ये आइडिया भी निप इन द बड कर दिया। दरअसल निप इन द बड इसलिए याद रहता है क्योंकि अंग्रेजी के इस एकमात्र मुहावरे को बचपन में खूब रटा था। तो भइया......भड़ास को लेकर मैं बड़ा परेशान हूं और भड़ास से कई भाई लोग बहुत परेशान हैं। ऐसे में करें क्या....कुछ उपाय सुझाइए ना........।
आज तो जय भड़ास कहने की कतई इच्छा नहीं हो रही क्योंकि बेहद गुस्से में हूं। इसलिए माफ करिएगा, आज कहूंगा.....
भड़ास मुर्दाबाद
यशवंत
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मोहब्बत की तबीयत......
मोहब्बत की तबीयत में
ये कैसा बचपना कुदरत ने रखा है
के ये जितनी पुरानी
जितनी भी मज़बूत हो जाए
इसे ताज़गी की जरूरत फिर भी रहती है
यकीं की आखिरी हदों तक
निगाह में लहलहाती हो
आंखों में चमकती हो
लहू में जगमगाती हो
इसे इज़हार के लफ्ज़ों की
चाहत फिर भी रहती है
मोहब्बत मांगती है यूं
गवाही अपने होने की
जैसे इक बच्चे की नादानी
शाम को बीज बोये
और रात में कई बार उठे
ज़मीन खोदकर देखे
के ये पौधा कहां तक है
मोहब्बत की तबीयत में
अजब तकरार सी क्यों है
के ये इज़हार के लफ्ज़ों को
सुनने से नहीं थकती
बिछड़ने की कोई घड़ी हो
या मिलने का कोई मौक़ा
इसे बस एक ही धुन है
कहो मुझसे मोहब्बत है
बुजुर्गों की कहावत है
किसी भी पल के रुक जाने की
ख्वाहिश दिल में मत करना
यकीं और उम्मीदों के बीच
कठिन-आसान रस्तों में
ना जाने............
बीते हुए कितने ही लम्हे हैं
कि जिनको रोकना चाहा
मगर हम रोक ना पाये
फिर ऐसी राह भी आई
के जिनको पार करने में
लगा, सारी उम्र गुज़री
शुमार वक्त में लेकिन
ये सब उतने ही लम्हे थे
के जिनको रोकने की आरज़ू में
ये रिवायत भूल बैठे थे
किसी भी पल के रुकने की
ख्वाहिश दिल में मत करना
.......................................रियाज़
मेरे दिल का दरवाज़ा खुला है
जिस तरह से चाहो आ जाओ
इस रियासत में अब वजीरे दाखिला कोई नहीं
पहले तो रहता था यहां कातिलों का इक हुजूम
अब तेरे सर की कसम तेरे सिवा कोई नहीं
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हादसे क्या हुए रस्ते में मुझे याद नहीं
आबले पांव के तफ्सीले सफर रखते हैं
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रियाज़
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आसमान का स्वाद कैसा होता है
क्यों इन सपनों में रंग भर रहे हो चित्रकार
ये ऐसे ही थे धूसर बेरंग
क्यों इन कल्पनाओं को पंख दे रहे हो
ये उड़ना नहीं जानती
आसमान का स्वाद कैसा होता है
मैंने चखा नहीं
उड़ने का अहसास कैसा होता है
मैंने कभी छुआ नहीं
पर अब इच्छा है चित्रकार
मेरे सपनों में रंग भर दो
मैं भी सपने देखना चाहती हूं
मेरी कल्पनाओं को पंख दे दो
एक बार उड़ना चाहती हूं
जाना चाहती हूं दूर देस
जहां जी सकें सतरंगी सपने
सुंदर आत्माएं- तन और तृष्णा से मुक्त
विचरण करें अपने होने को
संपूर्णता में अभिव्यक्त करते
खिलखिल झिलमिल हिलमिल
बस कुछ ऐसे ही रंग हों
भाषा हो, रोशनी हो, संगीत हो
सब एक दूसरे में एकाकार होती हुईं
अपने अलग-अलग होने के वजूद को साबित करते हुए भी
होड़ करें मुक्ति के उस मन को छू लेने को
चूम लेने को
जिसके लिए तुम हो, मैं हूं, सब हैं..
आसमान का स्वाद, उड़ने का अहसास
पा लेने दो........उड़ जाने दो...दूर देस
-मीरा
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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